भाषा किसे कहते हैं? अर्थ, परिभाषा | Bhasha Kise Kahate Hain

भाषा किसे कहते हैं?

भाषा मानव जाति को मिला एक ऐसा वरदान है जिसके बिना मानव सभ्यता का विकास नहीं हो सकता। भाषा हमारे विचारों, भावों, संस्कारों, रीति-रिवाजों, प्रार्थना और ध्यान, सपनों में, संबंधों और संचार में सभी जगह विद्यमान है। संचार-साधन और ज्ञान-भंडार होने के बावजूद यह चिंतन-मनन का साधन है और प्रसन्नता का स्रोत है भाषा अतिरिक्त ऊर्जा बिखेरती है, दूसरों में जोश पैदा करती है। एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति अथवा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को ज्ञान का अंतरण करती है।
Bhasha-Kise-Kahate-Hain
भाषा मानव संबंधों को जोड़ती भी है और तोड़ती है। भाषा के बिना मनुष्य मात्र एक मूक प्राणी रह जाता है। इससे हम अपनी बात और मंतव्य का संप्रेषण दूसरों तक कर पाते हैं और इसी कारण हम अन्य प्राणियों से अलग हो जाते हैं। भाषा सर्वव्यापी है, किंतु कई बार यह न केवल भाषाविदों के लिए गंभीर वस्तु होती है, वरन् दार्शनिकों, तर्कशास्त्रियों, मनोविज्ञानियों, विज्ञानियों, साहित्यिक आलोचकों आदि के लिए भी होती है। वस्तुतः भाषा एक बहुत ही जटिल मानव वस्तु है, इसलिए यह जानना आवश्यक है कि भाषा क्या है और इसका स्वरूप और प्रकृति क्या है। इसी के साथ हिन्दी भाषा के स्वरूप और इसके विकास के परिप्रेक्ष्य के बारे में जानकारी होना भी आवश्यक है।

भाषा का अर्थ और परिभाषा

किसी भी वस्तु की परिभाषा उस वस्तु की अपनी प्रकृति और उसके अपने प्रयोजन पर आधारित होती है। भाषा की परिभाषा पर विचार करते हुए यह बात ध्यान में रखना आवश्यक है कि भाषा केवल अपनी संरचना और प्रकृति में जटिल नहीं होती, वरन् अपने प्रयोजन में भी बहुमुखी होती है। यदि वह हमारी चिंतन प्रक्रिया का आधार है तो हमारी संप्रेषण प्रक्रिया का साधन भी है।
इससे हमारे मानसिक व्यापार के साथ-साथ हमारा सामाजिक व्यापार भी होता है। इसी प्रकार संरचना के स्तर पर जहाँ भाषा अपनी विभिन्न इकाइयों का संश्लिष्ट रूप ग्रहण करती है, वहाँ वह उन सामाजिक स्थितियों से भी संबंध स्थापित करती है, जिनमें वह प्रयक्त होती है। इसी कारण विभिन्न विद्वानों ने इसे विभिन्न रूपों में देखने और परिभाषित करने का प्रयास किया है। भाषा की संकल्पना और उसके स्वरूप को स्पष्ट करते हुए कई विद्वानों ने अपनी परिभाषाएँ दी हैं; किंतु प्रकार्य की दृष्टि से कोई सर्वमान्य और पर्याप्त सिद्ध परिभाषा की रचना नहीं हो पाई है। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं :
  • हेनरी स्वीट ने 'ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा विचारों के प्रकटीकरण' को भाषा कहा है।
बाबूराम सक्सेना के मतानुसार 'जिन ध्वनि-चिह्नों द्वारा मनुष्य परस्पर विचार-विनिमय करता है, उसके समष्टि रूप को भाषा कहते हैं। बेंद्रे का कथन है कि 'भाषा मनुष्यों के बीच संचार-व्यवहार के माध्यम के रूप में एक प्रतीक व्यवस्था हैं।' इन परिभाषाओं से भाषा को ध्वनि के साथ जोड़ा गया है और उसमें भाषा को एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में माना गया है। विद्वान-द्वय ब्लाक एवं ट्रेगर की परिभाषा काफी सीमा तक सार्थक और अधिक मान्य मानी गई है। उनके अनुसार 'भाषा यादृच्छिक ध्वनि-प्रतीकों की व्यवस्था है जिसके द्वारा समाज अपने विचार का आदान-प्रदान करता है। इस परिभाषा में ब्लाक एवं ट्रेगर ने ध्वनि-प्रतीक, उनकी यादृच्छिकता, उनकी व्यवस्था और समाज जैसे चार पक्षों का उल्लेख किया है।
उपर्युक्त परिभाषाओं से ये स्पष्ट होता है कि भाषा ध्वनिमूलक सार्थक और यादृच्छिक व्यवस्था है जिसके द्वारा मानव समाज अपने भाषा-भाषी समाज से अपने भावों और विचारों का पारस्परिक आदान-प्रदान करता है। यह व्यवस्था ध्वनियों तथा अर्थमूलक तत्वों के योग से संबद्ध है जो विचार-विमर्श के लिए सार्थक भूमिका निभाती है। भाषा के इन मूल तत्वों का विवेचन कर भाषा के स्वरूप और प्रकृति को पहचाना जा सकता है।

'भाषा' शब्द भाष् धातु से निष्पन्न हुआ है। शास्त्रों में कहा गया है- “भाष व्यक्तायां वाचि" अर्थात् व्यक्त वाणी ही भाषा है। भाषा स्पष्ट और पूर्ण अभिव्यक्ति प्रकट करती है।
भाषा का इतिहास उतना ही पुराना है जितना पुराना मानव का इतिहास। भाषा के लिए सामान्यतः यह कहा जाता है कि- 'भाषा मनुष्य के विचार-विनिमय और भावों की अभिव्यक्ति का साधन है।' भाषा की परिभाषा पर विचार करते समय रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव की यह बात ध्यान देने योग्य है कि- 'भाषा केवल अपनी प्रकृति में ही अत्यन्त जटिल और बहस्तरीय नहीं है वरन् अपने प्रयोजन में भी बहुमुखी है। उदाहरण के लिए अगर भाषा व्यक्ति के निजी अनुभवों एवं विचारों को व्यक्त करने का माध्यम है; तब इसके साथ ही वह सामाजिक सम्बन्धों की अभिव्यक्ति का उपकरण भी है, एक ओर अगर वह हमारे मानसिक व्यापार(चिन्तन प्रक्रिया) का आधार है तो दूसरी तरफ वह हमारे सामाजिक व्यापार(संप्रेषण प्रक्रिया) का साधन भी है। इसी प्रकार संरचना के स्तर पर जहाँ भाषा अपनी विभिन्न इकाइयों में सम्बन्ध स्थापित कर अपना संश्लिष्ट रूप ग्रहण करती है जिनमें वह प्रयुक्त होती है। प्रयोजन की विविधता ही भाषा को विभिन्न सन्दर्भो मे देखने के लिए बाध्य करती है।
यही कारण है कि विभिन्न विद्वानों ने इसे विभिन्न रूपों में देखने और परिभाषित करने का प्रयत्न किया है:-

