Bhagwat Geeta in Hindi PDF | संपूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता (PDF)

Bhagwat Geeta in Hindi PDF

दोस्तों आप यहाँ से गीताप्रेस की गोरखपुर द्वारा प्रकाशित Bhagwat Geeta की PDF डाउनलोड कर सकते है- DOWNLOAD आज हम आपको अपने ग्रंथ श्रीमदभगवत गीता ग्रंथ के बारे में कुछ जानकारी देने जा रहे हैं। दोस्तों भगवत गीता मानव जीवन से संबंधित ज्ञान का एक संकलन है जो भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को सुनाई थी।
जब महाभारत के युद्ध में अर्जुन विचलित होकर अपने कर्तव्य से विमुख हो रहे थे। दोस्तों यह गीता का उद्देश्य आज से लगभग 7000 पहले सुनाई गई थी। और इसकी खासियत यह है कि यह आज के दिन में भी उतना ही खास है। जब तक धरती पर मानव का अस्तित्व है तब तक महत्वपूर्ण माना जाएगा।
यह गीता उपदेश कुरुक्षेत्र के रणभूमि में रविवार के दिन सुनाया गया था और उस दिन एकादशी का दिन था। हमारे हिंदू समाज में इसीलिए एकादशी के दिन को बहुत पवित्र और  महत्वपूर्ण माना जाता है। दोस्तों श्रीमद भगवत गीता में कुल 18 अध्याय है और 700 श्लोक है। जिसमें मुख्य रुप से ज्ञान भक्ति और कर्म योग मार्गो की विस्रित व्याख्या की गई है। और इन मार्गो पर चलने से व्यक्ति निश्चित ही परम पद अथवा जीवन में सफलता का अधिकारी बन जाता है इस गीता उपदेश को उस कुरुक्षेत्र में अर्जुन के अलावा धृतराष्ट्र और संजय नहीं सुना था। और आपको यह जानकर बहुत आश्चर्य होगा के अर्जुन से पहले यह गीता उपदेश भगवान सूर्य देव को दिया गया था।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

अर्थात भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं। की है अर्जुन, जब-जब धर्म की हानि होने लगती है और अधर्म और आगे बढ़ने लगता हे तब तब मैं स्वयं की श्रष्टि करता हूं अर्थात जन्म लेता हूं। सज्जनों की रक्षा और दुष्टों का विनाश और धर्म का पुनः स्थापना के लिए मैं विभिन्न युगों अर्थात कालों में अवतरित होता हूं।
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संपूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता की कुछ खास बातें

  • जो हुआ, अच्छे के लिए ही हुआ,
  • जो हो रहा है, वह भी अच्छे के लिए ही हो रहा है।
  • जो होगा वह भी अच्छे के लिए ही होगा।
  1. परिवर्तन ही संसार का नियम है
  2. ध्यान से मन एक दीपक की लौ की तरह अटूट हो जाता है।
  3. आप खाली हाथ आए थे और खाली हाथ ही जाओगे।
  4. मनुष्य विश्वास से बनता है। आप जैसे विश्वास रखते हैं वैसे बन जाते हैं।
  5. संदेह के साथ कभी खुशी नहीं मिल सकती। नाइस लोक में ना परलोक में।
  6. मनुष्य अपने विचारों से ऊंचाइयां भी छू सकता है और खुद को गिरा भी सकता है क्योंकि हर व्यक्ति खुद का मित्र भी होता है और शत्रु भी।
  7. आत्मा ना ही जन्म लेती है ना ही मरती है।

