जनन किसे कहते हैं? | janan kise kahate hain

जनन किसे कहते हैं?

जनन करने की क्षमता का होना सजीवों का एक अनिवार्य अभिलक्षण है। इसके द्वारा आनुवंशिक पदार्थ पैतृक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में पहुंचता है, और इस प्रकार न केवल जातियों के ही अभिलक्षण बल्कि जनक जीवों के लक्षण भी अविच्छिन्न रूप से बने और आगे जारी रहते हैं।
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इस प्रक्रिया में सजीवों की एक पीढी दुसरी पीढी को जन्म देती है। उस प्रक्रिया को जिसके द्वारा एक जीव अपने ही प्रकार के जीव को जन्म देता है, जनन (reproduction) कहते हैं। 
जनन दो प्रकार से हो सकता है-
  1. अलैंकिग जनन (Asexual)
  2. लैंगिक जनन (Sexual)
बैक्टीरिया तथा प्रोटोजोआ में एक ही जीव से संतानोत्पत्ति संभव है, इसे अलैंगिक जनन कहते हैं। अनेक जन्तु तथा पौधे अलैंगिक जनन द्वारा जनन करते हैं, जैसा कि चित्र में दिखाया गया हैं जब जनन में दो जीव (नर तथा मादा) निहित होते हैं, तब उसे लैंगिक जनन कहते हैं। लैंगिक जनन में नर युग्मक मादा युग्मक के साथ संलयन कर एक नये जीव की शुरूआत करता है। यह पौधों तथा जन्तुओं में जनन की एक सामान्य प्रक्रिया है।

अलैंगिक जनन

निम्न जीवों जैसे बैक्टीरिया, प्रोटोजोआ एवं कुछ शैवालों में जनन अनेक प्रकार से एकल जीव द्वारा होता है। पौधों में अलैंगिक जनन कायिक जनन द्वारा होता है। कुछ जंत जैसे स्पंज तथा हाइड्रा अलैंगिक व लैंगिक दोनों प्रकार से जनन करते हैं।

(i) निम्नतर जीवों में अलैंगिक जनन
अलैंगिक जनन अनेक प्रकार का होता है :

(क) द्विविभाजन (Binary fusion) : एक कोशिका विभजित होकर दो संतति बनाती है और अपना अस्तित्व खो देती है। जैसे कि अमीबा और बैक्टीरिया में होता है। चित्र. 1
चित्र. 1

(ख) मुकुलन (Budding) : मुकुलन में मातृकोशिका (जनक) के शरीर से एक मुकुल बनता है और जनक से जुड़ा रहता है। जनक का केन्द्रक लंबा होकर दो में विभाजित हो जाता है जिसमें से एक भाग मुकुल में चला जाता है।उदाहरण : यीस्ट चित्र. 2
चित्र. 2

बहुकोशिकीय जीव जैसे स्पंज तथा हाइड्रा में शरीर के किसी भाग से एक मुकुल निकलती है, बड़ी होती है और जब इसके शरीर का पूर्ण निर्माण हो जाता है तब यह मुकुल, जनक के शरीर से, अलग हो जाता है। चित्र. 3
चित्र. 3

(ग) बीजाणु का निर्माण (Spare formation) : शैवाल जैसे क्लैमाइडोमोनास का कोशिका द्रव्य तथा केन्द्रक विभाजित होकर चार से आठ बीजाणु बना देते है। फफूंद, मांस तथा फर्न में भी जनन हेतु बीजाणु बनते हैं। बीजाणु वे एकल कोशिकाये होते हैं जो जनक पौधे से निकलकर नई सन्तति में विकसित हो जाते हैं। चित्र. 4
चित्र. 4

(ii) पौधों में अलैंगिक जनन

कायिक जनन : प्रकृति में, नए पौधों का जन्म चित्र. 5 (क से झ तक) में दिखाए गए किसी पौधे के कायिक अंगों जैसे जड़, तना, (स्तम्भ) या पत्तियों द्वारा हो सकता है। इस प्रकार के अलैंगिक जनन को कायिक जनन कहते हैं।

