सविनय अवज्ञा आंदोलन | कारण | प्रभाव | महत्त्व | savinay avagya andolan

सविनय अवज्ञा आंदोलन

महात्मा गांधी द्वारा प्रतिपादित सत्याग्रह का सिद्धान्त सत्य अथवा आत्मिक शक्ति पर बल देता है। इसकी सबसे सुन्दर अभिव्यक्ति सविनज्ञ अवज्ञा के रूप में हुई।
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असहयोग से तात्पर्य आवश्यक रूप से सविनय अवज्ञा से नहीं है। किन्तु सविनय अवज्ञा निश्चित रूप से वर्तमान संस्थाओं के विरूद्ध संघर्ष करने के लिए गांधी द्वारा प्रयुक्त पद्धति की आधारशिला है। इसका अर्थ मात्र असहयोग ही नहीं वरन् राज्य अथवा समाज के कानूनों का विरोध है यही सविनय अवज्ञा आन्दोलन का सर्वाधिक क्रियाशील रूप है। दोनों का सार एक ही है अर्थात् बुराई का अहिंसात्मक तरीकों से प्रतिरोध करना। राजनीति में हम इसका अर्थ अन्यायपूर्ण कानूनों से उत्पन्न दोष व बुराइयों का विरोध करने से ले सकते है। परन्तु इस शब्द का भी प्रयोग उस अन्तिम दशा में करना चाहिए जबकि वर्तमान कानूनों को मानना एक प्रकार से पाप बन जाये। हमें सविनय अवज्ञा को कानूनों के अपराधपूर्ण उल्लघन से नहीं लेना चाहिए। अपराधी कानून का उल्लंघन दण्ड से बचने के लिए करता है, जबकि सत्याग्रही समाज के हित के लिए सरकार से असहयोग करता है। सविनय अवज्ञा करने वाला सरकार के कानूनों के प्रति आदर व श्रद्धा रखता है पर जब वे कानून समाज के लिए अहितकर बन जाते है तो सत्याग्रही उनका अनादर व अवज्ञा करता है। कानूनों की अवज्ञा करते समय सत्याग्रही दण्ड से भयभीत नहीं होता।

सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरूआत

सन् 1930 ई. में स्वाधीनता दिवस मनाने के बाद गाँधीजी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) शुरू हुआ। यह आंदोलन गाँधीजी की प्रसिद्ध दांडी-यात्रा से शुरू हुआ। 12 मार्च 1930 ई. को गाँधीजी ने अहमदाबाद के अपने साबरमती आश्रम से 78 सदस्यों के साथ दांडी की ओर पैदल यात्रा शुरू की। दांडी अहमदाबाद से करीब 385 किमी. दूर भारत के पश्चिमी समुद्र तट पर स्थित है।
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गाँधीजी और उनके साथी 6 अप्रैल, 1930 ई. को दांडी पहुंचे। समुद्र के पानी के वाष्पीकरण के बाद बने नमक को उठाकर गाँधीजी ने सरकारी कानून को तोड़ा। नमक के उत्पादन पर सरकार का एकाधिकार था, इसलिए किसी के लिए भी नमक बनाना गैर-कानूनी था। नमक कानून को तोड़ने के बाद सारे देश में सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ।

तमिलनाडु में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने दांडी-यात्रा की तरह त्रिचनापल्ली से वेदराण्यम् तक की यात्रा की।


सविनय अवज्ञा आन्दोलन के कारण

1930 ई. में गाँधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया जिसके प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

1. साइमन कमीशन- भारत के वायसराय लार्ड इरविन ने 8 नवम्बर, 1927 को घोषणा की कि सर जान साइमन की अध्यक्षता में सात सदस्यीय राजकीय कमीशन शीघ्र भारत आने वाला है। इस कमीशन के सभी सदस्य अंग्रेज थे। यद्यपि इस आयोग को भारत के भावी संविधान के लिए प्रतिवेदन प्रस्तुत करना था, परंतु कोई भी भारतीय इस आयोग में सम्मिलित नहीं था। अतः साइमन कमीशन के भारत पहुँचने पर उसका काले झण्डों एवं 'साइमन कमीशन वापस जाओ' के नारों से स्वागत किया गया। लाहौर में लाला लाजपत राय के नेतृत्व में कमीशन के विरोध में एक विशाल जुलूस निकाला गया। पुलिस द्वारा लाला लाजपत राय पर लाठियों की वर्षा की गई जिससे वे बुरी तरह से घायल हो गए और 17 नवम्बर, 1928 को उनकी मृत्यु हो गई। लखनऊ में पुलिस ने पं. जवाहर लाल नेहरू तथा गोविंद वल्लभ पंत पर भी लाठियाँ बरसाईं। अंग्रेजों की दमनकारी नीति से गाँधीजी को प्रबल आघात पहुँचा।

