हिंदी दिवस पर भाषण | hindi diwas par bhashan

हिंदी दिवस पर भाषण

सुप्रभात मेरे प्यारे दोस्तों और प्रिय शिक्षकगण!
हिंदी दिवस शैक्षिक संस्थानों और सरकारी कार्यालयों में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। आज के अत्यधिक व्यवसायिक वातावरण में जहां लोग अपनी जड़ों को भूल रहे हैं, हिंदी दिवस महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह लोगों को अपनी जड़ों के संपर्क में रहने के लिए प्रोत्साहित करता है, साथ ही साथ हिंदी को भी बढ़ावा देता है। अफसोस की बात है कि कई लोग हैं, जो अपनी मातृभाषा में बोलने में शर्म महसूस करते हैं।
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हिंदी दिवस हमें यह एहसास दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है कि हिंदी दुनिया की सबसे पुरानी और प्रभावशाली भाषाओं में से एक है और इस तरह हमें अपनी मातृभाषा में बोलने में गर्व करना चाहिए। हिंदी सीखी हुई भाषा है और इस भाषा में कई साहित्यिक रचनाएं की गई हैं। रामचरितमानस हिंदी की सबसे बड़ी साहित्यिक कृतियों में से एक है। 16वीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित, इसमें राम की कहानी को दर्शाया गया है। हिंदी में कुछ अन्य कृतियां हैं, हरिवंश राय बच्चन द्वारा मधुशाला, मुंशी प्रेमचंद द्वारा निर्मला, देवकी नंदन खत्री द्वारा चंद्रकांता आदि। हिंदी सबसे पुरानी भाषाओं में से एक है और संस्कृत की वंशज है। हिंदी आधुनिक इंडो-आर्यन भाषाओं की शाखा से संबंधित है। हालांकि, पिछली कई शताब्दियों में हिंदी में कई बदलाव हुए हैं और अंत में अपने वर्तमान स्वरूप में विकसित हुए हैं। हिंदवी, हिंदुस्तानी और खड़ी बोली हिंदी के प्रारंभिक रूप थे। हिंदी दिवस उन लोगों के लिए मुख्य दिन है जो अपने घर में हिंदी भाषा बोल रहे हैं या जो इस भाषा की मातृभाषा रख रहे हैं। भारत देश में बहुत सारी भाषाएं हैं। सभी भाषाओं में, हिंदी भारत देश में महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध भाषा है। हिंदी दिवस का उपयोग लोगों को हिंदी भाषा बोलने के लिए किया जाता है जो कि उनकी अपनी राष्ट्रीय भाषा है और हिंदी भाषा के बारे में ज्ञान प्राप्त करने के लिए हर व्यक्ति का उपयोग किया जाता है। सरकार ने कई स्कूलों और कॉलेजों को हिंदी भाषा पर ध्यान केंद्रित करने के लिए बनाया है, जिनके पास हिंदी भाषा के बारे में जानकारी नहीं है।

भाषण - 1

सभी को नमस्कार।
इस विशेष समारोह में आप सभी का स्वागत है। आज 14 सितंबर है। इस दिन को पूरे भारत में हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। हर साल हम इस दिन को हिंदी भाषा के प्रति सम्मान दिखावे के लिए उत्साह के साथ मनाते हैं।
हिंदी भाषा दुनिया में बोली जाने वाली मुख्य भाषाओं में से एक है। हिंदी हमारे देश की संस्कृति और मूल्यों का प्रतिबिंब है।
भारत में अधिकांश लोग हिंदी भाषी हैं, इसीलिए 14 सितंबर 1949 को भारतीय संविधान में हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार किया गया था।
हमें अपनी आधिकारिक भाषा हिंदी के माध्यम से ही संस्कृति का ज्ञान है। हिंदी दुनिया की प्राचीन और समृद्ध भाषा है। यह एक सरल भाषा है और किसी को भी इसे बोलने और समझने में परेशानी नहीं होती है। हिंदी भारत को एकजुट रखती है।
आज के आधुनिक युग में अंग्रेजी का भी अपना स्थान है, लेकिन इस वजह से हम अपनी मातृभाषा को नहीं भूल सकते हैं।
आज हम हिंदी में बात करते हैं, लेकिन कई बार हमारे शब्दों में अंग्रेजी शब्दों का उपयोग किया जाता है। यही कारण है कि हिंदी के कई शब्द प्रचलन से हटाए जा रहे हैं और हमें ऐसा नहीं होने देना है।
हिंदी भाषा के विकास के लिए हम सभी को एकजुट होकर काम करना होगा। हम सभी को हिंदी भाषा का अधिक से अधिक उपयोग करना होगा, तभी हम अपनी भाषा का उसके सही अर्थ में सम्मान कर सकते हैं।
आइए हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि अपनी राजभाषा हिंदी के विकास में हम अपनी ओर से हरसंभव प्रयास करेंगे और यथासंभव हिंदी भाषा का उपयोग करेंगे।
धन्यवाद।
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भाषण - 2

