आर्य समाज की स्थापना किसने की | arya samaj ki sthapna kisne ki

आर्य समाज की स्थापना

आर्य समाज की स्थापना दयानंद सरस्वती (1824-83) ने की 19वीं शताब्दी के अंत में सबसे प्रसिद्ध सुधार आंदोलन आर्य समाज रहा। यह पश्चिम भारत से प्रारंभ हुआ तथा पंजाब तथा अन्य हिन्दी भाषी क्षेत्रों में बहुत जल्दी फैल गया। इसकी स्थापना दयानंद सरस्वती (1824-83) ने की। सन् 1875 में उन्होंने 'सत्यार्थ प्रकाश' की रचना की तथा इसी वर्ष बम्बई आर्य समाज का गठन किया। लाहौर आर्य समाज 1877 में स्थापित हुआ। परिणामस्वरूप लाहौर आर्य समाज की गतिविधियों का मुख्य केन्द्र बन गया। दयानंद ने हिन्दू धर्म के आडंबरों का विरोध किया था वेदों पर अपनी शिक्षाएँ आधारित की। उनके अनुसार सही विश्लेषण के साथ वेद ही आखिरी सत्य हैं। उन्होंने पुराणों, बहु-ईश्वरवाद, मूर्तिपूजा तथा ब्राहमणों के वर्चस्व का विरोध किया।
उन्होंने जनसाधारण तक पहुंचने के लिए हिन्दी भाषा को अपनाया। उन्होंने बाल विवाह का भी विरोध किया। वे जातिगत भेदभाव के घोर विरोधी थे क्योंकि उनके अनुसार निम्न जाति के लोगों द्वारा ईसाई तथा मुस्लिम धर्मान्तरण की सबसे बड़ी वजह यही थी। दयानंद सरस्वती की मृत्यु (1883) के पश्चात् आर्य समाज बिखर गया। समाज को संघठित रखने तथा इसकी गतिविधियों को संघटित रखने के प्रयास के चलते दयानंद एंग्लो वैदिक ट्रस्ट तथा मैनेजमेंट सोसायटी की स्थापना लाहौर में 1886 में की गई। इसी वर्ष इस समिति ने स्कूल खोला, जिसमें लाला हंसराज प्रधानाध्यापक बने। हालांकि समाज के कुछ सदस्यों ने एंग्लो वैदिक शिक्षा का विरोध किया था। वे थे मुंशी राम (स्वामी श्रद्धानंद), गुरूदत्त, लेखराम तथा अन्य। उन्होंने तर्क दिया कि आर्य समाज की शैक्षणिक गतिविधियाँ संस्कृत आर्य विचारधारा तथा वैदिक शिक्षाओं पर आधारित होनी चाहिए तथा ब्रिटिश भाषा को कम से कम स्थान देना चाहिए। विरोध करने वालों का मानना था कि दयानंद के कथन ही पवित्र हैं तथा सत्यार्थ प्रकाश में दिए उनके संदेशों पर प्रश्न नहीं किया जा सकता। जबकि लाला हंसराज तथा लाजपत राय ने इस बात पर जोर दिया कि दयानंद एक सुधारक थे न कि कोई ऋषि या साधु। डी ए. वी. प्रबंध समिति के नियंत्रण पर भी विवाद उठे। इन मतभेदों के चलते सन् 1893 में आर्य समाज का औपचारिक विभाजन हो गया जहाँ मुंशीराम ने अपने समर्थकों के साथ गुरूकुल आधारित शिक्षा की शुरुआत की। तत्पश्चात् 1893 के बाद आर्य समाज के दो हिस्से हो गए-डी. ए. वी. समूह तथा गुरुकुल समूह।
मुंशी राम तथा लेख राम ने स्वयं को वेद शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया। तथा मिशनरियों के प्रभाव से शिक्षा को बचाने के लिए जालंधर में आर्यकन्या पाठशाला का निर्माण किया। सन् 1902 में मुंशीराम ने हरिद्वार में कांगड़ी में एक गुरूकुल की नींव रखी। यह संस्थान भारत में आर्य समाज की शिक्षा शाखा का केन्द्र बन गया। यहीं पर मुंशीराम ने संन्यास लिया तथा स्वामी श्रद्धानंद बन गए। आर्य समाज की दोनों शाखाएँ अर्थात् डी. ए. वी. तथा गुरूकुल शिक्षा के मुद्दे पर तो अलग-अलग मतों वाली थीं किंतु महत्त्वपूर्ण सामाजिक, राजनीतिक तथा सामाजिक मुद्दों पर एक थीं। पूर्ण रूप से आर्य समाज ने हिन्दुओं के ईसाई तथा इस्लाम में धर्मान्तरण को पूर्ण रूप से गलत
ठहराया तथा धर्मान्तरित हुए हिन्दुओं की पुनः स्वधर्म में वापसी करवाई। इस प्रक्रिया को शुद्धि कहा गया। उन्होंने देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी भाषा के प्रयोग पर बल दिया। सन् 1980 में आर्य समाज ने गौ वध के मुद्दे को उठाया तथा गौरक्षिणी सभा की नींव डाली। आर्य समाज ने छूआछूत के खिलाफ आंदोलन किया तथा जाति भेद की समाप्ति पर जोर दिया।

