कंप्यूटर भाषा क्या हैं? | कंप्यूटर की भाषाएं | Computer language in hindi | types of computer language

कंप्यूटर की भाषा

कंप्यूटर एक मानव निर्मित उपकरण है, उसमें कोई संवेदना अथवा भावना नहीं होती है। पर वह हमारे आदेश से चलता है, काम करता है। कंप्यूटर के अन्दर काफी कलपुर्जे लगे होते हैं और वे परस्पर सामंजस्य और संगति के साथ काम करते हैं। यह सामंजस्य स्थापित करने का काम कंप्यूटर की भाषा करता है। सॉफ्टवेयर की सक्रियता भी भाषा पर निर्भर करती है। भाषा निहायत मौलिक और व्यक्तिगत चीज है।
एक कंप्यूटर प्रयोग करने वाला अपना काम सॉफ्टवेयर से चलाता है। उसे भाषा के लिए अलग से सर्तकता नहीं बरतनी पड़ती है। भाषा सॉफ्टवेयर में ही निहित होती है, कुल मिलाकर, आम बोलचाल की भाषा में कह सकते हैं कि कंप्यूटर की भाषा हमारे 'शब्दकोष' की भाँति है और शब्दों से कहानी, कविता, पत्र, लेख, निबन्ध आदि लिखना सॉफ्टवेयर का काम है।

बेसिक (BASIC) (Beginners All Symbolic Instruction Code)

यह उच्च स्तरीय भाषा है। इसका विकास 1963-64 में हुआ। इसके विकास का उद्देश्य प्रोग्रामिंग की संकल्पना को स्पष्ट करना था । इसके विकास में जान जी केमेनी और थामस ई कुर्ज का योगदान रहा। इसके अनेक संस्करण बाजार में आ चुके हैं।
इनमें से कुछ प्रमुख निम्न हैं
  • फार्मवेयर- बेसिक के इन्टरप्रेटर सॉफ्टवेयर को कैसेट में स्टोर कर बाजार में प्रस्तुत किया गया। इसे "कैसे बेसिक" भी कहा जाता है।
  • आईबीएम पीसी के लिए बेसिक- माइक्रोसॉफ्ट कारपोरेशन ने आईबीएम पीसी के लिए बेसिक के इस सॉफ्टवेयर को तैयार किया।
  • एडवांस बेसिक- इस संस्करण का सभी प्रकार की प्रोग्रामिंग के लिए प्रयोग किया जाता है। यह काफी शक्तिशाली और उपयोगी सॉफ्टवेयर है।
  • दृश्य बेसिक- यह लोकप्रिय सॉफ्टवेयर विंडो पर आधारित है । यह नवीनतम संस्करण है। वर्तमान में इसका व्यापक प्रयोग किया जाता है।

कोबोल (COBOL) (Common Business Oriented Language)

कोबोल भी एक उच्च स्तरीय कंप्यूटर की भाषा है पर बेसिक और कोबोल में बहुत अंतर है । बेसिक 'इन्टरप्रेटर' है जबकि कोबोल 'कम्पाइलर' है । इसलिए कोबोल का प्रयोग व्यापारिक संस्थाओं द्वारा अधिक मात्रा में किया जाता है इसकी विशेषताएँ निम्न हैं-
  • कोबोल एक व्यवस्थित और विशेष प्रकार के पदानुक्रम में काम करने वाली भाषा है। इसे काफी सूक्ष्म स्तर पर विभाजित किया जा सकता है।
  • कंप्यूटर का वास्तविक प्रयोग प्रोसेसिंग के लिए किया जाता है। इनमें अन्य भाषा की तरह क्रमबद्ध रूप में आँकड़ों का प्रयोग करते हैं।
उदाहरण के रूप में देखें-

