ग्लोबल वार्मिंग | कारण | उपाय | प्रभाव (global warming) | global warming in hindi

ग्लोबल वार्मिंग (Global warming)

वैश्विक स्तर पर मानवीय क्रियाकलापों द्वारा विकिरण या ऊष्मा संतुलन में परिवर्तन हो रहा है जो भूमंडलीय उष्मन तथा उससे जनित भूमंडलीय पर्यावरण परिवर्तन के रूप में विश्व के समक्ष समस्या उत्पन्न कर रहा है। क्षोभमंडल में पृथ्वी की सतह के नज़दीक के वातावरण के औसत तापमान में वृद्धि को भूमंडलीय तापन कहते हैं, जिसके कारण वैश्विक जलवायु प्रतिरूप में परिवर्तन आता है। सामान्यतः मानव क्रियाओं द्वारा उत्सर्जित हरित गृह गैसों में वृद्धि के परिणामतः उत्पन्न ताप वृद्धि को वैश्विक तापन कहते हैं।
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ग्लोबल वार्मिंग के कारण (Causes of global warming)

ग्लोबल वार्मिंग के यूँ तो बहुत सारे कारण हैं, लेकिन इसका मुख्य कारण ग्रीन हाउस गैस है जो कुछ प्राकृतिक प्रक्रियाओं से तो कुछ मनुष्यों के द्वारा पैदा की हुई है। जनसंख्या में वृद्धि तथा उसके द्वारा आवश्यक ऊर्जा एवं अन्य साधन के इस्तेमाल की वजह से 20वीं सदी में ग्रीन हाउस गैसों को बढ़ते देखा गया है। वायुमंडल में कई सारी ग्रीन हाउस गैसों के बढ़ने का कारण औद्योगीकरण है, क्योंकि लगभग हर आवश्यकता की पूर्ति के लिये उद्योग की स्थापना आवश्यक हो गई है।
पिछले कुछ वर्षों में कार्बन डाइऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड 10 गुना से अधिक बढ़ा है। ऑक्सीकरण के चक्रण और प्रकाश संश्लेषण सहित प्राकृतिक एवं औद्योगिक प्रक्रियाओं के अनुसार CO2 के निष्कासन में वृद्धि होती है। कार्बनिक वस्तुओं के सड़ने से मीथेन गैस निकलती है जो एक ग्रीन हाउस गैस है। इसके साथ ही दूसरी ग्रीन हाउस गैस नाइट्रोजन का ऑक्साइड, हैलो कार्बस, क्लोरोफ्लोरो कार्बन, क्लोरीन आदि हैं। ये सभी गैसें वायुमंडल में एक साथ मिल जाती हैं और वातावरण के संतुलन को बिगाड़ते हैं, जिससे वायुमंडल की विकिरण को सोखने की क्षमता प्रभावित होती है परिणामतः धरती की सतह गरम होने लगती है।
अंटार्कटिका क्षेत्र के ओज़ोन परत में कमी आना भी ग्लोबल वार्मिंग का एक कारण है। क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैस के बढ़ने से ओज़ोन परत में कमी आ रही है। ये ग्लोबल वार्मिंग का मानवजनित कारण है। क्लोरो फ्लोरोकार्बन गैस का इस्तेमाल अनेक जगहों पर औद्योगिक तरल सफाई में एरोसॉल प्रणोदक की तरह एवं फ्रिज में होता है, जिसके नियमित रूप से बढ़ने से ओजोन परत में कमी आती है।

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ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव (Effect of global warming)

ग्लोबल वार्मिंग का सीधा प्रभाव ग्लेशियर पर पड़ता है। तापमान में वृद्धि के साथ ग्लेशियर पिघल रहे हैं। दुनिया के कई हिस्सों में बाढ़ जैसी स्थिति लगातार बन रही है। इसके अलावा बढ़ते समुद्र के स्तर से जीवित प्राणियों की प्रजातियाँ खतरे में पड़ गई हैं जिसके चलते हमारी पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ गया है जिसका प्रभाव हमें निम्नलिखित रूपों में दिखाई दे रहा है-

