ज्वार-भाटा (Tide) | ज्वार-भाटा किसे कहते है? | ज्वार-भाटा कैसे उत्पन्न होता है? | प्रकार | jwar bhata

ज्वार-भाटा (Tide) jwar bhata

सूर्य व चन्द्रमा की आकर्षण शक्तियों के कारण सागरीय जल के ऊपर उठने तथा गिरने को 'ज्वार भाटा' कहा जाता है। इससे उत्पन्न तरंगों को ज्वारीय तरंग कहते है। विभिन्न स्थानों पर जल की गहराई, सागरीय तट की रूपरेखा तथा सागर के खुले होने या बंद होने पर आधारित होती है। यद्यपि सूर्य चन्द्रमा से बहुत बड़ा हैं तथापि चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति को प्रभाव दोगुना है। इसका कारण सूर्य का चन्द्रमा की तुलना में पृथ्वी से दूर होना है। 24 घंटे में प्रत्येक स्थान पर दो बार ज्वार भाटा आता है। जब सूर्य, पृथ्वी तथा चन्द्रमा एक सीधी रेखा में होते हैं तो इस समय उनकी सम्मिलित शक्ति के परिणामस्वरूप दीर्घ ज्वार को अनुभव किया जाता है। यह स्थिति सिजिगी (Syzygy) कहलाती है। ऐसा पूर्णमासी व अमावस्या को होता है। इसके विपरीत जब सूर्य, पृथ्वी व चन्द्रमा मिलकर समकोण बनाते हैं तो चन्द्रमा व सूर्य का आकर्षण बल एक दूसरे के विपरीत कार्य करते है। फलस्वरूप निम्न ज्वार का अनुभव किया जाता है। ऐसी स्थिति कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष के सप्तमी या अष्टमी को देखा जाता है। लघु ज्वार सामान्य ज्वार से 20% नीचा व दीर्घ ज्वार सामान्य ज्वार से 20% ऊँचा होता।

jwar-bhata

पृथ्वी पर चन्द्रमा के सम्मुख स्थित भाग पर चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति के कारण ज्वार आता है किन्तु इसी समय पृथ्वी पर चन्द्राविमुखी भाग पर ज्वार आता है। इसका कारण पृथ्वी के घुर्णन को संतुलित करने के लिए अपकेन्द्री बल (Centrifugal Force) का शक्तिशाली होना है। प्रत्येक स्थान पर 12 घंटे के बाद ज्वार आना चाहिए किन्तु यह प्रति दिन लगभग 26 मिनट की देरी से आता है। इसके कारण चन्द्रमा का पृथ्वी के सापेक्ष गतिशील होना है। कनाडा की न्यु ब्रसविक तथा नेता स्कोशिया के मध्य स्थित फंडी की खाड़ी में ज्वार की ऊँचाई सर्वाधिक (15 से 18मी.) होती है जबकि भारत के ओखा तट पर मात्र 2.7 मी. होती है। इंग्लैंड के दक्षिणी तट पर स्थित साउथैम्पटन में प्रतिदिन चार बार ज्वार आते है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ये दो बार इंग्लिश चैनल से होकर एवं दो बार उत्तरी सागर से होकर विभिन्न अंतरालों पर वहाँ पहुँचते है।
नदियों को बड़े जलयानों के लिए नौ संचालन योग्य बनाने में ज्वार सहायक होते है। टेम्स तथा हुगली नदियों की ज्वारीय धाराओं के कारण ही क्रमश: लंदन व कोलकाता महत्वपूर्ण पत्तन बन्दरगाह बन सके है। नदियों द्वारा लाए गए अवसाद भी भाटा के साथ बहकर समुद्र में चले जाते है और इस प्रकार डेल्टा निर्माण की प्रक्रिया में बाधा पहुँचती है। जल विद्युत के उत्पादन हेतु भी ज्वारीय ऊर्जा का प्रयोग किया जाता है। फ्रांस व जापान में ज्वारीय ऊर्जा पर आधारित कुछ विद्युत केन्द्र विकसित किए गए है। भारत में खंभात की खाड़ी तथा कच्छ की खाड़ी में इसकी अच्छी संभावना है।
  • ज्वार-भाटा सागरीय जल की एक महत्वपूर्ण गति है, जिसके माध्यम से सागरों में जल-स्तर की मात्रा घटती-बढ़ती रहती है। अतः सागर की इस गति के कारण उसके जल के स्तर में सदैव परिवर्तन होता रहता है।
  • सूर्य व चन्द्रमा की आकर्षण शक्तियों के कारण सागरीय जल के ऊपर उठने तथा आगे (तट) की ओर बढ़ने की अवस्था को ज्वार तथा जल के नीचे उतरने व पीछे (सागर) की ओर लौटने की अवस्था को भाटा कहा जाता है। इससे उत्पन्न तरंगों को ज्वारीय तरंग कहते हैं।
  • विभिन्न स्थानों पर ज्वार-भाटा की ऊँचाई में पर्याप्त भिन्नता होती है, जो सागर में जल की गहराई, सागरीय तट की रूपरेखा तथा सागर के खुले या बंद होने पर आधारित होती है।
  • यद्यपि सूर्य, चन्द्रमा से बहुत बड़ा है, तथापि पृथ्वी पर सूर्य की अपेक्षा चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति का प्रभाव दोगुना है। इसका कारण सूर्य का चन्द्रमा की तुलना में पृथ्वी से अधिक दूर होना है।
  • पृथ्वी के परिभ्रमण (घूर्णन) के कारण 24 घंटे में प्रत्येक स्थान पर दो बार ज्वार एवं दो बार भाटा आता है।
  • जब सूर्य, पृथ्वी तथा चन्द्रमा एक सीधी रेखा में होते हैं तो यह स्थिति युति-वियुति (Syzygy) कहलाती है। सिजिगी की स्थिति पूर्णमासी व अमावस्या को उत्पन्न होती है। इस समय उनकी सम्मिलित आकर्षण शक्ति के परिणामस्वरूप दीर्घ ज्वार या वृहत ज्वार (Spring Tide) का अनुभव किया जाता है।
  • दीर्घ ज्वार में सूर्य का प्रभाव कम दिखाई देता है, क्योंकि सूर्य चन्द्रमा की अपेक्षा पृथ्वी से अधिक दूर है। पृथ्वी से चन्द्रमा की निकटता का प्रभाव ज्वार की ऊँचाई पर स्पष्ट दिखाई देता है।

