व्याकरण किसे कहते हैं? | व्याकरण की परिभाषा | व्याकरण के अंग | vyakaran kise kahate hain

व्याकरण

जिस शास्त्र में शब्दों के शुद्ध रूप और प्रयोग के नियमों का निरूपण होता है उसे व्याकरण कहते हैं। किसी भाषा की रचना को ध्यानपूर्वक देखने से जान पड़ता है कि उसमें जितने शब्दों का उपयोग होता है; वे सभी बहुधा भिन्न-भिन्न प्रकार के विचार प्रकट करते हैं और अपने उपयोग के अनुसार कोई अधिक और कोई कम आवश्यक होते हैं। फिर, एक ही विचार को कई रूपों में प्रकट करने के लिए शब्दों के भी कई रूपांतर हो जाते हैं। भाषा में यह भी देखा जाता है कि कई शब्द दूसरे शब्दों से बनते हैं, और उनमें एक नया ही अर्थ पाया जाता है। वाक्य में शब्दों का उपयोग किसी विशेष क्रम से होता है और उनमें रूप अथवा अर्थ के अनुसार परस्पर संबंध रहता है। इस अवस्था में आवश्यक है कि पूर्णता और स्पष्टतापूर्वक विचार प्रकट करने के लिए शब्दों के रूपों तथा प्रयोगों में स्थिरता और समानता हो। व्याकरण के नियम बहुधा लिखी हुई भाषा के आधार पर निश्चित किए जाते हैं; क्योंकि उनमें शब्दों का प्रयोग बोली हुई भाषा की अपेक्षा अधिक सावधानी से किया जाता है। व्याकरण (वि+आ+करण) शब्द का अर्थ 'भली-भांति समझाना' है। व्याकरण में वे नियम समझाए जाते हैं जो शिष्ट जनों के द्वारा स्वीकृत शब्दों के रूपों और प्रयोगों में दिखाई देते हैं।
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व्याकरण भाषा के आधीन है और भाषा ही के अनुसार बदलता रहता है। व्याकरण का काम यह नहीं कि वह अपनी ओर से नए नियम बनाकर भाषा को बदल दे। वह इतना ही कह सकता है कि अमुक प्रयोग अधिक शुद्ध है, अथवा अधिकता से किया जाता है; पर उसकी सम्मति मानना या न मानना सभ्य लोगों की इच्छा पर निर्भर है। व्याकरण के संबंध में यह बात स्मरण रखने योग्य है कि भाषा को नियमबद्ध करने के लिए व्याकरण नहीं बनाया जाता, वरन् भाषा पहले बोली जाती है, और उसके आधार पर व्याकरण की उत्पत्ति होती है। व्याकरण और छन्दशास्त्र निर्माण करने के बरसों पहले से भाषा बोली जाती है और कविता रची जाती है।

व्याकरण की सीमा

लोग यह समझते हैं कि व्याकरण पढ़कर वे शुद्ध-शुद्ध बोलने और लिखने की रीति सीख लेते हैं। ऐसा समझना पूर्ण रूप से ठीक नहीं। यह धारणा अधिकांश में मृत (अप्रचलित) भाषाओं के संबंध में ठीक कही जा सकती है जिनके अध्ययन में व्याकरण से बहुत कुछ सहायता मिलती है। यह सच है कि शब्दों की बनावट और उनके संबंध की खोज में भाषा के प्रयोग में शुद्धता आ जाती है; पर यह बात गौण है। व्याकरण न पढकर भी लोग शद्ध-शद्ध बोलना और लिखना सीख सकते हैं। कई अच्छे लेखक व्याकरण नहीं जानते अथवा व्याकरण जानकर भी लेख लिखने में उसका विशेष उपयोग नहीं करते। उन्होंने अपनी मातृभाषा का लिखना अभ्यास से सीखा है। शिक्षित लोगों के लड़के बिना व्याकरण जाने शुद्ध भाषा सुनकर ही शुद्ध बोलना सीख लेते हैं; पर अशिक्षित लोगों के लड़के व्याकरण पढ़ लेने पर भी प्रायः अशुद्ध ही बोलते हैं। यदि छोटा लड़का कोई वाक्य शुद्ध नहीं बोल सकता तो उसकी माँ उसे व्याकरण का नियम नहीं समझाती, वरन् शुद्ध वाक्य बता देती है और लड़का वैसा ही बोलने लगता है।
केवल व्याकरण पढ़ने से मनुष्य अच्छा लेखक या वक्ता नहीं हो सकता। विचारों की सत्यता अथवा असत्यता से भी व्याकरण का कोई संबंध नहीं। भाषा में व्याकरण की भूल न होने पर भी विचारों की भूल हो सकती है और रोचकता का अभाव रह सकता है। व्याकरण की सहायता से हम केवल शब्दों का शुद्ध प्रयोग जानकर अपने विचार स्पष्टता से प्रकट कर सकते हैं जिससे किसी भी विचारवान् मनुष्य को उनके समझने में कठिनाई अथवा सन्देह न हो।

