भूकंप क्या है? | भूकंप से लाभ और हानि | bhukamp

भूकम्प (Earthquake)

पृथ्वी का भूपटल अन्तर्जात तथा बहिर्जात बल के कारण सदैव परिवर्तनशील रहता है। भूकम्प आकस्मिक अन्तर्जात बल के कारण होने वाली एक प्रमुख प्राकृतिक आपदा है। भूकम्प भूपृष्ठ के कम्पन को कहते हैं।
भूगोलवेत्ता एफ. जे. मोंकहाऊस के अनुसार भूपटल की शैलों में संचलन व समायोजन की क्रिया द्वारा बाहर की ओर सभी दिशाओं में होने वाले प्रत्यास्थ प्रघाती तरंगों के संचार को भूकम्प कहते हैं।
bhukamp
साधारण शब्दों में भूकम्प को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है, “भूकम्प भूगर्भिक शक्तियों के परिणामस्वरूप धरातल के किसी भाग में उत्पन्न होने वाले आकस्मिक कम्पन को कहते हैं।"

भूकम्प उत्पत्ति के कारण

किसी क्षेत्र की समस्थिति में अस्थायी रूप से उत्पन्न असंतुलन से भूकम्प आता है।
धरातल की संतुलन व्यवस्था में असंतुलन उत्पन्न करने वाले निम्नलिखित कारक हैं जिनसे भूकम्प उत्पन्न होते हैं :-

भ्रंशन (Faulting)
भूगर्भिक शक्तियों द्वारा तनाव व सम्पीड़न के कारण शैलों में चटकन व दरारें पड़ जाती हैं एवं भ्रंशन उत्पन्न होते हैं। इन क्रियाओं के दौरान भूकम्प आते हैं।

ज्वालामुखी क्रिया (Volcanism)
ज्वालामुखी क्रिया भूकम्प के आने का प्रमुख कारण है। ज्वालामुखी उद्गार के समय जब तीव्र व वैगवती गैसें पृथ्वी के अभ्यांतर से बाहरी भाग पर प्रकट होने के लिए धक्का लगाती हैं तो भूपटल पर कम्पन्न पैदा होता है। ऐटना, क्राकाटोवा, विसूवियस आदि ज्वालामुखी विस्फोट के समय विनाशकारी भूकम्प आए थे।

जलीय भार (Water load) 
कुछ विद्वानों के अनुसार बड़े बांधों के निर्माण के फलस्वरूप धरातलीय भाग पर अत्यधिक मात्रा में जल का भंडारन होने से जल भंडार की तली के नीचे स्थित शैलों में हेर-फेर होने लगता है जिससे भूकम्प आते हैं। दिसम्बर 1967 को महाराष्ट्र के कोयना भूकम्प का एक कारण कोयना बांध' को माना जाता है।

भूपटल का संकुचन (Contraction of the Earth)
कुछ विद्वानों ने भूकम्पों की उत्पत्ति का कारण भूपटल में संकुचन को माना है। उनके अनुसार पृथ्वी के तापक्रम में निरन्तर विकिरण की क्रिया के फलस्वरूप हास हो रहा है, जिससे भूपटल ठंडी होने से सिकुड़ रही है। जब यह क्रिया शीघ्र व तीव्रता से होती है तो भूकम्प उत्पन्न होते हैं, डाना, ब्यूमाउण्ट, जेफ्रीज इसी मत के समर्थक हैं।

समस्थिति समायोजन (Isostatic Adjustments)
सामान्यतया भूपटल के विविध भूआकारों यथा पर्वत, पठार, मैदान व महासागरीय गर्त में संतुलन बना रहता है जब कभी अपरदन कारी क्रिया द्वारा निक्षेपित मलबे से समुद्री क्षेत्रों में भार अधिक हो जाता है, तो इस संतुलन व्यवस्था में क्षणिक रूप से असन्तुलन होने से भूकम्प आते हैं। हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में भूकम्प प्रायः इसी कारण से आते हैं।

प्रत्यास्थ पुनश्चलन सिद्धान्त (Elastic Rebound Theory)
प्रो. एफ.एस.रीड के अनुसार शैले रबड़ की भांति एक सीमा तक खिंचती है उसके बाद टूट जाती है एवं टूटे हुए भूखण्ड पुनः खींचकर अपना स्थान ग्रहण करते हैं इससे भूकम्प उत्पन्न होते हैं।