श्रीमद्भगवद्गीता के बारे में 

श्रीमद्भगवद्गीता एक ऐसा विलक्षण ग्रन्थ है, जिसका आजतक न तो कोई पार पा सका, न पार पाता है, न पार पा सकेगा और न पार पा ही सकता है। गहरे उतरकर इसका अध्ययन-मनन करने पर नित्य नये-नये विलक्षण भाव प्रकट होते रहते हैं। गीता में जितना भाव भरा है, उतना बुद्धिमें नहीं आता। जितना बुद्धि में आता है, उतना मन में नहीं आता। जितना मन में आता है, उतना कहने में नहीं आता। जितना कहने में आता है, उतना लिखने में नहीं आता। गीता असीम है, पर उसकी टीका सीमित ही होती है। हमारे अन्तःकरण में गीता के जो भाव आये थे, वे पहले 'साधकसंजीवनी' टीका में लिख दिये थे। परन्तु उसके बाद भी विचार करने पर भगवत्कृपा तथा सन्तकृपा से गीता के नये-नये भाव प्रकट होते गये। उनको अब ‘परिशिष्ट भाव' के रूपमें 'साधक-संजीवनी' टीका में जोड़ा जा रहा है।
'साधक-संजीवनी' टीका लिखते समय हमारी समझ में निर्गुण की मुख्यता रही; क्योंकि हमारी पढ़ाई में निर्गुण की मुख्यता रही और विचार भी उसी का किया। परन्तु निष्पक्ष होकर गहरा विचार करने पर हमें भगवान्के सगुण (समग्र) स्वरूप तथा भक्ति की मुख्यता दिखायी दी। केवल निर्गुण की मुख्यता माननेसे सभी बातों का ठीक समाधान नहीं होता। परन्तु केवल सगुण की मुख्यता मानने से कोई सन्देह बाकी नहीं रहता। समग्रता सगुणमें ही है, निर्गुण में नहीं। भगवान्ने भी सगुणको ही समग्र कहा है-
'असंशयं समग्रं माम्' (गीता ७।१)।
परिशिष्ट लिखने पर भी अभी हमें पूरा सन्तोष नहीं है और हमने गीता पर विचार करना बन्द नहीं किया है। अतः आगे भगवत्कृपा तथा सन्त कृपा से क्या-क्या नये भाव प्रकट होंगे-इसका पता नहीं! परन्तु मानव-जीवन की पूर्णता भक्ति (प्रेम)- की प्राप्ति में ही है- इसमें हमें किं चिन्मात्र भी सन्देह नहीं है।
पहले 'साधक-संजीवनी' टीका में श्लोकों के अर्थ अन्वय पूर्वक न करने से उनमें कहीं-कहीं कमी रह गयी थी। अब श्लोकों का अन्वयपूर्वक अर्थ देकर उस कमी की पूर्ति कर दी गयी है। अन्वयार्थ में कहीं अर्थको लेकर और कहीं वाक्यकी सुन्दरता को लेकर विशेष विचारपूर्वक परिवर्तन किया गया है।
पाठकोंको पहलेकी और बादकी (परिशिष्ट) व्याख्या में कोई अन्तर दीखे तो उनको बादकी व्याख्याका भाव ही ग्रहण करना चाहिये। यह सिद्धान्त है कि पहलेकी अपेक्षा बाद में लिखे हुए विषय का अधिक महत्त्व होता है। इसमें इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि साधकोंका किसी प्रकार से अहित न हो। कारण कि यह टीका मुख्य रूप से साधकों के हित की दृष्टि से लिखी गयी है, विद्वत्ता की दृष्टि से नहीं।
साधकों को चाहिये कि वे अपना कोई आग्रह न रखकर इस टीका को पढ़ें और इस पर गहरा विचार करें तो वास्तविक तत्त्व उनकी समझ में आ जायगा और जो बात टीका में नहीं आयी है, वह भी समझमें आ जायगी!
