भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्र | Bhartiya Arthvyavastha Ke Kshetra

भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्र

हम भिन्न-भिन्न प्रकार की वस्तुओं एवं सेवाओं का उपभोग करते हैं। ये दो प्रकार की हो सकती हैं -
(i) खाद्य मदें
(ii) गैर-खाद्य मदें।
भोजन बनाने के लिये हमें खाद्यान्नों, फल तथा सब्जियों एवं खाद्य तेलों की आवश्यकता पड़ती है। इन सभी वस्तुओं का ग्रामीण क्षेत्रों में कृषकों द्वारा उत्पादन किया जाता है। गैर-खाद्य मदें जिन्हें हम प्रयोग करते हैं, अनगिनत हैं, जैसे कपड़े, जूते, फर्नीचर, बर्तन, मोटरगाड़ी, पैन, कागज, पुस्तक आदि। इनका उत्पादन कस्बों तथा शहरों में उद्योगों द्वारा किया जाता है। क्योंकि खाद्यान्नों का उत्पादन तथा गैर खाद्य सामग्री का उत्पादन भिन्न-भिन्न वातावरण में होता है, हम इन्हें अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में वर्गीकृत करते हैं।
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लोगों के द्वारा अपनाये जाने वाले व्यवसायों के प्रकार
अपनी जीविका अर्जित करने के लिये लोग अपनी शिक्षा. कौशल. परिवार की परम्परा आदि के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार की गतिविधियों में संलग्न होते हैं।
सामान्यतया हम इन्हें अर्थव्यवस्था के तीन विभिन्न क्षेत्रों में वर्गीकृत करते हैं:-
  • (i) प्राथमिक क्षेत्र
  • (ii) द्वितीयक क्षेत्र
  • (iii) तृतीयक क्षेत्र

प्राथमिक क्षेत्र

भारत के ग्रामीण क्षेत्रों के बारे में विचार करें। वे लोग जो गांवों में रहते हैं, अपनी जीविका कैसे अर्जित करते हैं? उनमें से अधिकतर लोग फसल उगाने के लिए खेतों में कार्य करते हैं जिसे हम कृषिकर्म कहते हैं। इन लोगों को हम कृषक तथा कृषि श्रमिक तथा व्यवसाय को कृषि कहते हैं। विभिन्न प्रकार की फसलें होती हैं जिन्हें उगाया जाता है जैसे खाद्यान्न तथा गैर-खाद्य मदें। खाद्यान्नों में आनाज, दाले, फल तथा सब्जी आदि तथा गैर-खाद्य मदों में कपास, जूट आदि को सम्मिलित किया जाता है।
इसी प्रकार, लोग अपनी जीविका वान्यिकी से भी अर्जित करते हैं जिससे अभिप्राय वन-उत्पादों को एकत्र कर बाजार में बेचने से है। इस व्यवसाय को वान्यिकी कहा जाता है। वन उत्पादों में इमारती लकड़ी, ईंधन की लकड़ी, जड़ी-बूटी वाली औषधि आदि को सम्मिलित किया जाता है। बहुत से लोग खनिज निकालने के लिये खानों के क्षेत्र में कार्य करते हैं। अनेक लोग ऐसे भी है जो पशुधन में वृद्धि करने में संलग्न हैं जैसे मुर्गीपालन तथा दुग्धशाला आदि। अन्त में, मत्स्यपालन एक अन्य व्यवसाय है जिसमें लोग पोखरों, नदियों अथवा समुद्र में से मछलियाँ पकड़कर बाजार में बेचते हैं। ये सभी गतिविधियाँ अर्थात कृषि, वान्यिकी, खनन, पशुपालन तथा मत्स्यपालन एक दूसरे की पूरक हैं। इन्हें हम प्राथमिक उत्पादन में वर्गीकृत करते हैं तथा उन्हें प्राथमिक क्षेत्र में रखते हैं।
अतः हमारी अर्थव्यवस्था के प्राथमिक क्षेत्र में निम्नलिखित को सम्मिलित किया जाता है:-
  • कृषि तथा संबद्ध क्रियाकलाप
  • मत्स्यपालन
  • वान्यिकी
  • खनन तथा उत्खनन
भारत में गांव प्राचीन काल से विद्यमान रहे हैं। कृषि तथा संवद्ध क्रियाकलाप लोगों का परम्परागत व्यवसाय है। यह उन्हें प्राकृतिक रूप से ही प्राप्त हो जाता है क्योंकि भोजन जो हमें कृषि से प्राप्त होता है, जीवन की एक मूलभूत आवश्यकता है। परन्तु समय के साथ-साथ मानव आबादी गांवों के बाहर भी फैलने लगी है। विकास की प्रक्रिया में कस्बे तथा शहर अस्तित्व में आये हैं। इन्हें शहरी क्षेत्र कहते हैं। जयपुर, अहमदाबाद, पुणे, भुवनेश्वर आदि भारत में शहरों के उदाहरण हैं। देहली, चैन्नई, मुम्बई तथा कोलकत्ता को मेट्रो शहर कहा जाता है क्योंकि ये और भी बड़े शहर हैं। ये शहरी क्षेत्र गैर-कृषि व्यवसायों के लिये जाने जाते हैं।
गैर-कृषि गतिविधियों को हम दो क्षेत्रों में विभाजित कर सकते हैं।
  • (i) द्वितीयक क्षेत्र
  • (ii) तृतीयक क्षेत्र

