संचार व्यवस्था | communication system in hindi

संचार व्यवस्था

संचार व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण योगदान आर्थिक विकास, सामाजिक संबंधों में वृद्धि तथा सांस्कृतिक एकता को कायम करने में होता है। संचार के साधन परस्पर विरोधी तथा बेमेल लोगों को अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर लाकर परस्पर सौहार्द्र बढ़ाने में सहायक होते हैं।
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किसी प्रत्याशित विनाशकारी दुर्घटना हो जाने पर अथवा आपातकालीन परिस्थितियों में संचार के तात्कालिक साधन आसानी से विपदाओं का समाचार तत्काल पूरे विश्व में प्रसारित कर सकते हैं ताकि राहत व सहायतार्थ साज-समान एवं लोग घटनास्थल पर पहुँच सके।

डाक सेवा

यह सब से अधिक प्रयुक्त संचार का माध्यम रहा है। हमारे देश में डाक सेवा ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। आज भी करीब 99 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रो में डाक सेवाओं का लाभ मिल रहा है।
वर्तमान में करीब 1.55 लाख पोस्ट आफिस पूरे देश में हैं जो देश के कोने-कोने में डाक-सेवाएँ उपलब्ध करा रहे हैं। विश्व के भिन्न भागों में हो रहे आधुनिकीकरण के तारतम्य में भारतीय डाक सेवाओं को भी प्रोन्नत एवं आधुनिक बनाया जा रहा है।

कुछ सुधार इस प्रकार हैं-
  • पिन कोड - डाक वितरण को अधिक द्रुतगामी करने के लिए डाक सूचना अंक प्रणाली (पिन) को प्रयोग में लाया गया है,
  • स्पीड पोस्ट सेवाएँ अपनाई गई हैं जिसमें डाक को शीघ्रता से पहुँचाया जाता है।
  • (क्विक मेल सर्विस (क्यू. एम. एस.) भी स्पीड पोस्ट सेवा जैसी एक अन्य सेवा है। यह डाक को शीघ्रता पूर्वक पहुँचाने में प्रयोग होता है।
इसके अतिरिक्त उपग्रह मनीआर्डर की अदायगी का प्रयोग 1994 में किया गया। इसके अन्तर्गत दूरसंचार प्रणाली द्वारा भारत के दूर-दराज के पिछड़े एवं पर्वतीय भागो में इस प्रकार की सेवाएँ देश के छ: नगरों से आरंभ की गई। अन्तर्राष्ट्रीय द्रुतगामी डाक सेवाएँ वायु मार्ग एवं समुद्री जलमार्गों द्वारा सम्पन्न होती हैं जिससे भारत का विश्व के अन्य देशों के साथ संबंध जुड़ता है।

दूर संचार

सामूहिक तथा व्यक्तिगत स्तर पर संचार का यह अति आधुनिक एवं महत्वपूर्ण माध्यम है। इस माध्यम के प्रकारों में तार सेवा, दूरभाष, टेलेक्स एवं फैक्स इत्यादि है। वर्ष 2004-05 की अवधि तक दूरभाष की संख्या के आधार पर भारत विश्व का दसवाँ सबसे बड़ा देश बन गया है।

तारसेवा (टेलीग्राफ)

यह संचार माध्यम का अपेक्षाकृत सबसे पुराना माध्यम है अतिशीघ्र सूचना भेजने में इसका प्रयोग होता है। इस समय हमारे देश में लगभग चालीस हजार तारघर कार्यरत हैं।

दूरभाष

दूरभाष सेवाओं में बहुत तेजी से विस्तार हुआ है। 31 मार्च 2006 तक भारत में 1420.9 लाख दूरभाष कनेक्शन मौजूद हैं तथा फरवरी 2006 तक 23.4 लाख सार्वजनिक दूरभाष केन्द्र स्थापित हो चुके हैं। देश में सेल्यूलर फोन उपभोक्ताओं की संख्या 629.0 लाख तक पहुंच चुकी है और इसकी माँग का आधार भी 20 लाख प्रतिमाह की दर से बढ़ रहा है। दूरभाष सेवाओं में प्रसार बहुत तीव्रता से हो रहा है। देश में टेलीफोन सेवाओं में एस.टी.डी (सबस्क्राइबर ट्रक डायलिंग) की सुविधा सभी बड़े नगरों एवं छोटे शहरों में उपलब्ध हैं। पूर्णतः स्वचालित आई.एस.डी. (इंटरनेशनल सबस्क्राइबर डायलिंग) सेवाएँ विश्व के सभी देशों के लिए उपलब्ध हैं।

