रहीम के दोहे - रहीम प्रसिद्द दोहे हिंदी अर्थ सहित | rahim ke dohe

रहीम के दोहे rahim ke dohe

कवि रहीम भक्तिकाल और रीतिकाल के मिलन बिंदु पर हैं। उन्होंने भक्ति, नीति और श्रंगार का बहुत सुंदर निरूपण किया है। वे विशेष रूप से अपने नीतिपरक दोहों के लिए विख्यात हैं। रहीम को लोक-व्यवहार का बहुत अच्छा ज्ञान था। उनके लिखे दोहे कहावतों और लोकोक्तियों का रूप ग्रहण कर चुके हैं। तभी तो रहीम का काव्य बहुत लोकप्रिय है। छंदों में उन्हें दोहा, सोरठा तथा बरवै अधिक प्रिय हैं।

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दोहे

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1. जो रहीम ओछो बढै, तो अति ही इतराय।
प्यादे सों फरजी भयो, टेढ़ो-टेढ़ो जाय।।
अर्थ
प्रसंग
जो व्यक्ति किसी कारणवश अपने गुण और सामर्थ्य से अधिक कुछ पा लेता है वह घमंडी हो जाता है तथा अपने मूल व्यवहार का त्याग कर इतराने लगता है। प्रस्तुत दोहे में रहीम ने शतरंज के खेल के माध्यम से ऐसे व्यक्तियों के मनोविज्ञान को स्पष्ट किया है।

व्याख्या
आइए, सबसे पहले हम शतरंज के खेल के प्रासंगिक हिस्से को समझें। शतरंज के खेल में प्यादे की चाल सामने की ओर के सीधे खानों में एक-एक खाने की होती है तथा वजीर सीधे और तिरछे (आड़े) खानों में कितनी भी दूरी तक चल सकता है। जब कोई प्यादा एक-एक खाना चलते हुए आखिरी खाने तक पहुँच जाता है, तो उस खाने में मूल रूप से रहने वाले मोहरे के बराबर हो जाता है अर्थात् उसी की चाल चलने लगता है। अतः यदि कोई प्यादा वज़ीर के खाने तक पहुँच जाए तो वह वज़ीर के समकक्ष हो जाएगा तथा उसी की चाल चलने लगेगा।
रहीम कहते हैं कि यदि किसी साधारण व्यक्ति को किन्हीं कारणों से कोई ऊँचा पद मिल जाता है, तो वह उतना ही इतराने लगता है जैसे कि शतरंज के खेल में प्यादा फरजी बनते ही टेढ़ा-टेढ़ा चलने लगता है अर्थात जब किसी व्यक्ति को उसके गुण, शक्ति और सामर्थ्य से बढ़कर कुछ अधिक (पद, पैसा इत्यादि) प्राप्त हो जाता है, तो वह अपने सहज व्यवहार को त्यागकर घमंड से भर जाता है और अन्य लोगों से सीधे मुँह बात नहीं करता।

टिप्पणी
  • (क) "प्यादे से फरजी भयो टेनो-टेढ़ो जाय" रहीम की अत्यंत प्रभावशाली सूक्तियों में से एक है। जनता के बीच यह कहावत के रूप में खूब प्रचलित है।
  • (ख) आइए, इस प्रसंग में तुलसी की यह पंक्ति देखें - 'प्रभुता पाइ काहि मद नाहीं।' (प्रभुता पाकर किसे अहंकार नहीं होता।)

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2. जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।
बारे उजियारो लगै, बढ़े अँधेरो होय।।
अर्थ
प्रसंग
प्रस्तुत दोहे में रहीम ने 'बारे' और 'बढ़े' के श्लेष से दीपक और कपूत की तुलना की है। घर में कुपुत्र अर्थात् नालायक बेटे की बचपन की हरकतें जितनी अच्छी लगती हैं, बड़े होने पर उसकी वही हरकतें दुखदायी हो जाती हैं।

