बौद्ध धर्म (baudh dharm)

बौद्ध धर्म (baudh dharm)

'छठी शताब्दी ई. पू.' भारतीय इतिहास में 'धार्मिक क्रांति के युग' के रूप में विख्यात है. यह वह समय था जब चीन में कन्फ्यूशियस तथा लाओत्से अपने दार्शनिक विचारों का प्रचार कर रहे थे. ईरान में जोरेस्टर का प्रचार कार्य चल रहा था. यूनान में सुकरात अपने दार्शनिक सिद्धान्तों की विवेचना कर रहे थे.
baudh-dharm
भारत भी इस धार्मिक क्रान्ति से अछूता न रह सका. भारत में भी लोगों के धार्मिक दृष्टिकोण में परिवर्तन हो रहा था. चूँकि अब तक धार्मिक जटिलताएं अपने चरम पर पहुँच गयी थीं, इसलिए धार्मिक अनुष्ठान अब आम आदमी की पहुंच से परे होते जा रहे थे. ऐसे समय में लोग एक ऐसे धर्म की खोज में जुटे हुए थे जो सरल, सुबोध और उच्चस्तरीय हो. इसी समय भारत में महात्मा बुद्ध और महावीर स्वामी दो महान् व्यक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ. इन दो महान् व्यक्तियों ने भारत में व्याप्त प्राचीन धार्मिक परम्पराओं एवं अंधविश्वासों का घोर विरोध किया और लोगों के समक्ष क्रमशः बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म को रखा. ये ऐसे धर्म थे जिन्होंने तत्कालीन जनता के धार्मिक विचारों में क्रांतिकारी परिवर्तन किया, परिणामस्वरूप तत्कालीन भारत में बौद्ध एवं जैन धर्म का प्रचार-प्रसार बढ़ता गया.

महात्मा बुद्ध का जीवनवृत्त

जन्म

563 ई. पू.

जन्म स्थान

कपिलवस्तु से 14 मील दूर लुम्बनीवन में

पिता का नाम

शुद्धोधन (शाक्यों के राज्य कपिलवस्तु के शासक)

माता का नाम

महामाया (देवदह की राज कुमारी)

बुद्ध के बचपन का नाम

सिद्धार्थ

बुद्ध की पत्नी का नाम

यशोधरा

बुद्ध के पुत्र का नाम

राहुल

बुद्ध की मृत्यु

486 ई.पू.

मृत्यु स्थान

कुशीनारा


महात्मा बुद्ध और बौद्ध धर्म

भारत प्रारम्भ से ही धार्मिक संस्कारों वाला देश रहा है. यहाँ जब भी धर्म का पतन हुआ तब धर्म की रक्षा हेतु महान् व्यक्तियों ने अवतार लिया. छठी शताब्दी ई. पू. तक भारत में स्थापित धर्म में अनेक त्रुटियाँ उत्पन्न हो चुकी थीं. धर्म विनाश की ओर अग्रसर था ऐसे में महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ जिन्होंने एक नवीन धर्म बौद्ध धर्म की स्थापना की. उन्होंने अपने उपदेशों और शिक्षा के माध्यम से लोगों के धार्मिक दृष्टिकोण को ही बदल डाला.
बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा गौतम बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था. उनका जन्म कपिलवस्तु से 14 मील दूर स्थित लुम्बनी नामक ग्राम में 563 ई. पू. में हुआ था. महात्मा बुद्ध के पिता का नाम शुद्धोधन था जो कपिल वस्तु के शाक्य क्षत्रियों के एक छोटे से गणराज्य के प्रधान थे. महात्मा बुद्ध की माता का नाम महामाया (कोसल राजवंश) था, सिद्धार्थ (महात्मा बुद्ध) के जन्म के एक सप्ताह पश्चात् ही महामाया का देहान्त हो गया. अतः उनकी मौसी प्रजापति ‘गौतमी' ने उनका लालन-पालन किया सम्भवतः इसी कारण वे गौतम कहलाए. प्रारम्भ से ही गौतम का रुझान आध्यात्मिकता की ओर था, कारणतः उनके पिता चिन्तित रहते थे.
आध्यात्मिकता की ओर से ध्यान हटाने के लिए गौतम का पालन ऐश्वर्य और भोग विलास के वातावरण में किया गया. जब वे (गौतम) 16 वर्ष के थे उनका विवाह यशोधरा नामक सुन्दर कन्या से कर दिया गया. 28 वर्ष की अवस्था में उनके एक पुत्र हुआ जिसका नाम 'राहुल' था, किन्तु इतना सब होने पर भी उनका मन दाम्पत्य जीवन में नहीं लगा. सांसारिक दु:खों के बन्धन ने उन्हें बराबर अशांत बनाए रखा और एक दिन 29 वर्ष की अवस्था में गौतम ने गृहत्याग दिया, उन्होंने यथास्थान तत्कालीन सभी बुद्धिवान साधुओं और संन्यासियों की संगति की, सघन वन में समाधि लगाई. गौतम द्वारा गृहत्याग किए जाने को बौद्ध मतावलम्बी 'महाभिनिष्क्रमण' कहते हैं. वे सात वर्ष तक ज्ञान की खोज में इधर-उधर भटकते रहे, इसी दौरान उनकी मुलाकात बिम्बसार, उद्रक और आलार कालाम नामक सांरव्योपदेशक से हुई. इसके उपरांत वे 35 वर्ष की अवस्था में बिहार स्थित 'उरूबेला' की सुरम्य वनस्थली पहुंचे यहाँ पर उन्हें 'कौण्डिन्य' आदि पाँच साधक मिले. बाद में यह 'उरूबेला' ही बौद्ध गया के नाम से प्रचलित हुआ. यह वही स्थान है, जहाँ एक पीपल के पेड़ के नीचे गौतम को समाधि लगाने के 49वें दिन ज्ञान प्राप्त हुआ तभी से वे बुद्ध तथा पीपल का पेड़ ‘बोधि वृक्ष' के नाम से जाना जाने लगा, ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् महात्मा बुद्ध ने वाराणसी के समीप सारनाथ में अपने पाँच शिष्य जोकि जाति के ब्राह्मण थे को पहली बार उपदेश दिया.
बुद्ध का यह प्रथम उपदेश बौद्ध परम्परा में "धर्म चक्र प्रवर्तन' के नाम से जाना जाता है. इसके पश्चात् उन्होंने कई राज्यों यथा-मगध, कोशल, वैशाली, कौशाम्बी आदि अनेक राज्यों का भ्रमण किया और वहाँ उपदेश दिए. ऐसा जान पड़ता है कि उन्होंने मगध को अपना प्रमुख प्रचार केन्द्र बनाया. बुद्ध के उपदेश इतने प्रभावी थे कि अनेक शासक यथा मगध का शासक बिम्बसार, कौशाम्बी का उदयन तथा कोशल का प्रसेनजित उनके (बुद्ध) अनुयायी बन गए. बौद्धत्व प्राप्ति के पश्चात् बुद्ध ने अपना सम्पूर्ण जीवन बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में लगा दिया. 483 ई. पू. में वे जब लगभग अस्सी वर्ष के थे. उनका निधन कुशीनगर (कसिया गाँव देवरिया जिला, पूर्वी उत्तर प्रदेश) में हुआ.
बुद्ध के निधन को बौद्ध परम्परा में 'महापरिनिर्वाण' के नाम से जाना जाता है. महापरिनिर्वाणोपरान्त बुद्ध के अस्थि अवशेषों को आठ भागों में विभाजित कर भारत में अलग स्थानों पर स्थापित कर उसके ऊपर स्तूपों का निर्माण कराया गया.

