जैन धर्म (jain dharm)

जैन धर्म (jain dharm)

भारत के अस्तित्व में रहे विभिन्न धर्मों में जैन धर्म का अपना अलग एवं विशिष्ट स्थान है. इस धर्म की प्राचीनता को लेकर विद्वानों के अलग-अलग मत हैं. जैन धर्म के अनुयायी इस धर्म को सृष्टि के आरम्भ से मानते हैं. ऋग्वेद में भी दो जैन मुनियों ऋषभदेव तथा अरिष्टनेमि के नाम का उल्लेख मिलता है. इसके साथ ही पुराणों यथा विष्णु पुराण और भागवत पुराण में ऋषभदेव (जैन मुनि) का उल्लेख मिलता है.
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इन पुराणों में ऋषभदेव को नारायण का अवतार माना गया है. ये कुछ ऐसे तथ्य हैं जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि जैन धर्म यदि अधिक नहीं तो उतना प्राचीन तो है ही कि जितना वैदिक धर्म, किन्तु जैन धर्म का वास्तविक प्रचार छठी शताब्दी ई. पू. से ही देखने को मिलता है. जैन परम्परा के अनुसार इस धर्म में 24 तीर्थंकर हुए. ऋषभदेव इन तीर्थंकरों में प्रथम तीर्थंकर थे. जिन्हें जैन धर्म का संस्थापक माना जाता है, किन्तु कुछ जैन अनुयायी महावीर स्वामी (24वें तीर्थंकर) को जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक मानते हैं जो भी हो इतना तो सत्य अवश्य है कि महावीर स्वामी के जीवन काल में जैन धर्म का जितना प्रचार-प्रसार हुआ उतना अन्य किसी तीर्थंकर के काल में नहीं. यह महावीर स्वामी के तपोबल और सतत् प्रयासों का ही परिणाम था कि छठी शताब्दी ई.पू. जैन धर्म सर्वत्र विख्यात हो गया.

प्रमुख जैन तीर्थंकर और उनके प्रतीक चिन्ह

जैन तीर्थंकरों के नाम

प्रतीक चिन्ह

ऋषभदेव (प्रथम जैन तीर्थंकर)

साँड़

आदिनाथ (द्वितीय जैन तीर्थंकर)

हाथी

पार्श्वनाथ (तेइसवें जैन तीर्थंकर)

सर्प

महावीर स्वामी (चौबीसवें जैन तीर्थंकर)

सिंह


जैन धर्म के तीर्थंकर जिन्हें 'जिन' अथवा विजेता कहा गया है, इनमें प्रथम ऋषभदेव, तेइसवें पार्श्वनाथ तथा चौबीसवें महावीर स्वामी हुए. इन तीर्थंकरों में पार्श्वनाथ की ऐतिहासिकता सिद्ध हो चुकी है और महावीर स्वामी की ऐतिहासिकता के विषय में कोई मतभेद नहीं है, किन्तु शेष 22 तीर्थंकरों के विषय में विस्तार से कुछ भी कह पाना सम्भव नहीं है. क्योंकि इन तीर्थंकरों की ऐतिहासिकता अभी तक संदिग्ध है.
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जैन धर्म के तेइसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ महावीर स्वामी से लगभग 250 वर्ष पहले हुए. इनके अनुयायियों को 'निर्गन्थ' कहा जाता था.

जैन धर्म के 24 तीर्थंकर

जैन धर्म के 24 तीर्थंकर

(1) ऋषभदेव

(2) अजितनाथ

(3) सम्भवनाथ

(4) अभिनंदननाथ

(5) सुमतिनाथ

(6) पद्मप्रभ

(7) सुपार्श्व

(8) चन्द्रप्रभु

(9) सुविधिनाथ

(10) शीतलनाथ

(11) श्रेयांस

(12) वासुपूज्य

(13) विमलनाथ

(14) अनंतनाथ

(15) धर्मनाथ

(16) शांतिनाथ

(17) कुन्थनाथ

(18) अरह अथवा अर्हनाथ

(19) मल्लिनाथ

(20) मुनिसुव्रतनाथ

(21) नेमिनाथ

(22) अरिष्टनेमि

(23) पार्श्वनाथ

(24) महावीर स्वामी


पार्श्वनाथ ने जैन धर्म में स्त्रियों को प्रवेश दिया. वैदिक धर्म के कर्मकाण्ड तथा देववाद की कटु आलोचना की. सत्य, अहिंसा, अस्तेय, (चोरी न करना) अपरिग्रह (सम्पत्ति न रखना) आपकी मूल शिक्षाएं थीं. पार्श्वनाथ के पश्चात् जैन धर्म को ख्याति प्रदान करने वाले महावीर स्वामी थे जिन्हें जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक न मानकर प्रमुख प्रतिस्थापक माना जाना ही उचित है.

द्रव्य

(जैन धर्म के अनुसार 6 द्रव्य जिनसे संसार का निर्माण हुआ है)

(1) जीव

(2) पुद्गल (भौतिक तत्व)

(3) धर्म

(4) अधर्म

  (5) आकाश

(6) काल


जैन धर्म में परिभाषित ज्ञान

  • मति (इंद्रिय जनित ज्ञान)
  • श्रुति (श्रवण ज्ञान)
  • अवधि (दिव्य ज्ञान)
  • मनः पर्याय (अन्य व्यक्तियों के मन मस्तिष्क की बात का ज्ञान)
  • कैवल्य (पूर्ण ज्ञान)

