स्वामी विवेकानंद | स्वामी विवेकानंद की जीवनी | swami vivekananda in hindi | Biography Of Swami Vivekananda In Hindi

स्वामी विवेकानन्द - Biography Of Swami Vivekananda In Hindi

स्वामी विवेकानंद
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वास्तविक नाम

नरेन्द्र नाथ दत्त।

आध्यात्मिक नाम

स्वामी विवेकानन्द।

जन्म

12, जनवरी 1863, कलकत्ता।

पिता

विश्वनाथ दत्त

माता

भुवनेश्वरी देवी

अध्ययन

स्कोटिश चर्च कॉलेज कलकत्ता से 1884 में बी. ए.।

आध्यामिक गुरु

श्री रामकृष्ण परमहंस।

संस्था

रामकृष्ण मिशन (1 मई, 1897)

संगठन

बैलूर मठ (9 दिसम्बर 1898)

नारा

दीन-दुखियों की सेवा ही सच्ची ईश्वर पूजा है। उठो, जागो और तब तक नहीं रूको जब तक मंजिल | प्राप्त न हो जाये।

मनोवृत्ति

उदारवादी विचार धारा, हिन्दुत्व एवं अतीत भारत की महानता में विश्वास।

उल्लेखनीय कार्य

राष्ट्रवाद की जागृति, शिकागो धर्म संसद में भारत का प्रतिनिधित्व, विदेशों में हिन्दू धर्म एवं भारतीय संस्कृति का प्रचार का

मुख्य रचनाएँ

योग, राजयोग, ज्ञानयोग

मृत्यु

4 जुलाई, 1902 बेलूर मठ में।


स्वामी विवेकानंद की रचनाएँ - धर्म तत्त्व, धर्म रहस्य, राजयोग, ज्ञानयोग, माई मास्टर, काली द मदर, लेक्चर फ्रॉम कोलम्बो टू अल्मोड़ा।

प्रारंभिक जीवन

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी, 1863 को कलकत्ता (कोलकाता) बंगाल में हुआ। उनके बचपन का नाम नरेंद्रनाथ था। उनके पिता पेशे से वकील थे और पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखते थे। उनकी माता अत्यंत धार्मिक महिला थीं जिसका प्रभाव बालक नरेंद्र पर सर्वाधिक पड़ा। बचपन से ही नरेंद्र को अच्छी अच्छे संस्कारों और परवरिश के कारण एक उच्च कोटि की सोच मिली। नरेन्द्र का विवाह नहीं हुआ था। युवा दिनों से ही उनमें आध्यात्मिकता में रुचि थी, वे हमेशा भगवान की तस्वीरों, जैसे- शिव, राम और सीता के सामने ध्यान लगाकर साधना करते थे। संन्यासियों और साधुओं की बातें उन्हें हमेशा प्रेरित करती रहीं।
  • आधुनिक राष्ट्रीय आंदोलन के धर्मगुरू स्वामी विवेकानन्द की जीवनयात्रा कोलकाता के सिमला मुहल्ले से प्रारंभ हुई। गंगा नदी के किनारे स्थित बेलूर मठ पर उनकी जीवन यात्रा का समापन हुआ। मात्र 39 वर्षों का उनका पुण्य जीवन भारतीय विभूति परम्परा की एक स्वर्णिम कड़ी है।
  • देशभक्ति, मानवसेवा तथा ईश्वर आराधना को परस्पर संबंधित मानने वाले स्वामी विवेकानन्द भारतीय चिन्तनधारा में नव वेदांती तथा वेदांत केसरी के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
  • विवेकानन्द (बचपन का नाम नरेन्द्र) का जन्म विश्वनाथ दत्त तथा भवनेश्वरी देवी के प्रथम पुत्र के रूप में 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में हुआ था। बचपन से ही नरेन्द्र में बहुमुखी प्रतिभा तथा अदम्य शक्ति के चिन्ह दिखने लगे थे। वे दर्शन, संगीत, काव्यकला के साथ-साथ खेल-कूद, तैराकी एवं कुश्ती में भी प्रवीण थे।
  • वर्ष 1881 में एक धार्मिक उत्सव के दौरान पहली बार नरेन्द्र को श्री रामकृष्ण परमहंस के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। बाद में नरेन्द्र उनके प्रिय शिष्य एवं सहचर बने। स्नातक परीक्षा के बाद नरेन्द्र कानून का अध्ययन करना चाहते थे लेकिन परिवार की जर्जर आर्थिक स्थिति के कारण उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी।
  • अपने गुरू श्री रामकृष्ण की महासमाधि के बाद नरेन्द्र ने वर्ष 1887 में वराह नगर में अनुष्ठान करके विधिवत् रूप से संन्यास लिया तथा विवेकानंद नाम ग्रहण किया। उन्होंने परिव्राजक के रूप में तीर्थाटन तथा भारत भ्रमण करते हुए अपने देश को निकटता से देखा एवं जाना।
  • वर्ष 1893 में शिकागों में आयोजित विश्वधर्म संसद को संबोधित करते हुए विवेकानंद ने सभी का मन मोह लिया। उन्हें हिन्दू संन्यासी के रूप में देश-विदेश में ख्याति मिली। वर्ष 1895 में अपनी लंदन यात्रा के दौरान विवेकानंद ने वेदांत तथा सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार किया तथा 1896 में न्यूयार्क में वेदांत समिति की स्थापना की। स्वदेश वापसी के अवसर पर कोलम्बो से कश्मीर तक स्वामीजी का भावभीनी अभिनंदन किया गया।
  • उन्होंने श्रीरामकृष्ण प्रवर्तित ज्ञानधारा के प्रचार के उद्देश्य से श्रीरामकृष्ण मिशन की स्थापना की तथा सेवा, साधना एवं सभी धर्मों के समन्वय केन्द्र के रूप में बेलूर मठ की स्थापना की।
  • वर्ष 1899 में विवेकानंद ने पश्चिम की द्वितीय यात्रा की तथा वे पेरिस भी गये। 4 जुलाई 1902 को ध्यानमग्न मुद्रा में स्वामी विवेकानंद महासमाधि के द्वारा आत्मस्वरूप में लीन हो गये।
  • विवेकानन्द अपने विचारों में वेदांतिक रहे लेकिन उन्होंने गीता के निष्काम कर्म तथा ईसाई धर्म के प्रेम एवं सेवा के आदर्श को भी अनुकरणीय माना। बौद्धधर्म के सर्वमुक्ति बौद्धिसत्व के आदर्श ने तो उनको बहुत गहराई से प्रभावित किया। विवेकानंद के चिन्तन में आध्यात्मिकता, व्यावहारिकता एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अद्भुत संगम है।
  • उन्होंने आध्यात्मिक उत्थान के पहले जीवन की दैनंदिन भौतिक आवश्यकताओं को पूरा कर लेने को आवश्यक माना तथा गरीबों और उत्पीडितों के उद्धार कर्म को ईश्वर आराधना का नाम दिया।
  • स्वामी विवेकानन्द अपने मन प्राण से एक क्रांतिकारी समाजवादी थे, जिन्होंने सम्पूर्ण मनुष्य जाति को उसके दिव्य स्वरूप का उपदेश दिया तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उसे प्रकट करने का उपाय बताया। यही उनके जीवन का आदर्श था। विवेकानंद के उपदेश वेदांत की समता तथा आत्मा की विश्वव्यापकता के सत्यों पर प्रतिष्ठित है।

