अनुवाद की परिभाषा देते हुए अनुवाद का स्वरुप स्पष्ट कीजिये। | anuvad ki paribhasha dete hue anuvad ka swaroop spasht kijiye

अनुवाद की परिभाषा देते हुए अनुवाद का स्वरुप स्पष्ट कीजिये। 

अनुवाद की परिभाषा

भर्तृहरि ने अनुवाद का अर्थ 'दोहराना' या पुनर्कथन' लिया है। अर्थात् जो बात कही जा चुकी है उसे उसी भाषा में या दूसरी भाषा में व्यक्त करना या दुहरा देना, अनुवाद है । कुछ शब्दों के हेर फेर के साथ आज सारा पश्चिमी जगत भी इसी परिभाषा के आधार पर अनुवाद कार्य को स्वीकार कर रहा है।
भारत में वैदिक भाषा के बाद जो परिवर्तन आया, वह ज्ञान फिर एक बार लोगों तक पहुँचाने हेतु उसकी टीका, अर्थ, भाषा व्याख्या आदि कार्य किया गया। संसार में यह अनुवाद का सर्वप्रथम रूप और प्रयोग है।
वही हाल पश्चिम में बाइबल को लेकर हुआ। मूल भाषा हिब्रू कालक्रम में अनुपयुक्त हो गई तो बाइबल को प्रचलित ग्रीक, फिर अंग्रेजी में उतारना पड़ा। आज तक यह अंतरण चल रहा है । इसलिए नहीं कि यह काम अधूरा रहा या अप्रामाणिक था । वरन विद्वानों एवं बाइबिल के अध्येताओं ने सूक्ष्म से सूक्ष्मतर स्तर पर उतरकर उसको गहराई से प्रस्तुत किया। हिंदी में यह कार्य प्रमुखत: फादर कामिल बुल्के ने किया जो भारत में सर्वाधिक प्रचलित एवं आदरणीय माना जाता है । वैदिक एवं उपनिषदिक व्याख्या की लंबी परंपरा है । यास्क, शंकराचार्य आदि की लंबी परंपरा है।
आधुनिक अनुवाद शास्त्र के पश्चिमी आलोचकों में नाइडा खूब प्रचलित हैं -
"Translating consists in to reducing one language the closest natural equivalent to the message of the source language first in meaning and secondly in style.

नाइडा ने अर्थ और शैली दोनों को ध्यान में रखने की बात कही है । मूल भाषा को लक्ष्य भाषा में अर्थ और शैली दोनों दृष्टि से समतुल्य होना चाहिए। नाइडा अनुवाद की भावात्मक दृष्टि की उपेक्षा नहीं करते *।
उसी प्रकार कैटफोर्ड ने कहा -
"Replacement of textual material in one lenguage by equivalent textual materinl in another language."
यहाँ सिर्फ शब्दों का अंतर है । लगभग एक ही बात दोनों कहते हैं ।
न्यूमार्क टेक्सट की बजाय संदेश की चर्चा करता है । एक भाषा का संदेश दूसरी भाषा में प्रस्तुत करते हैं।
अर्थात् तीनों विद्वानों ने कहा -अनुवाद में स्रोत भाषा (Source language) की सामग्री को लक्ष्य भाषा (Target language) में प्रस्तुत करना है ।
अब यहाँ देखते हैं कि मूल पाठ में भाषा और विषय दोनों हैं । भाषा में उसकी शैली, शब्दों का स्तर आदि आते हैं । सामग्री में विषय वस्तु और भाव, सौन्दर्य, कलात्मक विशेषता आदि होते हैं।
अनुवादक भाषा के सारे वैभव को देखता है और विषय की व्यापकता हृदयंगम करता है । इसे लेकर लक्ष्य भाषा में एक नये पाठ में उस मूल सामग्री को तैयार करता है । सजाता -संवारता है । यही अनुवाद कार्य है । भाषा के भाव के अलावा वह विषय को संप्रेषित करने पर पूरा ध्यान केंद्रित करता है । एक भाषा से दूसरी भाषा में समझाना यह अनुवाद का मूल लक्ष्य है। चाहे साहित्यिक हो अथवा कर्यालयीन अथवा वैज्ञानिक अनुवाद, सर्वत्र विषय ही प्रमुख होता है ।
दूसरे शब्दों में कहते हैं - अनुवादक अपने प्रयास में शब्दावरण भेद कर उस पाठ के सूक्ष्म भाव तक पहुँच कर अपनी भाषा में व्यक्त करता है । वह मूल के भाषागत आवरण का मोह छोड़ कर लक्ष्य में एक आवरण प्रस्तुत करता है। यहीं पर लक्ष्य में उसकी मौलिकता प्रकट होती है। उसमें सृजनात्मकता दिखती है। अब मूल छोड़ दे, अनूदित कृति की ओर गौर करें - टुकड़े-टुकड़े, शब्द, वाक्य, मुहावरे आदि, जोड़ कर बनाई गई कोई वस्तु नहीं, एक स्वयं संपूर्ण साहित्यिक कृति दिख रही है । स्वाभाविक एवं सहज सृजन लग रहा है। यही अनुवाद है।'