द्वितीयक क्षेत्र

इस क्षेत्र में निम्नलिखित उत्पादन गतिविधियों को सम्मिलित किया जाता है।
(क) विनिर्माण
(ख) निर्माण
(ग) गैस, जल तथा बिजली आपूर्ति

विनिर्माण
विनिर्माण करने वाली इकाइयां जिन्हें इस फैक्ट्री तथा उद्योग कहते हैं, इनमें कच्चे माल का प्रयोग कर वस्तुओं का उत्पादन करने वाली इकाईयों को सम्मिलित किया जाता है। आकार तथा सम्बद्ध व्यय के आधार पर ये लघु उद्योग तथा बड़े पैमाने के उद्योग होते हैं। लघु उद्योग के उदाहरण हैं: जूते बनाने वाली फैक्ट्री, कपड़े का उत्पादन करने वाली इकाईयां, प्रिंटिंग, शीशा बनाना, फर्नीचर आदि। बड़े पैमाने के उद्योग में इस्पात, मोटर गाड़ियां, एल्यूमिनियम आदि के उद्योगों को सम्मिलित किया जाता है। विनिर्माण के व्यवसाय में कुशल श्रमिक कार्य करते हैं।

निर्माण
इस गतिविधि में आवासीय तथा गैर-आवासीय इमारत, सड़क, पार्क, पुल, बांध, हवाई आहे, बस आहे आदि को सम्मिलित किया जाता है। शहरी क्षेत्रों में होने वाली यह एक नियमित गतिविधि है। द्वितीयक क्षेत्र में लोगों द्वारा अपनाएं जाने वाले व्यवसाय हैं: गैस, जल तथा बिजली आपूर्ति। ये आवश्यक सेवाएं हैं।

तृतीयक क्षेत्र

लोग तृतीयक क्षेत्र की गतिविधियों में भी संलग्न होते हैं जो प्रकृति में भिन्न होती हैं। इस क्षेत्र को सेवा क्षेत्र भी कहते हैं जिसमें निम्नलिखित सेवाएं प्रदान की जाती हैं।
  • व्यापार, होटल तथा जलपान गृह
  • परिवहन, संग्रहण तथा संचार
  • वित्तीय सेवाएं जैसे बैंकिंग, बीमा आदि
  • स्थावर सम्पदा तथा व्यवसायिक सेवाएं
  • लोक प्रशासन
  • अन्य सेवाएं
भारत में कार्यशील जनसंख्या का व्यवसायिक वितरण