2. साइमन कमीशन की रिपोर्ट से निराशा- 1930 में साइमन कमीशन ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट से भारतवासियों को बड़ी निराशा हुई। रिपोर्ट में भारतीयों की औपनिवेशिक स्वराज्य की माँग की पूर्ण उपेक्षा की गई। इसी प्रकार केंद्र में उत्तरदायी सरकार की स्थापना की माँग भी स्वीकार नहीं की गई। अतः गाँधीजी ने साइमन कमीशन की रिपोर्ट का विरोध किया और अंग्रेजों के विरूद्ध सविनय अवज्ञा प्रारंभ करने का निश्चय कर लिया।

3. नेहरू रिपोर्ट को अस्वीकार करना- भारत सचिव लार्ड बकन हेड ने भारतीयों को चुनौती दी कि वे एक ऐसा संविधान तैयार करें जो भारत के सभी राजनीतिक पक्षों को स्वीकार्य हो। कांग्रेस ने इस चुनौती को स्वीकार कर लिया तथा भारत के संविधान का प्रारूप तैयार करने के लिए पं. मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। इस समिति ने 10 अगस्त, 1928 को एक रिपोर्ट प्रस्तुत की जो 'नेहरू रिपोर्ट' के नाम से प्रसिद्ध है। ब्रिटिश सरकार ने इस रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया। मुस्लिम लीग ने भी नेहरू रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया। कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार को चेतावनी दी कि यदि सरकार 31 दिसम्बर, 1929 तक नेहरू रिपोर्ट स्वीकार नहीं करेगी, तो वह अहिंसात्मक सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करेगी।

4. पूर्ण स्वराज्य की माँग- दिसम्बर, 1929 में लाहौर में पं. जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का अधिवेशन शुरू हुआ। 31 दिसम्बर, 1929 को अधिवेशन में पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव पास किया गया। इस अधिवेशन में कांग्रेस ने जनवरी को स्वतंत्रता दिवस मनाने का निश्चय किया। अतः 26 जनवरी, 1930 को सम्पूर्ण भारत में स्वतंत्रता दिवस बड़े उत्साह के साथ मनाया गया। इस अधिवेशन ने कांग्रेस को उचित अवसर पर सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारम्भ करने का अधिकार दे दिया।

5. देश में अशांति एवं अराजकता- इस समय देश की आर्थिक स्थिति बड़ी शोचनीय थी। देश में महँगाई, बेरोजगा गरीबी बढ़ रही थी। बढ़ती हुई महँगाई के कारण मजदूरों में तीव्र असंतोष था। उन्होंने भी ब्रिटिश सरकार का विरोध करना शुरू कर दिया। ब्रिटिश सरकार ने दमनकारी नीति अपनाते हुए अनेक मजदूर नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। मेरठ षड्यंत्र मुकदमें में 36 मजदूर नेताओं को लम्बी कैद की सजा दिए जाने के कारण मजदूर-वर्ग में घोर असंतोष व्याप्त था। इसी समय क्रांतिकारियों ने अपनी गतिविधियाँ तेज कर दी थीं। 1929 में सरदार भगतसिंह तथा बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली में केंद्रीय विधानसभा में बम फेंक कर सनसनी फैला दी। गाँधीजी इन हिंसात्मक घटनाओं से बड़े चिंतित हुए। उन्होंने ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध अहिंसात्मक सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाने का निश्चय कर लिया।

6. लार्ड इरविन की अस्पष्ट घोषणा- इंग्लैंड से लौट कर भारत के वायसराय लार्ड इरविन ने 31 अक्टूबर, 1929 को घोषणा की कि 1917 की घोषणा से यह अभिप्राय स्पष्ट होता है कि भारत को अधिराज्य स्थिति का दर्जा मिले। लार्ड इरविन ने यह भी घोषित किया कि साइमन कमीशन की रिपोर्ट पर विचार करने के लिए ब्रिटिश सरकार एक गोलमेज इस घोषणा में यह नहीं कहा गया कि भारत को कब स्वराज्य प्राप्त हो गया। दूसरी ओर इंग्लैंड के अनुदार दल ने इरविन की घोषणा की आलोचना की। गाँधीजी ने लार्ड इरविन से भेंट कर यह जानना चाहा कि क्या सरकार लंदन में गोलमेज सम्मेलन भारत के लिए औपनिवेशिक स्वराज्य के आधार पर नवीन संविधान का निर्माण करने के लिए बुला रही है। परंतु लार्ड इरविन ने गाँधीजी को इस प्रकार का कोई आश्वासन नहीं दिया जिससे गाँधीजी को बड़ी निराशा हुई।

7. गाँधीजी की माँगों की उपेक्षा- गाँधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारम्भ करने के पूर्व वायसराय लार्ड इरविन के सामने 11 माँगें प्रस्तुत की और चेतावनी दी कि यदि उनकी माँगें स्वीकार नहीं की गईं, तो वे सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारम्भ करेंगे। गाँधीजी की माँगें निम्नलिखित थीं-
  • पूर्ण नशाबंदी हो।
  • मुद्रा-विनिमय में एक रुपया एक शिलिंग चार पैसे के बराबर हो।
  • नमक-कर समाप्त किया जाए।
  • मालगुजारी आधी कर दी जाए।
  • सैनिक व्यय में कम से कम 50% कमी की जाए।
  • प्रशासनिक खर्चे में कमी करने के लिए बड़े अधिकारियों के वेतन आधे कर दिए जाएँ।
  • भारतीय समुद्रतट केवल भारतीय जहाजों के लिए सुरक्षित रहें।
  • विदेशी वस्त्रों पर तट कर लगाया जाए ताकि देशी उद्योगों का संरक्षण हो।
  • सभी राजनीतिक बंदी रिहा कर दिए जाए।
  • गुप्तचर पुलिस को भंग कर दिया जाए या उस पर जनता का नियंत्रण रखा जाए।
  • आत्मरक्षा के लिए बंदूक आदि हथियारों के लाइसेंस दिए जाएँ।