माननीय प्रधानाचार्य महोदय, आदरणीय अध्यापक गण और मेरे सभी प्रिय दोस्तों को सबसे पहले हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
आज हम यहां हिंदी दिवस मनाने के लिए इकट्ठा हुए है। इस शुभ अवसर पर मैं हिंदी दिवस पर भाषण देने जा रहा हूं, अनजाने में कोई गलती हो जाए तो मुझे क्षमा कर देना।
आज 14 सितंबर हिंदी दिवस है। आज का यह दिन हम सभी भारतीयों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि इसी दिन 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एकमत से यह निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा होगी। भारत में सन 1953 से प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। सभी बड़े उत्साह के साथ अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए प्रतिवर्ष हिंदी दिवस मनाते हैं।
हिंदी भाषा को विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली तीसरी भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त है। भारत में अधिकतर लोग इन हिंदीभासी हैं।
देश का हर एक नागरिक हिंदी भाषा को समझता और बोलता है। हिंदी एक ऐसी भाषा है जो हमारे मन को गर्व से भर देती है। हिंदी विश्व की प्राचीन और समृद्ध भाषा है।
हिंदी हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा ही नहीं बल्कि हिंदुस्तानियों की पहचान भी है। माना, आज के आधुनिक युग से जुड़ने के लिए अंग्रेजी भाषा सीखना भी जरूरी है लेकिन हमें अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी को नहीं भूलना चाहिए।
हमें अपने देश को विकसित देशों की सूची में शामिल कराने के लिए हिंदी को अपनाना होगा। सभी भाषाओं से ज्यादा अपनी राष्ट्रभाषा को प्राथमिकता देनी चाहिए।
हम सभी को अपनी राष्ट्रभाषा का आदर करना चाहिए। देश के एक सच्चे और अच्छे नागरिक के रूप में हमें अपनी भूमिका निभानी चाहिए और हिंदी को जन जन तक पहुंचाने की कोशिश करनी चाहिए।
हमें हिंदी भाषा को बढ़ावा देने का प्रण लेना चाहिए। हमारे मन में हमेशा हिंदी भाषा के प्रति सम्मान और आदर होना चाहिए।
अंत में, मैं अपने उन शिक्षकों को धन्यवाद कहना चाहूंगा जिन्होंने मुझे हिंदी दिवस के अवसर पर अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी के बारे में बोलने का मौका दिया।
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भाषण - 3