व्यवसाय

प्रतिशत

(i) कृषि

50.19

(ii) खनन तथा उत्खनन

0.61

(iii) विनिर्माण

13.33

(iv) बिजली जल आपूर्ति आदि

0.33

(v) निर्माण

6.10

(vi) व्यापार, होटल आदि

13.18

(vii) परिवहन, संग्रहण आदि

5.06

(viii) वित्तीय, व्यवसायिक सेवाएं आदि

2.22

(ix) अन्य सेवाएं

8.97


प्राथमिक क्षेत्र की भूमिका एवं महत्व

प्राथमिक क्षेत्र में कृषि सबसे प्रधान व्यवसाय है तथा इसका राष्ट्रीय आय में अंश भी सबसे बड़ा है। इसलिए हम भारतीय अर्थव्यवस्था में राष्ट्रीय आय में अंश, रोजगार के अवसर, भोजन तथा कच्चे माल के संदर्भ में कृषि क्षेत्र की भूमिका तथा इसके महत्व पर अपना ध्यान केन्द्रित करेंगे। आइये, अब इन्हें एक-एक करके लें।

1. राष्ट्रीय आय में अंश
स्वतंत्रता के समय राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान 50 प्रतिशत से अधिक था। हाल के वर्षों में इसके योगदान में कमी आई है। वर्ष 2009-10 में राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान लगभग 15 प्रतिशत था।

2. जनसंख्या के सबसे बड़े भाग को रोजगार प्रदान करती है
कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है। ये भारत की जनसंख्या के सबसे बड़े भाग का व्यवसाय है। स्वतंत्रता के समय हमारी जनसंख्या का लगभग 70 प्रतिशत अपनी जीविका अर्जन करने के लिये कृषि तथा संबद्ध क्रिया कलापों पर निर्भर था। विनिर्माण तथा सेवा क्षेत्र के विकास होने से कृषि पर निर्भरता कुछ कम हुई है। वर्ष 2009-10 में भारत की लगभग 50 प्रतिशत जनसंख्या कृषि में कार्यरत थी।

3. लाखों को भोजन प्रदान करती है
भोजन, जीवन की सबसे मूलभूत आवश्यकता है। कृषि के बिना भोजन का उत्पादन तथा उसकी आपूर्ति हो ही नहीं सकते। भारत में भोजन की आवश्यकता केवल अधिक ही नहीं बल्कि जनसंख्या में वृद्धि होने के कारण प्रत्येक वर्ष उसमें वृद्धि भी हो रही है। भारत में वर्ष 2008-09 में खाद्यान्नों का कुल उत्पादन लगभग 2340 लाख टन था। इसमें गेहूँ, चावल तथा दाले सम्मिलित हैं।

4. उद्योगों को कच्चा माल प्रदान करती है
चीनी, जूट, कपास, कपड़ा, वनस्पति आदि उद्योगों को कच्चा माल कृषि से प्राप्त होता है। क्या आप जानते हैं कि कागज कैसे बनता है? इसके लिये एक विशेष प्रकार की घास, बांस आदि की आवश्यकता होती है। कृषि के बिना कागज का उत्पादन संभव नहीं है। भोजन सामग्री बनाने वाले उद्योगों पर दृष्टि डालिये जो विभिन्न प्रकार के डब्बा बंद भोजन की मदों जैसे अचार, फलों के रस, फलों के मुरब्बे, बिस्कुट, ब्रैड, आधे पके हुए भोजन आदि की आपूर्ति करते हैं। ये खाद्य प्रक्रमण से संबंधित उद्योग केवल कृषि के कारण ही चल रहे हैं।