अनुवाद का स्वरूप

अनुवाद के स्वरूप के सन्दर्भ में विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वज्जन अनुवाद की प्रकृति को ही अनुवाद का स्वरूप मानते हैं, जब कि कुछ भाषाविज्ञानी अनुवाद के प्रकार को ही उसके स्वरूप के अन्तर्गत स्वीकारते हैं। इस सम्बन्ध में डॉ. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव का मत ग्रहणीय है। उन्होंने अनुवाद के स्वरूप को सीमित और व्यापक के आधार पर दो वर्गों में बाँटा है। इसी आधार पर अनुवाद के सीमित स्वरूप और व्यापक स्वरूप की चर्चा की जा रही है।

अनुवाद का सीमित स्वरूप
अनुवाद के स्वरूप को दो संदर्भो में बाँटा जा सकता है
  1. अनुवाद का सीमित स्वरूप तथा
  2. अनुवाद का व्यापक स्वरूप
अनुवाद की साधारण परिभाषा के अंतर्गत पूर्व में कहा गया है कि अनुवाद में एक भाषा के निहित अर्थ को दूसरी भाषा में परिवर्तित किया जाता है और यही अनुवाद का सीमित स्वरूप है। सीमित स्वरूप (भाषांतरण संदर्भ) में अनुवाद को दो भाषाओं के मध्य होने वाला 'अर्थ' का अंतरण माना जाता है।
इस सीमित स्वरूप में अनुवाद के दो आयाम होते हैं
  1. पाठधर्मी आयाम तथा
  2. प्रभावधर्मी आयाम
पाठधर्मी आयाम के अंतर्गत अनुवाद में स्रोत–भाषा पाठ केंद्र में रहता है जो तकनीकी एवं सूचना प्रधान सामग्रियों पर लागू होता है। जबकि
प्रभावधर्मी अनुवाद में स्रोत-भाषा पाठ की संरचना तथा बुनावट की अपेक्षा उस प्रभाव को पकड़ने की कोशिश की जाती है जो स्रोत-भाषा के पाठकों पर पड़ा है। इस प्रकार का अनुवाद सृजनात्मक साहित्य और विशेषकर कविता के अनुवाद में लागू होता है।

अनुवाद का व्यापक स्वरूप
अनुवाद के व्यापक स्वरूप (प्रतीकांतरण संदर्भ) में अनुवाद को दो भिन्न प्रतीक व्यवस्थाओं के मध्य होने वाला 'अर्थ' का अंतरण माना जाता है। ये प्रतीकांतरण तीन वर्गों में बाँटे गए हैं-
  1. अंतःभाषिक अनुवाद (अन्वयांतर)
  2. अंतर भाषिक (भाषांतर),
  3. अंतर प्रतीकात्मक अनुवाद (प्रतीकांतर)
'अंतःभाषिक' का अर्थ है एक ही भाषा के अंतर्गत। अर्थात् अंतःभाषिक अनुवाद में हम एक भाषा के दो भिन्न प्रतीकों के मध्य अनुवाद करते हैं। उदाहरणार्थ, हिन्दी की किसी कविता का अनुवाद हिन्दी गद्य में करते हैं या हिन्दी की किसी कहानी को हिन्दी कविता में बदलते हैं तो उसे अंतःभाषिक अनुवाद कहा जाएगा। इसके विपरीत अंतर भाषिक अनुवाद में हम दो भिन्न-भिन्न भाषाओं के भिन्न-भिन्न प्रतीकों के बीच अनुवाद करते हैं।
अंतर भाषिक अनुवाद में अनुवाद को न केवल स्रोत-भाषा में लक्ष्य-भाषा की संरचनाओं, उनकी प्रकृतियों से परिचित होना होता है, वरन् उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराओं, धार्मिक विश्वासों, मान्यताओं आदि की सम्यक् जानकारी भी उसके लिए बहुत जरूरी है। अन्यथा वह अनुवाद के साथ न्याय नहीं कर पाएगा।
अंतर प्रतीकात्मक अनुवाद में किसी भाषा की प्रतीक व्यवस्था से किसी अन्य भाषेत्तर प्रतीक व्यवस्था में अनुवाद किया जाता है। अंतर प्रतीकात्मक अनुवाद में प्रतीक-1 का संबंध तो भाषा से ही होता है, जबकि प्रतीक-2 का संबंध किसी दृश्य माध्यम से होता है। उदाहरण के लिए अमृता प्रीतम के 'पिंजर' उपन्यास को हिन्दी फिल्म 'पिंजर' में बदला जाना अंतर-प्रतीकात्मक अनुवाद है।
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