प्लासी का युद्ध - कारण, महत्त्व और परिणाम | plasi ka yuddh

प्लासी का युद्ध

बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला तथा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना के मध्य 23 जून, 1757 को मुर्शीदाबाद के दक्षिण में नदिया जिले के 'प्लासी' नामक स्थान पर युद्ध हुआ जिसमें नवाब की सेना की पराजय हुई और कंपनी की जीत हुई।
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दक्षिण के साथ-साथ अंग्रेजों ने बंगाल में भी अपने प्रभाव को जमाने का प्रयास किया। भारत के पूर्वी प्रांतों में बंगाल, बिहार और उड़ीसा के प्रदेश सबसे समृद्ध थे। अत: बंगाल पर नियंत्रण स्थापित कर वहां की धन संपत्ति पर नियंत्रण स्थापित करना ब्रिटिश साम्राज्यवादी हितों के अनुकूल था। बंगाल में अन्य यूरोपीय शक्तियों की उपस्थिति भी बहुत प्रभावी नहीं थी। साथ ही बंगाल में मराठों के समान चुनौती देने वाली क्षेत्रीय शक्ति उपस्थिति नहीं थी। इस प्रकार बंगाल की आर्थिक समृद्धि एवं राजनीतिक अस्थिरता ने अंग्रेजों को बंगाल पर नियंत्रण जमाने के लिए प्रेरित किया। बंगाल पर ब्रिटिश नियंत्रण एक दीर्घकालिक प्रक्रिया का परिणाम था। जिसकी शुरूआत 1651 ई. में हुगली में एक व्यापारिक कोठी की स्थापना के रूप में हुई थी और जो 1765 ई. में बंगाल की दीवानी प्राप्त करने के साथ पूर्ण हुई। बंगाल में औरंगजेब के समय से ही मुर्शीद कुली खां गवर्नर के रूप में मौजूद था और औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात लगभग स्वतंत्र स्थिति में राज्य कर रहा था। मुगल शासक समय-समय पर अंगेजों को बंगाल में व्यापारिक सुविधाएं प्रदान करते थे जिन्हें बंगाल के गवर्नर मान्यता देते थे। इस क्रम में 1717 ई. में फर्रुखशियर द्वारा अंग्रेजों को दिया गया शाही फरमान प्रमुख था। इस फरमान का अंग्रेज व्यापारी प्रायः दुरूपयोग करते थे, जिससे नवाब को आर्थिक क्षति होती थी। 1740-56 ई. तक बंगाल का नवाब अलीवर्दी खां था जो योग्य प्रशासक था, उसने अंग्रेजों को कलकत्ता में और फ्रांसीसियों को चन्द्रनगर में किलेबंदी नहीं करने दी। अलीवर्दी खां ने अंग्रेजों की तुलना मधुमक्खी के छत्ते से की। 1756 ई. में बंगाल का नवाब सिराजुद्दौला बना। किन्तु नवाब की गद्दी के अन्य दावेदार भी थे जिनमें शौकतजंग एवं घसीटी बेगम प्रमुख थी। इस तरह बंगाल में सिराजुद्दौला के एक विरोधी गुट का आविर्भाव हुआ। अंग्रेजों ने इस स्थिति से लाभ उठाना चाहा। उन्होंने फ्रांस से युद्ध की संभावना का बहाना बनाकर सैनिक किलेबंदी आंरभ कर दी और नवाब विरोधी तत्त्वों को आश्रय प्रदान किया। जिसमें दीवान राजवल्लभ एवं उसका पुत्र कृष्णवल्लभ प्रमुख थे। व्यापारी अमीचंद भी लेन देन में नवाब को अत्यधिक हानि पहुँचाकर अंग्रेजों के पास चला गया था, इस प्रकार अंग्रेजों की गतिविधियों ने सिराजददौला को नाराज कर दिया। अत: सिराजुद्दौला के लिए अपने विरोधी तत्त्वों को कुचलना आवश्यक था। plasi ka yuddh
सिराजुद्दाला ने 1756 ई. में घसाटी बेगम एवं शौकतजंग को पराजित किया और कलकत्ता के किले को घेर लिया। इसी समय 20 जून 1756 ई. को ब्लैकहोल दुर्घटना घटी थी। सिराजददौला की इस सफलता से अंग्रेज बौखला गए और उनके आर्थिक हितों पर चोट पहुँची। अतः क्लाइव के नेतृत्व में जनवरी 1757 ई. में अंग्रेजों ने पुनः कलकत्ता पर अधिकार कर लिया। सिराजुद्दौला को पराजित कर उसके साथ 9 फरवरी 1757 को अलीनगर की संधि की। अलीनगर की संधि से अंग्रेजों को बंगाल, बिहार, उडीसा में बिना चंगी दिये व्यापार करने की अनुमति मिल गया। सिक्के ढालने और कलकत्ता की किलेबंदी करने का अधिकार अंग्रेजों को प्राप्त हुआ। इस प्रकार बंगाल में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कपना को सामांतर सत्ता स्थापित हो गई। यह संधि सिराजददौला के लिए अपमानजनक थी। प्रश्न यह उठता है कि सिराजुद्दौला जैसे शासक ने इस अपमानजनक संधि को क्यों स्वीकार किया? वस्तुत: सिराजुद्दौला को उसके कर्मचारियों ने धोखा दिया और अंग्रेजों के विरूद्ध समय पर सैनिक सहायता नहीं भेजी। इस तरह सिराजुद्दौला को अपने कर्मचारिया की वफादारी पर संदेह हो गया। दूसरी ओर अहमदशाह अब्दाली दिल्ली तक आ चुका था, सिराज को उसके आक्रमण का भय था इसलिए उसने अंग्रेजों से संधि करना उचित समझा। अग्रेजों ने बंगाल में अपना नियंत्रण बढ़ाने के लिए प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी शक्ति फ्रांसीसियों के विरूद्ध कार्यवाही की और चंद्रनगर पर कब्जा कर फ्रांसीसियों की शक्ति को नष्ट कर दिया और अब बंगाल में अपनी सत्ता को जमाने के लिए उन्हें एक कठपुतली नवाब की आवश्यकता थी जिसकी पूर्ति प्लासी के युद्ध से पूरी हुई। 