डॉ. कामता प्रसाद गुरु
भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचार दूसरों तक भलीभाँति प्रकट कर सकता है और दूसरों के विचार स्पष्टतया समझ सकता है। -हिन्दी व्याकरण

आचार्य किशोरीदास वाजपेयी 
विभिन्न अर्थों में संकेतित शब्दसमूह ही भाषा है, जिसके द्वारा हम अपने विचार या मनोभाव दूसरों के प्रति बहुत सरलता से प्रकट करते हैं। -भारतीय भाषाविज्ञान

डॉ. श्यामसुन्दर दास
मनुष्य और मनुष्य के बीच वस्तुओं के विषय में अपनी इच्छा और मति का आदान-प्रदान करने के लिए व्यक्त ध्वनि-संकेतों का जो व्यवहार होता है उसे भाषा कहते हैं। - भाषाविज्ञान

डॉ. बाबूराम सक्सेना
जिन ध्वनि-चिहनों द्वारा मनुष्य परस्पर विचार-विनिमय करता है, उनको समष्टि रूप से भाषा कहते हैं। -सामान्य भाषाविज्ञान

डॉ. भोलानाथ तिवारी
भाषा उच्चारणावयवों से उच्चरित यादृच्छिक arbitrary) ध्वनि-प्रतीकों की वह संचरनात्मक व्यवस्था है, जिसके द्वारा एक समाज-विशेष के लोग आपस में विचारों का आदान-प्रदान करते हैं ।' -भाषाविज्ञान

रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव
भाषा वागेन्द्रिय द्वारा निःस्तृत उन ध्वनि प्रतीकों की संरचनात्मक व्यवस्था है जो अपनी मूल प्रकृति में यादृच्छिक एवं रूढ़िपरक होते हैं और जिनके द्वारा किसी भाषा-समुदाय के व्यक्ति अपने अनुभवों को व्यक्त करते हैं, अपने विचारों को संप्रेषित करते हैं और अपनी सामाजिक अस्मिता, पद तथा अंतर्वैयक्तिक सम्बन्धों को सूचित करते हैं। -भाषाविज्ञान : सैद्धान्तिक चिन्तन

इस प्रकार भाषा यादृच्छिक वाक् प्रतीकों की वह व्यवस्था है, जिसे मुख द्वारा उच्चारित किया जाता है और कानों से सुना जाता है, और जिसकी सहायता से मानव-समुदाय परस्पर सम्पर्क और सहयोग करता है। उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि- "मुख से उच्चरित ऐसे परम्परागत, सार्थक एवं व्यक्त ध्वनि संकेतों की समष्टि ही भाषा है जिनकी सहायता से हम आपस में अपने विचारों एवं भावों का आदान-प्रदान करते हैं।"

भाषा : अभिव्यक्ति का माध्यम
अपने भावों को अभिव्यक्त करके दूसरे तक पहुंचाने हेतु भाषा का उद्भव हुआ। भाषा के माध्यम से हम न केवल अपने, भावों, विचारों, इच्छाओं और आकांक्षाओं को दूसरे पर प्रकट करते हैं, अपितु दूसरों द्वारा व्यक्त भावों, विचारों और इच्छाओं को ग्रहण भी करते हैं। इस प्रकार वक्ता और श्रोता के बीच अभिव्यक्ति के माध्यम से मानवीय व्यापार चलते रहते हैं। इसलिए सुनना और सुनाना अथवा जानना और जताना भाषा के मूलभूत कौशल हैं जो सम्प्रेषण के मूलभूत साधन हैं। अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में भाषा के अन्यतम कौशल है पढ़ना और लिखना जो विधिवत् शिक्षा के माध्यम से विकसित होते हैं।

भाषा : चिन्तन का माध्यम
विद्यार्थी बहुत कुछ सुने, बोले या लिखें-पढ़े, इतना पर्याप्त नहीं है, अपितु यह बहुत आवश्यक है कि वे जो कुछ पढ़ें और सुनें, उसके आधार पर स्वयं चिन्तन-मनन करें। भाषा विचारों का मूल-स्रोत है। भाषा के बिना विचारों का कोई अस्तित्व नहीं है और विचारों के बिना भाषा का कोई महत्त्व नहीं।
पाणिनीय शिक्षा में कहा गया है कि "बुद्धि के साथ आत्मा वस्तुओं को देखकर बोलने की इच्छा से मन को प्रेरित करती है। मन शारीरिक शक्ति पर दबाव डालता है जिससे वायु में प्रेरणा उत्पन्न होती है। वायु फेफड़ों में चलती हुई कोमल ध्वनि को उत्पन्न करती है, फिर बाहर की और जाकर और मुख के ऊपरी भाग से अवरुद्ध होकर वायु मुख में पहुँचती है और विभिन्न ध्यनियों को उत्पन्न करती है। “अतः वाणी के उत्पन्न के लिए चेतना, बुद्धि, मन और शारीरिक अवयव, ये चारों अंग आवश्यक हैं। अगर इन चारों में से किसी के पास एक या एकाधिक का अभाव हो तो वह भाषाहीन हो जाता है।

भाषा : संस्कृति का माध्यम
भाषा और संस्कृति दोनों परम्परा से प्राप्त होती हैं। अतः दोनों के बीच गहरा सम्बन्ध रहा है। जहाँ समाज के क्रिया-कलापों से संस्कृति का निर्माण होता है, वहाँ सास्कृतिक अभिव्यक्ति के लिए भाषा का ही आधार लिया जाता है। पौराणिक एवं साहसिक कहानियाँ, पर्व-त्यौहार, मेला महोत्सव, लोक-कथाएँ, ग्रामीण एवं शहरी जीवन-शैली, प्रकृति-पर्यावरण, कवि-कलाकारों की रचनाएँ. महान विभूतियों की कार्यावली, राष्ट्रप्रेम, समन्वय-भावना आदि सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रभाव भी भाषा पर पड़ता है।
दरअसल, किसी भी क्षेत्र विशेष के मानव समुदाय को परखने के लिए उसकी भाषा को समझना आवश्यक है। किसी निर्दिष्ट गोष्ठी के ऐतिहासिक उद्भव तथा जीवन-शैली की जानकारी प्रात्प करने हेतु उसकी भाषा का अध्ययन जरूरी है। संपृक्त जन-समुदाय के चाल-ढाल, रहन-सहन, वेशभूषा ही नहीं, अपितु उसकी सच्चाई, स्वच्छता, शिष्टाचार, सेवा-भाव, साहस, उदारता, निष्ठा, श्रमशीलता, सहिष्णुता, धर्मनिरपेक्षता, कर्त्तव्यपरायणता आदि उसकी भाषा के अध्ययन से स्पष्ट हो जाते हैं।