कायिक जनन के प्रकार उदाहरण सहित

जनन के प्रकार

पौधे का विशिष्ट भाग

उदाहरण

(A) प्राकृतिक विधियाँ

(क) जड़े चित्र. 5 क तथा ख

(ख) तना

(ग) पत्तियाँ

अपस्थानिक जड़े

(क) उपरिभूस्तारी (चित्र. 5 ज)

(ख) अधःभूस्तारी (चित्र. 5 झ)

(ग) शल्ककंद (चित्र. 5 ग)

(घ) कंद (चित्र. 5 घ)

(ङ) प्रकंद (चित्र. 5 च)

(च) अपस्थानिक मुकुल (चित्र. 5 छ)

शकरकंदी, डहेलिया

घास (बगीचे का)

गुलदाऊदी (क्रिसैंथीयम)

प्याज

आलू, कैना

अदरक

ब्रायोफिल्लम

(B) कृत्रिम विधियाँ (चित्र. 6 क से ग)

(क) कलम

(ख) दाब कलम

(ग) रोपण

 

गुलाब, मनीप्लांट

मोगरा (जास्मीन)

अंगूर

नींबू, जाति, आम

ऑर्किड, गुलदाउदी,

ऐस्पैरेगस


नये पौधे जड़ों (चित्र.5 क, ख) या तनों (चित्र. 5 ग, घ, च) या पत्तियों (चित्र .5 छ) से बन सकते हैं या जब एक तना कुछ दूरी पर बढ़ता है और फिर मिट्टी में प्रवेश कर उसमें से जड़ें निकल आती है। (चित्र .5 ज, झ)
चित्र. 5
(iii) पौधों में कृत्रिम कायिक जनन
मनुष्य ने कायिक जनन की प्राकृतिक विधियों से संकेत लेकर अनेक पौधे विकसित करने की कृत्रिम विधियाँ तैयार की हैं। चित्र. 6 विभिन्न विधियाँ दर्शाता है जिनके द्वारा किसानों तथा पौधघर के मालिकों ने कृत्रिम विधियों द्वारा अनेक इच्छित पौधे गुणित किए।

(iv) अलैंगिक जनन की अन्य विधियाँ
प्रयोगशाला में वैज्ञानिकों ने एक जीव से ऊतक संवर्धन द्वारा पौधे की व्यष्टियाँ (संतति) पैदा की है। डौली नामक भेड़, जो पूरी तरह अपनी माँ की नकल थी, को क्लोनिंग द्वारा पैदा किया गया है।

(क) सूक्ष्म प्रवर्धन
अन्वेषणकर्ताओं ने ऊतक संवर्धन की तकनीक प्रमाणित की है। किसी पौधे की प्रत्येक जीवित कोशिका या प्रत्येक अंग को टेटीपोटेन्ट अर्थात पूर्ण सक्षम पाया गया है जिसमें नये पौधे को जन्म देने की क्षमता होती है। क्या आप बता सकते है क्यों? इस लेख को पूरा पढ़ने के बाद कोशिश कीजिए और उत्तर दीजिए। आप अब समझ सकते हैं कि किसी एक जीव की समस्त कोशिकायें एक अकेली कोशिका - युग्मज (जाइगोट) से बनती हैं। इसीलिए सभी कोशिकाओं में एक समान जीन होते है। जीन, परिवर्धन विकास तथा समस्त जैव- प्रक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं।
पादप के किसी अंग जैसे गाजर की जड़ अथवा पत्तों से कोशिकाओं को निकालकर एक पर्याप्त पोषण माध्यम में सर्वर्धित करके, कोशिकाओं का एक अविभाजित पिंड प्राप्त किया जा सकता है जिसे कैलस कहते है। कैलस (Callus) नये पादपकों को जन्म देता है। ऊतक संवर्धन द्वारा नये पौधे बनाना सूक्ष्म प्रवर्धन कहलाता है (चित्र. 7)