मौसम का बदलना (Change of weather)

तापमान में वृद्धि का परिणाम बदलते मौसम के रूप में दिखना शुरू हो गया है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण वाष्पीकरण की दर तेज़ हो जाती है परिणामस्वरूप अनियंत्रित बारिश का खतरा बढ़ जाता है, जिससे कई इलाकों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। कई जानवर और पौधे अत्यधिक वर्षा बर्दाश्त नहीं कर पाते जिसके परिणामस्वरूप इनकी संख्या में कमी होने लगती है, जानवर अपने निवास को छोड़कर भाग जाते हैं, जिसका प्रभाव पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन पर पड़ता है।
ग्लोबल वार्मिग से एक तरफ जहाँ बाढ़ की स्थिति बन रही है वहीं दूसरी तरफ इसके कारण सूखे की समस्या का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि वाष्पीकरण अधिक होने से सूखे की भी समस्या बढ़ रही है। साथ ही साथ दुनिया के हिस्सों में पीने के पानी की समस्या बढ़ रही है। सूखा के कारण लोगों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल पा रहा है और कई देशों में भूख से मरने की स्थिति उत्पन्न हो गई।

रोगों में वृद्धि (Increase in disease)

तापमान बढ़ने का हमारे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अधिक वर्षा के कारण मलेरिया और डेंगू जैसे रोगों का खतरा बढ़ रहा है। वायुमंडल में कार्बन मोनोऑक्साइड का स्तर बढ़ रहा है जिससे हमें साँस लेने में कठिनाई महसूस होती है। अगर तापमान दर में वृद्धि जारी रही तो श्वसन समस्या तथा उनके लक्षण तेजी से फैल जाएंगे।
ग्लोबल वार्मिंग का एक प्रभाव मस्तिष्क समस्या के रूप में भी उभर रहा है। हालाँकि इस पर विशेषज्ञ शोध कर रहे हैं। माना यह भी जाता है कि लोग अपने घर और परिवार को सूखा, बाढ़, तूफान एवं ऐसी ही प्राकृतिक आपदा में खो देते हैं। इससे उनकी मानसिक स्थिति पर असर पड़ता है। असहनीय तनाव एवं विकार के पश्चात् वे निराशा के गर्त में चले जाते हैं जिससे अन्य बीमारियाँ भी हो जाती हैं। जब सूखे की स्थिति भयानक हो जाती है तो कई किसान आत्मघाती कदम उठा लेते हैं।

कृषि पर प्रभाव (Impact on agriculture)

नज़दीकी भविष्य में ग्लोबल वार्मिंग का सबसे ज़्यादा प्रभाव कृषि पर पड़ने वाला है जिसका रूप धीरे-धीरे दिखना शुरू हो गया है। हालाँकि कई बार हम फसलों की बर्बादी के मामले में इसके परिणाम भुगत चुके हैं। अधिक तापमान के कारण कई फसलों का पनपना मुश्किल हो जाता है परिणामस्वरूप उनका अस्तित्व धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। अत्यधिक बारिश या अत्यधिक सूखे के कारण कई फसलों की पैदावार सही नहीं हो पाती परिणामस्वरूप अनाज की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। पौधों से हम भोजन प्राप्त करते हैं। इस तरह से दुनिया भर में भोजन की कमी हो जाएगी और मुमकिन है कि यह कई देशों के बीच युद्ध का कारण होने वाला हो। सागर के असंतुलन के कारण कई मौसमों के चक्र प्रभावित होते हैं तथा कई मौसमों के आने का समय ज्ञात नहीं हो पाता है। कई स्थानों पर बरसात का मौसम इतना लंबा होता है कि फसलें बर्बाद होने लगती हैं और कुछ स्थानों पर लंबी गर्मियों के कारण हमारी जिंदगी प्रभावित होती है।

