व्याकरण किसे कहते हैं? | व्याकरण की परिभाषा, भेद, अंग | vyakaran kise kahate hain

व्याकरण

जिस शास्त्र में शब्दों के शुद्ध रूप और प्रयोग के नियमों का निरूपण होता है उसे व्याकरण कहते हैं। किसी भाषा की रचना को ध्यानपूर्वक देखने से जान पड़ता है कि उसमें जितने शब्दों का उपयोग होता है; वे सभी बहुधा भिन्न-भिन्न प्रकार के विचार प्रकट करते हैं और अपने उपयोग के अनुसार कोई अधिक और कोई कम आवश्यक होते हैं। फिर, एक ही विचार को कई रूपों में प्रकट करने के लिए शब्दों के भी कई रूपांतर हो जाते हैं। भाषा में यह भी देखा जाता है कि कई शब्द दूसरे शब्दों से बनते हैं, और उनमें एक नया ही अर्थ पाया जाता है। वाक्य में शब्दों का उपयोग किसी विशेष क्रम से होता है और उनमें रूप अथवा अर्थ के अनुसार परस्पर संबंध रहता है। इस अवस्था में आवश्यक है कि पूर्णता और स्पष्टतापूर्वक विचार प्रकट करने के लिए शब्दों के रूपों तथा प्रयोगों में स्थिरता और समानता हो। व्याकरण के नियम बहुधा लिखी हुई भाषा के आधार पर निश्चित किए जाते हैं; क्योंकि उनमें शब्दों का प्रयोग बोली हुई भाषा की अपेक्षा अधिक सावधानी से किया जाता है। व्याकरण (वि+आ+करण) शब्द का अर्थ 'भली-भांति समझाना' है। व्याकरण में वे नियम समझाए जाते हैं जो शिष्ट जनों के द्वारा स्वीकृत शब्दों के रूपों और प्रयोगों में दिखाई देते हैं।
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व्याकरण भाषा के आधीन है और भाषा ही के अनुसार बदलता रहता है। व्याकरण का काम यह नहीं कि वह अपनी ओर से नए नियम बनाकर भाषा को बदल दे। वह इतना ही कह सकता है कि अमुक प्रयोग अधिक शुद्ध है, अथवा अधिकता से किया जाता है; पर उसकी सम्मति मानना या न मानना सभ्य लोगों की इच्छा पर निर्भर है। व्याकरण के संबंध में यह बात स्मरण रखने योग्य है कि भाषा को नियमबद्ध करने के लिए व्याकरण नहीं बनाया जाता, वरन् भाषा पहले बोली जाती है, और उसके आधार पर व्याकरण की उत्पत्ति होती है। व्याकरण और छन्दशास्त्र निर्माण करने के बरसों पहले से भाषा बोली जाती है और कविता रची जाती है।

व्याकरण प्रयोजन

किसी भाषा के शुद्ध रूप तथा प्रयोग के नियमों के ज्ञान के लिए उस भाषा के व्याकरण के अध्ययन की अत्यन्त आवश्यकता है। यद्यपि कोई भी भाषा व्याकरण के ज्ञान के बिना भी उस भाषा विशेष के वातावरण में रह कर बड़ी आसानी से तथा कम समय में ही सीखी जा सकती है, तथापि उस भाषा के रूपों और प्रयोगों के नियमों का सूक्ष्म ज्ञान उस भाषा को सीख जाने मात्र से नहीं हो पाता जब तक कि उस भाषा के सैद्धान्तिक या प्रायोगिक व्याकरण का अध्ययन न कर लिया जाए।
काल-क्रम में व्याकरण भाषा का अनुगामी होता है, भाषा व्याकरण का अनुगमन नहीं करती। प्रत्येक मातृभाषा-भाषी अपने दैनिक व्यवहार के लिए तो व्याकरण का ज्ञान प्राप्त किए बिना ही, बिना किसी कठिनाई के अपनी बोली/भाषा का प्रयोग करता रहता है, लेकिन विभिन्न व्यवसायों, साहित्य-विधाओं आदि के सूक्ष्म भावोंविचारों को अधिक प्रभावपूर्ण ढंग से व्यक्त करने के लिए प्रयोग की जानेवाली भाषा के व्याकरण के नियमादि को जानने की आवश्यकता पड़ती रहती है। अन्य दूसरी भाषा के रूप में किसी भाषा को सीखने के लिए तो व्याकरण के नियमादि की जानकारी और अभ्यास अनिवार्य है। कठिन और सन्दिग्ध भाषा-रूप प्रयोग का अर्थ या स्पष्टीकरण व्याकरण की सहायता से सम्भव है।