स्वरूप

सही अर्थों में देखा जाए तो प्लासी की घटना एक नाटक थी। अंग्रेजों ने किसी विशेष सामरिक तथा सैन्य योग्यता का प्रदर्शन नहीं किया। यही कारण है कि युद्ध में बंगाल सेना के 500 सैनिक मारे गए तथा इतने ही जख्मी हुए जबकि अंग्रेज़ी सेना के 23 सैनिक मारे गए तथा 49 ज़ख्मी हुए।

कारण

अंग्रेजों द्वारा व्यापारिक सुविधाओं का दुरुपयोग एवं व्यापारिक कोठियों की किलेबंदी शुरू किये जाने के साथ ही नवाब के विरोधियों को शरण देना, नवाब को युद्ध के लिये उकसाने का प्रयास था। अंग्रेजों ने नवाब पर अलीनगर की संधि के उल्लंघन का भी आरोप लगाया।
अंग्रेजों ने सिराज के विरुद्ध मीर जाफर से गुप्त समझौता किया और षड्यंत्र कर नवाब के सेनापति रायदुर्लभ, जगत सेठ, अमीचंद व्यापारी को अपनी ओर मिला लिया। प्लासी के मैदान में वास्तव में युद्ध हुआ ही नहीं क्योंकि नवाब के सैन्य अधिकारियों ने उसके साथ विश्वासघात किया, वे मैदान में मूकदर्शक की तरह खड़े रहे। स्वाभाविक रूप से यहाँ अंग्रेजों की विजय हुई।
अंग्रेजों द्वारा नवाब पर अलीनगर की संधि के उल्लंघन का आरोप। 
अंग्रेजों का शत्रुतापूर्ण व्यवहार एवं नवाब के विरोधियों को अपने यहां शरण देना।
अंग्रेजों द्वारा व्यापारिक सुविधाओं का दुरूपयोग एवं व्यापारिक कोठियों की किलेबंदी करना। 
अंग्रेज बंगाल पर अपना राजनीतिक प्रभाव स्थापित करना चाहते थे इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु नवाब सिराजुद्दौला का
पदच्युत कर अपना मनपंसद मोहरा बंगाल की गद्दी पर बैठाना। 

गतिविधियां 

अंग्रेजों ने सिराज के विरूद्ध मीरजाफर से गुप्त समझौता किया और षड्यंत्र कर नवाब के सेनापति रायदुर्लभ, जगतसेठ, अमीचंद को अपनी और मिला लिया। प्लासी के मैदान में वास्तव में युद्ध हुआ ही नहीं क्योंकि नवाब के सैन्य अधिकारियों ने उसके साथ विश्वासघात किया और मैदान में मूकदर्शक की तरह खड़े रहे। स्वाभाविक रूप से यहां अंग्रेजों की विजय हुई।

प्लासी के युद्ध में नवाब की हार के कारण

मीर जाफर के षड्यंत्र को जानने के बाद भी उसे तथा उसके अन्य विश्वासघाती साथियों को गिरफ्तार नहीं करना।
अदूरदर्शी सिराजुद्दौला क्लाइव की कुटिल नीति और षड्यंत्र के सामने टिक नहीं सका। 
युद्ध भूमि से भागनाः उसने अपनी सेना को धैर्य बंधाया होता तो उसे सफलता प्राप्त हो सकती थी।
युद्ध में मीरमदान की मृत्यु से नवाब का हौसला पस्त हो गया। 
युद्ध के आरंभ में अपने अधीन फ्रांसीसी तोपची का इस्तेमाल सही तरीके से नहीं करना।
नवाब का व्यक्तित्व उसकी हार का प्रमुख कारण था। मीरजाफर के षड्यंत्र को जानते हुए भी नवाब ने उसे तथा उसके अन्य विश्वासघाती साथियों को गिरफ्तार नहीं किया। युद्ध के मैदान में भी वह घबराकर भाग गया। उसने अपनी सेना को धैर्य बंधाया होता तो उसे सफलता प्राप्त हो सकती थी। वह एक कुशल सेनापति नहीं था।
मीरजाफर व अन्य अधिकारियों ने उसके साथ विश्वासघात किया। 
युद्ध में मीरमदान की मृत्यु ने नवाब के हौसले पस्त कर दिये।
नवाब की सेना शीघ्रता से आगे नहीं बढ़ सकती थी। 
नवाब की तोपे बहुत भारी थीं। अतएव उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में कठिनाई हाती थी। भारतीय बन्दूकों की मारक क्षमता अच्छी नहीं थी। इसके विपरीत अंग्रेजों की तोपें हल्की थीं और बंदूकें दूर तक मार कर सकती थी। नवाब की तोपें, बन्दूकें व गोला बारूद वर्षा के कारण भीग जाने से प्रभावहीन हो गये थे। 
नवाब ने हाथियों का प्रयोग करके गलती की।
नवाब के घुडसवार अंग्रेजों द्वारा प्रशिक्षित पैदल सैनिकों के सामने निकम्मे सिद्ध हुए।  
मेजर किलपैट्रिक के अनुसार युद्ध आरम्भ होते समय नवाब के अधीन फ्रांसीसी तोपची ऊँचे स्थान से गोलाबारी करके अंग्रेजों पर दबाव डाल सकते थे किन्तु कुछ समय बाद उन्होंने यह स्थान छोड़ दिया। संभवतः बंगाली अधिकारियों के विश्वासघात के कारण उन्हें नवाब की सफलता में सन्देह होने लगा था। क्लाइव ने छल-कपट व नीति निपुणता का प्रदर्शन किया। अदूरदर्शी सिराजुद्दौला क्लाइव की कुटिल नीति और षड्यंत्र के सामने टिक नहीं सका। भारतीयों की हार का एक महत्त्वपूर्ण कारण उनकी नैतिक दुर्बलता थी। उस समय की स्थानीय राजनीति में स्वार्थ, षडयंत्र तथा विश्वासघात का बोलबाला एवं देशभक्ति का अथाव था। अतएव वे एक ऐसी कौम के सामने नहीं ठहर सकते थे जिसमें देशभक्ति कूट-कूट कर भरी हुई थी।