वर्द्धमान महावीर और जैन धर्म

जैन धर्म के प्रमुख प्रतिस्थापक तथा चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी का जन्म वैशाली के समीप कुण्डग्राम (बासुकुण्ड) में (बिहार के वर्तमान जिले मुजफ्फरपुर में) ई.पू. 599 में एक धन सम्पन्न क्षत्रिय परिवार में हुआ था. महावीर के पिता जिनका नाम सिद्धार्थ था. क्षत्रिय शांत्रिक कुल के प्रधान थे. उनकी माँ त्रिशला वैशाली के लिच्छवि शासक राजा चेटक की बहिन थी. इन्हीं के छोटे पुत्र का नाम वर्द्धमान था जो कालान्तर में महावीर के नाम से प्रसिद्ध हुए.
विद्वानों का मत है कि उनका नाम वर्द्धमान इसलिए रखा गया था, क्योंकि उनके जन्म के पश्चात् पिता के राज्य में अत्यधिक तीव्रगति से आर्थिक समृद्धि हुई थी. कल्पसूत्र से ज्ञात होता है कि पुत्र जन्म के अवसर पर राजा सिद्धार्थ ने लोगों की राज्य द्वारा अधिकृत सम्पत्ति लौटा दी साथ ही उनके कर माफ कर आवश्यक वस्तुओं के मूल्य में कमी कर दी, कहा जाता है कि वर्द्धमान के विषय में यह भविष्यवाणी की गई थी कि यह बालक या तो भविष्य में चक्रवर्ती राजा बनेगा या फिर परम ज्ञानी संन्यासी. वर्धमान का प्रारम्भिक जीवन अत्यधिक सुखसुविधाओं से परिपूर्ण रहा. उन्होंने उच्चकोटि की शिक्षा प्राप्त की. युवा होने पर उनका विवाह यशोदा नामक एक राजकुमारी से हुआ इनसे वर्द्धमान के एक कन्या का जन्म हुआ. संन्यासी होने पर इसी कन्या का पति वर्द्धमान महावीर का प्रथम शिष्य बना चूंकि वर्द्धमान बचपन से ही चिन्तनशील एवं गम्भीर स्वभाव वाले थे. अतः वे अधिक समय तक सांसारिक जीवन व्यतीत न कर सके अतः उन्होंने 30 वर्ष की अवस्था में अपने माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् संन्यास ग्रहण कर लिया और ज्ञान की खोज में तपस्यारत हो गए. पहले उन्होंने एक वस्त्र धारण किया फिर तेरह माह पश्चात् उस वस्त्र का भी त्यागकर दिया और नग्नावस्था में रहने लगे. लगातार 12 वर्ष तक कठोर तपस्या करते हुए अपनी तपस्या के 13वें वर्ष में जब वे 42 वर्ष के थे उन्हें 'सर्वोच्च ज्ञान' (कैवल्य) की प्राप्ति हुई.
आचारांग सूत्र से भी वर्धमान के कठोर तप के विषय में जानकारी प्राप्त होती है. वर्द्धमान को जम्भिकगाम के समीप श्रजुपालिक. अथवा ऋजुकला नदी के तट पर कैवल्य (सर्वोच्च ज्ञान) प्राप्त हुआ. कहा जाता है कि ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् जब पहली बार वर्द्धमान पावापुरी आए तो इंद्र आदि देवों ने वर्द्धमान के ज्ञान कल्याणक का उत्सव किया. ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् वर्द्धमान ‘महावीर' अर्थात् सर्वोच्च योद्धा, 'जिन' अर्थात् 6 विजयी, 'निग्रंथ' अर्थात् बन्धनों से मुक्त तथा केवलिन अर्थात् सर्वोच्च ज्ञानी के नाम से प्रसिद्ध हुए. 'जिन' के आधार पर ही महावीर के अनुयायी 'जैन' कहलाए और महावीर के द्वारा चलाया गया धर्म 'जैन धर्म' के नाम से प्रसिद्ध हुआ.
महावीर स्वामी ने अनेक राज्यों की यात्रा कर जैन धर्म का प्रचार-प्रसार किया. परिणामतः उनके अनुयायियों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हुई. उत्तराध्ययन सूत्र तथा ओबाइय सूत्र से ज्ञात होता है कि बिम्बसार और अजातशत्रु भी जैन धर्म के अनुयायी बन गए. जैन धर्म के प्रचार हेतु महावीर स्वामी ने पावापुरी में जैन संघ की स्थापना की. जैन धर्म के प्रचार प्रसार में उनके अनेक शिष्य यथा-आनंद, सुरदेव, महासयग, कुण्डकोलिय कामदेव, नन्दिनीपिया आदि ने भरपूर सहयोग दिया. महावीर स्वामी की मृत्यु के विषय में विद्वानों में मतभेद है, उनकी मृत्यु 72 वर्ष की अवस्था में पावापुरी में 527 ई. पू. में हुई.

जैन साहित्य

जैन विद्वानों ने विभिन्न कालों में लोक भाषाओं के माध्यम से महत्वपूर्ण कृतियों की रचना की. कल्पसूत्र जैन धर्म का महत्वपूर्ण ग्रन्थ है. इसकी भाषा संस्कृत है. इस ग्रन्थ के तीन भाग हैं. प्रथम भाग में 23 तीर्थंकरों की जीवनियाँ हैं. द्वितीय भाग में जैन भिक्षुओं के लिए नियमों का उल्लेख है. तृतीय भाग में जैन गान्धारों का क्रमानुसार वर्णन है. तमिल ग्रन्थ 'कुराल' के कुछ भाग भी जैनियों द्वारा रचे गए है. 'परिशिष्टि पर्वन' जैन धर्म का एक अन्य महत्वपूर्ण ग्रन्थ है. यह एक ऐतिहासिक ग्रन्थ है. प्रथम शताब्दी के आचार्य कुंद के चार ग्रंथ नियमसार, पंचास्तिकायसार, समयसार, प्रवचनसार आदि भी जैन धर्म के प्रमुख ग्रन्थ हैं. इसके अतिरिक्त भद्रबाहु चरित, त्रिलोक प्रजटित, कथा कोष, आराधना कथा कोष, भगवती सूत्र कथा कोष, स्थाविरावलि आदि अनेक प्रमुख जैन साहित्य की प्रमुख कृतियाँ हैं.

जैन धर्म और बौद्ध धर्म में अन्तर

एक ही समय में उदित जैन एवं बौद्ध धर्म में कुछ विषयों को लेकर अन्तर था. जो निम्न प्रकार है-
  • (i) जैन धर्म में कठोर व्रत और तपस्या के द्वारा कर्मों के प्रभाव को समाप्त करने पर मोक्ष की प्राप्ति स्वीकार की गई है. बौद्ध धर्म में निर्वाण प्राप्ति के लिए अष्टांग मार्ग के पालन पर बल दिया गया है.
  • (ii) जैन धर्म में अनन्त, विनिष्ट न होने वाली आत्मा का अस्तित्व स्वीकार किया गया है. बौद्ध धर्म के अनुसार सम्पूर्ण शरीर का निर्माण कुछ तत्वों के संयोग से होता है. इन तत्वों के अलग होने पर आत्मा और शरीर दोनों समाप्त हो जाते हैं.
  • (iii) जैन धर्म में अहिंसा पर अत्यधिक जोर दिया गया है और कीड़ों तक को मारना महापाप समझा जाता है. बौद्ध धर्म में अहिंसा पर बल दिया गया, किन्तु जैन धर्म की तुलना में कम.
  • (iv) जैन धर्म में गृहस्थ को महत्व दिया गया है, जबकि बौद्ध धर्म में संघ को.
  • (v) बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार विदेशों में हुआ, जबकि जैन धर्म भारत तक ही सीमित रहा.
  • (vi) जैन धर्म के ग्रन्थों को अंग तथा बौद्ध धर्म के ग्रन्थों को त्रिपिटक कहा जाता है.
  • (vii)जैन धर्म में घोर तपस्या को शुभ माना जाता है, बौद्ध धर्म में घोर तपस्या (कष्टकारी) का विरोध किया गया है.
  • (viii) जैन धर्म के एक सम्प्रदाय के मुनि नग्न रहते हैं, जबकि बौद्ध धर्म के किसी सम्प्रदाय के मुनि नग्न अवस्था में नहीं रहते हैं.
  • (ix) जैन धर्म में तीर्थंकरों की पूजा की जाती है. बौद्ध धर्म में बोधिसत्वों की पूजा की जाती है.
  • (x) जैन धर्म को राजकीय संरक्षण कम प्राप्त हुआ, जबकि बौद्ध धर्म को अपेक्षाकृत अधिक राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ.