आदरणीय प्रधानाचार्य और देवतुल्य गुरुजनों को मेरा प्रणाम और मेरे सभी प्यारे सहपाठियों को मेरा नमस्कार।
जैसा की हम सभी जानते है की आज हिंदी दिवस है इसलिए आज का दिन हमारे लिए विशेष है। भारत के एक कोने से दुसरे कोने तक हिंदी समझी और बोली जाती है। हिंदी को विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली तीसरी भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त है।
इसी कारण भारतीय संविधान में हिंदी को आज ही के दिन अर्थात 14 सितंबर 1949 को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया था। यह हमारे लिए गौरव की बात है।
आज के दिन हम इसे पर्व के रूप में मनाकर दुनिया में हिंदी के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने का प्रयास करते है। यह दिन हिंदी भाषा को बढ़ावा देने और प्रसारित करने में अहम भूमिका निभाता है।
इस दिन को हिंदी कविताएँ, भाषण, कहानी और शब्दावली प्रश्नोत्तरी से जडे अद्वितीय कार्यक्रमों और प्रतियोगिताओं के साथ हिंदी दिवस के रुप में स्कूलों, कॉलेजों, कार्यालयों, संगठनों और अन्य उद्यमों में मनाया जाता हैं।
किसी भी देश की पहचान उसकी मातृभाषा से होती है। कोई भी देश अपनी राष्ट्रभाषा के माध्यम से ही विकास के पथ पर आगे बढ़ता है। संसार के सभी देशों ने अपने ही देश की भाषा के माध्यम से अनेक अविष्कार किए है। लेकिन अफसोस की बात है की हिंदी आजादी के 7 साल बाद भी अपना सम्मानजनक स्थान नहीं पा सकी है। इसके सबसे बड़े दोषी है हम हिंदी भाषी।
हम बार बार यह कहते है की हमें हिंदी वहीं आती। कई माता-पिता बड़ी खुशी के साथ कहते है की मेरा बच्चा अंग्रेजी में तो फ़ास्ट है लेकिन हिंदी में थोड़ा कमजोर है। हम भारतीय है।
अगर हमें हिंदी बोलना और लिखना नहीं आता है तो हमारे लिए यह बहुत शर्म की बात है। वो इसलिए की हम अपनी ही राजभाषा को बोल नहीं सकते है।
आज हम अंग्रेजी बोलना और सीखना सम्मान समझते है। मैं आपसे यह नहीं कह रहा हूँ की अंग्रेजी मत सीखो, सीखो। सीखवी भी चाहिए लेकिन हम अपनी ही भाषा को सीखना क्यों पसंद नहीं करते?
धिक्कार है उन पर जो अपनी मातृभाषा को छोड़कर अंग्रेजी पर जोर दे रहे है। जबकि अपनी भाषा से ही संस्कृति का ज्ञान होता है। व्यक्ति सामाजिक बनता है।
अगर हम इसी तरह अपनी भाषा को नजरअंदाज करते रहे और अंग्रेजी भाषा को महत्व देते रहे तो एक दिन ऐसा भी आएगा जब आप अपने देश में खुद को पराया महसूस करेंगे।
अंत में अपने शब्दों को विराम देते हुए कहना चाहूँगा की हमें हिंदी को अपनी राष्ट्रभाषा बनाने और देश को विकसित देशों की सूची में शामिल करने के लिए हिंदी भाषा को अपनाना होगा और यह संभव तभी होगा जब विकास के मंच पर देश का हर एक व्यक्ति भागेदारी करेगा।
धन्यवाद!