द्वितीयक क्षेत्र की भूमिका तथा महत्व

विनिर्माण उद्योग द्वितीयक क्षेत्र के एक बड़े भाग का निर्माण करते हैं। इन उद्योगों को लघु उद्योगों तथा बड़े पैमाने के उद्योगों में वर्गीकृत किया जाता है।
लघु उद्योग क्या होते हैं? कोई भी उद्योग जिसमें संयंत्र तथा मशीनरी पर कम से कम 25 लाख रुपये का व्यय होता है, लघु उद्योग कहलाता है। ये उद्योग अधिकतर श्रम प्रधान प्रौद्योगिकी का प्रयोग करते हैं अर्थात इन उद्योगों में उत्पादन प्रक्रिया में अधिक श्रम शक्ति का उपयोग किया जाता है। दूसरी ओर, बड़े पैमाने के उद्योगों में संयंत्र तथा मशीनरी में बहुत बड़ी राशि के निवेश की आवश्यकता पड़ती है। ये अनेक एकड़ भूमि में फैले होते हैं तथा बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार देते हैं। ये बड़ी मशीनों के रूप में पूंजी प्रधान प्रौद्योगिकी का प्रयोग करते हैं। उदाहरण के लिये लोह एवं इस्पात उद्योग को ही लीजिये। टाटा लोह एवं इस्पात उद्योग देश में सबसे पुराना है। यह जमशेदपुर में लगभग 37.31 वर्ग कि.मी. भूमि क्षेत्र में स्थित है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद औद्योगिक क्षेत्र, लघु उद्योगों तथा बड़े पैमाने के उद्योगों दोनों के महत्व में वृद्धि होती रही है। अब हम इनकी एक-एक करके चर्चा करेंगे।

(i) राष्ट्रीय आय में अंश
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात औद्योगिक क्षेत्र का योगदान इस अवधि में धीरे-धीरे बढ़ रहा है। वर्ष 2009-10 में भारत के घरेलू उत्पाद में इस क्षेत्र का योगदान 28 प्रतिशत था। स्वतंत्रता के समय यह केवल 14 प्रतिशत था। इसमें वृद्धि विनिर्माण इकाईयों में वृद्धि तथा औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि के कारण हुई है।

(ii) रोजगार का सृजन
औद्योगिक क्षेत्र ने भारत की जनसंख्या को रोजगार के अवसर प्रदान करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। लघु उद्योगों तथा बड़े पैमाने के उद्योगों दोनों में संयुक्त रूप से लगभग 3 करोड़ 30 लाख लोग संलग्न हैं। इसमें से लघु उद्योग लगभग 3 करोड़ 12 लाख लोगों को नौकरी के अवसर प्रदान करता है।

(iii) आधारिक संरचना का सृजन
आज सड़कें, राजमार्गों, रेलवे, हवाई जहाजों आदि के होने के कारण दूरस्थ स्थानों की यात्रा करना आसान हो गया है। बड़ी-बड़ी बांध परियोजनाओं जैसे हीराकुंड तथा भाखड़ा नांगल आदि के बार में विचार कीजिये जो हमें बिजली तथा सिंचाई प्रदान करते हैं। बड़ी-बड़ी इमारतों पर दृष्टि डालिये जो दफ्तर, क्रय-विक्रय केन्द्र, फैक्ट्रियों, संस्थानों आदि को स्थान देते हैं तथा निवास स्थान उपलब्ध कराते हैं। रेडियो तथा टेलीफोन के टावरों को भी देखो जो संचार को सुगम बनाते हैं। ये सभी आधारिक संरचना के भाग हैं। आप सोच सकते हैं कि आज इन सुविधाओं के बिना किस प्रकार रहा जा सकता है? आधारिक संरचना का निर्माण बड़े पैमाने के उद्योगों के योगदान के कारण ही संभव है जो आधारिक संरचना के निर्माण के लिये आवश्यक मशीनरी तथा उपस्कर का निर्माण करते हैं।