स्वामी विवेकानंद की शिक्षा

8 वर्ष की उम्र में नरेंद्रनाथ दत्त को ईश्वरचंद्र विद्यासागर मेट्रोपोलिटन इंस्टीट्यूट में डाला गया। वर्ष 1879 में कलकत्ता वापसी के बाद वे एकमात्र छात्र थे, जिसने प्रेसीडेंसी कॉलेज प्रवेश परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी। अपने शिक्षा काल में नरेंद्रनाथ सर्वाधिक लोकप्रिय और जिज्ञासु छात्र थे। उन्होंने विभिन्न दर्शन, धर्म व साहित्य को गहनता से समझा। इसके अलावा उन्होंने उपनिषद, वेद व पुराणों का भी अध्ययन किया। नरेंद्रनाथ ने जनरल असेंबली इंस्टीट्यूट से पश्चिमी दर्शन और यूरोपियन साहित्य की पढ़ाई की थी। नरेंद्र ने डेविड ह्यूम, इमेनुअल कांट, हीगेल, जे.एस. मिल, आगस्ट कॉम्टे, हर्वर्ट स्पेंसर और चार्ल्स डार्विन को पढ़ा था। वे ब्रह्म समाज के सदस्य भी बने लेकिन परमात्मा को प्राप्त करने की प्रबल इच्छा उन्हें वहाँ रोक नहीं पाई। वर्ष 1881 में नरेंद्र रामकृष्ण परमहंस के संपर्क में आए और उन्हें अपना गुरु बनाया। 25 वर्ष की अवस्था में नरेंद्र ने संन्यासी जीवन धारण कर लिया और यहीं से स्वामी विवेकानंद के रूप में जाने गए। अपने गुरु की इच्छानुसार विवेकानंद संपूर्ण मानव जाति के कल्याण के लिये दुनिया और देशभर में भ्रमण किया और भटके हुए लोगों को मार्ग दिखाने का कार्य किया। सन् 1893 में अमेरिका के शिकागो में विश्वधर्म सम्मेलन में भाग लिया और पाश्चात्य जगत को भारतीय दर्शन के वास्तविक स्वरूप से परिचित कराया। वे भारत वर्ष को धर्म एवं दर्शन की पुण्यभूमि मानते थे। विवेकानंद पुरोहितवाद, रूढ़िवादी प्रथाओं व धार्मिक आडंबरों के सख्त खिलाफ थे।

सामाजिक विचार

  • यद्यपि मौलिक रूप से स्वामी विवेकानन्द एक साधू थे। जिन्होंने अद्धैतवाद को वैज्ञानिक रूप देकर विश्व में फैलाने का प्रयास किया था लेकिन देश भक्ति और भारत राष्ट्र की रक्त बहाती हुई आत्मा उन्हें बौद्धि विवाद और अभ्यास तक ही सीमित नहीं कर सकती।
  • स्वामी दयानंद की भांति ये भी भारतीय समाज की रूढ़ियों को तोड़ने और सामाजिक परिवर्तन के लिये इच्छुक थे। भारतीय समाज में वर्ण-व्यवस्था सबसे बड़ा अभिशाप थी, और है। इस व्यवस्था में ब्राह्मणों को कुछ विशेष गये हैं। यह वैदिक व्यवस्था और पद्धति के विरूद्ध हैं। समाज में निवास करने वाले समस्त व्यक्तियों को सामाजिक समानता मिलनी चाहिए क्योंकि प्रत्येक मानव में आत्मा जो कि परम ब्रह्म का अहंकार है।
  • सामाजिक समानता का अभिप्राय यह नहीं है कि समाज में सब वर्गों व वर्णों को समाप्त कर दिया जायेगा और उसके स्थान पर एक ही वर्ग होगा। वर्ग और वर्ण रहेंगे। ये समाज के आवश्यक अंग हैं।
  • इनका विकास और निर्माण सामाजिक आवश्यकताओं के परिणामस्वरूप हुआ है। परन्तु अन्य समस्त वर्णों के मध्य असमानता को किसी भी स्तर में स्वीकार नहीं किया जायेगा।
  • छुआछूत भारतीय समाज में सबसे बड़ा अभिशाप है। धर्म के अन्तर्गत थोपी गई इस रूढ़ि को अनिवार्य रूप से तोड़ा जाना है।
  • समाज को विभिन्न वर्गों के मध्य संघर्ष का अखाड़ा न बनाया जाए न तो किसी वर्ग को उच्च समझा जाये और न निम्न, बल्कि प्रत्येक वर्ग और वर्ण को अपने कर्त्तव्य पूरे करने चाहिये। मानव जीवन की श्रेष्ठता त्याग और बलिदान में है, स्वार्थ सिद्धि में नहीं। इसलिये वर्गों के मध्य संघर्ष न होकर सामन्जस्य होना चाहिये।
  • स्वामी जी के उपरोक्त विचार कार्ल मार्क्स के विचारों के विपरीत हैं। मार्क्स ने समाज में वर्ग के संघर्ष को स्वाभाविक माना है, जितना तीव्र यह संघर्ष होगा उतना ही शीघ्र समाज में परिवर्तन आयेगा, इस परिवर्तन को शीघ्र लाने के लिए क्रान्ति द्वारा सर्वहारा वर्ग को पूंजीपति वर्ग के विरूद्ध संघर्ष करना होगा।
  • इसके विपरीत स्वामी विवेकानन्द समाज में क्रान्तिकारी परिवर्तनों के विरूद्ध हैं।
  • अरस्तू की भाँति वे स्वीकार करते हैं कि समाज जो कुछ भी अपनाता है, आवश्यकता के कारण अपनाता है, अगर उसको क्रान्ति द्वारा बदल दिया जाये तो तनाव उत्पन्न होगा। इस तनाव में लाभ के स्थान पर हानि अधिक होगी भारतीय समाज में तो यह बात और भी अधिक लागू होती है।
  • इतिहास में जब भी किसी दूसरी संस्कृति से संघर्ष हुआ तो विशेषकर हिन्दू धर्म ने उस संस्कृति की अच्छाई को अपनाया है। भारतीय समाज की गतिशीलता और निरन्तरता के लिए इसी कारण को उत्तरदायी माना जा सकता है।

राजनीतिक विचार

स्वामी विवेकानन्द के संबंध में भारत के शैक्षिणक जगत में यह भ्रांत धारणा बनी हुई है कि वे केवल संन्यासी, धर्मोपदेशक एवं वेदान्ती मात्र थे, उनका राजनीतिक क्रिया-कलापों एवं राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन से कोई संबंध नहीं था और स्वामी विवेकानन्द के विचारों की राजनीतिक व्याख्या हो ही नहीं सकती। इस भ्रान्ति के मूल में जहाँ तक एक ओर इस आलोचकवर्ग की पाश्चात्य राजनीतिक दर्शन के प्रति अंधभक्ति है तो दूसरी ओर भारतीय सामाजिक एवं राजनीतिक चिंतन के नाम से उनमें विकर्षण विद्यमान है। स्वामी विवेकानन्द के राजनीतिक विचार उनके धार्मिक एवं सामाजिक विचारों के सहगामी हैं। वे राष्ट्रवाद का अध्यात्मीकरण करने के पक्षपाती थे। स्वामी विवेकानन्द के राजनीतिक विचारों को निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत व्यक्त किया जा सकता है

राजनीतिक विचार
  • राष्ट्रवाद
  • व्यक्ति और राज्य 
  • स्वतंत्रता और कानून
  • क्रांति का सिद्धांत
  • देशभक्ति और समाजवाद

राष्ट्रवाद
  • विवेकानन्द हेगल की तरह राष्ट्र की महत्ता के प्रतिपादक थे। उनके अनुसार भारत को अपने अध्यात्म से पश्चिम को विजित करना होगा। उनका कहना था, "एक बार पुनः भारत को विश्व की विजय करनी है। उसे पश्चिम की आध्यात्मिक विजय करनी हैं।"
  • मानवेन्द्रनाथ राय ने विवेकानन्द की आलोचना करते हुए उनकी राष्ट्रवाद संबंधी विचारधारा के प्रभाव का इस प्रकार वर्णन किया है। "विवेकानन्द का राष्ट्रवाद आध्यात्मिक साम्राज्यवाद था। उन्होंने तरुण भारत को प्रेरित किया कि वह भारत के आध्यात्मिक उद्देश्यों में विश्वास रखे। उनके दर्शन के आधार पर आगे चलकर उन तरुण बुद्धिजीवियों के परम्परानिष्ठ राष्ट्रवाद का निर्माण हुआ जो अपने वर्गों से संबंध-विच्छेद कर चुके थे और जिन्होंने अपने को गुप्त समुदायों के रूप में संगठित किया तथा ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के लिये हिंसा और आंतक का समर्थन किया। आध्यात्मिक श्रेष्ठता के द्वारा विश्व को विजय करने के इस रोमांचपूर्ण स्वप्न ने उन तरुण बुद्धिजीवियों में भी नयी चेतना जाग्रत कर दी जिनकी दयनीय आर्थिक स्थिति ने उन्हें व्याकुल कर रखा था।"
  • विवेकानन्द ने राष्ट्रवाद को आध्यात्मिक पुट दिया। उनका यह कार्य उनके इस प्रबल विश्वास का कि भविष्य में धर्म ही भारत का मेरुदंड बनेगा, अनुगामी था। वे इस अर्थ में पुनरभ्युदयवादी थे। वे भारत के अतीत का आह्वान कर भविष्य के भारत का निर्माण करना चाहते थे। वे भारत राष्ट्र की महत्ता एवं एकता के पोषक थे। उनका राष्ट्र प्रेम भारत-माता के चित्र में समाहित था।
  • वे उग्र-राष्ट्रवाद के पक्षपाती थे और इसी कारण से उन्होंने भगिनी निवेदिता को “आक्रमण हिन्दूवाद" का उपदेश दिया।
  • स्वामी विवेकानन्द आधुनिक सामाजिक एवं राजनीतिक चिंतन के (स्वामी दयानन्द के पश्चात्) ऐसे दूसरे विचारक हैं जिन्होंने सक्रिय प्रतिरोध का मार्ग भारतीयों के लिये प्रशस्त किया। स्वामी दयानन्द ने इस प्रतिरोध को जहाँ सामाजिक एवं धार्मिक क्षेत्र में अधिक प्रचारित किया वहाँ स्वामी विवेकानन्द ने यह चेतना राजनीतिक क्षेत्र में अधिक व्यापक बनायी।
  • उनके द्वारा राष्ट्रीय उन्नति एवं जागरण के लिए दिया गया सशक्त वक्तव्य आज भी भारतीयों के लिए प्रेरणादायक है। विवेकानन्द ने कहा था यह “राष्ट्र के रुप में अपना व्यक्तित्व विस्तृत कर बैठे हैं, और यही इस देश में सब दुष्कर्मों की जड़ है। हमें देश को उसका खोया हुआ व्यक्तित्व वापस देना है और जनता का उत्थान करना है किन्तु सब उसके उत्थान की शक्ति भी अन्तराल से आनी चाहिए, अर्थात परम्परानिष्ठ हिन्दू समाज में से है। प्रत्येक देश में जो बुराइयां देखने को मिलती हैं वे धर्म के कारण नहीं है बल्कि धर्म-द्रोह के कारण हैं। इसलिए दोष धर्म का नहीं है, मनुष्यों का है।"