(ख) क्लोनिंग (Cloning)
क्लोन अपने जनक की आनुवांशिक नकल है। डौली नामक भेड़ जब पैदा हुई थी, अपनी माँ की हू-ब-हू नकल थी। उसकी माँ के स्तन (थन) की कोशिका में से केन्द्रक निकालकर एक सरोगेट माँ के अण्ड में डाल दिया गया था, जिसका केन्द्रक पहले ही निकाल लिया गया था। डौली के एक भ्रूण से एक पूर्ण विकसित जीव को उसकी माँ ने जीन प्रदान किए तथा कोखदायी (सरोगेट) माँ में गर्भ का विकास हुआ। (चित्र. 8)

लैंगिक जनन

इसमें युग्मकों के निर्माण और बाद में उनका संलयन होता है। निषेचन के बाद नर व मादा युग्मकों के संलयन द्वारा युग्मनज बन जाता है, जो परिपक्व जीव में परिवर्धित हो जाता है। अधिकतर प्राणी और उच्चतर पौधे अपनी संख्या-वृद्धि लैगिक जनन द्वारा ही करते हैं।

पौधों में लैंगिक जनन

आप पहले से जानते ही हैं कि लैंगिक जनन में नर तथा मादा युग्मकों का संलयन आवश्यक होता है। अब हम जानेगें कि पुष्पी पौधों में किस प्रकार लैंगिक जनन होता है।

(i) पौधों में लैंगिक जनन
पुष्पी पौधों का जनन अंग फूल होता है (चित्र. 9)। पुंकेसर (स्टेमेन) जो कि पराग बनाता है पुष्प का नर भाग होता है। परागकणों में नर युग्मक होता हैं। एक फूल में कई पुंकेसर हो सकते हैं। प्रत्येक पुंकेसर के दो भाग होते हैं। ऊपरी भाग परागकोष (एंथर) कहलाता है जिसके भीतर परागकण होते है। यह निचले भाग पृतन्तु (फिलामेन्ट) के ऊपर स्थित होता है। स्त्रीकेसर (जायांग) मादा भाग होता है जिसका निचला भाग अंडाशय होता है जिसमें अण्डप या मादा युग्मक होते हैं।
स्त्रीकेसर के तीन भाग होते हैं – वर्तिकाग्र, वर्तिका, अंडाशय
अधिकांश पौधों में पुष्प में नर तथा मादा दोनों जनन अंग होते है। इन्हें उभयलिंगी कहते है। कुछ पौधों में नर पुष्प होते है जिनमें केवल पुंकेसर होता है और कुछ पौधों में केवल मादा पुष्प होते हैं जिनमें केवल स्त्रीकेसर होता है। इन्हें एकलिंगी पौधे कहते हैं।

(ii) परागण और निषेचन
केन्द्रकों के संलग्न हेतु परागकण तथा अंड अनेक कारकों जैसे वायु, जल एवं कीट द्वारा एक दूसरे के पास लाए जाते हैं। परागकोष से निकलकर परागकण का पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचने को परागण कहते है। यह दो प्रकार का होता है। स्वपरागण : जब किसी फूल के परागकण उसी फूल के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं एवं अण्ड को निषेचित करते है तो यह स्वपरागण होता है।
परपरागण में एक फूल के परागकण अपनी ही स्पीशीज़ के दूसरे पौधे के फूल के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं और उस फूल के अण्ड को निषेचित करते हैं। वायु, जल एवं कीट जैसे कारक परागकणों को एक फूल से दूसरे फूल तक पहुँचने में सहायता करते हैं।
परागकण तथा अण्ड के केन्द्रकों के निषेचन अथवा संलयन के लिए परागकण ऊपर बताए गए कारकों में से किसी भी एक कारक द्वारा जायांग के वर्तिकाग्र पर पहुँचता है। प्रत्येक परागकण एक पराग नलिका बनाता है। यह पराग नलिका वर्तिका के भीतर बढ़ती जाती है और परागकण का केन्द्रक बीजाण्ड में पहुँच जाता है। (चित्र.10) निषेचित बीजाण्ड बीजों में परिवर्तित हो जाता है जो पादपकों के रूप में अंकुरित होकर नये पौधों को बनाने में सक्षम होते हैं। (चित्र.11)
एक बार जब बीज बन जाते हैं तब वे प्रकीर्णित हो जाते हैं या जनक पौधे से दूर हो जाते हैं और फिर अनुकूल परिस्थितियाँ आने पर ये वहीं अंकुरित हो जाते है, जहाँ पर गिरते हैं।