प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonic)
विभिन्न प्लेट किनारों पर भूपलेटें अपसरीत, अभिसरीत या दाएं बाएँ सरकती हैं। इन क्रियाओं के दौरान होने वाली हलचलों के कारण भूकम्प आते हैं।

अन्य कारण
उपर्युक्त कारणों के अलावा गैसों के फैलाव, भूस्खलन, समुद्रतटीय भागों में भृगुओं के टूटने, कन्दराओं की छतों के ढहने आदि के कारण लघु प्रभाव वाले भूकम्प आते हैं।
bhukamp
इसके अतिरिक्त मानवीय कारणों यथा-आणविक विस्फोट, खनन क्षेत्रों में विस्फोट, गहरे छिद्रण आदि से भी स्थानीय प्रभाव वाले भूकम्प उत्पन्न होते हैं।

भूकम्प विज्ञान (Seismology)

भूकम्प विज्ञान में भूकम्पीय लहरों का सिस्मोग्राफ द्वारा अंकन किया जाता है भूगर्भ में जिस स्थान पर भूकम्प की उत्पत्ति होती है उसे भूकम्प मूल (Focus) कहते हैं। भूकम्प मूल के समकोण पर भूकम्प का वह केन्द्र होता है जहां पर भूकम्पीय लहरों का अनुभव सबसे पहले होता है इस स्थान को अधिकेन्द्र (Epicentre) कहते हैं।

भूकम्पीय तरंगे (Earthquke Waves)

भूकम्प मूल पर आघात उत्पन्न होने से शैलों में कम्पन्न होता है जिससे तरंगे उत्पन्न होती है। तरंगों के चलने की विधि व गति के अनुसार भूकम्पीय तरंगों को तीन भागों में विभाजित किया जाता है, पी-तरंगे, एस-तरंगे और एल तरंगे।
  1. पी-तरंगे (P-Waves) - इन्हें प्राथमिक तरंगें भी कहते हैं। भूकम्प मूल से प्रारम्भ होकर ये तरंगे धरातल पर सबसे पहले पहुंचती है। इनकी औसत गति 6 से 13 किमी प्रति सैकण्ड होती है। इन तरंगों के शैल में से होकर गुजरने पर शैल कणों में कम्पन्न तरंगों की गति की दिशा में आगे पीछे होता है ये तरंगे ठोस, द्रव व गैस तीनों माध्यम से गुजरतीं है।
    bhukamp
  2. एस-तरंगे (S-Waves) - इन्हें द्वितीयक तरंगे भी कहते हैं। इनकी औसत गति 4 से 7 किलोमीटर प्रति सैकण्ड होती है। इन तरंगों के शैलों से होकर गुजरने पर शैल कणों में गति तरंग की दिशा में समकोण पर होती है। यह तरंगे केवल ठोस भाग से गुजरती है, तरल भाग में लुप्त हो जाती
  3. एल-तरंगे (L-Waves) - धरातल पर ये तरंगे सबसे लम्बा मार्ग तय करती है एवं केवल धरातल पर अधिकेन्द्र से चारों ओर फैलती हैं। इसलिए इन तरंगों को लम्बी व धरातलीय तरंगे कहते हैं। ये तरंगे तीन किलोमीटर प्रति सैकण्ड की गति से चलती है इन तरंगों से भूकम्प क्षेत्र में सर्वाधिक क्षति होती है। अधिकेन्द्र पर तीनों तरंगों का अभिलेखन एक साथ होता है। अतः इनमें भिन्नता ज्ञात नहीं होती है। किन्तु इनकी गति भिन्न होने के कारण अधिकेन्द्र से दूर इनके पहुंचने का समय अलग अलग होता है। अतः ये तरंगे एक के बाद एक पहुंचती है। जिससे इनमें स्पष्ट विभेद किया जा सकता है। 
  • Pg व Sg लहरें - गुण में ये Pतथा S की भाँति होती हैं, लेकिन इनकी गति कम होती है। ये लहरें धरातल के निकट चलती है।
  • P* व S* लहरें - इनकी गति Pg तथा Sg से अधिक होती हैं।
    bhukamp
ये पृथ्वी की मध्यवर्ती परत में चलती हैं।

भूकम्प के प्रकार

अनेक प्रकार के भूकम्प पृथ्वी के विभिन्न भागों को प्रभावित करते रहते हैं। स्वभाव तथा कारणों के आधार पर भूकम्पों को निम्नलिखित प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है -

