प्रदूषण के प्रकार pradushan ke prakar

प्रदूषण के प्रकार pradushan ke prakar

प्रदूषण के प्रकार
  1. मृदा या भूमि प्रदूषण
  2. जल प्रदूषण
  3. रेडियोधर्मी प्रदूषण
  4. ध्वनि प्रदूषण
  5. तापीय प्रदूषण
  6. वायु प्रदूषण
  7. प्लास्टिक प्रदूषण
  8. ई-अपशिष्ट प्रदूषण
  9. ठोस अपशिष्ट प्रदूषण
  10. विद्युत चुम्बकीय विकिरण प्रदूषण
  11. जैव-प्रदूषण

मृदा या भूमि प्रदूषण

प्राकृतिक स्रोतों या मानव-जनित स्रोतों से मिट्टियों की गुणवत्ता में ह्यस या क्षरण निम्न कारणों से होते हैं- तीव्र गति से मृदा अपरदन, मिट्टियों में रहने वाले सूक्ष्म जीवों में कमी, मिट्टियों में नमी का आवश्यकता से अधिक या बहुत कम होना, तापमान में अत्यधिक उतार-चढाव मिट्टियों में हयूमस की मात्रा में कमी तथा मिट्टियों में विभिन्न प्रकार के प्रदूषकों क प्रवेश एवं सान्द्रण।

मृदा प्रदूषण के कारण या स्त्रोत

  1. जैविक स्रोत
  2. वायुजनित स्रोत
  3. प्राकृतिक स्रोत
  4. जैवनाशी रसायन स्रोत

जैविक स्रोत- मृदा-अपरदन के जैव स्रोत या कारकों के अंतर्गत उन सूक्ष्म जीवों तथा अवांछित पौधों को सम्मिलित किया जाता है जो मिट्टियों की गुणवत्ता तथा उर्वरता को कम करते हैं। यह सूक्ष्म जीव मिट्टियों में प्रवेश करके उन्हें प्रदूषित करते हैं। ये सूक्ष्म जीव आहार श्रृंखला में भी प्रविष्ट होकर मानव शरीर में पहुंच जाते हैं।

वायुजनित स्रोत- वायु जनित स्रोत वाले मिट्टयों के प्रदूषक वास्तव में वायु के प्रदूषण ही होते हैं। जिनका मानव ज्वालामुखियों (कारखानों की चिमनियों), स्वचालित वाहनों, ताप शक्ति, संयंत्रों तथा घरेलू स्रोत से वायुमंडल में उत्सर्जन होता है। इन प्रदूषकों का बाद में धरातलीय सतह पर अवपात होता है तथा ये विषाक्त प्रदूषक मिट्टियों में पंहुचकर उन्हें प्रदूषित कर देते हैं।

प्राकृतिक स्त्रोत- मृदा प्रदूषक के भौतिक स्रोतों का संबंध प्राकृतिक एवं मानव-जनित स्रोतों से मृदा-अपरदन तथा उससे जनित मृदा-क्षरण से होता है, अर्थात् अपरदन के कारण मृदा की गुणवत्ता में भारी कमी होती है। मिट्टियों के अपरदन के लिए उत्तरदायी प्राकृतिक कारकों के अंतर्गत निम्न को सम्मिलित किया जाता है वर्षा की मात्रा तथा तीव्रता, तापमान तथा हवा, जलीय कारक, वानस्पतिक आवरण आदि।

जैवनाशी रसायन स्रोत- मृदा प्रदूषण का सर्वाधिक खतरनाक स्रोत विभिन्न प्रकार के जैवनाशी रसायन (कीटनाशी, रोगनाशी तथा शाकनाशी कृत्रिम रसायन) है जिनके कारण बैक्टीरिया सहित सूक्ष्म जीव विनष्ट हो जाते हैं। परिणामस्वरूप मिट्टी की गुणवत्ता में भारी गिरावट आ जाती है। ज्ञातव्य है कि जैवनाशी रसायन पहले मिट्टयों में स्थित कीटाणुओं तथा अवांछित पौधों को विनष्ट करते हैं तत्पश्चात् मिट्टी की गुणवत्ता को कम करते हैं।
जैवनाशी रसायनों को रेंगती मृत्यु कहा जाता है।

मृदा या भूमि प्रदूषण का प्रभाव

भूमि प्रदूषण के कई प्रभाव हमें देखने को मिलते हैं। मृदा या भूमि-प्रदूषण के निम्नलिखित प्रभाव हैं-
  • कीटनाशक औषधियों के अत्यधिक प्रयोग से मछलियाँ और पक्षियों पर बड़े घातक प्रभाव देखने को मिले हैं। अनके पक्षी एवं मछलियाँ इनके प्रभाव से मर चुकी हैं।
  • भूमि प्रदूषण से अनेक रोगों के जीवणुओं और विषाणुओं का जन्म होता है जो मानव में अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न करते हैं।
  • पृथ्वी पर एकत्रित कूड़े-करकट के ढेर जब सड़ने लगते हैं तो उनसे ऐसी दुर्गध आती है कि हमारा जीवन दूभर हो जाता है यह दुर्गध अनेक रोगों को जन्म देती है।
  • भूमि के दुरूपयोग, नदियों और सागरों के किनारों को प्रदूषित करने से अनेक जीव-जन्तुओं को खतरा पैदा हो गया है।
  • भूमि प्रदूषण का प्रभाव पेड़-पौधों पर भी पड़ा है। फलों और सब्जियों की गुणवत्ता में अंतर आने लगा है।

मृदा प्रदूषण का नियंत्रण

  • भूमि प्रबन्धन को अपनाना चाहिए।
  • ठोस पदार्थों को गलाकर इसके चक्रीकरण पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
  • रायासनिक उर्वरकों, कीटनाशियों का कम से कम प्रयोग करना चाहिए।
  • ठोस तथा अनिम्नीकरण योग्य पदार्थों जैसे- लोहा, तांबा, कांच, पॉलिथीन को मिट्टी में नहीं दबाना चाहिए।
  • गोबर, मानव मल-मूत्र के बायोगैस के रूप में प्रयोग पर बल देना चाहिए।
  • कीटनाशियों के स्थान पर जैव-कीटनाशियों के प्रयोग पर बल देना चाहिए।
  • अपशिष्ट पदार्थों को ढेर के रूप में इकट्ठा करके और उसमें आग लगाकर गंदगी से छुटकारा पाया जा सकता है।
  • मोटर वाहनों के टूटे हुए भागों को पुनः प्रयोग करने का तरीका बहुत प्रभावशाली है। कांच एल्युमिनियम, लोहा, तांबा, आदि को पुनः पिघलाकर प्रयोग कर सकते हैं।
  • मृदा अपरदन को रोकने की विधियों का प्रयोग करना चाहिए।
  • ठोस पदार्थों जैसे-कागज, रबड़, गन्ने आदि को जलाकर भूमि (मृदा) प्रदूषण पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है।
  • कूड़े को जमीन में दबाकर उसमें मुक्ति पायी जा सकती है। दबा हुआ कूड़ा कुछ समय में मिट्टी में परिवर्तित हो जाता है।

जल प्रदूषण

जल प्रदूषण प्राकृतिक या मानवीय क्रिया-कलापों द्वारा जल के भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों में होने वाले विपरीत परिवर्तन का परिणाम होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट (1996) के अनुसार, “प्राकृतिक या अन्य स्रोतों से उत्पन्न अवांछित बाह्य पदार्थों के कारण जल प्रदूषित हो जाता है और वह विषैला तथा सामान्य स्तर से कम आक्सीजन होने के कारण जीवों के लिए हानिकारक बन जाता है और संक्रामक रोगों के प्रसार में सहायक होता है।
जल को प्रदूषित करने वाले तत्त्वों (जल प्रदूषकों) की उत्पत्ति प्राकृतिक और मानवीय दोनों स्रोतों से होती है। प्राकृतिक स्रोत के अन्तर्गत ज्वालामुखी उद्गार, भूस्खलन, मृदा अपरदन, मृत पौधों तथा जन्तुओं के विघटन एवं वियोजन आदि को सम्मिलित किया जाता है। मानव जनित स्त्रोतों में कारखानों तथा नगरों के अपशिष्ट जल, रासायनिक उर्वरकों, कीट नाशक एवं शाकनाशक दवाओं आदि के प्रयोग के रूप में कृषि तथा अन्य मानवीय स्रोत सम्मिलित किये जा सकते हैं। इन मानवीय स्रोतों से कई प्रकार के प्रदूषकों का जल में विसर्जन होने से जल प्रदूषित हो जाता है।

जल प्रदूषण के प्रकार

जल के स्रोतों तथा भण्डारों के आधार पर जल प्रदूषण को तीन प्रमुख वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-

1. स्थलीय जल प्रदूषण- इसके अन्तर्गत जल स्रोतों यथा नदी, झील, तालाब आदि के जल प्रदूषण को सम्मिलित किया जाता है। किसी नदी, झील या तालाब के जल में नगरों से निष्कासित गंदे जल और औद्योगिक प्रतिष्ठानों (कारखानों) से निकलने वाले विषाक्त पदार्थों से युक्त जल के मिलने, मृत पशुओं या मनुष्यों के शवों के जलाशयों में सड़ने-गलने, जलाशयों में पशुओं को नहलाने, रसायन प्रधान डिटर्जेन्ट साबुनों से जलाशयों में कपड़ा धोने तथा अन्य मानवीय कारणों से जलाशयों के जल के भौतिक स्वरूप, रंग, स्वाद आदि में उल्लेखनीय परिवर्तन हो जाता हैं और जल प्रदूषित हो जाता है। वर्तमान समय में तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसंख्या, औद्योगीकरण, नगरीकरण, अधिक उत्पादन के लिए फसलों में कीटनाशी तथा शाकनाशी दवाओं और रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग आदि के कारण जल प्रदूषण में अधिक वृद्धि हो रही है। स्थलीय प्रदूषक वर्षा जल के साथ बहकर जलाशयों में पहुँच जाते हैं जिससे जल प्रदूषित हो जाता है।

