ज्वालामुखी किसे कहते हैं? | ज्वालामुखी क्या है? | परिभाषा, प्रकार, कारण, प्रभाव, | jwalamukhi kya hai

ज्वालामुखी (Volcano)

भू-पृष्ठ का वह छिद्र या दरार अथवा पतला मार्ग जिससे भूपृष्ठ के नीचे की पिघली चट्टान धरातल पर आ जाती है ज्वालामुखी कहलाता है। ज्वालामुखी का उद्गार तथा उससे निकलने वाले पदार्थों के बाहर प्रकट होने की प्रक्रिया को 'ज्वालामुखी के प्रकट होने की क्रिया' कहा जाता है।
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पृथ्वी के भीतरी भागों में चट्टानों के दबाव के चलते या रेडियोधर्मी खनिजों (यूरेनियम, थोरियम) के टुटते रहने के कारण ताप में वृद्धि होती है। इस ताप वृद्धि से भीतर की चट्टानें गर्म होकर फैलने तथा पिघलने लगती हैं। ज्वालामुखी उद्गार के फलस्वरूप निकलने वाले पदार्थ ठोस द्रव एवं गैस तीनों रूपों में होते हैं। गैसें तीव्र विस्फोट के साथ धरातल को तोड़कर बाहर निकलती हैं। इस गैसों में 80-90% भाग जलवाष्प का होता है। अन्य गैसों में कार्बन-डाईऑक्साइड एवं सल्फर डाईऑक्साइड आदि है। तरल पदार्थों में लावा सबसे अधिक महत्वपूर्ण है जो बाहर निकलकर फैल जाता है।

ज्वालामुखी की परिभाषा

प्रायः एक गोलाकार छिद्र अथवा खुला हुआ भाग जिससे होकर पृथ्वी के अत्यंत तप्त भू-गर्भ से गैस, तरल लावा, जल एवं चट्टानों के टुकड़ों से युक्त गर्म पदार्थ पृथ्वी के धरातल पर प्रकट होते हैं, ज्वालामुखी कहलाता है।

ज्वालामुखी क्रिया के दो रूप होते हैं-
  1. अभ्यान्तरिक अथवा धरातल के नीचे
  2. बाह्य अथवा धरातल के ऊपर
आभ्यानरक क्रिया में मैग्मा आदि धरातल के नीचे ही जमकर ठोस रूप धारण कर लेता है तथा इनमें प्रमुख हैं- बैथोलिथ, फैकोलिथ, सिल तथा डाइक। बाह्य क्रिया में गर्म पदार्थ के धरातल पर प्रकट होने की क्रियाएँ सम्मिलित होती हैं। इनमें प्रमुख हैं- ज्वालामुखी, धरातलीय प्रवाह, गर्म जल के स्त्रोत, गीजर, तथा धुंआरे।

ज्वालामुखी उद्गार के कारण

  • भूगर्भिक असन्तुलन (Isostatic Disequilibsium)
  • गैसों की उत्पत्ति (Formation of Gases)
  • भूगर्भ में ताप वृद्धि
  • दाब में कमी
  • प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonic)

भूगर्भिक असन्तुलन (Isostatic Disequilibsium)
भूगर्भिक असन्तुलन के कारण भूगर्भिक क्षेत्रों में संचनात्मक परिवर्तन होते हैं जिनसे ज्वालामुखी क्रिया होती है।

गैसों की उत्पत्ति (Formation of Gases)
भूगर्भिक जल दरारों से पृथ्वी के आन्तरिक भाग में पहुंचकर वाष्प में परिवर्तित हो जाता है जो कि उद्गार में नोदक शक्ति (Propelling Force) का कार्य करती है।

भूगर्भ में ताप वृद्धि
भूगर्भ में स्थित रेडियो सक्रिय पदार्थों के निस्तर विखण्डन से निकलते ताप से शैलें द्रवित होकर कमजोर, एवं आयतन में बढ़ जाती है तत्पश्चात् कमजोर दरारों से लावा के रूप में बाहर निकलती हैं।

दाब में कमी
ऊपरी परतों के दबाव के कारण भूगर्भ की शैले ठोस अवस्था में रहती है और दबाव कम होने पर पिघल जाती है जो ज्वालामुखी क्रिया को प्रोत्साहित करता