ब्रिटिश सरकार ने गाँधीजी की माँगों पर कोई ध्यान नहीं दिया। लार्ड इरविन ने गाँधीजी को जो उत्तर भेजा, वह बड़ा असंतोषजनक था। इस पर गाँधीजी को बड़ा दुःख हुआ और उन्होंने कहा “मैंने घुटने टेक कर रोटी माँगी थी, परंतु मुझे मिला पत्थर। ब्रिटिश सरकार केवल शक्ति पहचानती है और इस कारण वायसराय के उत्तर पर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। हमारे राष्ट्र के भाग्य में जेल की शांति ही एकमात्र शांति है। समस्त भारत एक विशाल कारागृह मैं अंग्रेजों के कानूनों को मानने से इंकार करता हूँ।"

सविनय अवज्ञा आंदोलन कार्यक्रम

सविनय अवज्ञा आंदोलन कार्यक्रम के अंतर्गत निम्नलिखित बातें सम्मिलित थीं-
  • नमक बनाकर नमक कानून को तोड़ा जाए।
  • विद्यार्थी सरकारी स्कूलों तथा कॉलेजों का बहिष्कार करें।
  • सरकारी कर्मचारी अपनी नौकरियों से त्याग पत्र दे दें।
  • विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया जाए और स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग किया जाए।
  • स्त्रियाँ शराब तथा विदेशी वस्त्रों की दुकानों पर धरना दें।
  • जनता सरकार को कर न चुकाये।
6 अप्रैल, 1930 को गाँधीजी ने आंदोलन के लिए निम्न कार्यक्रम घोषित किया “गाँव-गाँव को नमक बनाने के लिए निकल पड़ना चाहिए। बहनों को शराब, अफीम और विदेशी कपड़ों की दुकानों पर धरना देना, विदेशी वस्त्रों को जला देना चाहिए। हिंदुओं को छुआछूत त्याग देनी चाहिए। विद्यार्थियों को सरकारी, शिक्षण-संघ का परित्याग कर देना चाहिए तथा सरकारी कर्मचारियों को अपनी नौकरियों से त्याग-पत्र दे देना चाहिए।"

(क) आंदोलन का प्रथम चरण

सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रथम चरण को विवेचन की सुविधा की दृष्टि से निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत स्पष्ट किया गया है-
  • 1. नमक सत्याग्रह (डाण्डी यात्रा)- सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रारंभ डाण्डी यात्रा की ऐतिहासिक घटना से हुआ। इसमें 12 मार्च, 1930 ई. को महात्मा गाँधी एवं उनके अनुयायी 200 मील की यात्रा पैदल प्रारम्भ कर 24 दिनों के पश्चात् डाण्डी पहुँचे। डाण्डी यात्रा की तुलना सुभाषचंद्र बोस ने नेपोलियन के पेरिस मार्च और मुसोलिनी के रोम मार्च से की। हजारों लोगों ने मार्ग में सत्याग्रहियों का दिल खोलकर स्वागत किया। 6 अप्रैल को आत्मशुद्धि के उपरांत गाँधी ने समुद्र तल से थोड़ा नमक उठाकर नमक कानून को भंग किया। गाँधीजी द्वारा कानून तोड़ने के साथ ही सत्याग्रह में अभूतपूर्व तेजी आ गई। बम्बई, बंगाल, उत्तर-प्रदेश, मध्य प्रांत और मद्रास में गैर-कानूनी तरीके से नमक बनाना प्रारम्भ हो गया।
  • 2. शराब विरोधी आंदोलन- महात्मा गाँधी ने स्त्रियों को शराब की दुकानों पर धरना देने के लिए आह्वान किया, जिसका दिल खोलकर स्वागत किया गया। दिल्ली में 1600 महिलाओं ने शराब की दुकानों पर धरना दिया। फलस्वरूप बहुत-सी दुकानें बंद हो गईं। स्त्रियों ने पर्दा प्रथा को ताक में रखकर सत्याग्रह में भाग लिया जो भारतीय स्त्रियों के जीवन में अविस्मरणीय रहेगा।
  • 3. विदेशी कपडों का पर्ण बहिष्कार- विदेशी कपड़ों का पर्ण बहिष्कार भी आशा से अधिक सफल रहा। 1930 ई. में सती कपड़ों का व्यापार पहले वर्ष की अपेक्षा एक-तिहाई या एक-चौथाई के लगभग रह गया। बम्बई में अंग्रेज व्यापारियों की सोलह मिलें बंद हो गईं और 32,000 मजदूर बेरोजगार हो गए। इनके विरूद्ध भारतीय व्यापारियों की मिलें दुगनी तेजी से काम करने लगीं।
  • 4. कर बंदी आंदोलन- किसानों ने कर बंदी आंदोलन को सक्रिय सहयोग दिया।
  • 5. सरकार की दमन प्रक्रिया- सरकार ने 16 अप्रैल, 1930 को जवाहरलाल नेहरू एवं 5 मई, 1930 को गाँधीजी को गिरफ्तार कर लिया तथा आंदोलन को निर्ममता से कुचलने का उपक्रम किया। इस हेतु गवर्नर जनरल ने दर्जनों अध्यादेश जारी किए; जुलूसों और सार्वजनिक सभाओं को तितर-बितर करने के लिए अंधाधुंध लाठियों का प्रयोग किया गया और कभी-कभी गोलियों से लोगों को भूना गया। वृहद् स्तर पर जनता के साथ अत्याचार अपनी चरम सीमा कर न देने वालों की सम्पत्ति जब्त कर ली गई। धारासना में 2,500 सत्याग्रहियों ने नमक के गोदाम पर चढ़ाई की, पुलिस ने सत्याग्रहियों को बहुत बुरी तरह से पीटा जिससे अनेक व्यक्ति घायल हो गए। लगभग 60 हजार भारतीयों को जेलों में बंद कर दिया गया।