2. भूमिगत जल प्रदूषण- भूमिगत जल का प्रदूषण भू-सतह से सामान्यतया 20 से 40 मीटर तक की गहराई तक पाया जाता है। कुओं, हैण्डपम्प, नलकूपों आदि के माध्यम से निकाले गये प्रदूषित भूमिगत जल को जब मनुष्यों तथा पशुओं के लिए पीने के काम में लाया जाता है, तब उनसे अनेक रोग और जानलेवा बीमारियाँ फैल जाती हैं। प्रदूषित जल फसलों की सिंचाई के लिए भी हानिकारक होता है। भूमिगत जल मुख्यतः निम्नलिखित कारणों से प्रदूषित होता है-
  • रासायन तथा कीटनाशकों का प्रयोग- फसलों से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए खेतों में कई प्रकार के रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक एवं शाकनाशक रसायन प्रयोग किये जाते हैं जो वर्षा जल या सिंचाई के जल में घुलकर निक्षालन (रिसाव)क्रिया द्वारा नीचे की शैल सतहों में पहुँच जाते हैं और भूमिगत जल में मिलकर उसे प्रदूषित कर देते हैं।
  • औद्योगिक एवं नगरीय अपशिष्ट पदार्थ- औद्योगिक तथा नगरीय क्षेत्रों में अपशिष्ट पदार्थों के जमाव स्थलों तथा प्रदूषित जल जमाव वाले स्थानों से अनेक प्रकार के रासायनिक प्रदूषक जल में घुलकर रिसाव द्वारा निचली शैल सतहों में पहुँच जाते हैं जिससे भूमिगत जल प्रदूषित हो जाता है।
  • प्रदूषित जल का रिसाव- ग्रामीण क्षेत्रों में कच्चे सेफ्टिक टैंकों और प्रदूषित जलाशयों का जल जब रिसकर नीचे जाता है तब उसके साथ कुछ रासायनिक प्रदूषक भी नीचे पहुँच जाते हैं जिससे भूमिगत जल भी प्रदूषित हो जाता है।

3. सागरीय या समुद्रीय जल प्रदूषण -समुद्री या सागरीय जल का प्रदूषण मुख्यतः उन सागर तटवर्ती भागों में पाया जाता है। जहाँ बड़ी मात्रा में नगरीय तथा औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थों को विसर्जित किया जाता है। सागर के तटवर्ती जल में किसी एक प्रदूषक के अधिक मात्रा में सांद्रण से भयंकर पर्यावरणीय समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। सागर के तटवर्ती जल में औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थो तथा विषाक्त रसायनों के विसर्जन एवं डम्पिंग से सागरीय प्रदूषण की उत्पत्ति होती है। जिसका सागरीय जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे विभिन्न प्रकार के सागरीय जीव बड़ी संख्या में मर जाते हैं अथवा रोगग्रस्त हो जाते हैं। सागरीय जल के प्रदूषण का सबसे अधिक प्रतिकूल प्रभाव मछलियों पर पड़ता है। अण्डमान एवं निकोबार द्वीपों के तटीय भागों में औद्योगिक विषाक्त अपशिष्टों के विसर्जन के दुष्प्रभाव से असंख्य मूंगा जीव (कोरल) मर गये हैं।

तेल अधिप्लाव (Oil Spills) :- तेल टैंकरों से रिसकर अथवा टैंकरों के क्षतिग्रस्त होने पर खनिज तेल सागर में पहुँचने पर सागरीय जल की सतह पर बड़ी शीघ्रता से फैल जाता है। सागरीय सतह पर फैले हुए तेल को ऑयल स्पिल कहते हैं। ऑयल स्पिल के कारण सागरीय जल विषैला हो जाता है जिसके कारण मछलियां तथा अन्य सागरीय जीव मर जाते हैं और सागरी तटीय भागों में पारिस्थितिकीय प्रकोप एवं विनाश की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
प्रत्येक वर्ष 10 करोड़ टन से अधिक तेल का परिवहन होता है तथा परिवहन के दौरान लगभग 6.01 प्रतिशत तेल का रिसाव समुद्र में होता है। इस प्रकार प्रतिवर्ष 200 लाख गैलन तेल सागरीय जल को प्रदूषित करता है। अंतर्राष्ट्रीय तेल पाइपलाइन में रिसाव से भी तेल अधिप्लाव की समस्या उत्पन्न होती है। तेल की खुदाई का कार्य बहुत तेजी से बढ़ रहा है इसमें बहुत बार तकनीकी खराबी होने के कारण तेल बाहर निकलकर फैल जाता है। बहुत से तेल टैंकर पानी में डूब जाते हैं या दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं।

तेल अधिप्लाव का प्रभाव :
  1. स्थानीय उद्योगों पर प्रभाव- तेल अधिप्लाव का असर स्थानीय उद्योगों पर पड़ता है, जैसे-पर्यटन उद्योग, मत्स्य उद्योग, स्वीमिंग एवं सेलिंग। हालाँकि इसका प्रभाव सीमित समय तक ही रहता है।
  2. मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव- समुद्री जलीय तेल से प्रभावित भोजन मनुष्य के लिये हानिकारक होता है। तेल अधिप्लावित क्षेत्रों में आग लगने से श्वसन, आँखों के रोग आदि समस्या उत्पन्न होती है। ऐसे क्षेत्र अस्थमा, गले में इन्फेक्शन, आँखों में जलन, माइग्रेन आदि की समस्या से ग्रस्त रहते हैं।
  3. जलीय परितंत्र पर प्रभाव- तेल फैलाव का असर समुद्री वनस्पति पर भी पड़ता है। प्रवाल भित्तियों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है। जलीय जीव-जन्तुओं पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। तेल अधिप्लाव के कारण प्रत्येक वर्ष लाखों प्रजातियाँ नष्ट हो रही है। इससे खाद्य श्रृंखला भी प्रभावित होती है।

तेल अधिप्लाव नियंत्रण व उपाय

रासायनिक विधि (Chemical Method)
डिटर्जेंट का प्रयोग कर तेल को बुलबुले के माध्यम से वाष्पीकृत किया जाता है परन्तु इससे जलीय पारितंत्र पर नकारात्मक प्रभाव भी पड़ता है।

भौतिक विधि (Physical Method)
दहन प्रक्रिया द्वारा तेल को जलाकर 98 प्रतिशत तेल अधिप्लाव को हटाया जा सकता है परंतु इस तेल अधिप्लाव स्तर की मोटाई कम-से-कम 9 मिलीमीटर होनी आवश्यक है।

जैविक विधि (Biological Method)
टेरी द्वारा विकसित ऑयल जैपिंग जैविक उपचार की एक विधि है जिसमें बैक्टीरिया का प्रयोग कर तेल अधिप्लाव को नियंत्रित किया जाता है। ये ऑयल पैजर बैक्टीरिया, तेल में उपस्थित हाइड्रोकार्बन को खाकर उसे गैर-हानिकारक कार्बन डाइऑक्साइड और जल में बदल देते हैं।

यांत्रिक विधि (Mechanical Method)
  1. बूम इसमें (तेल क्षेत्र में) एक प्रकार की दीवार न बना दी जाती है।
  2. सोरबेन्ट्स- एक तरीका है जिसमें या तो अवशोषण या सोखने द्वारा तेल को हटाया जाता है।
  3. स्कीमर- यह एक प्रकार के वैक्यूम क्लीनर के समान है जो तेल को खींचता है।

जल प्रदूषण के दुष्प्रभाव

प्रदूषित जल का उपयोग करने से मानव-सहित सभी प्राणियों तथा वनस्पतियों पर कई प्रकार से प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जल प्रदूषण से उत्पन्न कुछ प्रमुख दुष्प्रभाव निम्नलिखित हैं-
  1. प्रदूषित पेय जल के प्रयोग से संक्रामक एवं खतरनाक रोग उत्पन्न होते हैं जिनमें हैजा, पीलिया, अतिसार, तपेदिक (टी. बी), टाइफाइड (मियादी बुखार), पेचिस आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। पारायुक्त जल पीने से मिनामाता और ऐस्बेस्टस के रेशेयुक्त जल के पीने से ऐस्बेटोसिस नामक प्राणघातक रोग हो जाते हैं। इससे उदर रोगों के अतिरिक्त फेफड़े का कैंसर हो जाता है।
  2. अधिक विषाक्त जल से मिट्टी में स्थित सूक्ष्म जीव मर जाते हैं और मिट्टी की उर्वरता कम या नष्ट हो जाती है अधिक खारे जल से सिंचाई करने पर मिट्टी की क्षारीयता में वृद्धि होती है और मिट्टी अनुर्वरक हो जाती है।
  3. जल में जहरीले रसायनों तथा भारी धात्विक पदार्थों के एकत्रण (सांद्रण) से पौधे तथा प्राणी विनष्ट हो जाते हैं।