उप-भू (Perigee) एवं अप-भू (Apogee)

  • जब पृथ्वी चन्द्रमा से निकटतम स्थिति (पृथ्वी के केन्द्र चन्द्रमा के केन्द्र की दूरी 3,56,000 किमी.) पर होती है, तो उसे चन्द्रमा की उप-भू स्थिति कहते हैं। इस स्थिति में चन्द्रमा का ज्वारोत्पादक बल सर्वाधिक होता है जिस कारण उच्च चार उत्पन्न होता है, जो कि सामान्य ज्वार से 20% ऊँचा होता है।
  • जब चन्द्रमा पृथ्वी से अधिकतम दूरी (पृथ्वी के केन्द्र से चन्द्रमा के केन्द्र के बीच की दूरी 4,07,000 किमी.) पर स्थित होता है तो उसे अप-भू कहते हैं।
  • इस समय चन्द्रमा का ज्वारोत्पादक बल न्यूनतम होता है, जिस कारण लघु ज्वार उत्पन्न होता है, जो कि सामान्य ज्वार से 20% नीचा होता है।

  • जब सूर्य, पृथ्वी व चन्द्रमा मिलकर समकोण (Right Angle) की स्थिति बनाते हैं तो चन्द्रमा व सूर्य का आकर्षण बल एक दूसरे के विपरीत (समकोणीय स्थिति के कारण सूर्य की चन्द्रमा महासागरीय जल को अपनी-अपनी ओर आकर्षित करते हैं।) कार्य करते हैं। जिसके परिणामस्वरूप निम्न ज्वार या लघु ज्वार का अनुभव किया जाता है। लघु ज्वार में महासागरीय जल का उतार-चढ़ाव कम होता है, ऐसी स्थिति कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष की सप्तमी या अष्टमी तिथि को देखी जाती है।
  • पृथ्वी पर चन्द्रमा के सम्मुख स्थित भाग पर चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति के कारण ज्वार आता है, किन्तु इसी समय पृथ्वी पर चन्द्राविमुखी भाग पर ज्वार आता है। इसका कारण पृथ्वी के घूर्णन को संतुलित करने के लिए अपकेन्द्रीय बल (Centrifugal Force) का शक्तिशाली होना है।
  • एक ही स्थान पर जब एक ज्वार और एक भाटा आता है, तब इसे दैनिक ज्वार-भाटा कहते हैं। इन ज्वारों में 24 घण्टे 52 मिनट का अन्तर होता है।

गुरुत्वाकर्षण व अपकेन्द्रीय बलों के कारण उत्पन्न ज्वार-भाटा

  • गुरुत्वाकर्षण और अपकेन्द्रीय बलों के प्रभाव के कारण प्रत्येक स्थान पर 12 घंटे के पश्चात् ज्वार आना चाहिए किन्तु, यह प्रति दिन लगभग 26 मिनट की देरी से आता है। इसका कारण चन्द्रमा का पृथ्वी के सापेक्ष गतिशील होना है।
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  • जब एक ही स्थान पर दो बार ज्वार आते हैं तब एक ज्वार और दूसरे ज्वार के मध्य 12 घण्टे 26 मिनट का अन्तर रहता है, इसे अर्द्ध-दैनिक ज्वार कहते हैं। अर्द्धदैनिक ज्वार तथा भाटा में ऊँचाई तथा गहराई समान रहती है।
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ज्वार-भाटों का अंतराल एवं ऊँचाई