भाषण - 4

आज हिन्दी दिवस है, आज ही के दिन हिन्दी को संवैधानिक रूप से भारत की आधिकारिक भाषा का दर्जा मिला था। दो सौ साल की ब्रिटिश राज की गुलामी से आजाद हुए देश ने तब ये सपना देखा था कि एक दिन पूरे देश में एक ऐसी भाषा होगी जिसके माध्यम से कश्मीर से कन्याकुमारी तक संवाद संभव हो सकेगा। आजादी के नायकों को इस बात में तनिक संदेह नहीं था कि हिन्दुस्तान की संपर्क भाषा बनने का महती दायित्व केवल और केवल हिन्दी उठा सकती है। इसीलिए इस संविधान निर्माताओं ने देवनागरी में लिखी हिन्दी को नए देश की आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार किया। संविधान निर्माताओं ने तय किया था कि जब तक हिन्दी वास्तविक अर्थों में पूरे देश की संपर्क भाषा नहीं बना जाती तब तक अंग्रेजी भी देश की आधिकारिक भाषा रहेगी।
संविधान निर्माताओं का अनुमान था कि आजादी के बाद अगले 15 सालों में हिन्दी पूरी तरह अंग्रेजी की जगह ले लेगी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हों या देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, सभी इस बात पर एकमत थे कि ब्रिटेन की गुलामी की प्रतीक अंग्रेजी भाषा को हमेशा के लिए देश की आधिकारिक भाषा नहीं होना चाहिए। लेकिन अंग्रेजों के जाने के बाद भी उनकी “फूट डालो और राज करो” की नीति भाषा के क्षेत्र में चलती रही। हिन्दी को एकमात्र आधिकारिक भाषा के खिलाफ उसकी बहनों ने ही बगावत कर दी। उन्होंने एक परायी भाषा “अंग्रेजी” के पक्ष में खड़ा होकर अपनी सहोदर भाषा का विरोध किया। जबकि उनका भय पूरी तरह निराधार था। हिन्दी किसी भी दूसरी भाषा की कीमत पर राष्ट्रभाषा नहीं बनना चाहती। देश की सभी राज्य सरकारें अपनी-अपनी राजभाषाओं में काम करने के लिए स्वतंत्र थीं। हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का विचार परस्पर सह-अस्तित्व पर आधारित था, न कि एक भाषा की दूसरी भाषा की अधीनता पर आजादी के 70 साल बाद भी स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों की वह इच्छा अधूरी है। आज पूरे देश में शायद ही ऐसा कोना हो जहां दो-चार हिन्दी भाषी न हों। शायद ही ऐसा कोई प्रदेश हो जहां आम लोग कामचलाऊ हिन्दी न जानते हों। भले ही आधिकारिक तौर पर हिन्दी देश की राष्ट्रभाषा न हो केवल राजभाषा हो, व्यावाहरिक तौर पर वो इस देश की सर्वव्यापी भाषा है। ऐसे में जरूरत है हिन्दी को उसका वाजिब हक दिलाने की जिसका सपना संविधान निर्माताओं ने देखा था।
हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की माँग कमोबेश हर हिन्दी भाषी को सुहाती है। लेकिन इसकी आलोचना पर बहुत से लोग मुँह बिचकाने लगते हैं। आज हम हिन्दी की ऐसी दो खास समस्याओं पर बात करेंगे जिन्हें दूर किए बिना हिन्दी सही मायनों में राष्ट्रभाषा नहीं बन सकती। अंग्रेजी, चीनी, अरबी, स्पैनिश, फ्रेंच इत्यादि के साथ ही हिन्दी दुनिया की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में एक है। लेकिन इसकी तुलना अगर अन्य भाषाओं से करें तो ये कई मामलों में पिछड़ी नजर आती है और इसके लिए जिम्मेदार है कुछ हिन्दी प्रेमियों का संकीर्ण नजरिया। हिन्दी के विकास में सबसे बड़ी बाधा वो शुद्धतावादी हैं जो इसमें से फारसी, अरबी, तुर्की और अंग्रेजी इत्यादि भाषाओं से आए शब्दों को निकाल देना चाहते हैं। ऐसे लोग संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दों के बोझ तले कराहती हिन्दी को “सच्ची हिन्दी” मानते हैं। लेकिन यहाँ मशहूर भाषाविद प्रोफेसर गणेश देवी को याद करने की जरूरत है जो कहते हैं भाषा जितनी भ्रष्ट होती है उतनी विकसित होती है।
प्रोफेसर देवी का सीधा आशय है कि जिस भाषा में जितनी मिलावट होती है वो उतनी समृद्धि और प्राणवान होती है। अंग्रेजों को लूट, डकैती, धोती और पंडित जैसे खालिस भारतीय शब्द अपनी भाषा में शामिल करने में कोई लाज नहीं आती लेकिन भारतीय शुद्धतावादी लालटेन, कम्प्यूटर, अस्पताल, स्कूल, इंजन जैसे शब्दों को देखकर भी मुँह बिचकाते हैं जिनका प्रयोग अनपढ़ और गंवई भारतीय भी आसानी से कर लेते हैं। तो हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाने के लिए जरूरी है कि वो समस्त भारतीय भाषाओं और अन्य भाषाओं से अपनी जरूरत के हिसाब से शब्दों को लेने में जरा भ संकोच न करे। हम परायी भाषा के शब्दों को हिन्दी में जबरन घुसेड़ने की वकालत नहीं कर रहे। लेकिन जो शब्द सहज और सरल रूप से हिन्दी में रच-बस गये हों उन्हें गले लगाने की बात कर रहे हैं।
हिन्दी के राष्ट्रभाषा बनने में दूसरी बड़ी दिक्कत है इसका ज्ञान-विज्ञान में हाथ तंग होना। कोई भाषा केवल अनुपम साहित्य के बल पर राष्ट्रभाषा का दायित्व नहीं निभा सकती। भाषा को ज्ञान, विज्ञान, व्यापार और संचार इत्यादि क्षेत्रों के लिए भी खुद को तैयार करना होता है। आज हिन्दी इन क्षेत्रों में दुनिया की अन्य बड़ी भाषाओं से पीछे है। गैर-साहित्यिक क्षेत्रों में हिन्दी में उच्च गुणवत्ता के चिंतन और पठन सामग्री के अभाव से हिन्दी बौद्धिक रूप से विकलांग प्रतीत होती है। आज जरूरत है कि विज्ञान और समाज विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में हिन्दुस्तानी को बढ़ावा दिया जाए। तभी सही मायनो में हिन्दी देश की राष्ट्रभाषा बन सकेगी। अगर इन दो बातों पर पर्याप्त ध्यान दिया जाए तो हिन्दी को वैश्विक स्तर पर पहचान और प्रतिष्ठा पाने से कोई नहीं रोक सकेगा।