जल प्रदूषण का नियंत्रण

जल प्रदूषण से उत्पन्न होने वाले भयंकर दुष्प्रभावों को देखते हुए इसके नियंत्रण के प्रभावी उपायों को अपनाना आवश्यक है। जल प्रदूषण की रोकथाम के लिए अपनाये जाने योग्य कतिपय महत्त्वपूर्ण उपाय निम्नलिखित हैं-
  1. पर्यावरणीय शिक्षा के प्रसार द्वारा जल प्रदूषण के कारणों तथा उससे होने वाले रोगों, बीमारियों और हानियों से सामान्य जनता को अवगत कराने तथा उसके प्रति जागरूकता उत्पन्न कराने हेतु सार्थक प्रयास किये जाने चाहिए। इस दिशा में सरकारी स्वास्थ्य संस्थाओं के साथ ही गैर-सरकारी तथा स्वंय-सेवी एजेन्सियां महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
  2. नगरों तथा कारखानों से निकलने वाले विषाक्त जल तथा अपशिष्ट पदार्थों को किसी नदी या झील में पहुँचाने से पहले उनके शोधन की व्यवस्था की जानी चाहिए। शोधन के पश्चात् ही ऐसा जल नदी, झील या तालाब में गिराया जाना चाहिए।
  3. नगरों तथा कारखानों से निकलने वाले गंदे जल को साफ करना तथा निथारना अधिक व्यय साध्य होता है। अतः ठोस अपशिष्ट पदार्थों यथा कूड़ा-करकट, मल-मूत्र, अपशिष्ट जल आदि से रासायनिक विधियों द्वारा उर्वरक आदि उपयोगी पदार्थ बनाये जा सकते हैं।
  4. लघु स्थलीय जलाशयों यथा झीलों और तालाबों के जल शुद्धीकरण के लिए जल प्रदूषण नाशक पौधों जैसे शैवाल जलकुम्भी आदि का प्रयोग किया जा सकता है।
  5. सरकार का यह उत्तरदायित्व हैं कि वह जल प्रदूषण के नियंत्रण संबंधी कानून बनाये और उसका कठोरता से पालन कराने की व्यवस्था सुनिश्चित करे। इसी उद्देश्य से भारत सरकार ने 1974 में जल प्रदूषण अधिनियम पारित किया था। जल की गुणवत्ता बनाये रखने तथा जल प्रदूषण के नियंत्रण के लिए समय-समय पर कई अन्य अधिनियम भी बनाये गये हैं।

वायु प्रदूषण

वायु गुणवत्ता का अपघटन एवं प्राकृतिक वायुमंडलीय पारिस्थितिकी से मिलकर वायु प्रदूषण होता है। वायु प्रदूषक गैस या कणकीय पदार्थ हो सकते हैं (जैसे हवा में तैरता हुआ एरोसोल जोकि ठोस तथा तरल से बना होता है)।
वायु प्रदूषकों को दो वर्गों में बांटा गया है, जैसे प्राथमिक तथा द्वितीयक वायु प्रदूषक। प्राथमिक प्रदूषक वायुमंडल में अनेक स्रोतों के द्वारा सीधे प्रवेश करते हैं। द्वितीयक प्रदूषक प्राथमिक वायु प्रदूषकों तथा अन्य वायुमंडलीय अवयवों जैसे जलवाष्प के आपस में रासायनिक प्रतिक्रिया होने के उपरांत उत्पन्न होते हैं। साधारणतः ये प्रतिक्रयाएं सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में होती है।

1. प्राथमिक वायु प्रदूषक तथा उनके प्रभाव
ये प्रदूषक प्राकृतिक अथवा मानवीय क्रियाकलापों के द्वारा सीधे वायु में निष्कासित होते हैं।
प्राथमिक वायु प्रदूषकों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कणकीय पदार्थ, कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO), हाइड्रोकार्बन (HCs) सल्फर डाई ऑक्साइड तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड शामिल हैं।

  • कणकीय पदार्थ- ठोस कणों या तरल बूंदों (एरोसोल) के बने होते हैं इनके छोटे होने के कारण ये वायु में हमेशा तैरते रहते हैं, उदाहरण के लिए कालिख, धुआँ धूल, ऐसबेस्टस, तंतु कीटनाशक कुछ धातुएं (जैसे Hg, Pb, Cu, तथा Fe) तथा जैविक कारकों जैसे सूक्ष्म धूल, बरूथी तथा पराग। तैरने वाले कणकीय पदार्थ निम्न वायुमंडल में (क्षोभमंडल) मनुष्य के श्वसन तंत्र को उत्तेजित करते हैं, जिससे कई प्रकार की बीमारियां जैसे दमा, दीर्घकालिक श्वसनी, शोथ इत्यादि हो जाती है। जब ऊपरी वायुमंडल में (समताप मंडल) जमा हुआ कणकीय पदार्थ विकिरण तथा ताप बजट में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन लाता है जिससे धरती की सतह का तापमान कम हो जाता है।
  • कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO)- जीवाश्मी ईधन के अपूर्ण दहन से बनता है। CO उत्सर्जन का 50 प्रतिशत ऑटोमोबाइल से निकलता है। यह सिगरेट के धुएं में भी उपस्थित रहता है। CO वायुमंडल में कम समय के लिए रहता है तथा इसका ऑक्सीकरण CO2 में हो जाता है। कार्बन मोनोक्साइड सभी जंतुओ के लिए हानिकारक है। श्वसन के साथ अंदर जाने पर यह रक्त की ऑक्सीजन वहन की क्षमता को घटाता है।
  • हाइड्रोकार्बन (HCs) या वाष्पशील जैविक कार्बन (VOCs)- हाइड्रोकार्बन, हाइड्रोजन तथा कार्बन के बने होते हैं। HCs प्राकृतिक रूप से कार्बनिक पदार्थों के अपघटन के समय एवं खास प्रकार के पौधे से उत्पन्न होते हैं (जैसे चीड़ के वृक्ष)। मीथेन (CH4) वायुमंडल में प्रचुर मात्रा में भूमि से निकला हाइड्रोकार्बन है। यह बाढ़ वाले धान के खेतों तथा दलदल से उत्पन्न होता है। बेंजीन तथा इसके व्युत्पन्न जैसे फार्मेल्डीहाइड इत्यादि, कारसिनोजेनिक हैं (वह पदार्थ, जिससे कैंसर होता है)। फार्मेल्डीहाइड घरेलू स्रोतों से उत्पन्न होता है, जैसे नया बना हुआ कारपेट आंतरिक प्रदूषण फैलाता है। कुछ आंशिक रूप से प्रतिक्रियात्मक HC द्वितीयक प्रदूषक में भी योगदान देते हैं। HC जीवाश्मी ईंधन के जलने (कोयला तथा पेट्रोलियम)से भी उत्पन्न होता है।
  • सल्फर डाइ ऑक्साइड (SO2)- सल्फर युक्त कोयला जलाने पर प्रमुख उत्सर्जक का काम करता है। अयस्क प्रगालक तथा तेल शोधकों से भी SO2 की महत्त्वपूर्ण मात्रा का उत्सर्जन होता है। वायु में SO2 की उच्च सांद्रता गंभीर श्वसन समस्या को जन्म देती है। पौधों के लिए भी इसकी उच्च सांद्रता खतरनाक है।
  • नाइट्रोजन ऑक्साइड (NO2)- मुख्यतः जीवाश्मी ईधन के उच्च ताप पर ऑटोमोबाइल इंजन में जलने पर N2 तथा O2 से बनता है। नाइट्रोजन ऑक्साइड लाल भूरे रंग की धुंध (भूरी हवा) संकीर्ण शहर के यातायात की वायु में रहती है जो हृदय तथा फेफड़े की समस्याओं को बढ़ाती है। यह कारसिनोजेनिक भी हो सकती है। नाइट्रोजन ऑक्साइड अम्ल वर्षा को बढ़ाता है क्योंकि वे जल की बूंद के साथ मिलकर नाइट्रिक अम्ल तथा अन्य अम्ल बनाता है।

2. द्वितीयक वायु प्रदूषक तथा उनके प्रभाव
सूर्य के विद्युत चुम्बकीय विकिरणों के प्रभाव के अधीन प्राथमिक प्रदूषकों तथा सामान्य वायुमंडलीय यौगिकों के बीच रासायनिक अभिक्रियाओं के परिणामस्वरूप द्वितीयक प्रदूषक का निर्माण होता है। उदाहरण के लिए प्राथमिक प्रदूषक सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) वायुमंडल की ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया करके सल्फर ट्राईऑक्साइड (SO3) बनाती है जो एक एक द्वितीयक प्रदूषक है सल्फर ट्राईऑक्साइड जलवाष्प से मिलकर एक और द्वितीयक प्रदूषक सल्फ्यूरिक अम्ल (H2SO4) बनाता है जो कि अम्ल वर्षा का घटक है। (NO2) के दो अन्य द्वितीयक प्रदूषक पेरॉक्सीएसिटिल नाइट्रेट (PAN) तथा नाइट्रिक अम्ल (HNO3) हैं। धूम कोहरा (SMOG) धुएं और कोहरे का मिश्रण होता है।