प्लासी के युद्ध का महत्त्व एवं परिणाम

प्लासी के परिणामों को लेकर इतिहासकारों ने कई स्थापनाएं की है। मैलेसन के अनुसार "प्लासी का युद्ध भारत के निर्णायक युद्धों में से एक था।" ताराचंद के शब्दों में "प्लासी के युद्ध से परिणामों की लबी श्रृंखला शुरू हुई जिसने भारत का रूख बदल दिया। के.एम.पणिक्कर के अनुसार "प्लासी का युद्ध एक सौदा था जिसमें बंगाल के कुछ धनी स्वार्थी लोगों ने अपना देश अंग्रेजों को बेच दिया।"
मीरजाफर को बंगाल का नवाब बनाया गया जिससे बंगाल में संरक्षित राज्य स्थापित हुआ, भारत में ब्रिटिश राज्य का निर्माण संभव हो सका। बंगाल में अंग्रेजों की सर्वोच्चता स्थापित हो गई। अंग्रेज राजा निर्माता (किंग मेकर) के रूप में स्थापित हुए। ईस्ट इंडिया कंपनी अब केवल व्यापारिक कंपनी न रहकर राजनीतिक सत्ता हो गई। अंग्रेजों को भारतीय राजनीति की दुर्बलताओं का ज्ञान हुआ। वे जान गए कि स्वार्थी, असंतुष्ट अधिकारियों एवं व्यापारियों के साथ षड्यंत्र कर अपने साम्राज्य का विस्तार कर सकते हैं। इस युद्ध ने मुगल साम्राज्य की दुर्बलता को प्रकट कर दिया। मुगल सम्राट अपने सूबेदार को एक विदेशी व्यापारिक संस्था द्वारा हटाए जाने के विरूद्ध कोई कार्यवाही नहीं कर सका। प्लासी में अंग्रेजों की एक छोटी प्रशिक्षित सेना ने एक बड़ी भारतीय सेना पर विजय प्राप्त की। इससे यह सिद्ध हो गया कि भारतीय सेना एक भीड़ है जिसे आसानी से पराजित किया जा सकता है।
मीरजाफर ने अंग्रेजों को बारूद की खानों पर एकाधिकार प्रदान किया। इससे अंग्रेजों का तोपखाना और शक्तिशाली हुआ।
प्लासी के युद्ध के पश्चात् बंगाल की वह लूट आरंभ हुई जिसने भारत के सबसे धनी प्रदेश को निर्धन बना दिया। मीरजाफर ने 3 करोड़ रूपए कंपनी के अधिकारियों को दिए एवं अगले आठ वर्षों में कंपनी ने 15 करोड़ से अधिक लाभ कमाया। कंपनी को बंगाल, बिहार, उड़ीसा में चुंगी मुक्त व्यापार का निर्विरोध अधिकार प्राप्त हुआ एवं कलकत्ता के समीप 24 परगना की जमींदारी भी प्राप्त हुई। बंगाल के संसाधनों का प्रयोग करके अंग्रेजों ने अपने प्रतिद्वन्द्वियों की शक्ति को नष्ट किया। आर्थिक दृष्टि से प्लासी युद्ध के पश्चात् एक नवीन युग का प्रारम्भ हुआ जिसमें राज्य विस्तार व्यापार के साथ जुड़ गया एवं भारत की दासता का वह युग आरंभ हुआ, जिसमें भारत का आर्थिक व नैतिक शोषण हुआ। 1757 से पहले बंगाल का 74% व्यापार ब्रिटेन से आयातित सोना-चांदी से होता था 1757 के बाद वह बंगाल के राजस्व से सामान ले जाने लगे। प्लासी के पश्चात् सोना-चांदी का निर्यात अब चीन को होने लगा फलतः बंगाल को आर्थिक क्षति हुई। षड्यंत्र द्वारा प्राप्त सफलता से उत्साहित अंग्रेजों ने अपने कुचक्रों में वृद्धि की। भारतीयों की विश्वासघाती प्रवृत्ति का लाभ उठाकर अंग्रेजों ने अपने प्रभाव का विस्तार किया।अंग्रेजों ने 'फूट डालो-राज करो' की सफलता को देखकर भविष्य में भी इसे अपनाया। प्लासी की विजय से बंगाल में अंग्रेजों की प्रधानता स्थापित हुई किन्तु प्लासी में इस बात का निर्णय नहीं हुआ कि बंगाल का वास्तविक शासक कौन है? नवाब और अंग्रेजों में इसके लिए संघर्ष होना स्वाभाविक था। अत: बक्सर के युद्ध के बीज प्लासी में बोए गए।
प्लासी का युद्ध सैन्य दृष्टिकोण से अत्यधिक निर्णायक नहीं कहा जा सकता, फिर भी इस युद्ध के राजनीतिक व आर्थिक परिणाम अधिक प्रभावी और दीर्घकालिक थे।
प्लासी की विजय ने ईस्ट इंडिया कंपनी के स्वरूप में परिवर्तन ला दिया। अब वह केवल व्यापारिक कंपनी न रहकर राजनीतिक सत्ता हो गई। अंग्रेज़ राजा निर्माता (King Maker) की भूमिका निभाने लगे। प्लासी के युद्ध का एक अतिरिक्त लाभ अंग्रेज़ों को यह हुआ कि अब उन्होंने बंगाल से अन्य विदेशी शक्तियों, यथा-डचों, फ्रांसीसियों को उखाड़ कर उनकी चुनौती समाप्त कर दी। प्लासी में अंग्रेजों की एक छोटी प्रशिक्षित सेना ने एक बडी भारतीय सेना के रहते विजय प्राप्त की। इससे यह सिद्ध हो गया कि भारतीय सेना एक भीड़ है जिसे आसानी के साथ तितर-बितर किया जा सकता है।