महावीर के सिद्धान्त एवं शिक्षाएं

यद्यपि जैन धर्म के संस्थापक ऋषभदेव को माना जाता है और विद्वानों का मत है कि जैन धर्म का उद्भव छठी शताब्दी ई.पू. से बहुत पहले ही हो चुका था, किन्तु जैन धर्म का सर्वाधिक प्रचार-प्रसार जैन धर्म के चौबीसवें और अन्तिम तीर्थंकर महावीर स्वामी के काल में हुआ. यही कारण है कि महावीर स्वामी ने जिन सिद्धान्तों का प्रचार किया वे ही जैन धर्म के सिद्धान्त स्वीकार किए जाने लगे. महावीर स्वामी ने जिन सिद्धान्तों का निर्धारण जैन धर्म के अनुयायियों के लिए किया,
वे निम्नवत् हैं-

अनीश्वरवादिता- महावीर स्वामी का ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं था. उन्होंने न तो ईश्वर को संसार का रचयिता माना और न ही नियन्त्रक उनका विश्वास था कि सृष्टि तो अनादि एवं अनंत है. इसमें (सृष्टि) परिवर्तन तो होते रहे हैं, किन्तु विनाश कभी नहीं हुआ है. सृष्टि का निर्माण है. द्रव्यों-आकाश, काल, धर्म, अधर्म, पुदगल व जीव से हुआ है.

आत्मवादिता तथा अनेकात्मवादिता- जिस प्रकार ब्राह्मण धर्म में आत्मा की अमरता को स्वीकार किया गया है, उसी प्रकार जैन धर्म में आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार किया गया है. महावीर स्वामी के अनुसार आत्मा सुख-दुःख का अनुभव करती है तथा प्रकाश के समान अस्तित्व, किन्तु आत्मा का कोई आकार नहीं होता है. प्रत्येक जीव-जन्तु में अलग-अलग आत्मा होती है आत्मा का वास पेड़-पौधों में भी होता है. महावीर स्वामी के अनुसार आत्मा स्वभाव से निर्विकार एवं सर्वद्रष्टा है.

निवृत्ति की प्रधानता- जैन धर्म में निवृत्ति की प्रधानता पर बल दिया गया है. यह संसार दुःखों से परिपूर्ण है और दुःख का प्रमुख कारण तृष्णा है. तृष्णा का नाश निवृत्ति से सम्भव है. निवृत्ति मार्ग के अनुसरण से ही मनुष्य का कल्याण सम्भव है. अतः प्रत्येक व्यक्ति को सांसारिक सुखों का त्यागकर निवृत्ति मार्ग का अनुसरण करना चाहिए.

कर्म की प्रधानता और पुनर्जन्म में विश्वास- जैन धर्म में कर्म को प्रधानता दी गई है तथा पुनर्जन्म में विश्वास व्यक्त किया गया है. पुनर्जन्म अथवा आवागमन का सिद्धान्त मनुष्यों के कर्म पर आधारित है. कर्म के आधार पर ही मनुष्य का अगला जन्म होता है. कर्मानुसार ही मनुष्य की अगले जन्म में आयु निर्धारित होती है. अतः मनुष्य को सदैव सत्कर्म करने चाहिए जिससे मोक्ष प्राप्ति हो सके.

मोक्ष अथवा निर्वाण- हिन्दू एवं बौद्ध धर्म की भाँति जैन धर्म में भी मोक्ष अथवा निर्वाण प्राप्ति को परम लक्ष्य माना गया है. मोक्ष के सम्बन्ध में जैन धर्म का मत है कि कर्मबंधन की मुक्ति से मोक्ष अथवा निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है. कर्मबन्धन से मुक्ति पाने के लिए मनुष्य को वर्तमान जन्म में सत्कर्म करने चाहिए, ताकि उसके पूर्व जन्म के दुष्कर्मों का नाश हो जाए. यदि मनुष्य ऐसा करता है, तो उसका ज्ञान अनन्त, असीम तथा विशुद्ध हो जाता है और वह भौतिक तत्वों के मोह पाश से छुटकारा पा लेता है. जीवन की इसी अवस्था को निर्वाण कहा जाता है. निर्वाण प्राप्ति के लिए जैन धर्म में 'त्रिरत्न' को आवश्यक बताया गया है.

त्रिरत्न- कर्मफल से छुटकारा पाने तथा निर्वाण हेतु जैन धर्म में 'त्रिरत्न' को आवश्यक बताया गया है. यदि मनुष्य त्रिरत्नों का पालन करता है, तो वह निश्चय ही मोक्ष (निर्वाण) प्राप्त कर लेगा.

ये त्रिरत्न हैं-
  1. सम्यक ज्ञान- सच्चा और पूर्ण ज्ञान ही सम्यक ज्ञान है. कुछ लोगों में तो यह स्वभावतः ही विद्यमान होता है तथा अन्य लोग अभ्यास और विद्योपार्जन द्वारा इसकी प्राप्ति कर सकते हैं. अतः प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह जैन तीर्थंकरों के उपदेशों का अध्ययन कर अनुसरण करें.
  2. सम्यक दर्शन- यथार्थ ज्ञान के प्रति श्रद्धा को ही जैन धर्म में सम्यक दर्शन कहा गया है.
  3. सम्यक आचरण- सम्यक आचरण से आशय है कि मनुष्य को इन्द्रियों के वशीभूत न होकर सदाचारी जीवन व्यतीत करना चाहिए. इसके लिए आवश्यक है कि वह सत्य, अहिंसा तथा ब्रह्मचर्य का पालन करे.

तप एवं व्रत- जैन धर्म के अनुसार सभी दुःखों से छुटकारा पाने के लिए तृष्णा का नाश आवश्यक है. तृष्णा का नाश कठोर तप और व्रत के द्वारा किया जा सकता है.

अहिंसा- जैन धर्म में अहिंसा पालन पर विशेष बल दिया गया है. जैन धर्म के जड़ तथा चेतन दोनों प्रकार की वस्तुओं में जीव का अस्तित्व विद्यमान है. अतः मनुष्य को कोई भी ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जिससे जीव हिंसा हो. यहाँ तक कि हिंसा के विषय में सोचना भी नहीं चाहिए. अहिंसा का पालन मन, वचन तथा कर्म से करना चाहिए.