व्याख्या
आइए, सबसे पहले हम 'बारे' और 'बढ़े' का अर्थ दीपक के संदर्भ में समझ लें। आजकल बिजली के आ जाने के कारण दिये का चलन समाप्त हो गया है, अतः ये शब्द आपके लिए अपरिचित हो सकते हैं। बिजली के घर-घर पहँचने से पहले रात को रोशनी प्राप्त करने के लिए 'दिये' प्रयोग में लाए जाते थे। भारतीय संस्कृति में शब्दों का प्रयोग अत्यंत सावधानी से करने की परंपरा रही है। यदि कोई शब्द अपने आम प्रयोग में किसी अनिष्ट या अशुभ संकेत रखता है तो उसे शुभ, पवित्र तथा जीवन और रोजगार से संबंधित बातों में प्रयोग नहीं किया जाता। आपने दकान के संदर्भ में 'बढ़ाना' क्रिया का प्रयोग सुना होगा। चूँकि दुकान बंद करना दुकानदार के रोज़गार के बंद होने का भी अर्थ रखता है, इसलिए कुछ समय तक (रोज शाम को) 'दुकान बंद करना' की जगह 'दुकान बढ़ाना' कहा जाता है। इसी प्रकार, चूँकि 'दिया' प्रकाश देता है इसलिए 'दिया बुझाना' की जगह दिया बढ़ाना' तथा 'दिया जलाना' की जगह 'दिया बालना' का प्रयोग किया जाता था। ब्रज भाषा में 'ल' वर्ण की जगह अक्सर 'र' का प्रयोग किया जाता है जैसे-पालना-पारना, डोली-डोरी आदि। इसी कारण 'बाले' (बालपन पर) के स्थान पर 'बारे' और 'बालने' (दिया जलाने) के स्थान पर 'बारे' का प्रयोग है।
कुपुत्र या पुत्र के अर्थ में 'बारे' का अर्थ बाल्यकाल में अर्थात् बचपन में होगा तथा 'बढ़े' का उम्र बढ़ने या सयाना होने पर।
अब इस दोहे की व्याख्या करें:
रहीम कहते हैं कि दीपक की और परिवार में उत्पन्न कुपुत्र की गति एक समान होती है। जिस प्रकार दीपक के 'बालने' पर प्रकाश फैलता है अर्थात् वह प्रसन्नता का कारण होता है और 'बढ़ जाने' पर अँधेरा हो जाता है अर्थात् वह व्यक्ति को असमर्थ और असहाय बना देता है और इस तरह दुख का कारण बन जाता है। उसी प्रकार नालायक पुत्र भी अपनी चेष्टाओं और शरारतों के कारण बाल्यकाल में तो अच्छा लगता है पर बड़े होने पर उसकी वही हरकतें अत्यंत दुखदायी हो जाती हैं। बचपन में माता-पिता बच्चे की वात्सल्यमयी क्रीड़ाओं और चेष्टाओं से प्रसन्न होते हैं, किंतु बड़े होने पर अगर यही बालक वैसी ही शरारतें करता रहे तो कपूत सिद्ध होता है, और दुःख का कारण हो जाता है।

टिप्पणी
  • (क) इस दोहे में 'बारे' तथा 'बढ़े' शब्दों का एक-एक बार ही प्रयोग हुआ है पर ये 'दीपक' और 'कपूत' के लिए भिन्न-भिन्न अर्थ देते हैं। अतः इन दोनों शब्दों में एक से अधिक अर्थ देने के कारण श्लेष अलंकार है। श्लेष का अर्थ होता है चिपका हुआ। जब एक शब्द से कई अर्थ प्रकट हों तो वहाँ पर श्लेष अलंकार होता है। प्रस्तुत दोहे के माध्यम से आपने श्लेष का उदाहरण तो समझ ही लिया है।
  • (ख) 'कुल कपूत' में 'क' वर्ण की आवृत्ति होने से अनुप्रास अलंकार है।
  • (ग) दो बिल्कुल भिन्न चीजों में समानता प्रस्तुत करके रहीम ने अपनी विलक्षण प्रतिभा और सूक्ष्म अवलोकन-शक्ति का परिचय दिया है।
  • (घ) उजाले और अंधेरे से क्रमशः सुख और दुख का अर्थ प्राप्त होता है। साहित्य में ये प्रतीकार्थ रूढ़ हो चुके हैं।