भाषण - 5

भारत दुनिया के सबसे विविध देशों में से एक है जिसमें कई धर्म, रीति-रिवाज, परंपराएँ, व्यंजन और भाषाएँ सम्मिलित हैं। हिंदी भारत की सर्वप्रमुख भाषाओं में से एक है और 2001 में, इस भाषा के लगभग 26 करोड़ देशव्यापी वक्ता थे, जिससे यह भाषा देश में सबसे अधिक और व्यापक रूप से बोली जाने वाली भाषा बन गई है।
जब 14 सितंबर 1949 को हिंदी भाषा को भारत में गौरवान्वित स्थान मिला, तो इसे देश की शासकीय भाषा के रूप में अपनाया गया। 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। आज, हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त है।
हिंदी दिवस को शैक्षिक संस्थानों और सरकारी कार्यालयों में बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है। वर्तमान समय में, अत्यधिक व्यावसायिक वातावरण में, जहाँ लोग अपनी मूल भाषा को भूल रहे हैं, वहाँ हिंदी दिवस एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इससे न केवल लोगों को अपनी मूल संस्कृति के संपर्क में रहने के लिए प्रोत्साहन मिलता है बल्कि साथ ही हिंदी को बढ़ावा भी मिलता है। अफसोस की बात है, ऐसे बहुत से लोग हैं जो अपनी मातृभाषा को बोलने में संकोच महसूस करते हैं। हिंदी दिवस हमें यह एहसास कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है कि हिंदी दुनिया की सबसे पुरानी और सबसे प्रभावशाली भाषाओं में से एक है, इसलिए हमें अपनी मातृभाषा को बोलने में गर्व महसूस करना चाहिए।
हिंदी मनीषियों (ज्ञानियों) की भाषा है और इस भाषा में कई साहित्यिक रचनाएं लिखी गई हैं। रामचरितमानस हिंदी भाषा में लिखी गई सबसे बड़ी साहित्यिक रचनाओं में से एक है। 16 वीं सदी में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित इस रचना में राम के चरित्र का वर्णन किया गया है। हिंदी भाषा में कुछ अन्य रचनाएँ जैसे हरिवंश राय बच्चन द्वारा रचित मधुशाला, मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित निर्मला और देवकी नंदन खत्री द्वारा रचित चंद्रकांता आदि हैं।
हिंदी सबसे प्राचीन भाषाओं में से एक है और संस्कृत भाषा की वंशज (अवरोही) है। हिंदी आधुनिक इंडो-आर्यन (भारतीय-आर्यों की) भाषाओं की शाखा से संबंधित है। हालाँकि, हिंदी में विगत कई शताब्दियों में काफी बदलाव हुआ और आखिरकार अब यह अपने मौजूदा स्वरूप में विकसित हुई है।
प्रारंभिक समय में हिंदी के तीन रूप- हिन्दवी, हिंदुस्तानी और खड़ी-बोली थे। इनका उपयोग 10 वीं शताब्दी में किया जाता था। हिंदी का साहित्यिक इतिहास 12 वीं शताब्दी से पहले का है। हिंदी का आधुनिक अवतार लगभग 300 वर्ष पुराना है, जो कि वर्तमान युग में अधिकतर उपयोग में लाया जाता है।
वास्तव में, अंग्रेजी के साथ ही हिंदी को भी राष्ट्र की शासकीय भाषा के रूप में चुना गया क्योंकि हिंदी ही एकमात्र भाषा थी जो सम्पूर्ण राष्ट्र को एकीकृत कर सकती थी। वास्तव में, 1917 में महात्मा गांधी ने गुजरात शिक्षा सम्मेलन, भारुच में एक भाषण प्रस्तुत किया और हिंदी के महत्व को रेखांकित किया। उस विशेष सम्मेलन में, गांधीजी ने स्पष्ट किया कि हिंदी पूर्वकाल से ही अधिकांश भारतीयों द्वारा बोली जाती है इसलिए इसे राष्ट्रीय भाषा के रूप में अपनाया जा सकता है।
उन्होंने भाषा के महत्व को रेखांकित करते हुए आगे बताया कि इसका प्रयोग धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक संचार के एक माध्यम के रूप में किया जा सकता है। इसलिए 14 सितंबर 2017 को हम अत्यधिक आत्मिक खुशी और गर्व के साथ हिंदी दिवस मनाते हैं। यह हमारी राष्ट्रीय भाषा है और इसने हमें अपनी निराली हमारी राष्ट्रीय भाषा है और इसने हमें अपनी निराली पहचान प्रदान की है। हिंदी में बात करते समय हमें हमेशा गर्व महसूस करना चाहिए। हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