भाषा : साहित्य का माध्यम
भाषा साहित्य का आधार है। भाषा के माध्यम से ही साहित्य अभिव्यक्ति पाता है। किसी भी भाषा के बोलनेवालों जन-समुदाय के रहन-सहन, आचार-विचार आदि का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करने वाला उस भाषा का साहित्य होता है। साहित्य के जरिए हमें उस निर्दिष्ट समाज के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन का परिचय मिलता है। केवल समकालीन जीवन का ही नहीं, बल्कि साहित्य हमें अपने अतीत से उसे जोड़कर एक विकसनशील मानव सभ्यता का पूर्ण परिचय देता है। साथ ही साहित्य के अध्ययन से एक उन्नत एवं उदात्त विचार को पनपने का अवसर मिलता है तो उससे हम अपने मानवीय जीवन को उन्नत बनाने की प्रेरणा ग्रहण करते हैं। अतः भाषा का साहित्यिक रूप हमारे बौद्धिक एवं भावात्मक विकास में सहायक होता है और साहित्य की यह अनमोल सम्पत्ति भाषा के माध्यम से ही हम तक पहुँच पाती है। उत्तम साहित्य समृद्ध तथा उन्नत भाषा की पहचान है।

भाषा का स्वरूप और प्रकृति

भाषा को 'यादृच्छिक ध्वनि-प्रतीकों की व्यवस्था' माना गया है, जो समाज में आपस में विचार-विनिमय के लिए प्रयुक्त होती है। वास्तव में भाषा प्रतीकात्मक होती है और इसका कार्य संप्रेषण करना होता है। यह जिन प्रतीकों को लेकर चलती है, वे संकल्पना के रूप में साधारणीकृत होते हैं और संप्रेषण के रूप में भावों एवं विचारों का बोधन कराते हैं। स्विस विद्वान सस्यूर के अनुसार प्रतीक का संबंध संकेतित वस्तु और संकेतार्थ से होता है। संकेतित वस्तु का अर्थ उन भौतिक और यथार्थ वस्तुओं के साथ जुड़ा हुआ है जो गैर-भाषायी तथा वास्तविक जगत् की होती है। उस यथार्थ वस्तु का मानव मस्तिष्क में जो चित्र बन जाता है वह संकल्पना मनोवैज्ञानिक, बौद्धिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, जातीय और परंपरागत परिवेशों से संबद्ध होती है।
प्रतीक से अभिप्राय यह है कि प्रतीक ध्वनियों का सार्थक और स्वतंत्र समूह है और प्रतीक के रूप में गृहीत शब्द या वाक्य की संकल्पना उन सभी वस्तुओं या भावों की सामान्यीकृत मानसिक यथार्थता होती है जो निर्दिष्ट वस्तुओं या भावों को अपने भीतर समेट लेती है। इसे 'भाषिक प्रतीक' कहा जाता है। उदाहरण के लिए, हमारे सामने यथार्थ वस्तु 'पेड़ है, जिसके रूपाकार की संकल्पना मानव-मस्तिष्क में बैठ गई है और ‘प्+ए+ड्+अ' ध्वनियों के संयोजन से यह भाषिक प्रतीक बन गया है। ‘पेड़' कई प्रकार के होते हैं - छोटा पेड़, बड़ा पेड़, नीम का पेड़, आम का पेड़ आदि किंतु उस शब्द 'पेड़' के रूप में जो संकल्पना पैदा होती है, वह एक है और वह भी साधाणीकृत होती है। अतः इसमें वस्तु की अपनी विशिष्टता का लोप हो जाता है। यदि किसी विशेष 'पेड़' की संकल्पना को लाना होगा तो उसके साथ विशेषण लगाना होगा। जैसे, वह पेड़ देखो, यह नीम का पेड़ है, यह छोटा-सा पेड़ है। ध्यान में रहे कि ये भाषिक प्रतीक मूल रूप में ध्वनिपरक होते हैं किंतु बाद में लिपिबद्ध हो जाते हैं।
संकेतित वस्तु और प्रतीक का संबंध मानसिक रूप से माना जाता है, क्योंकि यह वक्ता और श्रोता के मस्तिष्क में संकल्पना के साथ रहता है लेकिन प्रतीक और यथार्थ वस्तु के बीच जो संकल्पनात्मक संबंध रहता है वह नैसर्गिक या प्राकृतिक न होकर यादृच्छिक होता है। इसलिए विभिन्न भाषाओं में विभिन्न शब्दों का प्रयोग होता है। उदाहरण के लिए, हिन्दी का शब्द 'घोड़ा', संस्कृत में शब्द 'अश्व', अंग्रेजी में 'हॉर्स', चीनी में 'मा', रूसी में 'कोन्य' और फ्रेंच में 'शेवल' कहलाता है। इसी प्रकार 'पशु' शब्द यदि हिन्दी में 'जानवर' का बोधक है तो मलयालम में वह 'गाय' का । इस प्रकार यथार्थ वस्तु, संकल्पना और प्रतीक का संबंध अनिवार्य रूप से स्थानवाची, कालवाची, सामाजिक-सांस्कृतिक, मनौवैज्ञानिक, ऐतिहासिक कई रूपों में दिखाई देता है। इससे अपने-अपने परिवेश में अर्थ भी बदल जाते हैं। कभी-कभी यथार्थ-वस्तु नहीं भी होती है और संकल्पना भी प्रतीक का रूप धारण कर लेती है; जैसे – स्वर्ग, नरक, अमृत आदि प्रतीक परंपरागत संस्कार-सापेक्ष या समाज-संदर्भित होते हैं और इनकी अपनी मानसिक संकल्पना बनी रहती है।
संकेतित वस्तु, संकेतार्थ और प्रतीक के संबंधों के आधार पर कहा जा सकता है कि भाषिक प्रतीक कथ्य और अभिव्यक्ति की समन्वित इकाई है। इसमें इन दोनों पक्षों का होना अनिवार्य है अर्थात् यदि कथ्य और अभिव्यक्ति नहीं है और यदि अभिव्यक्ति है किंतु कथ्य नहीं तो उसे प्रतीक की संज्ञा नहीं दी जा सकती। जब हम प्रतीक के रूप में 'कमल' शब्द का उच्चारण करते हैं तो श्रोता के मन में तत्काल उसका कथ्य उभरकर आता है अर्थात् 'कमल' का रूप और गुण हमारे मस्तिष्क में आ जाते हैं लेकिन यह जरूरी नहीं कि 'नीरज' या 'पंकज' शब्द की अभिव्यक्ति करने से श्रोता उसके कथ्य को पकड़ पाए। इस स्थिति में यह कहा जा सकता है कि कथ्य और अभिव्यक्ति के आंतरिक संबंधों के कारण श्रोता के लिए 'कमल' शब्द प्रतीकवत् सिद्ध है किंतु 'नीरज' या 'पंकज' कथ्य पक्ष के अभाव के कारण उसके लिए असिद्ध हैं। अतः कथ्य और अभिव्यक्ति का प्रतीक में अटूट संबंध है। इसी संबंध के कारण प्रतीक अपने-आप में सिद्ध है लेकिन व्यक्ति-विशेष या समाज-विशेष के लिए असिद्ध हो सकता है। कथ्य के स्तर पर अर्थ के कई आयाम होते हैं – बोधात्मक, संरचनात्मक, सामाजिक और सांस्थानिक। एक ही प्रतीक में कम-से-कम एक या दो अर्थ मिल जाते हैं। 'जलज' और 'नीरज' दोनों का बोधात्मक अर्थ 'कमल का फूल' है, लेकिन उससे जो अन्य अर्थ निकलता है वह 'विषयवासनाओं से अप्रभावित व्यक्ति' का संकेत करता है। इस प्रकार एक या एक से अधिक में एक ही अर्थ या कथ्य पाया जाता है। वस्तुतः कथ्य और अभिव्यक्ति में जो अटूट संबंध है उसमें लचीलापन भी है। इसी कारण हर भाषा में अनेकार्थी अथवा संदिग्धार्थी और पर्यायवाची शब्द या वाक्य मिल जाते हैं -
वाक्य के धरातल पर तीन वाक्य देखें
  1. क) मोहन ने मोटे लड़के को पीटा है।
  2. ख) मोहन ने जिस लड़के को पीटा वह मोटा है।
  3. ग) मोहन ने उस लड़के को पीटा जो मोटा है।
इन तीनों अभिव्यक्तियों ने एक ही अर्थ का प्रतिपादन किया है।
  • इसी प्रकार शब्द के धरातल पर 'उसे सोना महंगा पड़ा' और 'मोहन ने उस दिन मन भर मिठाई खाई' वाक्यों में 'सोना' तथा 'मन' अभिव्यक्ति के स्तर पर एक है, किंतु कथ्य के स्तर पर दो हैं। 'सोना' शब्द 'स्वर्ण' और 'निद्रा' दो अर्थ देता है और 'मन', 'वजन' (40 किलो) और 'जी' (दिल) के अर्थ देता है।
वाक्य के धरातल पर 'मैंने पाजामा पहनते हुए मोहन को देखा' के अभिव्यक्ति के स्तर पर दो अर्थ हो सकते हैं।
उदाहरण के लिए -
  • क) मैं पाजामा पहन रहा था, मैंने मोहन को देखा।
  • ख) मैंने जब मोहन को देखा, मोहन पाजामा पहन रहा था।