अठारह पाप- जैन धर्म में अठारह पापों का उल्लेख किया गया है. इन पापों से मनुष्य कर्म बन्धन में फँसता है.
ये पाप हैं-
(1) झूठ, (2) चोरी, (3) मैथुन, (4) क्रोध, (5) हिंसा, (6) द्रव्य मूर्छा, (7) लोभ, (8) माया, (9) मान, (10) मोह, (11) कलह, (12) द्वेष, (13) दोषारोपण, (14) चुगली, (15) निंदा, (16) असंयम, (17) माया मृशा (कपटपूर्ण झूठ) (18) मिथ्या दर्शन रूपी शल्य.

पंच महाव्रत- महावीर स्वामी ने जैन भिक्षु-भिक्षुणियों को पंच महावृतों के पालन का उपदेश दिया. इन पंच महाव्रतों- अहिंसा, अमृषा (सत्य), अचौर्य (अस्तेय), अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य में प्रथम चार महाव्रतों का प्रतिपादन तेइसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ एवं पाँचवें महाव्रत ब्रह्मचर्य का प्रतिपादन चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने किया.

अहिंसा- मन, कर्म तथा वचन से किसी के प्रति ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए जिससे उसे दु:ख अथवा कष्ट हो अर्थात् किसी को शब्दघात नहीं पहुँचाना चाहिए. साथ ही कोई भी ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जिससे किसी पशु, पक्षी, पेड़पौधों को किसी प्रकार का कष्ट हो.

अमृषा- मनुष्य को सदैव मधुरता से बोलते हुए सत्य बोलना चाहिए. इसके लिए क्रोध और भय के समय मौन रहना चाहिए, बिना विचारे बोलना नहीं चाहिए.

अचौर्य- बिना स्वीकृति लिए किसी की भी वस्तु अथवा धन नहीं लेना चाहिए. बिना अनुमति के न तो किसी के घर में प्रवेश करना चाहिए और न ही रहना चाहिए.

अपरिग्रह- भौतिक वस्तुओं का त्याग करना चाहिए तथा सम्पत्ति का संग्रह नहीं करना चाहिए.

ब्रह्मचर्य- भोग वासना से दूर रहकर संयमपूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहिए. ब्रह्मचर्य के अन्तर्गत किसी स्त्री को न तो देखना चाहिए और न ही उससे वार्तालाप करना चाहिए. जिस घर में स्त्री का वास हो वहाँ नहीं रहना चाहिए और स्त्री संभोग का तो कतई ध्यान भी नहीं करना चाहिए.

पंच अणुव्रत- उपर्युक्त वर्णित पंच महाव्रत का पालन करना जैन भिक्षु और भिक्षुणियों के लिए अनिवार्य था. चूँकि ये पंच महाव्रत अत्यधिक कठोर थे और इनका पालन करना गृहस्थों के लिए सम्भव न था.
अतः महावीर स्वामी ने गृहस्थों को पंच अणुव्रत के पालन का उपदेश दिया ये पंच अणुवृत हैं-
  1. अहिंसा
  2. अमृषा
  3. अचौर्य
  4. अपरिग्रह
  5. ब्रह्मचर्य.
चूँकि ये पंच व्रत पंचमहाव्रतों की तुलना में कम कठोर तथा अधिक सरल थे और इनका पालन करना किसी भी गृहस्थ के लिए दुष्कर नहीं था. अतः इन्हें पंच अणुव्रत कहा गया.

जाति प्रथा तथा लिंग- भेद का विरोध-जैन धर्म जाति प्रथा के भेद को नहीं मानता है. महावीर स्वामी ने जाति-प्रथा का घोर विरोध किया उनका विचार था कि मनुष्य कर्म से ही ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य अथवा शूद्र होता है, जन्म से नहीं यही कारण था कि उन्होंने सभी जातियों के लिए जैन धर्म का द्वार खुला रखा. इसके साथ ही महावीर स्वामी ने लिंग भेद का भी विरोध किया उनकी दृष्टि में स्त्री-पुरुष दोनों ही एक समान थे तथा दोनों ही मोक्ष प्राप्ति के अधिकारी हैं. अतः कोई भी स्त्री इस धर्म को स्वीकार कर सकती है.

वेदों में अविश्वास- जैन धर्मावलम्बी वेदों को ईश्वरीय ज्ञान नहीं मानते हैं, बल्कि इन्हें मनुष्य द्वारा रचित मानते हैं. यही कारण है कि जैन धर्मावलम्बियों का वेदों में किचिंत मात्र भी विश्वास नहीं है.

यज्ञ, पशु-बलि तथा कर्मकाण्डों में अविश्वास- चूँकि जैन धर्मावलम्बियों का हिंसा में विश्वास था अतः वे पशु बलि तथा यज्ञ जैसे कर्मकाण्डों के घोर विरोधी हैं, क्योंकि इससे हिंसा होती थी.

गुणव्रत- जैन धर्म के अन्तर्गत तीन गुणव्रत-
  1. दिग्व्रत (प्रत्येक दिशा में निर्धारित दूरी से आगे भ्रमण न करना)
  2. अनर्थ दण्डव्रत (प्रयोजनहीन वस्तु जो पाप में वृद्धि करती है उनका त्याग)
  3. देशव्रत (समयानुकूल भ्रमण की दूरी में और कमी करना) का पालन आवश्यक बताया गया है.

शिक्षाव्रत- उपर्युक्त वर्णित गुणव्रतों के अतिरिक्त जैन धर्म में चार शिक्षाव्रतों का भी उल्लेख किया गया है. ये शिक्षा व्रत हैं-
  1. अतिथि सम्विभाग (अर्थात् दानदक्षिणा देना, पूजा करना तथा अतिथि को भोजन कराना)
  2. सामयिक (अर्थात् पाप मुक्त हो चिंतन करना)
  3. प्रोषोधोपवास (अर्थात् सप्ताह में एक बार, व्रत-उपवास रखना)
  4. भोगोपभोगपरिमाण व्रत (भोजन की मात्रा का निर्धारण)

तीर्थंकरों में विश्वास- जैन अनुयायी 24 तीर्थंकरों में अटूट विश्वास रखते हैं. वे इन्हें सर्वज्ञ तथा सर्वशक्तिमान मानते हैं. तीर्थंकरों में महावीर स्वामी को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था.