जंतुओं में लैंगिक जनन

जैसा कि पहले बताया जा चुका है निम्नतर जंतु जैसे स्पंज व हाइड्रा अलैंगिक विधियों से जनन कर सकते हैं। हालांकि वे लैंगिक जनन भी कर सकते हैं। सभी जंतुओं में मादा अण्ड (अण्डाणु) तथा नर शुक्राणु का संलयन होता है और युग्मज (जाइगोट) बनता है जो कि भ्रूण के रूप में एक पूर्ण-विकसित संतति बन जाता है। अण्डे के भीतर विकास आंशिक या पूर्ण हो सकता है। ऐसे जन्तु जो अण्डे देते हैं जैसे मछली, मेंढक, सरीसृप (सांप/छिपकली) एवं पक्षी अण्डज या ओविपेरस कहलाते हैं। स्तनधारियों जैसे बिल्ली, कुत्ता, गाय एवं मनुष्यों में बच्चा माँ के गर्भ में विकास करता है, इन्हें जरायुज या विविपेरस कहते हैं। फीताकृमि तथा केंचुए में नर तथा मादा दोनों जनन अंग एक ही जीव में होते हैं, इन्हें उभयलिंगी (हाफोडाइट) कहते हैं। बाकी दूसरे जंतुओं में लिंग अलग-अलग जीव में होते हैं। नर में नर जनन अंग जैसे वृषण आदि तथा मादा में अंडाशय आदि होते हैं। मानव भी जंतु जगत में आते हैं। स्तनधारी होने के कारण ये जरायुज या विविपेरस हैं।

मनुष्यों में जनन

मनुष्य में शैशवावस्था से लैंगिक परिपक्वता के बीच की अवधि में बाल्यावस्था एवं युवावस्था आती है। नीचे दी गई तस्वीरें, जीवन की विभिन्न अवस्थाओं जैसे शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था तथा अंततः वृद्धावस्था से होते हुए मानव जीवन की प्रगति को प्रदर्शित कर रही है।

मनुष्यों में यौवनावस्था
जब कोई जीवन की यौवन (लैंगिक परिपक्वता) अवस्था में आता है तब शरीर में अनेक प्राकृतिक परिवर्तन होते हैं। ये परिवर्तन लगभग 10 से 11 वर्ष की आयु में आरंभ होते हैं और 18 से 19 वर्ष तक होते रहते हैं। जीवन की यह अवस्था (किशोरावस्था) कहलाती है। मनुष्यों मे परिवर्तन का वह काल जो उन्हें प्रजनन (संतानोत्पत्ति) के योग्य बनाता है, उसे यौवनारंभ आयु (Puberty) कहते हैं। केवल मानव ही नहीं अपितु कोई भी जंतु पैदा होने के तुरंत बाद जनन करने में समर्थ नहीं होता और ऐसा करने के लिए पहले उसे परिपक्व एवं वयस्क होना पड़ता है। जन्तुओं में जन्म और परिपक्वता की अवधि बहुत कम होती है। शायद मनुष्यों में यह अवधि सबसे लंबी है।
यौवन प्राप्त लड़के-लड़कियाँ जनन के लिए समर्थ होते हैं, लेकिन वे माता-पिता बनने की ज़िम्मेदारी निभाने योग्य नहीं होते। नवयौवनाएँ (किशोर लड़कियाँ) गर्भ में बच्चे को रखने के लिए (शारीरिकी विज्ञान) के आधार पर पूर्ण परिपक्व नहीं होती और कई बार ऐसी माँ और उसके बच्चे दोनों को जटिलताओं का सामना करना पड़ता है। यौवन प्राप्त किशोर जनकों के सामने अपने बच्चे की शिक्षा तथा आजीविका के लिए अच्छे विकल्प नहीं होते और ना ही वे उन्हें ये सब उपलब्ध करा पाते हैं। बाल-विवाह हमारे देश में अब भी एक समस्या है जबकि कानूनी रूप से विवाह की उपयुक्त आयु लड़कियों के लिए 18 वर्ष तथा लड़को लिए 21 वर्ष निर्धारित है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य जांच के 2005-2006 के आंकड़ों के अनुसार 27 प्रतिशत नवयौवनाओं तथा 30 प्रतिशत नवयुवकों का 15-19 आयु के बीच विवाह हुआ था। (इस जांच के समय) इसके अतिरिक्त इसी जांच से प्राप्त जानकारी यह बताती है कि 15 से 19 वर्ष की 30 प्रतिशत महिलाओं ने 19 वर्ष की आयु तक बच्चे को जन्म दिया है।

