गोपाल कृष्ण गोखले | गोपाल कृष्ण गोखले की जीवनी | gopal krishna gokhale in hindi

गोपाल कृष्ण गोखले

"मुझे भारत में एक पूर्ण सत्यवादी आदर्श पुरुष की तलाश थी, और वह आदर्श पुरुष गोखले के रूप में मिला। उनके हृदय में भारत के प्रति सच्चा प्रेम व वास्तविक श्रद्धा थी। वे देश की सेवा करने के लिए अपने सारे सुखों और स्वार्थ से परे रहे।"
महात्मा गांधी ने ये शब्द गोपाल कृष्ण गोखले के लिए कहे थे, जिन्होंने अपना सारा जीवन देश और समाज की सेवा में अर्पित कर दिया।
गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 6 मई सन् 1866 को रत्नागिरि के कोटलुक गाँव में हुआ। उनके पिता कृष्णाराव एवं माता सत्यभामा थीं। माता-पिता अत्यन्त सरल स्वभाव के थे। उन्होंने गोखले को बचपन से ही देश-जाति के प्रति निष्ठा, विनम्रता जैसे गुणों की शिक्षा दी।
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पिता की असमय मृत्यु के कारण गोखले को शिक्षा प्राप्त करने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। बड़े भाई गोविन्द पन्द्रह रुपये महीना की नौकरी करते थे जिसमें से वे हर माह आठ रुपये गोखले को भेजने लगे ताकि उनकी शिक्षा में व्यवधान न पड़े। गोखले यह अनुभव करते थे कि भाई किस कठिनाई से उनकी सहायता कर रहे हैं। अत्यन्त संयमित जीवन व्यतीत करते हुए उन्होंने साधनों के अनुरूप अपने को ढाला। ऐसा समय भी आया जब वे भूखे रहे और उन्हें सड़क की बत्ती के नीचे बैठकर पढ़ाई करनी पड़ी। इन कठिन परिस्थितियों में भी उनका सम्पूर्ण ध्यान पठन-पाठन में लगा रहा। सन् 1884 में उन्होंने मुम्बई के एलफिंस्टन कॉलेज से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। गोखले का अंग्रेजी भाषा पर असाधारण अधिकार था। गणित और अर्थशास्त्र में उनकी अद्भुत पकड़ थी जिसके बल पर वे तथ्यों व आँकड़ों का विश्लेषण और उनकी विवेचना विद्वतापूर्ण ढंग से करते थे। इतिहास के ज्ञान ने उनके मन में स्वतंत्रता व प्रजातंत्र के प्रति निष्ठा उत्पन्न की।
स्नातक होने के पश्चात् गोखले भारतीय प्रशासनिक सेवा (आई०सी०एस०) इंजीनियरिंग या वकालत जैसे लाभदायक व्यवसायों में जा सकते थे, किन्तु इस विचार से कि बड़े भाई के ऊपर और आर्थिक बोझ न पड़े उन्होंने इन अवसरों को छोड़ दिया। वे सन् 1885 में पुणे के न्यू इंगलिश कॉलेज में अध्यापन कार्य करने लगे। इस कार्य में उन्होंने स्वयं को जी-जान से लगा दिया और एक उत्कृष्ट शिक्षक साबित हुए। अपने स्नेहपूर्ण व्यवहार और ज्ञान से वे छात्रों के चहेते बन गए। उन्होंने अपने सहयोगी एन० जे० बापट के साथ मिलकर अंकगणित की एक पुस्तक संकलित की जो अत्यन्त लोकप्रिय हुई। इस पुस्तक का अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ।
सन् 1886 में बीस वर्ष की उम्र में गोपाल कृष्ण गोखले ने सक्रिय रूप से समाज सेवा और राजनीति में प्रवेश कर लिया। इससे पूर्व 'डेकन एजूकेशनल सोसाइटी' में अपनी गतिविधियों के कारण वे सार्वजनिक जीवन से सम्बंधित उत्तरदायित्व वहन करने की कला में महारथ हासिल कर ही चुके थे। उन्होंने 'अंग्रेजी हुकूमत के आधीन' विषय पर कोल्हापुर में अपना प्रथम भाषण दिया। अभिव्यक्ति और भाषा प्रवाह के कारण इस भाषण का जोरदार स्वागत हुआ। गोखले लोगों में राष्ट्रीयता की भावना जगाने के लिए शिक्षा को आवश्यक मानते थे। उनकी मान्यता थी कि शिक्षा ही राष्ट्र को संगठित कर सकती है।
गोखले विभिन्न पदों पर कार्य करते हुए सामाजिक जीवन में चेतना का संचार करते रहे। गरीबों की स्थिति में सुधार के लिए 1605 में गोखले ने 'सर्वेन्ट्स ऑफ इण्डिया सोसाइटी' की स्थापना की। शीघ्र ही यह संस्था समाज सेवा करने को तत्पर युवा, उत्साही और निःस्वार्थ कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण स्थल बन गई। इनमें अधिकांश कार्यकर्ता स्नातक थे। आदिवासियों का उत्थान करना, बाढ़ व अकाल पीड़ितों की मदद करना. स्त्रियों को शिक्षित करना और विदेशी शासन से मक्ति के लिए संघर्ष करना इस संस्था के प्रमख उद्देश्य थे। कार्यकर्ताओं पर गोखले का अत्यन्त प्रभाव था, जिसे देखकर किसी ने टिप्पणी की थी-“केवल एक गोखले से ही हमारी रूह काँपती है। उसके जैसे बीसियों और बन रहे हैं, अब हम क्या करेंगे?"