ग्लोबल वार्मिंग से वनस्पतियों में वृद्धि

नासा के द्वारा उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों की सहायता से किये गये एक अध्ययन के पश्चात् यह आश्चर्यजनक तथ्य सामने आया है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण उत्तरी गोलार्द्ध में हरियाली छा रही है। इस अध्ययन के अनुसार 1981 के उपरांत 40° उत्तरी अक्षांश के ऊपर पौधों एवं वनस्पतियों की संख्या में तीव्र वृद्धि हुई है। इस क्षेत्र में 1970 के पश्चात् तापमान में 0.8° की वृद्धि हुई है। परिणामतः वनस्पतियों के क्षेत्रफल में वृद्धि तो नहीं हुई, परंतु उनके घनत्व में तीव्रता से वृद्धि हुई है।
इस अध्ययन दल ने पत्तों के उगने एवं झड़ने के कारणों तथा वृद्धि मौसम का लंबाई पर प्रभाव का भी अध्ययन किया। इस अध्ययन के उपरांत यह निष्कर्ष प्रतिपादित किया गया कि यूरेशिया में पत्तों की वृद्धि का मौसम 18 दिन का होता है, जबकि उत्तरी अमेरिका में यह केवल 12 दिन का ही होता है।
वनस्पतियों में यह वृद्धि वैज्ञानिकों द्वारा अच्छी नहीं मानी जा रही है, क्योंकि हरियाली में वृद्धि से कार्बन चक्र तो प्रभावित हो ही सकता है, साथ में पृथ्वी के लिए सभी प्रकार के पौधे भी लाभदायक नहीं हैं।

अन्य प्रभाव (Other effects)

ग्लोबल वार्मिंग के कारण जंगलों में आग की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है। इससे जंगलों में रहने वाले जीव-जंतुओं के साथ-साथ इसके आस-पास के निवासियों का जीवन भी प्रभावित होता है। अगर इसके दूसरे पहलू को देखें तो समुद्र के जलस्तर में बढ़ोतरी के कारण कई देशों के जलमग्न होने की संभावना है। इनमें ग्रीनलैंड जैसे देश का समुद्री स्तर तेजी से घट रहा है इस कारण सुंदर शहर, देश और यहाँ तक कि कई महाद्वीप भी आने वाले समय में जल समाधि लेकर इतिहास बन जाएंगे।

ग्लोबल वार्मिंग का समाधान (Solution to global warming)

ग्लोबल वार्मिंग की प्रक्रिया की गति को किसी व्यक्ति विशेष से नहीं बल्कि सामूहिक भागीदारी से हम निश्चित रूप से कम कर सकते हैं। घर हो या कार्यालय हो हमें पर्यावरण को ध्यान में रखकर अपने कृत्य को करना चाहिये। हमें प्रदूषण को कम करना चाहिये और ऊर्जा के स्रोतों की रक्षा करनी चाहिये। हमें ओजोन की परत को घटाने वाले पदार्थ की बजाय ओजोन अनुकूल पदार्थ का उपयोग करना चाहिये, जैसे- क्लोरोफ्लोरो कार्बन के स्थान पर हाइड्रोफ्लोरो कार्बन का उपयोग।
इसके अलावा सरकारी एजेंसियों, व्यापारिक नेतृत्व, निजी क्षेत्रों और एन.जी.ओ. आदि के द्वारा भी जागरूकता अभियान और कार्यक्रम चलाया जा रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के द्वारा कुछ ऐसी क्षति हुई है जिसकी भरपाई असंभव है, जैसे- ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ का पिघलना, मगर अब हमें यह प्रयास करना चाहिये कि पर्यावरण नुकसान कम-से-कम हो। हमें ताप ऊर्जा के बजाय स्वच्छ नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल पर बल देना चाहिये। तेल जलाने और कोयले के इस्तेमाल, परिवहन के साधनों आदि के इस्तेमाल को कम करके ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को घटाया जा सकता है।

