पर्यावरण (Environment) परिभाषा, विशेषताएँ, प्रकार, संरचना और संघटक | paryavaran

पर्यावरण (Environment)

पृथ्वी के उद्भव के बहुत बाद में पर्यावरण का निर्माण हुआ। इसके निर्माण की प्रक्रिया नितान्त मन्द गति से अनवरत सक्रिय रही। अनेक भौतिक एवं अभौतिक तत्वों का निर्माण तथा इनके मध्य उत्पन्न सम्बन्ध से पर्यावरण धीरे-धीरे मूर्त रूप धारण करता गया। वायुमंडल का निर्माण एवं इसकी घटनायें पर्यावरण के निर्माण एवं विकास में निरन्तर सहयोग देती रहीं कालान्तर में भू-तल पर एक भौतिक पर्यावरण का निर्माण हो गया।

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इस पर्यावरण के मध्य मानव जैसा एक विशिष्ट प्राणी उत्पन्न हुआ। यही एक ऐसा प्राणी है जो चिन्तन, कृतित्व एवं व्यक्तित्व से परिपूर्ण है। वह अपने तथा समस्त जैविक-अजैविक संघटकों के विषयों में सोच सकता है। पर्यावरण के उपादानों का उपयोग एवं उनकी सुरक्षा कर सकता है। पर्यावरण ने मानव को बहुत कुछ दिया है जिससे एक उत्कृष्ट मानव-संस्कृति उद्भत हुई है। परन्तु मानव स्वार्थ से अन्धा होकर पर्यावरण के विनाश में संलग्न है। पृथ्वी का उद्भव, उसका शीतलन, वायुमंडल का निर्माण, वनस्पति एवं जीवों की उत्पत्ति आदि कालान्तर की सक्रिय प्रक्रिया से पर्यावरण का निर्माण हुआ। प्रारम्भ में पर्यावरण नितान्त निर्बल था। धीरे-धीरे सघन एवं मौलिक होता गया, अनेक प्राकृतिक नियम पर्यावरण में संचालित होने लगे। सभी ने परस्पर सम्बद्ध होकर पर्यावरण को मौलिक स्वरूप प्रदान किया।
जैसे कि जीवित जीव घिरा हुआ है, प्रश्न यह उठता है किसके द्वारा और कहाँ ? स्पष्ट है जीवित जीव भौतिक गुणों के द्वारा स्थान या निवास क्षेत्र पर घिरा हुआ है। इस प्रकार, किसी स्थान विशेष में मनुष्य तथा जीवित जीव के चारों ओर घिरे भौतिक आवरण को पर्यावरण कहा जा सकता है। सी.पी. पार्क के अनुसार, 'पर्यावरण का अर्थ उन दशाओं के योग से होता है जो मनुष्य को निश्चित समय में निश्चित स्थान पर आवृत्त करतीं हैं'। आदि काल या प्रारम्भ में मनुष्य के पर्यावरण की रचना केवल भौतिक पक्षों तथा जैविक समुदायों द्वारा ही होती थी परन्तु समय के साथ-साथ मनुष्य ने अपने बदलते सामाजिक स्वरूप को विस्तृत और विकसित किया जिससे मनुष्य के लिए पर्यावरण का अर्थ बदलता गया। अतः मनुष्य के पर्यावरण में अब भौतिक पर्यावरण के साथ सामाजिक पर्यावरण, आर्थिक पर्यावरण, राजनैतिक पर्यावरण, सांस्कृतिक पर्यावरण आदि सम्मिलित हो गये।
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इको चिन्हः भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा मिट्टी के घड़े के रूप में स्थापित यह चिन्ह ऐसे उत्पादों के लिए दिया जाता है जिसका उत्पादन और उपयोग पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता लाने के लिए सरकार द्वारा चलाया जा रहा अभियान है।

इकोब्लब: किशोरो में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता लाने के लिए सरकार द्वारा चलाया जा रहा अभियान।


पर्यावरण की विभिन्न परिभाषाएँ

  • फिटिंग के शब्दों में "पर्यावरण किसी जीवधारी को प्रभावित करने वाले समस्त कारकों का योग है।'' (Environment is the sum total of all the factors that inefluence an organism-Fitting)
  • हरकोविट्ज के अनुसार, "किसी जीवित तत्व के विकास चक्र को प्रभावित करने वाली समस्त बाह्य दशाओं को पर्यावरण कहते हैं।" (Envrionment is the sum total of all the external conditions and its influences on the external conditons and its influences ont he development cycle of biotic elements-Herkovitz)
  • रॉस ने लिखा है, "पर्यावरण एक वाह्य शक्ति है जो हमें प्रभावित करती है।" (Environment is an external force which influences us.- Ross)
  • डेविस ने पर्यावरण को मूर्त वस्तु न मानकर अमूर्त वस्तु मानी है। (Environment does not refer to anything tangible but to an abstraction.-Devis)
  • वर्तमान समय में पारिस्थितिविद् Environment शब्द के स्थान पर habiat अथवा Milieu शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं, जिसका तात्पर्य समस्त परिवृत्तित है। पार्क, ने स्पष्ट किया कि पर्यावरण उन सभी दशाओं का योग है जो मानव जाति को निश्चित समयावधि में स्थित नियत स्थान पर आवृत्ति करती है।

पर्यावरण का अध्ययन क्यों?

मानव और पर्यावरण का अन्योन्याश्रित है। पर्यावरण हमें विविध विकास की ऊँचाइयों को छूने हेतु प्रयत्नरत है, किंतु इस अंधी दौड़ में हमने अपने संसाधनों का अनियोजित उपयोग और दुरूपयोग किया है। इस कारण पर्यावरण पर दो दबाव उत्पन्न हुआ है उससे पर्यावरण का संतुलन डगमगा गया है। पर्यावरण संबंधी अनेक विसंगतियाँ उत्पन्न हो गई है, जिनसे न केवल कई मानवेत्तर प्रजातियाँ विलुप्त होती जा रही है बल्कि मानव के अस्तित्व पर भी भविष्य में प्रश्नचिन्ह लगने जैसी स्थिति उत्पन्न होने की सम्भावनाएँ प्रबल हो गई है। इसलिए पर्यावरणविदों का ध्यान विकास प्रक्रिया के पर्यावरणीय विश्लेषण की ओर गया है। मूल रूप से पर्यावरण और विकास दोनों एक-दूसरे के पूरक है।
इनका उद्देश्य संतुलित पारिस्थितिक समन्वय के साथ सतत विकास करना है। पर्यावरण अध्ययन वातावरण के गुणों और उनके बीच असंतुलन के कारण उत्पन्न समस्याओं के मध्य अर्न्तसम्बन्धों का मूल्यांकन है।