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3. रहिमन अँसुआ नैन ढरि, जिय दुख प्रगट करेइ।
जाहि निकारो गेह ते, कस न भेद कहि देइ।।
अर्थ
प्रसंग
प्रस्तुत दोहे में रहीम ने आँसुओं के द्वारा मन का दुख प्रकट होने की बात के उदाहरण से घर की बात घर के भीतर ही रखने का संकेत किया है।

व्याख्या
रहीम कहते हैं कि आँखों से आँसू निकलकर व्यक्ति के हृदय के दुख को व्यक्त कर देते हैं और वे करें भी क्यों नहीं, जब किसी को घर से निकाला जाएगा तो वह घर का भेद तो दूसरों तक पहुँचाएगा ही।
यहाँ दो बातों का उल्लेख अत्यंत आवश्यक है: शास्त्रों में मानव देह का वर्णन घर के रूप में किया गया है जिसके दस दरवाजे हैं, जिनमें दो दरवाजे दोनों नेत्र हैं।
रामकथा में रावण द्वारा अपने छोटे भाई विभीषण को अपमानित करके लंका से निकाल देने का प्रसंग है। घर से निकाले जाने पर विभीषण राम से आ मिला और उसी ने राम को लंका के समस्त भेद तथा रावण की मृत्यु का रहस्य भी बताया। इसी से जनता में कहावत भी मशहूर है – 'घर का भेदी लंका ढावै।'


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4. यह रहीम निज संग लै, जनमत जगत न कोय।
बैर, प्रीति, अभ्यास, जस, होत होत ही होय।।
अर्थ
प्रसंग
प्रस्तुत दोहे में रहीम ने वैर, प्रेम, अभ्यास और कीर्ति के विषय में बताया है कि ये चीजें कोई भी व्यक्ति जन्म से प्राप्त नहीं करता बल्कि ये समय के साथ-साथ विकसित होती हैं।

व्याख्या
रहीम कहते हैं कि वैर अर्थात् शत्रुता, प्रेम, किसी कार्य को करने का कौशल तथा यश व्यक्ति के जन्मजात गुण नहीं होते और न ही अल्प समय में प्राप्त होते हैं, बल्कि ये धीरे-धीरे ही बढ़ते हैं अर्थात् केवल निरंतरता से ही इनका विकास होता है। आइए, इन पर क्रम से विचार करें।
वैर मन का वह भाव है जो अपने आलम्बन का नाम आते ही जाग जाता है अर्थात् यदि हमारा किसी व्यक्ति से वैर है, तो उसका नाम सुनते ही या उसकी शक्ल देखते ही, हमारे भीतर यह भाव जागने लगता है। वैर, घृणा और क्रोध का मिश्रित रूप है। वैर के मायने केवल लड़ाई या दुश्मनी नहीं हैं। लड़ाई या दुश्मनी तो किसी भी छोटे या बड़े कारण से हो सकती है जो या तो कारण के खत्म हो जाने अथवा कुछ समय बीतने पर समाप्त भी हो जाती है। किंतु, वैर मूलतः व्यक्ति की दूसरे व्यक्ति या व्यक्तियों के प्रति पूर्ण अस्वीकार की भावना है, जो घृणा या अहित-साधन के द्वारा व्यक्त होती है। यह अस्वीकार लंबी अवधि तक नकारात्मक भावों के एकत्रित होते रहने से ही उत्पन्न होता है।
प्रीति अर्थात् प्रेम भी समय के साथ ही गाढ़ा होता है। किसी की क्षणिक समीपता से जो सकारात्मक भाव हमारे मन में होता है, उसे अक्सर प्रेम कह दिया जाता है, किंतु वह प्रेम नहीं महज आकर्षण होता है। प्रेम साहचर्यजन्य होता है अर्थात साथ रहने से पैदा होता है। प्रेम वैर के विपरीत पूर्ण स्वीकार की भावना है। हम जिससे प्रेम करते हैं उसके लिए कुछ भी करने को तत्पर रहते हैं और यह भावना केवल लंबे समय तक साथ रहने से ही उत्पन्न होती है।
अभ्यास तो स्वयं स्पष्ट है कि समयावधि से ही आता है। किसी काम को करने का कौशल काम के लगातार करते रहने से ही प्राप्त होता है। फिर यह अभ्यास चाहे संगीत का हो या हॉकी खेलने का, ड्राइविंग का हो या चित्र बनाने का या किसी अन्य काम का। यश अर्थात् कीर्ति (प्रसिद्धि) भी लंबे समय तक किसी क्षेत्र में सतत श्रेष्ठ कार्य करते रहने का ही परिणाम है।
चर्चा और यश में अंतर है। चर्चा कुछ समय तक होती है, यश दीर्घकालिक होता है। चर्चा प्रायोजित हो सकती है किंतु यश महत्त्वपूर्ण योगदान से ही प्राप्त होता है।