व्याकरण के भेद

किसी भाषा के शब्दों, पदों, पदबन्धों और वाक्यों की संरचना के नियमादि का बोध करानेवाला व्याकरण 'सैधान्तिक व्याकरण' कहलाता है। उन नियमादि के आधार पर उस भाषा के शब्दों, पदों पदबन्धों और वाक्यों के प्रयोग का बोध करानेवाला व्याकरण "प्रायोगिक व्याकरण' कहलाता है। इसे व्यावहारिक व्याकरण भी कहा जा सकता है।
सामान्यतः व्याकरण ग्रन्थों में नियम, परिभाषाएं, सूत्र तथा कुछ उदाहरण दे कर इन दोनों प्रकार के व्याकरणों को एकाकार-सा कर दिया जाता है । प्रायोगिक व्याकरणों में नियमों पर कम तथा प्रयोग पर अधिक बल दिया जाता है। सैद्धान्तिक व्याकरणों में नियम-निर्धारण पर अधिक तथा प्रयोग पर कम बल दिया जाता है। सन्तुलित व्याकरण में नियमों और प्रयोगों पर लगभग समान बल दिया जाता है।

व्याकरण की सीमा

लोग यह समझते हैं कि व्याकरण पढ़कर वे शुद्ध-शुद्ध बोलने और लिखने की रीति सीख लेते हैं। ऐसा समझना पूर्ण रूप से ठीक नहीं। यह धारणा अधिकांश में मृत (अप्रचलित) भाषाओं के संबंध में ठीक कही जा सकती है जिनके अध्ययन में व्याकरण से बहुत कुछ सहायता मिलती है। यह सच है कि शब्दों की बनावट और उनके संबंध की खोज में भाषा के प्रयोग में शुद्धता आ जाती है; पर यह बात गौण है। व्याकरण न पढकर भी लोग शद्ध-शद्ध बोलना और लिखना सीख सकते हैं। कई अच्छे लेखक व्याकरण नहीं जानते अथवा व्याकरण जानकर भी लेख लिखने में उसका विशेष उपयोग नहीं करते। उन्होंने अपनी मातृभाषा का लिखना अभ्यास से सीखा है। शिक्षित लोगों के लड़के बिना व्याकरण जाने शुद्ध भाषा सुनकर ही शुद्ध बोलना सीख लेते हैं; पर अशिक्षित लोगों के लड़के व्याकरण पढ़ लेने पर भी प्रायः अशुद्ध ही बोलते हैं। यदि छोटा लड़का कोई वाक्य शुद्ध नहीं बोल सकता तो उसकी माँ उसे व्याकरण का नियम नहीं समझाती, वरन् शुद्ध वाक्य बता देती है और लड़का वैसा ही बोलने लगता है।
केवल व्याकरण पढ़ने से मनुष्य अच्छा लेखक या वक्ता नहीं हो सकता। विचारों की सत्यता अथवा असत्यता से भी व्याकरण का कोई संबंध नहीं। भाषा में व्याकरण की भूल न होने पर भी विचारों की भूल हो सकती है और रोचकता का अभाव रह सकता है। व्याकरण की सहायता से हम केवल शब्दों का शुद्ध प्रयोग जानकर अपने विचार स्पष्टता से प्रकट कर सकते हैं जिससे किसी भी विचारवान् मनुष्य को उनके समझने में कठिनाई अथवा सन्देह न हो।
व्याकरण-अध्ययन के पर्याप्त लाभ होने पर भी यह समझना या मानना एक भ्रम या भूल है कि व्याकरण पढ़ कर शुद्ध भाषा-व्यवहार (बोलने, लिखने) की क्षमता एवं दक्षता आ जाएगी। मृत (अप्रचलित) भाषाओं को उन के व्याकरण के आधार पर सीखा जा सकता है, किन्तु जीवित (प्रचलित) भाषा/भाषाओं के व्याकरण पढ़ लेने मात्र से कोई भी व्यक्ति अच्छा लेखक या वक्ता नहीं बन सकता। शिक्षित तथा सभ्य लोगों के सम्पर्क में रह कर बिना व्याकरण पढ़े भी बच्चे शुद्ध तथा प्रभावी भाषा का व्यवहार करना सीख जाते हैं, जब कि अशिक्षित तथा असभ्य लोगों के सम्पर्क में रहनेवाले व्याकरण पढ़े हुए बच्चे अशुद्ध, अप्रभावी तथा अरोचक भाषा का व्यवहार करते हैं। व्याकरण से भाषा के नियम समझे जा सकते हैं, विचारों की शुद्धता, सूक्ष्मता, गहनता और प्रभावकारिता नहीं । विचारों की शुद्धता तर्कशास्त्र के ज्ञान से और भाषा की प्रभावकारिता तथा रोचकता साहित्य-शास्त्र के ज्ञान से कुछ अंशों में प्राप्त की जा सकती है।