मीर जाफर (1757-60 ई.)
प्लासी को सफलता के बाद अंग्रेजों ने मीर जाफर को बंगाल का नवाब बना दिया। प्रशासनिक अव्यवस्था तथा राजकोष रिक्त होने के कारण, वह कंपनी की किस्तों का भुगतान नहीं कर सका। इस स्थिति में नवाब को बर्धमान (बर्दवान), नदिया, हुगली के क्षेत्रों का राजस्व कंपनी को सौंपना पड़ा। परंतु इससे अंग्रेजों की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो पा रही थी, अतः वह किसी अन्य कठपुतली नवाब को बैठाना चाह रहे थे।

मीर कासिम (1760-1763 ई.)  
मीर कासिम का मानना था कि आजादी बनाए रखने के लिये, भरा हुआ खजाना और कुशल सेना की आवश्यकता
पड़ती है।  
इसने बंगाल की सार्वजनिक अव्यवस्था को सँभाला, राजस्व प्रशासन से भ्रष्टाचार मिटाकर आय बढ़ाई और यूरोपीय तर्ज पर आधुनिक सेना तैयार की। 
सेना के आधुनिकीकरण के लिये एक जर्मन अधिकारी थाल्टर रीन हार्ड की नियुक्ति की। यह समरू के नाम से प्रसिद्ध था। 
मीर कासिम ने कंपनी को बर्दवान, मिदनापुर, चटगाँव के क्षेत्र दिये।
अंग्रेजों द्वारा दस्तकों के दुरुपयोग को रोकने के लिये नवाब ने 1762 ई. में एक क्रांतिकारी निर्णय लिया। नवाब ने आंतरिक व्यापार पर लगे सभी करों को समाप्त कर दिया, फलतः अंगेजों के विशेषाधिकार समाप्त हो गए। अब सभी भारतीय एवं विदेशी व्यापारी एक ही स्तर पर आ गए जो कि कंपनी को एकदम अस्वीकार्य था। परिणामस्वरूप अंग्रेजों ने मीर कासिम के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। अवध के नवाब शुजाउद्दौला से मीर कासिम ने शरण मांगी। वहाँ उस समय मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय भी शरणार्थी के रूप में जीवन व्यतीत कर रहा था। इन तीनों ने संयुक्त होकर अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी जिसे बक्सर का युद्ध के नाम से जाना जाता है। बक्सर नामक स्थान वर्तमान बिहार राज्य में स्थित है।

1760 ई. की क्रांति 
मीर जाफर के द्वारा जब कंपनी के हितों की पूर्ति होना समाप्त हो गई, तब कंपनी ने 1760 ई. में मीर जाफर पर डचों से संबंध का आरोप लगाकर अपदस्थ कर दिया और मीर कासिम को बंगाल का नया नवाब बना दिया। मीर कासिम को बंगाल का नया नवाब बनाए जाने की घटना को वेंसिटार्ट ने क्रांति की संज्ञा दी।
इस बदलाव को 1760 ई. की रक्तहीन क्रांति का नाम दिया गया। किंतु इसे क्रांति कहना उचित नहीं है क्योंकि 
इसमें बंगाल की जनता की कोई भूमिका नहीं थी। राजनीतिक क्षेत्र में कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन नहीं हुआ।

निष्कर्ष

इस युद्ध के पश्चात् बंगाल में वह लूट आरंभ हुई जिसने भारत के सबसे धनी प्रदेश को निर्धन बना दिया। बंगाल के संसाधनों का प्रयोग करके अंग्रेजों ने अपने प्रतिद्वंद्वियों की शक्ति को नष्ट किया। इसके अतिरिक्त अभी तक अंग्रेजों को भारत से व्यापार हेतु सोना, चांदी इंग्लैंड से मंगवाना पड़ता था किंतु अब वह बंगाल से प्राप्त धन का ही उपयोग कर भारत से वस्तुएँ क्रय कर निर्यात करने लगे। इस युद्ध का एक अति महत्त्वपूर्ण परिणाम यह रहा कि अंग्रेजों को भारतीय मानसिकता व कमजोरी का पता चल गया जिससे उन्होंने फूट डालो व राज करो की नीति का अपने पूरे शासनकाल में प्रयोग कर संपूर्ण भारतवर्ष पर अधिकार कर लिया।