टिप्पणी
  • (क) 'जनमत जगत' तथा 'होत होत ही होय' में क्रमशः 'ज' 'त' तथा 'ह' वर्णों की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार है।
  • (ख) 'होत होत ही होय' कथन का चारुत्व और अनुप्रास अलंकार दर्शनीय है।
  • (ग) प्रस्तुत दोहे में रहीम ने कम शब्दों में बहुत अधिक कह दिया है। गहन विचारों का इतने कम शब्दों में तथा इतनी सरल भाषा में अत्यंत सहजता से कह देने की विशेषता तुलसी के बाद रहीम में ही दिखाई पड़ती है।

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5. टूटे सुजन मनाइए, जो टूटे सौ बार।
रहिमन फिरि-फिरि पोहिए, टूटे मुक्ताहार।।
अर्थ
प्रसंग
प्रस्तुत दोहे में रहीम ने सज्जनों तथा अपने लोगों (स्वजन) के रूठ जाने पर उन्हें बार-बार मनाने की बात कही है।

व्याख्या
रहीम कहते हैं कि जिस प्रकार मोतियों के हार के टूट जाने पर मोतियों को फेंका नहीं जाता बल्कि उन्हें बार-बार धागे में पिरोकर फिर से हार बना दिया जाता है; उसी प्रकार श्रेष्ठ लोगों तथा अपने लोगों (कुटुंबी, संबंधी, मित्र आदि) के रूठने या नाराज होने पर उन्हें हर बार मना लेना चाहिए। (सुजन शब्द का अर्थ है - सु+जन अर्थात् श्रेष्ठ लोग तथा स्व+जन अर्थात् अपने लोग, दोनों ही रूपों में ग्रहण किया जा सकता है। दोनों अर्थ ग्रहण करने पर अर्थ-सौंदर्य बढ़ जाता है।)

टिप्पणी
  • (क) 'सुजन' में श्लेष अलंकार है। जिसे आप व्याख्या पढ़ने पर समझ ही गए होंगे।
  • (ख) श्रेष्ठ मनुष्यों का मोतियों से साम्य सुंदर है, उपयुक्त भी है और प्रचलित भी।
  • (ग) बहुत सादा और सरल तरीके से लोक-व्यवहार की नीति को व्यक्त किया गया
  • (घ) रहीम का यह दोहा लोक में बहुत अधिक प्रचलित है।

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6. काज परै कछु और है, काज सरै कछु और।
रहिमन भाँवर के भये, नदी सेरावत मौर।।