(iv) उपभोक्ता वस्तुओं का प्रावधान
कपड़े, जो आप पहनते हैं, पैन, टूथ ब्रश, साबुन, जूते, साइकिल, स्कूटर, कार आदि जो आप प्रयोग करते हैं, सभी का उत्पादन विनिर्माण उद्योगों में होता है। आज आपकी पसंद की अनेक वस्तुओं से बाजार भरा हुआ है। यह औद्योगीकरण के कारण ही सम्भव है।

सेवा क्षेत्र की भूमिका तथा महत्व

भारत में सेवा क्षेत्र का प्रसार बहुत तेजी से हो रहा है। अगर आप अपने चारों ओर दृष्टि डाले तो आप देखेंगे कि लोगों तथा माल को ले जाने वाली रेल गाड़ियों की संख्या में भी महत्वपूर्ण रूप से वृद्धि हुई है। आप यह भी देखते हैं कि अनेक बसें, कार तथा ट्रक सड़क पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर आते जाते रहते हैं। इससे तात्पर्य है कि समय के साथ परिवहन सेवाओं में वृद्धि हुई है। अधिक संख्या में लोगों के पास टेलीफोन तथा मोबाइल फोन हैं। शिक्षा प्रदान करने के लिये देश में अधिक संख्या में स्कूलों का निर्माण हुआ है। मुक्त विद्यालयी शिक्षा के अन्तर्गत अध्ययन केन्द्रों की संख्या में वृद्धि हुई है ताकि और अधिक विद्यार्थी लाभान्वित हो सकें। आप, लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करते हुए अस्पताल, स्वास्थ्य केन्द्रों आदि को भी देखते हैं। बैंकों ने भी अपनी शाखाएं खोली हैं ताकि लोग अपना खाता खोल सकें, अपनी आवश्यकतानुसार पैसा निकाल सकें तथा मकान, कार, स्कूटर आदि खरीदने के लिये ऋण ले सकें। लोगों को भोजन प्रदान करने के लिये अधिकतर सार्वजनिक स्थलों पर होटल तथा जलपान गृह हैं। ये सभी विभिन्न प्रकार की सेवाओं के उदाहरण हैं। सेवाओं के अभाव में अर्थव्यवस्था में जीवन के बारे में सोचना भी कठिन है।
इसलिये सेवा क्षेत्र की भूमिका तथा महत्व के बारे में जानना आवश्यक है जिसकी हम निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत चर्चा करेंगे।
  • सेवा क्षेत्र का राष्ट्रीय आय में योगदान
  • सेवा क्षेत्र का रोजगार प्रदान करने में योगदान
  • विदेशों से कोषों को आकर्षित करने में योगदान
  • निर्यातों में सेवा क्षेत्र का योगदान

सेवा क्षेत्र का राष्ट्रीय आय में योगदान
तीनों क्षेत्रों अर्थात कृषि, उद्योग तथा सेवा क्षेत्रों में, सेवा क्षेत्र ने भारत की राष्ट्रीय आय में सबसे अधिक योगदान दिया है। यदि भारत की आय 100 है तो वर्ष 2009-10 में सेवा क्षेत्र का योगदान 55.20 रहा जो कुल के आधे से अधिक है।

सकल घरेलू उत्पाद में सेवा क्षेत्र का योगदान (2009-10)

व्यापार होटल आदि

16.3

परिवहन, संचार सेवा

7.8

वित्त, स्थावर सम्पदा, व्यवसाय

16.7

समुदाय, सामाजिक तथा अन्य

14.4

कुल सेवा क्षेत्र

55.2


स्रोतः आर्थिक सर्वेक्षण
आप देख सकते हैं कि वित्तीय, स्थावर सम्पदा तथा व्यवसायकि सेवाओं का कुल 55.2 में से 16.7 प्रतिशत योगदान रहा। वित्तीय सेवाओं में बैंकिंग तथा बीमा को सम्मिलित किया जाता है। व्यापार तथा होटल सेवाओं का योगदान 16.3 प्रतिशत रहा। समुदाय तथा सामाजिक सेवाओं, जिनमें लोक प्रशासन, रक्षा आदि सेवाओं को सम्मिलित किया जाता है, का योगदान 14.4 प्रतिशत रहा जबकि परिवहन तथा संचार सेवाओं का राष्ट्रीय आय में 7.8 प्रतिशत योगदान रहा।