ग्लोबल वार्मिंग से भारत को सबसे ज्यादा खतरा

मई 2002 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) तथा सेंटर फॉर एटमोस्फियरिक सांइसेज (सीएएस) द्वारा कराए गए अध्ययनों से पता चलता है कि वैश्विक तापमान अर्थात ग्लोबल वार्मिग का सबसे ज्यादा खराब असर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों विशेषकर भारत पर पड़ेगा।

'ग्लोबल वार्मिग' से सम्बंधित इन अध्ययनों से भयावह स्थिति का खुलासा हुआ कि हिमालय के शिखरों पर जमी बर्फ तेजी से पिघलने लगेगी, बंगाल की खाड़ी और उड़ीसा के तटों पर तूफान का खतरा कई गुणा बढ़ जाएगा। पंजाब एवं हरियाणा जैसे उत्तर भारतीय क्षेत्रों में फसलों की उत्पादकता तो कम होगी ही मानसून कब, कहां और कितना बरसेगा इसका अन्दाजा लगाना मुश्किल हो जाएगा। मौसम छोटे होंगे और सूखे व बाढ़ की मार कहीं अधिक होगी।

सी.ए.एस के प्रख्यात वैज्ञानिक मुरारी लाल के अनुसार ताजा अध्ययनों से साफ संकेत मिले हैं कि तापमान में वृद्धि से समुद्र तल तो ऊंचा होगा ही, तूफान की प्रहारक क्षमता और गति भी 20 फीसदी तक बढ़ जाएगी। इस तरह के तूफान दक्षिण भारतीय तटों के लिए विनाशकारी साबित होंगे।

वैश्विक तापमान के भारत पर असर की एक खास बात यह रहेगी कि तापमान सर्दियों के मौसम में ज्यादा बढ़ेगा। स्पष्ट है कि सर्दियां उतनी कड़क नहीं होगी जितनी की होती है, जबकि गर्मियों व मानसून के मौसम में तापमान में ज्यादा बदलाव नहीं आएगा। मौसम छोटे होते जाएंगे जिसका सीधा असर वनस्पति पर पड़ेगा और कम समय में उगने वाली सब्जियों व फलों को तो पकने का भी पूरा समय नहीं मिल पाया करेगा।

सेंटर फॉर एटमोरकरिक साइंसेज के एक अध्ययन पत्र के अनुसार सन् 2050 तक भारत का धरातलीय तापमान 3 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बढ़ चुका होगा। सर्दियों के दौरान यह उत्तरी व मध्य भारत में 3 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ेगा तो दक्षिण भारत में केवल 2 डिग्री तक। इससे हिमालय के शिखरों से बर्फ पिघलने लगेगी और वहां से निकलने वाली नदियों में जल बहाव तेज हो जाएगा। इस सबका मानसून पर यह असर पड़ेगा कि मध्य भारत में सर्दियों के दौरान वर्षा में 10 से 20 प्रतिशत की कमी आएगी और उत्तरी पश्चिमी भारत में 30 प्रतिशत तक।

सदी के अन्त तक भारत में वर्षा 7 से 10 प्रतिशत बढ़ेगी, लेकिन सर्दियों में यह कम हो जाएगी। पानी कछ ही दिनों में इतना बरसेगा कि बाढ़ का खतरा आम हो जाएगा। इसका सीधा असर भारत के जल स्रोतों पर पड़ेगा और जल आपूर्ति का संकट और भयावह हो सकता है।


हरित गृह प्रभाव (Green house effect)