व्याकरण से लाभ

यहाँ अब यह प्रश्न हो सकता है कि यदि भाषा व्याकरण के आश्रित नहीं और यदि व्याकरण की सहायता पाकर हमारी भाषा शद्ध, रोचक और प्रामाणिक नहीं हो सकती; तो उसका निर्माण करने और उसे पढ़ने से क्या लाभ? कुछ लोगों का यह भी आक्षेप है कि व्याकरण एक शुष्क और निरुपयोगी विषय है। इन प्रश्नों का उत्तर यह है कि भाषा से व्याकरण का प्रायः वही संबंध है, जो प्राकृतिक विकारों स विज्ञान का है। वैज्ञानिक लोग ध्यानपूर्वक सृष्टिक्रम का निरीक्षण करते हैं और जिन नियमों का प्रभाव वे प्राकृतिक विकारों में देखते हैं, उन्हीं को बहुधा सिद्धांतवत् ग्रहण कर लेते हैं। जिस प्रकार संसार में कोई भी प्राकृतिक घटना नियम-विरुद्ध नहीं होती; उसी प्रकार भाषा भी नियम-विरुद्ध नहीं बोली जाती। व्याकरण इन्हीं नियमों का पता लगाकर सिद्धांत स्थिर करते हैं। व्याकरण में भाषा की रचना, शब्दों की व्युत्पत्ति, और स्पष्टतापूर्वक विचार प्रगट करने के लिए, उनका शुद्ध प्रयोग बताया जाता है, जिनको जानकर हम भाषा के नियम जान सकते हैं; और उन भूलों का कारण समझ सकते हैं, जो कभी-कभी नियमों का ज्ञान न होने के कारण अथवा असावधानी से, बोलने या लिखने में हो जाती है। किसी भाषा का पूर्ण ज्ञान होने के लिए उसका व्याकरण जानना भी आवश्यक है। कभी-कभी तो कठिन अथवा संदिग्ध भाषा का अर्थ केवल व्याकरण की सहायता से ही जाना जा सकता है। इसके सिवा व्याकरण के ज्ञान से विदेशी भाषा सीखना भी बहुधा सहज हो जाता है।
कोई-कोई व्याकरण व्याकरण को शास्त्र मानते हैं और कोई-कोई उसे केवल कला समझते हैं। पर यथार्थ में उसका समावेश दोनों भेदों में होता है। शास्त्र से हमें किसी विषय का ज्ञान विधिपूर्वक होता है और कला से हम उस विषय का उपयोग सीखते हैं। व्याकरण को शास्त्र इसलिए कहते हैं कि उसके द्वारा हम भाषा के उन नियमों को खोज सकते हैं जिन पर शब्दों का शुद्ध प्रयोग अवलम्बित है और वह कला इसलिए है कि हम शुद्ध भाषा बोलने के लिए उन नियमों का पालन करते हैं। विचारों की शुद्धता तर्क शास्त्र के ज्ञान से और भाषा की रोचकता साहित्य-शास्त्र के ज्ञान से आती है।
हिंदी व्याकरण में प्रचलित साहित्यिक हिंदी के रूपांतर और रचना के बहुजनमान्य नियमों का क्रम पूर्ण संग्रह रहता है। इसमें प्रसंग वश प्रांतीय और प्राचीन भाषाओं का भी यत्र-तत्र विचार किया जाता है, पर वह केवल गौण रूप में और तुलना की दृष्टि से।