गोखले के जीवन पर महादेव गोविन्द रानाडे का प्रबल प्रभाव था। वे 1887 में रानाडे के शिष्य बन गए। रानाडे ने उन्हें सार्वजनिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में 15 वर्ष तक प्रशिक्षित किया और ईमानदारी, सार्वजनिक कार्यों के प्रति समर्पण व सहनशीलता का पाठ सुनाया।
गांधी जी जब दक्षिण अफ्रीका से भारत आए तो गोखले से मिले। वे गोखले के विनम्र स्वभाव तथा जन जागरण हेतु किए गए प्रयासों से अत्यंत प्रभावित हुए। गांधी जी ने गोखले को अपना राजनैतिक गुरु' मान लिया। गांधी जी कहते थे, “गोखले उस गंगा का प्रतिरूप हैं, जो अपने हृदय-स्थल पर सबको आमंत्रित करती रहती है और जिस पर नाव खेने पर उसे सुख की अनुभूति होती है। गांधी जी ने गोखले से स्वराज प्राप्ति का तरीका सीखा। गोखले भी गांधी जी की सादगी और दृढ़ता से अत्यन्त प्रभावित हुए और उन्हें बड़े भाई सा आदर देने लगे।
सन् 1886 में गोखले इण्डियन नेशनल कांग्रेस में सम्मिलित हो गए। उन्होंने कांग्रेस के मंच से भारतीयों की विचारधारा, सपनों और उनकी महत्वाकांक्षाओं को अपनी तर्कपूर्ण वाणी और दृढ़ संकल्प द्वारा व्यक्त किया। सन् १६०५ में गोखले कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में लाला लाजपतराय के साथ इंग्लैण्ड गए। उन्होंने ब्रिटिश राजनेताओं और जनता के सामने भारत की सही तस्वीर प्रस्तुत की। अपने पैंतालीस दिन के प्रवास के दौरान उन्होंने विभिन्न शहरों में प्रभावपूर्ण पैंतालीस सभाओं को सम्बोधित किया। श्रोता मंत्र-मुग्ध होकर उन्हें सुनते। निःसंदेह गोखले भारत का पक्ष प्रभावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करने में सर्वाधिक सक्षम नेता थे।
अलीगढ़ कॉलेज अंग्रेजों और अंग्रेजी राज्य के समर्थकों तथा राष्ट्रीय कांग्रेस के विरोधियों का गढ़ माना जाता था, किन्तु वहाँ भी राष्ट्रवादी छात्रों का एक प्रभावशाली समूह था। गोखले के विचारों की अलीगढ़ के छात्रों पर इतनी गहरी छाप थी, कि जब गोखले वहाँ भाषण देने पहुंचे तो वहाँ छात्रों ने उनकी बग्घी के घोड़े हटा दिए और स्वयं बग्घी में जुत गए। वे बग्घी को खींचते हुए गोखले जिन्दाबाद' 'हिन्दुस्तान जिन्दाबाद' के नारे लगाते हुए स्ट्रेची हाल तक ले आए।
गोखले ने समाज सेवा को अपने जीवन का परम लक्ष्य बना लिया था। सन् 1868 में मुम्बई में प्लेग का प्रकोप हुआ। उन्होंने अपने स्वयंसेवकों के साथ दिन-रात प्लेग पीड़ितों की सेवा की। साम्प्रदायिक सद्भाव को बढ़ाने के लिए उन्होंने भरसक प्रयास किए। उन्होंने सरकार से मादक पदार्थों की बिक्री खत्म करने का अनुरोध किया। वे अधिकाधिक भारतीयों को नौकरी देने, सैनिक व्यय को कम करने तथा नमक कर घटाने की माँगे निरन्तर उठाते रहे। उन्होंने निःशुल्क एवं अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा को प्रारम्भ करने, कृषि तथा वैज्ञानिक शिक्षा को बढ़ावा देने तथा अकाल राहत कोष का सही ढंग से इस्तेमाल करने हेतु सरकार पर बराबर दबाव बनाए रखा।
दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले भारतीयों के प्रति गोखले की अत्यधिक सहानुभूति थी। अपने उन बन्धुओं पर होने वाला अन्याय उन्हें अपने ऊपर हुआ अन्याय लगता था। गांधी जी के निमंत्रण पर वे सन् 1612 में दक्षिण अफ्रीका गए। ऐसा पहली बार हुआ था जब कोई भारतीय राजनेता प्रवासी भारतीयों की स्थिति को परखने के लिए भारत से बाहर गया। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका की सरकार से जातीय भेद-भाव को समाप्त करने का आग्रह किया।
गोखले देश की आजादी, सामाजिक सुधार और समाज सेवा हेतु अथक परिश्रम करते रहे। निरन्तर श्रम से उनका स्वास्थ्य गिरने लगा। उन्हें मधुमेह और दमा ने घेर लिया। १६ फरवरी १६१५ की रात्रि दस बजकर पच्चीस मिनट पर उन्होंने अन्तिम साँस ली। उन्होंने आकाश की ओर आँखें उठाई और हाथ जोड़कर प्रभु को प्रणाम करते हुए सदा के लिए आँखें मूंद लीं।
उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक में राष्ट्रीय काँग्रेस की राजनीति के सूत्र दो नेताओं के हाथ में थे। परंतु उनकी विचारधारा भिन्न थी। वे दो नेता थे - गोपाल कृष्ण गोखले और लोकमान्य टिळक। उस समय दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, दिनशा वाच्छा, सुरेंद्रनाथ बॅनर्जी, गोपाल कृष्ण गोखले प्रमुख नरमपंथी नेता थे।
आयु के 18 वें वर्ष में उपाधि प्राप्त करने के पश्चात तत्कालीन परंपरानुसार वे सरकारी नौकरी के पीछे नहीं पडे। उल्टे उन्होंने समाजसेवा का व्रत ले लिया जो अविरत ढंग से निभाया। अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत उन्होंने डेक्कन एज्युकेशन सोसायटी में अध्यापकी से की। कुछ समय उन्होंने फर्ग्युसन महाविद्यालय में अध्यापन किया। वहाँ से वे सन् 1903 में सेवानिवृत्त हुए। पुणे की सार्वजनिक सभा के सचिव के रूप उन्होंने कार्य किया साथ ही राष्ट्रीय काँग्रेस द्वारा प्रकाशित त्रैमासिक का संपादन भी उन्होंने किया। वे सुधारक के सह संपादक भी रहे। गोपाल कृष्ण गोखले न्यायमूर्ती रानडे को गुरु मानते थे। उन्हीं के प्रभाव से गोखले के स्वभाव में मृदुता एवं ऋजुता आ गई। राजनीति तथा अर्थनीति की शिक्षा गोखले ने अपने गुरु से ही ले ली। राष्ट्रीय काँग्रेस की गतिविधियों में गोखले सन् 1889 से सक्रिय थे। सन् 1895 में वे राष्ट्रीय काँग्रेस के सचिव बन गए। वे सन् 1905 में वाराणसी में संपन्न अधिवेशन के अध्यक्ष थे। अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने राष्ट्रीय काँग्रेस के लक्ष्य के रूप में 'औपनिवेशिक स्वराज्य' की घोषणा की।
भारतीय आय-व्यय की जाँच करने के लिए सन् 1897 में वेल्वी कमीशन नियुक्त किया गया। कमीशन के सामने गवाह देने के लिए डेक्कन सभा की तरफ से गोपाल कृष्ण गोखले गए थे। वे इंग्लैंड जानेवाले भारत के प्रथम लोकप्रतिनिधि थे। कमीशन के सामने उनकी गवाही एकदम सप्रमाण एवं तर्कसंगत थी। भारत में ब्रिटिशों की सदोष राज्यपद्धति, भारत की दरिद्रता के बारे में भाष्य करते हुए गोखले ने कमीशन को समझा दिया कि भारत में सुधारों की कितनी आवश्यकता है। राज्य के कारोबार में भारतीयों को स्थान मिले यह मांग भी उन्होंने रखी। राजनीतिक मतभिन्नता के बावजूद तिलक ने गोखले के इस कार्य की प्रशंसा की। राजनीति, अर्थनीति, सामाजिक प्रश्न, शिक्षा, तर्कशास्त्र आदि विषयों का गोखले का व्यासंग था। वे सन् 1898 में वे प्रांतीय कानून मंडल के तथा 1902 में केंद्रीय कानून मंडल के सदस्य बने। सन् 1902 से 1912 केकालखंड में गोखले ने राजनीतिक, आर्थिक विषयों के साथ ही सैनिकी खर्चा, शिक्षा के बारे में महत्त्वपूर्ण कार्य किया। किसानों के संदर्भ में उन्होंने शासन को महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ दे दी।