प्रकाश रसायनिक धूम कुहरा- द्वितीयक प्रदूषक का सबसे अच्छा उदाहरण प्रकाश रासायनिक धूम कुहरा है। जहां अधिक यातायात रहता है वहां गर्म परिस्थितियों तथा तेज सूर्य विकिरण से प्रकाश रासायनिक धूम कुहरा का निर्माण होता है। प्रकाश रासायनिक धूम कुहरा खास तौर से ओजोन तथा पेरोक्सिएसिटाइल नाइट्रेट (PAN) से बनता है। यह हमेशा भूरी हवा कहलाता है जहां सूर्य विकिरण तेज होता है। कम सूर्य विकिरण वाले क्षेत्रों में या खास मौसम में धूम कुहरा अपूर्ण रूप से बनता है। ऐसी वायु को भूरी वायु कहते हैं। ऑटोमोबाइल निर्वातक में HC तथा NO रहता है एवं ये शहरी पर्यावरण में O3 तथा PAN के निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

धूम कुहरा ओजोन, पौधे एवं जंतु जीवन को नुकसान पहुंचा सकता है, पौधों में, मुख्यतः पत्तों को नुकसान पहुंचाता है। ओजोन मनुष्यों में फेफड़े की बीमारी को बढ़ाता है। ओजोन एक प्रभावकारी ऑक्सीकारक के रूप में भी काम करता है। यह पुरानी इमारतों की सतह को भी संक्षारित कर देता है। संगमरमर की मूर्तियों को नुकसान करता है एवं सांस्कृतिक धरोहर का नुकसान करता है। कई पौधों की प्रजातियां धूम कुहरा में PAN से बहुत प्रभावित होता है। PAN क्लोरोप्लास्ट का नुकसान करता है जिससे प्रकाश संश्लेषण की क्षमता एवं पौधे का विकास कम हो जाता है। यह इलेक्ट्रॉन यातायात प्रणाली को बाधित करने के साथ-साथ एंजाइम प्रणाली को भी प्रभावित करता है जोकि कोशिकाओं के उपापचय में अहम भूमिका निभाते हैं। मनुष्यों की आंखों में PAN बहुत ज्यादा जलन पैदा करता है।

अम्ल वर्षा (Acid Rain):- अम्ल वर्षा की घटना को सर्वप्रथम प्रकाश में लाने का श्रेय रॉवर्ट एग्स स्मिथ को है। जलवर्षा के साथ अम्ल के अवपात को अम्ल वर्षा कहते हैं। वर्षा का जल भी पूर्णतया शुद्ध नहीं होता है क्योंकि वायुमण्डलीय कार्बन डाईऑक्साइड का वर्षा-जल मे विलयन हो जाता है जिस कारण वह थोड़ा अम्लीय हो जाता है। 7.0 PH मान वाला जल तटस्थ जल कहा जाता है। 7 से कम PH होने पर जल अम्लीय तथा अधिक होने पर क्षारीय हो जाता है। जब जल का PH 5.6 से कम हो जाता है तो वह जल जैविक समुदाय के लिए हानिकारक हो जाता है। मानव-जनित स्रोतों से निस्तृत सल्फर डाई-ऑक्साइड (SO2) तथा नाइट्रोजन के ऑक्साइड वायुमण्डल में पहुँचकर जल से मिलकर सल्फेट तथा सल्फ्यूरिक एसिड और नाइट्रस ऑक्साइड तथा नाइट्रिक अम्ल का निर्माण करते हैं। जब यह एसिड वर्षा के जल के साथ नीचे गिरता हुआ धरातलीय सतह पर पहुँचता है तो उसे अम्ल वर्षा कहते हैं।
अम्ल वर्षा को कभी-कभी झील कातिल भी कहा जाता है, क्योंकि झीलो, तालाबों एवं जलभण्डारों में जलीय जीवों की मृत्यु के लिए अम्ल वर्षा को प्रधान कारक ठहराया गया है।

अम्लीय वर्षा के प्रभाव
  • अम्लीय वर्षा का दुष्प्रभाव एक स्थान विशेष तक ही सीमित नहीं रहता और न ही यह SO2 तथा NO2 उगलने वाले औद्योगिक एवं परिवहन स्रोतों तक सीमित रहता है। यह स्रोतों से दूर अत्यधिक विस्तृत क्षेत्रों को भी प्रभावित करती है क्योंकि अम्लीय वर्षा के उत्तरदायी कारक वायु के वेग के साथ वायु की दिशा में हजारों किमी. दूर तक बह जाते हैं और आर्द्रता पाकर अम्लीय वर्षा के रूप में बरसते हैं।
  • पेयजल भण्डार दूषित हो जाते हैं। अम्लीय वर्षा से मानव में साँस एवं त्वचा की बीमारियाँ हो जाती हैं। आँखों में जलन की समस्या उत्पन्न होती है।
  • अम्लीय वर्षा का वनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है क्योंकि इससे पत्तियों की सतह पर मोम जैसी परत जमा हो जाती है जिससे पत्तियों के स्टोमेटा बंद हो जाते हैं फलस्वरूप प्रकाश संश्लेषण, वृद्धि जनन, वाष्पोत्सर्जन आदि जैविक क्रियाएँ मन्द पड़ जाती है। जर्मनी में 8 प्रतिशत के लगभग वन नष्ट हुए हैं।
  • जल स्रोतों यथा झील, नदी आदि की अम्लीयता बढ़ने से पानी के जीवों व वनस्पतियों पर हानिकारक असर होता है। अमेरिका और नार्वे स्वीडन, आदि देशों में अम्ल वर्षा के कारण अधिकांश झीलों के जैविक समुदाय समाप्त हो गए हैं।
  • अम्ल वर्षा से मृदा की अम्लता बढ़ जाती है जिससे पादप व जन्तु जगत को हानि होती है जैविक प्रक्रियाओं का अवनयन हो जाता है।
  • इससे भवनों को संक्षारण के कारण क्षति होती है। पत्थर एवं संगमरमर विशेष रूप से प्रभावित होता है। यूनान, इटली एवं कई यूरोपीय देशों में संगमरमर से बनी मूर्तियाँ तथा आगरा का प्रसिद्ध ताजमहल अम्लीय वर्षा से धुंधला पड़ता जा रहा है।

संभावित समाधान
अम्ल वर्षा पर्यावरण सम्बन्धी मौजूदा समस्याओं में से एक सबसे बड़ी समस्या है। अम्ल वर्षा अति प्रदूषित इलाके में बड़ी दूर तक बड़ी असानी से फैलती है। अम्लीय वर्षा के लिए मानवीय उत्पादन मुख्य रूप से जिम्मेदार है।
  1. विभिन्न स्रोतों से अम्लीय वर्षा उत्पन्न करने वाली SO2 एवं NO2 के उत्पादन पर नियंत्रण किया जाए। इन्हें वातावरण में घुलने से रोका जाए। अतः उद्योगों में स्क्रबर्स का उपयोग करें। बैग फिल्टर तथा कोलाइडल टैंक बनाये जाए।
  2. सौर ऊर्जा तथा पवन ऊर्जा के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाए।
  3. व्यक्तिगत वाहनों का प्रयोग कम किया जाए। समय-समय पर वाहनों की जाँच करवाई जाए।
  4. जल स्रोतों जहाँ पानी की अम्लीयता बढ़ गई है वहाँ पानी में चूना डाला जाए। इसी प्रकार मिट्टी की अम्लता नष्ट करने हेतु भी चूने का प्रयोग किया जाए।
अधिकांश भारतीय नगरों में वर्षा जल में अम्लता का स्तर सुरक्षा सीमा से कम है लेकिन बढ़ती उद्योग इकाइयों से हानिकारक गैसों की सान्द्रता पर रोकथाम पूरी तरह प्रभावी नहीं हो पा रही है। हमें अपने देश की उद्योग इकाइयों को नियंत्रित करना पड़ेगा।

वायु प्रदूषण का नियंत्रण

वायु प्रदूषण के कारणों तथा उससे हाने वाली हानियों और वनों के महत्त्व को बताते हुए विद्यार्थियों तथा सामान्य जनता को पर्यावरण एवं वायु प्रदूषण के प्रति जागरूक बनाने का सार्थक प्रयत्न किया जाना चाहिए।
घरेलू उपयोगों में अधिक धुआँ छोड़ने वाले परम्परागत ईधनों (लकड़ी, कोयला, उपला आदि) के स्थान पर प्राकृतिक गैस तथा विद्युत जैसे धुआं रहित ईधनों के जलाने से वायु प्रदूषण को कम किया जा सकता है।
वायु प्रदूषण को कम करने के लिए कारखानों तथा स्वचालित वाहनों में विद्युत स्थैतिक अवक्षेप तथा फिल्टर जैसे प्रदूषक नियंत्रक उपकरणों का उपयोग किया जा सकता है।
वायु को प्रदूषित करने वाली सामग्रियों तथा तत्त्वों के उत्पादन और उपभोग को प्रतिबंधित तथा नियंत्रित किया जाना चाहिए।
भूतल पर वृक्षों तथा वनों की उपस्थिति से वायुमंडल में ऑक्सीजन और कार्बन डाई ऑक्साइड का संतुलन बना रहता है। इससे वायुमंडल में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा अधिक बढ़ने नहीं पाती है। भूमंडलीय ताप वृद्धि में कार्बन डाई ऑक्साइड में होने वाली अवांछित वृद्धि का सर्वाधिक योगदान है। अतः वन संरक्षण हेतु वनों के काटने पर प्रतिबंध लगाने तथा वन रोपण को प्रोत्साहित किये जाने की आवश्यकता है।