खाता संख्या

नाम

शेष राशि

500

A

1000-00

600

B

5000-00

700

C

7000-00

800

D

9000-00


इसमें आँकड़ों के प्रस्तुतिकरण का क्रम निम्न होता है
फाइल → रिकार्ड → आँकड़े
रिकार्डों के समूह को फाइल कहा जाता है।

सी (C)

कंप्यूटर की विलक्षण प्रोग्रामिंग भाषा का नाम 'सी' है। 'बी' भाषा यानी 'Basic Combined Programming Language BCPL' की उपज है। 1960 में इसे विकसित किया गया। इसको डेनिस रित्वी ने परिमार्जित किया और 1972 में बेल प्रयोगशाला में प्रयोग किया। इसी सुधरे संस्करण का नाम 'C' पड़ा। उसके बाद यूनिक्स आपरेटिंग व्यवस्था के साथ विकसित होता रहा। यूनिक्स के साथ इसका गहरा सम्बन्ध है। अनेक वर्षों तक 'सी' भाषा का प्रयोग शैक्षणिक कार्यों में होता रहा। बाद में सी कम्पाइलर को व्यवसायिक उद्देश्य के लिए जारी किया गया। इससे यूनिक्स की लोकप्रियता बढ़ी। कंप्यूटर व्यवसायियों ने भी इसका भरपूर स्वागत किया। 'एमएस-डॉस' सहित अनेक ऑपरेटिंग सिस्टम में इसका व्यापक उपयोग आरम्भ हुआ।

'सी' भाषा की विशेषताएँ
  • 'सी' भाषा में प्रोग्राम काफी तेजी से होता है। इसकी वजह से 'सी' में विभिन्न प्रकार के आँकड़ों और शक्तिशाली ऑपरेशनों को पूरा करने की क्षमता है।
  • यह बेसिक से कई गुना तेज होता है। एक सेकेण्ड में 0 से 1500 के गुणकों से अपने प्रोग्राम को बढ़ा सकता है। जबकि यही कार्य बेसिक 50 सेकेण्ड में करता है।
  • ऑपरेटर जटिल से जटिल प्रोग्राम को आसानी से लिख सकते हैं।
  • उच्च स्तरीय भाषा के सभी गुण हैं। अतः यह सिस्टम सॉफ्टवेयर से लेकर पैकेज सॉफ्टवेयर में आसानी से लिख सकता है।

C++

80 के दशक के उत्तरार्द्ध में C++ का विकास हुआ। बजार्ने स्ट्राडस्ट्राप - ने अमेरिका के न्यू जर्सी स्थित मुरे पहाड़ी के एटी एंड टी बेल प्रयोगशाला में किया। C++ एक लक्ष्योन्मुखी प्रोग्रामिंग की भाषा है। स्ट्राडस्ट्राप 'सीमुला - 67' के प्रशंसक थे और C के समर्थक। अतः दोनों को मिलाकर C++ को जन्म दिया। अत: C++ को C का विस्तार कह सकते हैं तथा सीमुला 67 की अनेक विशेषताओं से युक्त इसके आविष्कारक/विकासकर्ता ने इसका नाम 'C with class' दिया। लेकिन 1983 में इसका नाम बदलकर C++ कर दिया गया ।
इसके तीन गुण विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। जो C की तुलना में C++ में अधिक हैं।
  1. Classes
  2. Function Overloading
  3. Operator Overloading
इसमें व्यापक सुविधायें उपलब्ध हैं, जो 'C' भाषा में नहीं हैं। अतः वैश्विक स्तर पर इसकी काफी उपयोगिता है।

हाई लेवेल भाषाएँ (High Level Language)