प्रथम गोलमेज सम्मेलन
सरकार के दमन चक्र के बावजूद सविनय अवज्ञा आंदोलन जोर पकड़ता जा रहा था। इसी समय ब्रिटिश सरकार ने साइमन कमीशन की रिपोर्ट पर विचार करने के लिए इंग्लैंड में प्रथम गोलमेज सम्मेलन बुलाया।
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12 नवम्बर, 1930 को लंदन में प्रथम गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें 89 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में कांग्रेस का कोई भी प्रतिनिधि सम्मिलित नहीं हुआ। इस सम्मेलन में साम्प्रदायिक समस्या पर कोई समझौता नहीं हो सका। अंत में 19 जनवरी, 1931 को यह सम्मेलन स्थगित कर दिया गया।

गाँधी-इरविन समझौता
5 मार्च, 1931 को गाँधीजी तथा वायसराय लार्ड इरविन के बीच समझौता हो गया, जो गाँधी-इरविन समझौते के नाम से प्रसिद्ध है।
इस समझौते की प्रमुख शर्ते निम्नलिखित थीं-
  • सरकार सभी अध्यादेशों तथा चालू मुकदमों को वापिस ले लेगी।
  • राजनीतिक बंदियों को रिहा कर दिया जाएगा। केवल उन्हीं लोगों को ही रिहा नहीं किया जाएगा जिनके विरूद्ध हिंसात्मक अपराध सिद्ध हो चुके हैं।
  • सरकार आंदोलन के दौरान सत्याग्रहियों की जब्त की हुई सम्पत्ति को लौटा देगी।
  • सरकार ऐसे लोगों को गिरफ्तार नहीं करेगी जो शराब, अफीम तथा विदेशी वस्त्रों की दुकानों पर शांतिपूर्वक धरना देंगे।
  • सरकार समुद्र के निकटवर्ती प्रदेशों में बिना नमक-कर दिए नमक बनाने की आज्ञा दे देगी।
  • जिन सरकारी कर्मचारियों ने आंदोलन के दौरान नौकरियों से त्याग-पत्र दे दिए थे, उन्हें नौकरियों में वापिस लेने के लिए सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाएगा।
  • कांग्रेस अपने सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित कर देगी।
  • कांग्रेस पुलिस द्वारा की गई ज्यादतियों के लिए निष्पक्ष जाँच की माँग नहीं करेगी।
  • कांग्रेस द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेगी।
  • कांग्रेस सब बहिष्कारों को बंद कर देगी।

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन
17 अप्रैल, 1931 को लार्ड इरविन के स्थान पर लार्ड वेलिंगडन भारत के वायसराय नियुक्त हुए। उन्होंने गाँधी-इरविन समझौते का उल्लंघन करते हुए दमनकारी नीति अपनाई। अंत में 27 अगस्त, 1931 को गाँधीजी और वायसराय वेलिंगडन की शिमला में भेंट हुई तथा वायसराय के अनुरोध पर गाँधीजी ने द्वितीय सम्मेलन में भाग लेना स्वीकार कर लिया। 7 सितम्बर, 1931 को लंदन में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में गाँधीजी ने भाग लिया। गाँधीजी ने पूर्ण स्वराज्य की माँग की जिस पर सरकार ने ध्यान नहीं दिया। सरकार विभिन्न वर्गों में फूट डालना चाहती थी। गाँधीजी ने साम्प्रदायिक समस्या को सुधारने के लिए नेहरू रिपोर्ट के आधार पर सुझाव दिए, परंतु सरकार ने उनके सुझावों पर ध्यान नहीं दिया। द्वितीय गोलमेज सम्मेलन 1 दिसम्बर, 1931 को समाप्त हो गया और गाँधीजी खाली हाथ भारत लौट आए।