जैन संघ

ज्ञान प्राप्ति के पश्चात जैन धर्म का प्रचार करने हेतु महावीर स्वामी भ्रमण करते हुए पावापुरी पहुँचे उस समय वहाँ 11 ब्राह्मणों के नेतृत्व में एक महायज्ञ का आयोजन हो रहा था. महावीर स्वामी का इन ब्राह्मणों से वाद-विवाद हुआ जिसमें ब्राह्मण परास्त हुए और महावीर स्वामी के शिष्य बन गए. महावीर स्वामी ने ब्राह्मणों की सहायता से जैन संघ की स्थापना की और इसको 11 भागों (गणों) में बाँट दिया. प्रत्येक गण एक अध्यक्ष के अधीन कार्य करता था जिसे गणधर कहा जाता था. महावीर स्वामी इस संघ के सर्वोच्च धर्माध्यक्ष बने, उन्होंने 11 ब्राह्मणों को भी गणधर नियुक्त किया. आगे चलकर जैन संघ के सदस्यों को भिक्षु, भिक्षुणी, श्रावक तथा श्राविका चार श्रेणियों में बाँटकर चतुर्विघ संघ की स्थापना की गई. इसमें प्रथम दो भिक्षु-भिक्षुणी संन्यासियों के लिए तथा शेष दो श्रावक-श्राविका गृहस्थों के लिए थी.

सम्प्रदाय

महावीर स्वामी की मृत्यु के पश्चात् लगभग दो शताब्दियों तक जैन अनुयायी संगठित रहे, किन्तु मौर्य काल में जैन दो सम्प्रदायों में विभक्त हो गए. इन विभक्त सम्प्रदायों में एक सम्प्रदाय दिगम्बर कहलाया तथा दूसरा श्वेताम्बर.
दिगम्बर सम्प्रदाय- यह कट्टरपंथी जैनियों का सम्प्रदाय था. इस सम्प्रदाय के अनुयायी जैन धर्म के नियमों का पालन बड़ी कठोरता से करते थे. इस सम्प्रदाय के जैन मुनि वस्त्र धारण नहीं करते थे, वे सदैव नग्नावस्था में रहते थे.
श्वेताम्बर सम्प्रदाय- इस सम्प्रदाय के नियमों को अपेक्षाकृत लचीला बना दिया गया था. इस सम्प्रदाय के अनुयायी उदारवृत्ति वाले थे तथा धार्मिक नियमों में परिस्थति के अनुसार परिवर्तन के पक्षधर थे. इस सम्प्रदाय के जैन मुनि सफेद वस्त्र धारण करते थे.

जैन संगीतियाँ

समय-समय पर जैन धर्म की व्याख्या हेतु जैनियों द्वारा जैन संगीतियों (सभाओं) का आयोजन किया गया. साहित्य में अब तक दो जैन संगीतियों का उल्लेख प्राप्त हुआ है.
प्रथम जैन संगीति- प्रथम जैन संगीति का आयोजन 300 ई. पू. में स्थूल भद्र की अध्यक्षता में पाटलिपुत्र में हुआ था. इस संगीति में बिखरे हुए एवं लुप्त जैन ग्रन्थों का संचयन एवं पुनर्पणयन किया गया.
द्वितीय जैन संगीति- इस संगीति का आयोजन 512 ई. में गुजरात राज्य स्थित बल्लभी में हुआ था. इस संगीति की अध्यक्षता देवऋद्धिगणी ने की थी. इस संगीति का आयोजन बिखरे जैन ग्रन्थों के पवित्र मूल पाठों को एकत्र करके उन्हें पुस्तकों का रूप देने के लिए किया गया था.

जैन धर्म की उन्नति अथवा प्रसार

जैन धर्म जिसके प्रतिस्थापक महावीर स्वामी थे, ने ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् सर्वत्र भ्रमण कर जैन र्धम का प्रचार किया. यह उनके सतत् प्रयासों का ही परिणाम था कि उनके जीवन काल में ही यह धर्म सम्पूर्ण भारत विशेषकर कोशल, विदेह, मगध तथा अंग राज्यों में फैल गया. कुछ जैन साधुओं ने पश्चिम में इस धर्म का प्रचार किया और प्राच्य तीर्थ स्थली मथुरा को अपने धार्मिक प्रचार कर केन्द्र बनाया. प्रथम और द्वितीय शताब्दी ई. पू. तक मालवा और उज्जयिनी भी जैन मतावलम्बियों के प्रमुख केन्द्र बन गए और इस तरह जैन धर्म का प्रचार उत्तरी भारत में हो गया. दक्षिण में जैन धर्म का प्रचार दिगम्बर सम्प्रदाय के अनुयायियों ने किया. यद्यपि जैन धर्म बौद्ध धर्म की भाँति विदेशों तक नहीं फैल सका, किन्तु भारत में इसका प्रचार-प्रसार खूब हुआ.

भारत में जैन प्रचार-प्रसार के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

राजकीय संरक्षण- जैन धर्म के तीव्र प्रचार-प्रसार के मूल में मुख्य बात यह थी कि तत्कालीन राजाओं ने इस धर्म को अपना समर्थन व राजकीय संरक्षण प्रदान किया. अनेक राजा, सामन्त तथा उच्च राजकीय पदाधिकारी महावीर के उपदेशों से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने जैन धर्म स्वीकार कर लिया और फिर जैन धर्म के प्रचार में अपना पूर्ण योगदान दिया.

सिद्धान्तों की सरलता- जैन धर्म के सिद्धान्त अति सरल थे. इसमें आत्मा तथा परमात्मा के गूढ़ रहस्यों का जंजाल नहीं था. सिद्धान्त इतने सरल थे कि जनसाधारण इन्हें आसानी से अपना सकता था. इन सिद्धान्तों में ऐसी कोई बात नहीं थी जो कष्टसाध्य अथवा दुर्बोध हो. जैन धर्म के इन सरल एवं व्यावहारिक सिद्धान्तों ने जनसाधारण को उनके कर्तव्यों का बोध कराया तथा स्वावलम्बी बनने का उपेदश दिया.

सामाजिक समानता का सिद्धान्त- जैन धर्म मुख्यतः समानता के सिद्धान्त पर आधारित था. महावीर स्वामी ने जात-पांत का घोर विरोध कर समानता, नैतिकता व स्वतन्त्रता पर विशेष बल दिया और जाति प्रथा को निरर्थक प्रमाणित किया, जबकि ब्राह्मण धर्म में समाज के निम्न वर्ग के लोगों का कोई स्थान न था और उनका तिरस्कार किया जाता था. महावीर स्वामी ने सभी जातियों के लिए अपने धर्म के द्वार खोल दिए. परिणामस्वरूप जनसाधारण इस धर्म की ओर आकृष्ट हुआ और जैन धर्म का प्रचार हुआ.

बोलचाल की भाषा का प्रयोग- चूंकि जैन धर्म के सिद्धान्त साधारण बोलचाल की भाषा में लिखे गए थे. अतः जनता उसे आसानी से समझ सकी. साथ ही महावीर स्वामी तथा उनके शिष्य साधारण बोलचाल की भाषा में ही उपदेश देते थे जिन्हें लोग आसानी से समझ लेते थे. यही कारण था कि जनता इस धर्म की अनुयायी हो गई.

