पल्लवन किसे कहते है? परिभाषा, विधि, प्रमुख विशेषताएँ, नियम तथा उपयोग | pallavan

पल्लवन किसे कहते है? pallavan

पल्लवन का शाब्दिक अर्थ है- किसी विषय या विचार का विस्तार। इसके अंतर्गत भाव या विचार का अर्थ स्पष्ट किया जाता है। लेखन की इस क्रिया को हिन्दी में 'पल्लवन' कहते हैं तथा वृद्धीकरण, विशदीकरण, संवर्द्धन, भाव-विस्तार आदि पल्लवन के अन्यान्य नाम हैं।

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जब किसी विचार को कम-से-कम शब्दों में प्रकट किया जाता है या उसे सूक्तियों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो उसके अर्थ को ग्रहण करने में कठिनाई होती है। ऐसी स्थिति में इस बात की आवश्यकता होती है कि उन पंक्तियों को व्याख्यायित किया जाए, ताकि उन्हें सरलता से समझा जा सके।
पल्लवन के अंतर्गत इसी उद्देश्य की पूर्ति की जाती है। अतः पल्लवन को इन शब्दों में परिभाषित किया जा सकता है, “किसी सुगठित एवं गुंफित विचार या भाव के विचार को पल्लवन कहते हैं।"

भाव पल्लवन

किसी उक्ति, सूक्ति, भाव, विचार अथवा वाक्य के मूल भाव को विस्तार के साथ लिखना भाव-पल्लवन कहलाता है। पेड़ में फूटे नए पत्तों को पल्लव कहते हैं और इस प्रक्रिया को पल्लवन कहते हैं। अतः किसी उक्ति अथवा वाक्य में निहित व्यापक संदेश को विस्तार देना ही भाव पल्लवन है।

उदाहरण के लिए, "करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान" का भाव-पल्लवन ध्यान से पढ़िए:

निरंतर अभ्यास से अज्ञानी व्यक्ति भी ज्ञानवान हो सकता है। अभ्यास से व्यक्ति की बुद्धि का विकास होता है और उसकी जानकारी बढ़ती है। अभ्यास के लिए परिश्रम आवश्यक होता है। परिश्रम द्वारा मंदबुद्धि व्यक्ति भी बुद्धिमान हो सकता है। बुद्धि के परिष्कार और संस्कार के लिए लगातार प्रयास करना जरूरी है। ज्ञान की प्राप्ति और बुद्धि को धारदार बनाने के लिए लगातार अभ्यास करना आवश्यक होता है। परीक्षा में वही विद्यार्थी अच्छे अंक पाता है जो लगातार अध्ययनरत रहता है। ज्ञान अपने आप हमारे पास चलकर नहीं आता बल्कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमें प्रयास करना पड़ता है। जो जितना अधिक प्रयास और अभ्यास करता है उसके ज्ञान का भंडार उतना ही विस्त त होता है। ज्ञान किसी की बपौती नहीं है। यह उसे प्राप्त होता है जो इसके लिए निरंतर प्रयास करता है।
आप भी एक पाठ को जितनी बार पढ़ते हैं वह आपको उतना ही बेहतर समझ में आता जाता है। आप अपनी इकाइयों को जितनी बार दोहराएँगे आप परीक्षा में उतना ही बेहतर लिख सकेंगे। सचिन तेंदुलकर सचिन तेंदुलकर कैसे बना। जाकिर हुसैन उस्ताद जाकिर हुसैन कैसे बने। यह सब अभ्यास और रियाज का ही कमाल है। आप भी जितनी मेहनत करेंगे, जीवन में उतने ही सफल होंगे।

आपने ध्यान दिया होगा कि भाव-पल्लवन में मूल भाव को ग्रहण किया गया है। अर्थात् "करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान" का मूल भाव है :
  • अभ्यास से अज्ञानी व्यक्ति ज्ञानवान बन सकता है।
इस मूल भाव से कौन-सा प्रेरणा संदेश या निष्कर्ष निकलता है ? वह है :

अभ्यास से मनुष्य की बुद्धि का विकास होता है और उसका व्यक्तित्व परिवर्तित हो जाता है।
भाव-पल्लवन के स्वरूप में मूल भाव को समझाने के लिए किसी सहायक भाव, मान्यता, धारणा आदि का उल्लेख करते हैं। साथ ही मूल भाव किसी बड़े निष्कर्ष या नीति-संदेश की प्रेरणा देता है, तो वह भी भाव-पल्लवन में स्थान पाता है। आप समझ गए होंगे कि भाव-पल्लवन के स्वरूप में मूल भाव, मूल भाव की मान्यता, धारणा आदि का उल्लेख और प्रेरणाप्रद संदेश आते हैं। इन तीनों की सहायता से भाव-पल्लवन बन जाता है।

पल्लवन की प्रमुख विशेषताएँ

  • पल्लवन, भाव या विचार का विस्तार है लेकिन यह व्याख्या तथा भावार्थ से भिन्न है।
  • पल्लवन, व्याख्या तथा भावार्थ में तात्त्विक अंतर होता है।
  • पल्लवन में निहित भाव का विस्तार होता है।
  • पल्लवन में प्रसंग-निर्देश के साथ आलोचना तथा टीका-टिप्पणी करने की छूट नहीं है, जिस प्रकार की छूट 'व्याख्या' करने में होती है।
  • पल्लवन में मूलभाव को स्पष्ट करने के लिये भाव-विस्तार संबंधी कोई सीमा नहीं होती, जिस प्रकार की सीमा भावार्थ में मूलभाव को स्पष्ट करने के संबंध में होती है।
  • पल्लवन के द्वारा 'मूल' तथा 'गौण' दोनों प्रकार के निहित भावों को प्रकट किया जाता है।

पल्लवन से संबंधित महत्त्वपूर्ण नियम

  • पल्लवन के लिये मूल अवतरण के संपूर्ण भाव को अच्छी तरह से समझने का प्रयास करें।
  • मूलभाव या विचार के साथ-साथ गौण या सहायक विचारों को भी समझने की चेष्टा करें।
  • अर्थ-विस्तार हेतु कुछ उदाहरण या तथ्य भी दिये जा सकते हैं।
  • भाषा में स्पष्टता, मौलिकता तथा सरलता होनी चाहिये। इसमें प्रयोग किये गए छोटे-छोटे वाक्य अधिक उपयुक्त होते हैं।
  • अलंकृत भाषा लिखने से बचना चाहिये।
  • पल्लवन में मूल लेखक के मनोभावों का ही विस्तार होना चाहिये। टीका-टिप्पणी या आलोचना नहीं करनी चाहिये।
  • पल्लवन समास-शैली की जगह व्यास-शैली में लिखना चाहिये अर्थात् इसमें तथ्य को विस्तार से लिखा जाना चाहिये।
  • इसमें सामासिक शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिये।
  • पल्लवन की रचना अन्य पुरुष में होनी चाहिये।