मशीन लैंग्वेज की जटिलता से बचने के लिए असेम्बली भाषा बनाई गई - थी लेकिन असेम्बली भाषा को हर प्रोग्रामर नहीं बना सकता क्योंकि इस भाषा में प्रोग्राम बनाने के लिए सभी तरह के हार्डवेयरों और माइक्रोप्रोसेसर सर्किटों की पूरी जानकारी होना जरूरी है। इसलिए कंप्यूटरों को सामान्य प्रयोगार्थ बनाने के लिए ऐसी भाषा बनाना जरूरी हो गया है जिसमें अंग्रेजी जैसे शब्दों के प्रयोग से प्रोग्राम से प्रोग्राम बनाये जा सकें और शेष कार्य एक कम्पायलर या असेम्बलर करे। यह कम्पायलर अंग्रेजी में हाई लेवेल भाषा के आदेशों/शब्दों को सीधे ही मशीनकोड में बदल देता है। इस तरह हाई लेवेल की भाषा और इस भाषा से संबंधित कंपायलर प्रोग्राम की सहायता से सीधे ही सरलता से प्रोग्रामिंग की जा सकती है। सबसे पहली हाई लेवेल भाषा आइ.बी.एम. ने 1957 में बनाई जिसे फोरट्रान नाम दिया गया।
इसके बाद कोबोल, बेसिक, अल्गोल, पास्कल, पी. एल.-1, पी.एल.-2, कोरल, लोगो, सी, लिस्प, प्रोलॉग आदि कई हाई लेवेल भाषाएं बना ली गईं। इन भाषाओं को हाई लेवेल कहने का अर्थ यह नहीं कि इन्हें सीखने के लिए किसी ऊँची जानकारी की जरूरत है बल्कि यह है कि ये समझने के लिए इतनी अधिक सरल हैं कि कोई भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति इन्हें आसानी से सीख सकता है। इन भाषाओं में लचीलापन भी इतना अधिक होता है कि थोड़े से आदेशों से बहुत से काम कराये जा सकते हैं। इन सभी हाई लेवेल भाषाओं में एक समानता है कि लगभग सभी में अंग्रेजी के वर्णों व इन्डो-अरेबियन अंकों का प्रयोग होता है।

फोरट्रॉन (Fortran)

यह विश्व की सबसे पहली हाई लेवेल कंप्यूटर प्रोग्रामिंग भाषा है जिसका विकास आइ.बी.एम. ने 1957 में किया। यह अंग्रेजी के शब्दों Formula Transition का संक्षिप्त रूप है। 1958 में इसका सुधरा हुआ द्वितीय संस्करण व फिर 1966 में इसके और भी संशोधित व अमेरिका के राष्ट्रीय मानक संस्थान द्वारा प्रमाणित संस्करण फोरट्रॉन-IV को जारी किया गया जिसके बाद सभी वैज्ञानिक गणनाओं के लिए इसका प्रयोग किया जाने लगा। उन दिनों कंप्यूटरों में डेटा डालने के लिए पंच कार्डों का प्रयोग किया जाता था इसलिए फोरट्रॉन को उसी तरह का रूप दिया गया। माइक्रोकंप्यूटरों के विकास के बाद फोरट्रॉन के नये संस्करण फोरट्रॉन-77 का प्रयोग किया जाने लगा। यह शुरूआत में केवल MS-DOS नामक ऑपरेटिंग सिस्टम के लिये उपयुक्त था। बाद में इसका एक अन्य संस्करण निकाला गया जो 'यूनिक्स' (UNIX) सिस्टम पर भी चलाया जा सकता है। फोरट्रॉन की रचना बीजगणितीय सूत्रों से मिलती-जुलती है। इसीलिए इसे यह नाम (Formula Translation) दिया गया। इस भाषा से गणितीय सूत्रों को बहुत आसानी से हल किया जा सकता है इसलिए सारे संसार में जटिल वैज्ञानिक गणनाओं के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। इस भाषा में कुछ कमियां भी हैं जैसे यह उन कामों में प्रयोग नहीं की जा सकती जहाँ बहुत से डेटा या डेटा फाइलों की जरूरत हो या कुछ इनपुट-आउटपुट काम बार-बार किये जाने हों। फोरट्रॉन में लिखे गये प्रोग्राम एक-एक लाइन में लिखे गये आदेशों (Instructions) की श्रृंखला होती है जिनके जरिये कंप्यूटर द्वारा डेटा इनपुट, आउटपुट, कैलकुलेशन आदि कार्य कराये जाते हैं। इन इंस्ट्रक्शन्स के लिए अंग्रेजी के आम शब्दों जैसे READ, WRITE, DATA, GOTO आदि का प्रयोग किया जाता है।
यह भाषा वैज्ञानिक व इंजीनियरिंग कार्यों के लिए बहुत उपयुक्त है लेकिन वाणिज्य या मनोरंजन कार्यों में इसका कोई उपयोग नहीं किया जा सकता, न ही इसमें ग्राफिक कार्यों की क्षमता है, फोरट्रॉन की वाक्य रचना व व्याकरण के नियम बहुत कठिन हैं। प्रोग्राम बहुत आसानी से बनाये जा सकते हैं, यह और बात है कि एक कौमा (,) भी गलत जगह लगा देने पर प्रोग्राम निरर्थक हो जाता है। इस भाषा में प्रयोग किये जाने वाले कई शब्द दूसरी भाषाओं में भी वैसे के वैसे ही प्रयोग किये जा सकते हैं।