भाषण - 6

हिन्दी दिवस वह दिन है जब हम सभी अपनी राष्ट्रभाषा - हिंदी का प्रचार और प्रसार करते हैं। हिंदी दुनिया भर में अधिकांश लोगों द्वारा बोली जाने वाली मूल भाषा है। यह भाषा भारत की मातृभाषा के रूप में घोषित की गई है। इस दिन कई सत्र, सेमिनार, समारोह आदि का आयोजन किया जाता है। इन समारोहों के दौरान विभिन्न हिंदी कविताओं, निबंधों आदि का आयोजन किया जाता है। इस दिन के पीछे का मुख्य एजेंडा है लोगों को हिंदी भाषा की आवश्यकता को पहचानना और लोगों को भी यह समझना चाहिए कि जो कोई सही तरीके से हिंदी भाषा बोलता है वह पिछड़ा हुआ नहीं है बल्कि यह वह है जो संजीदगी से हिंदी भाषा
को आगे ले जा रहा है।
यह दिन हमारी मातृभाषा को सम्मान देने के लिए सालाना तौर पर मनाया जाता है। पूरे देश में हिंदी दिवस का उत्सव मनाया जाता है जो कि सबसे अधिक प्रचलित हिंदी भाषा के महत्व को दर्शाता है। इस दिन को देवनागरी लिपि में आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकृत हिंदी भाषा के प्राचीन समय को पहचानने के लिए कानूनी समर्पित दिन के रूप में घोषित किया गया है।
आजकल लोग अंग्रेजी सीखने के लिए उत्सुक हैं और महसूस करते हैं कि यदि वे हिंदी में बोलते रहे तो यह उनके कैरियर को प्रतिबंध या उनकी प्रगति में बाधाएं उत्पन्न कर सकता है। लेकिन ऐसा नहीं है लोगों के लिए आगे बढ़ना और अन्य भाषाओं को सीखना महत्वपूर्ण है लेकिन हमारी मातृभाषा के महत्व को भूलना या कम करना, यह सही रास्ता नहीं है जिस पर हम आगे बढ़ते हैं। मेरे स्कूल के दिनों के दौरान हमारे शिक्षक विशेष रूप से विभिन्न प्राचीन हिंदी विषयों पर अंतर-कक्षाओं के बीच निबंध लेखन और कविता का पाठ सत्र का आयोजन करते रहते थे। वह समय वाकई मज़ेदार, मनोरंजक और शिक्षा के लिए इस्तेमाल होता था लेकिन आजकल स्कूलों का ध्यान ऑक्सफोर्ड अध्ययन की दिशा में अधिक स्थानांतरित हो गया है और इसलिए वे सभी आयु समूहों में अंग्रेजी भाषा को बढ़ावा देते हैं। यह भी आवश्यक है लेकिन हमारे भीतर हिंदी भाषा का उत्तराधिकारी होने की जड़ होना बहुत महत्वपूर्ण है।
हमें भारत के नागरिकों के रूप में अपनी मातृभाषा - हिंदी को अन्य भाषाओं और दुनिया के अन्य देशों में मान्यता के महत्व को प्राप्त करने पर ध्यान देना चाहिए। इस प्रामाणिक भाषा के अस्तित्व का आकलन करने के कारण हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवसों के रूप में मनाया जाता है। मेरे विचार के अनुसार प्रत्येक विद्यालय, महाविद्यालय और संगठन को इस दिन हमारी हिंदी भाषा को समर्पित विशेष प्रतियोगिताओं के द्वारा मनाना चाहिए। कविता लेखन और कविता सुनाना, कथालेखन और कथा सुनाना, निबंध लेखन और हिंदी शब्दावली की प्रश्न उत्तर आदि के विभिन्न सत्रों को व्यवस्थित किया जा सकता है ताकि अन्य लोगों के साथ युवा पीढ़ी हिंदी भाषा से ज्यादा जुड़ी हो।
इस सत्र का एक हिस्सा बनने के लिए आप सभी को धन्यवाद। जय हिंद! जय भारत! हिंदी भाषा हमारी रगों में दौड़ती है। हम सभी हर वर्ष एक साथ हिंदी दिवसों पर विशेष पहल करने की प्रतिज्ञा करते हैं जिससे कि हिंदी भाषा और हिंदी दिवस का अविश्वसनीय मूल्य प्रमुखता पर बना रहे।