ध्वनि प्रदूषण

ध्वनि एक विशेष प्रकार की दाब तरंग होती है जिसका संचरण प्रायः वायु से होकर होता है। ध्वनि के उत्पत्ति केन्द्र से दूरी बढ़ने के साथ-साथ उसकी तीव्रता कम होती जाती है। उच्च दाब या उच्च तीव्रता वाली ध्वनि को शोर कहते हैं। शोर अवांछित आवाज का द्योतक होता है जो मुनष्य के कान में प्रवेश करके अशांति और बेचैनी उत्पन्न करता है। अवांछित तीव्र ध्वनि या शोर को जिससे मनुष्यों में अंशाति और बेचैनी उत्पन्न होती है ध्वनि प्रदूषण कहते हैं। ध्वनि की सामान्य मापन कहते हैं। जिसकी माप 0 से लेकर 200 या इससे ऊपर तक की जा सकती है। शून्य डेसीबल मनुष्य के कान द्वारा सुनाई पड़ने वाली सर्वाधिक मंद ध्वनि का सूचक है।

ध्वनि प्रदूषण के स्त्रोत

ध्वनि प्रदूषण के स्रोत प्राकृतिक और मानवकृत (कृत्रिम) दोनों हो सकते हैं। प्राकृतिक स्रोतों में मेघ गर्जन, आंधी, तूफान, तरंगें आदि। मानव जाति स्रोतों के अन्तर्गत स्वचालित मोटर वाहनों, कारखानों की मशीनों, रेलगाड़ियों, वायुयानों, वाद्य यंत्रों, पटाखों तथा बमों के विस्फोट आदि से उत्पन्न तीव्र ध्वनियों को सम्मिलित किया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में ध्वनि प्रदूषण नगण्य या अत्यल्प होता है। ध्वनि प्रदूषण के प्रमुख क्षेत्र नगरीय तथा औद्योगिक केन्द्र होते हैं। जहाँ स्वचालित मोटर वाहनों, कारखानों की मशीनों, रेलगाड़ियों, वायुयानों, हेलीकाप्टरों, और ध्वनि विस्तार यंत्रों (लाउडस्पीकर आदि) से तीव्र ध्वनियाँ प्रसारित होती हैं जिससे ध्वनि प्रदूषण में वृद्धि होती है।

ध्वनि प्रदूषण के दुष्प्रभाव

  • अति तीव्र ध्वनि से मनुष्य के श्रवण तंत्र पर अत्यंत बुरा प्रभाव पड़ता है। कभी-कभी अत्यधिक तीव्र ध्वनि (शोर) के दुष्प्रभाव से मनुष्य की श्रवण शक्ति शक्ति समाप्त हो जाती है, कान के पर्दे तक फट जाते हैं और वह स्थायी रूप से बधिर हो जाता है।
  • तीव्र ध्वनि के कारण अध्ययनरत व्यक्तियों की एकाग्रता नष्ट हो जाती है, सोते हुए व्यक्ति की नींद भंग हो जाती है और इससे स्मृति क्षीणता, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन आदि दशाएं उत्पन्न होती हैं।
  • लगातार अवांछित तीव्र ध्वनि या शोर के दुष्प्रभाव से मनुष्य कई प्रकार की शारीरिक एवं मानसिक विकृतियों से ग्रस्त हो जाता है। ध्वनि प्रदूषण से उच्च रक्तचाप, हृदयरोग, अनिद्रा, तनाव, पाचन तंत्र में अव्यवस्था, उत्तेजना, चिड़चिड़ापन आदि विकृतियाँ तथा बीमारियाँ उत्पन्न होती है।
  • 120dB से अधिक तीव्र ध्वनि का गर्भवती महिलाओं तथा गर्भस्थ शिशु पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। स्वीकार्य ध्वनि स्तर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 25dB से 30dB, नगरीय आवासीय क्षेत्रों के लिए 30dB से 40dB और औद्योगिक क्षेत्रों के लिए 50dB से 60dB मानी जाती है। इससे तीव्र ध्वनि सम्बन्धित क्षेत्रों के लिए हानिकारक होती है।

ध्वनि प्रदूषण का नियंत्रण

ध्वनि प्रदूषण के नियंत्रण के लिए प्रभावकारी प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं-
  • आवासीय क्षेत्रों से होकर तीव्र ध्वनि वाले मोटर वाहनों के गुजरने तथा अति उच्च ध्वनि वाले हार्न बजाने पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।
  • ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रण करने के लिए कारखानों को आवासीय क्षेत्र से दूर स्थापित किया जाना चाहिए।
  • बाजारों मेलों, सार्वजनिक स्थानों, आवासीय क्षेत्रों आदि में लाउडस्पीकरों तथा अन्य ध्वनि विस्तारक यंत्रों के द्वारा होने वाले अत्यधिक शोर को कम करने हेतु प्रभावी उपाय तथा निषेधात्मक कानून का सहारा लिया जा सकता है।
  • सभी प्रकार के मोटर वाहनों तथा शोर करने वाली औद्योगिक मशीनों में ध्वनि मंदक का प्रयोग अनिवार्य किया जाना चाहिए।
  • तीव्र तथा अवांछित ध्वनि वाले क्षेत्रों (जैसे मेलों, उत्सवों आदि) में पहुँचने वाले या वहाँ रहने वाले लोग अपने कान में रूई या कर्ण प्लग लगाकर ध्वनि प्रदूषण से बचाव कर सकते है।
  • कानूनी नियंत्रण भारत में ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण के लिये पृथक् अधिनियम का प्रावधान नहीं है। भारत में ध्वनि प्रदूषण को वायु प्रदूषण में ही शामिल किया गया है। वायु (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1981 में सन् 1987 में संशोधन करते हुए इसमें 'ध्वनि प्रदूषकों' को भी 'वायु प्रदूषकों' की परिभाषा के अन्तर्गत शामिल किया गया है। पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 6 के अधीन भी ध्वनि प्रदूषकों सहित वायु तथा जल प्रदूषकों की अधिकता को रोकने के लिये कानून बनाने का प्रावधान है। इसका प्रयोग करते हुए ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) नियम, 2000, पारित किया गया है। इसके तहत् विभिन्न क्षेत्रों के लिये ध्वनि के संबंध में वायु गुणवत्ता मानक निर्धारित किये गए हैं। विद्यमान राष्ट्रीय कानूनों के अंतर्गत भी ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण का प्रावधान है। ध्वनि प्रदूषकों को आपराधिक श्रेणी में मानते हुए इसके नियंत्रण के लिये भारतीय दंड संहिता की धारा 268 तथा धारा 290 का प्रयोग किया जा सकता है। पुलिस अधिनियम, 1861 के अन्तर्गत पुलिस अधीक्षक को अधिकृत किया गया है कि वह त्योहारों और उत्सवों पर गलियों में बजने वाले संगीत की तीव्रता के स्तर को नियंत्रित करा सकता है।

नाभिकीय या रेडियोधर्मी प्रदूषण

रेडियोधर्मी (रेडियो सक्रिय) पदार्थों के विकिरण से उत्पन्न होने वाले पर्यावरण प्रदूषण को नाभिकीय या रेडियोधर्मी प्रदूषण कहते हैं। रेडियोधर्मी पदार्थ के अन्तर्गत उस तत्त्व या पदार्थ को सम्मिलित किया जाता है जो स्वतः अन्य तत्त्वों में विखण्डित होता है और उससे विशिष्ट प्रकार की अदृश्य किरणें (या तरंगे) बाहर निकलती हैं।
रेडियोधर्मी प्रदूषण की माप रोन्टजेन इकाई में की जाती है। इस मापन इकाई का नामकरण एक्स-किरणों (X-rays) के आविष्कारक जर्मन वैज्ञानिक रोन्टजेन (W.C. Roentgen) के नाम पर किया गया है। इसके अतिरिक्त रेडियोधर्मी प्रदूषण की माप रैड (Rad) नामक इकाई में भी की जाती है।

रेडियोधर्मी प्रदूषण के प्रकार

रेडियोधर्मी प्रदूषण की उत्पत्ति प्राकृतिक घटनाओं या मानवीय क्रियाओं द्वारा होती है। अतः इसे दो वर्गों में रखा जा सकता है।
  1. प्रकृतिजन्य प्रदूषण - पृथ्वी के भूगर्भ में पर्याप्त मात्रा में रेडियोधर्मी पदार्थ पाये जाते हैं जिनसे उत्सर्जित किरणों का प्रभाव पृथ्वी के तल पर भी होता है। इन किरणों की तीव्रता अधिक न होने के कारण इनका जीवधारियों पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है। किन्तु जहाँ यूरेनियम, थोरियम, प्लूटोनियम, रेडियम आदि रेडियोधर्मी अयस्कों (Ores) का खनन किया जाता है वहाँ पर अन्य किसी कारण से ये अयस्क (खनिज) धरातल पर आ जाते हैं और वहाँ के निवासियों को बुरी तरह प्रभावित करते हैं।
  2. मानवजन्य प्रदूषण- रेडियोधर्मी प्रदूषण की उत्पत्ति मुख्यतः मानवीय क्रिया-कलापों के द्वारा होती है। रेडियोधर्मी प्रदूषण का प्रसार अधिकतर परमाणु बमों के विस्फोट, परमाणु भट्टियों से होने वाले रिसाव रेडियोधर्मी व्यर्थ पदार्थों के निस्तारण रेडियोधर्मी पदार्थो जैसे थोरियम, यूरेनियम प्लेटिनम, आदि के खनन द्वारा होता है। मानव द्वारा विभिन्न उद्देश्य से प्रयोग किये जाने वाले कुछ अन्य पदार्थों से भी रेडियोधर्मी प्रदूषण की उत्पत्ति होती है। ऐसे पदार्थों में कोबाल्ट-60, कार्बन-14, स्ट्रांसियम-90 कैल्सियम-137 तथा ट्रीटीयम आदि उल्लेखनीय हैं।