प्लासी का युद्ध (NCERT) से समझते हैं

1756 में अली वर्दी खान की मृत्यु के बाद सिराजुद्दौला बंगाल के नवाब बने। कंपनी को सिराजुद्दौला की ताकत से काफी भय था। सिराजुद्दौला की जगह कंपनी एक ऐसा कठपुतली नवाब चाहती थी जो उसे व्यापारिक रियायतें और अन्य सुविधाएँ आसानी से देने में आनाकानी न करे। कंपनी ने प्रयास किया कि सिराजुद्दौला के प्रतिद्वंद्वियों में से किसी को नवाब बना दिया जाए। कंपनी को कामयाबी नहीं मिली। जवाब में सिराजुद्दौला ने हुक्म दिया कि कंपनी उनके राज्य के राजनीतिक मामलों में टाँग अडाना बंद कर दे, किलेबंदी रोके और बाकायदा राजस्व चुकाए। जब दोनों पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं हुए तो अपने 30,000 सिपाहियों के साथ नवाब ने कासिम बाज़ार में स्थित इंग्लिश फैक्टरी पर हमला बोल दिया। नवाब की फौजों ने कंपनी के अफसरों को गिरफ्तार कर लिया, गोदाम पर ताला डाल दिया, अंग्रेजों के हथियार छीन लिए और अंग्रेज़ जहाज़ों को घेरे में ले लिया। इसके बाद नवाब ने कंपनी के कलकत्ता स्थित किले पर कब्जे के लिए उधर का रुख किया।

क्या आप जानते थे?

क्या आप जानते थे कि प्लासी का यह नाम किस तरह पडा? दरअसल असली नाम पलाशी था जिसे अंग्रेज़ों ने बिगाड़ कर प्लासी कर दिया था। इस जगह को पलाशी यहाँ पाए जाने वाले पलाश के फलों के कारण कहा जाता था। पलाश के खूबसूरत लाल फूलों से गुलाल बनाया जाता है जिसका होली पर इस्तेमाल होता है।


कलकत्ता के हाथ से निकल जाने की खबर सुनने पर मद्रास में तैनात कंपनी के अफसरों ने भी रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में सेनाओं को रवाना कर दिया। इस सेना को नौसैनिक बेड़े की मदद भी मिल रही थी। इसके बाद नवाब के साथ लंबे समय तक सौदेबाजी चली। आखिरकार 1757 में रॉबर्ट क्लाइव ने प्लासी के मैदान में सिराजुद्दौला के ख़िलाफ़ कंपनी की सेना का नेतृत्व किया। नवाब सिराजुद्दौला की हार का एक बड़ा कारण उसके सेनापतियों में से एक सेनापति मीर जाफ़र की कारगुजारियाँ भी थीं। मीर जाफ़र की टुकड़ियों ने इस युद्ध में हिस्सा नहीं लिया। रॉबर्ट क्लाइव ने यह कहकर उसे अपने साथ मिला लिया था कि सिराजुद्दौला को हटा कर मीर जाफ़र को नवाब बना दिया जाएगा। plasi ka yuddh
प्लासी की जंग इसलिए महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि भारत में यह कंपनी की पहली बड़ी जीत थी।
प्लासी की जंग के बाद सिराजुद्दौला को मार दिया गया और मीर जाफर नवाब बना। कंपनी अभी भी शासन की जिम्मेदारी संभालने को तैयार नहीं थी। उसका मूल उद्देश्य तो व्यापार को फैलाना था। अगर यह काम स्थानीय शासकों की मदद से बिना लड़ाई लड़े ही किया जा सकता था तो किसी राज्य को सीधे अपने कब्जे में लेने की क्या जरूरत थी।
जल्दी ही कंपनी को एहसास होने लगा कि यह रास्ता भी आसान नहीं है। कठपुतली नवाब भी हमेशा कंपनी के इशारों पर नहीं चलते थे।
आखिरकार उन्हें भी तो अपनी प्रजा की नजर में सम्मान और संप्रभुता का दिखावा करना पड़ता था।
तो फिर कंपनी क्या करती? जब मीर जाफ़र ने कंपनी का विरोध किया तो कंपनी ने उसे हटाकर मीर कासिम को नवाब बना दिया। जब मीर कासिम परेशान करने लगा तो बक्सर की लड़ाई (1764) में उसको भी हराना पड़ा। उसे बंगाल से बाहर कर दिया गया और मीर जाफर को दोबारा नवाब बनाया गया। अब नवाब को हर महीने पाँच लाख रुपए कंपनी को चुकाने थे। कंपनी अपने सैनिक खों से निपटने, व्यापारिक जरूरतों तथा अन्य खर्चों को पूरा करने के लिए और पैसा चाहती थी। कंपनी और ज्यादा इलाके तथा और ज्यादा कमाई चाहती थी। 1765 में जब मीर जाफ़र की मृत्यु हुई तब तक कंपनी के इरादे बदल चुके थे। कठपुतली नवाबों के साथ अपने खराब अनुभवों को देखते हुए क्लाइव ने ऐलान किया कि अब "हमें खुद ही नवाब बनना पड़ेगा।"
आखिरकार 1765 में मुगल सम्राट ने कंपनी को ही बंगाल प्रांत का दीवान नियुक्त कर दिया। दीवानी मिलने के कारण कंपनी को बंगाल के विशाल राजस्व संसाधनों पर नियंत्रण मिल गया था। इस तरह कंपनी की एक पुरानी समस्या हल हो गयी थी। अठारहवीं सदी की शुरुआत से ही भारत के साथ उसका व्यापार बढ़ता जा रहा था। लेकिन उसे भारत में ज्यादातर चीजें ब्रिटेन से लाए गए सोने और चाँदी के बदले में खरीदनी पड़ती थीं। इसकी । वजह ये थी कि उस समय ब्रिटेन के पास भारत में बेचने के लिए कोई चीज़ नहीं थी। प्लासी की जंग के बाद ब्रिटेन से सोने की निकासी कम होने लगी और बंगाल की दीवानी मिलने के बाद तो ब्रिटेन से सोना लाने की जरूरत ही नहीं रही। अब भारत से होने वाली आमदनी के सहारे ही कंपनी अपने खर्चे चला सकती थी। इस कमाई से कंपनी भारत में सूती और रेशमी कपड़ा खरीद सकती थी, अपनी फौजों को संभाल सकती थी और कलकत्ते में किलों और दफ्तरों के निर्माण की लागत उठा सकती थी।