प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonic)
भूपृष्ठ की विभिन्न प्लेटों की गतियों के कारण भी ज्वालामुखी क्रिया होती है। प्लेटों के एक दूसरे के सम्मुख दिशा में गति करने से यह क्रिया अधिक होती है।

ज्वालामुखी से निकलने वाले पदार्थ

ज्वालामुखी से निकलने वाले पदार्थों को प्रायः तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है-
  1. गैस व जलवाष्प (Gasses and Water Vapour)
  2. ठोस पदार्थ (SolidMaterial)
  3. तरल पदार्थ (Liquid Material)

गैस व जलवाष्प (Gasses and Water Vapour)
ज्वालामुखी के उद्भेदन के साथ ही जलवाष्प एवं कार्बनडाई ऑक्साईड, सल्फर डाई ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साईड, हाइड्रोक्लोसिक एसिड, अमोनिया क्लोराइड आदि गैसें निकलती है। गीजर (Fumaroles) गर्म पानी के स्त्रोत हैं, जिनसे उष्ण वाष्प एवं जल तीव्रता से निकलता हैं। गैसें, अम्ल, गन्धक आदि पदार्थ तीव्र धार के रूप में बाहर आते हैं। ‘सोल्फटारा (Solftara) गन्धकीय धुंआरा कहलाता है।

ठोस पदार्थ (SolidMaterial)
ज्वालामुखी से सूक्ष्म धूल या राख से लेकर बड़े आकार के शीलाखण्ड निकलते हैं।

तरल पदार्थ (Liquid Material)
धरातल के नीचे समस्त पिघला शैल पदार्थ मैग्मा कहलाता है एवं ज्वालामुखी से जब यह धरातल पर आता है तो उसे लावा के नाम से जाना जाता है।

ज्वालामुखी के उद्भेदन के साथ ही गैसें सर्वप्रथम बड़ी तेजी से भूपटल को तोड़ कर धरातल पर प्रकट होती हैं। इन गैसों में सर्वाधिक प्रतिशत वाष्प का होता है। विखण्डित पदार्थों में ज्वालामुखी की बारीक धूल से लेकर बड़े-बड़े चट्टान के टुकड़े सम्मिलित किये जाते हैं। उद्गार के समय गैसों की तीव्रता के कारण ये टुकड़े आकाश में अधिक ऊंचाई तक उछाल दिये जाते हैं तथा जब गैस का जोर कम हो जाता है। तो ये टुकड़े पुनः धरातल पर वापस आने लगते हैं।
जब उद्गार के साथ द्रव रूप में पिघला हुआ भाग बाहर आता है तो उसे लावा कहते हैं-

सिलिका के आधार पर लावा दो प्रकार का होता है
  • अम्ल प्रधान लावा या एसिड लावा - अत्यधिक गाढ़ा लावा जिसमें सिलिका की मात्रा अधिक होती है (लगभग75%) इसे अम्लीय लावा कहते है। इसका रंग पीला होता है, तथ इसका भार कम होता है।
  • बेसिक लावा - दूसरा लावा पतला होता है जिसमें सिलिका की मात्रा कम होती है। पतला होने के कारण लावा बहकर अधिक दूर तक फैल जाता है, फलस्वरूप पठार का निर्माण होता है। इसका रंग गहरा तथा काला होता है तथा तुलनात्मक रूप से यह भारी होता है। यह कम ताप पर भी पिघल जाता है। हल्का तथा पतला होने के कारण उद्गार के बाद धरातल पर शीघ्रता से फैल जाता है, परंतु सिलिका की कमी के कारण यह शीघ्र जमकर ठोस रूप धारण कर लेता है।

ज्वालामुखी के अंग

ज्वालामुखी उद्गार से मुक्त हुए पदार्थ जब ज्वालामुखी छिद्र के चारों ओर क्रमशः जमा होने लगते हैं तो ज्वालामुखी शंकु का निर्माण होता है। जब जमाव अधिक हो जाता है तो शंकु काफी बड़ा हो जाता है तथा पर्वत का रूप धारण कर लेता है। इस पकार के शंकु को 'ज्वालामुखी पर्वत' कहते हैं। इस पर्वत के ऊपर लगभग बीच में एक छिद्र होता है, जिसे 'ज्वालामुखी नली' (Volcanic pipe) कहते हैं। जब ज्वालामुखी का छिद्र विस्तृत हो जाता है तो उसे 'ज्वालामुखी का मुख' (Volcanic crater) कहते हैं। जब धंसाव या अन्य कारण से ज्वालामुखी का विस्तार अत्यधिक हो जाता है तो उसे 'काल्डेरा' (Caldera) कहते हैं।