पल्लवन की आवश्यकता

  • क्योंकि कम-से-कम शब्दों में लिखे गए विचारों तथा भावों में इतनी स्पष्टता नहीं रहती है, जिसे सभी आसानी से समझ सकें।
  • क्योंकि एक गंभीर लेखक 'गागर में सागर' भरते हुए न्यूनतम शब्दों में अधिकतम बातों को लिखने का प्रयास करता है, जिसे आसानी से बिना स्पष्टता के नहीं समझा जा सकता।
  • क्योंकि हिन्दी में ऐसी हज़ारों सूक्तियाँ और कहावतें प्रचलित हैं जिनका अर्थ स्पष्ट करने हेतु उनका अर्थ-विस्तार करना आवश्यक होता है।
  • क्योंकि अर्थ-विस्तार करते समय मूल वाक्य में आए विचारसूत्रों का उपयुक्त (सही) अर्थ पकड़ने का प्रयास किया जा सके।

पल्लवन की विधि

  • 1. दिये गए वाक्य या सुभाषित को अच्छी तरह पढ़िए और उस पर चिंतन-मनन कीजिए ताकि उसका अर्थ और अभिप्राय पूरी तरह से समझ में आ जाए।
  • 2. सोचिए कि इस उक्ति के अंतर्गत क्या-क्या विचार या भाव आ गए हैं और आपके मन में इसके पक्ष में क्या-क्या विचार प्रस्फुटित होते हैं। क्या आप इस मूल कथन की पुष्टि में कोई उदाहरण, दृष्टान्त या प्रमाण दे सकते हैं?
  • 3. विस्तार उसी बात का होना चाहिए जो मूल में हो; जोडना उतना है जो निश्चित रूप से उसी विषय के अनुकूल हो।
  • 4. आप यह समझ लीजिए कि मूल उक्ति किसी लम्बी-चौड़ी बात का निष्कर्ष स्वरूप है। सोचिए कि विचारों के किस क्रम से यह बात अंत में कहीं गई होगी।
  • 5. इसके बाद लिखना शुरू कर दें। आपका लेख कितना बड़ा हो, इस बारे में कोई नियम नहीं है। एक पैराग्राफ भी हो सकता है, दो-तीन भी। आप अलग-अलग छोटे-छोटे पैराग्राफ लिखिए और देखते जाइए कि मूल की सब बातें आ गई हैं। यदि परीक्षक कहे कि इतने शब्दों में पल्लवन करें तो इस सीमा-निर्धारण का ध्यान रहे। यदि कोई निर्देश न हो तो तीन-साढ़े तीन सौ शब्द काफी समझे जाएं।
  • 6. आप अपने लेख की पुष्टि में ऐसे उद्धरण भी दे सकते हैं जिनकी संगति उस विषय से निश्चित हो।
  • 7. अप्रासंगिक बातें मत उठाएं, उक्ति की आलोचना या टीका-टिप्पणी या विरोध न करें।
  • 8. मैं और हम का प्रयोग भूलकर भी न करें। अन्य पुरुष में बात करें।
  • 9. भाषा सरल, शुद्ध और स्पष्ट होनी चाहिए। अलंकृत भाषा से बचें। छोटे-छोटे वाक्य अच्छे होते हैं।
  • 10. अपना लेख एक बार दोहरा लें। कोई शब्द, कोई अक्षर या मात्रा या विराम-चिह्न छूट गये हों तो ठीक कर लें।
  • 11. लेख में कोई विचार, वाक्य या वाक्यांश दोहराया न जाए।
  • 12. परीक्षा से पहले घर पर अभ्यास करते रहिए तो आपको कोई कठिनाई नहीं होगी। निर्धारित समय से पहले आप अपना काम कर लेंगे।

पल्लवन के उदाहरण

1. आवश्यकता आविष्कार की जननी है।
मनुष्य की आदिम अवस्था से लेकर वर्तमान विकसित अवस्था तक कायापलट के मूल में आवश्यकताएँ ही रही हैं। आवश्यकता-पूर्ति हेतु मनुष्य कर्म के लिये प्रेरित और बाध्य होता है और इस प्रयास में उसे जो अनुभव हासिल होता है, उसे अगली आवश्यकता-पूर्ति में उपयोग करता है। मनुष्य कितनी भी उत्तम अवस्था में पहुँच जाए, उसकी आवश्यकताएँ निरंतर बनी रहती हैं।
आदिमावस्था से वर्तमान अवस्था के मध्य की अवधि में अनंत आवश्यकताएँ थीं, जिन्हें एक-एक कर पार कर आज मनुष्य विज्ञान की विकासशील अवस्था में पहुँचा है। आज तमाम मानवीय सुख-साधन की उपलब्धता के बावजूद न तो आवश्यकताओं की इतिश्री हुई है और न ही मनुष्य अपनी कर्म-समाप्ति मानकर हाथ पर हाथ धरे बैठ गया है। सच तो यह है कि आज विज्ञान और तकनीक ने व्यक्तिगत सुख-सुविधा से अलग विकास के अन्यान्य क्षेत्र के अनंत द्वार खोल दिये हैं, जिनसे आवश्यकताओं के दायरे भी असंख्य हो गए हैं। फलतः मनुष्य की क्रियाशीलता की गति भी काफी बढ़ गई है। परिणामतः नित नए-नए आविष्कार हो रहे हैं। मानवीय आवश्यकताएँ और उनकी पूर्ति हेतु मानवीय प्रयास एक निरंतर प्रक्रिया है, जो कभी समाप्त होने वाली नहीं है। अतः यह कथन अक्षरशः सत्य है कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है।

2. मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।
मानव-मन में उत्साह का संचार और आशा ही किसी कार्य/लक्ष्य की आधी प्राप्ति हेतु पर्याप्त होते हैं। लक्ष्य-प्राप्ति की राह में दृढ़ संकल्प से मनुष्य विषम बाधाओं, परेशानियों तथा कष्टों को सुगमतापूर्वक पार करने में सफल हो जाता है, क्योंकि उसको लक्ष्य पाना होता है। यद्यपि अन्य सहायक अनुकूलताओं का भी इसमें विशेष महत्त्व है, तथापि जब तक मनुष्य आत्मप्रेरित न हो, तब तक अन्यान्य अनुकूलताएँ एवं सुअवसर भी कारगर साबित नहीं होते और लक्ष्य-प्राप्ति की संभावना क्षीण बनी रहती है। उदाहरणस्वरूप यदि कोई छात्र अंतर्मन से यह मान ले कि अमुक परीक्षा में वह सफल नहीं हो सकता तो श्रेष्ठ पुस्तकें एवं अन्य सहायक श्रेष्ठ सामग्री भी उसके लिये निष्प्रयोज्य ही सिद्ध होगी। इसके विपरीत, यदि घातक रोग से पीड़ित व्यक्ति अंतर्मन से उससे जूझने का संकल्प कर ले, तो उसकी यह जिजीविषा उसके अंदर नवजीवन का संचार कर रोग प्रतिरोधक शक्ति पैदा कर देती है। आशय यह है कि अंतर्मन से लिया गया दृढ़संकल्प मानसिक सबलता के साथ-साथ शरीर की अंदरूनी प्रमुख क्रियाओं को मज़बूती प्रदान करता है, जिनसे जीवन-युद्ध जीतने में मदद मिलती है। अतएव, मानव जीवन के हर क्षेत्र में जीत का प्रत्यक्ष संबंध शारीरिक-भौतिक सामर्थ्य से कहीं अधिक मानसिक धारणा से है।

3. घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध।
प्रायः लोगों की यह मानसिकता होती है कि वे अपने आसपास उपलब्ध चीज़ को महत्त्व न देकर बाहर की चीज़ को विशिष्ट मानकर विशेष महत्त्व देते हैं। अभिप्राय यह है कि लोग अपने आसपास के गुणाकर योगी को कौड़ी का भाव देते हुए सम्मान देने से परहेज़ करते हैं, जबकि दूर के साधारण-से योगी को सिद्ध योगी मानकर सिर-आँखों पर बैठा लेते हैं। इसका मूल कारण यह है कि अल्प योग्य व्यक्ति की कम उपलब्धता उसे अधिक मूल्यवान बना देती है। मुश्किल से उपलब्ध व्यक्ति और दूरस्थता के कारण लोगों के लिये अनभिज्ञ होने के कारण स्वाभाविक रूप से उनके मन में सहज जिज्ञासा का तीव्र संचार उत्पन्न करता है। शायद यही कारण लोगों के अंतर्मन में उसके कथित ज्ञान के बावजूद अधिक सम्मान की भावना उत्पन्न कर देती है। इसके विपरीत, निकटस्थ सहज उपलब्ध ज्ञानी व्यक्ति के प्रति आकर्षण या लगाव कम होता है। मानव-प्रकृति की यह विडंबना ही कही जाएगी कि वह अपने आसपास के योग्य योगी (जोगी) को महत्त्वहीन मानकर अनादर की भाषा में 'जोगणा' कहता है तथा दूरस्थ के साधारण-से योगी को 'सिद्ध योगी' मानकर आदर व सम्मान के ऊँचे आसन पर बैठा देता है। इस संदर्भ में कहावत भी प्रचलित है 'घर की खाँड किरकिरी, बाहर का गुड़ मीठा'।

4. जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि।
कवि की कल्पना-शक्ति अपार होती है, जो मानव-मन के उस अपहुँच भागों में पहुँचने का सामर्थ्य रखती है, जहाँ सूर्य की रोशनी भी नहीं पहुँच सकती। सूर्य की रोशनी की परिव्याप्तता सौरमंडल तक ही सीमित है, परंतु कवि की कल्पनाशीलता की सीमा अनंत है। कवि न केवल यथार्थ लोक के जगत-जीवन के सूक्ष्मतम और अदृश्य तथ्यों की परिकल्पना कर सकता है, वरन् नव लोक-जगत के निर्माण में भी सक्षम होता है। अपनी रचनाओं के माध्यम से कवि अद्भुत, अविश्वसनीय एवं विलक्षण घटनाओं, चरित्र एवं परिवेश की सृष्टि कर अपने हृदय की गूढ संवेदनाओं तथा विलक्षण बुद्धि की सूक्ष्म विचारधारा को प्रस्तुत करने में पूर्णतः सक्षम होता है। सही अर्थों में कवि यथार्थ लोक का लेखक तो होता ही है, कल्पना-लोक का भी एक उत्तम शिल्पकार होता है। कवि की कृति मानव-मन की निराशा एवं अंधकार पक्ष को रोशन कर नवजीवन को ऊर्जा एवं स्फूर्ति प्रदान करती है। निराशा में आकंठ डूबे मध्यकालीन भारतीय जनमानस को कबीर, तुलसी, सूर आदि महान संतों-कवियों ने ही तो उबारा था।

5. बिना विचारे जो करे, सो पाछे पछताय।
कोई भी काम बिना विचारे नहीं करना चाहिये। विचार के अभाव में कार्य को सही दिशा नहीं मिल पाती है। विचार करने से कार्य का उद्देश्य सुनिश्चित हो जाता है। इससे कार्य-संबंधी मज़बूत एवं कमज़ोर पक्ष स्पष्ट हो जाते हैं। फलतः कार्य की एक रूपरेखा बन जाती है जिससे काम करना आसान हो जाता है। कार्य की सफलता की संभावना भी प्रबल हो जाती है। अतः कोई निर्णय करने के पहले खूब विचार-विमर्श कर लेना चाहिये, जिससे इस निर्णय के प्रभाव को समझा जा सके। जो व्यक्ति उचित-अनुचित का विचार कर किसी निष्कर्ष पर पहुँचता है, वह अपने निर्णय से संतुष्ट रहता है। इसके विपरीत किसी उत्तेजना या गुस्से में लिये गए निर्णय बाद में पश्चात्ताप का कारण बनते हैं। इसी तरह बिना विचारे जब किसी काम को किया जाता है तो जानकारी के अभाव में अक्सर उसमें असफलता हाथ लगती है तथा अंततः पछताना ही पड़ता है।

अभ्यास पल्लवन के संकेत

1. अतिशय रगड़ करे जो कोई अनल प्रकट चंदन ते होई।
शांत प्रकृति व्यक्ति भी अधिक चिढ़ाने, कोसने या तंग करने से खीज जाता है, कुद्ध हो जाता है। कहाँ तक वरदाश्त करे? चंदन शीतल होता है, पर उसे रगड़ा जाए तो उससे आग निकलेगी।