प्लासी के युद्ध का महत्त्व
प्लासी के युद्ध का सामरिक महत्त्व कुछ नहीं था। यह एक छोटी सी झड़प थी जिसमें कम्पनी के कुल 65 व्यक्ति तथा नवाब के 500 व्यक्ति काम आये। अंग्रेजों ने किसी विशेष सामरिक योग्यता तथा चातुर्य का प्रदर्शन नहीं किया। नवाब के साथियों ने विश्वासघात किया। मीर मदान के वीर गति प्राप्त करने के पश्चात् विश्वासघातियों का ही बोलबाला था। यदि मीर जाफर तथा राय दुलर्भ राजभक्त रहते तो युद्ध का परिणाम भिन्न होता।
सम्भवतः कूटनीति में क्लाइव दक्ष था। उसने जगत सेठ को भय दिखाया, मीर जाफर की महत्त्वकांक्षाओं को जगाया तथा बिना लड़े ही युद्ध जीत लिया। के.एम. पन्निकर के अनुसार यह एक सौदा था जिसमें बंगाल के धनी सेठों तथा मीर जाफर ने नवाब को अंग्रेजों के हाथ बेच डाला।
प्लासी का युद्ध उसके पश्चात् होने वाली घटनाओं के कारण ही महत्त्वपूर्ण है। बंगाल अंग्रेजों के अधीन हो गया और फिर स्वतंत्र नहीं हो सका। नया नवाब मीर जाफर अपनी रक्षा तथा पद के लिए अंग्रेजों पर निर्भर था। उनकी 6000 सेना उसकी रक्षा के हेतु बंगाल में स्थित थी। शनैः शनैः समस्त शक्ति कम्पनी के हाथों में चली गई। उसकी असमर्थता का अनुमान इस बात से लगा सकते हैं कि वह दीवान राय दुर्लभ तथा राम नारायण को उनके विश्वासघात के लिए दण्डित करना चाहता था परन्तु कम्पनी ने उसे रोक दिया। अंग्रेज रेजिडेंट वाट्स का विशेष प्रभाव था। मुसलमान इतिहासकार गुलाम हुसैन लिखता है कि पदोन्नति के लिए केवल अंग्रेज का समर्थन आवश्यक था। शीघ्र ही मीर जाफर अंग्रेजों के जुए से दुःखी हो गया। वह डच लोगों से मिलकर अंग्रेजों को बाहर निकालने का षड्यंत्र रचने लगा। क्लाइव ने इस षड्यंत्र को नवम्बर 1759 में लड़े, बेदारा के युद्ध में डच लोगों को परास्त कर विफल कर दिया। जब मीर जाफर ने भावी घटनाओं को समझने से इन्कार कर दिया तो उसे 1760 में कम्पनी के मनोनीत व्यक्ति मीर कासिम के लिए स्थान छोड़ना पड़ा। प्लासी के युद्ध तथा उसके पश्चात् होने वाली लूट ने (क्योंकि उसके पश्चात् होने वाले व्यापार को हम केवल लूट की संज्ञा ही दे सकते हैं) अंग्रेजों को अनन्त साधनों का स्वामी बना दिया। पहली किस्त जो अंग्रेजों को मिली वह 8 लाख पौड की थी जो चांदी के सिक्कों के रूप में ही थी। मैकॉले के अनुसार यह धन कलकत्ता को एक सौ से अधि क नावों में भर कर लाया गया। बंगस उस समय भारत का सबसे धनाढ्य प्रान्त था और उद्योग तथा व्यापार में सबसे आगे था। 1767 में वेरेल्स्ट लिखता है कि बंगाल समस्त भारत का व्यापार केन्द्र है जहाँ सारा धन खिंचा चला आता है। यहाँ की बनी वस्तुएँ भारत के दूरस्थ प्रदेशों में बिकती हैं। बंगाल के इस अनन्त धन की सहायता से ही अंग्रेजों ने दक्कन विजय कर लिया तथा उत्तरी भारत को भी प्रभाव में ले आए। कम्पनी की स्थिति का भी कायाकल्प हो गया। पहले वह बहुत सी विदेशी कम्पनियों में से एक थी जिसे नवाब के अधिकारियों को धन देना पड़ता था। plasi ka yuddh
अब उसका बंगाल के व्यापार पर एकाधिकार हो गया। फ्रांस को पुनः अपनी खोई हुई स्थिति को प्राप्त करने का अवसर नहीं मिला। डचों ने 1759 में एक प्रयत्न किया तथा मुंह की खाई। अंग्रेज व्यापार के एकाधिकार से राजनैतिक एकाधिकार की ओर बढ़े। भारत के भाग्य पर प्लासी के युद्ध का अत्यधिक प्रभाव पड़ा। मालेसन के अनुसार सम्भवतः इतिहास मे इतना प्रभावित करने वाला युद्ध नहीं लड़ा गया। यह अतिशयोक्ति है जब वह आगे चलकर यह कहते हैं कि इस युद्ध के कारण इंग्लैण्ड मुस्लिम संसार की सबसे बड़ी शक्ति बन गया। प्लासी के युद्ध के कारण ही इंग्लैण्ड पूर्वी समस्या में विशेष भूमिका निभाने लगा। इसी के कारण उसे मॉरीशस तथा आशा अन्तरीप को विजय करने तथा उन्हें अपना उपनिवेश बनाने पर बाध्य होना पड़ा तथा मिस्र को अपने संरक्षण में लेना पड़ा। परन्तु निश्चय ही भारत पर अधिकार प्राप्त करने की श्रृंखला में यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कड़ी थी।