व्यक्ति और राज्य
  • व्यक्ति और राज्य के बारे में स्वामी जी का मत व्यक्ति और समाज के संबंधों के विश्लेषण से आरम्भ होता है। उनका कहना है कि सृष्टि बनने के बाद पहले जो कानून दुनिया में आये वे ईश्वर प्रदत्त थे। राजा राज्य करता था और प्रजा यह नहीं सोचती थी कि उसकी भी भागीदारी राज्य करने में होगी। शायद ग्राम पंचायत की संस्था सबसे पहली ऐसी संस्था थी जिसमें शासित को अपना भाग महसूस हुआ।
  • स्वामीजी मानव की अन्तः प्रकृति को उसकी बाह्य प्रकृति से अधिक महत्त्वपूर्ण मानते थे। वे कहा करते थे मानव रुपया बनाता है, रुपया मानव नहीं बनाता।
  • मनुष्य का सारा सुख उसके नैतिक और आध्यात्मिक जीवन पर निर्भर है। यदि मानव जीवन इस तत्त्व से विहीन है तो किसी भी तरह की राजनीतिक या आर्थिक व्यवस्था, किसी भी तरह का समाज, किसी भी तरह की विश्व-व्यवस्था, किसी भी तरह की वैज्ञानिक तथा तकनीकि ज्ञान में वृद्धि और कितना भी सम्पन्न भौतिक जीवन उसे सुख नहीं पहुंचा सकता।
  • कोई भी समाज इस बात से सुखी नहीं हो सकता कि उसकी संसद ने क्या नया कानून बनाया है। समाज का स्थाई सुख तो इस बात पर निर्भर करता है कि कितने अच्छे लोग उस समाज में रहते हैं । शिक्षा पद्धति और सामाजिक व्यवस्था कैसी है? स्वामीजी उसका उत्तर देते हैं कि यह व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिससे समाज में रहने वाले शारीरिक, मानसिक और आत्मिक सुख से सम्पन्न रहें।

स्वतंत्रता और कानून
  • स्वामी विवेकानन्द इस बात को मानते थे कि स्वतन्त्रता वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति या समाज को अपने भाग्य का फैसला खुद करने की आजादी हो आध्यात्मिक दृष्टि से मोक्ष ही जीवन का अन्तिम ध्येय है।
  • सभी धर्म और सभी पद्धतियाँ एक ही लक्ष्य की ओर जा रहे हैं- सभी आजादी का तराना गाते हैं।
  • लेकिन यह स्वतन्त्रता समाजिक और राजनैतिक क्षेत्र में तो अन्तिम लक्ष्य भी रहती है और साधन भी।
  • स्वामी जी का कहना है कि स्वतन्त्रता विकास की पहली शर्त है। समाज के जिस क्षेत्र में भी कार्य करने की स्वाधीनता होगी वहीं विकास दृष्टिगोचर होगा।
  • यद्यपि स्वतन्त्रता का अर्थ बन्धों से मुक्ति माना जा सकता है परन्तु यदि सही से सोचा जाये तो सभी तब ही स्वतन्त्र होंगे जब सब की स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध न लगे होंगे। रूसो और स्वामी जी की सोच इस मामले में एक है। रूसो ने कहा था कि मनुष्य स्वतन्त्र पैदा होता है, परन्तु हर जगह उसको बंधनों में जीना पड़ता है। ये बंधन दूसरों की स्वतन्त्रता बनाए रखने के लिए जरूरी है।
  • स्वामीजी समाज में स्वतन्त्रता का वातावरण पनपने के लिए विशेषाधिकारों और विशेष सुविधाओं की समाप्त की बात कहते हैं। उनका कहना है कि जब तक समाज में ऐसा वर्ग पनपता है जिसे विशेष सुविधाएँ प्राप्त हैं तब तक स्वतन्त्रता का वातावरण पैदा नहीं हो सकता। परमेश्वर ने सबको बराबर उत्पन्न किया है फिर विशेषाधिकारों की बात कैसी। स्वामी ने विशेषधिकारों को समाज से हटाने की जो बात कही है उसके दूरगामी प्रभाव हैं। उनका कहना है कि प्रत्येक व्यक्ति में योग्यताएँ हैं, परन्तु यदि उन योग्यताओं को उभरने और प्रकट होने का मौका न मिले तो वह व्यक्ति पिछड़ जाता है।
  • आज के समाज में योग्यताओं के उभरने के इन मौकों का नाम ही अधिकार है। जैसा प्रो. बार्कर ने कहा है कि व्यक्तियों को अधिकार मिलने से ही स्वतन्त्रता के असली अर्थ उजागर होते हैं। विवेकानन्द उसी दिन की तलाश में हैं जब प्रत्येक व्यक्ति अपने 'स्व' को विकसित करने का अवसर पाएगा।
  • विशेषाधिकार की बात जब दुनिया से मिटेगी तभी मानव-मानव के बीच समानता का सम्बन्ध भी विकसित होगा।
  • स्वामी जी आनुवांशिकता का सिद्धांत भी नहीं मानते। उनका कहना है कि समाज में विशेषाधिकार लाने का यह भी एक तरीका है। क्या ब्राह्मणों के वंशजों का ही विद्या पर अधिकार रहेगा? क्या किसी अन्य वर्ग का व्यक्ति उस तरह का विद्यवान नहीं हो सकता? यदि सही वातावरण और सुविधाएं मिलें (जिन्हें आज के युग में राजनैतिक अधिकारों के नाम से जाना जाता है) तो आनुवांशिकता का यह सिद्धान्त चलने वाला नहीं है। इस प्रकार प्रत्येक वर्ग के व्यक्ति को अपने वर्ण के अनुसार बेहतर बनने की आवश्यकता है।

क्रान्ति का सिद्धान्त
  • स्वामी जी का क्रान्ति का सिद्धान्त एक तरह से उनके जाति अभिवर्तनों के सिद्धान्त (Theory of cycle of castes) से काफी मेल खाता है।
  • स्वामीजी का कहना है कि समाज में राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए जाति अभिवर्तन का सिद्धान्त अपना काम करता रहता है परन्तु यह जरूरी नहीं कि लोग परिवर्तन चक्र के पूरा घेरा होने तक प्रतीक्षा करें। ऐसा भी हो सकता है कि परिवर्तन लाने की चाह समाज में पहले ही उत्पन्न हो जाये तभी क्रान्ति को आने की सम्भावना रहेगी।