मनुष्यों में जनन के अंग (जनन तंत्र)

मनुष्यों में जनन के लिए दो जीव आवशयक होते हैं,- एक नर तथा एक मादा

(i) नर जनन अंग
नर जनन अंग नर जनन तंत्र चित्र 13 में दर्शाया गया हैं। इसके अंगों के कार्यों की तालिका में सूचीबद्ध किया गया।

मानव नर के जनन अंग

अंग

कार्य

एक जोड़ी वृषण

शुक्राणु उत्पन्न करना

एक जोड़ी शुक्रवाहिकाएँ

प्रत्येक वृषण के शरीर में जाकर मिलती है और स्खलनवाहिनी बनाती है।

एक स्खलन वाहिनी

यह मूत्र तथा शुक्राणु के निकलने के लिए एक सम्मिलित नलिका है।

शिश्न

एक पेशीय अंग जो मादा के शरीर में शुक्राणओं का स्थानांतरण करता है।


(ii) मादा जनन-तंत्र
चित्र.14 (क) तथा चित्र.14 (ख) में दिखाया गया है-
  • (i) मानवों में मादा जनन तंत्र तथा
  • (ii) मादा जनन प्रदेश की काट जो दिखा रही है अंडाशय से निकले अंड की चाल/उसका अंडवाहिनी में निषेचन, जाइगोट (युग्मज) का विकास जब तक वह आगे विकास के लिए गर्भाशय की दीवार में रोपित होता है।
मादा जनन-तंत्र उदर के निचले भाग में अवस्थित होता है। मादा जनन तंत्र के अंग एवं उनके कार्य तालिका में सूचीबद्ध है। साधारणतः अंडाशय एवं अंडवाहिनी सभी मादा जंतुओं में पाए जाते हैं तथा जो जंतु अंडे नहीं देते, बच्चे पैदा करते हैं, उनमें गर्भाशय भी पाया जाता है।