व्याकरण के अंग

व्याकरण भाषा संबंधी शास्त्र है, और भाषा का मुख्य अंग वाक्य है। वाक्य शब्दों से बनता है, और शब्द प्रायः मूल ध्वनियों से लिखी हुई भाषा में एक मूल ध्वनि के लिए प्रायः एक चिह रहता है जिसे वर्ण कहते हैं।
वर्ण, शब्द और वाक्य के विचार से व्याकरण के मुख्य तीन अंग होते हैं-
  1. वर्ण विचार
  2. शब्द साधन
  3. वाक्य विन्यास
  1. वर्ण विचार व्याकरण का वह विभाग है जिसमें वर्गों के आकार, उच्चारण और उनके मेल से शब्द बनाने के नियम दिए जाते हैं।
  2. शब्द साधन व्याकरण के उस विधान को कहते हैं जिसमें शब्दों के भेद, रूपान्तर और व्युत्पत्ति का वर्णन रहता है।
  3. वाक्य विन्यास व्याकरण के उस विभाग का नाम है जिसमें वाक्यों के अवयवों का परस्पर संबंध बताया जाता है और शब्दों से वाक्य बनाने के नियम दिए जाते हैं।

व्याकरण के भाग

व्याकरण भाषा के रूपों और प्रयोगों का निरूपण भी करता है और उस के अंग-प्रत्यंग का विवेचन तथा विश्लेषण भी। भाषा अपनी अर्थ-रहित तथा अर्थ-सहित व्यवस्था में ध्वनियों (संस्वन, स्वनिम); शब्दों (रूप, शब्द) और वाक्यों (वाक्यांश, उपवाक्य, वाक्य) के ताने-बाने से बुनी हुई सुगठित चादर है, अतः व्याकरण के मुख्य तीन भाग माने जाते हैं
  1. ध्वनि-विचार
  2. शब्द-विचार
  3. वाक्य-विचार
इन्हें हम ध्वनि-व्यवस्था, शब्द-व्यवस्था और वाक्य-व्यवस्था भी कह सकते हैं।

ध्वनि-व्यवस्था
में ध्वनियों, अक्षरों के स्वरूप तथा शब्दों और वाक्यों में उन के उच्चारण के नियम बताए जाते हैं । यद्यपि यह भाग मुख्यतः उच्चारण से सम्बन्धित है तथापि लिखित रूप में प्रस्तुत करने के कारण वर्णों (लिखित ध्वनियों) में ही इसे बताया जा सकता है । वर्णों का उच्चारण कर के प्रस्तुत करना ध्वनि-विचार कहा जाता है। इस प्रकार ध्वनि-व्यवस्था में गौण रूप से लेखन और वर्तनी-व्यवस्था का भी समाहार हो जाता है।

शब्द -व्यवस्था
में शब्द के घटक रूप, रूपिम; शब्द-रचना; शब्द-भेद; शब्दों का रूपान्तर; शब्दों की व्युत्पत्ति; शब्द-अर्थ का विवरण दिया जाता है। यह विवरण मुख्यतः उच्चरित भाषा का ही होता है किन्तु उस का लिखित रूप भी इस विवरण पर कभी-कभी, कहीं-कहीं प्रभाव डालता है।