प्रतीकों की व्यवस्था
यह भी ध्यान में रहे कि कोई भी भाषा प्रतीकों की केवल लड़ी या समूह नहीं होती वरन् उसकी व्यवस्था होती है। उदाहरण के लिए, हिन्दी में 'राम मोहन को पीटता है' वाक्य में 'राम' कर्ता के रूप में पहले आता है, बाद में 'मोहन' कर्म के रूप में और फिर क्रिया 'पीटता है' आती है। इस प्रकार हिन्दी की मूल आंतरिक व्यवस्था ‘कर्ता-कर्म-क्रिया' है (राम सेब खाता है)। हर भाषा की अपनी व्यवस्था होती है। अंग्रेजी की व्यवस्था है 'कर्ताक्रिया-कर्म' (Rama eats an apple)। इस प्रकार प्रतीकों की आंतरिक व्यवस्था भाषा है। इन भाषिक प्रतीकों की व्यवस्था अपनी प्रकृति में संरचनात्मक होती है जो भाषा के रूप में प्रतिफलित होती है।

समाज और प्रतीक का संबंध
समाज में प्रतीक हेतु का काम करते हैं, क्योंकि भाषा कई प्रयोजनों की सिद्धि करती है। समाज से अभिप्राय उस भाषा-भाषी समुदाय से है जिसके अपने सामाजिक स्तर होते हैं, सांस्कृतिक रीति-रिवाज और परंपराएँ होती हैं। यह समाज अपनी भाषा में कार्य-व्यापार करता है। वह भाषा के सहारे ही सोचता है, विचारविमर्श करता है। इसमें समाज के सामाजिक, सांस्कृतिक, परंपरागत, मनोवैज्ञानिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक, प्रयोजनपरक आदि विभिन्न परिवेश या संदर्भ जुड़े होते हैं। हमारे सामाजिक और पारिवारिक संबंधों की जानकारी के साथ-साथ वक्ता-श्रोता के अंतर्वैयक्तिक संबंधों की जानकारी भी मिलती है। उदाहरण के लिए, मध्यम पुरुष सर्वनाम के 'तू', 'तुम' और 'आप' के अपने सामाजिक संदर्भ हैं। सांस्कृतिक परिवेश में पुष्प, कलश, अक्षत आदि शब्दों का जो प्रयोग होता है, उनके स्थान पर फूल, लोटा, चावल आदि शब्दों या पर्यायों का प्रयोग वर्जित माना जाता है। इस प्रकार भाषा का मुख्य प्रकार्य संप्रेषण है जो अपनी संरचनात्मक व्यवस्था में सामाजिक परिवेश, सांस्कृतिक रीति-रिवाज, परंपराओं आदि को अभिव्यक्त करती है। इसलिए भाषिक प्रतीक और उसकी अपनी व्यवस्था की प्रकृति के आधार पर भाषा को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है कि भाषा मानव-मुख से निस्सृत ध्वनि-प्रतीकों की वह संरचनात्मक, संदर्भगत और परिवेशगत व्यवस्था है जो अपनी प्रकृति में यादृच्छिक तथा रूढ़िपरक होती है और उससे समाज अपने विचारों और भावों का आदान-प्रदान करता है।
भाषा को कथ्य (अर्थ) और अभिव्यक्ति (ध्वनि) दोनों के धरातल पर देखा जाता है। दूसरे शब्दों में, कथ्य और अभिव्यक्ति के संबंधों को जानना या समझना भाषा का विश्लेषण करना है, लेकिन वक्ता के भीतर जो व्याकरण अव्यक्त रूप में होता है वह संदर्भ में बाहर नहीं होता वरन् उसमें उसके प्रयोग संबंधी नियमों की भी पकड़ होती है। यह भाषिक क्षमता उच्चारण अथवा लेखन के माध्यम से व्यवहार में आने पर विभिन्न भाषिक कौशलों (अर्थात बोलना-सुनना और पढ़ना-लिखना) के रूप में कार्यान्वित होती है। इस प्रकार भाषिक कौशलों का विकास व्यक्ति की भाषिक क्षमता और उसके व्यावहारिक रूपों में होता है।