मानव मादा जनन अंग और उनके कार्य

अंग

कार्य

एक जोड़ी अंडाशय

अंडे उत्पन्न करना

एक जोड़ी अंडवाहिनियाँ

इन अंडवाहिनियों में से होकर अंडे अंडाशयों से गर्भाशय में आते हैं।

गर्भाशय

एक गुहा जहाँ भ्रूण विकसित होता है

सर्विक्स

गर्भाशय का मुख

योनि

जनन छिद्र


मानव में निषेचन एवं भ्रूण विकास
चित्र.15 (क से ज) को सावधानीपूर्वक देखिए। यह मानव में जनन के क्रम को दिखता है। चित्र क तथा ख में मानव युग्मक नर युग्मक शुक्राणु वृषण में (शुक्राणुजनन) तथा मादा युग्मक अंड अण्डाशय में अण्डजनन द्वारा बनते हैं।
शुक्राणु व अंड के केन्द्रक अंडे के भीतर संलयित होकर युग्मज (जाइगोट) बनाते हैं। यह संलयन निषेचन कहलाता है। यह अंडवाहिनी में होता है। (चित्र.15 ग)
निषेचित अंड या ज़ाइगोट में विभाजन आरंभ हो जाता है। बार – बार विभाजन द्वारा एक स्थिति आती है जब एक कोशिका - संतति में कोशिकाएँ व एक गुहा ब्लास्टोसील होती है, यह गर्भाशय की मोटी दीवार में धंस जाता है (च) जिसमें अनेक रक्त वाहिकाएँ होती है।
यदि निषेचन नहीं होता तो अंडा विघटित हो जाता है। गर्भाशय की मोटी दीवार रक्त वाहिकाओं समेत खंडित हो जाती है जिससे रक्त प्रवाह होता है। (रजोचक्र) मानव मादा में रजोचक्र प्रत्येक 28 से 30 दिन में होता है। (चित्र.12)
भ्रूण जो अब गर्भ (फीट्स) कहलाता है वह गर्भाशय में 280 दिनों के भीतर एक पूर्ण विकसित बच्चा बन जाता है। (ज) व (झ) और पीयूष ग्रंथि पश्चपालि की द्वारा स्त्रावित एक हार्मोन ऑक्सीटोसिन के प्रभाव से वह जन्म लेता है।
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जनन वाहिनी संक्रमण तथा यौन संचारित रोग

जनन वाहिनी संक्रमण (RTIs) का तात्पर्य जनन अंगों के संक्रमण से है। ये बीमारियाँ यौन आरोग्य (सफाई) की कमी से होती है। उदाहरण के लिए लड़कियों में मासिक धर्म में स्वच्छता की कमी। मुख्यतः जनन वाहिनी संक्रमण लैंगिक संपर्क द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे में संचारित होते हैं और इसलिए इन्हें यौन संचारित रोग (STDs) कहते हैं।

यौन संचारित रोग (STDs)
ये संक्रमण योनि या गुदा संभोग अथवा लैंगिक त्वचा के संपर्क में आने से फैल सकते है। गोनोरिया (सूजाक), सिफलिस (उपदंश), हरपीज़ क्लैमाइडिया, मस्से तथा कैन्क्रॉइड कुछ सामान्य यौन संचारित रोग हैं। लैंगिक संपर्क द्वारा मानव प्रतिरक्षा न्यूनता विषाणु (HIV) भी संचारित हो।

यौन संचारित रोगों के लक्षण इस प्रकार हैं :
  • जननांगों या गुदा में खुजली या सूजन।
  • मूत्राजनन क्षेत्रों में छाले, घाव, पिंड या दाने।
  • मादा में योनि से तथा नर में शिश्न से रंगीन स्त्राव होना जो दुर्गंधयुक्त भी हो सकता है।
  • मूत्रोत्सर्ग में दर्द होना।
  • स्त्रियाँ कमर के निचले भाग तथा उदर में दर्द की शिकायत भी कर सकती हैं।
  • कुछ संक्रामित व्यक्तियों के लक्षण मालूम नहीं पड़ते और वे अनजाने ही अपने साथी में संक्रमण फैला सकते हैं।

क्या आप जानते हैं कि पुरुषों की तुलना में-
  • स्त्रियों को जनन वाहिनी संक्रमण अधिक आसानी से हो जाते हैं क्योंकि बीमारी फैलाने वाले सूक्ष्मजीव योनि में लम्बे समय तक रह सकते हैं।
  • संक्रमण होने के काफी समय बाद तक भी स्त्रियों में लक्षण दिखाई नहीं देते हैं।
  • युवा स्त्रियों को यौन संचारित रोग होने का संदेह अधिक होता है क्योंकि उनकी योनि का श्लेष्मा अपरिपक्व होता है।
यदि STDs का कोई भी लक्षण हो, तो चिकित्सक को दिखाना बहुत अवश्यक है। सही समय पर पूर्ण उपचार से यौन संचारित रोगों को ठीक किया जा सकता है। अनुपचारित STDS से नपुंसकता (बंध्यता) आ सकती है। संक्रमित व्यक्ति के यौन साथी को चिकित्सकीय परामर्श व उपचार कराना चाहिए। जब तक संक्रमित व्यक्ति पूरी तरह ठीक न हो जाए, उसे लैंगिक संभोग से बचना चाहिए। यौन संचारित रोगों से बचा जा सकता है -
केवल एक विश्वसनीय लैंगिक साथी होना चाहिए।
हमेशा और सही कंडोम के उपयोग से सुरक्षित यौन संबंध स्थापित करना चाहिए।