बौद्ध धर्म के सिद्धान्त

महात्मा बुद्ध ने जो धर्म चलाया वो वास्तव में कोई नवीन धर्म न था वरन् पुराने प्रचलित धर्म के ही आधार पर मनुष्यों के सम्मुख रखा जाने वाला एक ऐसा मार्ग था, जिसका पालन कर मनुष्य जन्म-मरण के बन्धन से मुक्ति प्राप्त कर सकता है. वास्तव में, महात्मा बुद्ध एक व्यावहारिक धर्म सुधारक थे. यही कारण है कि उन्होंने स्वयं को उस समय चल रहे आत्मा और ब्रह्म सम्बधी निरर्थक वाद-विवाद में कभी नहीं उलझाया, बल्कि उन्होंने अपने धर्म में सदाचार और नैतिकता पर विशेष बल दिया. अंधविश्वास को उन्होंने कहीं कोई स्थान न दिया और तर्क को प्रधानता दी. एक बार उन्होंने अपने शिष्यों को सम्बोधित करते हुए कहा था "भिक्षुओं में जो कुछ कहूँ वह परम्परागत है, इसलिए सत्य मानना, तुम्हारी श्रद्धा का पोषक है, इसलिए सत्य मत मानना. मैं शास्ता हूँ, पूज्य हूँ ऐसा मानकर सत्य मत मानना, किन्तु तुम्हारा हृदय और मस्तिष्क जिस बात को विवेकपूर्वक ग्रहण करे उसे ही सत्य मानना." महात्मा बुद्ध ने अपनी माता महाप्रजापति गौतमी से कहा था "धर्म वही है जो विराग का उपदेश देता है, जो इच्छाओं का दमन करता है.
"बुद्ध का मत था कि यह संसार दुःख से परिपूर्ण है तथा इस दुःख का मुख्य कारण लोगों की तृष्णाएं हैं. संक्षेप में कहा जा सकता है कि उनका धर्म लोकतन्त्रवादी था जिसका ध्येय बहुजन हिताय था बौद्ध धर्म के सिद्धान्त निम्नलिखित हैं-
  • दु:ख- दुःख महात्मा बुद्ध के चार आर्य सत्यों में से एक है. बुद्धजी का मत था कि यह सम्पूर्ण संसार दुःख से व्याप्त है. यहाँ जन्म, मरण, जरा, व्याधि, प्रिय का वियोग, इच्छित वस्तु का प्राप्त न होना आदि सभी दुःख है.
  • दुःख समुदाय- समुदाय का अर्थ है कारण अर्थात् संसार में व्याप्त दु:ख का कोई न कोई कारण अवश्य है. बुद्धजी ने समस्त दुःखों का कारण तृष्णा को बताया. उनका मत है कि अपूर्ण इच्छाओं की पूर्ति के लिए मनुष्य बार-बार इस संसार में जन्म लेता है, मनुष्य की यही तृष्णा उसके सम्मुख दुःख उत्पन्न करती है.
  • दुःख निरोध- निरोध का अर्थ है दूर करना, संसार में जब चारों तरफ दुःख व्याप्त है और इस दुःख का कारण है तो इसका दु:ख निरोध भी सम्भव है. चूंकि दुःख का कारण तृष्णा है. अतः यदि तृष्णा का विनाश कर दिया जाए तो दुःख का नाश भी सम्भव है.
  • दुःख निरोध मार्ग- दुःख का विनाश करने के लिए महात्मा बुद्ध ने जिस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया उसे दुःख निरोध गामिनी प्रतिपदा कहा जाता है. इसके अन्तर्गत आठ सिद्धान्तों का निरुपण किया गया जिन्हें अष्टांगिक मार्ग कहा जाता है. ये वे आठ मार्ग हैं जिनका पालन करने से दुःख का नाश सम्भव है. दुःख निरोध हेतु महात्मा बुद्ध द्वारा प्रतिपादित अष्टांगिक मार्ग 'मध्य मार्ग' कहलाता है, क्योंकि इसमें मनुष्य को यह बताया गया है कि उसे न तो विलासिता में ही रत रहना चाहिए और न ही अपने शरीर को कष्ट देना चाहिए, बल्कि उसे शुद्धतापूर्वक नैतिक जीवन व्यतीत करना चाहिए.

अष्टांगिक मार्ग

सम्यक दृष्टि

अर्थात् चार आर्य सत्यों की सही परख

सम्यक वचन

अर्थात् सत्य बोलना

सम्यक संकल्प

अर्थात् भौतिक वस्तु तथा दुर्भावना का त्याग

सम्यक कर्म

अर्थात् सत्य कर्म करना

सम्यक आजीव

अर्थात् ईमानदारी से आजीविका कमाना

सम्यक व्यायाम

अर्थात् शुद्ध विचार ग्रहण करना

सम्यक स्मृति

मन, वचन तथा कर्म की प्रत्येक क्रिया के प्रति सचेत रहना

सम्यक समाधि

अर्थात् चित्त की एकाग्रता


दस शील तथा आचरण

महात्मा बुद्ध ने मनुष्य के जीवन का परम लक्ष्य निर्वाण प्राप्ति बताया है. निर्वाण प्राप्ति से आशय है मोक्ष प्राप्त करना अर्थात् जीवन-मरण के चक्र से मुक्त हो जाना. इस निर्वाण प्राप्ति हेतु महात्मा बुद्ध ने आचरण की शुद्धता पर विशेष बल दिया. उन्होंने आचरण की शुद्धता हेतु दस शीलों के पालन को आवश्यक बताया ये दस शील इस प्रकार हैं-
  1. अहिंसा
  2. सत्य
  3. अस्तेय अर्थात् चोरी न करना
  4. अपरिग्रह अर्थात् धन संग्रह न करना
  5. ब्रह्मचर्य
  6. नृत्य व संगीत का त्याग
  7. सुगन्धित पदार्थों का त्याग
  8. असमय भोजन का त्याग
  9. कोमल शय्या का त्याग
  10. कामिनी कंचन का त्याग
उपर्युक्त दस शीलों में से प्रथम पाँच तो गृहस्थों के लिए तथा भिक्षुओं के लिए सभी दस शील थे जिनके पालन करने से शुद्ध आचरण सम्भव हो सकता है.

क्षणिकवाद- महात्मा बुद्ध संसार को नित्य न मानकर क्षण भंगुर मानते थे. उनका विश्वास था कि संसार की प्रत्येक वस्तु क्षणिक तथा निरन्तर परिवर्तनशील है. ये मनुष्य का श्रम है कि वह सांसारिक वस्तुओं को स्थायी समझ लेता है.

अनीश्वरवाद- महात्मा बुद्ध अनीश्वरवादी थे. उनका विचार था कि संसार की उत्पत्ति में ईश्वरीय सत्ता का कोई योगदान नहीं है बल्कि कार्य कारण की श्रृंखला से यह संसार चलता रहता है अर्थात् संसार के कर्ता के रूप में ईश्वर का अस्तित्व नहीं है.

प्रतीत्य समुत्पाद- यह बौद्ध दर्शन तथा सिद्धान्त का मूल तत्व है. महात्मा बुद्ध का विचार था कि एक वस्तु के विनाश के पश्चात् दूसरे की उत्पत्ति होती है. प्रत्येक घटना के पीछे कार्य-कारण का सम्बन्ध है. कार्य-कारण का यही सिद्धान्त 'प्रतीत्य समुत्पाद' के नाम से जाना जाता है.