असेम्बलर

असेम्बलर का काम है असेम्बली भाषा में लिखे हुए प्रोग्राम को मशीन कोड में बदलना। कंप्यूटर में लगा हुआ माइक्रोप्रोसेसर सिर्फ मशीन कोड में लिखे प्रोग्राम से संचालित होता है इसलिए हर कंप्यूटर में एक असेम्बलर प्रोग्राम लगाना जरूरी होता है। यह असेम्बलर कंप्यूटर की रोम मेमोरी में स्टोर करके रख लिया जाता है। असेम्बलर की सहायता से असेम्बली भाषा में लिखे गये प्रोग्राम को इस तरह लागू किया जाता है-
  1. पहले असेम्बलर को इनपुट यूनिट द्वारा मेन मेमोरी में भर लिया जाता है।
  2. असेम्बली भाषा में लिखे गये सोर्स प्रोग्राम को मेन मेमोरी के द्वारा इनपुट यूनिट की सहायता से पढ़ा जाता है।
  3. अब असेम्बलर प्रोग्राम असेम्बली भाषा में लिखे सोर्स प्रोग्राम को मशीन कोड में अनुवादित करता है।
  4. स्टैप 3 से प्राप्त अनुवादित प्रोग्राम को मेन मेमोरी में ट्रांसफर कर उसमें आयी गलतियों को दूर किया जाता है। गलतियां दूर करने के बाद उसे मेन मेमोरी में डाल दिया जाता है।
  5. प्रोग्राम से संबंधित डेटा को मेन मेमोरी में डाल दिया जाता है।
  6. अब माइक्रोप्रोसेसर के द्वारा प्रोग्राम चलाया जाता है और असेम्बली भाषा में मिले हुए निर्देशों को प्रिंट कर लिया जाता है।

कंपायलर और इन्टरप्रेटर

हम पहले जान चुके हैं कंप्यूटर सिर्फ मशीन कोड की भाषा समझता है क्योंकि वह सिर्फ एक मशीन है जिसे केवल विद्युत संकेतों से चलाया जा सकता है। ये संकेत बाइनरी रूप में कंप्यूटर द्वारा लिये जाते हैं। जब हाई लेवल की किसी भाषा का प्रोग्राम कंप्यूटर में डाला जाता है तो यह जरूरी हो जाता है कि उस प्रोग्राम का मशीन लैंग्वेज में अनुवाद हो सके। यह अनुवाद कंपायलर या इंटरप्रेटर की सहायता से किया जाता है। कंपायलर पहले पूरा का पूरा अनुवाद एक साथ कर लेता है और फिर उसे कार्यान्वित करता है जबकि इन्टरप्रेटर एक-एक पंक्ति का अनुवाद करता है और साथ ही साथ पंक्ति में हुई गलती को बतलाता जाता है।
वास्तव में कंपायलर और इंटरप्रेटर दोनों ही सॉफ्टवेयर (प्रोग्राम) हैं जो ऑटोमेटिक ढंग से हाई लेवल की भाषा को मशीन कोड में बदल देते हैं। चूँकि हाई लेवल भाषा को सोर्स प्रोग्राम और मशीन लैंग्वेज के प्रोग्राम को ऑब्जेक्ट कोड कहा जाता है इसलिए हम कह सकते हैं कि कंपायलर या इंटरप्रेटर वे युक्तियां हैं जो सोर्स कोड को ऑब्जेक्ट कोड में बदल देती है।