इस दृष्टि से पर्यावरण अध्ययन के निम्नलिखित उद्देश्य है-
  1. पर्यावरण संबंधी विविध पक्षों की जानकारी प्रदान करना।
  2. पारिस्थितिक प्रणालियों का ज्ञान कराना।
  3. पारिस्थितिक प्रणालियों की समस्याओं की जानकारी प्रदान करना।
  4. पर्यावरणीय क्रियाओं के प्रभाव की जानकारी प्रदान करना।
  5. पर्यावरण असंतुलन और उसके प्रभावों का ज्ञान कराना।
  6. पर्यावरण संरक्षण हेतु विविध उपायों की जानकारी देना।
  7. पर्यावरण के प्रति जागरूकता उत्पन्न कराना।

पर्यावरण का अध्ययन क्षेत्र

पर्यावरण अपने अन्दर चार बड़े खण्डों को समाहित करता है
  1. वायुमण्डल
  2. जलमण्डल
  3. स्थलमण्डल
  4. जैव मण्डल

वायुमण्डल

  • वायुमण्डल अपनी गैसों द्वारा पृथ्वी के चारों ओर एक रक्षात्मक ब्लैंकेट की तरह कार्य करता है। जिससे पृथ्वी पर जीवन बना रहता है।
  • अंतरिक्ष के विपरीत पर्यावरणीय प्रभाव से बचता है।
  • यह वाह्य अन्तरिक्ष की अधिकतर ब्रह्माण्डीय किरणों को तथा सूर्य को विद्युत चुम्बकीय करणों को अवशोषित कर उनके दुष्प्रभाव को नगण्य करता है।
  • यह यहाँ पर केवल अल्ट्रावायलेट, दृश्य, लगभग अवरक्त किरणें (300 से 2500 एन.एम) और रेडियों तरंगो को ही प्रसारित होने देता है। जबकि 300 एनएम से कम की अल्ट्रावायलेट किरणों को अवशोषित कर लेता है जो समस्त जीवित जीव को हानि पहुँचा सकती है।
  • वायुमण्डल, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन से बना है। कुछ अन्य गैस जैसे-आर्गन कार्बन डाईआक्साइड और संकेतिक गैसें।

जलमण्डल

  • जलमण्डल में सभी प्रकार के जल संसाधनों को शामिल करते है जैसे महासागर, सागर, झीलें, नदियाँ, जलाशय, ध्रुवीय बर्फ, हिमानी और धरातलीय जल।
  • पृथ्वी के पानी का 97% महासागरों में।
  • 2% पानी हिमनदों और ध्रुवीय क्षेत्रों में है।
  • केवल 1% पानी नदियों और झीलों और धरातलीय पानी मानव के उपयोग के लिए उपयुक्त है।

स्थलमण्डल

यह पृथ्वी के तीन मुख्य पतों में सबसे बाहरी पर्त है जिसमें पृथ्वी के दूसरे भाग मेण्टल के बाहरी भाग और पृथ्वी के उपरी परत क्रस्ट को सम्मिलित करते है। यह खनिजों का स्रोत तथा जीवों, प्राणियों, वायु और जल आदि इसी से
सम्बन्ध रखते है।

जैवमण्डल

  • जीवमण्डल रहने वाले जीवों के स्थानों को इंगित करता है तथा इसके पर्यावरण के साथ जैसे स्थलमण्डल, वायुमण्डल, जलमण्डल के साथ अन्त:क्रिया को दर्शाता है।
  • पर्यावरण अध्ययन में मानव तथा प्रकृति का पारस्परिक सम्बन्धों एवं अर्न्तक्रियाओं का भी अध्ययन प्रमुखता से किया जाता है। पर्यावरण अध्ययन की प्रकृति बहु-विषयक होने के कारण ये समस्या अध्ययन वैज्ञानिक तथा मानविकी के दृष्टिकोणों से किये जाते हैं। पर्यावरण अध्ययन के विषय क्षेत्र का निरन्तर विकास हो रहा है और आज इसका अध्ययन कई मानवीय विषयों के साथ-साथ शुद्ध विज्ञानी विषयों को भी आच्छादित कर रहा है। जैसे-वनस्पति विज्ञान, जन्तु विज्ञान, रसायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान आदि। इस प्रकार हम देख सकते है कि वर्तमान में पर्यावरण का अध्ययन क्षेत्र काफी बृहद रूप में फैल चुका है।

पर्यावरण के तत्व

पर्यावरण का निर्माण भौतिक, जैविक और सांस्कृतिक तत्वों के अंतरक्रिया पद्धति के द्वारा हुआ है जो आपस में विभिन्न तरीकों से सम्बन्धित हैं, व्यक्तिगत के साथ-साथ सामूहिक रूप से भी इन तत्वों को निम्न रूप में समझाया जा सकता है-

भौतिक तत्व

भौतिक तत्व जैसे-अंतरिक्ष, स्थलाकृतियाँ, जलराशियाँ, मिट्टी, चट्टान, खनिज आदि। ये तत्व मानव अधिवासों के विभिन्न लक्षणों को निर्धारित करते हैं। ये उपलब्धि के साथ-साथ सीमा का भी निर्धारण करते हैं।

जैविक तत्व

जैविक तत्व जैसे कि पादप, जन्तु, सूक्ष्म जीव और मानव जो एक जैवमण्डल का निर्माण करते है।

सांस्कृतिक तत्व

सांस्कृतिक तत्व जैसे कि आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक तत्व जो महत्वपूर्ण मानवीय रूप है जो सांस्कृतिक आधिवास बनाता है।

पर्यावरण की संरचना एवं प्रकार

सम्पूर्ण पर्यावरण की संरचना में तीन तत्व महत्त्वपूर्ण हैं- भौतिक, जैविक और सामाजिक सांस्कृतिक। इन्हीं संरचनात्मक तत्वों के आधार पर पर्यावरण को तीन वर्गों में विभक्त किया गया है-
  1. भौतिक पर्यावरण
  2. जैविक पर्यावरण
  3. सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण

भौतिक पर्यावरण

भौतिक पर्यावरण प्राकृतिक तत्वों का अन्योन्याश्रित पुंज है जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव मानव एवं समस्त प्राणियों के समस्त क्रियाकलापों पर पड़ता है।
इस भौतिक पर्यावरण के तीन वर्ग है
  1. स्थलमंडलीय पर्यावरण (Lethosphere): पर्यावरण का वह भाग जिसमें रेत, मिट्टी, चट्टाने आदि हैं और जो पेड़-पौधों का पोषण करता है।
  2. जल मंडलीय पर्यावरण (Hydrosphere): पर्यावरण का वह भाग जिसमें जल स्थित है।
  3. वायुमंडलीय पर्यावरण (Atmosphere): स्थलमंडल तथा जलमंडल के ऊपर लगभग 300 किलोमीटर तक फैला हुआ गैसीय वातावरण।

जैविक पर्यावरण

पृथ्वी की सतह से लगभग 10 किलोमीटर नीचे और 10 किलोमीटर ऊपर धरती, पानी और वायु का हिस्सा ही जैविक पर्यावरण है जिसे जीवमंडल (Biosphere) भी कहते। जीवमंडल के संदर्भ में पर्यावरण का तात्पर्य उस समूची भौतिक एवं जैविक व्यवस्था से है जिसमें जीवधारी रहते हैं, विकास करते हैं और अपनी स्वाभाविक प्रवृत्तियों के अनुसार क्रियाकलाप करते हैं।
जैविक पर्यावरण के दो वर्ग हैं:
  1. वानस्पतिक (Botanical) पर्यावरणः इसके अन्तर्गत समस्त प्रकार के पेड़-पौधे, वनस्पतियाँ आदि आती है।
  2. जन्तु (Zoological) पर्यावरणः धरती के समस्त पशु-पक्षी, कीट, सरीसृप, मत्स्य एवं मनुष्य जन्तु के अन्तर्गत आते हैं।

सामाजिक सांस्कृतिक पर्यावरण

सामाजिक सांस्कृतिक पर्यावरण का सम्बन्ध प्रमुख रूप से मनुष्य जाति से है। वैसे अन्य जीवधारी भी अपने समाज का निर्माण करते हैं परन्तु श्रेष्ठ प्राणी होने के कारण मनुष्य अपने समूहों, समुदायों, रूढ़ियों, परम्पराओं, आदर्शों, मूल्यों तथा सामाजिक विरासत को लेकर एक सामाजिक सांस्कृतिक पर्यावरण का निर्माण करता है।
इस सामाजिक सांस्कृतिक पर्यावरण के कई वर्ग हैं जिसमें से प्रमुख निम्नवत् हैं
  1. सामाजिक पर्यावरण (Social Environment): समस्त जीवधारी अपनी प्रजाति के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर अन्त:क्रिया करते हुए, समाज का निर्माण करते हैं, जिससे सामाजिक पर्यावरण बनता है।
  2. आर्थिक पर्यावरण (Economical Environment): अन्य जीवधारियों की भाँति मनुष्य भी अपने सम्बर्द्धन हेतु प्रकृति/भौतिक पर्यावरण से भौतिक पदार्थों को प्राप्त करता रहता है। भौतिक पर्यावरण से इस प्रकार पदार्थों को प्राप्त करने की क्रिया से आर्थिक पर्यावरण निर्मित होता है। वह स्वबुद्धि एवं प्रौद्योगिकी द्वारा संसाधनों का दोहन एवं उपयोग करता है और आर्थिकी का सृजन करता है।
  3. प्राविधिक पर्यावरण (Technological Environment): प्राकृतिक पर्यावरण का वह भाग जिसपर मानव ने विज्ञान की सहायता से नियन्त्रण पा लिया है, प्रौद्योगिक पर्यावरण कहलाता है। इस पर्यावरण में मनुष्य प्रविधि एवं यंत्रों की सहायता से संशोधन करता रहता है। सभ्यता का विकास काफी सीमा तक इसी पर्यावरण पर आश्रित है।
  4. राजनीतिक पर्यावरण (Political Environment): प्रकृति/ भौतिक पर्यावरण पर नियन्त्रण स्थापित कर सकने के साथ-साथ अन्य मानवों पर नियन्त्रण स्थापित कर पाने तथा उन पर आधिपत्य स्थापित करने की मानव की प्रबल आकांक्षाओं ने राजनीतिक पर्यावरण को जन्म दिया है।
  5. मनोवैज्ञानिक पर्यावरण (Psychological Environment): मनुष्य की मानसिक प्रवृत्तियाँ जैसे बुद्धि, रुचि, प्रेरणाएँ, चिन्तन, विचार आदि तथा व्यवहारात्मक प्रवत्तियाँ जैसे आदतें, उसके मनोवैज्ञानिक पर्यावरण का निर्माण करती है। एक साथ एक ही स्थान पर खड़ें दो व्यक्ति मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भिन्न-भिन्न पर्यावरण में स्थिति हो सके हैं।
  6. आध्यात्मिक पर्यावरण (Spiritual Environment): स्वयं को समझने तथा विश्व की नियामक शक्ति के सम्बन्ध में सम्पूर्ण ज्ञान आध्यात्मिक परिवेश का निर्माण करता है।
  7. सांस्कृतिक पर्यावरण (Cultural Environment): सामाजिक विरासत, धर्म, प्रथा, संस्कार, कला एवं साहित्य आदि मिलकर सांस्कृतिक पर्यावरण बनाते हैं।

पर्यावरण का महत्त्व

सम्पूर्ण पर्यावरण में तीन प्रमुख विशेषताएँ परिलक्षत होता हैं। पर्यावरण के तत्वों की अन्योन्याश्रितता, सीमित क्षमता, तथा जटिल सम्बन्धी प्रकृति के निर्माण में असंख्य तत्वों का योगदान होता है। ये सभी तत्व एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं, इन सभी तत्वों की मात्रा सीमित एवं सुनिश्चित होती है तथा इनका एक-दूसरे से केवल सरल और प्रत्यक्ष सम्बन्ध ही नहीं होता बल्कि अप्रत्यक्ष एवं जटिल सम्बन्ध भी होता है।

अन्योन्याश्रितता (Interdependence) के कारण ही किसी प्राणी की सत्ता अन्य असंख्य प्राणियों के अस्तित्व पर निर्भर करती है। वस्तुतः इस दृष्टि से मानव स्वतंत्र नहीं है। यदि पेड़-पौधे ऑक्सीजन उत्पन्न करना बन्द कर दें तो मनुष्य तथा जीव-जन्तु बच नहीं पायेंगे। पेड़-पौधों के विभिन्न अवयन मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं और मिट्टी के जीवांश पेड़-पौधों का पोषण करते हैं। पेड़-पौधों भी अपने में स्वतंत्र नहीं है। मिट्टी के बैक्टीरिया एवं सूक्ष्म जीवन उसे लाभ पहुँचाते हैं। वृक्ष भी असंख्य जीव घटकों के कारण ही जीवित है।