2. अधजल गगरी छलकत जाए
अपूर्ण ज्ञान हो तो आदमी अपनी विद्वता झाड़ता रहता है। वास्तव में जो विद्वान होता है, वह तो गंभीर होता है। नदियां तो उछलती हैं, समुद्र में गंभीरता होती है। ओछे आदमी खूब दिखावा करते हैं।

3. अनमाँगे मोती मिले मांगे मिले न भीख
भाग्य से अपने आप अनिच्छित पदार्थ मिल जाता है, और भाग्य नहीं है तो...। कभी तो बैठे-बिठाए कार्य सिद्ध हो जाता है और कभी बहुत हाथ-पैर मारने पर भी कुछ हाथ नहीं आता।

4. अपनी छाछ को कोई खट्टा नहीं कहता
अपनी वस्तु, अपनी करनी, अपने भाई-बेटे को कोई बुरा नहीं कहता। दुकानदार अपने माल की तारीफ़ ही करता है।

5. अलख पुरुष की माया कहीं धूप कहीं छाया
ईश्वर की लीला विचित्र है। कोई अमीर है, कोई गरीब; कोई सुखी है तो कोई दु:खी। भाग्य का खेल कहिए या ईश्वर की माया कहिए; समझ से बाहर है।

6. ईश्वर की माया कहीं धूप कहीं छाया
देखिए अलख पुरुष की माया....क्रम संख्या 5

7. एकै साथै सब सधै सब साथै सब जाय
आदमी को एक ही काम पर अपना ध्यान, अपना परिश्रम केंद्रित करना चाहिए। परीक्षा देनी है, और तुम खेल प्रतियोगिता की फिक्र में हो, नेतागिरी भी करते फिरते हो और कई तरह के और धंधों में लगे हो। इस तरह तो किसी काम में सिद्धि नहीं मिलेगी। पहले एक करो, फिर दूसरा, फिर तीसरा-इस तरह सब काम पूरे हो सकेंगे। नहीं तो सब अधूरे रह जाएंगे।

8. ऐसा जीवन तो विडंबना है जिसके लिए दिन-रात लड़ना पड़े।
यह क्या जीवन है कि आठों पहर नून तेल लकड़ी जुटाने में ही लगे हैं। लगातार मेहनत, सतत् संघर्ष। न सत्संग का अवकाश, न अपनों के साथ मिल बैठने का समय न प्रकृति का आनंद लेने का अवसर न प्रभु-चिंतन। उलटे, पेट पालने की चिंता, जिस पेट के लिए झूठ, धोखा और लड़ाई झगड़ा तक करते हो।

9. ओछे की प्रीत जैसे बालू की भीत
बालू की दीवार आज बनी कल गिर जाएगी। ठहर नहीं सकती। गारे चूने सीमेन्ट और ईंटों पत्थरों की हो। ऐसे ही ओछे टुच्चे आदमी की प्रीति है। स्वार्थ की मैत्री है। प्रीत प्रेम के आधार-हृदयों का जुड़ना, निष्ठा आदि हैं।

10. कमजोरी को मैं बुरा नहीं समझाता, मूर्खता को मैं माफ़ कर सकता हूँ, परन्तु बेईमानी मुझे तीर सी चुभती है- नेहरू
कमजोरी या मूर्खता अपने बस के दुर्गुण नहीं हैं। भगवान ने ऐसा बनाया है। परन्तु बेईमानी करना, न करना मनुष्य का अपना कर्म है। बेईमानी दोष है, अपराध है, पाप है। इसलिए बेईमानी को क्षमा नहीं किया जा सकता, वह असहनीय है।

11. करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान
कुछ लोग सहज प्रतिभा सम्पन्न होते हैं-होनहार बिरवान की तरह, कुछ की बुद्धि शुरू से ही इतनी तेज नहीं होती वे परिश्रम करके, बड़ों के संग में ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। लेकिन जिनकी बुद्धि जड़वत् है वे भी अभ्यास करते-करते ज्ञानी हो जाते है। अभ्यास करते रहने का बड़ा महत्त्व है। गाते-गाते लोग कलावंत हो जाते हैं। लिखते रहने का अभ्यास करने वाले सकल कवि और उपन्यासकार बन जाते हैं।

12. काजल को कोठरी में कैसोहू सयानो जाय एक लीक काजल की लागिहै सो लागिहै।
बुरों की संगति में बुराई हाथ आएगी ही। चोर हो, जुआरिया हो, गुंडा हो, नशेड़ी हो। उसकी संगति का प्रभाव पड़ेगा, अवश्य पड़ेगा।

13. का बरखा जब कृषी सुखानी
कोई हमारा काम वक्त पर करे तो उसका लाभ है, पर अवसर निकल जाए तो उस सहायता, उपकार या किसी तरह के काम का क्या लाभ? मरीज के दम तोड़ देने के बाद डाक्टर के पहुँचने का क्या मतलब? इसी तरह किसान की बात है, उसे तो समय पर वर्षा चाहिए।

14. कोयल होय न ऊजली सौ मन साबुन लाय
किसी के शरीर के अंग, उसका रंग-रूप अथवा किसी व्यक्ति का चरित्र या स्वभाव नहीं बदला जा सकता। हज़ार उपाय करें। यदि कोई असर होगा भी तो अस्थायी।

15. क्षीर-नीर विवरन को बक उघरत तेहि काल-तुलसी
बताया जाता है कि हंस दूध में मिले पानी को अलग कर देता है। यह अकेले हंस की पहचान है। बगुला ऐसा नहीं कर सकता। इसी प्रकार परीक्षण करके देखा जाता है कौन विद्वान है कौन ढोंगी है, कौन वीर है, कौन कायर है। झूठे और बनने वाले आदमी की पोल ऐसे ही खुलती है।

16. खाल ओढ़ाय सिंह की, स्यार सिंह नहिं होय
किसी डरपोक आदमी को शस्त्र पहना दें, वर्दी भी दे दें, तो वह वीरता नहीं दिखा सकता। किसी का कोई वेष बना दें तो उसमें इसी से वह गुण नहीं आ जाते। मौका पड़ने पर उसकी वास्तविकता प्रकट हो जायेगी।

17. चंदन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग
इसी प्रकार संत महात्माओं का संतपन या महात्मापन बुरे लोगों के बीच में भी नहीं जाता। दृढ़ चरित्र वाला व्यक्ति सभी परिस्थितियों में अपने चरित्र की रक्षा कर लेता है। धरती अपना धैर्य, समुद्र अपना गांभीर्य कभी नहीं छोड़ता।