एच.आइ.वी. (HIV) (एड्स)
मानव प्रतिरक्षा न्यूनता विषाणु द्वारा अर्जित प्रतिरक्षान्यूनता (AIDS) संलक्षण होता है। एच. आई.वी. एक रेट्रोवाइरस है जिसका आनुवंशिक पदार्थ आर.एन.ए. (RNA) है। यह प्रतिरक्षा-तंत्र की अतिआवश्यक कोशिकाओं को नष्ट करके शरीर को अनेक संक्रमणकारी कारकों के आक्रमण के लिए उपयुक्त बना देता है। यह टी-लिम्फोसाइट्स को संक्रमित कर हज़ारों विषाणु बना देता है। एच.आई.वी. ग्रस्त व्यक्ति 10 से 15 वर्ष तक भी अलाक्षणिक रह सकता है। धीरे-धीरे प्रतिरक्षा तंत्र की टी-सहायक कोशिकाओं की संख्या इतनी घट जाती है कि ग्रसित व्यक्ति अन्य बीमारियों के प्रति अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता खो देता है। यह स्थिति एड्स के पूर्ण संक्रमण की है।

टी-लिम्फोसाइट : सफेद रक्त कणिकाओं का एक प्रकार जो शरीर को संक्रमणकारी कारकों से बचाता है।
अनुमानित है कि दुनिया भर में 3 करोड़ वयस्क तथा 15 वर्ष से कम आयु के 30 लाख बच्चे एड्स के साथ जी रहे है। एच.आई.वी. संक्रमण निम्नलिखित विधियों द्वारा किसी संक्रमित व्यक्ति से दूसरे को हो सकता है।
  • असुरक्षित लैंगिक सम्भोग
  • संक्रमित रक्त
  • संक्रमित सिरीन्ज़ एवं सुई : इंजेक्शन द्वारा नशीला पदार्थ लेने वालों को संक्रमित सुइयों द्वारा इस विधि से संक्रमण हो सकता है। इसी प्रकार टैटू बनवाने तथा एक्यूपंचर से भी हो सकता है यदि संक्रमित सुइयों का इस्तेमाल किया जाए।
  • संक्रमित माँ द्वारा उसके बच्चे को गर्भ में बच्चे के जन्म के समय या दूध पिलाने में।
  • जैसा कि (STDs) से बचाव के अंतर्गत चर्चा की गई, एच.आई.वी. संक्रमण से बचा जा सकता है :
  • रक्तदान, रक्त चढ़ाने तथा इंजेक्शन लगाने में विसंक्रमित सुइयों के उपयोग द्वारा। एच.आई.वी. संक्रमित गर्भवती स्त्रियों को बच्चे के जन्म की सबसे सुरक्षित विधि के बारे में सलाह लेनी चाहिए तथा स्तनपान के संबंध में भी परामर्श लेना चाहिए।
  • एच.आई.वी. संक्रमण के पूरी तरह बढ़कर एड्स फैलने से बचने के लिए एंटी रिट्रोवाइरल थैरेपी उपलब्ध है और यह कारगर भी है।
आपने अभी जाना कि एच.आई.वी/एड्स कैसे फैलता है। यह चुम्बन, हाथ पकड़ने, एक शौचालय इस्तेमाल करने, एक-दूसरे के कपड़ों से, खाने या पीने, छींकनें, खांसी या मच्छरों के काटने से नहीं फैलता। अतः एड्स पीड़ित व्यक्तियों को बहिष्कृत या उनसे भेदभाव नहीं करना चाहिए।
  • जनन सभी जीवधारियों का आवश्यक लक्षण है।
  • यह अपने ही प्रकार के जीव पैदा करने की जैव-प्रक्रिया है।
  • जनन–अलैंगिक या लैंगिक हो सकता है।
  • अलैंगिक जनन में एक ही जीव के द्वारा संतति अथवा व्यष्टि का जन्म होता है।