रेडियोधर्मी प्रदूषण के दुष्प्रभाव

रेडियोधर्मी पदार्थों के केन्द्रकों से अल्फा, बीटा और गामा कण किरणों के रूप में स्वतः निकलते रहते हैं। मनुष्य तथा अन्य जीवों पर इनके खतरनाक दुष्प्रभाव पाये जाते हैं जिनमें कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं-
  1. नाभिकीय विकिरण आयनीकरण द्वारा जीवित ऊतकों के जटिल अणुओं को विघटित करके कोशिकाओं को नष्ट कर देता है। इन मृत कोशिकाओं के कारण कई प्रकार के प्राणघातक रोग जैसे कैंसर, चर्मरोग आदि उत्पन्न होते हैं।
  2. रेडियोधर्मी प्रदूषण के कारण जीन्स और गुणसूत्रों में हानिकारक उत्परिवर्तन होते हैं। इससे गर्भस्थ शिशुओं की मृत्यु हो जाती है या उनके विभिन्न अंग विचित्र या असाधारण प्रकार के हो जाते हैं।
  3. रेडियोधर्मी प्रदूषण के कारण मनुष्यों में कई प्रकार के जानलेवा रोग हो जाते हैं जिनमें रक्त कैंसर, अस्थि कैंसर, टी.बी आदि उल्लेखनीय हैं।
  4. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 1945 में अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी नगरों पर परमाणु बम गिराया था। दोनों नगर नष्ट हो गये थे। रेडियोधर्मी विकिरण के प्रभाव से अधिकांश लोग झुलसकर मर गये थे और जो बचे विकलांग हो गये। रेडियोधर्मी विकिरण का प्रभाव दीर्घकाल (कई हजार वर्षो) तक रहता है इसलिए बम विस्फोट के 60 वर्ष बाद भी जापान के इन नगरों में जन्मजात विकलांग लोगों की संख्या अधिक है।
  5. वर्षा के द्वारा ये रेडियोधर्मी पदार्थ जल में और जल के साथ मिट्टी में प्रवेश कर जाते हैं। मृदा में स्थित इन तत्त्वों को स्थलीय पौधे अपनी जड़ों द्वारा ग्रहण करते हैं और जलीय पौधे अपनी सतह की कोशिकाओं द्वारा अवशोषण करके प्राप्त करते हैं। जलीय पौधों से खाद्य श्रृंखला के रूप में ये रेडियोधर्मी पदार्थ मछलियों तथा अन्य शाकाहारी जन्तुओं में पहुंचते हैं और अंत में इनका प्रवेश मानव शरीर में भी हो जाता है।

रेडियोधर्मी प्रदूषण से बचाव के उपाय

  1. रेडियोधर्मी प्रदूषण की भयंकरता को देखते हुए यूरेनियम, थोरियम, प्लूटोनियम, रेडियम आदि रेडियोधर्मी पदार्थों के उत्खनन, उत्पादन, उपयोग आदि पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। परमाणु ऊर्जा के स्थान पर ऊर्जा के अन्य वैकल्पिक तथा नवनीकृत स्रोतों का उपयोग करना ही उचित होगा।
  2. रेडियोधर्मी पदार्थों का उपयोग करने वाली मशीनों तथा उपकरणों के पुराने या बेकार हो जाने पर उन्हें कबाड़ी के हाथों में न बेचा जाये, क्योंकि उनसे रेडियोधर्मी पदार्थों के रिसाव का खतरा बना रहता है। ऐसे यंत्रों तथा उपकरणों के संग्रह के लिए सरकारी संग्रहालय स्थापित किये जाने चाहिए।
  3. खतरनाक रेडियोधर्मी प्रदूषण से बचाव के लिए आवश्यक है कि परमाणु अस्रों, परमाणु पनडुब्बियों आदि के निर्माण तथा उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाये।

विद्युत चुम्बकीय विकिरण प्रदूषण

ब्रिटिश वैज्ञानिक मैक्सवेल (1860) ने बताया कि जब विद्युत परिपथ में विद्युत धारा उच्च आवृत्ति से बदलती है तो इसके चारों ओर ऊर्जा तरंगों के रूप में 'विद्युत चुम्बकीय तरंगे' प्रसारित होती हैं। एक्स किरणें, गामा, रेडियो, इंफ्रारेड आदि सभी विद्युत चुम्बकीय तरंगों में आती हैं।

विद्युत चुम्बकीय तरंगों के प्रभाव

  • विद्युत चुम्बकीय तरंगों का प्रभाव मानव एवं जन्तु दोनों समुदायों पर पड़ता है।
  • इससे अनिद्रा, मानसिक रोग, आँख, अंडकोश, पाचन तंत्र, पित्ताशय आदि पर प्रभाव पड़ता है।

तापीय प्रदूषण

तापीय प्रदूषण का अर्थ तापमान में वृद्धि के कारण उत्पन्न प्रदूषण से है जिसका प्रभाव स्थल, वायु और जल सभी पर होता है। तापीय प्रदूषण स्थानीय, प्रादेशिक अथवा वैश्विक किसी भी स्तर पर हो सकता है। नगरीय क्षेत्र के ऊपर तापमान के बढ़ जाने से तापीय द्वीप बन जाता है। इसी प्रकार कभी-कभी प्रादेशिक स्तर पर तापमान में एकाएक वृद्धि दो जाने से भंयकर समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं।

तापीय प्रदूषण के दुष्प्रभाव

  • भूमंडलीय ताप में वृद्धि होने से जलवायु में परिवर्तन होगा जिसके परिणामस्वरूप मानव सहित विभिन्न जीव समुदायों तथा पर्यावरण के विभिन्न पक्षों पर भयंकर दुष्प्रभाव पड़ने की सम्भानाएं व्यक्त की जा रही हैं।
  • पृथ्वी के तापमान में वृद्धि होने से स्थायी हिमनदों तथा हिम टोपियों के बर्फ पिघल जायेंगे जिससे सागर तल में उत्थान होगा और सागरों की तटवर्ती भूमि तथा असंख्य द्वीप जलमग्न हो जायेंगे। इससे वाष्पीकरण तथा वर्षण की मात्रा एवं प्रकृति, भूमंडलीय ऊष्मा संतुलन, पारिस्थितिकीय उत्पादकता और मानव सहित पौधों तथा जन्तुओं के स्वास्थ्य तथा क्रियाशीलता आदि में व्यापक परिवर्तन हो सकते हैं।
  • भूमंडलीय तापन में हो रही वृद्धि विश्व समुदाय के सम्मुख बड़ी चुनौती बनती जा रही है और चिन्ता का विषय बन गयी है। इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महत्त्वपूर्ण प्रयास भी किये जा रहे हैं।

तापीय प्रदूषण के निवारक उपाय

तापीय प्रदूषण मुख्यतः भूमंडलीय तापन को रोकने के लिए स्थानीय और विश्व स्तर पर उन उपायों को अपनाना आवश्यक है जिससे हरितगृह प्रभाव वाली गैसों की वृद्धि को नियंत्रित किया जा सके। इसके लिए कुछ प्रभावकारी उपाय निम्नलिखित हैं:
  1. जीवाश्म ईंधनों के प्रयोग में कमी लाना।
  2. गैर परम्परागत ऊर्जा का प्रयोग।
  3. वन रोपण।
  4. खेतों की जुताई कम करना।

ठोस अपशिष्ट प्रदूषण

ठोस अपशिष्ट का तात्पर्य उन पदार्थों से हैं जो उपयोग के पश्चात् बेकार तथा निरर्थक हो जाते हैं और उन्हें सामान्यतः घरों से बाहर लाकर सड़कों पर एकत्रित किया जाता है या अन्यत्र फेंक दिया जाता है। इसके अंतर्गत घरेलू कूड़े-कचरे, टूटे काँच के सामान, प्लास्टिक के डिब्बे, पॉलीथिन के थैले, ध्वस्त मकानों के मलवे, औद्योगिक कचरे, राख आदि विविध प्रकार के ठोस पदार्थ सम्मिलित होते हैं। इन ठोस अपशिष्ट पदार्थों के समुचित निस्तारण तथा डम्पिग के लिए अधिक स्थान की आवश्यकता होती है। तीव्रगति से बढ़ती हुई जनसंख्या और औद्योगीकरण तथा नगरीकरण में तेजी से होने वाली वृद्धि से अपशिष्ट पदार्थों की मात्रा निरन्तर बढ़ती जा रही है और उनके समुचित निस्तारण के अभाव में अनेक प्रकार की पर्यावरणीय समस्याएँ (पर्यावरण प्रदूषण) भी विकराल और असाध्य होती जा रही हैं। ज्ञातव्य है कि ठोस अपशिष्ट पदार्थों के निपटारे एवं तज्जनित प्रदूषण की समस्या ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक भयंकर नहीं है किन्तु औद्योगिक तथा नगरी क्षेत्रों में ठोस अपशिष्ट पदार्थों से उत्पन्न प्रदूषण की समस्या विश्वव्यापी है। ठोस अपशिष्ट पदार्थों के निपटान की समस्या केवल उद्योग प्रधान विकसित देशों में नहीं बल्कि विकासशील देशों के निस्तारण केन्द्रों के लिए भी दुष्कर एवं चिन्तनीय बन गयी है। उदाहरण के लिए न्यूयार्क महानगर में प्रतिदिन लगभग 25 हजार टन ठोस अपशिष्ट पदार्थ निकलते हैं।