पर्यावरण की दूसरी विशेषता सीमित क्षमता (Limitation) है। हर प्राणी एवं पदार्थ की संख्या एवं अनुपात सुनिश्चित तथा सीमित है। पौधे निर्धारित मात्रा में सूर्य की किरणें ग्रहण करते है और एक निर्धारित सीमा तक ही ऑक्सीजन पैदा करते है। उपभोक्ताओं की संख्या और उपयोग की मात्रा जब तक उत्पादन के अनुरूप रहती है तब तक व्यवस्था ठीक चलती है लेकिन उत्पादन से उपभोग की मात्रा बढ़ जाने पर असंतुलन बढ़ जाय तो ध्रुव प्रदशों की बर्फ पिघलने लगेगी जिससे समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा और इस जलस्तर की वृद्धि के कारण मैदानी क्षेत्र जलमग्न भी हो सकतें है।

पर्यावरण में सभी तत्त्वों और जीवो की अन्योन्याश्रिता की विशेषता ने ही सम्बन्धों को जटिल बना दिया है। कोई भी तत्व जो परम तत्व नहीं वह स्वतंत्र नहीं अर्थात पर्यावरण में दृश्यमान वस्तु का अस्तित्व दूसरे तत्व में तथा दूसरे का बदले में निर्भर है। अतः एक प्रभावित होगा तो सभी स्वतः ही प्रभावित होंगे।
इस प्रकार पर्यावरण को उपर्युक्त तीनों विशेषताएँ स्थानीय, प्रादेशिक, राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय सभी स्तरों पर विद्यमान हैं। इन तीनो के कारण ही सम्पूर्ण पर्यावरण में संतुलन बना रहता है
किन्तु विकास की प्रक्रिया में जो पर्यावरण ह्रास हुआ है और प्रकृति में जो असन्तुलन उत्पन्न हुआ है उससे हम सभी विदित है।

पिछले 50 वर्षों में विश्व की बढ़ती जनंसख्या, नगरीकरण, औद्योगिकरण तथा अत्यधिक प्राविधिक सक्रियता के कारण पारिस्थितिकी ह्रासोन्मुख परिवर्तन प्रारम्भ हो चुका है। अतः पर्यावरण का अध्ययन तथा उसके सरंक्षण की क्रियाएँ अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हो गई है।

पर्यावरण के अध्ययन से हमे पर्यावरण में अंधाधुंध प्रदूषकों के छोड़े जाने के प्रति भी संरक्षण और महत्व के बारे में भी ज्ञान प्राप्त होता है।

वर्तमान समय में बहुत से पर्यावरणीय मुद्दे है जो दिन-ब-दिन जटिल होते जा रहे है और अन्ततः पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लग गया है।
पर्यावरणीय अध्ययन निम्न कारणों से अति महत्वपूर्ण बन गया है-
  • पर्यावरण मुद्दे अन्तर्राष्ट्रीय होने के नाते- इस बात को अच्छी तरह से पहचाना गया है कि पर्यावरणीय मुद्दे जैसे ग्लोबल वार्मिंग, आजोन शरण, अम्ल वर्षा, समुद्री प्रदूषण और जैव विविधता केवल राष्ट्रीय मुद्दे नहीं है बल्कि वैश्विक मुद्दे है और इसलिए इन मुद्दों का अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों और सहयोग से हल निकाला जाना चाहिए
  • विकास के परिणाम उत्पन्न समस्याएं- विकास के परिणाम स्वरूप नगरीकरण, औद्योगिकरण, परिवहन तंत्र, कृषि और आवास को जन्म दिया, हॉलाकि विकसित देश इस चरण से बाहर हो गये है। उत्तरी गोलार्द्ध की दुनिया ने अपने पर्यावरण को शुद्ध करने के लिए गंदे कारखानों को दक्षिण में स्थानांतरित करने में कामयाब रहा। जब पश्चिम अपने को विकसित कर रहा था तो पर्यावरणीय समस्याओं को नजरअंदाज किया। जाहिर है इस प्रकार के पथ पर विकासशील देश है जो न तो व्यवहारिक है और न वाह्यनिय है।
  • प्रदूषण में विस्फोटक वृद्धि- कुल वैश्विक जनसंख्या में से प्रत्येक सातवां व्यक्ति भारत में निवास करता है। दुनिया की आबादी का 16 प्रतिशत और 2.4 प्रतिशत भू-क्षेत्र जहाँ भूमि सहित सभी प्राकृतिक संसाधनों पर भारी दबाव है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि मिट्टी के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ा है, उसके सक्ष्म पोषक तत्वों में कमी, कार्बनिक पदार्थ, लवणता और संरचना में भारी क्षति हुई है।
  • एक वैकल्पिक समाधान की आवश्यकता- यह विकासशील देशों के लिए आवश्यक है कि वैकल्पिक लक्ष्य के लिए वैकल्पिक मार्ग की खोज करें।
हमें निम्न रूप से एक लक्ष्य की आवश्यकता है:
  • विकास का एक ऐसा सच्चा लक्ष्य जो पर्यावरणीय दृष्टि से संपोषणीय भी हो।
  • हमारी पृथ्वी के सभी नागरिकों के लिए आम लक्ष्य।
  • विकासशील देशों को ऐसे लक्ष्य से दूरी बनानी होगी जो अत्यधिक उपयोग और अपत्ययी समाज का निर्माण करे जैसे कि विकसित देशों में हुआ है।
  • मानवता को विलुप्ती से बचाने की आवश्यकता- मानवता को विलुप्तता से बचाना हमारा कर्तव्य है। विकास के नाम पर, हमारी गतिविधियों से पर्यावरण का निर्माण तो होता है लेकिन जैवमण्डल जर्जर हो जाता है।
  • विकास के लिए उचित योजना की आवश्यकता- हमारा अस्तित्व संसाधनों के उपभोग प्रसंस्करण और उत्पादों के उपयोग पर निर्भर करता है इसलिए हमें अपने विकास के लिए ऐसी योजनाओं को बनाना चाहिए जो पर्यावरण का भी विकास करे और पारिस्थितिकी के अनुकूलता के साथ उनका भी अस्तित्व बनाये रखे।
आर.मिर्जा रिपोर्ट- इन्होंने पारिस्थितिकी को चार आधारभूत सिद्धान्त के तहत मान्यता दी:
  1. होलिज्म (Holism)
  2. पारिस्थितिकी तंत्र
  3. उत्तराधिकार
  4. वार्तालाप