देशभक्ति और समाजवाद
  • स्वामी जी एक अलौकिक देशभक्त थे। उन्हें अपने देश के अतीत पर गर्व था। उन्हें अपने देश के कंगाल करोड़ों लोगों से प्यार था। वे कहा करते थे कि देश कोई भौगोलिक इकाई नहीं है, और न ही वह कोई दार्शनिक संकल्पना है वह तो मात्र उसके लोग हैं- और लोगों से उनका तात्पर्य किसी समृद्ध वर्ग के लोगों से नहीं अपितु देश के करोड़ों साधारण लोगों से था।
  • स्वामी जी का कहना था कि देशभक्त होने के लिए तीन बातें आवश्यक हैं- जनसाधारण के लिए अतिशय प्यारा, कागजी बातों के स्थान पर उनकी दशा सुधारने के लिए ठोस कार्यक्रम, इस कार्यक्रम को लागू करने के लिए साहस, निष्ठा और संकल्प।
  • स्वामी जी चाहते थे कि जनता को उसकी हालत के प्रति अशांति उसके मन में जगाई जाय ताकि वह उससे बाहर निकलने के लिए उद्यत हो सके। परन्तु उनकी पद्धति मार्क्सवादी नहीं थी- वे संघर्ष, घृणा, भौतिकवाद को बढ़ावा देकर समाज में परिवर्तन का आरम्भ नहीं करना चाहते थे।
  • उनका समाजवादी मन उनके लिए वेदांत से ही बना था। जब सभी में परमात्मा तत्त्व है तो फिर भेद-भाव कैसा, वे निर्धन को 'दरिद्र-नारायण' कहते थे।
  • उनका कहना था कि परमात्मा का दर्शन दरिद्रनारायण की सेवा से ही प्राप्त हो सकता है। इस तरह से सदियों से चले आ रहे मोक्ष के पुराने विचार को उन्होंने नई बात से भर दिया। यह एक क्रान्तिकारी परिवर्तन था।
  • उनका कहना था इन 20 करोड़ भूखे नंगों की जो सोचेगा मैं उसे महात्मा कहूंगा, और जो इनके बल पर शिक्षित होकर इनकी नहीं सोचता मैं उसे देशद्रोही के अतिरिक्त कुछ नहीं मानता।

दार्शनिक व धार्मिक विचार

  • स्वामी विवेकानन्द के दर्शन स्रोत प्रधानतः तीन थे। पहला स्रोत, महान वैदिक और वैदान्तिक परम्परा का था, दूसरा स्रोत स्वामी रामकृष्ण परमहंस के साथ उनका घनिष्ठतम सम्पर्क था और तीसरा स्रोत जीवन का उनका स्वयं का विशाल अनुभव था। इन तीनों ही स्रोतों के माध्यम से उनके दार्शनिक और धार्मिक विचारों का निर्माण हुआ।
  • यह दार्शनिक और धार्मिक विचार अन्ततोगत्वा विवेकानन्द के राजनीतिक विचारों के आधार स्तम्भ बने।
  • विवेकानन्द ने धर्म के क्षेत्र में संकीर्णता और संशयात्मकता को दूर किया। उनकी दृष्टि में धर्म साधना का विषय था और इस बात को वे लोगों के दिल व दिमाग में बैठा देना चाहते थे। वे इस विचार को समूल नष्ट कर देना चाहते थे कि धर्मान्ध श्रद्धा का विषय था और उसमें तर्क अथवा युक्ति के लिए कोई स्थान नहीं है। विवेकानन्द तो यह सिद्ध करना चाहते थे कि जो तर्क के अनुकूल है वही धर्म है। उनका दृष्टिकोण विशुद्ध वैज्ञानिक था। जो बात उनकी बुद्धि और हृदय को प्रभावित नहीं करती थी उसे वे स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।
  • उन्होंने अपनी यह मान्यता प्रकट की कि धर्म का लक्ष्य आत्मा की प्राप्ति करना है स्वामी विवेकानन्द के प्रभावशाली ढंग से यह विचार पुनः प्रतिष्ठित किया कि आत्मा अनन्त है, उनका कोई छोर नहीं है।
  • कुछ लोगों का कहना है कि ऐसा मानने से नैतिकता का आधार नष्ट हो जायेगा लेकिन स्वामी विवेकानन्द का जवाब था कि ऐसा सोचना पाश्विक वृत्ति का सूचक है। इस पाश्विक वृत्ति को केवल चाबुक से काबू में रखा जा सकता है विवेकानन्द ने नैतिकता का अर्थ दूसरों की भलाई करना बताया और कहा कि यही सब धर्मों का सार है तथा अद्वैत में इस विचार की सर्वोत्तम व्याख्या की गई है। उनकी मान्यता है कि जो कोई भी दूसरों को हानि पहुँचाता है वह अपनी ही हानि करता है।
  • स्वामी विवेकानन्द ने धर्मों का व्यापक अर्थ लेते हुए सार्वभौम धर्म का प्रतिपादन किया। उन्होंने कहा कि विभिन्न दर्शन पद्धतियों में कोई विरोध नहीं है और वेदान्त अन्तिम एकता को खोजने के प्रयास के अतिरिक्त कुछ नहीं है तथा वह एक सफल प्रयास है।
  • उन्होंने वैश्विक प्रेम, प्यार और सेवा की भावना में प्रवाहित होते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि धर्म विध्वंसात्मक नहीं, निर्माणात्मक है।
  • सार्वभौमिक धर्म को प्राप्त करने का मार्ग यह नहीं है। कि किसी एक धर्म को अपनाकर दूसरे धर्म की निन्दा की जाए। प्रत्येक धर्म का अपना-अपना महत्त्व है। फिर भी नहीं भूलना चाहिये कि मनुष्य के स्वभाव भी भिन्न-भिन्न हैं अर्थात् कोई विचारक है तो कोई दार्शनिक, कोई भक्तिवादी है तो कोई रहस्यवादी और कोई कर्मकांडी। यही कारण है कि योग के ध्यान योग, राजयोग, हटयोग, भक्तियोग और कर्मयोग आदि कितने ही भेद बताये गये हैं, जबकि लक्ष्य सबका एक ही है और वह है आत्मा की प्राप्ति।
  • एक वेदान्तवादी होने के नाते स्वामी विवेकानन्द माया के सिद्धान्तों में विश्वास करते थे। किन्तु इससे उनका यह अभिप्राय नहीं था कि इन्द्रियों द्वारा अनुभव होने वाला संसार मिथ्या अथवा अवास्तविक है। उनका मत था कि माया संसार की व्याख्या का एक सिद्धान्त नहीं है वरन् केवल ययार्थ तथ्यों का एक कथन है इसका आशय केवल यह है कि ऐद्रिक अनुभव का संसार अन्तिम वास्तविक नहीं है लेकिन यह मिथ्या भी नहीं है। यह तो वास्तविकता है और जो कुछ दिखाई देता है इन दोनों का एक सम्मिश्रण है जिसका अस्तित्व केवल हमारे मन और इन्द्रियों के साथ सम्बन्ध में है तथा उनमें परिवर्तन हो जाने से इसमें भी परिवर्तन हो जाता है।
  • स्वामी विवेकानन्द ने इस तरह स्पष्ट किया है कि "प्रकृति का संसार निरपेक्ष सत्ता (Absolute being) और असत्ता (Non being) के बीच का रूप है, यह सापेक्ष है।