भाषा के प्रकार (विविध रूप)

भौगोलिक, ऐतिहासिक. प्रयोगात्मक, प्रयोजनपरक आदि विभिन्न आधारों पर भाषा के विविध रूप दिखाई देते हैं।

भौगोलिक या क्षेत्रीयता के आधार पर

(क) व्यक्ति बोली (Ideolect)
सामाजिक, क्षेत्रीय और पर्यावरणीय संदर्भो का व्यक्ति की भाषा पर प्रत्यक्ष एवं दूरगामी प्रभाव पड़ता है। इसी कारण हर व्यक्ति की अपनी व्यक्ति बोली होती है। हॉकेट के शब्दों में – "किसी निश्चित समय पर व्यक्ति-विशेष का समूचा वाकव्यवहार उसकी व्यक्ति बोली है।" यह व्यक्ति बोली शाब्दिक और व्याकरणिक व्यक्तिपरकता के कारण ही संभव होती है।

(ख) स्थानीय बोली (Local Dialect)
बहुत सी व्यक्ति-बोलियाँ मिलकर एक स्थानीय बोली बनती है जिनमें ध्वनि, रूप, वाक्य एवं अर्थ के स्तर पर पारस्परिक बोधगम्यता होती है। यह किसी छोटे स्तर पर बोली जाती है, जिनमें व्यक्ति-बोलियों का समाविष्ट रूप होता है।

(ग) उप बोली (Sub Dialect)
एकाधिक स्थानीय बोलियाँ मिलकर एक उपबोली बनती हैं; जैसे - भोजपुरी की छपरिया, खखार, शाहवारी, गोरखपुरी, नागपुरिया आदि अनेक उपबोलियां हैं।

(घ) बोली (Dialect)
एकाधिक उपबोलियाँ मिलकर एक बोली बनती है जिसे विभाषा भी कहा जाता है। हालांकि कुछ विद्वानों ने कुछ बोलियों के उपवर्ग को उपभाषा कहा है; जैसे बिहारी उपभाषा में भोजपुरी, मैथिली और मगही बोलियों का वर्ग है।

(ङ) उपभाषा (Sub language)
कुछ विद्वानों ने कुछ बोलियों के उपवर्ग को उपभाषा कहा है; जैसे बिहारी उपभाषा में भोजपुरी, मैथिली और मगही बोलियों का एक वर्ग है। लेकिन यह वर्गीकरण भ्रामक और गलत है। इसमें व्याकरणिक समानता और परस्पर बोधगम्यता तो काफी हद तक मिल सकती है किंतु जातीय अस्मिता के कारण इनमें भिन्नता है। अतः हिन्दी को बिहारी, राजस्थानी आदि उपभाषाओं से अलग रखना सही नहीं है।

(च) भाषा (Language)
भाषा का क्षेत्र व्यापक होता है जिसमें एकाधिक बोलियाँ अथवा उपभाषाएँ मिलकर एक भाषा बनाती है। एक भाषा के अंतर्गत एकाधिक बोलियाँ हो सकती हैं। जैसे हिंदी भाषा के अंतर्गत खड़ी बोली, ब्रजभाषा, अवधी, भोजपुरी, हरियाणवी, मारवाड़ी आदि अट्ठारह बोलियाँ अथवा पश्चिमी हिंदी, पूर्वी हिंदी, बिहारी, पहाड़ी, और राजस्थानी उपभाषाएं हैं। भाषा में ऐतिहासिकता, जीवंतता, स्वायत्तता और मानकता चार गुण पाए जाते हैं। ऐतिहासिकता से अभिप्राय उनकी परंपरा और विकास से है, जीवंतता का अर्थ उसके प्रयोग और प्रचलन से है, स्वायत्तता से आशय सभी कार्य क्षेत्र में इसका प्रयुक्त होना है और मानकता का अर्थ भाषा की संरचना में एकरूपता है। यद्यपि बोली और भाषा में व्याकरणिक समानता और बोधगम्यता तो प्रायः मिल जाती है, किंतु जातीय अस्मिता तथा जातीय बोध के कारण भाषा विशाल समुदाय की प्रतीक बन जाती है।

प्रयोग के आधार पर
प्रयोग के आधार पर भाषा के विभिन्न रूप मिलते हैं, यथा -

सामान्य बोलचाल की भाषा (Language for Common use)
'बालेचाल की भाषा' को समझने के लिए 'बोली' (Dialect) को समझना जरूरी है। 'बोली' उन सभी लोगों की बोलचाल की भाषा का वह मिश्रित रूप है जिनकी भाषा में पारस्परिक भेद को अनुभव नहीं किया जाता है। विश्व में जब किसी जन-समूह का महत्त्व किसी भी कारण से बढ़ जाता है तो उसकी बोलचाल की बोली 'भाषा' कही जाने लगती है, अन्यथा वह 'बोली' ही रहती है। स्पष्ट है कि 'भाषा' की अपेक्षा 'बोली' का क्षेत्र, उसके बोलने वालों की संख्या और उसका महत्त्व कम होता है। एक भाषा की कई बोलियाँ होती हैं क्योंकि भाषा का क्षेत्र विस्तृत होता है।
जब कई व्यक्ति-बोलियों में पारस्परिक सम्पर्क होता है, तब बालेचाल की भाषा का प्रसार होता है। आपस में मिलती-जुलती बोली या उपभाषाओं में हुई आपसी व्यवहार से बोलचाल की भाषा को विस्तार मिलता है। इसे ‘सामान्य भाषा' के नाम से भी जाना जाता है। यह भाषा बड़े पैमाने पर विस्तृत क्षेत्र में प्रयुक्त होती है।
किसी भी समाज में रोजमर्रा के रूप में प्रयुक्त होने वाली सामान्य भाषा होती है। यह प्रायः संपर्क भाषा का काम करती है। यह अपनी विभिन्न भाषिक इकाइयाँ, शब्दावली और व्याकरणिकता के आधार पर अपनी पहचान बनाती है।