वाक्य-व्यवस्था
में पदों, पदबन्धों, उपवाक्यों से वाक्य बनने के ढंग, वाक्यों के आकार; वाक्य-भेद तथा वाक्यों के रूपान्तरण आदि के नियमों का उल्लेख होता है। यह उल्लेख मूलतः उच्चरित भाषा का ही होता है किन्तु बोलने के समय के विराम, प्रश्न, आश्चर्य, सामान्य कथन आदि को स्पष्ट करने के लिए विरामादि चिह नों का लिखित प्रयोग भी किया जाता है।
मूलतः भाषा की आरम्भिक इकाई वाक्य ही है किन्तु विवरण प्रस्तुत करने, उसे समझने की सुविधा की दृष्टि से वाक्य के विभिन्न घटकों का विवरण ही पहले प्रस्तुत किया जा रहा है। आशा है पाठक इस तथ्य से सुपरिचित होंगे कि 'व्याकरण' किसी भी भाषा के आरम्भ विकास के समय से बहुत बाद में बनाया जाता है । आज भी संसार में ऐसी अनेक भाषाएँ हैं जिन का व्याकरण नहीं बनाया गया। उन का व्याकरण बनाने, लिखते समय उस भाषा के विभिन्न वाक्यों के आधार पर उस के उपवाक्यों, पदबन्धों, पदों, शब्दों, अक्षरों, स्वनिमों और अर्थ आदि के बारे में नियमों का निर्धारण किया जाता है। हम यहाँ हिन्दी भाषा का कोई नया व्याकरण नहीं बना रहे हैं, वरन् जो व्याकरण प्रचलित हैं, उन्हीं के आधार पर इस व्याकरण को अपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत कर रहे हैं। इस व्याकरण में ध्वनि, अक्षर, शब्द, पद, पदबन्ध, वाक्य के क्रम में हिन्दी के व्याकरण का सैद्धान्तिक तथा प्रायोगिक पक्ष समन्वित रूप से समझाने की चेष्टा की जा रही है।
कोई-कोई लेखक गद्य के समान पद्य को भाषा का एक भेद मानकर व्याकरण में उसके अंगछंद, रस और अलंकार का विवेचन करते हैं। पर ये विषय यथार्थ में साहित्य शास्त्र के अंग हैं जो भाषा को रोचक और प्रभाव शालिनी बनाने के काम आते हैं। व्याकरण से इनका कोई संबंध नहीं है, इसलिए इस पुस्तक में इनका विवेचन नहीं किया गया है। इसी प्रकार कहावतें और मुहाविरे भी जो बहुधा व्याकरण की पुस्तकों में भाषाज्ञान के लिए दिए जाते हैं, व्याकरण के विषय नहीं हैं। केवल कविता की भाषा और काव्य स्वतंत्रता का परोक्ष संबंध व्याकरण से है, अतएव ये विषय प्रस्तुत पुस्तक के परिशिष्ट में दिए जायँगे।