केंद्रीय कानून मंडल में गोपाल कृष्ण गोखले का भाषण अध्ययन एवं जानकारीपूर्ण होता था। जिससे ब्रिटिश अधिकारी भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहते थे। खुद लॉर्ड मिंटो ने कहा था कि 'इतना अध्ययनपूर्ण भाषण ब्रिटिश संसद में भी क्वचित ही सुनने को मिलता है।'
गोपाल कृष्ण गोखले उदारमतवादी नेता थे। उनका शांत एवं मृदु स्वभाव उनके विचारों का पोषक ही था। ब्रिटिशों के प्रति अपने विचारों के कारण गोखले को कई बार जनता के असंतोष का सामना करना पडा, परंतु वे अपने विचारों पर अडिग थे। पुरातनपंथी नेता के नाते गोखले सुधार एवं राजनीतिक अधिकारों का सदैव समर्थन करते रहते थे। मात्र उनका विचार था कि यह सब एक के बाद एक मिले। राष्ट्रकार्य हेतु उत्साही युवकों की पीढी निर्माण करने के उद्देश्य से गोखले ने सन् 1905 में पुणे में भारत सेवक समाज की स्थापना की।
सौम्य स्वभाव के गोपाल कृष्ण गोखले सन् 1905 में हुए बंगाल के विभाजन से काफी व्यथित हुए। यह विभाजन करनेवाले लॉर्ड कर्जन को उन्होंने औरंगजेब की उपमा दी। साथ ही स्वदेशी एवं बहिष्कार को भी गोखले ने मान्यता दी। उनकी इसी भूमिका के कारण इंग्लैंड से लौटने पर पुणे में उनका सत्कार किया गया। तब लोकमान्य तिलक ने गोखले का अभिनंदन किया। इसी दरम्यान दक्षिण आफ्रिका में गोरों द्वारा भारतीयों पर अत्याचार किए जा रहे थे। उसके विरूद्ध मोहनदास करमचंद गांधीने प्रत्यक्ष वहाँ जाकर कार्य किया।
इस कार्य के लिए गोखले का पूर्ण समर्थन था। सन् 1912 में उन्होंने स्वयं दक्षिण अफ्रिका का दौरा किया। वहाँ भारतीयों पर हो रहे अन्याय की जानकारी भारत सरकार को दे दी। महात्मा गांधी गोखले को अपना राजनीतिक गुरू मानते थे। अपने गुरू को उन्होंने गंगा की उपमा दी।
1902 ईस्वी में केंद्रीय विधिमंडल में गोखले को चुना गया। उस विधिमंडल में बजट पर किए गए उनके भाषण से उनका कर्तृत्व और नेतृत्व देशमान्य हुआ। 1902 से 1912 ईस्वी तक उन्होंने बजट पर लगभग 12 भाषण दिए। इनके सभी भाषण तत्कालीन आर्थिक एवं सामाजिक परिस्थितियों पर प्रकाश डालते हैं। इसीलिए इनका ऐतिहासिक महत्त्व भी रहा है। शिक्षा, कृषि, किसानों की स्थिति, उद्योग, सरकारी नौकरी, सेना-व्यय, कर, प्रणाली आदि अनेक विषय गोखले ने अपने भाषणों द्वारा व्यक्त किए। शिक्षा प्रसार को उन्होंने अधिक महत्त्व दिया था। आगे चलकर 1910 ईस्वी में विधिमंडल में प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य एवं मुफ्त में देने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया। बडौदा के महाराजा ने अमरेली तहसील में एक साल पहले ही यह प्रयोग सफल कर दिखाया था। 1909 ईस्वी में सभी संस्थानों में यह योजना शुरू की गई। गोखले ने इसका उल्लेख किया। सभी लोगों के शिक्षा की जिम्मेदारी अपनी है ऐसा सरकार ने 1854 ईस्वी में ही घोषित किया था। और शिक्षा-आयोग ने 1882 ईस्वी में भरोसा दिया। इस बात का गोखले ने हवाला दिया। उनके सामने जपान का आदर्श था। 