कर्मवाद- महात्मा बुद्ध का कर्म में विश्वास था उनका कहना था कि यज्ञ, पूजा, बलिदान तथा स्मृति आदि से मनुष्य अपने कर्मों के फल को नहीं मिटा सकता अर्थात् मनुष्य जैसे कर्म करता है वैसे ही फल को प्राप्त करता है.
अनात्मवाद- महात्मा बुद्ध के अनुसार आत्मा नाम की कोई वस्तु नहीं है उनके अनुसार मनुष्य का व्यक्तित्व कुछ संस्कारों का समूह है.

पुनर्जन्म- ईश्वर और आत्मा के अस्तित्व में विश्वास न होते हुए भी बुद्ध का पुनर्जन्म में विश्वास था, परन्तु इस सम्बन्ध में उनका विचार है कि पुनर्जन्म आत्मा का नहीं वरन् अनित्य अहंकार का होता है. वे पुनर्जन्म को भी कार्य कारण नियम द्वारा संचालित मानते थे.

कर्मकाण्ड, यज्ञ तथा पशुबलि में अविश्वास- पशुओं की बलि चढ़ाना तथा यज्ञ आदि में महात्मा बुद्ध का किंचित मात्र भी विश्वास नहीं था. कर्मकाण्डों के वे घोर विरोधी थे. यही कारण है कि वे ब्राह्मणों को भी उच्च स्थान देने के पक्ष में नहीं थे.

जात-पात का खण्डन- महात्मा बुद्ध का जात-पात में कोई विश्वास नहीं था वरन् वे सामाजिक एकता में विश्वास रखते थे, उनका मत था कि बौद्ध धर्म का अनुसरण कोई भी कर सकता है चाहे वह किसी भी जाति का हो. उन्होंने एक स्थान पर कहा है
"हे भिक्षुओ ! जिस प्रकार बड़ी-बड़ी नदियाँ समुद्र में गिरकर अपना अस्तित्व खो देती हैं, उसी प्रकार भिक्षु के वस्त्र धारण करने पर उनमें वर्ण-भेद नहीं रहता. धार्मिक जीवन में सब ऊँच-नीच समान हो जाते हैं.

अहिंसा पर बल- महात्मा बुद्ध अहिंसा के पक्षधर थे. उन्होंने बुद्धत्व प्राप्त करने के पश्चात् जीवन पर्यन्त 'अहिंसा परमोधर्म' के सिद्धान्त का प्रचार-प्रसार किया. उनका मत था कि मनुष्य को अपने मन, वचन तथा कर्म से किसी जीव को दुःख नहीं पहुँचाना चाहिए.

वेदों में अविश्वास- महात्मा बुद्ध ने वेदों को ईश्वरकृत नहीं माना तथा उनमें (वेदों) अविश्वास प्रकट किया. उनका मत था कि मनुष्य को सदैव अपने अनुभव द्वारा ही अपना आध्यात्मिक मार्ग खोजना चाहिए उसे किसी गुरु ग्रन्थ अथवा किसी बाहरी साधना का आश्रय नहीं लेना चाहिए.

निर्वाण- महात्मा बुद्ध के अनुसार निर्वाण वह अवस्था है जिसमें ज्ञान की ज्योति द्वारा अज्ञान रूपी अन्धकार की समाप्ति हो जाती है, अर्थात् मनुष्य की समस्त वासनाओं और तृष्णाओं का नाश हो जाता है. इसकी (निर्वाण) प्राप्ति सत्कर्मों द्वारा की जा सकती है.

बौद्ध साहित्य

बौद्ध साहित्य मुख्यतः त्रिपिटकों में समाहित है.
ये त्रिपिटक हैं-
  1. सुत्तपिटक
  2. अभिधम्म पिटक
  3. विनय पिटक
इसके अतिरिक्त दीपवंश, महावंश, मिलिन्दपन्ह, जातक कथाएं तथा संस्कृत भाषा में लिखित महावस्तु बुद्धचरित, सौंदरानंद तथा महा-विभाष आदि बौद्ध साहित्य के उच्च कोटि के प्रमुख ग्रन्थ हैं.

सुत्तपिटक- यह तीनों पिटकों में सर्वाधिक वृहत और महत्व वाला पिटक है इसमें बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों का वर्णन किया गया है.
यह पिटक पाँच निकायों अर्थात् भागों में विभक्त हैं-ये निकाय हैं-
  1. दीर्घ निकाय
  2. मज्झिम निकाय
  3. संयुक्त निकाय
  4. अंगुत्तर निकाय
  5. खुद्दक निकाय

सुत्तपिटक

सुत्तपिटक में बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों तथा महात्मा बुद्ध के उपदेशों का वर्णन किया गया है. ज्ञातव्य हो कि उपदेशों का संकलन सवांद के रूप में किया गया है. इस पिटक के 5 खण्ड हैं :

(1) दीर्घ निकाय, (2) मज्झिम निकाय, (3) अंगुत्तर निकाय, (4) संयुक्त निकाय, (5) खुद्दक निकाय

दीर्घ निकाय

इसमें कुल 34 सूक्त हैं. प्रत्येक सूक्त में महात्मा बुद्ध के संवादों का उल्लेख मिलता है.

मज्झिम निकाय

इसमें लघु उपदेशों का संकलन है. इसमें कुल मिलाकर 125 सूक्त हैं.

अंगुत्तर निकाय

इसमें लघु वक्तव्यों का संकलन है. इसमें 2,300 सूक्त हैं जो 11 भागों में विभाजित हैं.

संयुक्त निकाय

इसमें कुल 56 सूक्त हैं, जो विषय वार 5 भागों में विभाजित हैं.

खुद्दक निकाय

इसमें लघु सूक्तों का संग्रह है जो स्वतन्त्र पुस्तकों की भाँति है इनकी संख्या 15 हैं.


त्रिपिटक

बौद्ध साहित्य के मूल ग्रंथ त्रिपिटक कहे जाते हैं जो संख्या में तीन हैं और निम्न प्रकार हैं :-

(1) विनयपिटक (2) सुत्तपिटक (3) अभिधम्म पिटक

विनयपिटक

इसमें बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियों के संघ तथा उनके दैनिक जीवन सम्बन्धी नियमों का वर्णन किया गया है.

सुत्तपिटक

इसमें बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों का वर्णन किया गया है.

अभिधम्मपिटक

इसमें बौद्ध धर्म का दार्शनिक विवेचन किया गया है.


अभिधम्मपिटक- इसके सात भाग हैं, इसमें बौद्ध धर्म का दार्शनिक विवेचन किया गया है. वास्तव यह बौद्ध दर्शन, बौद्ध परिभाषा आदि को समझने के लिए अत्यन्त ही उपयोगी है.

अभिधम्मपिटक

इसमें बौद्ध दर्शन तथा बौद्ध परिभाषा आदि का विवेचन किया गया है. इस पिटक के सात भाग हैं :

(1) धम्म संगनी, (2) विभिंग, (3) धातु कथा, (4) पुलपंजति, (5) कथावत्थु, (6) यमक, (7) पट्ठान

नोट-उपर्युक्त में 'कथावत्थु' सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, इसकी रचना अशोक के गुरु 'मोग्गलि पुत्त तिस्स' ने की थी.


जातक कथाएं- यह पाली भाषा में लिखी गई है, इसमें बुद्ध के पूर्व जन्म की कथाएं तथा बुद्धकालीन धार्मिक, सामाजिक तथा आर्थिक जीवन का वर्णन किया गया है.