(i) रोजगार प्रदान करने में योगदान
आज अधिकाधिक लोगों को सेवा क्षेत्र में रोजगार मिल रहा है। 2009-10 में देश में कल रोजगार स्तर के 29.4 प्रतिशत को इस क्षेत्र में रोजगार प्राप्त हआ। आगे आने वाले समय में इस आंकड़े में और वृद्धि होने वाली है। इसका मुख्य कारण है कि भारत में प्रत्येक वर्ष शिक्षित लोगों की संख्या में वृद्धि हो रही है। वे विभिन्न क्षेत्रों से जैसे 10वीं पास, कला, वाणिज्य, विज्ञान, इंजीनियरिंग, औषधि विज्ञान तथा अन्य व्यवसायिक विषयों में स्नातक आदि होते हैं। सेवा क्षेत्र में इन लोगों की आवश्यकता होती है। मजदूरी और वेतन के सम्बन्ध में, सेवा क्षेत्र, कृषि क्षेत्र की अपेक्षा अधिक भुगतान करता है। कृषि की तुलना में, सेवा क्षेत्र अधिक रोजगार के अवसर प्रदान करता है। ऐसी भिन्न-भिन्न प्रकार की सेवाएं अस्तित्व में हैं जो पूरे वर्ष प्रदान की जाती है। लेकिन, कृषि में कुछ मौसमी गतिविधियां ही होती हैं। इसलिये, जैसे-जैसे लोग अधिक शिक्षित होते जाते हैं वे सेवा क्षेत्र की ओर बढ़ते हैं। इसलिये, सेवा क्षेत्र में रोजगार बढ़ रहा है।

(ii) विदेशों से कोषों को आकर्षित करने में योगदान
भारत के सेवा क्षेत्र के विकास को देखकर विदेशों से लोग लाभ कमाने के लिये इस क्षेत्र में अधिक धन निवेश करने में अपनी रूचि प्रदर्शित कर रहे हैं। बैंकिंग, बीमा, व्यापार, परिवहन, होटल सेवाओं ने संयुक्त रूप से एक लाख अठारह हजार करोड रु. से अधिक प्रत्यक्ष निवेश के रूप में विदेशों से आकर्षित किए हैं। हाल में, भारत में कम्प्यूटर सेवाओं में कई गुना वृद्धि हुई है। इसने सैंतालीस हजार करोड़ रु. से अधिक विदेशों से आकर्षित किए हैं। यदि निवेश किए जाते हैं तो अधिक रोजगार के अवसरों का सृजन होता है। यह देश के लिये लाभदायक है।

(iii) निर्यातों में सेवा क्षेत्र का योगदान
निर्यात से तात्पर्य डालर, यूरो, येन, पौण्ड आदि के रूप में विदेशी मुद्रा अर्जित करने के लिये विदेशी नागरिकों को वस्तुएं तथा सेवाएं बेचना है। हाल के वर्षों में, भारत के सेवा क्षेत्र ने, निर्यातों के माध्यम से देश के लिये विदेशी मुद्रा अर्जित करने में बहुत बड़ा योगदान दिया है। हमारी व्यवसायिक सेवाएं जिनमें सूचना प्रौद्योगिकी, परामर्श सेवाएं, कानूनी सेवाएं आदि को सम्मिलित किया जाता है, विश्व स्तर की हो चुकी हैं। वर्ष 2009-10 में भारत ने सेवाओं के निर्यात से लगभग 4.35 लाख करोड़ रुपये अर्जित किये।