श्रीमद्भगवदवतार जगद्गुरु श्री श्रीमत्कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास श्रीमद्भगवद्गीता ग्रन्थ के प्रणेता हैं। उनके द्वारा रचित विशाल श्री महाभारत के अन्तर्गत भीष्मपर्व के २५वें अध्याय से आरम्भ कर ४२वें अध्याय तक १८ अध्यायों में गीता ग्रन्थ सम्पूर्ण हुआ है। स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने नित्य पार्षद एवं प्रिय सखा अर्जुन को लक्ष्य कर समग्र मानव जाति के कल्याण के लिए, उन्हें भवसागर से पार कराने तथा अपने चरण कमलों की प्राप्ति कराने के लिए महामूल्यवान सारगर्भित उपदेशों को प्रदान किया है। हम जैसे मायामोहग्रस्त बद्धजीवों को मायामोहसे उत्तीर्ण करानेके लिए उन्होंने अपने नित्य परिकर अर्जुन के द्वारा मायामुग्ध होने का अभिनय कराया तथा उनके द्वारा मोहग्रस्त जीवोंके अधिकारके अनुसार प्रश्न करवाकर स्वयं उन प्रश्नों का उत्तर देते हुए सर्वप्रकार की शंकाओं को दूरकर क्रमानुसार जीवों के मायामोह को दूर करने का उपाय निर्धारित किया।
श्रीमद्भगवद्गीता को गीतोपनिषद् भी कहा जाता है। यह समग्र वैदिक ज्ञान का सार है तथा वैदिक साहित्य की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपनिषद् है। जो लोग साधु-गुरु-वैष्णवों का चरणा श्रय कर श्रद्धा पूर्वक इस ग्रन्थ का अनुशीलन करेंगे, वे अनायास ही इसका यथार्थ तात्पर्य अनुधावन कर सकेंगे तथा वे सहज-सरल रूपमें भवसागर को पारकर श्रीकृष्ण के चरण कमलों में पराभक्ति लाभकर कृष्ण प्रेम के अधिकारी बन सकेंगे-इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है।
आजकल भारत के बड़े-बड़े मनीषियों एवं प्रवीण व्यक्तियों को इस ग्रन्थ का आदर करते हुए देखा जाता है। यहाँ तक कि सर्व सम्प्रदाय के लोग इस ग्रन्थराज के प्रति आदर एवं श्रद्धा प्रदर्शन करते हैं। बहुत-से प्रसिद्ध राजनैतिक व्यक्तियोंने भी इस ग्रन्थ के प्रति श्रद्धा प्रदर्शित की है। यहाँ तक कि विश्व के सभी देशोंके मनीषियों ने इस ग्रन्थ की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।
श्रीमद्भगवद्गीता के ऊपर प्राचीन काल से लेकर अब तक अनेक भाष्य लिखे गए हैं, जिनमें श्री शंकारचार्य, श्री मदानन्दगिरि और श्री मधुसूदन सरस्वती प्रमुख केवलाद्वैतवादियों की टीकाएँ प्रसिद्ध हैं। अधिकांश लोग इन्हीं टीकाओं का पठन-पाठन करते हैं। कुछ-कुछ लोग विशिष्टा द्वैतवादी श्रीरामानुजाचार्य, शुद्धाद्वैतवादी श्रीधरस्वामी एवं शुद्धद्वैताचार्य श्रीमन्मध्वाचार्य द्वारा रचित टीकाओं की आलोचना करके ही गीता पाठ समाप्त कर लिया करते हैं। आधुनिक काल में कोई-कोई लोकमान्य तिलकजी, गान्धीजी और श्रीअरविन्द आदि राजनैतिक पुरुषों द्वारा लिखित गीता की व्याख्या का पाठ करके गीता का अध्ययन समाप्त करते हैं। किन्तु, अचिन्त्यभेदाभेद सिद्धान्तविद् श्री गौड़ीयवेदान्ताचार्य श्री बलदेव विद्याभूषण एवं श्री गौड़ीय वैष्णवाचार्य मुकुटमणि श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर द्वारा रचित टीकाओंका अनुशीलन करनेका सौभाग्य अधिकांश लोगोंके जीवनमें प्राप्त नहीं होता। श्रीगौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के सप्तम गोस्वामी रूपानुगवर श्रील भक्तिविनोद ठाकुरने श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर एवं श्रीबलदेव विद्याभूषणकी टीकाओं के तात्पर्य का अवलम्बनकर बंगला भाषा में श्रीरूपानुग विचारके अनुरूप तात्त्विक एवं शुद्धभक्ति के अनुकूल सुसिद्धान्त पूर्ण भाषाभाष्य के साथ गीता के दो संस्करणों को प्रकाशित किया है। इन दोनों महनीय संस्करणों द्वारा मानव जाति का कितना पारमार्थिक कल्याण साधित हुआ है, वह अवर्णनीय है।