कम्पाइलेशन

हाई लेवल भाषा में लिखे स्रोत प्रोग्रामों को कंप्यूटर के मशीन कोड (Object Code) में बदलने की क्रिया को कम्पाइलेशन कहते हैं ।
कम्पाइलेशन की क्रिया के मुख्य दो भाग होते हैं-
  1. शब्दकोशीय विश्लेषण (Lexical Analysis)
  2. वाक्य विश्लेषण (Syntax Analysis)
  • शब्दकोशीय विश्लेषण- इस विश्लेषण के दौरान कंपायलर स्रोत प्रोग्राम में उपयोग होने वाले सारे शब्दों को चेक करता है कि ये सारे शब्द पहले से अपनाये गये स्टैंडर्ड शब्द हैं या प्रोग्रामर के द्वारा लिये गये नये शब्द। इसके बाद यह प्रोग्रामर द्वारा प्रयोग किये गये नये शब्दों का मेमोरी में स्थान निश्चित करता है।
  • वाक्य विश्लेषण या सिन्टेक्स एनालिसिस- इस विश्लेषण के दौरान कंपायलर यह देखता है कि आदेश बनाते समय प्रोग्रामर ने संबंधित भाषा के सारे नियमों का पालन किया है या नहीं। यदि सारे नियमों का पालन किया है तो यह सोर्स प्रोग्राम को ऑब्लेक्ट प्रोग्राम में बदल देता है। यदि प्रोग्राम में व्याकरण (Grammar) की कोई गलती हुई है तो यह उस गलती की सूचना कंप्यूटर को दे देता है ताकि प्रोग्रामर अपनी गलती ठीक कर सके। इस तरह की गलतियाँ वाक्यरचना त्रुटियाँ (Syntax Error) कहलाती है। कुछ आमतौर से होने वाली स्टैंडर्ड गलतियाँ स्क्रीन पर डिस्प्ले हो जाती हैं या यदि प्रिंटर लगा हुआ हो तो वह गलतियों को उनकी कोड संख्या के अनुसार प्रिंट करता है। ये त्रुटियां सिन्टैक्स ऐरर कहलाती हैं।

एल्गोल (ALGOL)

1960 के दशक में यूरोप में इस भाषा का विकास हुआ। एल्गोल अंग्रेजी के शब्दों एल्गोरिथम लैंग्वेज (Algorithmic Language) का संक्षिप्त रूप है। एल्गोरिथम का अर्थ होता है कठिन समस्याओं को हल करने की तार्किक विधि। इसे विशेष रूप से जटिल बीज गणित की गणनाओं में प्रयोग करने के लिए बनाया गया था। 1958 में अमेरिका की एसोसिएशन फॉर कंप्यूटिंग मशीनरी (ACM) और यूरोप की गेम्म (GAMM) ने एक संयुक्त समिति बनाई जिसे इन्टरनेशनल एल्गोरिथम लैंग्वेज (IAL) को विकसित करने का काम सौंपा गया। इस समिति ने एल्गोल-58 भाषा का आविष्कार किया। इसका संशोधित वर्जन एल्गोल-60 यूरोप में बहुत प्रसिद्ध हुआ। बाद में एल्गोल-68 का आविष्कार हुआ जो कठिन होने के कारण ज्यादा प्रचलित नहीं हो पाई। लेकिन इसने एक दूसरी भाषा के लिए द्वार खोल दिये। इस भाषा को पास्कल नाम से जाना गया।