18. चार दिन सुखद चांदनी रात और फिर अंधकार अज्ञात
सुख और मौज-बहार थोड़े समय तक रहते हैं धन भी एक-दो पीढ़ी तक रहता है। बाकी के दिन और बाकी की पीढ़ियाँ कितनी दु:खमय होंगी, कोई नहीं जानता। पर सुख के बाद दुख होगा अवश्य। उत्थान है तो पतन होगा ही।

19. चिंता और चिता में से चिंता अधिक दाहक है
पहले तो कहते आ रहे थे कि चिंता चिता समान है, परन्तु विचार करने पर लगता कि चिंता बहुत अधिक जला देने वाली है। चिता तो शव को जलाती है-एक घंटे दो घंटे में समाप्त और फिर वह तो ऐसे व्यक्ति के शरीर को जलाती है, जिसमें कोई जान नहीं, संवेदना नहीं, अनुभव है। परन्तु चिंता रोज़-रोज़ जलाती है और धीरे-धीरे क्षीण करती है जो बहुत दुःखदायी है।

20. चोर चोरी से गया तो क्या हेरी-फेरी से भी गया
जो लत पड़ गई, छूटती नहीं। सिगरेट पीने वाले, शराब पीने वाले, और तरह-तरह के व्यसनी और अपराधी या पापी लाख समझाने पर भी बाज नहीं आते। उपदेशों का असर होगा तो बहुत थोड़ा और अस्थायी।

21. जिसकी लाठी उसी की भैंस
जिसके पास शक्ति है वही अधिकार जमा लेता है। मकानों पर ऐसे लोग जबरदस्ती कब्जा कर लेते हैं। लोगों के स्कूटर छीन लेते हैं। गुंडों, लफंगों, बदमाशों, लुटेरों का राज है।

22. जीवन एक फूल है तो प्रेम उसकी सुगंध
काँटे से भी खराब है जिस गुल में बू न हो। फूल की सार्थकता उसके सुगंधित होने में है। इसी तरह जीवन की सार्थकता मानवमात्र से प्रेम का व्यवहार करने में है। प्रेम जीवन को सुखमय बनाता है। सुगंध वाले फूल गले का हार बनते हैं, देवता पर चढ़ते हैं। प्रेमी व्यक्ति भी लोगों में सम्मान पाता है। उसका जीवन धन्य हो जाता है।

23. जीवन को मर्यादित करने का सहज उपाय यह है कि मनुष्य नित्य कार्यों का पालन सावधानी से करे
मनुष्य के अनेक नित्य कार्य हैं-पुरुष कमाते हैं, घर से बाहर के काम करते हैं, घर का सामान जुटाते हैं. स्त्रियाँ घर का, रसोई का, बच्चों के पालन-पोषण का क्या काम करती हैं। फिर एक या दोनों किसी कार्यालय में कार्य करते हैं। जीवन में अनुशासन, मर्यादा और तदुत्पन्न संतोष और सुख लाने का सीधा सा उपाय है हर काम सावधानी से करें। असावधानी से बिगाड़ होता है। पछताना पड़ता है।

24. जो गरजते हैं वो बरसते नहीं
कई लोगों का कथनी और करनी में बड़ा अंतर होता है। बहुत से लोग बड़ी-बड़ी डींगे मारते हैं-यह कर देंगे, वह कर देंगे। लेकिन काम करने के समय हट जाते हैं। हम उसकी खबर लेंगे, हम उसको ऐसा सीधा करेंगे कि याद रखेगा। लेकिन सामने आने पर घिग्धी बँध जाती है।

25. झूटे का मुँह काला, सच्चे का बोलबाला
झूठ कभी-न-कभी, किसी-न-किसी तरह खुल जाता है तो झूठा आदमी, शर्मिंदा होता है। उसकी बदनामी हो जाती है, कोई उसका विश्वास नहीं करता। सच्चा आदमी संतुष्ट रहता है, उसका विश्वास जमता है, जिससे उसको सफलताएँ प्राप्त होती हैं। 26. तलवार का घाव भर जाता है, पर बात का घाव नहीं भरता ।
बात का अर्थ यहाँ कड़वी बात है। तलवार का घाव मरहम-पट्टी करने से अच्छा हो - जाता है, परन्तु कड़वी बात, कोई चुभता व्यंग्य, कोई अपमान सदा ताजा रहता है। इसकी चुभन जीवन भर सालती रहती है, वैर पनपता रहता है।

27. तेते पाँव पसारिये जेती लाँबी सौर
अपनी चादर के बाहर पाँव पसारे जाएँ तो ठंड लगेगी, मच्छर काटेंगे। अपनी चादर के अंदर रहने में सुख है। अपनी आमदनी के अंदर खर्च करना अच्छा है, नहीं तो ऋण चढ़ता है, आदमी चिंतित और दुःखी रहता है। अपनी शक्ति के अनुसार किसी काम का जिम्मा लेना चाहिए। विवाह शादी पर जो लोग अपनी सामर्थ्य से बाहर काम करते हैं वे बाद में दुःखी होते हैं।

28. दुख में हरि को सब भजें सुख में भजे न कोय, जो सुख में हरि को भजे तो दुःख काहे को होय।
(इसका अर्थ स्पष्ट है)। प्रायः लोगों का यही स्वभाव है कि दुःख पड़ने पर परमात्मा को याद करते हैं। सदा उसका सिमरन करें तो दु:ख हो ही न।

29. धारण करने में धरती और धर्म है, स्नेह और दया चंद्र है, चित्त के विस्तार में आकाश है
धरती वह है जो धारण करती है, सब जीव इस पर रहते हैं, उनका पाल-पोषण करके उनकी रक्षा करती है। धर्म भी हमें धारण करता है। धर्म न हो तो हम काम न कर सकें। अथवा, हम जो धारण करते हैं, मन में निश्चय कर लेते हैं वह धर्म है। चंद्र में जो शीतलता है, स्नेह है, वह हममें शान्ति उत्पन्न करता है। आकाश विस्तार है जिससे हम चित्त के विस्तार की प्रेरणा पाते हैं।

30. धीरज धर्म मित्र अरु नारी आपत काल परखिए चारी
जब मनुष्य पर प्रायः विपत्ति आती है तो धैर्य नहीं रह पाता। धर्म को आदमी कोसता है, मित्र साथ नहीं देते। कभी-कभी नारी भी छोड़ जाती है-बड़े-बड़े शहरों में ऐसे किस्से सुनने में आते हैं। परन्तु इन चारों की परख तभी होती है कि पक्का कौन है-वही जो साथ न छोड़े।