भाषा लोगों से अपने विचारों को व्यक्त करने और जोड़ने का एक माध्यम है। भाषा ऐसी होनी चाहिए जो सबको एक साथ जोड़ सके और ऐसी एक भाषा है हिंदी। 14 सितंबर 1949 को भारतीय संविधान द्वारा संवैधानिक तरीके से हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाया गया और उसी दिन से हिंदी भाषा को राजभाषा के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा। हिंदी भारत की राजभाषा है। यह हमारा दुर्भाग्य है की आजादी के 71 साल बाद भी हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता नहीं मिल सकी। इसकी वजह, आज माँ-बाप अपने बच्चों को अंग्रेजी सिखाना जरूरी समझते है। वे अपने बच्चों को हिंदी स्कूलों में दाखिला दिलाने में संकोच महसूस करते है। जिससे आज की युवा पीढ़ी में अंग्रेजी भाषा सिखने और बोलने की होड़ लगी हुयी है। जिसकी वजह से वे अपनी मूल भाषा को भूल रहे है।
जिसकी वजह से हिंदी भाषा विलुप्त होती जा रही है। ऐसा ना हो इसलिए हम हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाते है और उसके बाद हिंदी को भूल जाते है। लेकिन अगर हमें हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाना है तो हमें हिंदी का अधिक से अधिक उपयोग करना होगा। जिस भाषा में हमने अपना पूरा जीवन बिताया उस भाषा के लिए हमारे दिल और मन में सम्मान होना चाहिए। हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलना चाहिए। इसके लिए 70 सालों से प्रयास किया जा रहा है और हम उम्मीद करते है की यह प्रयास जल्द पूरा हो और जल्द से जल्द हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलें। इसी के साथ आप सभी को हिंदी दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएं।
अंतिम शब्द,
मेरी आप सभी से प्रार्थना है की आप हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने का गौरव प्रदान करें। जिस भाषा में आपने अपना पूरा जीवन बिताया उस भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने की दिशा में सहयोग करके अपना कर्तव्य निभाएँ।

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