कंपनी के अफसर 'नबॉब' बन बैठे
नवाब बनने का क्या मतलब था? इसका एक मतलब तो यही था कि कंपनी के पास अब सत्ता और ताकत थी। लेकिन इसके कुछ और फायदे भी थे। कंपनी का हर कर्मचारी नवाबों की तरह जीने के ख्वाब देखने लगा था।
प्लासी के युद्ध के बाद बंगाल के असली नवाबों को इस बात के लिए बाध्य कर दिया गया कि वे कंपनी के अफसरों को निजी तोहफे के तौर पर जमीन और बहुत सारा पैसा दें। खुद रॉबर्ट क्लाइव ने ही भारत में बेहिसाब दौलत जमा कर ली थी। 1743 में जब वह इंग्लैंड से मद्रास (अब चैन्नई) आया था तो उसकी उम्र 18 साल थी। 1767 में जब वह दो बार गवर्नर 401,102 पौंड के बराबर थी। दिलचस्प बात यह है कि गवर्नर के अपने दूसरे कार्यकाल में उसे कंपनी के भीतर फैले भ्रष्टाचार को खत्म करने का काम सौंपा गया था। लेकिन 1772 में ब्रिटिश संसद में उसे खुद भ्रष्टाचार के आरोपों पर अपनी सफ़ाई देनी पड़ी। सरकार को उसकी अकूत संपत्ति के स्रोत संदेहास्पद लग रहे थे। उसे भ्रष्टाचार आरोपों से बरी तो कर दिया गया लेकिन 1774 में उसने आत्महत्या कर ली।

क्लाइव खुद को कैसे देखता था?

संसद की एक समिति के सामने सुनवाई के दौरान क्लाइव ने - कहा था कि प्लासी की लड़ाई के बाद उसने ज़बरदस्त संयम का परिचय दिया। आइए देखें उसने क्या कहा:

उस स्थिति की कल्पना कीजिए जहाँ प्लासी की जीत ने मुझे ला खड़ा कर दिया था! एक ताकतवर राजा मेरे इशारों पर चल रहा था; एक संपन्न शहर मेरी दया पर था। उसके सबसे दौलतमंद महाजन मेरी एक-एक मुस्कुराहट के लिए एक-दूसरे की गिरेबान खींच रहे थे। मैं ऐसे खज़ानों के बीच से गुज़र रहा था जो सिर्फ मेरे लिए खुले हुए थे, एक तरफ सोना और दूसरी तरफ जवाहरात थे! अध्यक्ष महोदय, मैं अपने इस संयम को देखकर खुद हैरान हूँ।


कंपनी के सभी अफ़सर क्लाइव की तरह दौलत इकट्ठा नहीं कर पाए। बहुत सारी बीमारियों और लड़ाई के कारण कम उम्र में ही मौत का निवाला बन गए। इसके अलावा उन सभी को भ्रष्ट और बेईमान मानना भी सही नहीं होगा। उनमें से बहुत सारे अफ़सर साधारण परिवारों से आए थे। उनकी सबसे बड़ी इच्छा बस यही थी कि वे भारत में ठीक-ठाक पैसा कमाएँ और ब्रिटेन लौटकर आराम की जिंदगी बसर करें। जो जीते जी धन-दौलत लेकर वापस लौट गए उन्होंने वहाँ आलीशान जीवन जिया। उन्हें वहाँ के लोग “नबॉब". कहते थे। यह भारतीय शब्द 'नवाब' का ही अंग्रेजी संस्करण बन गया था। उन्हें लोग अकसर नए अमीरों और सामाजिक हैसियत में रातों-रात ऊपर आने वाले लोगों के रूप में देखते थे। नाटकों और कार्टनों में उनका मजाक उड़ाया जाता था।