ज्वालामुखी के प्रकार (Types of Volcano)

उद्गार के अवधि के आधार पर ज्वालामुखी को तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है:-

1. सक्रिय ज्वालामुखी (Active Volcano)
जिन ज्वालामुखियों से लावा गैस आदि के रूप में विखंडित पदार्थ सदैव निकलता करते है उन्हें जाग्रत या सक्रिय ज्वालामुखी कहा जाता है। वर्तमान समय में विश्व में जाग्रत ज्वालामुखियों की संख्या लगभग 500 है।
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उदाहरण- इटली का एटना, स्ट्राम्बोली हवाईद्वीप का मोनालोआ आदि। स्ट्राम्बोली से सदैव प्रज्जवलित गैसें निकलती रहती है इसलिए इसे भूमध्य सागर का प्रकाश स्तम्भ कहा जाता है। विश्व का सबसे ऊँचा सक्रिय ज्वालामुखी कोटोपैक्सी है (5879 मी०) यह दक्षिण अमेरिका में स्थित है।

2. प्रसुप्त ज्वालामुखी (Dormant Volcano)
ये वो ज्वालामुखी है जो उद्गार के बाद शांत पड़ जाते है परन्तु इनमें कभी भी उद्गार हो सकता है।
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उदाहरण इटली का विसुवियस, इण्डोनेशिया का क्राकातोआ, जापान का फ्युजीयमा आदि।

3. मृत ज्वालामुखी (Extint Volcano)
वैसे ज्वालामुखी जिसमें भूगार्भिक इतिहास के अनुसार बहुत लम्बे समय से उद्गार नहीं हुआ है, मृत ज्वालामुखी कहलाते है।
उदाहरण-म्यानमार का माऊण्ट पोपा, अफ्रीका का किलीमंजारो, ईरान का कोट, सुल्तान देमबन्द अमेरिका का माऊण्ट शास्त्र हुड रेनियर आदि।

उद्गार के आधार पर ज्वालामुखी को दो प्रकार में विभाजित किया जाता है-
  • केन्द्रीय उद्गार वाले ज्वालामुखी
  • दरारी उद्गार वाले ज्वालामुखी

केन्द्रीय उद्गार वाले ज्वालामुखियों पुनः चार वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है
  1. हवाई तुल्य ज्वालामुखी : इस प्रकार के ज्वालामुखी में भीषण विस्फोट नहीं होता है, क्योंकि इसमें विस्फोटक गैस की कमी होती है तथा साथ ही लावा पतला होता है। (उदाहरण - हवाईद्वीप का मौनालोआ)
  2. स्ट्रोम्बोली तुल्य ज्वालामुखी : इस प्रकार के ज्वालामुखी में कभी-कभी भयंकर विस्फोट होता है और उद्गार के समय विखंडित पदार्थ (शिलाखंड आदि) वायु में उछल कर फैलने लगते हैं। लावा पतला ही होता है पर हवाई तुल्य की अपेक्षा गाढ़ा होता है। (उदाहरण इटली के उत्तर में स्थित लिपारी द्वीप में स्ट्राम्बोली ज्वालामुखी)
  3. बलकैनोतुल्य ज्वालामुखी : इस प्रकार के ज्वालामुखी में लावा गाढ़ा होता है और प्रत्येक प्रवाह के बाद मुख बंद हो जाने के कारण ऊपरी पपड़ी को तोड़ने में इसमें दुबारा भीषण विस्फोट होता है। इस प्रकार प्रत्येक लावा प्रवाह के बाद पुनः विस्फोट का होना आवश्यक है। इसमें विस्फोट के पश्चात इतनी ज्यादा मात्रा में धूल और गैसकी मात्रा निकलती है कि आकाश में गोभी के फूल सदृश घने बादल छा जाते है। लिपारी द्वीप में वलकैनो ज्वालामुखी इसका उदाहरण है।
  4. पीली तुल्य ज्वालामुखी : यह ज्वालामुखी सबसे ज्यादा विनाशकारी होता है जिसमें सबसे अधिक विस्फोट होता है और विस्फोट के समान आवाज उत्पन्न होता है। इसमें लावा बहुत अधिक गाढ़ा रहता है। जिससे उद्गार के समय ज्वालामुखी नली में लावा जमकर मार्ग अवरूद्ध कर देता है और अगले उद्गार के समय विस्फोटक गैसें इन्हें तीव्रता से तोड़कर आवाज करती हुई बाहर निकलती है। (उदा०-पश्चिम द्वीपसमूह का पीली पूर्वी दीपसमूह का क्राकातोआ फिलीपींस का हिबक-हिबक)