मिलिन्दपन्हो- इसमें यूनानी शासक मिलिन्द तथा बौद्ध भिक्षु नागसेन के मध्य दार्शनिक विषय को लेकर हुए वाद-विवाद का वर्णन किया गया है.

दीपवंश तथा महावंश- इसमें तत्कालीन भारत की सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक दशा तथा श्रीलंका के राजवंशों का वर्णन किया गया है. दोनों ही ग्रन्थ पाली भाषा में हैं, इनकी रचना श्रीलंका में की गई थी.

महावस्तु- संस्कृत में लिखित इस ग्रन्थ में बुद्ध की अद्भुत शक्ति तथा बोधिसत्व की प्रतिष्ठा का वर्णन किया गया है.

विनयपिटक- इसे स्वयं बुद्ध द्वारा प्रतिपादित माना जाता है. इसमें भिक्षुभिक्षुणियों के संघ, उनके दैनिक जीवन सम्बन्धी नियमों का वर्णन किया गया है.
इस पिटक के तीन भाग हैं-
  1. सुत्तविभग
  2. खन्दक
  3. परिवार पाठ

विनयपिटक

विनयपिटक जिसमें भिक्षु-भिक्षुणियों के संघ उनके दैनिक जीवन सम्बन्धी नियमों का वर्णन किया गया है. इस पिटक के तीन भाग हैं :

(1) सुत्तविभंग, (2) परिवार, (3) खंदक

सुत्तविभंग

इसमें उन नियमों का वर्णन किया गया है जिनका पालन करना बौद्ध भिक्षु और भिक्षुणियों के लिए अनिवार्य है साथ ही इसमें उन अपराधों का भी वर्णन किया गया है, जिनके करने पर बौद्ध भिक्षु एवं भिक्षुणियों का पतन हो जाता है.

सुत्तविभंग के भी दो भाग हैं :

  1. महाविभंग,
  2. भिक्कुनीविभंग

परिवार

इसमें प्रश्नोत्तर शैली में बौद्ध भिक्षुओं के नियमों और कर्तव्यों का वर्णन कया गया है.

खंदक

इसमें उन सभी बातों का विस्तार से वर्णन किया गया है जिनके आधार पर भिक्षु संघ में प्रवेश करते हैं. इसमें भिक्षुओं के जीवन से सम्बन्धित सभी क्रिया-कलापों का उल्लेख किया गया है-

इसके दो भाग हैं :-

  1. महावग्ग
  2. चुल्लवग्ग


बुद्धचरित तथा सौन्दरानन्द- ये संस्कृत भाषा में लिखे गए महाकाव्य ग्रन्थ हैं, इनकी रचना महाकवि अश्वघोष द्वारा की गई थी.

सारिपुत्र प्रकरण- यह नाटक ग्रन्थ है जो संस्कृत में लिखा गया है. इसकी रचना भी महाकवि अश्वघोष द्वारा की गई थी.

महाविभाष- यह उच्चकोटि का संस्कृत भाषा में लिखा गया बौद्ध ग्रन्थ है. इसकी रचना वसुमित्र द्वारा की गई थी.

ललित विस्तार- यह महायान सम्प्रदाय का ग्रन्थ है इसमें महात्मा बुद्ध के जीवन का उल्लेख मिलता है.

दिव्यावदान- बौद्ध साहित्य के इस ग्रन्थ में परवर्ती मौर्य शासकों एवं शुंग वंशी पुष्यमित्र शुंग का उल्लेख मिलता है.

बौद्ध धर्म के सम्प्रदाय

महात्मा बुद्ध की मृत्यु के कुछ समय बाद तक तो बौद्ध भिक्षुओं का जीवन अत्यन्त ही सरल और पवित्र रहा, किन्तु कालान्तर में बौद्धों के दृष्टिकोण में परिवर्तन होने लगा परिणामस्वरूप बौद्धों के मध्य अनेकानेक मतभेदों का जन्म हुआ. मतभेदों के इस जन्म के कारण बौद्ध विभिन्न सम्प्रदायों में विभक्त हो गए. बौद्ध धर्म के सम्प्रदाय थे-
  • हीनयान
  • महायान
  • वज्रयान

हीनयान- हीनयान शब्द का अर्थ है निकृष्ट या निम्न मार्ग. इस शब्द का प्रयोग महायान अनुयायियों द्वारा अपने विरोधियों के लिए किया गया था. यह सम्प्रदाय बौद्ध धर्म के प्राचीन स्वरूप को मानता है. इस सम्प्रदाय के लोग 'हीनयानी' कहलाए जाते हैं. इस सम्प्रदाय के अनुयायियों का मुख्य लक्ष्य 'बुद्धत्व' न होकर 'अर्हत' पद की प्राप्ति था. अर्हत वही भिक्षु हो सकता था जो निर्वाण प्राप्त कर लेता था. हीनयानी मात्र अपने लिए निर्वाण प्राप्त करता था. लोक कल्याण की कामना उसे नहीं थी. इस सम्प्रदाय के अनुयायियों का क्षण भंगुरता में विश्वास था. इस सम्प्रदाय के लोग मगध, ब्रह्मा तथा श्रीलंका में थे.

महायान- महायान शब्द का अर्थ है उत्कृष्ट मार्ग इस सम्प्रदाय की स्थापना नागार्जुन द्वारा की गई थी. इस सम्प्रदाय के अनुयायी महायानी कहलाए. इस सम्प्रदाय के अनुयायियों का बोधिसत्व, बोधिसत्व की मूर्ति तथा संस्कृत भाषा के प्रयोग आदि में विश्वास था. चूँकि हीनयानियों की तुलना में महायानियों के नियम अत्यन्त ही सरल थे. अतः शीघ्र ही यह सम्प्रदाय लोकप्रिय बन गया और चीन, जापान, कोरिया, अफगानिस्तान, तुर्किस्तान तथा दक्षिण पूर्व के अनेक देशों में फैल गया था.

वज्रयान- सातवीं सदी के आते-आते बौद्ध धर्म के नियमों में और परिवर्तन आया परिणामस्वरूप वज्रयान सम्प्रदाय का उदय हुआ. यह सम्प्रदाय बौद्ध धर्म का परवर्ती सम्प्रदाय था इस सम्प्रदाय के अनुयायी बुद्ध
को अलौकिक शक्तियों वाला पुरुष मानते थे. उनका मंत्र, हठयोग तथा तान्त्रिक क्रिया-कलापों में अत्यधिक विश्वास था. यह सम्प्रदाय तिब्बत एवं चीन में विशेष रूप से प्रचलित हुआ.

बौद्ध संगीतियाँ

समय-समय पर बौद्ध धर्म की व्याख्या हेतु अनेक बौद्ध सभाओं का आयोजन किया गया जिन्हें बौद्ध संगीति के नाम से जाना जाता है. बौद्ध धर्म की व्याख्या हेतु चार बौद्ध संगीतियों का आयोजन हुआ.

प्रथम बौद्ध संगीति- महात्मा बुद्ध के निर्वाण प्राप्त कर लेने के कुछ समय पश्चात् ही 483 ई. पू. में अजातशत्रु के शासनकाल में बिहार स्थित राजगृह के शप्तपर्णी गुहा में प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन किया गया. महाकश्यप की अध्यक्षता में आयोजित होने वाली इस बौद्ध संगीति में 500 बौद्ध भिक्षुओं ने भाग लिया. इस संगीति में बुद्ध के उपदेशों को दो पिटकों विनयपिटक और सुत्तपिटक में संकलित किया गया.