1872 ईस्वी से ही जपान ने प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य एवं मुफ्त की थी और तीस साल में सारा जपान साक्षर हुआ। अपने देश में अनिवार्यता एवं मुफ्त प्राथमिक शिक्षा प्रदान करना असंभव है इस बात को गोखले जानते थे इसीलिए सीमित मात्रा में यह योजना लागू करने की सूचना की और सुझाव दिया कि जिनकी मासिक आय पच्चीस रुपयों तक होगी उनके ही बच्चों को सहुलियत या मुक्त शिक्षा दी जाएँ। स्थानिय स्वायत्त शासन संस्थाओं को शिक्षा प्रसार के लिए केंद्र एवं प्रादेशिक सरकार अनुदान दे और इन संस्थाओं द्वारा शिक्षा कर लगा ने की सिफारिश भी की थी। शिक्षा कर संबंधी गोखले की सूचना पचास साल बाद आज़ाद हिंदुस्तान के कुछ राज्यों में अमल में लाया गया।
किसानों की दरिद्रता (गरीबी) गोखले के बजट के भाषणों का विषय रहा है। गरीबी, अज्ञान, एवं अस्वास्थ दूर करने के लिए उन्होंने महत्त्वपूर्ण तीन सूचनाएँ की थी जो इस प्रकार है - लगान कम करना, ऋण कम करना और भूविकास बैंक स्थापित करना। आयलैंड के किसानों की गरीबी दूर करने के लिए एक कानून 1904 ईस्वी में किया गया था। इस कानून के तहत 10 करोड पौंड का निधि संकलित किया गया। साहूकारों के पास गिरवी रखी हुई भूमि को वापिस लेने के लिए किसानों को इस निधि से ऋण देने की योजना अमल में लाई गई। उसी तरह से हमारे यहाँ भी निधि स्थापित किया जाए, इसीलिए भू-विकास बैंक की स्थापना की जाए ऐसा उनका आग्रह था। इस योजना के द्वारा पचास सालों में ऋण चुकाने की व्यवस्था की गई थी और साढ़े तीन प्रतिशत से अधिक ब्याज न लिया जाए ऐसा गोखले का कहना था। किसानों में बचत करने की आदत निर्माण करके उन्हें बाजिब मूल्य (दर) से ऋण दिया जाएँ। बजाय इसके किसानों की सहकारी समिति (पतपेढी) ऋण निवारण की समस्या हल नहीं कर सकती, इसीलिए ईजिप्त, जर्मनी आदि देशों के समान भू-विकास बैंक स्थापित किए जाएँ ऐसी गोखले की माँग थी। सहकारी पतसंस्थाओं की (क्रेडिट सोसायटी) क्षमता सीमित होने के कारण कृषि विकास के लिए भू-विकास बैंक, भूप्रतिभूति (गिरवी) बैंक आदि की सहायता अधिक मात्रा में लगती है यह बात अनुभव सिद्ध थी। जलसंधारण (नहर-बंधारे) का भी उन्होंने आग्रह किया और कहा कि केवल सरकार के द्वारा जलसंधारण योजनाएँ अमल में न लाकर निजी ठेकेदारों की भी सहायता ली जाएँ। ईजिप्त में लॉर्ड क्रोमर के सुधार का अनुकरण यहाँ भी किया जाएँ ऐसा उन्हें लगता था। विदेश से कृषितज्ञ यहाँ लाने के बजाय भारत के बुद्धिमान विद्यार्थी विदेश में ही कृषिशिक्षा के लिए भेजे जाएँ ऐसी उन्होंने सिफारिश की थी।
रानडे के समान ही गोखले का जोर औद्योगिकीकरण पर था। देश की गरीबी दूर करने का यही अच्छा उपाय है ऐसी उनकी श्रद्धा (भावना) थी। इसीलिए शिक्षा के लिए संस्था स्थापित करने और उद्योग व्यवसाय विकसित करने की वे हमेशा माँग करते रहे।
बजट पर गोखले के जो भी भाषण थे वे कभी भी निरर्थक नहीं रहते थे। उनकी मांग के अनुसार नमक का कर (टैक्स) कम किया गया और स्थानीय स्वायत्त शासन संस्थाओं (निकाओं) को अनुदान मिलने लगा था।
इस महान देशभक्त की मृत्यु सन् 1915 में हुई।

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