संघ की स्थापना- ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् महावीर स्वामी ने जैन संघ की स्थापना की थी. जैन संघ ने जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में अद्वितीय भूमिका निभाई.

जैन धर्म की अवनति अथवा पतन

यद्यपि जैन धर्म का प्रचार-प्रसार बड़े उत्साह के साथ किया गया, महावीर स्वामी ने अपना सम्पूर्ण जीवन इस धर्म के विकास में लगा दिया. परिणामस्वरूप यह धर्म भारत का प्रमुख धर्म बन गया और इस धर्म के अनुयायियों में अपार वृद्धि हुई, किन्तु कालान्तर में इसकी और अधिक प्रगति में अवरोध उत्पन्न होने लगे परिणामस्वरूप इस धर्म की लोकप्रियता घटने लगी और यह धर्म पतनोन्मुख हो चला.

भारत में जैन धर्म की अवनति के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे-

राज धर्म के रूप में प्रतिष्ठित न होना- यद्यपि महावीर स्वामी के प्रयासों से अनेक राजघरानों ने जैन धर्म को स्वीकार किया, किन्तु इस धर्म को कभी भी राज धर्म घोषित नहीं किया गया. परिणामतः इस धर्म का प्रचार क्षेत्र तो सीमित रहा ही साथ ही अल्पकालिक भी.

प्रचार साधनों का अभाव- प्रचार साधनों के अभाव में जैन धर्म शीघ्र ही पतोन्नमुख हो चला. बौद्ध संघों के समान जैन संघों ने जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में कोई विशेष रूचि नहीं दिखाई. महावीर स्वामी के बाद जैन भिक्षुओं ने इस धर्म का प्रचार नहीं किया. धर्म प्रचारकों के अभाव के कारण कोई विदेशी यात्री भी इस धर्म की ओर आकृष्ट नहीं हुआ.

जाति प्रथा का पुनरागमन- यद्यपि महावीर स्वामी ने जाति प्रथा का भेद मिटाते हुए इस धर्म के द्वार सभी के लिए समान रूप से खोल दिए थे, किन्तु बाद में जैन धर्म में जाति-प्रथा का पुनः प्रवेश हो गया. परिणामस्वरूप इस धर्म की लोकप्रियता घटने लगी. विशेषकर यह धर्म निम्न जातियों में बहुत अलोकप्रिय हो गया.

कठोर और अव्यावहारिक सिद्धान्त- अन्य धर्मों की तुलना में इस धर्म के सिद्धान्त अत्यधिक कठोर थे. उदाहरणार्थ जैन धर्म में मोक्ष प्राप्ति के लिए कठोर तप, शारीरिक कष्ट तथा उपवास पर विशेष बल दिया गया. ये सिद्धान्त इतने कठोर थे कि उन्हें व्यवहार में लाना जनसाधारण के लिए कष्टप्रद था. यही कारण है कि जैन धर्म साधारण जनता को अपनी ओर आकृष्ट न कर सका.

दार्शनिक क्लिष्टता- जैन दर्शन में अत्यधिक क्लिष्टता होने के कारण इसके स्यादवाद, अनेकान्तवाद, द्वैतवादी तत्वज्ञान आदि को समझना साधारण जनता के वश की बात न थी. परिणामस्वरूप जैन धर्म तपस्वियों तक ही सीमित रहा.

अन्य धर्मों से प्रतिद्वन्द्विता- जिस समय जैन धर्म का उद्भव हुआ. उसी समय बौद्ध धर्म का उद्भव हुआ. इस प्रकार छठी शताब्दी ई. पू. में ये दोनों ही धर्म प्रसिद्धि की ओर अग्रसर थे. कालान्तर में ब्राह्मण धर्माचार्यों के प्रयासों से ब्राह्मण धर्म पुनः अस्तित्व में आ गया. इस प्रकार ब्राह्मण बौद्ध धर्म और जैन धर्म के प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी बन गए. इस धार्मिक प्रतिद्वन्द्विता से जैन धर्म टक्कर न ले सका और पतन की ओर अग्रसर हो गया. र साम्प्रदायिक विभाजन-प्रारम्भ में जैन धर्म एक सशक्त आंदोलन था, किन्तु बाद में जैन मतावलम्बियों में आन्तरिक मतभेद प्रारम्भ हो गए. परिणामस्वरूप जैन धर्म दो सम्प्रदायों-दिगम्बर और श्वेताम्बर में विभाजित हो गया. जैन धर्म का यह साम्प्रदायिक विभाजन जैन धर्म के लिए अत्यधिक घातक सिद्ध हुआ और जैन धर्म पतन की ओर अग्रसर हो गया.

जैन साहित्य की भाषा- चूँकि प्रारम्भ में जैन साहित्य का लेखन प्राकृत भाषा में किया गया. अत: जन साधारण ने इसे आसानी से समझा, क्योंकि उस समय जनसाधारण की भाषा ही प्राकृत थी, किन्तु बाद में जबसे जैन साहित्य संस्कृत में लिखा जाने लगा तब से जनसाधारण के लिए जैन साहित्य को समझना दुष्कर हो गया. परिणामतः जनसाधारण का जैन धर्म के प्रति दृष्टिकोण उदासीन होता चला गया.

अहिंसा पर अत्यधिक बल- जैन धर्म में अहिंसा पर आवश्यकता से अत्यधिक बल दिया गया. जैन धर्म में कहा गया है कि समस्त प्राणी, बीज, अंकुर, पुष्प, अण्डे, ओले आदि सभी सजीव हैं. अतः कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जिससे इन पर हिंसा हो. हिंसा के बारे में विचार करना भी हिंसा है. ये सब कुछ ऐसे तथ्य थे जिनका पालन करना जनता के लिए सम्भव न था.

ब्राह्मण धर्म से सांलग्न्यता- प्रारम्भ में जैन धर्म ब्राह्मण धर्म के विरुद्ध एक क्रांति के रूप में उभर कर सामने आया, किन्तु बाद में ब्राह्मण धर्म के समान ही जैन धर्म में भी अनेक दोष उत्पन्न हो गए. ब्राह्मण धर्म की भाँति ही इस धर्म में भी भक्तिवाद और देवी-देवताओं की बाहुल्यता प्रवेश कर गई. फलतः जैन धर्म अलोकप्रिय होने लगा.

विदेशी आक्रमण- पूर्व मध्यकाल में अनेक विदेशी आक्रान्ताओं ने भारत को अपने आक्रमण का निशाना बनाया और भारत में प्रचलित प्रत्येक धर्म को हानि पहुँचाई. विदेशी आक्रान्ताओं के आक्रमण से जैन धर्म को भी बहुत अधिक क्षति पहुँची. आक्रान्ताओं ने जैन मंदिरों व मूतियों को ध्वस्त किया तथा जैन साहित्य को अग्नि की भेंट चढ़ा दिया. चूँकि जैन धर्मावलम्बी अहिंसावादी थे अतः वे आक्रमणकारियों का सामना नहीं कर सके और जैन धर्म पतनोन्मुख हो चला.