विश्व के प्रमुख ज्वालामुखी

विश्व के प्रमुख ज्वालामुखी

नाम

श्रेणी या स्थिति

देश

ओजस डेल सालाडो

एण्डीज

अर्जेन्टीना-चिली

गुआल्लाटीरी

एण्डीज

चिली

कोटापैक्सी

एण्डीज

इक्वाडोर

लैसकर

एण्डीज

चिली

टुपुंगटीटो

एण्डीज

चिली

पोपोकैटेपिटल

अल्टीप्लानो डि मेक्सिको

मेक्सिको

सैंगे

एण्डीज

इक्वाडोर

क्ल्यूचेव्सकाया सोप्का

कमचटका प्रायद्वीप

रूस

प्यूरेस

एण्डीज

कोलम्बिया

टाजुमूल्को

….

ग्वाटेमाला

मोनालोआ

हवाई द्वीप

सं. रा. अमेरिका

टकाना

सियरामाद्रे

ग्वाटेमाला

माउण्टकैमरून

(सक्रिय)

कैमरून (अफ्रीका)

माउण्टइरेबस

रॉस

अंटार्कटिका

रिन्दजानी

लाम्बोक

इंडोनशिया

पिको डि टीडे

चेनेरिफ (कनारीद्वीप)

स्पेन

सेमेरू

जावा

इंडोनेशिया

नीरागोंगा

विरुंगा

जायरे

कोरयाक्सकाया

कमचटका प्रायद्वीप

रूस

इराजू

सेंट्रल कार्डिलेरा

कोस्टारिका

स्लामाट

जावा

इंडोनेशिया

माउंट स्पर

अलास्का श्रेणी

सं. रा. अमेरिका

माउण्ट एटनी

सिसिली (सक्रिय)

इटली

लैसेन पीक

कास्केड श्रेणी, कैलिफोर्निया

सं. रा. अमेरिका

माउण्टसेंट हेलेन्स

कास्केट श्रेणी, वाशिंगटन

सं. रा. अमेरिका

टैम्बोरा

सुमात्रा

इंडोनेशिया

द पीक

त्रिस्तां डि कुन्हा

द. एटलांटिक

माउण्ट लेमिंग्टन

…..

पापुआ-न्यूगिनी

माउण्ट पीली

…..

मार्टिनीक

हेक्ला

…..

आइसलैंड

लासाओफैरी

सेंट विंसेण्ट द्वीप

अटलांटिक

विसूवियस

नैपल्स की खाड़ी

इटली

किलाउया

हवाईद्वीप

सं. रा. अमेरिका

फैआल

एजोर्स द्वीप

एंजोस

स्ट्राम्बोली

आइसलैंड

भूमध्यसागर

सेंटोरिनी

थेरा

ग्रीस (यूनान)

वलकैनो

लिपारीद्वीप

भूमध्यसागर

पैरीक्यूटिन

…..

मेक्सिको

सरट्स

आइसलैंड के समीप

आइसलैंड

एनेक क्राकाटाओ

द्वीप

इंडोनेशिया


अन्य ज्वालामुखी एवं उनकी स्थिति

नाम

देश

माउण्टरैंजल

कनाडा

माउण्टरेनियर

यू.एस.ए.