साहित्यिक भाषा (Literary Language)
यह भाषा का वह आदर्श रूप है जिसका प्रयोग साहित्य-रचना, शिक्षा आदि में होता है। यह प्रायः परिनिष्ठित होती है किंतु साहित्यिक भाषा कभी-कभी सामान्य भाषा के नियमों को तोड़ती है। विशिष्ट चयनसंयोजन से यह विशिष्ट भाषा बन जाती है। हिन्दी, अंग्रेजी, फ्रेंच, रूसी, जर्मन आदि भाषाएँ साहित्यिक भाषा के रूप में भी प्रयुक्त होती है।

व्यावसायिक भाषा (Language for Common use and Trade)
यह भाषा व्यवसाय, व्यापार में प्रयुक्त होने के लिए विशेष रूप धारण करती है। यह प्रायः औपचारिक एवं अनौपचारिक और तकनीकी या अर्द्धतकनीकी होती है। यह लिखित और मौखिक दोनों रूपों में प्रयुक्त होती है। इसकी व्यवसाय या व्यापार संबंधी अपनी विशिष्ट शब्दावली और संरचना होती है।

कार्यालयी भाषा (Official use)
इस भाषा का प्रयोग कार्यालयों, निकार्यों, कंपनियों, प्रशासन आदि में होता है। यह सामान्य भाषा पर आधारित तो होती है लेकिन शब्दावली तथा संरचना में अंतर मिल सकता है। यह तकनीकी या अर्द्धतकनीकी होती है, इसीलिए यह प्रायः औपचारिक शैली में लिखी जाती है। इसके मौखिक रूप के स्थान पर लिखित रूप का अधिक प्रयोग होता है।

राजभाषा (Official Language)
यह सरकार और जनता के बीच प्रयुक्त होने वाली भाषा है। यह प्रायः परिनिष्ठित और मानक होती है। यह देश में अधिक बोले जाने वाली भाषा होती है। इसमें विषयानुसार शब्दावली और संरचना का प्रयोग होता है। इसका प्रयोग प्रायः सरकारी मंत्रालयों, कार्यालयों, कंपनियों, नियमों, निकायों, संसद आदि में होता है ताकि जनता के साथ संबंध बनाया जा सके। इसे सर्वजन-सर्वकार्य सुलभ बनाने के लिए इसकी शब्दावली में उपयुक्त चयन करने की भी सुविधा रहती है। देश में प्रयुक्त अन्य भाषाओं की अपेक्षा इसका प्रायः प्रमुख स्थान रहता है। भारत की राजभाषा हिन्दी है।

राष्ट्रभाषा (National language)
राष्ट्र की प्रतिष्ठा का प्रतीक राष्ट्रभाषा होती है। इसे राष्ट्रीय स्तर पर गौरवमय स्थान प्राप्त होता है, जो राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय गान का होता है। वास्तव में राष्ट्रभाषा का संबंध राष्ट्रीय चेतना से होता है और राष्ट्रीय चेतना सांस्कृतिक चेतना से जुड़ी होती है। इसमें अपने देश की महान परंपरा और सामाजिक-सांस्कृतिक अस्मिता जागृत होती है। राष्ट्रभाषा राजभाषा हो सकती है लेकिन राजभाषा राष्ट्रभाषा भी हो, यह आवश्यक नहीं। भारत में अधिकतर भाषाओं का गौरवमय इतिहास रहा है, इसलिए बहुभाषी भारत में इनको राष्ट्रभाषा कहा जा सकता है।
देश के विभिन्न भाषा-भाषियों में पारस्परिक विचार-विनिमय की भाषा को राष्ट्रभाषा कहते हैं। राष्ट्रभाषा को देश के अधिकतर नागरिक समझते हैं, पढ़ते हैं या बोलते हैं। किसी भी देश की राष्ट्रभाषा उस देश के नागरिकों के लिए गौरव, एकता, अखंडता और अस्मिता का प्रतीक होती है। महात्मा गांधी ने राष्ट्रभाषा को राष्ट्र की आत्मा की संज्ञा दी है। एक भाषा कई देशों की राष्ट्रभाषा भी हो सकती है; जैसे अंग्रेजी आज अमेरिका, इंग्लैण्ड तथा कनाड़ा इत्यादि कई देशों की राष्ट्रभाषा है। संविधान में हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा तो नहीं दिया गया है लेकिन इसकी व्यापकता को देखते हुए इसे राष्ट्रभाषा कह सकते हैं। दूसरे शब्दों में राजभाषा के रूप में हिन्दी, अंग्रेजी की तरह न केवल प्रशासनिक प्रयोजनों की भाषा है, बल्कि उसकी भूमिका राष्ट्रभाषा के रूप में भी है। वह हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक अस्मिता की भाषा है। महात्मा गांधी जी के अनुसार किसी देश की राष्ट्रभाषा वही हो सकती है जो सरकारी कर्मचारियों के लिए सहज और सुगम हो; जिसको बोलने वाले बहुसंख्यक हों और जो पूरे देश के लिए सहज रूप में उपलब्ध हो। उनके अनुसार भारत जैसे बहुभाषी देश में हिन्दी ही राष्ट्रभाषा के निर्धारित अभिलक्षणों से युक्त है।

सम्पर्क भाषा
अनेक भाषाओं के अस्तित्व के बावजूद जिस विशिष्ट भाषा के माध्यम से व्यक्ति-व्यक्ति, राज्य-राज्य तथा देश-विदेश के बीच सम्पर्क स्थापित किया जाता है उसे सम्पर्क भाषा कहते हैं। एक ही भाषा परिपूरक भाषा और सम्पर्क भाषा दोनों ही हो सकती है। आज भारत मे सम्पर्क भाषा के तौर पर हिन्दी प्रतिष्ठित होती जा रही है जबकि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अंग्रेजी सम्पर्क भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हो गई है। सम्पर्क भाषा के रूप में जब भी किसी भाषा को देश की राष्ट्रभाषा अथवा राजभाषा के पद पर आसीन किया जाता है तब उस भाषा से कुछ अपेक्षाएँ भी रखी जाती हैं।
जब कोई भाषा lingua franca' के रूप में उभरती है तब राष्ट्रीयता या राष्ट्रता से प्रेरित होकर वह प्रभुतासम्पन्न भाषा बन जाती है। यह तो जरूरी नहीं कि मातृभाषा के रूप में इसके बोलने वालों की संख्या अधिक हो पर द्वितीय भाषा के रूप में इसके बोलने वाले बहुसंख्यक होते हैं।