हरित गृह एक भवन की तरह होता है जो शीशे की। दीवारों से बना होता है। ठंडी जलवायु वाले क्षेत्रों या ठंडे देशों में इन हरित गृहों में पौधों को उगाने का कार्य किया जाता है। बाहरी तापमान के निम्न रहने के बावजूद हरित गृहों के तापमान में वृद्धि होती रहती है।
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पृथ्वी भी एक हरित गृह की भाँति कार्य करती है। पृथ्वी की हरित गृह गैसें, जो पृथ्वी के निचले वायुमंडल में पाई जाती हैं, पृथ्वी को एक कंबल की तरह लपेटे रहती हैं एवं यह हरित गृह के शीशे की तरह कार्य करती है अर्थात् वह सौर्य विकिरण की आने वाली लघु तरंगदैर्ध्य को तो आने देती है परंतु पृथ्वी से लौटती दीर्घ तरंगदैर्ध्य विकिरण (पार्थिव विकिरण) को अवशोषित कर लेती है। यह समायोजन ताप तरंगों को नियंत्रित रूप से पृथ्वी की सतह से अंतरिक्ष के बाह्य पटल में भेजती है। इससे पृथ्वी के ऊपर आवरण सा बन जाता है जिस कारण पृथ्वी गरम एवं रहने योग्य रहती है। अत: एक प्राकृतिक ग्रीन हाउस पृथ्वी की सतह को गरम रखता है तथा उसे एक निश्चित तापमान प्रदान करता है।

प्राकृतिक ग्रीन हाउस प्रभाव (Natural greenhouse effect)

हरित गृह गैसें जो कि वातावरण में प्राकृतिक रूप से पाई जाती है, प्राकृतिक ग्रीन हाउस प्रभाव हेतु ज़िम्मेदार होती हैं। इस प्रक्रिया के द्वारा पृथ्वी की सतह गरम एवं रहने योग्य बनती है। प्राकृतिक ग्रीन हाउस प्रभाव पृथ्वी को माध्य तापमान (15°C) पर गरम रखता है। ग्रीन हाउस गैसों की अनुपस्थिति में पृथ्वी का माध्य तापमान -20°C तक गिर सकता है। मानवजनित ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ता है एवं तापमान में वृद्धि करता है। वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों की सांद्रता में बढ़ोतरी से अवरक्त विकिरण ज़्यादा अवशोषित होगी, जिससे ग्रीन हाउस में बढ़ोतरी होगी।

हरित गृह गैसें (Green house gases)

हरित गृह गैस का अर्थ वातावरण की उन गैसों से है जो प्राकृतिक एवं मानवजनित दोनों होती हैं। ये अवरक्त विकिरण (Infrared radiation) को अवशोषित करती हैं एवं पुनः छोड़ती हैं।
जलवाष्प तथा COवायुमंडल में पाई जाती जाने वाली गैसों में प्रचुर मात्रा में पाई जाती है तथा किसी क्षेत्र में अवरक्त विकिरणों (12 से 20 um) को ज़्यादा-से-ज्यादा अवशोषित करती हैं। इसके साथ ही अन्य प्रमुख ग्रीन हाउस गैसें हैं-
  • कार्बन डाइऑक्साइड (CO2)
  • मीथेन (CH4)
  • नाइट्रस ऑक्साइड (N2O)
  • हाइड्रोफ्लूरो कार्बन (HFCs)
  • परफ्लूरो कार्बन (PFCs)
  • सल्फर हेक्सा फ्लोराइड (SF6)
  • जलवाष्प

CO2 उत्सर्जन करने वाले प्रमुख देश - 2008

रैक देश

वार्षिक CO2 उत्सर्जन विश्व में प्रतिशत (हजार मीट्रिक टन में)

विश्व में प्रतिशत

चीन

7, 031, 916

23.33%

अमेरिका

5, 461,  014

18.11%

यूरोपीय संघ

4, 177, 817.86

14.04%

भारत

1, 742, 698

5.78%

रूस

1, 708, 653

5.67%

जापान

1, 86, 660

4.01%

जर्मनी

7, 86, 660

2.61%

कनाडा

5, 44, 091

1.80%

ईरान

5, 38, 404

1.79%

यूनाइटेड किंगडम

5, 22, 856

1.73%


कार्बन डाइऑक्साइड (Carbon Dioxide)