चिम्बोरेजो

इक्वाडोर

माउण्ट ताल

फिलीपींस

माउण्टउनजने

जापान

देमबंद

ईरान

एलबुर्ज

जॉर्जिया

किलिमंजारो

तंजानिया

मेरु

कीनिया

कटमई

अलास्का (यू.एस.ए.)

माउण्ट शस्ता

यू.एस.ए.

फ्यूजीयामा

जापान

माउण्ट पिनाटुबो

फिलीपींस

लाकी

आइसलैंड

कोहसुल्तान

ईरान

माउण्ट अरारात

आर्मीनिया

माउण्ट कीनिया

कीनिया

मेयान

फिलीपींस


ज्वालामुखी का विश्व वितरण

परिप्रशान्त मेखला (Circum Pecific Belt)
विश्व के दो-तिहाई से कुछ अधिक ज्वालामुखी केवल इसी मेखला में पाये जाते हैं। यह मेखला प्रशान्त महासागर के चारों ओर तटवर्ती क्षेत्र में फैली हुई है। यही पेटी अन्टार्कटिका के एरबस पर्वत से प्रारम्भ होकर एण्डीज, रॉकीज पर्वत होती हुई अलास्का से मुड़कर दक्षिण पूर्वी तटीय भागों के सहारे होती हुई मध्य महाद्वीपीय पेटी में मिल जाती है। इन मेखला में जापान का फ्यूजीयामा, फिलीपाइन का माउण्टताल, अमेरिका का शास्ता, रेनियर आदि प्रमुख ज्वालामुखी पर्वत है।

मध्यमहाद्वीपीय पट्टी
इसके ज्वालामुखी अटलांटिक महासागर के कुछ भागों भू-मध्य सागर तथा आल्पस और हिमालय के नवीन पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित है। यह मुख्य रूप से आल्पस हिमालय पर्वतीय श्रृंखला के क्षेत्र में फैली हुई है, भूमध्य सागर के ज्वालामुखी भी इसी मेखला में फैले हैं। वैरन, माउण्ड पोपा, एल्बूर्ज, एटना, विसुवियस, स्ट्रॉम्बली आदि इसी मेखला के ज्वालामुखी हैं।

मध्य अटलाण्टिक कटक मेखला (Mid-Atlantic Ridge Belt)
अटलाण्टिक महासागर में S की आकृति में यह मेखला फैली हुई है। यह मेखला उत्तर में आइलैण्ड से लेकर मध्य में अटलाण्टिक कटक के सहारे दक्षिण में अण्टार्कटिका महाद्वीप तक फैली है। हैकला, कटला, एसेन्शियन, सेन्ट हैलेना इस मेखला के प्रमुख ज्वालामुखी हैं।

पूर्वी अफ्रीका मेखला (East African Belt)
यह मेखला उत्तर में इजराइल में दक्षिण में लाल सागर तथा पूर्वी अफ्रीकी दरार घाटी में होते हुए मैडागास्कर तक विस्तृत है। एल्गन, तिबेस्ती व किलिमन्जारों इस मेखला के अंग हैं।

अन्य ज्वालामुखी (Other Volcanism)
उक्त मेखला के अतिरिक्त अन्य कुछ ज्वालामुखी एकाकी रूप में विस्तृत है इनमें प्रशान्त महासागर के हवाई द्वीप तथा हिन्द महासागर के मॉरिशस, कमोरो, रियुनियन आदि द्वीपों पर स्थित ज्वालामुखी को सम्मिलित किया जाता है।

ज्वालामुखी क्रिया द्वारा निर्मित स्थलाकृति

ज्वालामुखी शंकु
ज्वालामुखी से निकले पदार्थों के ठंडे होकर छिद्र के चारों ओर जमने के कारण कलांतर में ज्वालामुखी शंक का निर्माण होता है। ज्वालामुखी शंकु निम्न प्रकार के हो सकते हैं-
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  • सिण्डर शंकु
  • कम्पोजिट शंकु
  • परपोषित शंकु
  • पैठिक लावा शंकु
  • एसिड लावा शंकु