व्याकरण से लाभ

यहाँ अब यह प्रश्न हो सकता है कि यदि भाषा व्याकरण के आश्रित नहीं और यदि व्याकरण की सहायता पाकर हमारी भाषा शद्ध, रोचक और प्रामाणिक नहीं हो सकती; तो उसका निर्माण करने और उसे पढ़ने से क्या लाभ? कुछ लोगों का यह भी आक्षेप है कि व्याकरण एक शुष्क और निरुपयोगी विषय है। इन प्रश्नों का उत्तर यह है कि भाषा से व्याकरण का प्रायः वही संबंध है, जो प्राकृतिक विकारों स विज्ञान का है। वैज्ञानिक लोग ध्यानपूर्वक सृष्टिक्रम का निरीक्षण करते हैं और जिन नियमों का प्रभाव वे प्राकृतिक विकारों में देखते हैं, उन्हीं को बहुधा सिद्धांतवत् ग्रहण कर लेते हैं। जिस प्रकार संसार में कोई भी प्राकृतिक घटना नियम-विरुद्ध नहीं होती; उसी प्रकार भाषा भी नियम-विरुद्ध नहीं बोली जाती। व्याकरण इन्हीं नियमों का पता लगाकर सिद्धांत स्थिर करते हैं। व्याकरण में भाषा की रचना, शब्दों की व्युत्पत्ति, और स्पष्टतापूर्वक विचार प्रगट करने के लिए, उनका शुद्ध प्रयोग बताया जाता है, जिनको जानकर हम भाषा के नियम जान सकते हैं; और उन भूलों का कारण समझ सकते हैं, जो कभी-कभी नियमों का ज्ञान न होने के कारण अथवा असावधानी से, बोलने या लिखने में हो जाती है। किसी भाषा का पूर्ण ज्ञान होने के लिए उसका व्याकरण जानना भी आवश्यक है। कभी-कभी तो कठिन अथवा संदिग्ध भाषा का अर्थ केवल व्याकरण की सहायता से ही जाना जा सकता है। इसके सिवा व्याकरण के ज्ञान से विदेशी भाषा सीखना भी बहुधा सहज हो जाता है।
कोई-कोई व्याकरण व्याकरण को शास्त्र मानते हैं और कोई-कोई उसे केवल कला समझते हैं। पर यथार्थ में उसका समावेश दोनों भेदों में होता है। शास्त्र से हमें किसी विषय का ज्ञान विधिपूर्वक होता है और कला से हम उस विषय का उपयोग सीखते हैं। व्याकरण को शास्त्र इसलिए कहते हैं कि उसके द्वारा हम भाषा के उन नियमों को खोज सकते हैं जिन पर शब्दों का शुद्ध प्रयोग अवलम्बित है और वह कला इसलिए है कि हम शुद्ध भाषा बोलने के लिए उन नियमों का पालन करते हैं। विचारों की शुद्धता तर्क शास्त्र के ज्ञान से और भाषा की रोचकता साहित्य-शास्त्र के ज्ञान से आती है।
हिंदी व्याकरण में प्रचलित साहित्यिक हिंदी के रूपांतर और रचना के बहुजनमान्य नियमों का क्रम पूर्ण संग्रह रहता है। इसमें प्रसंग वश प्रांतीय और प्राचीन भाषाओं का भी यत्र-तत्र विचार किया जाता है, पर वह केवल गौण रूप में और तुलना की दृष्टि से।

व्याकरण के अंग

व्याकरण भाषा संबंधी शास्त्र है, और भाषा का मुख्य अंग वाक्य है। वाक्य शब्दों से बनता है, और शब्द प्रायः मूल ध्वनियों से लिखी हुई भाषा में एक मूल ध्वनि के लिए प्रायः एक चिह रहता है जिसे वर्ण कहते हैं।
वर्ण, शब्द और वाक्य के विचार से व्याकरण के मुख्य तीन अंग होते हैं-
  1. वर्ण विचार
  2. शब्द साधन
  3. वाक्य विन्यास
  1. वर्ण विचार व्याकरण का वह विभाग है जिसमें वर्गों के आकार, उच्चारण और उनके मेल से शब्द बनाने के नियम दिए जाते हैं।
  2. शब्द साधन व्याकरण के उस विधान को कहते हैं जिसमें शब्दों के भेद, रूपान्तर और व्युत्पत्ति का वर्णन रहता है।
  3. वाक्य विन्यास व्याकरण के उस विभाग का नाम है जिसमें वाक्यों के अवयवों का परस्पर संबंध बताया जाता है और शब्दों से वाक्य बनाने के नियम दिए जाते हैं।
कोई-कोई लेखक गद्य के समान पद्य को भाषा का एक भेद मानकर व्याकरण में उसके अंगछंद, रस और अलंकार का विवेचन करते हैं। पर ये विषय यथार्थ में साहित्य शास्त्र के अंग हैं जो भाषा को रोचक और प्रभाव शालिनी बनाने के काम आते हैं। व्याकरण से इनका कोई संबंध नहीं है, इसलिए इस पुस्तक में इनका विवेचन नहीं किया गया है। इसी प्रकार कहावतें और मुहाविरे भी जो बहुधा व्याकरण की पुस्तकों में भाषाज्ञान के लिए दिए जाते हैं, व्याकरण के विषय नहीं हैं। केवल कविता की भाषा और काव्य स्वतंत्रता का परोक्ष संबंध व्याकरण से है, अतएव ये विषय प्रस्तुत पुस्तक के परिशिष्ट में दिए जायँगे।

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