ठोस अपशिष्ट पदाथों के स्त्रोत/प्रकार

  • खनन अपशिष्ट।
  • कृषि अपशिष्ट।
  • औद्योगिक अपशिष्ट।
  • नगरपालिकाओं से निकले अपशिष्ट।
  • पैकिंग अपशिष्ट।
  • मानव अपशिष्ट।
  • जन्तु अपशिष्ट आदि।

अपशिष्ट पदार्थों के दुष्प्रभाव

  • सामान्यतः छोटे-बड़े सभी नगरों में वस्तुओं के उपयोग के पश्चात् घरों से प्रतिदिन कूड़ा-करकट तथा अनेक प्रकार के ठोस अपशिष्ट पदार्थ बाहर निकाले जाते हैं और उन्हे सड़क के किनारे एकत्रित किया जाता है।यदि कूड़े तथा अपशिष्ट पदार्थों के एकत्रित ढेर को शीघ्र नगर से बाहर नहीं किया जाता तो उनके सड़ने पर बिखरने से भयंकर बीमारियों के फैलने की आशंका बनी रहती है।
  • नगरीय प्रशासन की उपेक्षा और जनता की लापरवाही तथा अज्ञानता के परिणामस्वरूप अधिकांश भारतीय नगर की सड़कों पर बड़े-बड़े कूड़े के ढेर दिखाई पड़ते हैं जो कभी-कभी कई दिन ही नहीं बल्कि कई सप्ताह तक अपने ही स्थान पर पड़े रहते हैं और सुअर आदि पशु उसे दूर तक बिखरेते रहते हैं। बरसात के मौसम में कूड़े के सड़ने से अत्यधिक दुर्गन्ध निकलने लगती है और अनेक प्रकार की बीमारियां तथा जानलेवा संक्रामक रोग फैलते रहते हैं।
  • हाल के वर्षों में प्लास्टिक के बर्तनों एवं बोतलों तथा पालीथिन का प्रयोग नगरों में इतना अधिक होने लगा है कि उनके ढेर से एक नयी किन्तु अति गंभीर समस्या उत्पन्न हो गयी है। प्लास्टिक पदार्थों का कूड़ों में ढेर लग जाता है जो न तो सड़ते हैं और न तो जलाने पर पूर्णतया नष्ट ही होते हैं। पालीथिन के थैले तथा प्लास्टिक के सामान नालियों, नालों, सीवर पाइपों आदि में अक्सर फंस जाते हैं जिससे जल निकासन अवरूद्ध हो जाता है।

नियंत्रण के उपाय (अपशिष्ट प्रबंधन)

  • विकसित देशों में नगरीय कूड़ा-कचरा को एकत्रित करने के लिए त्वरित कार्य करने वाली स्वचालित मशीनों (यंत्रों) का प्रयोग किया जाता है।
  • ठोस अपशिष्ट पदार्थों के प्रबंधन का प्रथम चरण है। उनकों समुचित रूप से एकत्रित करना इसके लिए आवश्यक है कि नगरीय कचरे को प्रतिदिन नियमित रूप से एकत्रित किया जाये और कूड़े के ढेर को शीघ्र हटा लिया जाये। नगरों के व्यस्त बाजारों तथा सब्जी एवं फल की मण्डियों से अपशिष्ट पदार्थों को नगरपालिका को दिन में दो बार संग्रह करवाना चाहिए।
  • इसके साथ ही इसमें जनता का सहयोग भी अनिवार्य होता है। जनता में भी यह जागरूकता लाने का प्रयत्न किया जाये कि लोग अपने गृहों से निकले हुए कचरों तथा अपशिष्ट पदार्थों को सड़क पर न फेंकें बल्कि निर्धारित स्थान पर संचित करे और साथ ही नष्ट न होने वाले पदार्थों जैसे पॉलीथिन की थैलियों तथा प्लास्टिक के वर्तनों आदि का यथासंभव कम उपयोग करें।
  • अपशिष्ट पदार्थों का समुचित निस्तारण अपशिष्ट प्रबंधन का दूसरा महत्त्वपूर्ण चरण है आधुनिक वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग।

ई-अपशिष्ट प्रदूषण

उपयोग के बाद बेकार एवं निरर्थक हो चुके इलेक्ट्रिकल एवं इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को 'ई-अपशिष्ट' की संज्ञा दी जाती है। ई-अपशिष्ट के प्रमुख स्रोत कम्प्यूटर, टी. वी. रेडियों, मोबाइल, वाशिंग मशीन, सीडी प्लेयर, प्रिंटर, रेफ्रिजरेटर, ए.सी., वेक्यूम क्लीनर, पंखा, प्रेस आदि। जिसमें अनेक हानिकारक रसायन एवं भारी धातुएँ यथा- सीसा, कैडमियम, पारा, बेरीलियम, आर्सेनिक आदि पाये जाते हैं जो मानव स्वास्थ्य, पर्यावरण एवं जीव-जन्तुओं के लिए अत्यन्त खतरनाक है।

ई-वेस्ट का प्रभाव

ई-अपशिष्ट में ढेर सारे खनिज, रसायन व भारी धातुऐं यथा-पारा, सीसा, आर्सेनिक, बेरीलियम, कैडमियम, PVC (पॉली बिनाइल क्लोराइड) सेलेनियम आदि तत्त्व पाये जाते हैं जो मानव स्वास्थ्य के साथ-साथ पर्यावरण तथा जीव-जन्तुओं को प्रभावित करते हैं, यथा-
  • सीसा (Led)- यह किडनी व दिमाग पर प्रभाव डालता है तथा इससे जनन क्षमता (गर्भधारण) में कमी आती है। यह पौधों, जानवरों तथा अन्य सूक्ष्म जीवों को भी प्रभावित करता है।
  • आर्सेनिक - यह फेफड़े के कैंसर, त्वचा कैंसर तथा तंत्रिका क्षति का कारक है।
  • पारा- यह केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र एवं किडनी को क्षतिग्रस्त करता है इससे मिनामाटा नामक रोग होता है। पारा तथा आर्सेनिक भूमिगत जल को प्रदूषित करते हैं जिससे जलीय पारितंत्र प्रभावित होता है।
  • पॉली विनाइल क्लोराइड- इसे जलाने पर हाइड्रोजन क्लोराइड गैस उत्पन्न होती है जो जल के साथ संयुक्त होकर HCL बनाती है। HCL के कारण श्वसन सम्बन्धी समस्यायें उत्पन्न होती हैं।
  • कैडमियम- यह किडनी को क्षतिग्रस्त करता है तथा हड्डी को कमजोर करता है।
  • सेलेनियम- इससे सेलेनॉसिस नामक रोग होता है जिसमें बालों को क्षति, नाखुनों का भंगुर होना तथा तंत्रीय असमानता पायी जाती है।
  • बेरीलियम- इससे कैंसर एवं बेरीलियम नामक बीमारी होती है जिसमें श्वसन समस्या एवं सीने में दर्द आदि होता है।
  • बेरियम- इससे मस्तिष्क फूल जाता है तथा माँसपेशियाँ कमजोर हो जाती है एवं हृदय को क्षति पहुँचती है।
  • ट्राईक्लों इथिलरीन- यह लीवर तथा किडनी को क्षतिग्रस्त करता है एवं प्रतिरक्षा तंत्र को अप्रभावी बनाता है।
  • ब्रोमिनेटड फ्लेम रिटार्डेट- इसका प्रयोग पदार्थों को फ्लेम प्रतिरोधक बनाने में किया जाता है। इससे वृद्धि, लैंगिक विकास तथा प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है।
  • डाई ऑक्सीजन एवं फुरांस- इससे त्वचा विकार एवं लीवर सम्बन्धी समस्यायें होती हैं तथा प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर होता है।
  • पॉलीक्लोरीनेटेड वाई फिनाइल्स- इससे प्रतिरक्षा तंत्र, तंत्रिका तंत्र, प्रजनन तंत्र तथा लीवर को क्षति होती है।

ई-अपशिष्ट प्रबन्धन :

ई-अपशिष्ट भी एक प्रकार का ठोस अपशिष्ट होता है। इसके निपटान के लिए मुख्यतः लैंड फिलिंग एवं दहन (Incinaration) प्रक्रिया का प्रयोग किया जाता है।

1. भूमि भराव :- यह सामान्यतः नगरीय क्षेत्रों में अवस्थित गड्ढेनुमा भाग होता है जिसमें ठोस अपशिष्ट कचरे को लाकर डंप किया जाता है। पूरा भर जाने के बाद इसे मिट्टी से भर दिया जाता है।

लाभ
  • यह एक सस्ता विकल्प है।
  • स्थानीय लोगों के लिये रोजगार की उत्पत्ति करता है।
  • अन्य निपटान तरीकों की तुलना में बहुत प्रकार के अपशिष्ट का निपटान एक साथ ही किया जाता है।
  • इससे निकलने वाली मिथेन गैस से ऊर्जा बनाई जा सकती है।

