महात्मा गाँधी का जन्म कब हुआ था? | mahatma gandhi ka janm kab hua tha

महात्मा गाँधी का जन्म कब हुआ था? 

महात्मा गांधी का जन्म गुजरात प्रान्त के पोरबन्दर में 2 अक्टूबर 1869 ई० को हुआ था। इनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। इनके पिता का नाम करमचंद और माता का नाम पुतली बाई था। बालक मोहन पर परिवार की धार्मिक आस्था व सादगी का गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने बचपन में सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र और श्रवण कुमार के नाटक देखे थे। इन नाटकों का सन्देश उनके सम्पूर्ण जीवन (कार्य-व्यवहार) में परिलक्षित होता है। सत्यनिष्ठा, अहिंसा, त्याग व मानव सेवा की झलक उनके जीवन के अनेक प्रसंगों में मिलती है।
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गांधी अल्फ्रेड हाईस्कूल में प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। एक बार उनके विद्यालय में निरीक्षण के लिए विद्यालय निरीक्षक आए हुए थे। उनके शिक्षक ने छात्रों को हिदायत दे रखी थी कि निरीक्षक पर आप सब का अच्छा प्रभाव पड़ना चाहिए। निरीक्षक ने छात्रों को पाँच शब्द बताकर उनके हिज्जे (वर्तनी) लिखने को कहा। बच्चे हिज्जे लिख ही रहे थे कि शिक्षक ने देखा गांधी ने एक शब्द के हिज्जे गलत लिखे हैं। उन्होंने गांधी को संकेत कर बगल वाले छात्र से नकल कर हिज्जे ठीक कर लिखने को कहा, परन्तु गांधी ने ऐसा नहीं किया। उन्हें नकल करना अपराध लगा। बाद में उन्हें शिक्षक की डाँट खानी पड़ी। उन्हीं दिनों की एक दूसरी घटना है। गांधी के बड़े भाई कर्ज में फँस गए थे। कर्ज चुकाने के लिए उन्होंने अपना सोने का कड़ा बेंच दिया। मार-खाने के डर से उन्होंने माता-पिता से झूठ बोला कि कड़ा कहीं गिर गया है। झूठ बोलने के कारण उनका मन स्थिर नहीं हो पा रहा था। रात भर उन्हें नींद नहीं आई। गांधी ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए कागज में लिखकर पिता को दिया। उन्होंने सोचा कि जब पिता जी को मेरे अपराध की जानकारी होगी तो वह उन्हें पीटेंगे, लेकिन पिता ने ऐसा कुछ नहीं किया। वह बैठ गए और उनके आँसू आ गए। गांधी को इससे चोट लगी। उन्होंने महसूस किया कि प्यार हिंसा से ज्यादा असरदार दण्ड दे सकता है।
इसी घटना से प्रभावित होकर उन्होंने अहिंसा व्रत के पालन का संकल्प लिया। विलायत से वकालत करने के बाद एक बार उनको दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा। वहाँ पर रेल का प्रथम श्रेणी का टिकट होने के बावजूद उन्हें पहले दर्जे के कम्पार्टमेण्ट से धक्के मारकर निकाल दिया गया। उन दिनों दक्षिण अफ्रीका में रंग-भेद नीति का बोलबाला था। गोरे लोग काले अफ्रीकियों और एशियाई मूल के नागरिकों से बुरा बर्ताव करते थे। गांधी जी सोचते (चिन्तन) रहे और निर्णय लिया कि मैं रंग-भेद नीति के विरुद्ध लडूंगा। उनका कहना था कि वे हमें तिरस्कार की दृष्टि से देखते हैं, इन अपमानों के आगे झुकना घोर पतन है। उन्होंने भारत में फैली छुआ-छूत की कुरीति का भी