  • लैंगिक जनन में एक नर तथा एक मादा जीव की आवश्यकता होती है।
  • उभयलिंगी जैसे फीताकृमि एवं केंचुआ में नर तथा मादा दोनों अंग एक ही जीव में होते हैं।
  • प्रोटोजोआ में द्विविभाजन व यीस्ट तथा हाइड्रा में मुकुलन द्वारा, अलैंगिक जनन होता है। पौधों में जड़, तना एवं पत्तियों जैसे अंग नए पौधों को पैदा कर सकते है। इसे कायिक जनन कहते हैं। पौधे कृत्रिम विधियों जैसे दाब कलम, कलम, गूटी आदि द्वारा भी संचरित किए जा सकते हैं। सूक्ष्म संचरण (ऊतक संवर्धन) तथा क्लोनिंग नवीन प्रायोगिक विधियाँ हैं।
  • लैंगिक जनन में नर तथा मादा युग्मकों का युग्मन जरूरी है। पौधों में पुष्प जनन अंग होता है। इसके पुंकेसर नर भाग तथा स्त्रीकेसर मादा भाग होते हैं
  • नर तथा मादा युग्मक का संलयन निषेचन कहलाता है।
  • निषेचन के पश्चात बीजाण्ड बीज बन जाते हैं। बीज नए पौधे को जन्म दे सकते हैं।
  • मनुष्यों में जनन परिपक्वता यौवनारंभ होने पर आती है। इस दौरान लड़के व लड़कियों में अनेक शारीरिक, शरीर-विज्ञान संबंधी तथा मानसिक परिवर्तन आते हैं।
  • जन्तुओं में लैंगिक जनन शुक्राणु व अण्डे के युग्मन के साथ आरंभ होता है। शुक्राणु नर अंग वृषण तथा अंड मादा अंग अण्डाशय में विकसित होते हैं। जंतु अंडे दे सकते हैं। (ओविपेरस) या उनके भ्रूण पूर्णतया गर्भाशय के भीतर विकसित हो सकते हैं। (विविपेरस)
मानव में नर तथा मादा जनन अंग हैं –
नर - 1 जोड़ी वृषण, 2 शुक्रवाहिनियां, 1 स्खलन वाहिनी जो शिश्न से होकर जाती है।
मादा- 1 जोड़ी अंडाशय, 2 अंडवाहिनियाँ या फैलोपियन नलिकाएं, एक गर्भाशय व एक योनि जो बाहर की ओर खुलती है।
  • जनन घटनाएं हॉर्मोनों के नियंत्रण में होती हैं।
  • निषेचन के उपरांत भ्रूण माँ के गर्भाशय में रोपित होकर गर्भ बन जाता है। गर्भ पूर्ण रूप से माँ की गर्भगुहा में विकसित होता है।
  • भारत, चीन के बाद सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है परिवार के आकार तथा बच्चे जन्म के समय को नियोजित करके बेहतर जीवन पाया जा सकता है क्योंकि परिवार के सभी सदस्यों के भोजन, शिक्षा स्वास्थ्य तथा कल्याण के लिए पर्याप्त साधन जुटाने को बहुत खर्च करना पड़ता है। ऐसी अनेक गर्भनिरोध विधियाँ हैं जिनका इस्तेमाल जोड़े अपनी आवश्यकता के आधार पर कर सकते है।
  • कई बीमारियाँ लैंगिक क्रियाओं द्वारा फैलतीहैं। ये यौन-संचारित संक्रमण बैक्टीरिया तथा वाइरस (सूक्ष्म जीवाणु व विषाणु) द्वारा होता है। एच.आई.वी. एड्स विषाणु द्वारा होता है।

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