सार्वभौम धर्म
  • विवेकानन्द कहते हैं- प्रत्येक जीव अव्यक्त ब्रह्म है। बाहय एवं अन्तः प्रकृति को वशीभूत करके स्वयं में अन्तर्निहित ब्रह्म स्वरुप को व्यक्त करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है। कर्म, भक्ति, संयम या ज्ञान इनमें से किसी का सहारा लेकर अपने ब्रह्म भाव को व्यक्त कर मुक्त हो जाना धर्म सर्वस्व है। धर्म वह वस्तु है जिससे पशु मनुष्य तक तथा मनुष्य परमात्मा तक उठ सकता है।
  • विवेकानन्द की मान्यता है कि धर्म मनुष्य के चिन्तन एवं जीवन का सबसे उच्च स्तर है। मानव जाति के भाग्य निर्माण में जितनी शक्तियों ने योगदान दिया है. उनमें धर्म की शक्ति सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। धर्म ठोस सत्यों और तथ्यों को पाने के अतिरिक्त, उससे मिलने वाली सांत्वना के अतिरिक्त एक विशुद्ध विज्ञान और एक अध्ययन के रूप में वह मानव मन के लिये सर्वोत्कृष्ठ और स्वस्थतम व्यायाम है।
  • धर्म, मतवाद या बौद्धिक तर्क नहीं है, वरन् आत्मा के ब्रह्मत्व को जान लेना, तद्रूप हो जाना तथा उसका साक्षात्कार करना, यही धर्म हैं। धर्म कल्पना की नहीं प्रत्यक्ष दर्शन की चीज है। विवेकानन्द मानते हैं कि बाह्य प्रकृति पर विजय प्राप्त करना बहुत अच्छी और बड़ी बात है लेकिन अंतः प्रकृति को जीत लेना इससे भी बड़ी बात है। 
  • विवेकानन्द के अनुसार जहां धर्म ने मनुष्य को करूणा, प्रेम, शांति, बंधुत्व एवं सेवा के लिये प्रेरित किया है, वहीं विभिन्न धर्मों और सम्प्रदायों के कलह और कोलाहल, द्वन्द्व और संघर्ष, अविश्वास और ईर्ष्या-द्वेष ने रक्त की नदियां भी बहाई हैं। ऐसे में धर्म के सार्वभौम स्वरूप को प्राप्त करना कठिन प्रतीत होता है, लेकिन सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो सभी धर्मों में सार्वभौम लक्षण विद्यमान हैं। 
  • विवेकानन्द के अनुसार सार्वभौमिक धर्म से आशय किसी सार्वभौमिक दार्शनिक तत्त्व, किसी सार्वभौमिक पौराणिक तत्त्व या किसी सार्वभौमिक अनुष्ठान पद्धति से नहीं है जिसे मानकर सभी को चलना पड़े वरन् सार्वभौम धर्म के रूप में विवेकानन्द एक ऐसे धर्म का प्रचार करने के पक्षधर थे, जो सब प्रकार की मानसिक अवस्था वाले लोगों के लिये उपयोगी हो तथा जिसमें ज्ञान, भक्ति, योग और कर्म समभाव से रहे। इनमें से प्रत्येक भाव पूर्ण मात्रा में और समभाव से विद्यमान रहे तो यह मानव के लिये सर्वश्रेष्ठ आदर्श स्थिति होगी। विवेकानन्द भक्ति, योग, ज्ञान और कर्म के इस समन्वय को ही सार्वभौम धर्म का आदर्श मानते हैं। 
  • विवेकानन्द की मान्यता है कि धर्म को ग्रहणशील होना चाहिए और ईश्वर संबंधी आदर्शों में भिन्नता के कारण एक दूसरे का तिरस्कार नहीं करना चाहिए। ईश्वर संबंधी सभी सिद्धांत (सगुण, निर्गुण, अनन्त, नैतिक नियम या आदर्श मानव सभी) धर्म की परिभाषा के अंतर्गत आने चाहिए। जब धर्म इतने उदार बन जायेंगे तो उनकी कल्याणकारिणी शक्ति भी बढ़ जाएगी। 
  • विवेकानन्द के अनुसार सभी धर्मों को परस्पर बंधुत्व का भाव रखना चाहिए और यह भावना संरक्षण, कृपणता व अनुग्रह पर आधारित न होकर पारस्परिक स्नेह एवं आदर पर आधारित होनी चाहिए। उनका कहना है कि धार्मिक विचारों को विस्तृत, विश्वव्यापी एवं असीम होना पड़ेगा, तभी हम सार्वभौम धर्म के रूप में, धर्म के पूर्ण रूप को प्राप्त कर पायेंगे। विभिन्न धर्मों का आपसी बंधुत्व भाव, परस्पर आदान-प्रदान, त्याग एवं सहिष्णुता से ही मानव में निखार आयेगा तथा वह सत्य के संधान में आगे बढ़ पायेगा। यही सार्वभौम धर्म की दिशा है जो किसी धर्मावलंबी व्यक्ति की विशिष्टता को नष्ट न करते हुए उसे दूसरों के साथ सम्मिलित होने का पक्ष बता सकती है।

मानववाद का आध्यात्मिक आधार  
  • एक सन्यासी दार्शनिक के नाते स्वामी विवेकानन्द का मुख्य सरोकार परम सत्य और परम ब्रह्म से था। उन्होंने ब्रह्म की परिभाषा 'सच्चिदानंद' (सत्+चित्+आनंद) के रूप में दी अर्थात् वह परम सत्य (शाश्वत और निर्विकार), चेतन और आनंदमय है। परम ब्रह्म या परमात्मा की सेवा और ध्यान में ही आत्मा का परम कल्याण निहित है।  
  • प्रश्न यह है कि परमात्मा की सेवा कैसे की जाए? क्या संसार से विमुख होकर एकांत वन, पर्वत-शिखर या कंदरा में समाधि लगाकर परमेश्वर का ध्यान करने से वह मिल जाएगा? विवेकानंद ने आध्यात्मिक साधना की इस विधि का खंडन किया। 
  • उन्होंने तर्क दिया कि इस धरती का मानव-समुदाय ही ईश्वर के अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करता है, उसी के माध्यम से ईश्वर का साक्षात्कार संभव और सार्थक होता है। अतः यदि तुम ईश्वर की सेवा करना चाहते हो तो मनुष्य की सेवा करो उस मनुष्य की जिसे तुम्हारी सेवा और सहायता की प्रबल आवश्यकता है, दीनदुखी, असहाय और पीड़ित मानवता की सेवा ही ईश्वर की सच्ची सेवा है। 
  • प्रस्तुत संदर्भ में स्वामी जी ने 'दरिद्र नारायण' की संकल्पना प्रस्तुत की है। जब हम 'दरिद्र' को 'नारायण' मानकर उसकी सेवा और सहायता करेंगे तभी हमारी आत्मा इतनी पावन हो सकेगी कि उसे ईश्वर का साक्षात्कार हो जाएगा। इस तरह विवेकानंद ने मानववाद के आध्यात्मिक आधार का प्रतिपादन किया।  
  • मनुष्यों के दुःख और पीड़ा एक प्रधान कारण है, ऐसी सामाजिक प्रथाएं जो किसी उत्तम उद्देश्य की पूर्ति के लिए स्थापित की गई थी, परंतु अब उनका कोई उपयोग नहीं रहा। कुछ स्वार्थी तत्त्व उन्हें अब तक कायम रखकर दूसरों पर अत्याचार
  • कर रहे हैं।  
  • हिन्दू धर्म के अंतर्गत एक ऐसी ही प्रथा है, वर्ण-व्यवस्था या जाति प्रथा जिसे अनावश्यक रूप से कठोर बना दिया गया है।
  • विवेकानंद ने जात-पांत के नियमों को उदार बनाने की पैरवी की और अस्पृश्यता की अमानवीय प्रथा की तीव्र निंदा की।  
  • उन्होंने ब्राह्मणों के अधिकारवाद' पर प्रहार करते हुए शूद्रों को सर्वोच्च आध्यात्मिक ज्ञान से वंचित रखने की प्रथा का कड़ा विरोध किया।  
  • सभी मनुष्यों की आध्यात्मिक समानता का समर्थन करते हुए उन्होंने तर्क दिया कि परम सत्य का ज्ञान सब मनुष्यों को सुलभ होना चाहिए-तभी दीन-दुःखियों की दासता के बंधन टूटेंगे और संपूर्ण राष्ट्र का उत्थान होगा। 
  • विवेकानंद की दृष्टि में, वर्ण-व्यवस्था को तत्काल समाप्त करना संभव नहीं था, परंतु इसमें विस्तृत सुधार अत्यंत आवश्यक था। उन्होंने यह मांग की कि सब वर्णों की समानता स्थापित करने के लिए सबसे पहले उपेक्षित और शोषित वर्गों को शिक्षा के विस्तृत अवसर प्रदान करना जरूरी है। 
  • उन्होंने तर्क दिया कि यदि ब्राह्मण अपने आप को बहुत मेधावी समझता है, और शूद्र को जड़बुद्धि मानता है तो शूद्र के लिए शिक्षा की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है। यदि ब्राह्मण के लिए एक शिक्षक की जरूरत है तो शूद्र के लिए दस शिक्षकों की व्यवस्था होनी चाहिए। 
  • उन्होने यह विचार रखा कि ऐतिहासिक विकास के क्रम में चारों वर्ण बारी-बारी से मानव समाज पर राज करते हैं। ब्राह्मणों के राज में ज्ञान-विज्ञान को बढ़ावा दिया जाता है। क्षत्रियों के राज में शौर्य और पराक्रम को विशेष सम्मान दिया जाता है, परंतु इसमें जनसाधारण का दमन और उत्पीड़न होने लगता है। 
  • वैश्यों के राज में धन-संपदा की वृद्धि होती है, परंतु जनसाधारण का बहुत शोषण होता है। अब शूद्रों और मजदूरों के राज की बारी है। इसमें भौतिक सामग्री का समान वितरण होगा, परतु सभ्यता का स्तर गिर जाएगा। इसमें साधारण शिक्षा का भारी विस्तार होगा, परंतु असाधारण प्रतिभा दुर्लभ होती जाएगी।  
  • आदर्श राज्य वह होगा जिसमें ब्राह्मण युग के ज्ञान, क्षत्रिय युग के पराक्रम, वैश्य युग की समृद्धि और शूद्र युग की समानता में संतुलन कायम रखा जा सके।