होलिज्म को पारिस्थितिकी का मूल आधार माना गया है। श्रेणी बहु स्तर में पारिस्थितिकी इकाइयों की बातचीत या अर्न्तक्रिया निम्न रूप में होती है:
  • व्यक्तिगत < जनसंख्या < समुदाय < पारिस्थितिकी तंत्र< बायोम < जैवमण्डल।
आर. मिर्जा ने पर्यावरण प्रबन्धन के लिए चार आधारों को मान्यता दी है जो निम्न है:
  1. मानवीय क्रियाकलापों का पर्यावरण पर प्रभाव।
  2. मूल्य प्रणाली।
  3. संपोषणीय विकास के लिए योजना और डिजाइन।
  4. पर्यावरण शिक्षा।
इन विचारों को ध्यान में रखते हुए भारत ने पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में संपोषणीय विकास योजना बनाने के लक्ष्य में अपना योगदान दिया। ब्राजील की राजधानी 'रिया-डी-जिनेरियों' में आयोजित 'पृथ्वी सम्मेलन' (1992) में भी इसे उल्लेखित किया गया।

पर्यावरण एवं संसाधन में

संबंध संसाधन प्रकृति के संपूर्ण जैव जगत का आधार है, जिन पर जीवों का अस्तित्व निर्भर करता है। मनुष्य प्राकृतिक पर्यावरण के संसाधनों का उपयोग करके ही सांस्कृतिक भू-दृश्य विकसित करता है। मनुष्य प्राकृतिक पर्यावरण के संसाधनों का दक्षता तथा जीवीय श्रेष्ठता के कारण अन्य जीवों से आगे निकल गया है। मनुष्य ने पर्यावरण के प्रतिरोधों से बचने की विधियां भी विकसित कर ली है। बढ़ने मानवीय दबाव का प्रभाव संतुलित पर्यावरण पर पड़ा तथा संसाधनों का ह्वास प्रारम्भ हो गया। पर्यावरण में सर्वसुलभ संसाधनों (वायु तथा जल) का भी अवनयन होने लगा है। इन संसाधनों की बहुलता तथा नयीकरणीय प्रकृति होने पर भी मौलिक गुणवत्ता का हास हो जाने से पुनस्थापन असंभव हो जाएगा। गंगा नदी के जल को विगत पाँच दशकों में इस स्तर तक प्रदूषित कर दिया गया है कि आगामी समय में भी इसका पुनर्स्थापन हो पाना अत्यंत दुष्कर हो जाएगा। संसाधनों को दोहन तथा पर्यावरण संतुलन एक ऐसा अनूठा संयोजन है जिस पर प्राकृतिक व्यवस्था तथा जीवों का अस्तित्व निर्भर करता है। औद्योगिक क्रांति के उपरांत जीवाश्मीय ईंधन के दोहन तथा हरित गृह प्रभाव में वृद्धि हुई जिसके फलस्वरूप पृथ्वी का तापमान बढ़ना व संतुलित जलवायु के कदम लड़खड़ाने लगे। इसलिए यह आवश्यक है कि पर्यावरण तथा संसाधन उपयोग के मध्य मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किया जाए। संसाधन उपयोग के गलत तरीकों से पर्यावरण संकट उत्पन्न हो रहे है जिन पर नियंत्रण कर पाना आसान कार्य नहीं है। बढ़ते औद्योगीकरण के कारण अम्ल वर्षा, ओजोन अल्पता, तापमान में वृद्धि जैसी ज्वलत पर्यावरणीय समस्यायें सामने आ रही है।
मनुष्य पर्यावरण का प्रमुख संसाधन है, जो संसाधन निर्माण एवं दोहन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका रखता है।
मानव अपने सांस्कृतिक आर्थिक अभ्युदय के लिए संसाधनों का विस्तृत दोहन करता आया है, लेकिन अपने विकास में संसाधन के दोहन को अनिवार्य मानने वाला मानव समुदाय पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ने से आशंकित है। अतः जहाँ पर्यावरण में स्थित संसाधन मानवीय संवृद्धि के लिए आवश्यक है, वहीं इनका अति दोहन मानवीय अवनति भी कर सकता है। स्पष्ट है कि संसाधन एवं पर्यावरण में मैत्रीपूर्ण संबंधों के उपरान्त ही प्राकृतिक संतुलन संभव है जो अन्य जीव-जनतुओं सहित मानकीय समृद्धि का मूलाधार है।