पास्कल

एल्गोल परिवार की इस भाषा का नाम महान फ्रेंच गणितज्ञ ब्लेज पास्कल के नाम पर पड़ा। इसका विकास ज्यूरिच विश्वविद्यालय के निकोलस वर्थ द्वारा एल्गोल भाषा से किया गया। इस भाषा को बनाने में इस बात पर विशेष ध्यान दिया गया कि प्रोग्रामिंग में आसानी हो। इन्टरनेशनल स्टैंडर्ड ऑरगेनाइजेशन द्वारा स्वीकृत 150 पास्कल ही सबसे प्रचलित पास्कल मानी जाती है, यद्यपि इससे भी विकसित संस्करण बनाये जा चुके हैं, जिनमें से टर्बो पास्कल एक है। इसे सीखने के बाद अल्गोल परिवार की अन्य भाषाएं 'एडा', पी.एल.-1, 'सी' आदि आसानी से सीखी जा सकती हैं। इसमें विशेष बात यह है कि कमांड की जगह पूरे से पूरे स्टेटमेन्ट्स एक चेन की तरह प्रयोग में लाये जाते हैं। पास्कल और बेसिक में सबसे बड़ा अंतर यह है कि पास्कल के सभी चरों (Variables) को पहले ही परिभाषित किया जाना जरूरी है। पास्कल का प्रयोग माइक्रो कंप्यूटर में ज्यादातर किया जाता है।
पास्कल का सबसे नवीन संस्करण टर्बो पास्कल है जो कि मेनुड्रिवन (menudriven) है।

कम्प्यूटर की अन्य भाषाएँ

  • कॉमल- यह अंग्रेजी के शब्दों कॉमन एल्गोरिथम लैंग्वेज (Common Algorithmic Language) का संक्षिप्त रूप है। यह पास्कल से बहुत मिलती-जुलती है जिसे माध्यमिक स्तर के स्कूल के विद्यार्थियों के प्रयोग के लिए बनाया गया है।
  • पी.एल.-1 (PL-1)- पी. एल. का अर्थ है प्रोग्रामिंग लैंग्वेज । इसे आइ.बी.एम. ने 1960 में अपने 360 श्रृंखला के मेनफ्रेम कंप्यूटरों में प्रयोग करने के लिए बनाया। इस भाषा में फोरट्रॉन, कोबोल, स्नोबॉल और एल्गोल-60 चारों भाषाओं की विशेषताएँ विद्यमान हैं । इन सभी विशेषताओं के होते हुए भी यह भाषा लोकप्रिय नहीं हो सकी क्योंकि यह बहुत कठिन थी। साधारण प्रोग्रामर को इतनी कठिन प्रोग्रामिंक की जरूरत नहीं होती और इसे सीखने में समय भी बहुत अधिक लगता है। कोर्नेल विश्वविद्यालय ने पी.एल. -1 भाषा को अपनाया और इसके संशोधित संस्करण पी.एल.सी. और पी.एल. सी.टी. निकाले जिनका व्यापक उपयोग हुआ।
  • पी.एल./एम. (P.L/M)- यह पी. एल.-1 जैसी भाषा है जिसे इन्टेल परिवार की चिपों का प्रयोग करने वाले माइक्रोकंप्यूटरों के लिए बनाया गया है।
  • पी. एल./जेड.- यह जीलॉग द्वारा अपने Z-8000 माइक्रोप्रोसेसर की प्रोग्रामिंग के लिए बनाये गई भाषा-परिवार का नाम है।
  • एडा (Ada)- यह अमेरिकन रक्षा विंग द्वारा ऑटोमेटिक यंत्रों के नियंत्रण के लिए बनायी गयी भाषा का नाम है जिसे यह नाम विश्व की सबसे पहली लेडी-प्रोग्रामर एडा लवलेस के सम्मान में दिया गया। इस भाषा को एल्गोल और पास्कल को परिमार्जित करके बनाया गया था । एडा में भी प्रोग्राम की अशुद्धियां अपने आप ठीक कर लेने की व्यवस्था है। यह भी एक रियल टाइम कंट्रोल भाषा है।
  • कोरल-6 (Coral-6)- यह ऑटोमेटिक सिस्टमों और प्रोसेसिंग के नियंत्रण के लिए बनायी गयी भाषा है।
  • लोगो (Logo)- छोटी कक्षाओं के विद्यार्थियों को ग्राफिक डिजाइन आदि सिखाने के लिए 'लोगो' का प्रयोग किया जाता है। बहुत सरल अंग्रेजी शब्दों जैसे MOVE, FORWARD, TURN की सहायता से एक टर्टल (कछुए जैसी आकृति) को स्क्रीन पर घुमाकर कई तरह की आकृतियाँ बनायी जा सकती हैं। बच्चे खेल ही खेल में प्रोग्रामिंग का आनंद उठा लेते हैं ।
  • पायलट (Pilot)- यह एक लेखकीय भाषा है जिसके द्वारा शिक्षक या प्रशिक्षक कंप्यूटरों की मदद से पहले से रिकॉर्ड किये हुए विषय को पढ़ा सकते और विद्यार्थियों के द्वारा दिये गये उत्तरों को चेक कर सकते हैं।
  • फोर्थ (Forth)- यह भाषा चौथी पीढ़ी के कप्यूटरों के लिए चार्ल्स एच. मूरे ने 1960 के दशक में बनायी थी। बाद में इसके कई संस्करण प्रचलित हुए।