अर्थव्यवस्था के तीनों क्षेत्रों में सहबन्धन

अर्थ व्यवस्था के तीनों क्षेत्र परस्पर जुड़े होते हैं। वास्तव में ये एक दूसरे के पूरक एवं परिशिष्ट होते हैं। इसे समझने के लिये हम आपको एक कहानी सुनाते हैं। एक कृषक, हरी सिंह, रामपुर गांव में अपनी कृषि भूमि पर गेहूँ की खेती करता है। गत वर्ष अच्छी वषां होने के कारण उसकी फसल अच्छी हुई। इसलिये वह 10 क्विंटल गेहूँ स्थानीय मंडी में बेच सका तथा शेष 10 क्विंटल अपने परिवार के उपभोग के लिये रख सका।
इस वर्ष, उचित वर्षा नहीं हुई। इस क्षेत्र में सिंचाई की भी कोई सुविधा नहीं है तो वह गेहूँ की फसल की सिंचाई कैसे करे। हरी सिंह ने, भूमि से जल निकालने का निश्चय किया। लेकिन इसके लिये उसको डीजल पम्प सैट की आवश्यकता पड़ती है। डीजल पम्प सैट कौन देगा? इसका उत्पादन 'रवि मेनूफक्चरर्स' नामक एक विनिर्माण इकाई करती है जो 200 कि.मी. दर करीमनगर नामक औद्योगिक क्षेत्र में स्थित है। अब इतनी दूर जाना तो कठिन कार्य है।
हरी सिंह के एक मित्र गंगा सिंह ने उससे कहा कि चिन्ता करने की कोई बात नहीं है। वह हरी सिंह को शिव मंडी नामक सबसे पास के कस्बे में लेकर गया। बाजार में गंगा के बहनोई की 'पप्पू हार्डवेयर स्टोर' के नाम से एक दुकान है जिस पर पंप सैट बेचे जाते हैं। जब हरी सिंह ने पम्प सैट के बारे में पूछा तो पप्पू ने उसे दो घंटे इंतजार करने के लिये कहा क्योंकि जो ट्रक करीमनगर से 50 रवि पम्प सैट तथा ट्रैक्टरों के लिये कुछ पुर्जे लेकर आ रहा है, वह दुकान पर उस समय में पहुँच जायेगा। पप्पू ने रवि क्षेत्रपाल से जो रवि पम्प का मालिक है, अपने मोबाइल फोन पर इसे सुनिश्चित करने के लिए बात भी की।
उसी बीच, गंगा और हरी सिंह ने एक चाय की दुकान पर चाय तथा नाश्ता लिया, प्राथमिक विद्यालय शिक्षा के लिये हरी छोटी पुत्री के प्रवेश के बारे में पूछताछ के लिये गये तथा गंगा के पुत्र के लिये जिसे घर पर बुखार था, स्वास्थ्य केन्द्र से दवाएं खरीदी। दो घण्टे के पश्चात जब वे पप्पू की दुकान पर वापस आये तो उन्होंने श्रमिकों को पम्प सैट उतारते हुए देखा। पप्पू ने उनको बताया कि उसने करीमनगर में फैक्ट्री को 50 पम्प सैट का आर्डर दिया था। ट्रक उसी बाजार में दूसरी दुकान जो मोटर गाड़ियों तथा ट्रैक्टर के पुों का विक्रय करती है, को पुर्जे सौंप देगा। हरी ने देखा कि पप्पू ने ट्रक ड्राइवर को 1,00,000 रु. का चैक दिया जिसे उसने रवि क्षेत्रपाल की ओर से प्राप्त किया। क्योंकि राशि बड़ी है, नकद देना सुरक्षित नहीं है। चैक एक उससे बेहतर विकल्प है। पप्पू ने कहा मि. क्षेत्रपाल धन प्राप्त करने के लिए इस चैक को अपने बैंक खाते में जमा करा सकते हैं। उसने आगे कहा कि यह भुगतान कुछ पिछले देय को चुकाने के लिये है।