1. कृत्रिम भूकम्प (Aartificial Earthquake)
ये भूकम्प मानवीय क्रियाओं द्वारा उत्पन्न होते हैं। ये भूकम्प स्थानीय प्रभाव वाले होते हैं और इनकी तीव्रता बहुत कम होती है। जैसे खान खोदने, परमाणु विस्फोट, भूमिगत आण्विक परीक्षण आदि से उत्पन्न भूपटल कम्पन्न।

2. प्राकृतिक भूकम्प (Natural Earthquake)
ये प्राकृतिक कारणों से उत्पन्न क्रियाशील भूकम्प होते हैं, जो कि निम्नलिखित प्रकार के होते हैं :
  • (अ) ज्वालामुखी भूकम्प (Volcanic Earthquakes) - जो भूकम्प ज्वालामुखी क्रिया या उद्गार के समय उत्पन्न होते हैं, वो भूकम्प ज्वालामुखी भूकम्प कहलाते हैं, यथा विसूवियस, एटना, क्राकाटोवा उद्गार के समय उत्पन्न भूकम्प।
  • (ब) विवर्तनिक भूकम्प (Tectonic Farthquakes) - ये संरचनात्मक भूकम्प हैं, जो भूगर्भ की विवर्तनिक हलचलों यथा तनाव, संपीड़न आदि से उत्पन्न होते हैं। ऐसे भूकम्प अधिक गहराई पर उत्पन्न नहीं होते हैं, यथा- केलिफोर्निया का भूकम्प।
  • (स) संतुलन मूलक भूकम्प (Isostatic Farthquake) - ये भूकम्प भूपटल की संतुलन व्यवस्था में अव्यस्था उत्पन्न होने के फलस्वरूप आते हैं। इस प्रकार के भूकम्प प्रायः नवीन मोड़दार पर्वतीय क्षेत्र हिमालय आदि में आते हैं यथा वर्ष 2015 में हिंदकुश तथा नेपाल का भूकम्प।
  • (द) प्लूटोनिक भूकम्प (Plutonic Earthquake) - धरातल से अत्यधिक गहराई पर उत्पन्न होने वाले भूकम्प प्लूटोनिक भूकम्प या पातालीय भूकम्प कहलाते हैं। ऐसे भूकम्प की उत्पत्ति तथा शक्ति के बारे में बहुत कम ज्ञान हैं।

स्थिति के अनुसार भूकम्प

इस आधार पर भूकम्पों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है।
  • स्थलीय भूकम्प (Land Earthquake) - स्थल पर आने वाले भूकम्प को स्थलीय भूकम्प कहते हैं, मध्य महाद्वीपीय पेटी में आने वाले भूकम्प अधिकांशतः इसी श्रेणी के हैं।
  • सामुद्रिक भूकम्प (Marine Earthquake) - समुद्रों में आने वाले भूकम्पों को सामुद्रीक भूकम्प कहते हैं। इस तरह के अन्तः सागरीय भूकम्पों द्वारा उत्पन्न ऊंची विनाशकारी सागरीय लहरों को जापानी भाषा में 'सुनामी' (Tsunami) कहते हैं। मार्च 2011 को जापान के होंशू द्वीप के निकट आये तीव्र भूकम्प की वजह से उत्पन्न सुनामी से फुकुशिमा नगर पूरी तरह से नष्ट हो गया।

भूकम्पों का विश्व वितरण

विश्व के अधिकांश भूकम्प नवीन मोड़दार पर्वतों, ज्वालामुखी क्षेत्रों, समुद्री तटीय क्षेत्रों में आते हैं, ये वे क्षेत्र हैं जहां भूसंतुलन अव्यवस्थित है या कमजोर भूपटल है। भूकम्प की घटना प्लेटों के किनारों पर होती है। विश्व में भूकम्पों की निम्नलिखित पेटियां है।
bhukamp
परि प्रशांत पेटी (Circum Pacific Belt)
यह विश्व का सबसे विस्तृत भूकम्प क्षेत्र है जहां पर विश्व के 2/3 (लगभग 63 प्रतिशत) भूकम्प आते हैं यह पेटी प्रशांत महासागर के चारों ओर एक वृत्त की परिधि की तरह द्वीपों तथा महाद्वीपों में स्थित है। यहाँ पर भूकम्प के चार प्रमुख दशायें सागर तथा स्थल मिलन क्षेत्र, नवीन वलित पर्वत क्षेत्र, ज्वालामुखी क्षेत्र विनाशकारी प्लेट सीमा अपसरण क्षेत्र मिलती है। इसमें उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका के पश्चिम तटीय क्षेत्र, एशिया के कमचटका प्रायद्वीप से पूर्वी एशिया के द्वीप यथा क्यूराइल, जापान, ताइवान फिलिपिंस आते हैं।