व्याकरण का इतिहास

भाषा-अधिगम की दृष्टि से मातृभाषा-भाषी बच्चों को किसी सैद्धान्तिक व्याकरण की आवश्यकता नहीं होती किन्तु द्वितीय भाषा को सीखने के लिए उस भाषा के सैद्धान्तिक व्याकरण की आवश्यकता का अनुभव किसी-न-किसी रूप में प्रायः सभी प्रौढों को होता है।
भाषा-अधिगम के इस सिद्धान्त के आधार पर हिन्दी व्याकरण परम्परा का इतिहास 18वीं शती ई० के अन्त में कलकत्ता के फोर्ट विलियम कॉलेज के अध्यक्ष डॉ. J. B. Gilchrist के अंग्रेजी में लिखे व्याकरण An Easy and Familiar Introduction to the Popular Language of Hindustan. 1798 से माना जा सकता है। J. Shakespear का A Grammar of the Hindustani Language लन्दन से 1818 में और W. Yates का Introduction to the Hindoostanee Language, 1827 में Cale से प्रकाशित हुआ। ये व्याकरण अंग्रेजी व्याकरणों की शैली के अनुरूप लिखे गए थे जिन में हिन्दी का स्वरूप यथार्थ से पूरी तरह मेल नहीं खाता था। इन्हीं दिनों प्रेमसागर के रचयिता लालू जी लाल ने 'कवायद-हिन्दी' नाम से एक छोटी-सी पुस्तक लिखी। लगभग 25 वर्ष बाद कलकत्ता के पादरी आदम साहब की लिखी व्याकरण की छोटी-सी पुस्तक कई वर्षों तक स्कूलों में प्रचलित रही। प्रथम स्वतन्त्रता-आन्दोलन के कुछ दिनों बाद शिक्षा विभाग ने पं० रामजसन की 'भाषा तत्त्व बोधिनी' प्रकाशित की। ये सभी पुस्तकें अंग्रेजी/संस्कृत, हिन्दी की मिश्रित प्रणाली पर आधारित रहीं। पं० श्रीलाल के 'भाषा चन्द्रोदय', बाबू नवीनचन्द्र राय के 'नवीन चन्द्रोदय' (1869 ई०), पं० हरि गोपाल के 'भाषा तत्त्व दीपिका' पर संस्कृत/मराठी/अंग्रेजी का प्रभाव रहा।
राजा शिवप्रसाद के "हिन्दी व्याकरण' (1875 ई०) में पहली बार हिन्दी, उर्दू के स्वरूप पर अंग्रेजी ढंग से प्रकाश डाला गया। इन्हीं दिनों भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने भी बच्चों के लिए हिन्दी का एक छोटा-सा व्याकरण लिखा।
पादरी एथरिंगटन का 'भाषा भास्कर' परवर्ती व्याकरण-लेखकों के लिए कई दशाब्दियों तक अनुकरण का आधार बना रहा। 20वीं शती के आरम्भ में कई छोटे-बड़े हिन्दी-व्याकरण प्रकाश में आए, जैसे-'हिन्दी व्याकरण' (पं० केशवराम भट्ट 'भाषा प्रभाकर' (ठाकुर रामचरणसिंह), 'हिन्दी व्याकरण' (पं० रामावतार शर्मा). 'भाषा तत्त्व प्रकाश' (पं० विश्वेश्वर दत्त शर्मा), 'प्रवेशिका हिन्दी व्याकरण' (पं० रामदहिन मिश्र), 'विभक्ति विचार' (पं० गोविन्द नारायण मिश्र)। इन्हीं दिनों लंदन से J. Beams fit A Comparative Grammar of Modern Languages of India Vol. I-III (1872-1879), S. H. Kellogg का A Grammar of the Hindi Language, 3rd ed. (1955), J. Platts का A Grammar o the Hindustani or Urdu Language, 4th impr (1904), R. Hoernle का A Comparative Grammar of the Gaudian Language (1880). प्रकाशित हआ।
E. Pincott ने Hindi Manual (1820, London) में, D.C. Phillott ने Notes on the Statical and some other Participles in Hindustani (BSOAS Vol. IV, pt. I, 1976) में, E. Greaves ने Hindi Grammar, 2nd ed. (Allahabad, 1933) में, M. Kempson ने The Syntax and Idioms of Hindustani (London, 1922) में, T. G. Bailey ने Studies in North Indian Languages (London, 1938) में और H. Scholberg ने Concise Grammar of Hindi Language (London, 1950) में हिन्दी भाषा के विभिन्न पहलुओं पर मौलिक चिन्तन का प्रयास किया। इस के बाद भी कुछ अँगरेज लेखकों ने हिन्दी भाषा-व्याकरण के विभिन्न पक्षों को गहराई तथा विस्तार के साथ देखने का प्रयास किया है।