शिक्षा सम्बन्धी विचार

  • स्वामी विवेकानंद वर्तमान शिक्षा प्रणाली को उपयुक्त नहीं समझते थे। उनका आक्षेप था कि वर्तमान शिक्षा ऐसी है जो मनुष्य और उसके चरित्र का निर्माण नहीं करती। शिक्षा का अर्थ केवल इतना ही नहीं होता कि अपने दिमाग में सब तरह की जानकारी भरकर उसे वाटरलू का युद्ध क्षेत्र बना दिया जाए।
  • शिक्षा का लक्ष्य तो जीवन की निर्माण है, चरित्र का निर्माण, मानव का निर्माण है। वर्तमान शिक्षा इन लक्ष्यों की पूर्ति में सहयोगी नहीं है।
  • उन्होनें वर्तमान शिक्षा को अभावात्मक (Negative) बताया जहाँ छात्रों को अपनी संस्कृति के बारे में सीखने को कुछ नहीं मिलता, जहाँ उनमें जीवन के वास्तविक मूल्यों का पाठ नहीं पढ़ाया जाता और जहाँ शिक्षार्थियों में श्रद्धा का अभाव पनपता है। विवेकानन्द ने शिक्षा की गुरूकुल पद्धति को उपयोगी माना जहाँ छात्र, शिक्षक के निकटतम सम्पर्क में रह सके और उनमें पवित्रता, ज्ञान लिप्सा, धैर्य, विनम्रता, विश्वास तथा आदर की भावना पनप सके।  
  • शिक्षा पाठ्यक्रम में विवेकानन्द ने धार्मिक ग्रन्थों के अध्ययन को अनिवार्य बताया और कहा कि संस्कृति के ज्ञान द्वारा ही उन ग्रन्थों को सही परिप्रेक्ष्य में समझा जा सकता है। 
  • अंग्रेजी के अध्ययन पर भी उन्होनें विशेष बल दिया कि भारतीय इस सम्पर्क भाषा का लाभ उठा सकें, वर्तमान वैज्ञानिक प्रगति के बारे में जान सकें। आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ उन्होंने शिक्षा में धर्म सहिष्णुता बनाए रखने पर भी बल दिया शिक्षा ऐसी नहीं होनी चाहिए जो संकीर्ण भेदभावों और साम्प्रदायिकता को उत्पन्न करे।

रामकृष्ण मिशन एवं स्वामी विवेकानंद

  • स्वामी विवेकानंद ने भारतीय संस्कृति, धर्म एवं समाज की अच्छाइयों से विश्व को परिचित कराया। स्वामी विवेकानंद के समक्ष तीन प्रमुख कार्य थे-
  1. उनका पहला कार्य था, धर्म की ऐसी व्याख्या करना जो सर्वमान्य हो। 
  2. पाश्चात्य शिक्षा के कारण भारतीयों में धर्म के प्रति श्रद्धा कम हो गई थी। इस दृष्टि से हिन्दू धर्म के प्रति हिन्दुओं की श्रद्धा को पुनः स्थापित करना।
  3. हिन्दुओं में आत्म गौरव की भावना विकसित करना।
  • स्वामी ने धर्म की जो व्याख्या की उसका सार था- "धर्म मनुष्य के भीतर निहित देवत्व का विकास है। धर्म न तो पुस्तकों में है और न ही धार्मिक सिद्धातों में। वह तो केवल अनुभूति में निवास करता है। 
  • स्वामी विवेकानंद ने सन् 1891 से भारत के विभिन्न स्थानों पर भ्रमण किया एवं भारतीयों की निर्धनता एवं दयनीय दशा का प्रत्यक्ष अनुभव किया। आपको 1893 ई में शिकागो (अमेरिका) में विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने का अवसर मिला। कई बाधाओं को पार करते हुये स्वामी विवेकानंद धर्म सम्मेलन में पहुँचे।  
  • स्वामी जी ने अपने व्याख्यान में विश्व को अवगत कराया कि विश्व का कोई भी कार्य भारत की सामर्थ्य के बाहर नहीं हैं। बौद्धिक, धार्मिक, चारित्रिक, आध्यात्मिक एवं दार्शनिक दृष्टि से भारत जितना समृद्ध है, उतना विश्व का कोई अन्य देश नहीं है।
  • स्वामीजी ने अपने आत्मीय उद्बोधन से लोगों का मन मोह लिया। अगले दिन वहाँ के समाचार पत्र हैराल्ड ने उनके बारे में लिखा-"धर्म की इस महान संसद में विवेकानंद ही सबसे महान् है। उनका भाषण सुनने के बाद लगता है कि ऐसे ज्ञानी देश (भारत) को सुधारने के लिए विदेशी धर्म प्रचारकों को भेजना कितनी मूर्खता की बात है।" 
  • स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरू रामकृष्ण की शिक्षाओं के व्यापक प्रसार के लिए कोलकाता में बेल्लूर के पास 1 मई 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इसकी शाखाएं देश विदेश में फैली हुई हैं। इससे पूर्व 1887 ई. में तारानगर में रामकृष्ण मठ की स्थापना की गई। मठों के माध्यम से रामकृष्ण मिशन का संगठन और प्रचार कार्य स्वामीजी ने प्रारम्भ कर दिया था लेकिन रामकृष्ण मिशन का वैधानिक स्वरूप उनकी मृत्यु के बाद सन् 1903 से अस्तित्व में आया, जब इसे एक समुदाय के रूप में पंजीकृत करा लिया गया। 
  • रामकृष्ण मिशन भारत के विभिन्न प्रांतों तथा अमेरिका फिजी, मॉरिशस आदि देशों में शाखाएं है। रामकृष्ण मिशन ऐसे आदर्शों एवं सिद्धांतों का प्रचार प्रसार करता है, जिसे सभी धर्मों व संस्कृतियों के लोग अपना सकें। मिशन के माध्यम से उपदेश, शिक्षा, चिकित्सा, अकाल, बाढ़, भूकम्प व संक्रामक रोगों से पीड़ितों की सहायता कार्य भी किया जाता है। 
  • स्वामी विवेकानंद का मानव सेवा में महत्त्वपूर्ण स्थान है। वे रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, निर्धनता व अशिक्षा के कटु आलोचक थे। छुआछूत व वर्गभेद को नहीं मानते थे। जन कल्याण की भावना को उन्होंने प्रोत्साहित किया। 
  1. सामाजिक कार्य - विवेकानंद ने तत्कालीन भारतीय समाज में व्याप्त संकीर्णताओं एवं कुरीतियों का विरोध किया। उनका मत था कि सामाजिक धार्मिक परम्पराओं एवं मान्यताओं को तभी स्वीकार करना चाहिये जब वे उचित जान पड़े। उन्होंने स्त्री पुनरूस्थान की बात कही। वे निर्धनता और अज्ञानता को समाप्त करना चाहते थे। 
  2. विवेकानंद के विचारों को सफल बनाने के लिए रामकृष्ण मिशन ने समाज सेवा एवं परोपकार के कार्यों को बहुत महत्त्व दिया। अपने कार्यों में मानवतावादी दृष्टिकोण के कारण रामकृषण मिशन अधिक लोकप्रिय हुआ। रामकृष्ण मिशन ने कई विद्यालय, अनाथालय, चिकित्सालय आदि स्थापित किये और इसके माध्यम से समाज सेवा के कार्य किये। 
  3. स्वामी विवेकानंद का राष्ट्रीय दृष्टिकोण - विवेकानंद एवं रामकृष्ण मिशन ने भारतीयों में आत्मविश्वास एवं आत्मसम्मान की भावना का विकास किया। इसी भावना ने युवाओं को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की ओर प्रेरित किया। उन्होंने स्वतंत्रता, समानता एवं स्वतंत्र चिंतन की बात कर युवाओं को नयी दिशा प्रदान की। उन्होंने कहा उठो, जागो और तब तक विश्राम न करो जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए। मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति कर पहले वे मनुष्य को मनुष्य बनाना चाहते थे। उसी को सम्पूर्ण प्रगति का आधार मानते थे। उन्होंने भारत के प्राचीन गौरव को संसार के सामने रखा। उन्होंने ऐसी शिक्षा पद्धति की बात कही जिससे चरित्र निर्माण हो। उन्होंने कहा कि मनुष्य का साहस एक वीरत्व एक दिन उसे कुपथ त्यागने की प्रेरणा देंगे। 
  4. धार्मिक विचार - स्वामी जी हिन्दू धर्म एवं दर्शन में गहरी आस्था रखते थे। इन्होंने हिन्दू धर्म एवं संस्कृति की मौलिकता एवं इसकी, विशेषताओं को लोगों के समक्ष रखा। इन्होंने मनुष्य की आत्मा को ईश्वर का अंश बताया। इनका मानना था कि ईश्वर की आराधना का एक रूप दीन दुखी और दरिद्रो की सेवा भी है। रामकृष्ण मिशन ने मानव सेवा को ईश्वर की सेवा माना है। नर सेवा नारायण सेवा उनका ध्येय वाक्य है।