क्रेटर
ज्वालामुखी के छिद्र के ऊपर स्थित गर्त को क्रेटर या ज्वालामुखी का मुख कहा जाता है। क्रेटर में जब जल भर जाता है तो क्रेटर झील की रचना होती है। जब किसी ज्वालामुखी के क्रेटर का पर्याप्त विस्तार हो जाता है तथा पुनः जब ज्वालामुखी का उद्गार छोटे पैमाने पर होता है तो क्रेटर के अंदर छोटे शंकुओं पर कई क्रेटर बन जाते है। इस प्रकार एक विस्तृत क्रेटर के अन्दर कई छोटे-छोटे क्रेटर पाये जाते है इस प्रकार की आकृति को घोंसलादार क्रेटर कहते हैं।

लावा गुम्बद
लावा गुम्बद प्रायः शील्ड शंकु का रूप होता है, परंतु इसका गुम्बद शंकु से विस्तृत होता है तथा इसका ढाल अधिक होता है। इसका निर्माण ज्वालामुखी छिद्र के चारों ओर लावा के जमने के फलस्वरूप होता है। उत्पत्ति के आधार पर लावा गुम्बद को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है-
  1. डॉट गुम्बद
  2. आन्तरिक गुम्बद
  3. बाह्य गुम्बद।

काल्डेश
क्रेटर का विस्तृत भाग ही काल्डेरा कहलाता है। काल्डेरा के निर्माण के बारे में दो मुख्य संकल्पनाएँ हैं। प्रथम संकल्पना के अनुसार काल्डेरा ज्वालामुखी क्रैटर का विस्तृत रूप होता है, जो चारों तरफ से दीवारों से घिरा होता है। जब कैटर का धंसाव होता है तो उसका पर्याप्त विस्तार हो जाता है। द्वितीय संकल्पना के अनुसार काल्डेरा की रचना क्रेटर के धंसाव से न होकर ज्वालामुखी के विस्फोट का उद्भेदन से होती है।
 
गीजर (Geyser)
गीजर या उष्णोत्स वास्तव में एक प्रकार का गर्म जल स्रोत होता है जिससे समय-समय पर गर्म जल तथा वाष्प निकला करती है। गीजर में गर्म जल का प्लावन ऊपर की ओर एक छिद्र या सुराख से होता है तथा बाद में अपने जमाव द्वारा गीजर छिद्र के चारों ओर एक टीले की रचना करता है। इसके बीच में एक बेसिन होती है जिसका व्यास 69 फीट तथा गहराई 4 फीट होता है। यह बेसिन सिलिका युक्त जल से आवृत्त रहती है। उत्तरी अमेरिका में गीजर येलो स्टोन ओल्ड फेशफुल गीजर) नेशनल पार्क में एशिया में तिब्बत में, यूरोप में आडसलैण्ड तथा न्यूजीलैण्ड में गीजर पाया जाता है।

गीजर दो प्रकार के होते हैं
  1. कुण्ड गीजर : जब गीजर का उद्गार खुले बड़े छिद्र से या कुण्ड से होता है तो उसे 'कुण्ड प्रकार का गीजर' कहते हैं। इस प्रकार के गीजर से अत्यधिक मात्रा में जल तथा वाष्प बाहर निकलती है।
  2. सँकरे गीजर : जब गीजर का उद्गार पतले तथा सँकरे छिद्र अथवा सुराख से होता है तो उसे 'संकरा गीजर' कहते हैं। इस प्रकार की गीजर अपने जमाव द्वारा शंकु बना लेते हैं तथा उनके बीच में संकीर्ण छिद्र से गर्म जल तथा वाष्प बाहर निकलती हैं, परंतु इनकी मात्रा कुण्ड गीजर की अपेक्षा अत्यंत कम होती है।

आभ्यान्तरिक स्थलाकृति
जब ज्वालामुखी के उद्गार के समय गैस एवं वाष्प की तीव्रता में कमी होती है, तो मैगमा धरातल के ऊपर न आकर धरातल के नीचे ही दरारों आदि में प्रविष्ट होकर जमकर ठोस रूप धारण कर लेता है। इस प्रकार धरातल के नीचे बने स्थलरूप को आन्तरिक अथवा आभ्यान्तरिक स्थलरूप कहते हैं। इसमें प्रमुख हैं- बैथोलिथ, लैकोलिथ, लोपोलिथ, फैकोलिथ, डाइक, सिल तथा शीट आदि।