पम्पों के लिये भुगतान ग्राहकों को पम्प बेचने के बाद इसी प्रकार कर दिया जाएगा। हरी सिंह ने पप्पू को 7000 रु. का भुगतान करके एक पम्प सैट खरीद लिया। "इस वर्ष खराब मानसून के कारण पम्प सैटों की बहुत मांग है तथा ये शीघ्र ही बिक जायेंगे" पप्पू ने विश्वासपूर्वक कहा। “अब ट्रक का क्या होगा” गंगा सिंह के साथ गांव को वापस लौटते हुए हरी ने पूछा। अब ट्रक मंडी से गेहूँ तथा सब्जियाँ ले जाएगा जिन्हें करीमनगर औद्योगिक क्षेत्र तथा कस्बे में बेच दिया जाएगा" गंगा ने उत्तर दिया।
उपरोक्त कहानी से, आप कृषि, उद्योग तथा सेवा क्षेत्रों में आसानी से सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं। हरी सिंह की ही भांति कृषि क्षेत्र में अनेक कृषक हैं, जिन्हें अपनी भूमि की सिंचाई के लिये डीजल पम्पों की आवश्यकता है। पम्पों के अतिरिक्त भी अनेक अन्य आगतों जैसे उर्वरक, कीटनाशक, हल, ट्रैक्टर आदि की खेती बाड़ी में आवश्यकता होती है। इन वस्तुओं की भी उद्योगों द्वारा ठीक उसी प्रकार आपूर्ति की जाती है जिस प्रकार से उपरोक्त कहानी में पम्प सेटों की। बदले में उद्योगों तथा सेवा क्षेत्रों में कार्यरत लोगों को कृषि क्षेत्र द्वारा भोजन की आपूर्ति ठीक उसी प्रकार की जाती है जैसे कि हरी सिंह ने अपने अतिरिक्त गेहूँ को मंडी में बेचा था। तो फिर सेवा क्षेत्र की क्या भूमिका है? उसकी भूमिका कृषि तथा उद्योगों के बीच के लेनदेनों को सुगम तथा सुनिश्चित करना है। कहानी में ट्रक द्वारा पम्पों तथा पुों का करीमनगर से शिव मंडी ले जाना तथा अपनी वापसी यात्रा में भोजन सामग्री ले जाना परिवहन सेवा का एक भाग है। आर्डर के अनुसरण के लिये मोबाइल फोन का प्रयोग संचार सेवाओं का एक भाग है। बैंक में चैक जमा करना वित्तीय सेवाओं का भाग है। पप्पू की दुकान वस्तुओं की सुपुर्दगी प्रदान करने की व्यवसायिक सेवा प्रदान करती है। ध्यान दीजिये ये सभी गतिविधियाँ मुद्रा के लेनदेनों की सहायता से की जाती हैं। इस कहानी में हरी सिंह ने गेहँ बेचा तथा मद्रा प्राप्त की। उसने पम्प खरीदने के लिये मद्रा का प्रयोग किया। पप्प ने हरी से मुद्रा प्राप्त की तथा अपना लाभ रखने के बाद इसे पम्पों के आपूर्ति करने वाले को दे दिया। मुद्रा प्राप्त करने के पश्चात पम्पों की आपूर्ति करने वाला ट्रक वाले को उसका किराया तथा उद्योग में लोगों को मजदूरी का भुगतान करेगा। ये लोग इस मुद्रा का प्रयोग ट्रक द्वारा मंडी से लाये गये भोजन को स्थानीय बाजार से खरीदने में प्रयोग करेंगे। इस सरल सी कहानी से अब आप सोच सकते हैं कि पूरी अर्थव्यवस्था आन्तरिक रूप से किस प्रकार जुड़ी हुई है।

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