मानक भाषा
भाषा के स्थिर तथा सुनिश्चित रूप को मानक या परिनिष्ठित भाषा कहते हैं। भाषाविज्ञान कोश के अनुसार 'किसी भाषा की उस विभाषा को परिनिष्ठित भाषा कहते हैं जो अन्य विभाषाओं पर अपनी साहित्यिक एवं सांस्कृतिक श्रेष्ठता स्थापित कर लेती है तथा उन विभाषाओं को बोलने वाले भी उसे सर्वाधिक उपयुक्त समझने लगते हैं।
मानक भाषा शिक्षित वर्ग की शिक्षा, पत्राचार एवं व्यवहार की भाषा होती है। इसके व्याकरण तथा उच्चारण की प्रक्रिया लगभग निश्चित होती है। मानक भाषा को टकसाली भाषा भी कहते हैं। इसी भाषा में पाठ्य-पुस्तकों का प्रकाशन होता है। हिन्दी, अंग्रेजी, फ्रेंच, संस्कृत तथा ग्रीक इत्यादि मानक भाषाएँ हैं।
किसी भाषा के मानक रूप का अर्थ है, उस भाषा का वह रूप जो उच्चारण, रूप-रचना, वाक्य-रचना, शब्द और शब्द-रचना, अर्थ, मुहावरे, लोकोक्तियाँ, प्रयोग तथा लेखन आदि की दृष्टि से, उस भाषा के सभी नहीं तो अधिकांश सुशिक्षित लोगों द्वारा शुद्ध माना जाता है। मानकता अनेकता में एकता की खोज है, अर्थात यदि किसी लेखन या भाषिक इकाई में विकल्प न हो तब तो वही मानक होगा, किन्तु यदि विकल्प हो तो अपवादों की बात छोड़ - दें तो कोई एक मानक होता है। जिसका प्रयोग उस भाषा के अधिकांश शिष्ट लोग करते हैं। किसी भाषा का मानक रूप ही प्रतिष्ठित माना जाता है। उस भाषा के लगभग समूचे क्षेत्र में मानक भाषा का प्रयोग होता है।
मानक भाषा एक प्रकार से सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक होती है। उसका सम्बन्ध भाषा की संरचना से न होकर सामाजिक स्वीकृति से होता है। मानक भाषा को इस रूप में भी समझा जा सकता है कि समाज में एक वर्ग
मानक होता है जो अपेक्षाकृत अधिक महत्त्वपूर्ण होता है तथा समाज में उसी का बोलना-लिखना, उसी का खाना-पीना, उसी के रीति-रिवाज़ अनुकरणीय माने जाते हैं। मानक भाषा मूलतः उसी वर्ग की भाषा होती है।

गुप्त भाषा (Cant)
यह भाषा किसी विशेष वर्ग या समूह या संप्रदाय में प्रयुक्त होती है, जिसे उसी वर्ग के लोग समझ सकें। इसे वर्ग भाषा या चोर भाषा (roget) भी कहते हैं। इसकी सीमा भौगोलिक नहीं होती। वस्तुतः यह भाषा सेना, डकैतों या चोरों द्वारा प्रयुक्त होती है। इसे कूट भाषा (Code language) भी कह सकते हैं, जो गोपनीय और मनोरंजन के लिए प्रयुक्त होती है। यह वस्तुतः अंतरंग वर्ग की भाषा है।

मृत भाषा (Dead language)
जिस भाषा का प्रयोग भूत काल में जीवंत भाषा के रूप में होता रहा हो, जिसका विपुल साहित्य-भंडार भी हो और जिसका प्रयोग राजकाज में भी हुआ हो, किंतु वर्तमान काल में यदि जिसका व्यवहार सामाजिक दृष्टि से न हो रहा हो अथवा उसका प्रयोग बहुत ही सीमित हो गया हो तो उसे मृत भाषा कहते हैं। वर्तमान में इस भाषा का अस्तित्व परंपरा, धर्म, संस्कृति को सुरक्षित रखने की दृष्टि से होता है। यह एक प्रकार से पुस्तकालय भाषा का रूप ले लेती है। ग्रीक, लेटिन, संस्कृत आदि भाषाओं का कभी अत्यधिक प्रयोग होता था, किंतु अब इनका प्रयोग अतिसीमित संदर्भो में हो रहा है।

निर्माण के आधार पर

सहज भाषा - सामान्य बोलचाल की भाषाएँ, जिनका उद्भव प्राकृतिक और सहज रूप में हुआ है; जैसे हिन्दी, अंग्रेजी, जर्मन।

कृत्रिम भाषा - विभिन्न भाषाओं के बीच सार्वभौमिक रूपों को लेकर अंतरराष्ट्रीय संप्रेषण की दृष्टि से कृत्रिम भाषा के निर्माण कार्य का प्रयास हुआ; जैसे - एस्पेरैंतो, इंडो। इसका उद्देश्य विभिन्न भाषा-भाषी लोगों को परस्पर लाकर भाषिक आदानप्रदान की सुविधा देना था।
कृत्रिम भाषा के दो उपभेद हैं -
  • सामान्य कृत्रिम भाषा - सामान्य बोलचाल में प्रयुक्त करने के लिए बनाई गई भाषा; जैसे – एस्पेरैंतो भाषा
  • गुप्त कृत्रिम भाषा - किसी विशिष्ट प्रयोजन के लिए बनाई गई भाषा । सेना, दलालों, डाकुओं आदि की भाषा।

मानकता के आधार पर

मानक या परिनिष्ठित भाषा (standard language)
जो व्याकरणसम्मत तथा प्रयोगसम्मत हो। ध्वनि, शब्द, वाक्य आदि में व्याकरण सम्मत होने के साथ-साथ एकरूपता और लोक स्वीकृति हो; जैसे – मुझे घर जाना है।

मानकेतर भाषा (Non-standard language)
जो प्रयोगसम्मत हो, जिसमें लोकस्वीकृति हो किंतु व्याकरणसम्मत न हो; जैसे मैंने घर जाना है।

अमानक भाषा
जो व्याकरणसम्मत और एकरूपी न हो तथा उसे लोकस्वीकृति भी प्राप्त न हो। यथा - मेरे को जाना है।

उपभाषा (Slang)
यह भाषा व्यवहार में अनौपचारिकता का अतिशयवादी रूप है जो प्रायः अशिक्षित या अर्द्धशिक्षित वर्ग के लोगों में चलती है। इसमें तत्वों के साथ-साथ अशिष्ट एवं अग्राह्य रूपों तथा स्थानीय बोलचाल के ठेठ और अश्लील शब्दों का भी प्रयोग धड़ल्ले से होता है।