जन जागरूकता

मानव का प्रकृति के साथ गत्यात्मक सम्बन्ध है। मनुष्य ने प्रकृति से प्राप्त संसाधनों का उपयोग एक ओर अपनी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु किया और दूसरी ओर अपनी सभ्यता के विकास हेतु किया। पर्यावरणीय तत्वों के उपभोग के कारण प्रकृति में परिवर्तन आने आरम्भ हो गए जो सामाजिक-आर्थिक विकास के साथ-साथ असन्तुलन का रूप लेने लगे। उपभोग की अत्यधिक माँग होने कारण प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ा है। जनंसख्या वृद्धि, तीव्र नगरीकरण, औद्योगीकरण, उपभोक्तावादी जीवन दर्शन, भौतिकवादी जीवनशैली, सामाजिक मूल्यों का ह्रास, दोषपूर्ण प्रतिविधि गतिशीलता तथा वर्गीय एवं क्षेत्रीय असंतुलन आदि समस्याएँ सामाजिक-आर्थिक विकास के साथ-साथ पर्यावरण के लिए संकट लेकर आई हैं। इस समस्याओं पर वैश्विक एवं समग्र दृष्टि की आवश्यकता है। इस हेतु पर्यावरण सम्बन्धी जन चेतना का विकास होना अत्यन्त आवश्यक है। नवीन जानकारियों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए जन-चेतना अथवा जनजागरूकता की आवश्यकता पड़ती हैं। पर्यावरण सम्बन्धी विभिन्न पक्षों को समझने, उसका संरक्षण एवं संवर्द्धन करने के लिए पर्यावरणीय ज्ञान होना आवश्यक है।
पर्यावरणीय अध्ययन में पर्यावरण का मानव पर और मानव का पर्यावरण पर जो प्रभाव पड़ता है, उसका अध्ययन किया जाता है। दूसरे शब्दों में, मानव एवं पर्यावरण की अन्तक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। इतना स्पष्ट है कि मानव ने आज तक अपनी विकास यात्रा में पर्यावरण के साथ जो क्रियाकलाप किए हैं उन्होंने पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है जिससे पर्यावरण ह्रास और असन्तुलन की स्थिति उत्पन्न हुई है। अतः यह अत्यन्त आवश्यक है कि पर्यावरण के साथ मानव की अन्र्तक्रिया के तरीकों को परिवर्तित किया जाय अर्थात् मनुष्य द्वारा वे कार्य किए जाएं जिनसे प्राकृतिक संरक्षण एवं संवर्द्धन में सहायता मिले और प्रदूषण तथा पर्यावरण हास को रोका जा सके। इन कार्यों को जनमानस में पर्यावरण चेतना उत्पन्न करके ही सम्पन्न किया जा सकता है।
भारत में प्राचीन काल से ही पर्यावरण प्रति संवेदनशीलता और मित्रवत व्यवहार के साक्ष्य मिलते हैं, न केवल मित्रवत बल्कि प्राकृतिक तत्वों को दैव स्वरूप दिया गया और मानव अपने को उसका पुत्र बताया। लेकिन इतिहास इस बात का भी । गवाह रहा है कि पर्यावरण के प्रति मानव का व्यवहार हमेशा । दैव तुल्य नहीं रहा मानव का व्यवहार बदलता रहा है अर्थात समय के साथ-साथ जिस पर्यावरण को देवत्व का स्थान दिया गया वह समय के साथ उपभोग की वस्तु भी बना अर्थात मानव का प्रकति के साथ गत्यात्मक सम्बन्ध है। 'ए० डाउन्स' महोदय ने तो इसको एक सिद्धान्त के रूप में कहने का प्रयास किया कि मानव पर्यावरण के प्रति अपने व्यवहार और दिलचस्पी को समय के साथ पाँच अवस्थाओं में सम्पन्न करता है। 'डाउन्स' ने पर्यावरण की समस्याओं में जनसमुदाय की अभिरूचि को 'मुद्दा ध्यानाकर्षण चक्र' नाम दिया।
'ए, डाउन्स के अनुसार पर्यावरणीय समस्याओं में जनसमुदाय की दिलचस्पी समय के साथ बदलती रहती है तथा परिवर्तन का पूर्ण अनुक्रम पाँच अवस्थाओं में सम्पन्न होता है। डाउन्स ने पर्यावरण की समस्याओं में जनसमुदाय की अभिरूचि को 'मुद्दा ध्यानाकर्षण चक्र' नाम दिया।

इसमें उन्होंने निम्न पाँच अवस्थाओं को बताया-
  1. प्रथम अवस्थाः समस्या पूर्व की स्थिति होती है। इस समय जन साधारण का समस्या के प्रति कोई ध्यान नहीं दिया या पर्यावरण पर दिलचस्पी लेने वाले कुछ लोग ही आकर्षित होते हैं।
  2. द्वितीय अवस्थाः जब पर्यावरण समस्याएं भयावह होने लगती है तब जनसाधारण पर्यावरण के प्रति आकुल और उत्साहित होने लगता है। इस समस्या से निबटने के लिए लागत की भी परवाह नहीं करता।
  3. तृतीय अवस्था: इस अवस्था में जनसाधारण को यह मान हो जाता है कि सिर्फ लागत ख़र्च ही इस मुद्दे या समस्या का हल नहीं।
  4. चतुर्थ अवस्थाः जन साधारण की उदासीनता की स्थिति क्योंकि पर्यावरणीय सुधार योजनाओं में लागत अधिक साथ ही जनसाधारण को यह बोध हो जाता है कि पर्यावरणीय सुधार कार्यक्रमों का क्रियान्वयन उसके लिए अत्यधिक कठिन है तथा खर्च की गई धनराशि तथा संलग्न जनशक्ति की तुलना में मिलने वाला त्वरित लाभ बहुत कम है।
  5. पंचम अवस्थाः समस्या उपरान्त की अवस्था है जब पर्यावरणीय समस्या पर अचानक जनसाधारण की दिलचस्पी बढ़ जाती है। परन्तु जब खतरा टल जाता है तो लोगों की दिलचस्पी पुनः कम हो जाती है।
पर्यावरण में जनसाधारण की दिलचस्पी के उपर्युक्त चक्रीय रूपरेखा के आधार पर डाउन्स का मत है वर्तमान समय में जनसाधारण की दिलचस्पी तथा जागरूकता उपर्युक्त चक्र के माध्यम से गुजर रही है तथा भविष्य में उसके समाप्त हो जाने की सम्भावना है।
इस तरह से यह स्पष्ट है कि मानव ने आज तक अपनी विकास यात्रा में पर्यावरण के साथ जो क्रियाकलाप किए है उससे पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव ही पड़ा है जिससे पर्यावरण ह्वास और असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हुई है।
हमारे देश में 1973 का 'चिपको आन्दोलन' पर्यावरण चेतना का सूत्रघाट सिद्ध हुआ है। लोगों को पर्यावरण क्षति से उत्पन्न दुर्जेय परिणामों के बारे में जागरूक करना होगा, अगर कड़े सुधारात्मक कदम नहीं उठाये गये तो जीवन का अन्त हो सकता है। हम विभिन्न पर्यावरणीय समस्याओं का सामना कर रहे है इन चुनौतियों को देश का परिचित या वाकिफ कराना आवश्यक है जिससे उनका व्यवहार या कृत्य पर्यावरण अनुकूल हो सकता है।

ऐसे कुछ समस्याएं निम्न है- जिनसे जनता को जागरूक करना आवश्यक है-

बढ़ती जनसंख्याः प्रत्येक वर्ष 10 लाख से भी अधिक जनसंख्या 2.11% से बढ़ रही है। जबकि प्रत्येक वर्ष 17 लाख से अधिक जनसंख्या जड रही है। यह लगातार प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ा रहा है। और विकास की गति को भी बंद कर रहा है। अतः हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती जनसंख्या वृद्धि को सीमित करना है। यद्यपि विकास स्वतः ही जनसंख्या की वृद्धि को नियंत्रित करता है लेकिन वर्तमान में जनसंख्या ही विकास के लिए बाधा बन रही है। यह महिलाओं के विकास के लिए भी आवश्यक है।

गरीबी: भारत के बारे में यह हमेशा कहा गया है कि 'अमीर देश लेकिन गरीब जनता'। गरीबी और पर्यावरणीय अवनयन का आपसी सम्बन्ध है। एक बहुत बड़ी जनसंख्या अपनी आधारभूत आवश्यकता के लिए प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है जैसे खाद्य, ऊर्जा आदि के लिए। लगभग 40% जनसंख्या अभी भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है।