31. न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी
ऐसी शर्त रख देना कि पूरी हो ही न। शादी में इतना दहेज माँगा कि लडकी वाले दे न पाए तो संबंध नहीं बना। नौकरी दिलाने में ऐसी शर्त लगा दी कि उम्मीदवार पूरी न कर सका। स्कूल में बच्चे को दाखिल कराने, नौकर को छुट्टी देने, बच्चे को मेले पर जाने आदि में यह यह शर्त रख देना।

32. नरकृत सब शास्त्रों के बंधन, हैं नारी को ही लेकर
शास्त्रों में नारी पर अनेक बंधन लगाए गए हैं-वह पति को देवता समझे, सास-ससुर की सेवा करे। वह स्वतंत्रता के योग्य नहीं, पहले माँ-बाप को, फिर पति के और फिर पुत्रों के अधीन रहे, आदि-आदि जितने नियम नारियों के बारे में बनाये गए हैं वे पुरुषों द्वारा बनाए गए हैं-नारी को चरणों की दासी बनाने के लिए। यदि नारियाँ कोई शास्त्र बनाती , तो नियम कुछ और से होते।

33. नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं, प्रभुता पाय जाहि मद नाहीं
मंत्रियों को ही देख लें। कितना घमंड, कितनी अकड़ आ जाती है कि सगै रिश्तेदारों, पुराने मित्रों को पहचानने से भी इन्कार कर लेते हैं। जब कोई धनी हो जाता है, कोई अधिकार पा जाता है, तो वह और का और हो जाता है। उसमें अहंकार आ जाता है।

34. नारी तुम केवल श्रद्धा हो
सब के प्रति श्रद्धा-पति, पुत्र, घर-द्वार, परिवार। कितनी श्रद्धा से अपने कर्तव्यों का पालन करती है। जहाँ देखा जाता है कि पुरुष भ्रष्टाचार करते हैं, सरकार स्त्रियों को लगा देती है। दूसरी बात-तुम श्रद्धास्पद हो, श्रद्धा का रूप हो। श्रद्धा बड़ों के प्रति होती है-तुम महान हो। तुम्हारे त्याग को नमस्कार।

35. परहित सरिस धर्म नहिं भाई
धर्म के कई कार्य और लक्षण बताये जाते हैं, जैसे धैर्य, क्षमा, आत्मनिग्रह, चोरी न करना, सच बोलना, क्रोध न करना। अहिंसा परमो धर्मः। परन्तु परोपकार के समान कोई और धर्म नहीं है। परोपकारी हिंसा नहीं कर सकता, चोरी नहीं करेगा, शत्रु का भी भला करेगा, क्रोध तो करेगा ही नहीं। इसलिए सारे धर्म परहित या परोपकार के अंदर आ जाते हैं।

36. पराधीन सपनेहु सुख नाहीं।
कर्म की स्वतंत्रता वाणी की स्वतंत्रता, विचारों की स्वतंत्रता ही तो मनुष्य मात्र पशु है। उसे रस्सी बाँधकर कहीं ले चलो, कहीं बंद कर दो। दासता एक महान् क्लेश है, न आराम से बैठने का सुख, न कहीं जाने की आजादी। जो मालिक दे दे, जितना दे दे, उसी में संतोष कर लो। दिन-रात ड्यूटी दो। यही बात देश पर भी सही उतरती है। न बाहर के किसी देश से संबंध रख सकते हैं, न किसी से व्यापार कर सकते हैं। पराधीन भारत ने क्या-क्या दु:ख नहीं सहे।

37. परिवर्तन ही जीवन है।
किसी प्राणी को देख लो, छोटा है, थोड़ा और बड़ा, फिर प्रौढ़। पेड़-पौधों में जीव है जिसकी पहचान यह है कि वह परिवर्तित होता चलता है। मनुष्य शिशु है, बच्चा फिर किशोर, तरुण, युवा, प्रौढ़, वृद्ध। निर्जीव पदार्थ ऐसे परिवर्तित नहीं होते। फिर जब हम घर में, बैठक में, सोने के कमरे में, कहीं, थोड़ा-बहुत परिवर्तन कर देते हैं तो उसमें जान आ जाती है। परिवर्तन न हो तो निर्जीव है, जीवन का मज़ा ही नहीं।

38. बरु भल वास नरक कर ताता, दुष्ट संग जनि देहि विधाता
हे विधाता, हे मेरे पिता परमेश्वर, भले ही मुझे नरक में निवास करने का दंड दे देना पर दुष्ट की संगति में कभी न डालना। दुष्ट आदमी सदा धोखा, बेईमानी, शरारत करता रहेगा, दुःख ही देगा। नरक की अग्नि में जल जाएँगे तो अच्छा, रोज़-रोज़ दुष्ट के हाथों दु:ख पाना सहनीय नहीं होगा। न जाने दुष्ट क्या कर दे।

39. बल, बुद्धि और धन का अनुचित प्रयोग नहीं करना चाहिए।
बल हो तो निर्बलों की रक्षा करो, अत्याचारियों पर अपना बल दिखाओ, न कि अत्याचार करते फिरो। बुद्धि हो तो भाई-बहनों को अच्छी सलाह दो, समाज के कल्याण की सोचो न कि किसी के विरुद्ध षडयंत्र करने की सोचो, न ही ऐसी योजनाएँ बनाते फिरो जिससे किसी का बुरा हो। धन है तो अच्छे काम के लिए दान करो, न कि जुआ खेलो, शराब पियो, और बुरे-बुरे कामों में खर्चा करते फिरो।

40. बाप भला न भइया, सब से भला रुपइया।
आज के युग में विशेष करके यही कुछ देखने में आ रहा है कि पैसा ही सब कुछ है। इसके कारण माँ-बाप, भाई-बहनों से झगड़े हो जाते हैं, हत्याएँ तक होती हैं। जायदाद के बँटवारे पर लड़ मरते हैं। समझते हैं कि बाप या भाई हमारा क्या भला करेगा, पैसे से तो हम बहुत कुछ खरीद सकते हैं। सब सुख पैसे से है।

41. बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध ले
जो हो गया सो हो गया। अब कुछ अन्यथा नहीं लिया जा सकता। दु:खी रहने से कोई लाभ नहीं है। कुछ खो गया, कोई गलती हो गई, किसी से झगड़ा हो गया या कुछ और भूल जाना अच्छा है। अच्छा यही है कि आइंदा के लिए सावधान हो जाओ ताकि फिर ऐसा न होने पाए। अतीत पर अब तुम्हारा कोई वश नहीं रहा, भविष्य तुम्हारे बस में है।

42. बोये पेड़ बबूल के आम कहाँ से होय
आदमी जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल पाता है। बुरे का बुरा फल, अच्छे का अच्छा फल। पाप का फल दुःख, पुण्य का फल सुख। जैसी करनी वैसी भरनी। कर्म से प्रारब्ध भाग्य, अगली योनि। कर्म से वर्तमान और भविष्य बनता-बिगड़ता है। आम का पेड़ बोने से आम ही मिलेगा-मीठा फल। कई तरह के आम के पेड़ तो कई तरह के अच्छे फल। लेकिन बबूल का पेड़ बोने से तो काँटे ही हाथ लगेंगे।

43. भय बिन होय न प्रीति
नीति की बात है। आप चाहते हैं किसी आदमी या शत्रु से मनमुटावा जाता रहे, आप की बात मान ले। शान्ति से प्रस्ताव कर चुके, नहीं माना, धमकी दी नहीं माना। फिर रह जाता है भय। भय दिखाने या भयभीत कर देने से वह मानेगा। वैसे नहीं मानेगा। समुद्र राम को रास्ता नहीं दे रहा था, हाथ-पैर जोड़ लिये। तब राम ने अन्तिम उपाय निकाला-भय।

44. भा विधना प्रतिकू जवै, तब ऊँट चढ़े पर कूकर काटै
जो भाग में बदा है, वह होकर रहेगा। बताया गया है कि परीक्षित को सांप काटेगा। उसने सरोवर में महल बनवा लिया। परन्तु फूलों में ही साँप आ गया और उसने राजा परीक्षित को काट खाया। जब विधाता प्रतिकूल होता है, अर्थात् जब किस्मत बुरी होती है, तो भले ही ऊँट पर चढ़कर बैठ जाओ, कुत्ता काटेगा तो काटेगा ही। होनी बलवान है।

45. मनुज तू सृष्टि श्रृंगार
संसार में भाँति-भाँति के जीव हैं। जो गुण मनुष्य में हैं। जैसी प्रतिभा मनुष्य की है वैसे गुण, वैसी प्रतिभा, बुद्धि किसी जीव में नहीं। मनुष्य ने क्या-क्या नहीं किया। कल्पना कीजिए प्रागैतिहासिक काल में यह धरती कैसी रही होगी। जीव और उनके बीच में मनुष्य कैसे रहते होंगे, और युग-युग में बढ़ते हुए मनुष्य ने क्या कर डाला है। अद्भुत ! मनुष्य परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ कृति है।

46. महत्वाकांक्षा का मोती निष्ठुरता की सीप में पलता है
सीप कठोर होती है और उसमें एक मोती कैसे पलता है, इसी प्रकार महान् बनने की आकांक्षा या चाह मनुष्य के कठोर बनने से पनपती है। अपने से कठोरता बरतने से वह परिश्रम करेगा, किन्हीं नियमों का कड़ाई से पालन करेगा तो महत्त्वाकांक्षा को बल मिलेगा और घर-परिवार या समाज के प्रति कठोर होगा तो अपने कर्त्तव्य में शिथिल नहीं होगा और अपना स्थान निश्चित करेगा। समाज उसकी निंदा करेगा, रोड़े अटकाएगा तो उसका जवाब देगा। नैपोलियन और हिटलर के उदाहरण।

47. यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः
मनुष्य का कर्त्तव्य है कर्म करना, फल देना भगवान् के हाथ में है। यह हो सकता है कि आदमी के यत्न करने पर भी सिद्धि नहीं मिलती; उलटा दु:ख प्राप्त होता है। तब वह किस्मत को कोसने लगता है। यह तो अजीब बात है। यत्न करने पर भी यदि सफलता न मिले तो सोचना चाहिए कि क्या दोष रह गया। कोई कसर अवश्य रह गई, कोई गलती हमी से हो गई। तब तो आइंदा के लिए सावधानी बरती जाएगी।

48. रघुकुल रीति यही चली आई प्राण जायँ पर वचन न जाई।
दशरथ ने कैकेयी को दो वरदान दिये थे। अब मौका पाकर वे दोनों वचन पूरे करने के लिए दशरथ से कहा। रघुकुल तिलक दशरथ इन्कार नहीं कर सकते थे। पूरे करने पड़े। रघुवंश की यही मर्यादा थी। इस प्रकार हम सब का आदर्श या धर्म हो गया कि प्राण भले ही चले जायं पर वचन अन्यथा नहीं हो। राजा हरिश्चंद्र ने वचन दिया, पुत्र और स्त्री देकर भी उसे पूरा किया।

49. राजहंस बिन को करे नीर-क्षीर को दोय ।
जो व्यक्ति किसी कार्य को करने योग्य होता है, वही उसे कर सकता है, दूसरा नहीं। उदाहरण-कोई झगड़ा हो जाए तो उसका निपटारा एक सयाना आदमी ही कर सकता है। वही जान सकता है कि सच्चा कौन है, झूठा कौन है।

50. लघुता से प्रभुता मिलै प्रभुता से प्रभु दूर
छोटा होने में बड़ाई है, और अपने को बड़ा समझने वाले से भगवान दूर हो जाता है। कृष्ण ने यज्ञ में नौकर या भृत्य का काम संभाला था। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने एक युवक को कुली न मिलने पर उसका सामान उठाकर उसका काम कर दिया। भगवान् के निकट आने के लिए भी आत्म-निवेदन करना होता है, विनय, विनती, प्रार्थना करनी होती है, दास भाव से प्रभु का पाना होता है। प्रभुता पाकर तो अहंकार आ जाता है।

51. लड्डू कहे मुँह मीठा नहीं होता
कथनी से करनी का महत्त्व है। बातों से पेट नहीं भरता। काम तो करने से होता है। कई लोग बहुत बढ़-चढ़कर बातें बनाते रहते हैं। लेकिन काम के वक्त पीछे हट जाते हैं।

52. वक्त पड़े पर जानिए को बैरी को मीत
हम किसी को अपना समझते रहते और किसी दूसरे को बैरी। लेकिन होता यह कि जब परख का मौका आता है तो वैरी सज्जन सिद्ध होता हो और मित्र वैरी, झूठा और बेवफा।