हानि
  • यह क्षेत्र बहुत प्रदूषित व बदबूदार होता है।
  • इससे स्थानीय क्षेत्र में वायु प्रदूषण होता है। इससे निकलने वाली गैस वैश्विक तापन में योगदान देती है।
  • भूमिगत जल विषैला हो जाता है।
  • एक बार इस क्षेत्र का उपयोग होने पर पुनः इसका प्रयोग संभव नहीं है।

2. दहन भस्मीकरण :- भस्मीकरण एक निपटान विधि है जिसमें अपशिष्ट पदार्थों का दहन शामिल है। भस्मीकरण में ठोस अपशिष्ट को 1000°C पर जलाया जाता है। ठोस अपशिष्ट राख, गैस व ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है। इससे उत्पन्न ऊर्जा का प्रयोग बिजली बनाने में किया जाता है। इसे खतरनाक कचरा (जैसे जैविक चिकित्सा अपशिष्ट) निपटाने के लिये एक व्यावहारिक पद्धति के रूप में मान्यता प्राप्त है। परंतु गैसीय प्रदूषकों के उत्सर्जन के कारण भस्मीकरण अपशिष्ट निपटान की पद्धति विवादस्पद है।

लाभ
  • इसके लिये बहुत कम भूमि की आवश्यकता होती है।
  • अपशिष्ट के भार में 25 प्रतिशत की कमी आ जाती है।
  • इससे स्थानीय जल निकायों एवं भौमजल पर प्रदूषण का खतरा नहीं होता है।
  • इसे आवासीय क्षेत्र के निकट स्थापित किया जा सकता है।
  • उत्पन्न गैस का प्रयोग बिजली बनाने में किया जाता है।

हानि
  • महँगी तकनीक।
  • कुशल श्रमिक की आवश्यकता।
  • हवा में निकलने वाले रसायन ओजोन परत को नुकसान पहुंचा सकते हैं तथा ये उच्च प्रदूषक हो सकते है।
  • उच्च ऊर्जा की आवश्यकता।

प्लास्टिक प्रदूषण

भूमि या जल में प्लास्टिक निर्मित वस्तुओं के इकट्ठा होने को प्लास्टिक प्रदूषण की संज्ञा से अभिहित किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, "हम प्लास्टिक बम पर बैठे हुए हैं।" ऐसा उच्चतम न्यायालय ने CPCB (Central Pollution Control Board) की रिपोर्ट के आधार पर कहा, जिसमें बताया गया है कि भारत प्रत्येक वर्ष 56 लाख टन प्लास्टिक वेस्ट उत्पन्न करता है तथा दिल्ली अकेला 689.5 टन उत्पादन के लिये जिम्मेदार है।

प्लास्टिक के स्त्रोत

प्लास्टिक के प्रमुख स्रोत अधोलिखित हैं, यथा -
  • Chips and Confectionary Bags (19%)
  • Botlles and Cups Lids (12%)
  • PET Bottles (10%)
  • Supermarket/Retail Bags (7.5%)
  • Straws (7%)
  • Garbage Bags (6.5%)
  • Packaging (6.5%)
  • Food Bags (5%) आदि।

प्लास्टिक प्रदूषण का प्रभाव

वर्तमान समय में प्लास्टिक प्रदूषण एक विकराल समस्या का रूप धारण करता जा रहा है। इसका प्रभाव मानव जीव जन्तु, जल, भूमि एवं पर्यावरण आदि सभी पर पड़ता है।
  • प्लास्टिक में मौजूद रसायन से कैंसर, जन्मजात विकृति, एवं आनुवांशिक परिवर्तन जैसी बिमारियों के साथ-साथ मस्तिष्क समस्या, थाइरॉइड समस्या व पाचन तंत्र की समस्या उत्पन्न होती है।
  • प्लास्टिक के दहन से कार्बन मोनो ऑक्साइड, डाइऑक्सीन व हाइड्रोजन साइनाइट एवं फुरान्स जैसी जहरीली गैसें उत्पन्न होती हैं। ये गैसें मनुष्य के श्वसन तंत्र, तंत्रिका तंत्र तथा प्रतिरक्षा तंत्र को क्षति पहुँचाती हैं।
  • जल के माध्यम से प्लास्टिक मानव खाद्य-श्रृंखला में पहुँचकर उसके स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।
  • भूमि में प्लास्टिक की उपस्थिति खनिज, जल एवं पोषक तत्त्वों के अवशोषण में बाधक बनकर उसकी उर्वरा शक्ति को क्षीण करते हैं।
  • प्लास्टिक मलवे का प्रभाव जलीय परितंत्र पर भी पड़ता है।

जैव-प्रदूषण

रोगकारक सूक्ष्म जीवों से संक्रमित कर मनुष्यों, फसलों, फलदायी वृक्षों व सब्जियों का विनाश करना जैव-प्रदूषण है। सन् 1846 में जीनीय एकरूपकता के कारण यूरोप में आलू की समस्त फसल नष्ट हो गयी जिसके फलस्वरूप 10 लाख लोगों की मृत्यु हो गयी और 15 लाख लोग अन्यत्र पलायन कर गये। चूँकि सम्पूर्ण आलू में एक ही प्रकार का जीन था। अतः सब एक ही प्रकार के रोगाणुओं द्वारा संक्रमित होकर नष्ट हो गयी, सन् 1984 ई. में फ्लोरिडा में जीनीय एकरूपता के कारण खट्टे फलों की सारी फसलें एक ही प्रकार के बैक्टीरिया द्वारा संक्रमित होकर नष्ट हो गयीं। अतः इस जैवीय प्रदूषण को दूर करने के लिए एक करोड़ अस्सी लाख पेड़ों को मजबूरन काट कर गिरा देना पड़ा। अब इस जैव प्रदूषण को जैव हथियार के रूप में प्रयोग किया जा रहा है।
अक्टूबर, 2001 में संयुक्त राज्य अमेरिका के सामाचार पत्र 'सन' के फोटो सम्पादक बॉब स्टीवेंस की एंथ्राक्स नामक रोग से हुई मृत्यु ने जैव प्रदूषण को जैव आतंक का दर्जा दिला दिया। बाद में न केवल अमेरिका बल्कि भारत पाकिस्तान तथा अन्य देशों में भी एंथ्राक्स बैक्टीरिया से प्रदूषित लिफाफे लोगों के पास पहुँचने लगे और कई देशों के लोग इस जैव-आतंक से भयाक्रान्त हो गये।
जैव-प्रदूषण के माध्यम से फैलाये जा सकने वाले घातक रोगों में -एंथ्राक्स, बोटूलिज्म, प्लेग, चेचक टुयुलरेमिया एवं विषाणुवी रक्त स्रावी ज्वर प्रमुख हैं।

जैव प्रदूषण से निपटने के उपाय

  • बीमारियाँ फैलाने वाले रोगाणुओं पर अध्ययन, अनुसधान तथा परीक्षण करने के लिए रक्षा अनुसंधान व विकास संगठन (DRDO) ने 1972 में ग्वालियर (मध्यप्रदेश) में एक प्रयोगशाला स्थापित की।
  • भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने सन् 2000 में राष्ट्रीय डिसीज सर्विलेंस प्रोग्राम (NDSP) आरम्भ किया।
  • DRDO ने एक ऐसा फिल्टर बनाया है जो सेना के जवानों को सभी तरह के जैविक एवं रासायनिक हमलों से सुरक्षित रखता है।
  • जैव प्रदूषण व जैव आतंक से निपटने के लिए अमेरिका के रक्षा मुख्यालय पेन्टागन ने इस दिशा में व्यापक कदम उठाया है। वे हवा में उड़ते जीवाणुओं विषाणुओं को पकड़ने के लिए आयन ट्रैप मास स्पेक्ट्रोमीट्री एण्ड लेसर इन्डयुस्ड ब्रेक डाउन स्पेक्ट्रोस्कोपी नामक यंत्रो की मद्द लेते हैं।

पर्यावरण प्रदूषण के प्रभाव

  • घातक बीमारियों में वृद्धि।
  • अनिद्रा तथा मानसिक रोग।
  • तापमान में वृद्धि।
  • वनस्पतियों में कमी।
  • वन्य जीवों का ह्यस।
  • अपराधों में वृद्धि।
  • प्रदूषित फसलों का उत्पादन।
  • पारिवारिक विघटन।

सरकार के प्रयत्न

  • पर्यावरण संरक्षण कानून।
  • प्रदूषण की रोकथाम तथा नियन्त्रण।
  • केन्द्रीय गंगा प्राधिकरण।
  • राष्ट्रीय वृक्षारोपण और पारिस्थितिकी विकास बोर्ड।
  • वन नीति में संशोधन।
  • वन्य जीवन का संरक्षण।
  • पर्यावरण अनुसन्धान।
  • पर्यावरण संरक्षण पुरस्कार।

प्रदूषण नियन्त्रण के सामान्य सुझाव

  • कानूनों का प्रभावपूर्ण क्रियान्वयन
  • सामाजिक वानिकी को प्रोत्साहन
  • वाहनों की जाँच
  • वनों का विस्तार
  • नगर नियोजन
  • नदियों की सफाई
  • कीटनाशक दवाओं का सन्तुलित उपयोग
  • अन्तर्राष्ट्रीय प्रयत्न
  • नागरिक प्रशिक्षण
  • पर्यावरण शिक्षा

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