चतुर्थ जनरेशन की भाषाएँ (Fourth Generation Language)

भाषाओं की तीन जनरेशन (मशीन लैंग्वेज, असेम्बली भाषा और हाई लेवेल भाषा) के बाद भाषाओं की चौथी जनरेशन अपने विकास में लगी हुई है। इनमें से कुछ भाषाएं अभी-अभी व्यवहार में आई हैं जैसे-सायबेस, रेमीस II, फॉक्स बेस, नोमाड और ओरेकल (Oracle)।
इन भाषाओं में यह विशेषता है कि बिना प्रोग्रामिंग की जानकारी के सीधे ही इनके असेम्बलर को लगाकर प्रोग्रामिंग की जा सकती है। इसलिए इन्हें स्वप्रोग्रामन (Self Programming) भाषा भी कहा जाता है। इनका असेम्बलर प्रयोग करने वाले को स्क्रीन पर बतलाता जाता है कि आगे क्या करना है। इन भाषाओं में लंबे प्रोग्राम न बनाकर सीधे ही प्रश्नोत्तर के माध्यम से निष्कर्ष प्राप्त किये जाते हैं। इस प्रकार ये भाषाएं अप्रक्रियात्मक (Non-Procedural) और इन्टरएक्टिव होती हैं। इनका प्रयोग आसान होता है लेकिन यह जरूरी नहीं कि निष्कर्ष जल्दी मिल जाएं, न ही यह जरूरी है कि कम-से-कम मेमोरी में काम चल जाए।

पाँचवीं पीढ़ी की भाषा (Fifth Generation Lanaguage)

पाँचवीं पीढ़ी की भाषा का उपयोग कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं तार्किक प्रोग्रामिंग के लिये होता है। इस पीढ़ी की भाषा में किसी समस्या के समाधान के लिये एल्गोरिथम का प्रयोग न कर समस्या के समाधान में आने वाली बाधाओं तथा उससे उत्पन्न होने वाली तार्किक अवस्थाओं का उपयोग किया जाता है। इस भाषा के उदाहरण हैं- लिस्प तथा प्रोलॉग।
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