जमकर विरोध किया। स्वतन्त्रता आंदोलन में सक्रियता के साथ ही साथ उन्होंने सामाजिक कार्यों तथा कुरीतियों के विरुद्ध लड़ाई जारी रखी। गांधी जी का कहना था'यदि कोई निश्चित रूप से यह प्रमाणित कर देता है कि अस्पृश्यता (छुआ-छूत) हिन्दू धर्म का अंग है तो मैं यह धर्म छोड़ दूंगा'। महात्मा गांधी ने साबरमती में आश्रम के लिए नियम बनाए जिसमें सत्य बोलना, अहिंसा का भाव, ब्रह्मचर्य व्रत, भोजन संयम, चोरी नं करना और स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग करना सभी आश्रमवासियों को समान रूप से मानने पड़ते थे। चरखे की शुरुआत भी गांधी जी ने यहीं से की थी।
गांधी जी के आचार विचार से अनेक अंग्रेज अधिकारी भी प्रभावित थे। गांधी जी पर जब मुकदमा चलाया जा रहा था तो अंग्रेज न्यायाधीश ब्रूम्स फील्ड ने कहा था- "मिस्टर गांधी आपने अपना अपराध स्वीकार करके मेरा काम आसान कर दिया है, लेकिन क्या दण्ड उचित होगा, इसका निर्णय ही सभी न्यायाधीशों के लिए कठिन होता है। जवाहरलाल नेहरू ने 'मेरी कहानी' पुस्तक में गांधी जी के लिए लिखा है- 'इस पतले-दुबले आदमी में इस्पात की सी मजबूती है, कुछ चट्टान जैसी दृढ़ता है, जो शारीरिक ताकतों के सामने नहीं झुकती, फिर चाहे ये ताकतें कितनी ही बड़ी क्यों न हों।'
30 जनवरी 1948 ई० को गांधी जी दिल्ली के बिड़ला मंदिर में प्रार्थना के लिए जा रहे थे, उसी समय नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। दिल्ली के राजघाट में उनकी समाधि स्थित है। उनके समाधि स्थल पर श्रद्धा के पुष्प चढ़ाने बड़ी संख्या में लोग आज भी जाते हैं। गाँधी जी के कार्य, व्यवहार व विचार हमें चिरकाल तक नैतिक बल प्रदान करते रहेंगे।
महादेवी वर्मा ने बापू को श्रद्धांजलि देते हुए लिखा है-
चीर कर भू-व्योम की प्राचीर हो तम की शिलाएँ
अग्नि-शर सी ध्वंश की लहरें गला दें पथ दिशाएँ
पग रहे, सीमा रहे, स्वर रागिनी सूने निलय की
शपथ धरती की तुझे औ आन है मानव-हृदय की
यह विराग हुआ, अमर-अनुराग का परिणाम
हे असि-धार पथिक! प्रणाम

आँखों में गोल काँच का चश्मा, कमर में धोती लपेटे, खुला नंगा बदन, एक हाथ में गीता और दूसरे में लाठी लिये दुबली पतली काया। यह हुलिया है भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक महात्मा गांधी का। महात्मा गांधी को लोग प्यार से “बापू” कहते हैं। भारतीय स्वतंत्रता में योगदान के कारण महात्मा गांधी "राष्ट्रपिता' कहे जाते हैं। महात्मा गांधी का जीवन हमारे लिये प्रेरणा स्रोत है। उन्होंने जिस कार्य व्यवहार की दूसरों से अपेक्षा की वह स्वयं पहले उसे करते थे। महात्मा गांधी के सिद्धान्तों को गांधीवाद व उनके राजनीतिक काल को गांधी युग के नाम से जाना जाता है। उनका भारतीय जनमानस पर कितना गहरा प्रभाव था, इसकी झलक कवि सोहन लाल द्विवेदी की कविता में मिलती है
चल पड़े जिधर दो डग-मग में
चल पड़े कोटि पग उसी ओर
पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि
गड़ गए कोटि दृग उसी ओर।

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