अर्थ
आपने रहीम के पाँच दोहों का आनंद लिया। इस आनंद के साथ-साथ आपने इस बात पर भी जरूर ध्यान दिया होगा कि दोहे के अर्थ और भाव को कैसे समझा जाए। क्या अब आप खुद किसी दोहे की व्याख्या कर सकते हैं। क्यों नहीं, बिल्कुल कर सकते हैं अगर ... अगर आपको थोड़ी-सी मदद मिल जाए, यही न ...।
तो फिर हो जाइए तैयार और एक बार दोहा सं. 6 को पढ़ डालिए। मूलपाठ में शब्दों के अर्थ तो मिल ही रहे हैं, कुछ आवश्यक संकेत मदद के लिए यहाँ मौजूद हैं:
प्रसंग है काम पड़ने और काम निकल जाने पर मनुष्य के व्यवहार में बदलाव
उदाहरण है विवाह में दूल्हे द्वारा सिर पर पहना जाने वाला एक प्रकार का मुकुट। 'कुछ और' कहकर कवि ने व्यवहार को स्पष्ट न करते हुए भी बहुत कुछ स्पष्ट कर दिया। यह वक्रोक्ति का अच्छा उदाहरण है। सीधे-सीधे बात न कहकर किसी अन्य प्रकार से उसे व्यक्त करना वक्रोक्ति कहलाता है। 'और' शब्द के प्रयोग के कुछ और उदाहरण देखिए:
  • (i) वह चितवन और कछु जिहि बस होत सुजान
  • (ii) कहते हैं कि गालिब का है अंदाज़-ए-बयां और

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7. वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग।
बाँटनवारे के लगै, ज्यों मेंहदी को रंग।।

अर्थ
मूलपाठ से दोहा संख्या 7 को शब्दार्थ सहित पढ़िए। यह तो आप समझ ही गए होंगे कि दोहे में परोपकारी मनुष्यों के विषय में कहा गया है।
आप कुछ लोगों को यह कहते सुनते होंगे कि क्या रखा है परोपकार में'। रहीम के इस दोहे की दूसरी पंक्ति में इसका कुछ संकेत है, ज़रा ध्यान दीजिए। हाँ... आया न पकड़ में। तो अब कागज़-कलम उठाइए और एक अच्छी-सी व्याख्या लिख डालिए। देखिए, इसमें दृष्टान्त अलंकार भी है। इसके बारे में हम पहले आपको बता चुके हैं।

सोरठा

8. रहिमन मोहिं न सुहाय, अमी पियावै मान बिनु।
बरु विष देय बुलाय, मान सहित मरिबो भलो।।
अर्थ
प्रसंग
प्रस्तुत सोरठे में रहीम ने आत्मसम्मान के महत्त्व को रेखांकित किया है।

व्याख्या
रहीम कहते हैं कि यदि कोई मेरे आत्मसम्मान को ठेस पहुँचा कर अमृत पिलाए तो वह मुझे स्वीकार नहीं हैं, जबकि प्रेम और सम्मान के साथ यदि कोई जहर भी प्रस्तुत करे तो मुझे उसे पीकर मर जाना अच्छा लगेगा। व्यक्ति को आत्मसम्मान की रक्षा करनी चाहिए। यदि किसी से उसका आत्मसम्मान छीन लिया जाए तो जीवन में कुछ भी नहीं बचता, फिर वह अमर होकर भी क्या करेगा और यदि, कहीं प्रेम और सम्मान मिलता है तो जहर पीने में भी नुकसान नहीं, क्योंकि जीवन में प्रेम से अधिक पाने को और कुछ भी नहीं है। सामाजिक संबंधों की ऊष्मा और सार्थकता प्रेम में ही है। जहाँ प्रेम है, वहाँ व्यक्ति के सम्मान की रक्षा भी है। इसी आत्मसम्मान की रक्षा के लिए व्यक्ति से लेकर राष्ट्रों तक ने युद्ध लड़े हैं। बहुत से लोगों ने निजी आत्मसम्मान की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति दी है। इसके बिना जीवन की कल्पना ही क्या? और यह मिल जाए तो फिर और जीने की कामना भी छोड़ी जा सकती है। दुनिया की सारी चीजें (यथा-धन-दौलत, पद आदि) आज हैं, कल नहीं भी हो सकतीं और यदि आज नहीं हैं तो कल प्राप्त की जा सकती हैं पर व्यक्ति सम्मान को एक बार खोकर पुनः प्राप्त नहीं कर सकता।