मध्य महाद्वीपीय पेटी (Mid Continental Belt)
इसे भूमध्यसागरीय पेटी भी कहते हैं। यहां पर भ्रंशमूलक तथा संतुलन क्रिया के कारण भूकम्प आते हैं। विश्व के 21 प्रतिशत भूकम्प इसी भाग में आते हैं। इस पेटी में पुर्तगाल से लेकर हिमालय, तिब्बत तथा दक्षिण पूर्वी द्वीप समूह आते हैं। भारत का भूकम्पीय क्षेत्र भी इसी पेटी में आता है। यहां के प्रमुख क्षेत्र - इटली, चीन, एशिया माइनर हिन्दकुश, हिमालय, आल्पस, म्यांमार है।

मध्य अटलांटिक कटक पेटी (Mid Atlantic Ridge Belt)
यह पेटी मध्य अटलांटिक कटक के सहारे स्थित है जो अटलांटिक महासागर में पश्चिमी द्वीप समूह से लेकर दक्षिण में बोवेट द्वीप तक विस्तृत है। इसकी एक शाखा नीलघाटी से होकर अफ्रिका की महान दरार घाटी तक विस्तृत है। यहां पर भूकम्प मुख्य रूप से रूपान्तरण भ्रंश के निर्माण प्लेटों के अपसरण से और ज्वालामुखी क्रिया के कारण आते हैं। भूमध्य रेखा पर सर्वाधिक भूकम्प आते हैं।

भूकम्पों का प्रभाव

भूकम्प एक प्राकृतिक आपदा है जो कम समय में अत्यधिक विनाशकारी प्रभाव भूपटल पर लाती है। भूकम्प की तीव्रता को रिचर (रिएक्टर) पैमाने पर मापा जाता है। इसमें 0 से 9 बिन्दू होते हैं। आगे का प्रत्येक एक बिन्दु पिछले एक बिन्दु से 10 गुना अधिक तीव्रता तथा 31.6 गुना अधिक ऊर्जा पैदा करता है। वहीं भूकम्प की गहनता मरकैली पैमाने मापा जाता है। यह अनुभव मूलक प्रणाली है। इसमें मानव पर पड़ने वाले प्रभाव के संदर्भ में देखा जाता है, जो कि 1 से 12 तक होती है। भूकम्प प्रायः मानव के लिए विनाशकारी प्रभाव लाते हैं। इससे लाभ की अपेक्षा हानिकारक प्रभाव अधिक है। अतः मानव के लिए अभिशाप है।

भूकम्पों से हानियाँ

  1. भूकम्प से अपार जन-धन की हानि होती है। लाखों व्यक्ति मर जाते हैं, मकान, बांध व जलाशय टूट जाते हैं।
  2. भूकम्प से भूपटल की शैल टूट जाती है, नदियों के मार्ग बदल जाते हैं, रेल, सड़क यातायात मार्गों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। अत्यधिक तीव्र भूकम्प से संपूर्ण नगर नष्ट हो जाता है।
  3. भूकम्पों से सागरीय भागों में सुनामि लहरें उठती हैं, जिससे तटीय क्षेत्र, द्वीप जलमग्न हो जाते हैं।
 

भूकम्प से लाभ

  1. भूकम्प से ऊँचे भाग की उत्पत्ति हो जाती है जो कि उस क्षेत्र की जलवायु पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।
  2. समुद्री क्षेत्र में जलमग्न भूमि सतह से ऊपर आने से ऊपजाऊ मैदान निर्मित हो जाता है जो कि कृषि कार्य के लिए उपयोगी है। जब समुद्रतटीय भूमि नीचे फँस जाती है तो बंदरगाह गहरे हो जाते हैं।
  3. भूकम्प से पृथ्वी की आंतरिक संरचना समझने में सहायता मिलती है।

Post a Comment

Post a Comment (0)

Previous Post Next Post