(ख) आंदोलन का दूसरा चरण

असहयोग आंदोलन के द्वितीय चरण को निम्न बिंदुओं के अंतर्गत स्पष्ट किया गया है-
  • 1. सरकार द्वारा आंदोलन विरोधी दमन चक्र का चलाना- उधर गाँधीजी लंदन में संवैधानिक समस्या हल करने का प्रयत्न कर रहे थे, इधर भारतीय सरकार राष्ट्रीय आंदोलन के प्रवाह को रोकने के लिए प्रयास कर रही थी। सरकार ने उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत में लाल कुर्ती दल को अवैध घोषित कर दिया। खान-बंधुओं को बंदी बना लिया। बंगाल में क्रांतिकारियों की गतिविधियों को रोकने के वास्ते सरकार ने सख्त कदम उठाये। उत्तर प्रदेश के गवर्नर ने कर बंदी आंदोलन का दमन करने के लिए नया अध्यादेश प्रचलित किया एवं श्री जवाहरलाल नेहरू को उनके साथियों सहित गिरफ्तार कर लिया।
  • 2. सविनय अवज्ञा आंदोलन का पुनः प्रारंभ- सरकार के कार्य से प्रभावित होकर कांग्रेस कार्य समिति ने सविनय अवज्ञा आंदोलन पुनः प्रारंभ करने की धमकी दी। सरकार ने 4 जनवरी, 1932 ई. को भारत लौटने पर गाँधीजी को गिरफ्तार कर लिया, कांग्रेस को गैर-कानूनी संस्था घोषित कर दिया, आंदोलनकारियों की सम्पत्ति जब्त कर ली तथा प्रेस पर कड़े नियंत्रण लगा दिए। कठोर दमन के बावजूद सरकार आंदोलन को नियंत्रित नहीं कर सकी। आंदोलन के प्रथम चार माह में हजारों व्यक्ति बंदी बनाए गए। 1932 के अंत तक लगभग 120,000 लोगों को जेलों में बंद कर दिया गया। जनता ने बड़े साहस व उत्साह से सरकार के दमन-चक्र का सामना किया। सरकार ने, कांग्रेस के अधिवेशन न हो सकें, इसका भी प्रयत्न किया, फिर भी कांग्रेस के दिल्ली एवं कलकत्ता के अधिवेशन सफलतापूर्वक सम्पन्न हुए।
  • 3. गाँधीजी द्वारा 21 दिन का उपवास और आंदोलन की समाप्ति- शनैः-शनैः आंदोलन मंद पड़ने लगा। हिंदुओं और हरिजनों के प्रति किए गए पापों के प्रायश्चित के लिए गाँधीजी ने 8 मई, 1933 को 21 दिन का उपवास शुरू किया। सरकार ने उन्हें जेल से मुक्त कर दिया। आंदोलन को स्थगित किए जाने पर विचार किया जाने लगा। गाँधीजी का विचार था कि सरकार की दमनकारी नीति से जनता में भय और आतंक छा गया है। अतः आंदोलन को कुछ दिनों के लिए स्थगित कर दिया जाए। अंत में 7 अप्रैल, 1934 को सविनय अवज्ञा आंदोलन को बंद कर दिया गया। महात्मा गाँधी कांग्रेस से अलग हो गए तथा अछुतोद्धार के काम में लग गए।