टिप्पणी
(क) आत्मसम्मान पर दुनिया की विभिन्न भाषाओं के बहुत से कवियों और शायरों ने बहुत सारी कविताएँ लिखी हैं। यहाँ सिर्फ दो उदाहरण प्रस्तुत हैं:
(i) आवत ही हुलसै नहीं, नैनन नहीं सनेह ।
तुलसी तहाँ न जाइए, कंचन बरसै मेह।। - तुलसीदास
(जहाँ आपको देखकर दूसरे व्यक्ति को प्रसन्नता न हो और उसकी आँखों में प्रेम न दिखाई पड़े, वहाँ चाहे सोना बरस रहा हो तो भी नहीं जाना चाहिए।)
(ii) बंदगी में भी वो आज़ाद-ओ-खुदीं हैं कि हम।
उलटे फिर आएँ दर-ए-काबा अगर वा न हुआ।। - गालिब
(हम भक्ति में भी इतने स्वाभिमानी हैं कि अगर हमारे पहुँचने पर काबे का दरवाज़ा खुला न हो तो उलटे लौट आएँ।)
(ख) इस सोरठे की दूसरी पंक्ति सूक्ति के रूप में इस तरह प्रचलित है - 'प्रेम सहित
मरिबो भलो जो विष देय बुलाय।

बरवै

9. बाहिर लैकै दियवा, वारन जाय ।
सासु ननद ढिग पहुँचत, देत बुझाय।।
अर्थ
प्रसंग
प्रस्तुत बरवै में रहीम ने आतुरता से प्रिय की प्रतीक्षा में गृहस्थ नायिका के मनोभावों का वर्णन किया है।

व्याख्या
शाम हो चुकी है। नायिका के पति के घर लौटने का समय हो गया है। वह दिन भर के बिछुड़े अपने प्रिय से मिलने को आतुर है। उसका एक-एक पल प्रिय की आहट की प्रतीक्षा में है। यह आतुरता इतनी बढ़ चुकी है कि उससे घर के भीतर नहीं रुका जा रहा। वह बार-बार दिया जलाकर द्वार पर जाती है, पर अपने आवेग के खुल जाने तथा सास और ननद के ताने के डर से रास्ते में बैठी अपनी सास और ननद तक पहुँचते-पहुँचते उसे बुझा देती है। नायिका ग हस्थ है और अपनी आतुरता को प्रकट नहीं होने देना चाहती। साथ ही, उसे भय भी है कि बाहर जाने पर सास और ननद उसे ताना भी दे सकती हैं और प्रताड़ित भी कर सकती हैं।

टिप्पणियाँ
  • (क) गृहस्थ प्रेम का अत्यंत सुंदर चित्रण है।
  • (ख) लोक संस्कृति पर रहीम की गहरी पकड़ का उत्तम उदाहरण है।
  • (ग) श्रंगार रस है तथा भाषा अवधी है।
  • 10. लैकै सुघरु खुरुपिया, पिय के साथ।
  • छइ एक छतरिया, बरखत पाथ।।
आपने अभी-अभी एक बरवै छंद का आनंद लिया। अब अगले बरवै को ध्यान से पढिए। शब्द तो सभी समझ में आ ही रहे होंगे, हाँ बस मानक हिंदी से थोड़ा-सा भिन्न रूप है बोलचाल की अवधी के इन शब्दों का। थोड़ा-सा प्रयास करते ही आप सभी शब्द समझ जाएँगे।
यह भी पहले बरवै की तरह ही ग हस्थ प्रेम का चित्र है। भला, क्या करना चाहती है नायिका? और किसके साथ? इन प्रश्नों के उत्तर बहुत स्पष्ट हैं और इन्हीं की व्याख्या को विशेषतः रेखांकित करना है...।

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