टेलेक्स

इन सेवाओं के अन्तर्गत किसी छपे हुए समाचार को प्रेषित किया जा सकता है। भारत के 200 से अधिक शहरो में टेलेक्स की सेवाएँ उपलब्ध है। उपग्रहों के उपयोग ने संचार सेवाओ में अद्भुत क्राँति ला दी है।

जनसंचार

रेडियो एवं दूरदर्शन इलोक्ट्रॉनिक माध्यम के सशक्त साधन हैं। ये व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाते हैं।

रेडियो

यह जनसंचार का सशक्त माध्यम है। इसके द्वारा सभी प्रकार के समाचार, सूचनाएँ तथा मनोरंजन के विभिन्न कार्यक्रम प्रसारित किए जाते है। इस समय करीब 223 रेडियो प्रसारण केन्द्र कार्यरत हैं जिनसे देश की 99.13 प्रतिशत जनता को सेवाएँ उपलब्ध होती है तथा इन केन्द्रों द्वारा देश के 91.42 प्रतिशत क्षेत्र में प्रसार होता है। आजकल एफ.एम. सेवायें रेडियो प्रसारण को नया आयाम दे रहे हैं।

दूरदर्शन

दूरदर्शन सेवाएँ भारत में 1959 में प्रारंभ की गई। दूरदर्शन सेवाओं में वास्तविक विकास 1980 के बाद हुआ। हाल के वर्षों में दूरदर्शन में कई चैनल उपलब्ध होने से विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम प्रदर्शित होने लगे। दूरदर्शन के तंत्र-जाल में 64 दूरदर्शन केन्द्र (स्टूडियो सहित) तथा 1400 ट्रांसमीटर (DD1 के लिए 1134 ट्रांसमीटर, दूरदर्शन समाचार के लिए 153 ट्रांसमीटर, क्षेत्रीय सेवाओं के लिए 109 ट्रांसमीटर) हैं। देश के चारो महानगरों में एक एक डिजिटल ट्रांसमीटर स्थापित किए गए हैं। दूरदर्शन 1 देश के 79 प्रतिशत क्षेत्र को सेवा प्रदान करता है जिससे 91 प्रतिशत जनता दूरदर्शन सेवाएँ प्राप्त करती है।

सिनेमा

सिनेमा आज भी जनसंचार का लोकप्रिय साधन है। प्रतिदिन लाखों लोगों का मनोरंजन सिनेमा द्वारा होता है।

समाचार प्रकाशन

समाचार पत्र, साप्ताहिक पत्रिकाएँ, जर्नल इत्यादि का प्रकाशन जनसंचार माध्यम के अन्तर्गत आते हैं। स्वतंत्रता पश्चात् देश में प्रकाशन के क्षेत्र में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है। 31 मार्च 2006 के सर्वे के मुताबिक देश में 62,550 समाचार पत्र प्रकाशित होते हैं। इनमें दैनिक, साप्ताहिक, मासिक, पाक्षिक पत्रिकाएँ, बुलेटिन, जर्नल भी शामिल हैं। वैसे अलग अलग रूप में गिना जाय तो 6,800 दैनिक समाचार, 369 त्रि/द्वि साप्ताहिक, 21,453 साप्ताहिक पत्रिकाएँ, 8,227 पाक्षिक, 18,545 मासिक पत्रिकाएँ, 4340 त्रैमासिक, 584 वार्षिक तथा 2,232 अन्य पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं। हिन्दी भाषा में सबसे ज्यादा प्रकाशन (24,017) होता है। इसके बाद अंग्रेजी भाषा में (8,768) है।

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