धुंआरा (Fumaroles)
जब ज्वालामुखी उद्गार से लावा, राख विखण्डित पदार्थ आदि निकलना समाप्त हो जाते है तो उससे कभी-कभी रूक कर या लगातार गर्म वाष्प तथा गर्म गैसें निकलती हैं, इन्हें धुंआरा कहा जाता है। धुंआरे ज्वालामुखी की सक्रियता के अंतिम लक्षण माने जाते है। धुंआरे का विस्तृत क्षेत्र अलास्का में कटमई ज्वालामुखी के समीप पाया जाता है। इसे दस हजार धुंए की घाटी कहते है।

सोल्फतारा
धुंआरे के साथ वाष्प तथा गैस के साथ-2 कुछ खनिज पदार्थ भी निस्सृत होते हैं। इनमें प्रमुखता गन्धक की होती है। ऐसे धुंआरे जिनसे अधिक मात्रा में गंधक निकलता है उसे सोल्फतारा कहते है।

ज्वालामुखी क्रिया के प्रभाव

ज्वालामुखी उद्गार के समय बड़ी मात्रा में तप्त लावा, ठोस शैल खंड, विशैली गैसें आदि भूगर्भ से निकल कर भूमि पर तथा वायुमंडल में फैल जाते हैं और मानवकृत संरचनाओं (भवन, रेलमार्ग, सड़क मार्ग, पुल, औद्योगिक ईकाइयाँ आदि), जीव-जंतुओं, पर्यावरण तथा जन-धन की अपार हानि होती है।
ज्वालामुखी उद्गार से होने वाली हानि निम्नलिखित हैं:
  1. ज्वालामुखी से निकल कर लावा ढाल के अनुसार तेजी से आगे बढ़ता है और अपने मार्ग में वाली प्रत्येक वस्तु का विनाश कर देता हैं। बहुत सी मानवकृत संरचनाएँ, कृषि क्षेत्र, चरागाहों आदि लावे के नीचे दब कर नष्ट हो जाते हैं। यहाँ तक कि नदियों एवं झीलों में भी लावा भर जाता है और जंगल में आग लग जाती है।
  2. ज्वालामुखी से निःसृत पदार्थ, जैसे-शैल पिंड, धूल, राख आदि कुछ समय तक वायुमंडल में रहकर उसका प्रदूषण करते हैं और बाद में गुरुत्वाकर्षण के कारण भूमि पर गिरते हैं और फसलों, मानवीय बस्तियों, औद्योगिक इकाइयों आदि को हानि पहुँचाते हैं। कुछ अम्लीय गैसें वायुमंडल में प्रवेश करके अम्ल वृष्टि का कारण बनती हैं और मानव स्वरूप तथा फसलों एवं जलाशयों को क्षति पहुँचाते हैं।
प्रायः ज्वालामुखी उद्गार के कारण भूकंग भी आते हैं जो जन-धन को अत्यधिक हानि पहुँचती है। जब भी ज्वालामुखी उद्गार से समुद्र में सुनामी आती है तो ऊँची-ऊँची लहरें उठती हैं और तटवर्ती इलाकों में काफी जन-धन की हानि करती है।
  1. रचनात्मक प्रभाव – ज्वालामुखी से निकलने वाला लावा बिखराव के बाद अत्यधिक उपजाऊ मृदा को जन्म देता है। भारतीय प्रायद्वीप की काली मिट्टी ज्वालामुखी उद्गार के लाभप्रद पक्षों का एक उदाहरण है। विभिन्न प्रकार के खनिज युक्त भूपट्टियों के विकास में ज्वालामुखी प्रक्रिया की महत्वपूर्ण भूमिका है।
  2. ध्वंसात्मक प्रभाव – ज्वालामुखी उद्गार के साथ बहते हुए लावा एवं अन्य पदार्थों व गैसों से मानव जीवन व वातावरण की हानि के साथ ही सांस्कृतिक भूदृश्य की भी हानि होती है। करोड़ों जीवन ज्वालामुखी उद्गार से नष्ट हो जाते हैं तटीय क्षेत्रों में जलप्लावन से अपार क्षति होती है करोड़ों की संख्या में समुद्री जीव जन्तु मर जाते हैं।

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