संस्थागत प्रयास
  • 1894 – वेदांत सोसायटी – न्यूयॉर्क, अमेरिका
  • 1897 – रामकृष्ण मिशन - कलकत्ता
  • 1898 – रामकृष्ण मठ – कलकत्ता

विवेकानंद के अनुसार प्रत्येक कार्य को कितनी अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है-
  • उपहास।
  • विरोध।
  • स्वीकृति।

स्वामी विवेकानंद को 'विवेकानंद' की उपाधि किसने दी - खेतड़ी के महाराज ने स्वामी विवेकानंद को ‘विवेकानंद की उपाधि दी थी।

स्वामी जी के अनुसार देशभक्त होने के लिए तीन बातें आवश्यक हैं-
  • साहस
  • निष्ठा
  • संकल्प

विवेकानंद के अनुसार धार्मिक बहुलतावाद - स्वामी विवेकानंद ने अपने विचारों में धार्मिक बहुलतावाद को बहुत महत्त्व प्रदान किया है, उनके अनुसार विश्व में अनेक प्रकार के धर्म प्रचलित हैं और यह सभी धर्म एक ही चरम लक्ष्य अर्थात् ईश्वर प्राप्ति के विभिन्न मार्ग हैं। अतः हमें विश्व के सभी धर्मों के सकारात्मक पक्षों को ग्रहण करते हुए उच्चतम आदर्श तक पहुंचने के प्रयास करना चाहिए।

विवेकानंद के अनुसार दरिद्र नारायण कौन है?
  • विवेकानंद मानते थे कि भगवान का सबसे प्यारा व सच्चा रूप दरिद्र नारायण है। जब हम किसी दरिद्र को नारायण मानकर सेवा करेंगे तभी हमारी आत्मा का शुद्धिकरण होगा, तब हम ईश्वर के साक्षात्कार के योग्य हो जाएंगे।
  • गरीबों, असहायों एवं पीड़ितों की सेवा ही भगवान प्राप्ति का माध्यम है इसलिए निस्वार्थ जन सेवा को ज्ञान, भक्ति, योग के समान ही पवित्र मानते हैं।

विश्व धर्म संसद
  • 11 से 13 सिंतबर को अमेरिका के शिकागो शहर में आयोजित विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद ने भारतीय धर्म व संस्कृति की महानता एवं उज्जवल पक्षों से दुनिया को अवगत कराया।
  • विवेकांनद को इसमें भाषण देने के लिए कुछ ही समय दिया गया था और उनके पास पहले से तैयार भाषण भी नहीं परंतु उन्होंने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि एवं दक्षता के आधार पर सभागार में श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि "अमेरिकी निवासियों भाईयों एवं बहनों "।
  • इनके इस संबोधन मात्र से सभागार तालियों एवं हर्षोन्माद से गूंज उठा।
  • इस अवसर पर उन्होने सार्वभौम सहिष्णुता, भारत की आध्यात्मिक संपदा, भारतीय संस्कृति की सार्वभौमिकता की गौरव गाथा को पाश्चात्य देशों के समक्ष प्रस्तुत किया।

संसद का महत्त्व या प्रासंगिकता
  • उपर्युक्त संदर्भ सांवेगिक बुद्धि का उदाहरण है। यदि व्यक्ति के मन और बुद्धि का सम्यक संतुलन हो तो छोटे अवसरों को भी बड़े उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु प्रयोग किया जा सकता है।

वेदान्त

  • स्वामी जी मानते हैं कि अविद्या मानव की प्रकृति है, इसीलिये उसे सारे दुःख झेलने पड़ते हैं। विद्या तो आदमी को उन्नति की ओर ले जाती है। स्वामीजी ने परमेश्वर के बहुत से लक्षण गिनाये हैं, जैसे स्वतंत्रता, परिपूर्णता, उत्तमता आदि परंतु स्वामीजी ने साथ ही साथ यह भी कहा है कि विद्या का उद्देश्य स्वाधीनता है और परमेश्वर स्वाधीनता की प्रतिमूर्ति है। इसीलिये यदि अन्त:करण में परमेश्वर का साक्षात्कार करना है तो मनुष्य के लिये जरूरी है कि वह स्वाधीन हो।
  • उन्होंने इसके लिए वेदांत का मार्ग बताया है। स्वामी जी का कहना है कि परिपूर्णता से हटाने वाला तत्त्व अविद्या है और परिपूर्णता की ओर ले जाने वाला तत्त्व वेदांत है।
  • हर एक सत्कर्म दो ही कार्य करता है या तो वह मानव की सेवा करता है और या परम तत्त्व के निकट ले जाता है। स्वामी जी का यह भी कहना है कि यदि कहीं ऐसी स्थिति आ जाये कि व्यक्ति को यह सोच करना पड़े कि वह मानव की सेवा करे या ईश्वर भक्ति में लगे तो मानव सेवा करनी चाहिए।

कर्मयोग
  • स्वामीजी का कहना है कि कर्मयोग ही विद्या का मार्ग है और अंततोगत्वा उसी से व्यक्ति की गति होगी।
  • कर्मयोग के दो तत्त्व है- अंह का परित्याग, मानव सेवा। कर्मयोग एक ऐसा मार्ग है जिस पर छोटे-बड़े सब ही चल सकते हैं।
  • कर्मयोगी सदा अपने कर्म में लगा रहे। स्वामीजी ने इस जगत को वास्तविक माना। यद्यपि उनका कहना था कि यह जगत शाश्वत (Eternal) नहीं है।
  • मानव एक सामाजिक जीव है। स्वामी जी कहा करते थे, स्वर्ग की क्यों प्रतीक्षा करते हों उसे यहीं बना लो और उसका द्वार मानव सेवा की कुंजी ही खोल सकती है।
  • स्वामीजी व्यक्तिगत साहस और परिश्रम पर बहुत जोर देते थे। वे कहा करते थे कि दुनिया का इतिहास सिर्फ उन कुछ लोगों का इतिहास है जिन्हें अपने ऊपर भरोसा है।
  • आत्मविश्वास का आधार केवल अन्त:करण में बैठा दैवी तत्त्व ही है। अगर आपको अपने अन्दर विश्वास है तो कोई उद्देश्य ऐसा नहीं है जिसे प्राप्त न कर सकें। दुनिया को बदलने वाले थोड़े से आत्मविश्वासी ही हुए हैं।
  • धर्म और शिक्षा व्यक्ति में वेदांतिक निष्ठा भरते हैं इसलिए धर्म आवश्यक है और शिक्षा उपयोगी। इसी को स्वामीजी मानव-निर्माण धर्म (Man making religion) की संज्ञा देते हैं और यही उनके वेदांत धर्म का सार है।
  • उनका कहना है कि इन वेदांत की शिक्षा उपनिषदों और गीता में भरी पड़ी है। स्वामीजी का कहना था कि आत्म-बुद्धि परमात्म दर्शन की ओर ले जाती है।
  • विवेकानन्दजी कहते हैं कि अद्वैत दर्शन शंकराचार्य ने तो पहाड़ों और जंगलों में छोड़ दिया, मैं इसको पूरे समाज के लिये, उनके दैनिक प्रयोग के लिये चारों ओर बिखेर रहा हूँ। इसी से दुनिया में परिवर्तन आयेगा।
  • स्वामीजी का विश्वास था कि मानव अपनी आत्मा का विकास सत्य और साधुता के मार्ग से कर सकता है।
  • जहां तक मनुष्यों में असमानता का प्रश्न है स्वामीजी मानते हैं कि असमानता है और रहेगी परंतु असमानता रहने का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि अधिक शक्तिशाली, कमजोर को दबाए, उसे अपने शोषण का शिकार बनाए।
  • स्वामी जी इस तरह के शोषण के प्रबल विरोधी हैं। उनका कहना है कि इस तरह के विशेषाधिकार को समाज में सहन नहीं किया जाना चाहिए।