देशी रियासतों के विरुद्ध आंदोलन

  • भारत में अंग्रेजों द्वारा शासित प्रदेशों (ब्रिटिश भारत) के अलावा भारतीय नवाबों-राजाओं द्वारा शासित रियासतें भी थीं।
  • ये रियासतें पूर्णतः स्वतंत्र नहीं थीं। अंग्रेजों ने अपने शासन को मजबूत करने के लिए इन रियासतों को बनाए रखा था।
  • इन रियासतों की संख्या करीब 562 थी और इनमें भारत की करीब 20% आबादी बसी हुई थी।
  • इनमें जम्मू व कश्मीर, मैसूर और हैदराबाद जैसे कुछ राज्य तत्कालीन यूरोप के कुछ राज्यों से भी बड़े थे।
  • अधिकांश रियासतों में जनता की दशा शेष देश की जनता की दशा से भी बदतर थी।
  • अधिकतर राजा अपनी रियासतों को अपनी निजी सम्पत्ति समझते थे। ये राजा विलासिता का जीवन व्यतीत कर रहे थे।
  • शिक्षा के प्रसार, गरीबी दूर करने और जनता का जीवन स्तर सुधारने का कोई प्रयत्न नहीं किया गया था।
  • अनेक रियासतों में अभी भी कई अमानवीय प्रथाएँ जारी थीं, जैसे- बेगारी की प्रथा, यानी बिना मजदूरी दिए लोगों से काम करवाना। ब्रिटिश भारत में राष्ट्रीय आंदोलन का उदय हुआ तो रियासतों के लोगों में भी जागृति आने लगी। वे जनतांत्रिक अधिकारों और जनतांत्रिक सरकार की माँग करने लगे।
  • लोगों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए इन राज्यों में प्रजा मंडल जैसे संगठन स्थापित किए।  आरंभिक संगठन प्रजावर्मा आदि के नेतृत्व में राजस्थान के रियासतों में स्थापित हुए।
  • रियासतों की जनता के ये सभी संगठन ऑल इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कॉंफ्रेंस में एकीकृत हुए। बलवंत राय मेहता जिन्होंने भावनगर (गुजरात) में प्रजा मंडल की स्थापना की थी, इस नए संगठन के सचिव बने।
  • इस संगठन ने माँग की कि भारतीय रियासतों को भारतीय राष्ट्र का अंग माना जाना चाहिए। बीसवीं सदी के चौथे दशक में भारतीय रियासतों की जनता का आंदोलन अत्यधिक शक्तिशाली बना।
  • इस आन्दोलन के कुछ प्रमुख नेता थे- राजस्थान में जयनारायण व्यास तथा जमनालाल बजाज, ओडिशा में सारंगधर दास त्रावणकोर में एन्नी मस्करेने तथा पद्यमथानु पिल्लई और जम्मू - कश्मीर में शेख मुहम्मद अब्दुल्ला हैदराबाद में स्वामी रामानंद तीर्थ।
  • राजा-महाराजाओं ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को कुचलने में भी अंग्रेजों की मदद की।
  • ब्रिटिश सरकार ने आजादी के आंदोलन को कमजोर करने के लिए भारतीय रियासतों का इस्तेमाल किया।
  • जब देश आजादी प्राप्त करने की स्थिति में पहुँचा तो कई राजा-महाराजाओं ने दावा किया कि उनकी रियासतें स्वतंत्र हैं, उन्हें स्वतंत्र रहने का अधिकार है।
  • कांग्रेस ने कई वर्षों तक रियासतों के मामलों में हस्तक्षेप न करने की नीति अपनाई।
  • सुभाषचंद्र बोस की अध्यक्षता में 1938 ई. में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में घोषणा की गई कि, पूर्ण स्वराज का लक्ष्य रियासतों सहित समूचे देश के लिए है।
  • जवाहरलाल नेहरू को, जो कई सालों से रियासतों की जनता के संघर्ष को सहयोग दे रहे थे, 1939 ई. में ऑल इंडिया स्टेटस पीपुल्स कांफ्रेंस का अध्यक्ष चुना गया।
  • ब्रिटिश सरकार ने अपना शासन कायम रखने के लिए और राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करने के लिए भारतीय जनता में फूट डालने के प्रयास किए। उनकी एक चाल सांप्रदायिकता को प्रोत्साहन देना भी था।
  • मुस्लिम लीग की स्थापना (1906) इसी तरह हुई थी। 1815 ई. में हिंदू महासभा की स्थापना हुई। सांप्रदायिकता का जहर 1920 ई. के बाद तेजी से फैलने लगा। हिंदुओं और मुसलमानों में धर्म-परिवर्तन के आंदोलन शुरू हुए। इन्होंने विभिन्न जातियों में अक्सर तनाव पैदा किया।
  • 1920 ई. के दशक में धर्म के नाम पर दंगे हुए और अनेक बेकसूर लोग मारे गए। 1924 ई. में गाँधीजी ने 21 दिन का अनशन करके शांति स्थापित करने का प्रयास किया।
  • 1931 ई. में कानपुर में सांप्रदायिक दंगे हुए। राष्ट्रीय आंदोलन के एक प्रमुख नेता गणेश शंकर विद्यार्थी शांति स्थापित करने के लिए दंगाग्रस्त क्षेत्रों में गए। परन्तु उन दंगों के दौरान हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए वे शहीद हो गए।
  • सन् 1916 ई. से कुछ साल तक मुस्लिम लीग और कांग्रेस ने मिलकर काम किया था। मुस्लिम लीग ने अपने अधिवेशन उसी स्थान और उसी समय करने शुरू किए, जहाँ कांग्रेस के अधिवेशन होते थे।
  • 1924 ई. में यह प्रथा बंद हो गई। उसी समय हिंदू महासभा भी सक्रिय हो गई। सिक्खों के बीच में सांप्रदायिक नेताओं ने भी सांप्रदायिक माँगें उठानी शुरू कर दी।
  • मुसलमानों के लिए सांप्रदायिक निर्वाचन की जो प्रथा पहले शुरू की गई थी उसे 1932 ई. में सिक्खों पर भी लागू कर दिया गया।
  • जिस दौर में आजादी के संघर्ष में भाग लेने के लिए हजारों लोग जेल में पहुंच गए थे, उस समय सांप्रदायिक संगठन अलग रहे। कभी-कभी उन्होंने ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग किया।
  • साइमन कमीशन के विरुद्ध आंदोलन के समय सांप्रदायिक दलों के कुछ नेताओं ने साइमन कमीशन का स्वागत किया।
  • राष्ट्रीय आंदोलन ने सभी भारतीयों की समानता के आधार पर भारतीय समाज के पुनर्निर्माण पर जोर दिया, परन्तु सांप्रदायिक दल सामाजिक सुधारों के भी विरुद्ध थे। उनके मतानुसार सभी भारतीयों के हित समान नहीं थे।
  • मुहम्मद अली जिन्ना, जो बीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों में एक राष्ट्रवादी नेता थे, बाद में मुस्लिम लीग के सबसे प्रमुख नेता बन गये। ज्यादातर मुसलमानों ने पृथक राज्य की माँग का विरोध किया।
  • आजादी के संघर्ष में, दूसरे समुदायों के लोगों की तरह, मुसलमानों ने भी भाग लिया था और ब्रिटिश सरकार के दमन को उन्होंने भी झेला था।
  • अशफाक उल्ला खाँ पहले मुस्लिम नेता थे, जिन्हें स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान फांसी दी गई थी।
  • मुस्लिम कांग्रेस में बड़ी संख्या में थे। किसानों और मजदूरों के संगठनों ने समान सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक लक्ष्यों के लिए सभी समुदायों के लोगों को एकजुट किया था।
  • राष्ट्रीय आंदोलन में अनेक महान नेता मुस्लिम थे। मुसलमानों के अधिकांश धार्मिक नेता भी मुस्लिम लीग और पृथक राज्य की माँग के विरोधी थे। उन्होंने पहचाना कि मुसलमानों का भविष्य अन्य भारतीयों के साथ जुड़ा हुआ है तथा तात्कालिक समस्या विदेशी शासन को समाप्त करना है।
  • मुसलमानों, हिंदुओं, सिक्खों, ईसाईयों और दूसरे धर्मों के लोगों के सामने एक समान समस्याएँ थीं- गरीबी, पिछड़ेपन और असमानता की समस्याएँ।
  • 1930 ई. के दशक के अंत तक मुस्लिम लीग और हिंदुओं के सांप्रदायिक संगठनों का कोई खास प्रभाव नहीं था।

सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रभाव अथवा महत्त्व

इस आंदोलन ने सारे देश में एकता और जागृति की महान् सरिता में को प्रवाहित किया। लोग स्वाधीनता प्राप्ति के लिए आतुर हो गए और देश में भावनात्मक एकता का अपूर्व वातावरण स्थापित हुआ। इससे निम्न वांछित परिणाम निकले-
  • 1. नव चेतना का संचार- इस आंदोलन से राष्ट्रीयता की भावना को असीम बल मिला और भारतीयों में नव-चेतना का संचार हो गया। इस आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक बनाया।
  • 2. जनता के विश्वास में वृद्धि- ज्यों-ज्यों सरकार का दमन चक्र बढ़ता गया, त्यों-त्यों जनता के विश्वास में वृद्धि होती गई। उन्हें यह पूर्ण विश्वास हो गया कि वे अपनी स्वतंत्रता को प्राप्त कर सकते हैं बशर्ते कि उनमें आत्मविश्वास्त्र और अटल संकल्प बना रहे।
  • 3. इस आंदोलन ने जीवन के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सभी पक्षों पर अनुकूल प्रभाव डाला। स्वदेशी का प्रचार होने से देश में आत्मनिर्भरता के कार्यक्रम को बल मिला। इसके साथ ही चूँकि यह आंदोलन जन-आंदोलन था अतः उसे देश के सभी वर्गों का समर्थन प्राप्त हुआ।
  • 4. क्रान्तिकारी गतिविधियों में शिथिलता- इस आंदोलन ने क्रान्तिकारियों की गतिविधियों को भी प्रभावित किया। वे बंद तो नहीं हुईं; परंतु शिथिल अवश्य हो गईं क्योंकि जनता का उन्हें पूर्ण सहयोग नहीं मिल सका।
  • 5. विदेशों से नैतिक सहानुभूति की प्राप्ति- विदेशों में भारत के प्रति नैतिक सहानुभूति का भाव जागृत हुआ और ब्रिटेन के उदारवादी तत्त्व सरकार पर यह जोर देने लगे कि वह भारत की समस्याओं पर ध्यान दे। उसे जितना जल्दी सम्भव हो, उतनी जल्दी स्वतंत्रता प्रदान कर दे।
  • 6. अहिंसा की शक्ति में विश्वास- इस आंदोलन ने भारतीयों में अहिंसा की शक्ति पर विश्वास पैदा कर दिया।
  • 7. स्त्रियों का सहयोग- इस आंदोलन में स्त्रियों ने भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया जो आगे चलकर महत्त्वपूर्ण साबित हुआ।
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  • 8. संवैधानिक सुधारों को प्रोत्साहन- सविनय अवज्ञा आंदोलन ने संवैधानिक सुधारों को प्रोत्साहन दिया। कुछ समय बाद 1935 का अधिनियम पास किया गया।
  • 9. स्वदेशी को प्रोत्साहन- सविनय अवज्ञा आंदोलन ने स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग को प्रोत्साहन दिया। बम्बई में अंग्रेज व्यवसायियों की 16 मिलें बंद हो गईं।
  • 10. 'प्रभात फेरियों' और वानर सेना जैसी संस्थाओं का जन्म- इस आंदोलन के फलस्वरूप कांग्रेस से हमदर्दी रखने वाली सभी संस्थाओं पर प्रतिबंध लग गया और समाचारों को प्रसारित करने तथा लोगों को संगठित करने के लिए 'प्रभात-फेरियों' तथा 'वानर-सेना' जैसी संस्थाओं का जन्म हुआ।