उन्होंने अपने भाष्यके द्वारा भक्तिका सनातनत्व, सार्वभौमत्व और सर्वश्रेष्ठत्व प्रतिपादितकर शुद्धाभक्तिराज्य के पथिकों के लिए परम उपकार किया है।
आजकल नाना प्रकार के अप्रामाणिक व्यक्ति गीता का मनगढन्त भाष्य प्रकाशित कर रहे हैं, जिसमें सिद्धान्तहीन, स्वकपोलकल्पित चित्-जड़समन्वयवादरूप काल्पनिक मतवाद को धृष्टतापूर्वक प्रस्तुत किया गया है। इन भाष्यों में सनातन शुद्धाभक्ति को तुच्छ दिखलाने की चेष्टा की गई है। ऐसे अधिकांश भाष्यों में या तो कर्म अथवा मायावाद रूप निर्विशेष ज्ञान को ही गीता का एकमात्र तात्पर्य बतलाया गया है। जिसे पढ़-सुनकर साधारण कोमल श्रद्धालुजन पथभ्रष्ट हो रहे हैं।
निगम शास्त्र अत्यन्त विपल एवं विशाल हैं। उसके किसी अंश में धर्म, किसी अंश में कर्म, किसी अंश में सांख्य ज्ञान और किसी अंश में भगवद्भक्ति का उपदेश पाया जाता है। इन व्यवस्थाओं में परस्पर क्या सम्बन्ध है और किस दशा में एक व्यवस्था को छोड़कर दूसरी व्यवस्था को ग्रहण करना कर्त्तव्य है-वैसे क्रमाधिकार का वर्णन भी उन्हीं शास्त्रों में दृष्टिगोचर होता है। किन्तु, कलिकाल में उत्पन्न अल्प-आयुविशिष्ट तथा संकीर्ण मेधायुक्त जीवों के लिए उक्त विपुल शास्त्रों का पूर्ण रूप से अध्ययन और विचारपूर्वक अपने अधिकारका निर्णय करना बड़ा ही कठिन है। इसलिए इन व्यवस्थाओं की एक संक्षिप्त एवं सरल वैज्ञानिक मीमांसा अत्यन्त आवश्यक है। द्वापर के अन्त में अधिकांश लोग वेद-शास्त्रों का यथार्थ तात्पर्य समझाने में असमर्थ हो गए, अतः किसी ने कर्म, किसी ने भोग, किसी ने सांख्यज्ञान, किसी ने तर्क और किसी ने अभेद ब्रह्मवाद को शास्त्रों का एकमात्र तात्पर्य बताकर अपनी अपनी डफली बजाना और अपना अपना राग आलापना आरम्भ कर दिया। इस प्रकार भारत में ऐसे असम्पूर्ण ज्ञान से उत्पन्न मत समूह वैसी ही पीड़ा उत्पन्न करने लगे, जिस प्रकार अचर्वित खाद्य पदार्थ पेटमें पहुँचकर नाना प्रकार के क्लेश उत्पन्न करने लगते हैं। वैसे समय में परम कारुणिक भगवान श्रीकृष्णचन्द्र ने अपने प्रिय पार्षद एवं सखा अर्जुन को लक्ष्यकर जगत्के जीवों के कल्याण के लिए सारे वेदों के सारार्थ मीमांसा स्वरूप श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश दिया। इसलिए गीताशास्त्र समस्त उपनिषदों के शिरोभूषण के रूप में विद्यमान है। इसमें भिन्न-भिन्न व्यवस्थाओं में परस्पर सम्बन्ध बतलाकर पवित्र हरिभक्ति को ही जीवों के लिए चरम लक्ष्य प्रतिपादित किया गया है। वस्तुतः कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग अलग-अलग व्यवस्थाएँ नहीं हैं; एक ही योग की पहली, दूसरी, तीसरी व्यवस्थामात्र हैं। उस सम्पूर्ण योग की पहली अवस्था का नाम कर्मयोग, दूसरी अवस्था का नाम ज्ञानयोग एवं तीसरी अवस्था का नाम भक्तियोग है।