जैन धर्म की भारतीय संस्कृति को देन

यद्यपि जैन धर्म भारतवर्ष में एक निश्चित सीमा के अन्तर्गत ही विकसित हो सका. जैन धर्म को भारत का प्रमुख धर्म बनने का अवसर भी कभी प्राप्त नहीं हुआ, लेकिन इस पर भी जैन धर्म ने भारतीय संस्कृति को प्रभावित किया. भारतीयों में अहिंसा की भावना को विकसित करने का श्रेय जैन धर्म को ही जाता है.

संक्षेप में जैन धर्म की भारतीय संस्कृति को देन निम्नवत् है-

जैन धर्म की साहित्य को देन- साहित्यिक क्षेत्र में जैन धर्म का स्पष्ट प्रभाव देखने को मिलता है. जैन विद्वानों ने जनसाधारण की भाषा प्राकृत में जैन साहित्य की रचना की जिससे प्राकृत भाषा का समुचित विकास हुआ. कुछ जैन ग्रन्थों को अपभ्रंश भाषा में लिखा गया. इतना ही नहीं दक्षिण में कन्नड़, तमिल और तेलुगू भाषा में जैन साहित्य लिखा गया. जैन विद्वानों ने गुप्त काल में संस्कृत भाषा में जैन ग्रन्थों की रचना की. जैन विद्वानों ने न केवल धार्मिक ग्रन्थों की रचना की वरन उन्होंने व्याकरण, काव्य व गणित आदि पर भी अनेक ग्रन्थों की रचना की और भारतीय भाषाओं के विकास में अपना पर्याप्त योगदान दिया. जैन धर्म की साहित्यिक देन के सम्बन्ध में डॉ. हीरा जैन का मत है कि "जैनियों ने देश के भाषा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. संस्कृत तथा पालि भाषा का ब्राह्मण व बौद्धों द्वारा पवित्र रचनाओं व शिक्षाओं की रचना हेतु प्रयोग किया गया, किन्तु जैनियों ने विभिन्न स्थानों व विभिन्न समयों में लोक भाषा का प्रयोग ज्ञान को सुरक्षित रखने व अपने धर्म के प्रचार के लिए किया. उन्होंने ही पहली बार अनेक क्षेत्रीय भाषाओं को साहित्यिक स्वरूप प्रदान किया." पंचतन्त्र पर लिखे गए दो आलोचना ग्रन्थ जैनियों के प्रभाव के द्योतक है.

जैन धर्म की दर्शन को देन- जैन धर्म ने दार्शनिक क्षेत्र में भी भारतीय संस्कृति को प्रभावित किया है. अनेकान्तवाद और स्यादवाद के सिद्धान्त के प्रचलन के लिए जैन दर्शन श्रेय भागी है. स्यादवाद के सिद्धान्त को स्पष्ट कर जैन धर्म ने समझाया कि सत्य के अनेक स्वरूप होते हैं और प्रत्येक कथन में सत्य का कुछ न कुछ अंश विद्यमान रहता है, अतः सम्पूर्ण सत्य को समझने के लिए सत्य के प्रत्येक रूप को समझना नितान्त आवश्यक है.

जैन धर्म की कला को देन- जैन धर्म ने कला के क्षेत्र में भी विशेष योगदान दिया. जैन कलाकारों ने अपनी कलाकृतियों में भारतीय कला का विकास किया. जैन कलाकारों ने अपने तीर्थंकरों की स्मृति को स्थायी बनाए रखने के लिए मूर्तियों तथा मंदिरों का निर्माण करवाया. इसके अतिरिक्त बौद्ध कलाकारों की भाँति स्तूप, मठ, रेलिंग, स्तम्भ, गुफा तथा प्रवेश द्वार का निर्माण कराया. ग्यारहवीं, बारहवीं शताब्दी में जैन कला की अत्यधिक उन्नति हुई. कलाकृतियों के प्राप्ति स्थानों में मध्य भारत, बुन्देलखण्ड, मैसूर (श्रावणबेलगोला) के अतिरिक्त जूनागढ़ (गिरनार) उसमानाबाद, राजगृह, पावापुरी आदि उल्लेखनीय है. इन सभी कलाकृतियों से भारतीय कला कोष में अत्यधिक वृद्धि हुई.