कार्बन डाइऑक्साइड गैस वैश्विक तापन में 60% की भागीदारी करती है। यह एक प्राथमिक हरितगृह गैस है जो कि मानवीय क्रियाओं द्वारा उत्सर्जित होती है। कार्बन डाइऑक्साइड की वातावरण में प्राकृतिक रूप से पृथ्वी के कार्बन चक्र (कार्बन का वातावरण, समुद्र, मृदा वनस्पति एवं जीवों के बीच प्राकृतिक प्रवाह) के रूप में मौजूदगी रहती है। यह एक प्रमुख ताप अवशोषक गैस है। वातावरणीय कार्बन डाइऑक्साइड में कोई परिवर्तन वातावरण के तापमान को परिवर्तित कर सकता है।

मीथेन (Methane)

वैश्विक तापन में यह गैस 20% का योगदान करती है। यह वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) की अपेक्षा काफी कम मात्रा में मौजूद होती है परंतु इसका महत्त्व अधिक है क्योंकि मीथेन पृथ्वी द्वारा उत्सर्जित अवरक्त किरणों के अवशोषण में CO2 से औसतन 20 से 30 गुना ज़्यादा सक्षम है। मीथेन अपूर्ण अपघटन (Incomplete Decomposition) का उत्पाद है एवं अनॉक्सी दशाओं (Anaerobic Conditions) में मीथेनोजन जीवाणुओं द्वारा उत्पन्न होती है। मीठे जल वाली आर्द्रभूमि से मीथेन का उत्सर्जन होता है क्योंकि कार्बनिक पदार्थों का ऑक्सीजन के अभाव में अपघटन होने से मीथेन का उत्पादन होता है।
दीमक सेल्युलोज का पाचन करते हैं एवं इस क्रम में मीथेन का उत्पादन करते हैं। बाढ़ग्रस्त धान के खेतों में तथा कच्छ क्षेत्रों में मीथेनोजन जीवाणुओं द्वारा अनॉक्सी क्रिया के फलस्वरूप मीथेन का उत्पादन होता है। चरने वाले जानवर, जैसे- गाय, बैल एवं भेड़ द्वारा भी मीथेन गैस उत्पन्न होता है। कोयला खनन एवं तेल तथा प्राकृतिक गैस हेतु खनन मीथेन उत्सर्जन के अन्य स्रोत हैं।

नाइट्रस ऑक्साइड (N2O)

नाइट्रस ऑक्साइड पृथ्वी के नाइट्रोजन चक्र के रूप में वातावरण में प्राकृतिक रूप से मौजूद रहती है। यह गैस वैश्विक तापन हेतु 6% ज़िम्मेदार है। नाइट्रस ऑक्साइड को लाफिंग गैस (Laughing Gas) भी कहा जाता है।

हाइड्रोफ्लूरो कार्बन (HFCs)

हाइड्रोफ्लूरोकार्बन को ओज़ोन विघटनकारी गैसों, CFCs एवं HCFCs के प्रतिस्थापन के रूप में लाया गया था। हालाँकि, इस गैस द्वारा ओज़ोन का विघटन नहीं होता परंतु यह एक प्रबल हरित गृह गैस है एवं जलवायु परिवर्तन में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। चूँकि इसके द्वारा वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी होती है। अतः इसे क्योटो प्रोटोकॉल द्वारा विनियमित किया जाता है न कि मांट्रियल प्रोटोकॉल द्वारा। HFCs की दीर्घ वातावरणीय जीवन अवधि होती है एवं इसमें उच्च वैश्विक तापन क्षमता (GWPs) होती है।
ये शीतप्रशीतक, एरोसॉल नोदक, विलायक एवं अग्निशमन यंत्रों में प्रयोग किये जाते हैं।