उपनिषत्समूह, ब्रह्मसूत्र और श्रीमद्भगवद्गीता- ये सर्वप्रकार से शुद्ध भक्तिशास्त्र हैं, इन शास्त्रों में आवश्यकतानुसार कर्म, ज्ञान, मुक्ति और ब्रह्म प्राप्ति का विशदरूप में वर्णन परिलक्षित होता है; किन्तु तुलनामूलक रूप में विचारकर चरम अवस्थामें शुद्धा भक्तिका ही प्रतिपादन किया गया है।
श्रीगीताशास्त्र के पाठकों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है, स्थूलदर्शी और सूक्ष्मदर्शी। स्थूलदर्शी पाठक केवल वाक्यों के बाह्य अर्थ को ही ग्रहण कर सिद्धान्त किया करते हैं। परन्तु सूक्ष्मदर्शी पाठकगण शास्त्र के बाह्यार्थ से सन्तुष्ट न होकर गम्भीर तात्त्विक अर्थ का अनुसन्धान करते हैं। स्थूलदर्शी पाठकगण आदि से अन्त तक गीता का पाठकर यह सिद्धान्त ग्रहण करते हैं कि कर्म ही गीता का प्रतिपाद्य विषय है, क्योंकि अर्जुन ने सम्पूर्ण गीता सुनकर अन्त में युद्ध करना ही श्रेयस्कर समझा। सूक्ष्मदर्शी पाठकगण वैसे स्थूल सिद्धान्त से सन्तुष्ट नहीं होते। वे या तो ब्रह्मज्ञान को अथवा पराभक्ति को ही गीताका तात्पर्य स्थिर करते हैं। उनका कहना यह है कि अर्जुन का युद्ध अंगीकार करना केवल अधिकार-निष्ठा का उदाहरण मात्र है, वह गीता का चरम तात्पर्य नहीं है। मनुष्य अपने स्वभाव के अनुसार कर्माधिकार प्राप्त करता है और कर्माधिकार का आश्रयकर जीवनयात्रा का निर्वाह करते-करते तत्त्वज्ञान प्राप्त करता है। कर्म का आश्रय किए बिना जीवन का निर्वाह होना कठिन है। जीवन यात्रा का निर्वाह नहीं होने से तत्त्वदर्शन भी सुलभ नहीं होता है। इसलिए प्रारम्भिक अवस्था में वर्णाश्रमोचित सत्कर्म का आश्रय ग्रहण करना आवश्यक है। किन्तु, यहाँ यह जान लेना आवश्यक है कि सत्कर्म के अन्तर्गत भी भगवदर्पित निष्काम कर्म ही गीता को मान्य है। उसके द्वारा क्रमशः चित्तशुद्धि और तत्त्वज्ञान होता है तथा अन्तमें भगवद्भक्ति द्वारा ही भगवत्प्राप्ति होती है।
श्रीमद्भगवद्गीता के तात्पर्य अर्थात् उसके चरम प्रतिपाद्य विषय को समझने के लिए इसके वक्ता के द्वारा दिए गए निर्देशों को ग्रहण करना चाहिए। गीता के वक्ता स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण हैं। गीता के प्रत्येक पृष्ठ में उनका उल्लेख भगवान्के रूप में हुआ है। श्रीकृष्ण ने स्वयं अहैतु की कृपावश बहुत-से स्थलों में अपने को परात्पर तत्त्व भगवान् बतलाया है-
प्रसंगवशतः यहाँ यह भी जान लेना आवश्यक है कि अन्यान्य भगवदवतारों ने अपनी भगवत्ता का स्पष्ट परिचय स्वयं नहीं दिया है, किन्तु भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में स्वयं ही सुस्पष्ट रूप से अपनी भगवत्ता का परिचय देकर अपनी शरणागति, और भक्ति को ही जीवों के लिए सर्वोत्तम साधन निर्दिष्ट किया है-
  • (१) 'मामेव ये प्रपद्यन्ते' (गीता ७/१४)
  • (२) 'तेऽपि मामेव कौन्तेय' (गीता ९/२३)
  • (३) 'मामेकं शरणं व्रज' (गीता १८/६६)
यहाँ 'मामेव', 'मामेव' और 'मामेक-इन तीनों पदों द्वारा त्रिसत्य के रूप में श्रीकृष्णने अपनी भगवत्ताका प्रतिपादनकर, कृष्ण-भक्ति को ही सर्वश्रेष्ठ साधन और साध्य निर्धारित किया है।
केवल श्रीकृष्ण ने ही नहीं, बल्कि देवर्षि नारद, असित, देवल, व्यास प्रमुख महामुनिगण एवं सिद्धजन भी इस सत्यकी पुष्टि करते हैं। अर्जुन भी प्रारम्भ से ही इस परम तत्त्व को स्वीकार करते हैं।

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