जैन धर्म के प्रमुख तथ्य

  • जैन साहित्य के अनुसार जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए. इनमें प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव, तेइसवें पार्श्वनाथ तथा चौबीसवें एवं अन्तिम महावीर स्वामी सर्व प्रमुख हैं.
  • प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभदेव की मृत्यु अट्ठावय (कैलाश पर्वत) पर हुई थी.
  • जैन धर्म के तेइसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ काशी नरेश अश्वसेन के पुत्र थे.
  • पार्श्वनाथ की प्रथम अनुयायी उनकी माता वामा तथा पत्नी प्रभावती थीं.
  • महाकवि गोस्वामी तुलसीदास ने तेइसवें जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ की भगवान के रूप में वंदना की है.
  • तीस वर्ष की अवस्था में तेइसवें जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ को वैराग्य प्राप्त हुआ था.
  • 83 दिन तक कठोर तपस्या करने के पश्चात् 84वें दिन पार्श्वनाथ को सम्मेय पर्वत पर ज्ञान प्राप्त हुआ था.
  • पार्श्वनाथ ने भिक्षुओं के लिए चतुर्वतों की व्यवस्था की थी. ये व्रत थे- (1) अहिंसा (किसी भी जीवित प्राणी को आघात न पहुँचाना), (2) सत्य (सदा सत्य बोलना), (3) अस्तेय (बिना अनुमति के किसी की वस्तु न लेना), (4) अपरिग्रह (सम्पत्ति का संग्रहण न करना).
  • वैदिक मंत्रों में केवल दो जैन तीर्थंकर (1) ऋषभदेव, (2) अरिष्टनेमि का उल्लेख मिलता है.
  • महावीर स्वामी की माँ का नाम त्रिशला तथा पिता का नाम सिद्धार्थ था.
  • ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् महावीर स्वामी को 'केवलिन' की उपाधि मिली.
  • जैन धर्म की परम्पराओं के अनुसार प्रथम जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ का प्रतीक चिन्ह सर्प तथा चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी का प्रतीक चिन्ह सिंह है.
  • महावीर स्वामी की माँ त्रिशला लिच्छवी नरेश चेटक की बहिन थीं.
  • बौद्ध साहित्य में महावीर स्वामी को निगष्ठ नातपुत्र अथवा निग्रन्थ सातपुत्र भी कहा गया है.
  • ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् महावीर स्वामी ने पावापुरी में जैन संघ की स्थापना की.
  • आगे चलकर महावीर स्वामी ने जैन संघ के सदस्यों को चार श्रेणियों-भिक्षु, भिक्षुणी, श्रावक, श्राविकाओं में बाँटकर चतुर्विघ संघ की स्थापना की.
  • लिच्छवीराज चेटक की पुत्री तथा चम्पा नरेश दधिवाहन की पत्नी पद्यावती महावीर स्वामी की प्रथम शिष्या बनी.
  • गोशाल महावीर स्वामी के प्रथम सहयोगी बने.
  • महावीर स्वामी को 'केवलिन', 'जिन' अथवा 'जितेन्द्रिय', 'अर्हतं', 'विग्रंथ' नामों से जाना जाता है.
  • नन्दीवर्धन, महावीर स्वामी के अग्रज थे. इन्हीं से आज्ञा प्राप्त कर महावीर स्वामी ने घर त्याग दिया.
  • महावीर स्वामी ने वैशाली, राजगृह, मिथिला, कौशल, विदर्भ, श्रावस्ती, मगध, अंग आदि स्थानों का भ्रमण कर अपने मत का प्रचार किया.
  • जैन धर्म के अनुसार सृष्टि का निर्माता ईश्वर नहीं है बल्कि सृष्टि का निर्माण 6 द्रव्यों- (1) जीव, (2) पुदगल (भौतिक तत्व), (3) धर्म, (4) अधर्म , (5) आकाश, (6) काल से मिलकर हुआ है.
  • प्रत्यक्ष, अनुमान, तीर्थंकरों के वचन, जैन धर्म में ज्ञान के तीन स्रोत हैं.
  • ऋग्वेद के 'केशीसूक्त' में कुछ जैन तीर्थंकरों का उल्लेख मिलता है.
  • 'स्यादवाद' का अर्थ है शायद है भी और नहीं भी.
  • जैन धर्म के स्यादवाद को ही सप्तभंगी का सिद्धान्त भी कहते हैं.
  • जैन धर्म में आंशिक रूप से हिंसा आदि कार्यों से दूर रखने वाले व्यक्ति को 'अणुव्रती' कहा गया है.
  • जैन धर्म के अनुसार भिक्षुओं को अहिंसा महाव्रत के पालन के लिए पाँच उपनियमों का पालन करना भी आवश्यक है. ये नियम हैं-
  1. ईयास समिति- भिक्षुओं को ऐसे मार्ग पर चलना चाहिए जहाँ कीट-कीटाणु आदि जीव पैर से न कुचलें.
  2. भाषा समिति-  भिक्षुओं को सदैव मधुर वाणी में बोलना चाहिए, जिससे वाचसिक हिंसा न हो. एषणा समिति-भिक्षुओं को सदैव ध्यान रखना चाहिए कि भोज के द्वारा किसी भी प्रकार के कीट कीटाणु की हिंसा न हो.
  3. आदान-अपेक्षा समिति- भिक्षुओं को अपने धार्मिक कर्तव्यों का पालन न करने के लिए जिन वस्तुओं को अपने पास रखना आवश्यक है, उनमें यह निरन्तर देखते रहना चाहिए कि कहीं कीट-कीटाणु तो नहीं हैं.
  4. व्युत्सर्ग समिति- भिक्षु को ऐसे स्थान पर मलमूत्र त्याग करना चाहिए जहाँ किसी भी प्रकार के कीट-कीटाणु नहीं हों.
  • असत्य त्याग महाव्रत का पालन करने के लिए भिक्षुओं को पाँच बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए. ये बातें हैं-
  • अनुषिम भाषी अर्थात् भिक्षुओं को भली-भाँति विचार करके ही भाषण करना चाहिए.
  • कोंह परिजानाति अर्थात् भिक्षुओं को क्रोध आने पर नहीं बोलना चाहिए.
  • लोभ परिजानाति अर्थात् लोभ की भावना जाग्रत होने पर मौन रहना चाहिए.
  • भय परिजानाति अर्थात् भयवश असत्य भाषण नहीं करना चाहिए.
  • हास परिजानाति अर्थात् हँसी मजाक में भी असत्य नहीं बोलना चाहिए.
  • अस्तेय महाव्रत के पालन के लिए भिक्षुओं को पाँच बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए. ये बाते हैं-
  1. बिना आज्ञा के किसी के घर में प्रवेश नहीं करना चाहिए, जब तक गुरु की आज्ञा न हो भिक्षार्जित भोजन को ग्रहण नहीं करना चाहिए.
  2. जब तक अनुमति न मिले किसी के घर में निवास नहीं करना चाहिए.
  3. बिना गृहस्वामी की आज्ञा के उसके घर रखी किसी भी वस्तु का प्रयोग नहीं करना चाहिए.
  4. जब कोई भिक्षु किसी घर में निवास कर रहा हो, तो भी दूसरे भिक्षु को बिना गृहस्वामी की अनुमति के उस घर में नहीं रहना चाहिए.
  5. ब्रह्मचर्य व्रत के पालन में भिक्षु को न तो किसी स्त्री को देखना, बोलना, ध्यान करना चाहिए, न ही जिस घर में नारी का निवास हो वहाँ रुकना चाहिए.
  • अपरिग्रह महाव्रत के अनुसार भिक्षुओं को किसी प्रकार का संग्रह नहीं करना चाहिए.
  • सैद्धान्तिक रूप में जैन धर्म ने जाति प्रथा का विरोध किया, किन्तु व्यवहार में वह कभी पूर्णरूपेण जाति प्रथा को न छोड़ सका.
  • मौर्य काल में जैन धर्म दो सम्प्रदायों में विभक्त हो गया. ये सम्प्रदाय थे- दिगम्बर एवं श्वेताम्बर.
  • जैन धर्म के सिद्धान्तों में निवृत्ति मार्ग का स्थान प्रधान है.
  • जैन धर्म के अनुसार आत्मा पिछले जन्म के कर्मों, इच्छाओं से बंधक रूप में रहती है.
  • जैन धर्म के अनुसार त्रिरत्न हैं-(1) सम्यक ज्ञान, (2) सम्यक दर्शन, (3) सम्यक आचरण.
  • महावीर के 11 शिष्य थे जो गणधर अथवा गंधर्व कहलाते थे.
  • भद्रबाहु द्वारा रचित 'कल्प सूत्र' जैन धर्म का सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रन्थ माना जाता है.
  • आचार्य कुन्द के चार ग्रन्थ-
  1. नियम सार
  2. प्रचस्ति कामसार
  3. समयसार
  4. प्रवचन सार जैन धर्म के प्रमुख ग्रन्थ माने जाते हैं.

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