भारत में काशी नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी ने अपनी स्थापना के साथ ही सं० 1950 वि० में ही हिन्दी के एक अच्छे सर्वांगीण व्याकरण के अभाव का अनुभव करते हुए एक वर्ष बाद ही एक स्वर्णपदक प्रदान करने की घोषणा कर दी थी। श्री गंगाप्रसाद, श्री रामकर्ण शर्मा-रचित व्याकरणों में सर्वांगीणता का अभाव पाने पर पं० कामताप्रसाद 'गुरु' को सं० 1974 वि० में एक सर्वांगीण हिन्दी व्याकरण लिखने का भार सौंपा गया। सं० 1977 वि० में पहली बार पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित 'गुरु' का 'हिन्दी व्याकरण' परवर्ती हिन्दी व्याकरण लेखकों के लिए आज तक आधार स्तम्भ का कार्य कर रहा है । यह व्याकरण अंग्रेजी तथा संस्कृत व्याकरण-प्रणाली का मिश्रित रूप होने पर भी विषय-प्रतिपादन की दृष्टि से लगभग पूर्ण है। सभा के आग्रह पर पं० किशोरीदास वाजपेयी ने 'हिन्दी शब्दानुशासन' (वाराणसी, सं० 2014 वि०) में हिन्दी की व्याकरण-प्रणाली के सम्पूर्ण, अखण्ड वर्णन का नया प्रयास किया जिस में अष्टाध्यायी और महाभाष्य का अनुसरण करने की चेष्टा तो की गई है किन्तु यह हिन्दी-व्याकरण को एकीकृत प्रणाली में प्रस्तुत नहीं कर सका है।
भारत को स्वतन्त्रता मिलने के दिनों से ही समकालीन हिन्दी भाषा की विभिन्न संरचनागत व्यवस्थाओं पर विभिन्न विश्वविद्यालयों की डॉक्टरेट उपाधि के लिए कई शोध प्रबन्ध लिखे गए हैं। स्वतन्त्र रूप से भी हिन्दी भाषा-व्याकरण के विभिन्न पहलुओं पर काफी कुछ प्रकाशित हुआ है जिस की संख्या सैकड़ों में है। एकांगी तथा सर्वांगीण दृष्टि से लिखे गए उल्लेखनीय कुछ ग्रन्थों के नाम हैं-डॉ० धीरेन्द्र वर्मा 'हिन्दी भाषा का इतिहास' (प्रयाग 1958) डॉ० उदयनारायण तिवारी 'हिन्दी भाषा का उद्गम और विकास' (प्रयाग, सं० 2012), डॉ० भोलानाथ तिवारी 'हिन्दी भाषा का सरल व्याकरण' (दिल्ली 1958) 'हिन्दी भाषा' (इलाहाबाद, 1966) डॉ० मुरारीलाल उप्रैतिः 'हिन्दी में प्रत्यय विचार' (आगरा, 1964), डॉ० सुधा कालरा 'हिन्दी वाक्य-विन्यास' (इलाहाबाद, 1971), दुनीचन्द 'हिन्दी व्याकरण' (होशियारपुर, 1951), ना० नागप्पा 'अभिनव हिन्दी व्याकरण' (दिल्ली, 1971) डॉ. हरदेव बाहरी 'व्यावहारिक हिन्दी व्याकरण' (इलाहाबाद), 'हिन्दी : उद्भव, विकास और रूप' (इलाहाबाद), रामदेव 'व्याकरण-प्रदीप' (इलाहाबाद), रामचन्द्र वर्मा 'मानक हिन्दी व्याकरण' (वाराणसी, 1970), ओमप्रकाश शर्मा 'हिन्दी व्याकरण नव मूल्यांकन' (दिल्ली, 1977), डॉ० न० वी० राजगोपालन 'हिन्दी का भाषा वैज्ञानिक व्याकरण' (दू० संस्क० 1979, आगरा), डॉ० वी० रा. जगन्नाथन् 'प्रयोग और प्रयोग' (दिल्ली), डॉ० सूरजभानसिंह 'हिन्दी का वाक्यात्मक व्याकरण (दिल्ली), डॉ. ल. ना. शर्मा 'हिन्दी संरचना का अध्ययन-अध्यापन' (तृ० संस्क० 1989, आगरा)।
रूस में 1897 ई० से ही हिन्दी भाषा के विभिन्न पक्षों पर चिन्तन तथा लेखन कार्य होता चला आ रहा है। डॉ० जाल्मन दीमशित्स ने 'हिन्दी व्याकरण' (राद्ग प्रकाशन, मास्को 1983) में रूसी लेखकों के कार्य की विस्तृत सूचना दी है। डॉ० दीमशित्स रचित 'हिन्दी व्याकरण की रूपरेखा' का प्रकाशन 1966 (राजकमल प्रकाशन, दिल्ली) में हुआ था।
आज भी हिन्दी-व्याकरण की छोटी-बड़ी बीसियों पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं जो किसी-न-किसी रूप में पूर्ववर्ती ग्रन्थों के आधार पर लिखी गई हैं। प्रस्तुत पुस्तक के लेखन में भी 4-5 ग्रन्थों को ही सन्दर्भ ग्रन्थ के रूप में आधार बनाया गया है। पं० 'गुरु' का व्याकरण 20वीं शती के अन्तिम दशक की हिन्दी की दृष्टि से पुराना पड़ गया है। पं० वाजपेयी ने व्याकरण की प्रतिपादन-शैली व्याकरण-लेखन शैली से कटी-कटी लगती है। डॉ. दीमशित्स के दीर्धाकार व्याकरण की प्रस्तुति-शैली और प्रतिपाद्य वस्तु-विश्लेषण में पर्याप्त जटिलता है। डॉ० जगन्नाथन् ने व्याकरण के कथ्य को कोश के रूप में प्रस्तुत किया है, अतः उस में क्रमिकता का अभाव होना स्वाभाविक है। डॉ० राजगोपालन् का व्याकरण रूपान्तरण व्याकरण की शैली पर रचित होने के कारण केवल भाषाविज्ञान के शोध छात्रों के लिए ही उपयोगी जा सकता है । अभी भी हिन्दी में प्रचलित अनेकानेक व्याकरणों में या तो कथ्य और विश्लेषण की दृष्टि से भ्रम एवं अपूर्णता है या भाषावैज्ञानिक वाग्जाल की अति जटिलता। विश्लेषण के लिए भाषावैज्ञानिक दृष्टि से संस्कृत और अंगरेजी प्रणाली का समन्वय करते हुए हिन्दी को एक स्वतन्त्र तथा समुन्नत भाषा स्वीकार कर सरल शंली में प्रस्तुत किए जानेवाले मौलिक व्याकरण की अभी भी हिन्दी में कमी खटक रही है।

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