कृषिक विकास- लोगों को निश्चित रूप से इस बात की जानकारी चाहिए बिना पर्यावरण को क्षति पहुँचाए कृषि विकास को सुनिश्चित करें। क्योंकि उच्च उत्पादकता वाली फसलों से मिट्टी के भौतिक गुणों में परिवर्तन ला देता है
और उपजाऊ भूमि बंजर भूमि में बदलने लगती है।

पानी की आवश्यकताः भूमिगत जल के उपयोग की पुर्नव्याख्या करने की आवश्यकता है। शहरी कूड़ा, औद्योगिक कारखाने, रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक आदि सतही जल के साथ-साथ भूमिगत जल को भी प्रदूषित करते है। यह एक चुनौती है कि हम अपने नदियों और झीलों के पानी की गुणवत्ता को पुनः कैसे बहाल करें।

विकास और वनः वन नदियां और भूमिगत जल के लिए जलग्रहण की सेवा देते है पानी की बढ़ती मांग तथा सिचाई परियोजनाओं के द्वारा जल दोहन की शक्तिशाली योजनाएं भी है। इन परियोजनाओं से बने विशाल बाँधों से जंगल डूबना, स्थानीय लागों का विस्थापन, जीवों का विस्थापन आदि की समस्या ने एक राजनीतिक और वैज्ञानिक बहस के क्षेत्र बन गये है।

भूमि का अवनयनः देश की कुल 329 मि. हेक्टेयर भूमि का केवल 266 मि.हे. भूमि ही उपजाऊ है। इसमें से 143 मि.हे. कृषि भूमि और 85 मि.हे. अतिरिक्त भूमि क्षरण से ग्रस्त है। और बची हुई 123 मि.हे. में से 40 मि.हे. पूरी तरह से बंजर भूमि है तथा शेष 83 मि.हे. वन भूमि के रूप वर्गीकृत की जाती है। लगभग 406 मिलियन पशुओं के पशुचारण भूमि 13 मि.हे. ही है अथवा पशुचारण के लिए वर्गीकृत भूमि 4 प्रतिशत ही है। इसलिए हमारी 266 मि. हे. का 175 मि.हे. अथवा 66 प्रतिशत भूमि का भिन्न-भिन्न प्रकार से विकृति हो रही है। लगभग 150 मि.हे, भूमि का अपरदन पानी और हवा के द्वारा होता है इसमें भी ध्यान देने की आवश्यकता है।

संस्थाओं का पुनःस्थापनः आज की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अनुकूल संस्थाओं, व्यवहार और आधारभूत ढाँचे की पुनः स्थापना या पुनर्गठन किया जाना चाहिए। यह बदलाव भारत के संसाधनों के उपयोग और प्रबन्धन के परम्परागत तरीकों में किया जाना चाहिए, यह बदलाव शिक्षा, रवैया, प्रबन्धन के तरीकों और संस्थाओं में किया जाना चाहिए। क्योंकि यह लोगों के तकनीक, विचारों और विकास के सोच को बदलने में प्रभावी होता है।

आनुवांशिक विविधता में ह्वासः आनुवांशिक विविधता के संरक्षण के लिए विविध कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। वर्तमान में बहुत से जंगली जीव प्रकृति से विलुप्त हो गये है। एशियाई शेर सहित बहुत से आनुवांशिक विविधता वाले जीवों के नुकसान की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। संरक्षित क्षेत्र जैसे-राष्ट्रीय पार्क, जैवमण्डल, सेन्चुरी आदि में आनुवंशिकीय संख्या कम होती है जिससे दूसरे अनुवांशिकीय गुणों वाले जीवों से जनन क्रिया नहीं हो पाती जिससे इनमें नकारात्मक बदलाओं आते है। अनुवंशकीय विविधता में कमी की जांच के लिए सुधारात्मक कदम उठाए जाने चाहिए।

नगरीकरण के दुष्परिणाम: भारत की लगभग 27% जनसंख्या शहरों में निवास करती है। शहरीकरण और औद्योगिकरण ने भारी संख्या में पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म दिया है जिनमें अविलम्ब ध्यान देने की आवश्यकता है। 30% से ज्यादा शहरी आबादी मलिन बस्तियों में रह रही है। भारत के कुल 3245 कस्बो और शहरों में केवल 21 ही ऐसे शहर है जिनमें पूरी तरह या आधे अधूरे ही सीवेज सुविधा और इलाज सुविधा है। अतः हो रहा तीव्र नगरीकरण का मुकाबला एक चुनौती है।

वायु और जल प्रदुषणः हमारे अधिकांश औद्योगिक संयंत्र या तो पुरानी तकनीक पर कार्य कर रहे है या अस्थायी सुविधाओं का उपयोग कर रहे है। शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों में वायु और जल की सबसे खराब रूप में पहचान की गयी है। इनसे सम्बन्धित अधिनियम तो देश में बना दिये गये लेकिन उनको लागू करना आसान नहीं, कारण उनके क्रियान्वयन के लिए अधिक संसाधन तकनीक और विशेषज्ञता के साथ-साथ राजनीतिक इच्छा शक्ति और सामाजिक इच्छा की भी आवश्यकता होती है। फिर भी लोगों को नियमों के प्रति जागरूक करने की आवश्यकता है। उनका समर्थन नियमों को लागू करने के लिए अपरिहार्य है।
इस तरह के अधूरे लक्ष्यों की पूर्ति के लिए व्यापक जागरूकता की आवश्यकता है जो पर्यावरण शिक्षा के माध्यम से (प्राथमिक स्तर से उच्च स्तरत की कक्षाओं में) सामाजिक क्रियाओं के माध्यम से स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से सभी मुद्दों पर सोचने, समझने और कुछ सार्थक कर सकने की रूचि जगानी होगी

पर्यावरणीय शिक्षा

भारत में पर्यावरण शिक्षा को प्रोत्साहन देते हेतु कई केन्द्र खोले गए हैं। यह पर्यावरण शिक्षा केन्द्र सी.पी.आर. शिक्षा केन्द्र अहमदाबाद एवं सी.पी.आर. शिक्षा को बढ़ावा देने हेतु वर्ष 1978 में नई दिल्ली में राष्ट्रीय प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय की स्थापना की गई। यह पर्यावरण के विभिन्न पहलुओं से संबंधित स्थाई प्रदर्शनी, दीर्घ के अलावा, यह संग्रहालय स्कूली बच्चों, महाविद्यालयों के छात्रों और आम जनता के लिए स्थायी प्रदर्शनी तथा कई शैक्षिक कार्यक्रमों व गतिविधियों का भी आयोजन करता है। तीन क्षेत्रीय प्राकृतिक संग्रहालय भुवनेश्वर, भोपाल और मैसूर में स्थापित किये गये हैं। इसके अतिरिक्त भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद् देश में वानिकी शिक्षा के विस्तार एवं विकास गतिविधियों का केन्द्रीय स्थल हैं, पर्यावरण शिक्षा लागू करने हेतु कई विनिमय होने के बावजूद कोई विशेष प्रतिफल देखने को नहीं मिले हैं। वस्तुतः कई राज्य सरकारें इस मामले में उदासीन हैं।

पर्यावरण शिक्षा की आवश्यकता क्यों?

पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता लाना तथा जन-चेतना बढ़ाना ही पर्यावरण शिक्षा का निहितार्थ है।
पिछले पाँच दशकों में यह अनवरत देखा गया है कि पृथ्वी की जीवन रक्षक क्षमता को तीव्र गति से ह्वास हो गया है। इस ह्वास का मुख्य कारण वनों का मानव विकास की दृष्टि से नाश, प्रजातियों का विलुप्त होना और जल, मृदा एवं वायु का प्रदूषण है।
बढ़ती आबादी से भू-भाग और अन्य संसाधन सिमटकर छोटे होते जा रहे हैं। वायुमंडल से हानिकारक या विषैली गैसों में अनवरत वृद्धि जारी है जिसका दुष्प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर देखा जा सकता है।
बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना के लिए बड़े पैमाने पर जंगल काटे जा रहे हैं। देश में अनवरत बढ़ती आबादी के लिए भोजन तथा आवास की समस्या हल करने के उद्देश्य से बड़ी मात्रा में जंगलों का सफाया किया गया।
चारागाह के रूप में वन क्षेत्रों का अनियंत्रित उपयोग तथा वन्य प्राणियों के शारीरिक अवशेष इकट्ठा करने हेतु उनका अवैध शिकार अपनी गति से जारी है। वनों में विभिन्न प्रकार की वनोपज प्राप्त करने के लिए ठेकेदारों ने भी वनों को नष्ट किया है।
आदिम जातियों की झूम कृषि प्रणाली भी जंगलों के विनाश में प्रमुख भूमिका निभाती है।
हमारा शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य जल, वायु की शुद्धता और आस-पास के वातावरण की स्वच्छता पर निर्भर करता है किन्तु औद्योगीकरण की तीव्र प्रक्रिया हो रही है जिनमें उद्योगों से उत्सर्जित जहरीली गैसे, वाहनों का धुआं प्रमुख है। इसके परिणाम स्वरूप आँखों में जलन, फेफड़ों में कैसर, दमा जैसी खतरनाक बीमारियाँ आम हो गई है।
उद्योगों द्वारा विसर्जित अवशिष्ट पदार्थ के जल स्त्रोतों से मिलने से जल स्त्रोत रोग ग्रस्त होते है।
रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशक दवाइयों के बढ़ते प्रयोग, कल-कारखानों का कचरा, भूमि में आसानी से न विघटित होने वाली पॉलिथीन, प्लास्टिक के टुकड़े, काँच एवं अन्य जहरीले तत्वों से भूमि प्रदूषित हो रही है।
वस्तुतः इन सबके के पीछे पर्यावरण संरक्षण के बारे में लोगों में अज्ञानता है। इस अज्ञानता को दूर करने के लिए पर्यावरण शिक्षा जरूरी है।

भारत में पर्यावरण शिक्षा की समस्याएं

सर्वोच्च न्यायालय ने कक्षा-12 तक पर्यावरण शिक्षा लागू करना अनिवार्य कर दिया है। किन्तु बहुत सारे राज्यों ने इसे लागू नहीं किया है। वस्तुत: पर्यावरण के शैक्षिक पाठ्यक्रम लागू करने के संबंध में विवाद है। कुछ शिक्षाविदों ने इसकी उपयोगिता पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया है। उनके मतानुसार पहले से ही बच्चों का पाठ्यक्रम बोझिल है। पर्यावरण शिक्षा लागू होने से बच्चों पर अतिरिक्त दबाव आ जायेगा। पर्यावरण शिक्षा शैक्षिक विभागों या शिक्षकों के लिए प्राथमिकता नहीं रखता है। बहुत " से शिक्षकों के लिए पर्यावरण शिक्षा विज्ञान से जुड़ा विषय है।
वे यह नहीं सोचते कि इसे मानविकी, कला या अन्य दूसरे तरीके से पढ़ाया जा सकता है। शिक्षाविदों का मानना है कि इसे पाठ्यक्रम में न जोड़कर स्वैच्छिक स्तर पर स्कूली या महाविद्यालय शिक्षा में सम्मिलित किया जाना चाहिए। यह पाठ्येत्तर विषय होना चाहिए जिसमें छात्रों को पारिस्थितिकीय के प्रति अभिरूचि और जागरूकता पैदा करने पर बल दिया जाना चाहिए। जहाँ पर्यावरण शिक्षा की पढ़ाई होती है। वहाँ पारिस्थितिकीय अध्ययन पर कम पेड़-पौधों व बाघ के बारे में अधिक बताया जाता है।
पर्यावरण शिक्षा संबंधी अन्य समस्याएँ यह है कि इसके पाठ्यक्रम किसी एक संस्था द्वारा तय किये जाते है और यह भारत के सभी भागों में लागू की जाती है, किन्तु भारत के विभिन्न क्षेत्रों की अपनी-अपनी पर्यावरणीय समस्याएँ है, जिस प्रकार कुपोषण की पारिस्थितिकी प्रणाली में निवास करने वाले लोगों को मरूस्थल के बारे में पढ़ाने से कोई विशेष उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकती। वास्तव में पर्यावरण शिक्षा की समस्याओं का समाधान उस समय तक संभव नहीं है जब तक इस आधुनिक जगत का शिक्षित समुदाय इसे शिक्षा का विषय की बजाय जीवनशैली का विश्व नहीं मानेंगे। सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थाओं के साथ व्यक्ति विशेष को अपने स्तर पर पहल करनी होगी आज गरीबी, बेरोजगारी, आतंकवाद, जातिवाद, राजनैतिक विवाद इत्यादि किसी देश, प्रदेश या क्षेत्र विशेष की समस्याएं है जबकि भू-मंडलीय तापन के कारण जलवायु परितर्वन, प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता एवं वृद्धि जैसी विश्वव्यापी समस्याएँ उत्पन्न होती जा रही है।

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