द्वितीय बौद्ध संगीति- बौद्ध भिक्षुओं में उत्पन्न आपसी मतभेदों को दूर करने के लिए महात्मा बुद्ध के निर्वाण के लगभग 100 वर्ष बाद 383 ई. पू. में चुल्लबग (वैशाली) में कालाशोक के शासन काल में द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन किया गया. इस संगीति में लगभग 700 भिक्षुओं ने भाग लिया, किन्तु मतभेद दूर न हो सके, साथ ही वैशाली के भिक्षुओं ने इस संगीति का बहिष्कार किया और अपनी बात पर अड़े रहे और यहीं से बौद्ध धर्म के अनुयायियों में विभाजन की शुरूआत हुई. जिन भिक्षुओं ने परिवर्तन के साथ विनयपिटक के नियमों को स्वीकार किया वे 'महासांधिक' कहलाए तथा जिन भिक्षुओं ने विनयपिटक के अपरिवर्तित नियमों को स्वीकार किया वे 'थेरवादी' कहलाए, थेरवादियों का नेतृत्व 'महाकच्चायन' तथा महासांधिकों का नेतृत्व 'महाकस्सप' ने किया. कालान्तर में महासांधिक तथा थेरवादी सम्प्रदाय 18 उप-सम्प्रदायों में विभाजित हो गए.

तृतीय बौद्ध संगीति- तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन मौर्यवंशीय शासक अशोक के शासन काल में 250 ई. पू. में पाटलिपुत्र में किया गया. इस संगीति में लगभग 1000 भिक्षुओं ने भाग लिया. संगीति की अध्यक्षता ‘मोगालिपुत्त तिस्स' ने की. इस संगीति में महात्मा बुद्ध के उपदेशों का एक बार फिर संकलन किया गया तथा तृतीय पिटक जो अभिधम्मपिटक के नाम से जाना जाता है, की स्थापना हुई और तीनों पिटक-विनयपिटक, सुत्तपिटक तथा अभिधम्मपिटक को त्रिपिटक के नाम से सम्बोधित किया गया. इस संगीति में थेरवादियों का प्रभुत्व रहा.

चतुर्थ बौद्ध संगीति- चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन कुषाणवंशीय शासक कनिष्क के शासन काल में प्रथम अथवा द्वितीय शताब्दी ई. में कश्मीर के कुण्डलवन में किया गया. इस संगीति की अध्यक्षता वसुमित्र ने की. अश्वघोष इस संगीति के उपाध्यक्ष थे. इस संगीति का आयोजन इस आशय से किया गया था कि बौद्धों में जो अब तक अत्यधिक मतभेद उत्पन्न हो गए हैं उन्हें दूर किया जा सके. इस संगीति में महासांधिकों का प्रभुत्व रहा. त्रिपिटक पर प्रमाणिक भाष्य 'विभाषाशास्त्र' की रचना इसी संगीति में हुई इस संगीति के पश्चात् बौद्ध अनुयायी हीनयान तथा महायान दो स्वतन्त्र सम्प्रदायों में विभक्त हो गए.

बौद्ध संगीतियाँ

संगीति

आयोजित वर्ष

आयोजित स्थल

अध्यक्ष

राज्यकाल

प्रथम

483 ई.पू.

राजगृह (बिहार) (सप्तपर्णी गुफा में)

महाकस्सप

अजात शत्रु

द्वितीय

383 ई.पू.

वैशाली (बिहार)

सर्वकामिनी

कालाशोक

तृतीय

250 ई.पू.

पाटलिपुत्र (बिहार)

मोगलिपुत्त तिस्स

अशोक

चतुर्थ

प्रथम अथवा द्वितीय शताब्दी ई.

कुण्डलवन, कश्मीर

वसुमित्र अश्वघोष (उपाध्यक्ष)

कनिष्क


बौद्ध धर्म की उन्नति अथवा प्रसार

बौद्ध धर्म, जिसके प्रवर्तक महात्मा बुद्ध थे. के प्रयासों से भारत में खूब फला-फूला और सर्वत्र प्रचलित हुआ. महात्मा बुद्ध की मृत्यु के पश्चात् यह धर्म सर्वव्यापी धर्म बन गया और शीघ्र ही चीन, जापान, श्रीलंका तथा मिस्र आदि अनेक देशों में प्रचलित हो गया. बौद्ध धर्म की उन्नति अथवा प्रसार के अनेक कारण थे.

तत्कालीन धार्मिक स्थिति- छठी शताब्दी ई.पू. तक भारत में प्रचलित वैदिक धर्म में इतने दोष और जटिलताएं उत्पन्न हो गईं, जिनसे समाज त्रस्त हो गया था. वैदिक यज्ञ एवं कर्मकाण्ड जनसाधारण के लिए कष्टप्रद हो गए थे और जनता यज्ञों और कर्मकाण्डों का विरोध करने लगी थी. ऐसे दोष एवं जटिलता युक्त धार्मिक वातावरण में जब महात्मा बुद्ध ने लोगों के समक्ष एक ऐसा धर्म प्रस्तुत किया जो आडम्बर एवं जटिलताओं से पूर्णत: मुक्त था तथा जिसमें अत्यन्त ही सरलता एवं व्यावहारिकता विद्यमान थी जिसके सिद्धान्त उच्चस्तरीय थे. जनसाधारण सहजता से इस धर्म (बौद्ध धर्म) की ओर आकर्षित हुआ.

महात्मा बुद्ध का व्यक्तित्व- महात्मा बुद्ध में 'बहुजन हिताय' की भावना थी. सहनशीलता, क्षमा, दया, स्नेह, करुणा आदि उनके व्यक्तित्व के विशिष्ट गुण थे. सरलता, अकाट्य तर्क तथा प्रभावशाली उपदेश ये कुछ ऐसी बातें थीं कि राजा से लेकर रंक तक प्रत्येक व्यक्ति उनकी ओर आकर्षित हुआ और शीघ्र ही उनका अनुयायी हो गया.

सिद्धान्तों की सरलता एवं व्यावहारिकता- बौद्ध धर्म के सिद्धान्त इतने सरल एवं व्यावहारिकता से युक्त थे कि जन-साधारण उन्हें आसानी से अपना सकता था. इन सिद्धान्तों में ऐसी कोई बात नहीं थी जो कष्टसाध्य अथवा दुर्बोध हो. बौद्ध धर्म के इन सरल एवं व्यावहारिक सिद्धान्तों ने जनसाधारण को उनके कर्तव्यों का बोध कराया तथा स्वावलम्बी बनने का उपदेश दिया.

सामाजिक समानता का सिद्धान्त- महात्मा बुद्ध ने जाति-पाँति का घोर विरोध कर समानता, नैतिकता व स्वतन्त्रता पर विशेष बल दिया और जाति प्रथा को निरर्थक प्रमाणिक किया, जबकि ब्राह्मण धर्म में समाज के निम्न वर्ग के लोगों का कोई स्थान न था और उनका तिरस्कार किया जाता था. अतः उच्च वर्ग के साथ ही निम्न वर्ग के लोग भी इस धर्म के अनुयायी हो गए और बौद्ध धर्म शीघ्र ही सर्वत्र प्रचलित हो गया.