आर्य समाज के प्रमुख कार्य

आर्य समाज ने उपर्युक्त सिद्धांत के आधार पर हिंदू धर्म और समाज सुधार के लिए निम्नलिखित महत्वपूर्ण कार्य किए-
  • सामाजिक सुधार कार्य
  • धार्मिक सुधार कार्य
  • साहित्यिक और शैक्षणिक सुधार कार्य
  • राजनीतिक जागृति

सामाजिक सुधार कार्य
आर्य समाज ने सामाजिक क्षेत्र में अनेक महत्वपूर्ण कार्य किये थे। आर्य समाज के द्वारा बाल-विवाह, बहु विवाह, सती प्रथा, पर्दा प्रथा, जाति प्रथा, अशिक्षा, छुआ-छूत आदि सामाजिक बुराइयों का विरोध किया गया था। आर्य समाज में स्त्री शिक्षा, अंतर्जातीय-विवाह, विधवा विवाह का समर्थन किया था। स्वामी दयानंद सरस्वती ने वर्ण-व्यवस्था, जाति-पाँति के ऊँच-नीच और भेदभाव को स्वीकार करने से मना कर दिया। उन्होंने सामाजिक एकता पर बल दिया और उन्होंने समाज को एक नई दिशा प्रदान की।

धार्मिक सुधार कार्य
धार्मिक क्षेत्र में आर्य समाज ने मूर्ति पूजा, कर्मकांडों, स्वर्ग और नरक की कल्पना, बलि प्रथा, भाग्य में विश्वास आदि कुरीतियों का विरोध किया। स्वामी दयानंद सरस्वती का कहना था कि वैदिक धर्म ही सभी धर्मों में श्रेष्ठ है। वे कहते थे कि वैदिक धर्म का आधार वेद है, जो ईश्वर की देन है।

साहित्यिक और शैक्षणिक सुधार कार्य
आर्य समाज ने साहित्यिक तथा शैक्षणिक क्षेत्र में भी सराहनीय कार्य किए। स्वामी दयानंद सरस्वती ने हिंदी भाषा में अनेक पुस्तकें लिखी थीं। ऐसा करके उन्होंने हिंदी साहित्य को समृद्ध बनाया और संस्कृत भाषा के महत्व को पुनः स्थापित किया। उनके द्वारा रचित प्रमुख पुस्तकें वेद भाष्य, सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका आदि हैं। स्वामी दयानंद सरस्वती स्त्री शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। उनका मानना था कि स्त्री का शिक्षित होना परिवार तथा समाज के लिए आवश्यक है।

राजनीतिक जागृति
आर्य समाज ने भारत में राजनीतिक जागृति लाने का सराहनीय कार्य किया। स्वामी दयानंद सरस्वती पहले व्यक्ति थे जिन्होंने घोषणा की थी कि विदेशी राज्य से स्वराज्य हर प्रकार से श्रेष्ठ है। आर्य समाज ने देश में स्वाभिमान और देश प्रेम की भावना को जागृत किया।

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