परफ्लूरो कार्बन (PFCs)

ये योगिक विभिन्न औद्योगिकी प्रक्रियाओं के सह-उत्पाद (By-products) होते हैं जो एल्यमिनियम उत्पादन एवं अर्द्धचालकों के निर्माण से जुड़े होते हैं। HFCs की तरह PFCs की भी दीर्घ वातावरणीय जीवन अवधि एवं उच्च वैश्विक तापन क्षमता होती है।

सल्फर हेक्सा फ्लोराइड (SF6)

SF6 मैग्नीशियम प्रक्रियाओं एवं अर्द्धचालकों के निर्माण में प्रयुक्त होती है। साथ ही यह रिसाव खोज (Leak Detection) हेतु प्रयोग में आने वाली खोजी गैस है। SF6 का उपयोग विद्युत वितरण उपकरणों, जिसमें सर्किट ब्रेकर भी आते हैं, में होता है। SF6 की वैश्विक तापन क्षमता 22,800 होती है जो इसे IPCC के अनुसार प्रबल हरित गृह गैस बनाता है।

जलवाष्प (Water vapour)

जलवाष्प वायुमंडल में सबसे अधिक परिवर्तनशील तथा असमान वितरण वाला घटक है। इसकी मात्रा विभिन्न ऊँचाइयों पर भिन्न-भिन्न होती है। ऊँचाई के साथ जलवाष्प की मात्रा घटती है। इसके अलावा निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों की ओर जाने पर भी इसमें कमी आती है। जलवाष्प सूर्यातप के कुछ अंश को ग्रहण कर धरातल पर उसकी मात्रा को कम करता है। यह पार्थिव विकिरण को अवशोषित कर CO2 की भाँति ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न करता है। मानव जलवाष्प उत्सर्जन हेतु प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेवार नहीं माने जाते हैं, क्योंकि वे जलवाष्प की उतनी मात्रा उत्सर्जित नहीं करते जिससे वातावरण के सांद्रण में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हो जाए। हालाँकि, वातावरण में जलवाष्प की मात्रा बढ़ने का कारण CO2 और अन्य हरित गृह गैसें भी हैं, जिनके कारण पौधों के वाष्पोत्सर्जन दर में तेजी आ जाती है। साथ ही CO2 की तरह जलवाष्प हवा में स्थायी नहीं रह सकती, क्योंकि यह जलचक्र द्वारा जल भंडारों एवं वर्षा तथा हिम के रूप में परिवर्तित होती रहती है।

फ्लूरीनेटेड गैसें (Fluorinated gases)

वैश्विक तापन में इनका 14% योगदान है। वातावरण में इनका उत्सर्जन ओजोन विघटनकारी पदार्थों (CFC आदि) के प्रतिस्थापन के रूप में तथा कई औद्योगिक प्रक्रियाओं, जैसे- एल्यूमिनियम एवं अर्द्धचालक के निर्माण द्वारा होता है। अधिकांश फ्लूरीनेटेड गैसों की अन्य हरित गृह गैसों की अपेक्षा अन्य वैश्विक तापन क्षमता (High Global Warming Potentials-GWPs) होती है। फ्लूरीनेटेड गैसें सबसे प्रबल एवं दीर्घजीवी प्रकार की ग्रीन हाउस गैस हैं जो मानव क्रियाकलापों द्वारा उत्सर्जित होती है।

फ्लूरीनेटेड गैसें मुख्यतः 3 प्रकार की होती हैं-

  • 1. HFCs (Hydroflurocarbons-हाइड्रोफ्लूरोकार्बन)
  • 2. PFCs (Perflurocarbons-परफ्लूरोकार्बन)
  • 3. SF6 (Sulfur hexafluoride-सल्फर हेक्साफ्लूराइड)


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