मीर जाफर एवं मीर कासिम

मीरजाफर (1757-1760 ) : 30 जून, 1757 ई. को क्लाइव ने मुर्शिदाबाद में मीरजाफर को बंगाल के नवाब के पद पर आसीन कराया। इसी समय से बंगाल में कंपनी ने नृप निर्माता की भूमिका की शुरुआत की। बंगाल की नवाबी प्राप्त करने के उपलक्ष्य में मीर जाफर ने कंपनी को '24 परगना' की जमींदारी पुरस्कार के रूप में दिया। मीरजाफर ने अंग्रेजों को उनकी सेवा के बदले ढेर सारा पुरस्कार दिया। क्लाइव को उसने 2 लाख 34 हजार पौण्ड की व्यक्तिगत भेंट, 50 लाख रुपया सेना तथा नाविकों को पुरस्कार के रूप में तथा बंगाल की सभी फ्रांसीसी बस्तियों को जाफर ने अंग्रेजों को सौंप दिया। मीर जाफर एक दुर्बल, दुविधाग्रस्त और राजनीतिक एवं प्रशासनिक अक्षमताओं से युक्त व्यक्ति था जिसके कारण शीघ्र ही उसके शक्तिशाली हिन्दू सहयोगी राजा रामनारायण (बिहार) और दीवान दुर्लभराय उसके विरोधी बन गये। मीरजाफर के बारे में कहा जाता है कि उसने अंग्रेजों को इतना अधिक धन दिया कि उसे अपने महल के सोने-चाँदी के बर्तन भी बेचने पड़े। कर्नल मेलसेन के अनुसार “कंपनी के अधिकारियों का यह उद्देश्य था कि जितना हो सके उतना हड़प लो, मीरजाफर को एक सोने की बोरी के रूप में इस्तेमाल करो और जब भी इच्छा हो उसमें हाथ डालो।" कालांतर में मीरजाफर के अंग्रेजों से सम्बन्ध अच्छे नहीं हरे क्योंकि नवाब के प्रशासनिक कार्यों में अंग्रेजों का हस्तक्षेप अधिक बढ़ गया. साथ ही मीरजाफर डचों के साथ अंग्रेजों के विरुद्ध षड्यंत्र करने लगा। अंग्रेजी सरकार के खर्च में दिन प्रतिदिन हो रही बेतहासा वृद्धि और उसे वहन न कर पाने के कारण मौरजाफर ने अक्टूबर, 1760 ई. में अपने दामाद मीरकासिम के पक्ष में सिंहासन त्याग दिया। मुर्शिदाबाद में मीरजाफर को 'कर्नल क्लाइव का गीदड़' कहा जाता था। मीरजाफर के शासन काल में ही अंग्रेजों ने 'बांटो और राज करो' की नीति को जन्म देते हुए एक गुट को दूसरे गुट से लड़ाने की शुरुआत की। क्लाइव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु मीरजाफर ने तत्कालीन मुगल बादशाह आलमगीर द्वितीय से क्लाइव को उमरा की उपाधि और 24 परगना की जमींदारी प्रदान करवायी। 24 परगना की जागौर को 'क्लाइव की जागीर' के नाम से जाना जाता था। plasi ka yuddh

मीरकासिम (1760-1765) : मौरकासिम अलीवर्दी के उत्तराधिकारियों में सर्वाधिक योग्य था। राज्यारोहण के तत्काल बाद उसे मुगल सम्राट शाहआलम द्वारा बिहार पर (1760-61) आक्रमण का सामना करना पड़ा, कंपनी की सेना ने सम्राट को पराजित कर उसकी स्थिति को दयनीय बना दिया। नवाबी पाने के बाद कासिम ने बेंसिटार्ट को 5 लाख, हॉलवेल को 2 लाख, 70 हजार और कर्नल केलॉड को 4 लाख रुपये उपहार स्वरूप दिया। कंपनी तथा उसके अधि कारियों को भरपूर मात्रा में धन देकर मीरकासिम अंग्रेजों के हस्तक्षेप से बचने के लिए शीघ्र ही अपनी राज मुर्शिदाबाद से मुंगेर हस्तांतरित कर लिया। मीरकासिम ने राजस्व प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म करने एवं आमदनी बढ़ाने हेतु कई उपाय अपनाये जिसमें प्रमुख हैं- अधिक धन वालों का धन जब्त करना, सरकारी खर्च में कटौती, कर्मचारियों की छंटनी, नये जमींदारों से बकाया धन की वसूली आदि। मीरकासिम ने बिहार के नायब सूबेदार रामनारायण को उसके पद से बर्खास्त कर उसकी हत्या करवा दी क्योंकि वह बिहार के आय और व्यय का ब्यौरा देने के लिए तैयार नहीं था। सैन्य व्यवस्था में सुधार करने के उद्देश्य से मीरकासिम ने अपने सैनिकों की संख्या में वृद्धि की, साथ ही उन्हें यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित किया। इसने अपनी सेना को गुर्गिन खां नामक आर्मेनियाई के नियंत्रण में रखा। मुंगेर में मीरकासिम ने तोपों तथा तोड़ेदार बंदूकों के निर्माण हेतु कारखाने की स्थापना की।
1717 में मुगल बादशाह द्वारा प्रदत्त व्यापारिक फरमान का इस समय बंगाल में दुरुपयोग देखकर नवाब मीरकासिम ने आंतरिक व्यापार पर सभी प्रकार के शुल्कों की वसूली बंद करवा दी। 1762 में मीरकासिम द्वारा समाप्त की गई व्यापारिक चुंगी और कर का लाभ अब भारतीयों को भी मिलने लगा, पहले यह लाभ 1717 के फरमान द्वारा केवल कंपनी को मिलता था, कंपनी ने चुनाव के इस निर्णय को अपने विशेषाधि कार की अवहेलना के रूप में लिया। परिणामस्वरूप संघर्ष की शुरुआत हुई।
1763 जुलाई में मीरकासिम को कंपनी ने बर्खास्त कर मीरजाफर को पुनः बंगाल का नवाब बनाया। 19 जुलाई, 1763 को मौरकासिम और एडम्स के नेतृत्व में करवा नामक स्थान पर 'करवा का युद्ध' हुआ जिसमें नवाब (अपदस्थ) पराजित हुआ। करवा के युद्ध के बाद और बक्सर के युद्ध से पूर्व मीरकासिम को अंग्रेजों ने तीन बार पराजित किया. परिणामस्वरूप कासिम ने मुंगेर छोड़कर पटना में शरण ली। 1763 में हुए पटना हत्याकाण्ड, जिसमें कई अंग्रेज मारे गये. से मीरकासिम प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा था। अंग्रेजों द्वारा बार-बार पराजित होने के कारण मौरकासिम ने एक सैनिक गठबंधन बनाने की दिशा में प्रयास किया। कालांतर में मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मीरकासिम ने मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध एक सैन्य गठबंधन का निर्माण किया।

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