53. वा सोने को जारिए जिससे फाटे कान
ऐसी वस्तु भले ही कितनी ही कीमती क्यों न हो, यदि दु:खदायी है, तो उसे त्याग देना चाहिये। लड़का बदचलन और बदमाश निकल गया, उसे अलग कर देना चाहिये क्योंकि उससे परिवार की बदनामी हो रही है। माना कि वह इकलौता बेटा है, पर माँ-बाप के लिए वह कलंक है। जाये अपना खाए-कमाए। अपनी करनी का फल आप भोगे।

54. विपति कसौटी जे कसे वे ही साँचे मीत
सच्चे मित्र की यह पहचान है कि मुसीबत पड़ने पर काम आता है। उसकी परीक्षा तभी होती है।

55. वैर क्रोध का अचार या मुरब्बा है
किसी फल का अचार या मुरब्बा डाला जाए तो उस फल को मिर्च-मसाला और गुड़चीनी डालकर पकाया जाता है। इसी तरह क्रोध में जब बातों में मिर्च-मसाला लगाकर उसे पकाते हैं । भड़काते हैं तो वह वैर का रूप ग्रहण करता है। क्रोध तो क्षणिक है, लेकिन वैर बनकर वह पक्का हो जाता है। इसलिए क्रोध क्षणिक ही रहे तो अच्छा।

56. सच्चा प्रेम वही है जिसकी तृप्ति हो आत्मत्याग पर निर्भर
प्रेम तो त्याग माँगता है। प्रेमी को अपना सब कुछ न्यौछावर करना पड़ता है। जो तोहि प्रेम खेलन का चाव/सिर धर थली कली मोरी आव। प्रेम में स्वार्थ नहीं, सच्चा प्रेम स्वार्थ भावना के त्याग में है। तभी उसकी सार्थकता है। नहीं तो वह झूठा है। प्रेमी को संतोष तभी होता है, तृप्ति होती है जब वह अपनी इच्छित वस्तु या प्राणी के लिए आत्मसमर्पण कर देता है।

57. सठ सुधरहिं सत्संगति पाई
सत्संग की महिमा सभी धर्मग्रन्थों में बराबर चर्चित होती रही है। बुरी संगति को यदि कोई नहीं छोड़ता तो उसके चरित्र में सुधार नहीं हो पाएगा। लेकिन यदि वह सत्पुरुषों का संग करेगा तो उस पर धीरे-धीरे उनके व्यक्तित्व का उनके उपदेशों का प्रभाव पड़ेगा ही। वह अवश्य सुधर जाएगा। बड़े-बड़े चोर डाकू किसी सत्पुरुष की वाणी सुनकर ही अपने कुकृत्य छोड़ देते हैं। फिर सुधार का कोई और ढंग भी तो नहीं है। यही अमोक्ष उपाय है।

58. समय पाय तरुवर फले केतिक सींचो नीर
हर पेड़ अपने वक्त पर फल देता है। आम गर्मियों में, अमरूद सर्दियों में। ऐसा नहीं हो सकता कि आप खूब पानी दें और अगले दो महीने में फल देने लगे। तुम लाख उपाय करते फिरो, काम अपने समय पर ही होगा। उतावला होने से कोई लाभ नहीं होगा। परीक्षाफल है, बच्चे का माँ के पेट से जन्म है, आपका बी० ए० करके नौकरी पाने की चाह है, आदि सब समय पर होगा। धैर्य चाहिए।

59. सर्वे गुणाः कांचनमाश्रयन्ति
धनी आदमी बड़ा माना जाता है-वह धर्म सभा का अध्यक्ष, साहित्य समिति का संरक्षक, खेल, प्रतियोगिता में मुख्य अतिथि होने के योग्य होता है। उसकी गवाही जज भी मान लेगा, वह कोई अपराध करने पर शायद छूट भी जाएगा। पैसे की महिमा है। पैसे वाले आदमी में सब गुण होते हैं।

60. स्वाधीनता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है-तिलक
प्रकृति में सव स्वाधीन हैं। जन्म से ही वे किसी गैर के अधीन नहीं हो जाते। हम उन्हें अपने हित के लिए, स्वार्थवश भले ही अपने बस में कर लेते हैं और उनके कृत्रिम, अप्राकृतिक घर बनाकर उन्हें अपनी कैद में रखते हैं। इसी तरह हर जाति को अपनी मातृभूमि पर अपना राज्य स्थापित करने का अधिकार है। किसी और जाति का यह अत्याचार है कि वह किसी दूसरी जाति को अपने अधीन कर रखे।

61. हमें दार्शनिक नहीं, अच्छे कारीगर चाहिए-नेहरू
दार्शनिक लोग विचारशील होते हैं। हमें विचार नहीं चाहिए। विचार हमारे पास बहुत है। हमें विचारों को कार्यान्वित करने वाले लोगों की आवश्यकता है। इंजीनियरों, मिस्त्रियों, कलाकारों, कारीगरों की, जो देश का निर्माण कर सकें। हमें पुल बनाने वालों, सड़कें बनाने वालों, इमारतें खड़ी करने वालों, कारखाने खोलने वालों की जरूरत है।

62. हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश विधि हाथ
आदमी बहुत मेहनत करता है, किन्तु उसका फल उलटा हो जाता है और कभी कोई काम ऐसा हो पड़ता है कि लगता है हानि हो जाएगी लेकिन अचानक कोई कारण बन जाता है जिससे लाभ प्राप्त हो जाता है। इसी तरह कोई नहीं कह सकता कि वह कल जिन्दा रहेगा या नहीं। किसी काम से उससे यश मिलेगा या नहीं। वही होता है जो विधाता चाहता है। मनुष्य के हाथ में कुछ नहीं।

63. होनहार बिरवान के होत चीकने पात
छोटे पौधों के पत्ते चिकने हों तो समझा जाता है कि वह अच्छा पेड़ बनेगा। हर जीव की-पशु-पक्षी की विशेषता-बचपन में ही उसके लक्षणों से पहचान कर ली जाती है कि ये आगे चलकर कैसा होगा। इसी तरह बचपन से ही महापुरुषों के से लक्षण मिलने लगते हैं। दयानन्द, गाँधी, बुद्ध, कृष्ण, राम, अरविन्द, सुभाष, जवाहरलाल ऐसे ही बच्चे थे तो जाना गया था कि वे क्या होंगे? किसी बच्चे का माथा ही देखकर लोग बता देते हैं कि यह कोई महापुरुष है।

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