सविनय अवज्ञा आंदोलन का निष्कर्ष

निष्कर्ष के रूप में हम कह सकते हैं कि सविनय अवज्ञा आंदोलन भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में अत्यंत क्रांतिकारी घटना थी, जिसने देश में अपूर्व उत्साह और गौरवपूर्ण राष्ट्रीयता का संचार कर दिया। इस आंदोलन की सबसे ठोस उपलब्धि यह थी कि इसका आधार जन-मानस होने से यह देश के मर्म को पहली बार सार्थक रूप में पहचान पाया। इस आंदोलन ने विश्व जनमत का नैतिक समर्थन प्राप्त किया और अंग्रेजों पर इस मनोवैज्ञानिक तथ्य का रहस्योद्घाटन किया कि वे अधिक समय तक स्वतंत्रता की माँग की उपेक्षा नहीं कर सकते। नि:संदेह यह आंदोलन भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के विकास का गौरवपूर्ण पहलू था।

सविनय अवज्ञा आंदोलन के महत्वपूर्ण तथ्य

  • धरासना (गुजरात) में सरोजिनी नायडू जो एक प्रसिद्ध कवयित्री थीं, कांग्रेस की एक प्रमुख नेता थीं और कांग्रेस की प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष बनी थीं, ने नमक के सरकारी डिपो तक अहिंसात्मक सत्याग्रहियों की यात्रा का नेतृत्व किया।
  • देश भर में प्रदर्शन हुए, हड़तालें हुई, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार हुआ और बाद में लोगों ने कर देने से मना कर दिया।
  • सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार किया गया और कांग्रेस पर प्रतिबंध लगाया गया।
  • आंदोलन शुरू होने के एक वर्ष के भीतर करीब 90,000 लोगों को जेल में बंद कर दिया गया।
  • पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में इस आंदोलन का नेतृत्व खान अब्दुल गफ्फार खाँ ने किया। वे सीमांत गाँधी के नाम से प्रसिद्ध हुए।
  • साइमन कमीशन द्वारा सुझाए गए सुधारों पर विचार करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने नवंबर 1930 ई. में लंदन में पहला गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया।
  • कांग्रेस ने उस सम्मेलन का बहिष्कार किया, परन्तु भारतीय राजाओं, मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा और कुछ अन्य संगठनों के प्रतिनिधि उसमें शामिल हुए।
  • वायसराय इरविन ने 1931 ई. में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में शामिल होने के लिए कांग्रेस को राजी करने के प्रयास किए।
  • गाँधीजी और इरविन के बीच एक समझौता हुआ, जिसके अन्तर्गत सरकार ने उन सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करना स्वीकार कर लिया जिनके खिलाफ हिंसा के आरोप नहीं थे।
  • कांग्रेस ने भी सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस लेना स्वीकार कर लिया।
  • बल्लभभाई पटेल की अध्यक्षता में मार्च 1931 ई. में करांची में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में समझौते को मान लेने और दूसरे गोलमेज सम्मेलन में शामिल होने का निर्णय लिया गया।
  • दूसरे गोलमेज सम्मेलन के लिए गाँधीजी को कांग्रेस का प्रतिनिधि चुना गया। यह सम्मेलन 7 सितंबर, 1931 से 1 दिसम्बर, 1931 तक चला।
  • कांग्रेस के करांची अधिवेशन (1931) में मौलिक अधिकारों और आर्थिक नीति के बारे में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव स्वीकार किया गया।
  • प्रस्ताव में उन मौलिक अधिकारों का जिक्र था जिन्हें, जाति तथा धर्म के भेदभाव के बिना जनता को प्रदान करने का वादा किया गया था।
  • प्रस्ताव में कुछ उद्योगों के राष्ट्रीयकरण, भारतीय उद्योगों के विकास और मजदूरों एवं किसानों के लिए कल्याणकारी योजनाओं को भी स्वीकार किया गया था।
  • द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने वाले कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि गाँधीजी थे। गाँधीजी के अलावा अन्य भारतीयों ने भी सम्मेलन में भाग लिया। उनमें भारतीय राजा और हिंदू, मुस्लिम एवं सिक्ख संप्रदायों के नेता थे।
  • द्वितीय गोलमेज सम्मेलन असफल रहा, गाँधीजी भारत लौटे और सविनय अवज्ञा आंदोलन 28 दिसम्बर 1931 को पुनः शुरू कर दिया गया।
  • गाँधीजी और दूसरे नेता गिरफ्तार हुए। करीब एक साल के भीतर 1, 20, 000 लोगों को जेल में बंद कर दिया गया। आंदोलन को मई, 1934 ई. में वापस ले लिया गया।

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