  • कनाडा के न्यू बूंसविक तथा नोवास्कोशिया के मध्य स्थित फंडी की खाड़ी में ज्वार की ऊँचाई सर्वाधिक (15 से 18 मी.) होती है, जबकि भारत के ओखा तट पर ज्वार की ऊँचाई मात्र 2.7 मी. होती है।
  • अर्द्ध दैनिक ज्वार में असमानता को प्रकट करने की स्थिति को मिश्रित ज्वार भाटा कहते हैं। मिश्रित ज्वार भाटा में दोनों ज्वार और दोनों भाटा के मध्य अत्यधिक अन्तर पाया जाता है।
  • इंग्लैण्ड के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित साउथैम्पटन में प्रतिदिन चार बार ज्वार व चार बार भाटा आते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ये दो बार इंग्लिश चैनल से होकर एवं दो बार उत्तरी सागर से होकर विभिन्न अंतरालों पर वहाँ पहुँचते हैं।
  • नदियों को बड़े जलयानों के लिए नौ संचालन योग्य बनाने में ये ज्वार सहायक होते हैं। टेम्स और हुगली नदियों में प्रवेश करने वाली ज्वारीय धाराओं के कारण ही क्रमशः लंदन व कोलकाता महत्त्वपूर्ण पत्तन बन सके हैं।
  • नदियों द्वारा लाए गए अवसाद भाटा के साथ बहकर समुद्र में चले जाते हैं तथा इस प्रकार डेल्टा निर्माण की प्रक्रिया में बाधा पहुँचती है। जल विद्युत के उत्पादन हेतु भी ज्वारीय ऊर्जा का प्रयोग किया जाता है। फ्रांस व जापान में ज्वारीय ऊर्जा पर आधारित कुछ विद्युत केन्द्र विकसित किए गए हैं। भारत में खंभात की खाड़ी व कच्छ की खाड़ी में इसके विकास की अच्छी संभावना है।

ज्वार-भाटा की उत्पत्ति सम्बंधी संकल्पनाएँ

संकल्पनाएँ

प्रतिपादक

गुरुत्वाकर्षण बल सिद्धान्त (1687 ई.)

न्यूटन

गतिक सिद्धान्त (1755 ई.)

लाप्लास

प्रगामी तरंग सिद्धांत (1833 ई.)

डब्ल्यू वेवेल

नहर सिद्धांत (1842 ई.)

एयरी

स्थैतिक तरंग सिद्धान्त

हैरिस


ज्वारभाटा के प्रकार

दीर्घ ज्वार (Spring tide)

जब सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा तीनों एक सीध में होते है तो चन्द्रमा और सूर्य का सम्मिलित आकर्षण बल पृथ्वी पर पड़ता है, अतः उच्च ज्वार अनुभव किया जाता है। यह अवस्था अमावस्या या पूर्णिमा को उत्पन्न होती है।

लघु ज्वार (Neep tide)

यह अवस्था उस समय उत्पन्न होती है जब चन्द्रमा और सूर्य पृथ्वी पर समकोण बनाते है। यह अवस्था सप्तमी और अष्टमी को होती है, इस कारण सूर्य और चन्द्रमा पृथ्वी के जल को भिन्न-2 दिशाओं की ओर प्रभावित करते है, जिससे ज्वार की ऊचाँई कम रह जाती है। इसे 'लघु ज्वार' कहा जाता है।

उपभू तथा अपभू ज्वार (A pogean-perigean tides)

चन्द्रमा अपने दीर्घवृत्ताकार अक्ष पर घूमता हुआ पृथ्वी की प्ररिक्रमा करता है। पृथ्वी अपनी दीर्घ वृत्ताकार कक्ष में सूर्य की परिक्रमा करती है इसलिए घूमता हुआ चन्द्रमा जब पृथ्वी के निकटतम होता है तो उसकी ज्वार उत्पन्न करने की शक्ति अधिक होती है और उस समय जो ज्वार आता है, उसे उपभू ज्वार कहते है। जब चन्द्रमा की पृथ्वी से अधिकतम दूरी होने पर ज्वार की स्थिति न्यून रह जाती है तो इस ज्वार को 'अपभू ज्वार' कहते है।

अयन वृत्तीय और विषुवतरेखीय ज्वार

जब चन्द्रमा कर्क रेखा या मकर रेखा पर होता है तब उत्पन्न होने वाले ज्वार को अयन वृत्तीय ज्वार कहा जाता है। जब चन्द्र विषुवत रेखा के ठीक ऊपर स्थित होता है तब उत्पन्न होने वाले ज्वार को 'विषुवतरेखीय ज्वार' कहते है।

दैनिक ज्वार

जब किसी स्थान पर दिन में एक बार ही ज्वार भाटा आता है तो उसे दैनिक के अतंर में आता है।

अर्ध दैनिक ज्वार

जब दिन में दो बार ज्वार भाटा आता है तो उसे अर्द्ध दैनिक ज्वार भाटा कहा जाता है। यक प्रत्येक दिन समयानुसार 12 घण्टे 26 मिनट बाद आता है अर्थात् दो अर्द्ध ज्वारों के समय में 26 मिनट का अतंर जरूर रहता है।

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