बौद्ध धर्म का लचीलापन- ब्राह्मण धर्म की तुलना में बौद्ध धर्म अत्यधिक लचीला था. इसमें परिस्थतियों के अनुसार परिवर्तन भी सम्भव था. कारणतः न केवल भारतीय वरन विदेशी भी इस धर्म की ओर आकर्षित हुए और बौद्ध धर्म का विकास हुआ.

प्रबल प्रतिद्वंद्विता का अभाव- चूंकि बौद्ध धर्म को प्रचारित होने के लिए किसी प्रबल प्रतिद्वंद्वियों का सामना नहीं करना पड़ा इसलिए यह धर्म अपनी शैशव अवस्था को पार कर उन्नति करता चला गया.

लोक भाषा एवं रोचक शैली- महात्मा बुद्ध द्वारा बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु अपनायी गई शैली अत्यन्त ही सरल एवं रोचक थी. उन्होंने अपने उपदेश सदैव लोक भाषा पाली में ही दिए परिणामस्वरूप जनसाधारण ने उनके उपदेशों को सुगमता से ग्रहण किया और देखते ही देखते उनके अनुयायियों की संख्या में अपार वृद्धि हो गई.

मठों की स्थापना व प्रचार कार्य- महात्मा बुद्ध इस तथ्य से भली-भाँति परिचित थे कि किसी भी धर्म का विकास तभी सम्भव हो सकता है जब उसमें संगठन हो अत: बुद्ध ने बौद्ध धर्म के विकास और प्रचार के लिए बौद्ध भिक्षुओं के लिए संघ की स्थापना की तथा उनके रहने के लिए बौद्ध मठों की. परिणामस्वरूप बौद्ध भिक्षुओं में पारस्परिक समानता व भ्रातत्व की भावना विकसित हुई जो किसी धर्म के प्रचार और विकास के लिए आवश्यक होती है.

राजकीय संरक्षण- राजकीय संरक्षण प्राप्त होने के कारण बौद्ध धर्म की अत्यधिक उन्नति सम्भव हो सकी. अनेक शासकों यथा बिम्बसार, प्रसेनजित, प्रद्योत, अशोक, कनिष्क, मिलिन्द, हर्ष आदि ने इस धर्म को राजकीय प्रश्रय प्रदान किया. कुछ शासकों ने तो बौद्ध धर्म को राज्य धर्म घोषित कर दिया और उसके प्रचार एवं विकास में राजकीय शक्ति को लगा दिया. अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए धार्मिक महामात्रों की नियुक्ति की तथा स्तूप एवं स्तम्भों का निर्माण करवाया जिन पर महात्मा बुद्ध के उपदेश खुदवाए तथा बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु विदेशों में प्रचारक भेजे यही कारण है कि बौद्ध धर्म की अत्यधिक उन्नति हुई.

बौद्ध संगीतियों का आयोजन- समयसमय पर आयोजित होने वाली बौद्ध संगीतियों ने बौद्ध धर्म की उन्नति में विशेष योगदान दिया. इन संगीतियों में बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों पर समय-समय पर विचार-विमर्श किया गया तथा आवश्यकता पड़ने पर बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों का सरलीकरण किया गया साथ ही बौद्ध ग्रन्थों की रचना हुई परिणामस्वरूप बौद्ध धर्म की उन्नति हुई.

साहित्य की प्रचुरता- किसी भी धर्म की उन्नति में साहित्य का विशेष योगदान होता है, क्योंकि साहित्य को पढ़कर तथा उस पर विचार कर सम्बन्धित धर्म के सार को आसानी से समझा जा सकता है. चूंकि बौद्ध साहित्य का प्रचुरता में सृजन किया गया अतः अपार जनसमुदाय बौद्ध साहित्य को पढ़कर तथा समझकर बौद्ध धर्म का अनुयायी हो गया. बौद्ध साहित्य ने न केवल भारतीय वरन् विदेशियों को भी अपनी ओर आकर्षित किया. यही कारण है कि समयसमय पर अनेक विदेशी यात्री भारत आए. उन्होंने यहाँ आकर बौद्ध साहित्य का अध्ययन किया और फिर बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में अपना योगदान दिया.

बौद्ध धर्म की अवनति अथवा पतन

भारत में छठी शताब्दी ई. पू. से लेकर गुप्त शासकों के उत्थान तक बौद्ध धर्म ने निरन्तर उन्नति की, किन्तु गुप्त शासकों के काल में यह धर्म अवनति की ओर अग्रसर हो गया और आज तो स्थिति यह है कि भारत का माना जाने वाला यह प्रमुख धर्म भारत में प्रायः विलुप्त हो गया है.
भारत में बौद्ध धर्म की अवनति के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे-
  1. बौद्ध धर्म का परिवर्तित स्वरूप- जिस बौद्ध धर्म का प्रतिपादन महात्मा बुद्ध ने किया था वह अत्यन्त ही सरल एवं व्यावहारिक था, किन्तु समय के साथ बौद्ध धर्म में भी जटिलता एवं कट्टरता का समावेश हो गया और इस का मौलिक स्वरूप ही बदल गया. बौद्ध धर्म में उत्पन्न होने वाली अनेक कुरीतियों ने जनसाधारण को त्रस्त कर दिया. अतः अब जनसाधारण इस धर्म से विमुख हो चला और धीरे-धीरे बौद्ध धर्म के अनुयायियों में घटोत्तरी होने लगी.
  2. बौद्ध संघ में भ्रष्टाचार का पनपना- बौद्ध संघों एवं मठों में भ्रष्टाचार पनपने के कारण भारत में बौद्ध धर्म का पतन हो गया. शनै-शनै अनेक अनुयायी भ्रष्ट एवं चरित्रहीन हो गए. वे अपना समय धर्म-प्रचार के स्थान पर पारस्परिक विवादों में व्यतीत करने लगे. उन्होंने भिक्षा माँगना बंद कर दिया तथा सम्राटों से प्राप्त धन का व्यक्तिगत उपभोग करने लगे. मठों में स्त्रियों के लिए भिक्षुओं के साथ रहना निषेध था, किन्तु बाद में इस नियम में भी शिथिलता आ गई. अतः जन-साधारण का बौद्ध भिक्षुओं से विश्वास उठ गया और बौद्ध धर्म की अवनति हो गई.
  3. हिन्दू-धर्म में सुधार- बौद्ध धर्म के उत्थान के समय हिन्दुओं को अपने धर्म में व्याप्त होने वाली त्रुटियों का आभास हुआ. अतः उन्होंने हिन्दू धर्म में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया परिणामस्वरूप हिन्दू धर्म में अनेक सुधार हुए. शंकराचार्य, कुमारिल भट्ट तथा रामानुज आदि कुछ ऐसे दार्शनिक हुए जिन्होंने हिन्दू धर्म के दोषों को दूर किया. अब हिन्दू धर्म ने एक बार पुनः लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया. इस तरह हिन्दू धर्म में सुधार होने के कारण बौद्ध धर्म के गौरव को भारी क्षति पहुँची.
  4. आन्तरिक मतभेद- चूँकि महात्मा बुद्ध ने अपना कोई उत्तराधिकारी नियुक्त नहीं किया था. अतः उनकी मृत्यु के पश्चात् बौद्ध अनुयायियों में मतभेद उत्पन्न हो गया. यद्यपि आन्तरिक मतभेदों को दूर करने के लिए बौद्ध सभाएं आयोजित की गईं, किन्तु मतभेद दूर न किए जा सके और एक समय वह भी आया जब बौद्ध धर्म एक से अधिक भागों में विभक्त हो गया और प्रथम शताब्दी ई. के आने तक इस धर्म की 18 शाखाएं हो गईं. इस प्रकार बौद्ध धर्म में उत्पन्न हुए आन्तरिक मतभेदों ने बौद्ध धर्म की अवनति में महत्वपूर्ण योगदान दिया.
  5. राजकीय संरक्षण का अन्त- जहाँ बौद्ध धर्म के उत्थान में राजकीय संरक्षण की अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका रही वहीं बौद्ध धर्म के पतन में भी राजकीय संरक्षण की समाप्ति ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. शुंग, कण्व, आन्ध्र, सातवाहन तथा गुप्तवंशीय शासकों ने ब्राह्मण धर्म को संरक्षण प्रदान किया बौद्ध धर्म को नहीं, परिणामस्वरूप बौद्ध धर्म एक राष्ट्रीय धर्म न रहा और इस धर्म का पतन होने लगा.
  6. विदेशी आक्रमण- भारत में होने वाले नृशंस और बर्वर आक्रमण भी इस धर्म के पतन के लिए उत्तरदायी हैं. विदेशी आक्रमणकारियों ने बौद्ध संस्कृति के प्रतीक मठों, संघारामों तथा बिहारों को नष्ट कर दिया जिससे बौद्ध धर्म की अवनति हुई और शीघ्र ही भारत में बौद्ध धर्म प्रायः लुप्त हो गया.
  7. राजपूतों का उत्कर्ष- सम्राट हर्ष की मृत्यु के पश्चात् भारत में राजपूत शक्ति का उदय हुआ. राजपूत बौद्ध धर्म के अहिंसावादी सिद्धान्त के विरुद्ध थे. अतः उन्होंने बौद्ध धर्म को राज्याश्रय प्रदान न कर हिन्दू धर्म को राज्याश्रय प्रदान किया जो बौद्ध धर्म के पतन का प्रमुख कारण बना.