सार्वभौमिक धर्म
  • विवेकानन्द के अनुसार सार्वभौमिक धर्म से आशय किसी सार्वभौमिक दार्शनिक तत्त्व, किसी सार्वभौमिक पौराणिक तत्त्व या किसी सार्वभौमिक अनुष्ठान पद्धति से नहीं है जिसे मानकर सभी को चलना पड़े वरन् सार्वभौम धर्म के रूप में विवेकानन्द एक ऐसे धर्म का प्रचार करने के पक्षधर थे, जो सब प्रकार की मानसिक अवस्था वाले लोगों के लिये उपयोगी हो तथा जिसमें ज्ञान, भक्ति, योग और कर्म समभाव से रहे।
  • इनमें से प्रत्येक भाव पूर्ण मात्रा में और समभाव से विद्यमान रहे तो यह मानव के लिये सर्वश्रेष्ठ आदर्श स्थिति होगी। विवेकानन्द भक्ति, योग, ज्ञान और कर्म के इस समन्वय को ही सार्वभौम धर्म का आदर्श मानते हैं।

स्वामी विवेकानंद का राष्ट्रीयता संबंधी विचार
  • विवेकानंद का मानना था कि भारतीयों की गरीबी एवं दुर्दशा का कारण ब्रिटिश शासन की शोषणकारी नीतियां हैं, जिनके निराकरण हेतु आवश्यक है कि भारतीय लोग सामाजिक बुराईयों, अंधविश्वास, जातिप्रथा, छुआ-छूत को दूर कर आंतरिक एकता एवं आत्म गौरव का भाव विकसित करें जिसके लिए सांस्कृतिक पुनर्जागरण आवश्यक है।
  • विवेकानंद के अनुसार अतीत के उन्नत पक्षों का अनुसरण करते हुए राष्ट्रीय हित की भावना को लोगों में जागृत किया जा सकता है और आत्मगौरव एवं देशभक्त हेतु तैयार किया जा सकता है। उनका संदेश है। कि- "उठो जागे एवं लक्ष्य प्राप्त करने तक न रूको।" यह संदेश आज भी युवाओं को जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान करता है।
  • विवेकानंद ने देश सेवा को आध्यात्मिक आधार प्रदान करते हुए भारत माता की संकल्पना प्रस्तुत की उन्होंने कहा - "गर्व से कहो मैं भारतीय हूं" सभी भारतीय मेरे बंधु हैं चाहे वह दरिद्र हो या संपन्न, भारत की मिट्टी मेरे लिए परम स्वर्ग है भारत के कल्याण में मेरा कल्याण है"।

स्वामी विवेकानंद के प्रमुख सिद्धांतों की प्रशासन के संदर्भ में उपयोगिता की विवेचना कीजिए।
  • संपूर्ण विश्व में भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता स्थापित करने वाले स्वामी विवेकानंद एक महान देशभक्त, प्रखर, वक्ता, कुशल विचारक और मानव प्रेमी थे। संपूर्ण विश्व में 'तूफानी हिन्दू' के नाम विख्यात स्वामी विवेकानंद जी ने जितने भी सिद्धांत दिए वे केवल दैनिक जीवन में राजनीतिक व सामाजिक जीवन में उपयोगी है वरन् प्रशासन मे भी उतने ही प्रासंगिक हैं-
  1. कर्म योग का सिद्धांत- स्वामी विवेकानन्द का मानना है कि व्यक्ति को सदा क्रियाशील रहना चाहिए व अपने लक्षित उद्देश्यों को प्राप्ति के लिए साहस व निर्भीकता से लगे रहना चाहिए। एक आदर्श कुशल प्रशासक को चाहिए कि वह भी विवेकानंद के 'कर्मयोग' सिद्धांत का पालन करे और समाज का कल्याण करे।
  2. जनसेवा- विवेकानंद का मानना था कि जनसेवा ही ईश्वर सेवा है इसलिए प्रशासन में भी जनसेवा को ध्येय मानकर प्रशासकों को अपनी कल्याणकारी नीतियों से जनसेवा करना चाहिए हालांकि प्रशासन का उद्देश्य जनसेवा व जनकल्याण ही है परंतु कतिपय प्रशासकों ने अपने लाभ व स्वार्थ के कारण प्रशासन की छवि धूमिल की है जो कि अनैतिक है।
  3. युवा शक्ति का आह्वान- विवेकानंद ने ऊर्जा और साहस से परिपूर्ण युवा शक्ति का आह्वान करते हुए कहा कि सभी युवा अपने आप को शारीरिक, मानसिक रूप से सक्षम बनाकर देश व समाज के प्रति कर्तव्यों को पहचाने और निरंतर इनकी भलाई व उत्थान हेतु कार्यरत रहे। आज भी देश का सबसे बड़ा वर्ग युवा है और उसकी प्रशासन में महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
  4. नारी उत्थान के समर्थक- भारतीय पुरूष प्रधान समाज में नारी को दोयम दर्जे का माना जाता रहा है परंतु विवेकानंद की भांति एक प्रशासक को नारी उत्थान के कार्य करने चाहिए व नारी संबंधी कार्यों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
  5. जातिप्रथा व अस्पृश्यता के विरोधी- स्वामी विवेकानंद जातिप्रथा व छुआछूत के कट्टर विरोधी थे। समाज के प्रत्येक वर्ग (चाहे युवा या कुलीन व राजनीतिक हो) से उन्होनें जाति प्रथा के विरोध का आह्वान किया। एक सफल प्रशासक को भी छुआछूत व जातिप्रथा से ऊपर उठकर सर्व वर्ग हितैषी कार्य करने चाहिए ताकि समाज के प्रत्येक वर्ग का कल्याण हो।
  6. पाश्चात्य अंधानुकरण का विरोध- स्वामी जी पश्चिम के अच्छे विचारों के समर्थक व अंधानुकरण के विरोधी थे। प्रशासन पर भी यह सिद्धांत लागू होता है कि अच्छी नीतियां कहीं से भी ग्रहण की जा सकती हैं परंतु किसी भी अन्य देश की नीतियों का अंधानुकरण नहीं होना चाहिए।

मूल्यांकन

विवेकानन्द के जीवन और चिन्तन के इस संक्षिप्त मन्थन से यह निष्कर्ष निकलना स्वाभाविक है कि उन्होंने देश में जनजागरण का मन्त्र फूंका और देशवासियों को शक्ति तथा निर्भयता के मार्ग पर आगे बढ़ाया। भारतीय राष्ट्रवाद का सराहनीय प्रयास किया। रामकृष्ण मिशन की स्थापना करके उन्होंने राष्ट्रीय जीवन में वेदान्तवाद का प्रसार किया और प्रेम तथा विश्व बन्धुत्व का संदेश दिया। विवेकानन्द ने पूर्व और पश्चिम की संस्कृतियों में समन्वय का प्रयास इस रूप में किया कि पश्चिम की अच्छी बातों को ग्रहण करने और अपना मानसिक क्षितिज विस्तृत करने में हमे संकोच नहीं होना चाहिए लेकिन राजाराम मोहन राय की तरह उन्होंने यह कदापि नहीं माना कि पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति में भारत का पुनर्निर्माण करने की पूरी क्षमता है। वास्तव में विवेकानन्द पूर्व की आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक महानता के समर्थक थे तो पश्चिम के वैज्ञानिक और संगठनात्मक कुशलता तथा समाज सेवा भावना के भी प्रशंसक थे और उन्होंने इन दोनों ही बातों का मिश्रण प्रस्तुत किया, जिसने आधुनिक भारत के समाज सुधारकों और राजनीतिक नेताओं को प्रभावित किया।

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