बौद्ध धर्म की भारतीय संस्कृति को देन

बौद्ध धर्म ने भारतीय संस्कृति को व्यापक रूप से प्रभावित किया. यद्यपि आज भारत में बौद्ध धर्म के अनुयायी बहुत कम हैं और बौद्ध धर्म भारत में प्रायः लुप्त हो गया है, किन्तु इस धर्म का प्रभाव आज भी भारतीय संस्कृति में दृष्टिगोचर होता है. भारतीयों में अहिंसा, सहिष्णुता, परोपकार, दया व मानव कल्याण की भावनाओं को विकसित करने का श्रेय बौद्ध धर्म को ही जाता है. भारत में जाति प्रथा का विरोध करना भी बौद्ध धर्म ने ही सिखाया जिस समय भारतीय जनसमुदाय ब्राह्मण धर्म को और स्वीकारने के पक्ष में नहीं था उस समय महात्मा बुद्ध ने बौद्ध धर्म की स्थापना की और जनमानस की इच्छाओं को पूर्ण किया और भारतीय संस्कृति पर अमिट छाप छोड़ी. चूँकि बौद्ध धर्म एक लम्बे समय तक भारत का राष्ट्रीय धर्म रहा. अतः इस धर्म ने साहित्य, दर्शन तथा कला आदि के क्षेत्र में भारतीय संस्कृति को बहुत कुछ प्रदान किया.

बौद्ध धर्म की साहित्य को देन- साहित्यिक क्षेत्र में बौद्ध धर्म की देन अविस्मरणीय है. बौद्ध धर्म ने भारतीय साहित्य के कोष में अपार वृद्धि की. बौद्ध भिक्षुओं द्वारा सृजित साहित्य ने भारतीय संस्कृति को प्रभावित किया. बौद्धों द्वारा पाली भाषा में लिखित जातक साहित्य से भारत के विभिन्न पहलुओं के विषय में जानकारी प्राप्त होती है. बौद्धों ने न केवल पाली भाषा वरन् संस्कृत में भी अनेक ग्रन्थों का सृजन किया. इन ग्रन्थों में बुद्धचरित, सौन्दरानन्द, मंजूश्री मूलकल्प, ललित विस्तार, अमरकोष, सारिपुत्र प्रकरण, सन्दर्भ पुण्डरीक, मिलिन्दपन्हो, महावस्तु व लंकावतार सूत्र आदि कुछ प्रमुख हैं जो आज भारतीय साहित्य की अमूल्य निधि हैं. इन ग्रन्थों से हमें तत्कालीन भारत के विषय में विभिन्न क्षेत्रों से सम्बन्धित विशिष्ट जानकारी प्राप्त होती है.

बौद्ध धर्म की दर्शन को देन- बौद्ध धर्म का दर्शन अत्यन्त ही उच्चकोटि का है. यही कारण है कि बौद्ध दर्शन ने जनमानस को अत्यधिक प्रभावित किया. बौद्धों का दर्शन समृद्ध ही नहीं अपितु विचारोत्तेजक भी था. प्रतीत्य-समुत्पाद, शून्यवाद, योगाचार, सौतान्त्रिक, विज्ञानवाद और अनित्यवाद आदि अनेक बौद्ध विचारधाराओं ने भारतीयों को प्रभावित किया. आज जबकि भारत में बौद्ध धर्म प्रायः लुप्त हो चुका है, किन्तु आज भी बौद्ध दर्शन का महत्व यथावत है. असंग, वसुमित्र, धर्मकीर्ति आदि अनेक बौद्ध दार्शनिकों के दर्शन के अध्ययन बिना भारतीय दर्शन आचार्य नहीं बन सकता. अतः कहा जा सकता है कि दर्शन के क्षेत्र में बौद्ध धर्म की देन महान् एवं अविस्मरणीय हैं.

बौद्ध धर्म की कला को देन- साहित्य और दर्शन के साथ ही बौद्ध धर्म का प्रभाव भारतीय कला पर भी दृष्टिगोचर होता है. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मूर्तिकला व शिल्पकला का उदभव बौद्ध धर्म के द्वारा ही सम्भव हुआ है. गुहा मन्दिर, स्तम्भ, स्तूप आदि बौद्ध धर्म की ही देन हैं. कला के क्षेत्र में अजन्ता, ऐलोरा, बाँध सभी बौद्धकालीन स्थापत्य कला व चित्रकला की श्रेष्ठतम कलाकृतियाँ हैं.

बौद्ध संघ

बौद्ध धर्म के प्रचार- प्रसार हेतु महात्मा बुद्ध ने बौद्ध संघ का निर्माण किया. संघ वह स्थान था जिसमें भिक्षु अपना घर छोड़कर निवास करते थे और जीवन पर्यन्त बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों का प्रचार करते थे. ये भिक्षु अत्यधिक त्यागी और संयमी होते थे. वे अल्पमात्रा में वस्त्र धारण करते थे तथा भिक्षा अर्जन कर अपना पेट भरते थे. संघ में 15 वर्ष की आयु से पूर्व प्रवेश नहीं मिलता था. 15 वर्ष की आयु से अधिक के व्यक्ति अपने माता-पिता की अनुमति प्राप्त कर संघ में प्रविष्ट हो सकते थे. बौद्ध संघ में प्रविष्ट होने पर भिक्षु बनने से पूर्व व्यक्ति को दाढ़ी-मूंछ तथा सर का मुंडन एवं गेरुआ वस्त्र धारण करने होते थे. बौद्ध धर्म और संघ के प्रति निम्नलिखित शपथ लेनी पड़ती थी
बुद्धं शरणं गच्छामि।
धम्मं शरणं गच्छामि।।
संघं शरणं गच्छामि।

उपर्युक्त शपथ लेने के पश्चात् भिक्षु के लिए लिखे गए दस आदेशों को दुहराना पड़ता था. इस प्रक्रिया के साथ ही वह एक बौद्ध भिक्षु का शिष्य बन जाता था. बौद्ध भिक्षु अपने शिष्य को बौद्ध धर्म ग्रन्थों और सिद्धान्तों को समझाता था. सभी सिद्धान्तों को समझने के पश्चात् शिष्य को एक परिषद् जिसमें कम-से-कम दस भिक्षु होते थे, के सम्मुख साक्षात्कार हेतु उपस्थित किया जाता था. जब दसों भिक्षु शिष्य को स्वीकृति प्रदान कर देते थे तब शिष्य भिक्षु बन जाता था. भिक्षु बनने के पश्चात् उसे संघ के नियमों का पालन करना अनिवार्य हो जाता था. संघ की व्यवस्था गणतन्त्रात्मक थी. बौद्ध परिषद् कोई भी निर्णय बहुमत के आधार पर लेती थी. यह परिषद् अपराधी भिक्षु को दण्ड दे सकती थी. परिषद् का एक सभापति होता था जो प्रति पन्द्रहवें दिन महात्मा बुद्ध के आदेश को पढ़कर भिक्षुओं को सुनाता था. भिक्षुओं को निजी सम्पत्ति रखने का अधिकार नहीं था मादक वस्तुएं सम्पत्ति सुवासित वस्तुएं भिक्षु और भिक्षुणियों के लिए वर्जित थीं. भिक्षु वर्ष में केवल चार माह (वर्षा के दिनों में) संघ में रहते थे. शेष 8 माह उन्हें जगह-जगह घूमकर बौद्ध धर्म का प्रचार करना होता था. इस प्रकार बौद्ध संघ की कार्यपद्धति अद्वितीय थी. यही कारण है कि बौद्ध धर्म को सर्वत्र अति शीघ्र प्रचारित एवं प्रसारित किया जा सका.
बौद्ध संघ में कतिपय दोष भी विद्यमान थे. स्वतन्त्रता और केन्द्रीय सत्ता का अभाव जैसे संघ के कुछ दोष थे. संघ के दोषों के कारण ही आगे चलकर बौद्ध धर्म अनेक सम्प्रदायों में विभक्त हो गया.

प्रमुख तथ्य

  • महात्मा बुद्ध तीन प्रमुख नामों-(1) बुद्ध, (2) तथागत, (3) शाक्य मुनि से जाने गए.
  • महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ई.पू. में नेपाल की तराई स्थित कपिलवस्तु के निकट लुम्बनी ग्राम के आम्रकुंज में हुआ था.
  • महात्मा बुद्ध के जन्म के सातवें दिन उनकी माता ‘महामाया' का देहान्त हो गया था. अतः उनका पालन-पोषण उनकी मौसी 'महाप्रजापति गौतमी' ने किया.
  • 29 वर्ष की आयु में महात्मा बुद्ध को वैराग्य उत्पन्न हो गया और उन्होंने घर त्याग दिया. गृहत्याग की यह घटना 'महाभिनिष्क्रमण' कहलाती है.
  • महात्मा बुद्ध ज्ञान की खोज में 7 वर्ष तक इधर-उधर भटकते रहे, इसी दौरान उनकी मुलाकात उद्रक और आलार कालाम (सांख्योपदेशक) से हुई.
  • 35 वर्ष की आयु में गौतम ने गया (बिहार) में उरुबेला नामक स्थान पर एक पीपल के वृक्ष के नीचे समाधि लगाई. समाधि लगाने के 49वें दिन गौतम को यहीं बोधि (ज्ञान) प्राप्त हुआ. इसीलिए यह स्थान (गया) बौद्ध गया, पीपल का वृक्ष बोधिवृक्ष तथा गौतम बुद्ध कहलाए.
  • ज्ञान प्राप्त होने के पश्चात् महात्मा बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश ऋषिपत्तन (सारनाथ) में दिया.
  • महात्मा बुद्ध का प्रथम उपदेश धर्म चक्र प्रवर्तन कहलाता है.
  • 45 वर्ष तक अनवरत धर्मोपदेश देकर 80 वर्ष की आयु में 483 ई. पू. में वैशाख पूर्णिमा के दिन कुशीनगर (कसिया गाँव, देवरिया जिला, पूर्वी उत्तर प्रदेश) में महात्मा बुद्ध का देहान्त हो गया. बौद्ध परम्परा में इसे 'महापरिनिर्वाण' के नाम से जाना जाता है.
  • महात्मा बुद्ध ने कुशीनगर के परिव्राजक 'सुभच्छ' को अपना अन्तिम उपदेश दिया था.
  • सारिपुत्र, योग्गालन, आनन्द तथा उपालि बुद्ध के प्रमुख शिष्य थे.
  • महात्मा बुद्ध के अनुयायी 4 भागों में विभक्त थे- (1) भिक्षु, (2) भिक्षुणी (3) उपासक, (4) उपासिका
  • महात्मा बुद्ध के शिष्य आनंद ने प्रथम बौद्ध संगीति के दौरान सुत्तपिटक का पाठ किया था.
  • महात्मा बुद्ध के शिष्य उपालि ने प्रथम बौद्ध संगीति के दौरान विनयपिटक का पाठ किया था.
  • बौद्ध धर्म के अष्टांगिक मार्ग को तीन श्रेणियों में विभक्त किया गया है-(1) प्रज्ञा स्कन्ध, (2) शील स्कन्ध, (3) समाधि स्कन्ध.
  • सम्यक दृष्टि और सम्यक संकल्प (अष्टांगिक मार्ग) प्रज्ञा ज्ञान के अन्तर्गत आते हैं.
  • सम्यक वाक, सम्यक कर्म और सम्यक आजीव (अष्टांगिक मार्ग) शील के अन्तर्गत आते हैं.
  • सम्यक व्यायाम और सम्यक स्मृति (अष्टांगिक मार्ग) और सम्यक समाधि के अन्तर्गत आते हैं.
  • बौद्ध संघ में लाए गए प्रस्ताव के पाठ को 'अनुसावन' कहा जाता है.
  • हीनयान, महायान तथा वज्रयान बौद्ध धर्म के सम्प्रदाय हैं.
  • महायान सम्प्रदाय का उद्भव प्रथम शताब्दी ई. पू. में हुआ था. इस सम्प्रदाय की स्थापना नागार्जुन द्वारा की गई थी.
  • हीनयान में महात्मा बुद्ध को एक उपदेशक के रूप में स्वीकार किया गया है, जबकि महायान सम्प्रदाय में बुद्ध को भगवान के रूप में स्वीकार किया गया हैं.
  • हीनयान सम्प्रदाय के लोग पाली भाषा का प्रयोग करते थे, जबकि महायान सम्प्रदाय के लोग संस्कृत भाषा का प्रयोग करते थे.
  • वैभाषिक एवं सौतांत्रिक हीनयान सम्प्रदाय के प्रमुख सम्प्रदाय थे.
  • वज्रयान सम्प्रदाय के लोग महात्मा बुद्ध को अलौकिक सिद्धियों वाला पुरुष मानते थे.
  • विनयपिटक के भाग-दीर्घ निकाय, मज्झिम निकाय, संयुक्त निकाय, अंगुत्तर निकाय का उल्लेख दिव्यावदान में मिलता है.
  • दीपवंश एवं महावंश की रचना श्रीलंका में की गई थी.

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