प्रकार्य के आधार पर

संपूरक भाषा
निजी ज्ञान की वृद्धि के लिए द्वितीय भाषा प्रयोग करना सीखना। यह पुस्तकालय भाषा होती है जिसका सक्रिय प्रयोग नहीं होता। राजनयिकों आदि द्वारा सीमित प्रयोग के लिए भी यह भाषा सीखी जाती है।

परिपूरक भाषा
सामाजिक प्रयोजनों की पूर्ति के लिए समुदाय में प्रचलित दूसरी भाषा को जानना आवश्यक है। मातृभाषा के साथ-साथ सामाजिक स्तर पर परिपूरक के रूप में प्रयुक्त भाषा; जैसे – भारत में हिन्दी या अपनी मातृभाषा के साथ अंग्रेजी।

सहायक भाषा
व्यक्ति अपने समुदाय में दूसरी भाषा का ज्ञान अपने ज्ञान की सहायक भाषा के रूप में करता है; जैसे - हिन्दी और संस्कृत हिन्दी का प्रयोग करते हुए व्यक्ति को कभी संस्कृत की भी सहायता लेनी पड़ती है।

समतुल्य भाषा
जब कोई व्यक्ति दूसरी भाषा में भी समतुल्य ज्ञान प्राप्त कर धीरे-धीरे उस भाषा का भी उन सभी सामाजिक संदर्भो में प्रयोग करने लगे जिनमें वह मातृभाषा का करता रहा है उनके लिए समतुल्य भाषा हो गई है। इसमें दोनों भाषाओं पर समान अधिकार की अपेक्षा होती है; जैसे – भारत में हिन्दीतर भाषी अपनी मातृभाषा के स्थान पर हिन्दी का प्रयोग करने लगते हैं। इसलिए अमेरिका में विभिन्न देशों के बसे लोग अपनी-अपनी मातृभाषा छोड़कर अंग्रेजी का प्रयोग करने लगे हैं।

ऐतिहासिकता के आधार पर

मूल या उद्गम भाषा
मूल या उद्गम भाषा, भाषा का वह प्राथमिक स्वरूप है जो स्वयं किसी से प्रसूत नहीं होता वरन् वह अन्य भाषाओं को प्रसूत करता है, अर्थात् जिससे अन्य भाषाएँ निकली हों, जैसे - भारोपीय भाषा।

प्राचीन भाषा
जो प्राचीन काल में प्रयुक्त हुई हों; जैसे संस्कृत, ग्रीक, लेटिन, हिब्रू, तमिल।

मध्यकालीन भाषा
जिनका प्रयोग मध्यकाल में हआ हो। भारतीय संदर्भ में पालि. प्राकृत, अपभ्रंश।

आधुनिक भाषा
जिनका प्रयोग आधुनिक काल में हो रहा हो; जैसे हिंदी, मराठी, बंगला, अंग्रेजी, फ्रेंच।

सम्मिश्रीकरण के आधार पर

पिजिन (Pidgin)
जब कोई भाषाभाषी समुदाय किसी अन्य भाषाभाषी समुदाय में उपनिवेश बनाकर रहता है तो उनके परस्पर संपर्क से दो भाषाओं के मिश्रण की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है। यह भाषा का प्रारंभिक और सरलीकृत रूप होता है। यह किसी समुदाय की मातृभाषा नहीं होती। यह एक प्रकार की मिश्रित भाषा होती है। इसलिए इसे संकर भाषा भी कहते हैं।

क्रियोल (Creole)
यह पिजिन का विकसित रूप है। पिजिन बोलने वाली पीढ़ी के बाद आने वाली पीढ़ी पिजिन को क्रियोल में बदल देती हैं। यह भाषा मूल भाषा की ध्वनि और रूपपरक संरचना को त्याग कर अपना स्वतंत्र स्वरूप बना लेती है। मॉरिशस, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद-टोबेगो आदि देशों में क्रियोल का प्रयोग होता है। इनमें कहीं फ्रेंच, अंग्रेजी और हिंदी के तत्व हैं तो कहीं डच और हिन्दी के और कहीं अंग्रेजी और हिन्दी के। इसे संसृष्ट भाषा भी कहा जाता है।

भाषा विज्ञान

भाषा विज्ञान एक विज्ञान है। विज्ञान स्वतः निरपेक्ष होता है। तात्त्विक विवेचन और तत्त्वदर्शन ही उसका लक्ष्य होता है। तत्त्वसंदर्शन से बौद्धिक शांति और आनन्दानुभूति होती है। अतएव वैज्ञानिक चिंतन निरपेक्ष होते हुए भी सापेक्ष होता है। इसी दृष्टि से भाषाविज्ञान की भी कतिपय उपयोगिताएँ दृष्टिगोचर होती हैं । उनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-

ज्ञान-पिपासा की शांति
भाषा विज्ञान हमारी भाषा-विषयक जिज्ञासाओं को शान्त करता है। ज्ञान की वृद्धि मानवमात्र का कर्तव्य है। भाषा हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग है। उसके विषय में विस्तृत जानकारी प्रत्येक मानव के लिए अनिवार्य है। अतएव आचार्य पतंजलि न षडंग वेद के अध्ययन की अनिवार्यता पर बल देते हुए कहा है कि ब्राह्मण को निष्काम-भाव से षडंग वेद का अध्ययन करना चाहिए।

भाषा के परिष्कृत रूप का ज्ञान
भाषा-विज्ञान के द्वारा भाषा का सूक्ष्मतम अध्ययन किया जाता है। भाषा-विज्ञान के द्वारा ध्वनियों, वर्णों, प्रकृति, प्रत्यय और अर्थ का वास्तविक ज्ञान प्राप्त होता है। जिससे शुद्ध अर्थ का बोध होता है, उच्चारण की शुद्धता आती है और भाषा के परिष्कृत रूप के साथ वाग्ब्रह्म साक्षात्कार होता है।

भाषा विज्ञान से वैज्ञानिक अध्ययन की ओर प्रवृत्ति
भाषा विज्ञान के द्वारा भाषा के सूक्ष्म अध्ययन की ओर मानव की प्रवृत्ति ही नहीं होती, अपितु उसका दृष्टिकोण विज्ञानमूलक हो जाता है। वह प्रत्येक वस्तु के तत्त्वदर्शन और तत्त्वज्ञान की ओर अग्रसर होता है। किसी भी विज्ञान या शास्त्र का तत्त्वदर्शन और तत्त्वज्ञान की ओर अग्रसर होता है। किसी भी विज्ञान या शास्त्र का तत्त्वदर्शन मानव का लक्ष्य है।

वेदार्थ-ज्ञान में सहायक
वेदों के वास्तविक अर्थ के ज्ञान में भाषा-विज्ञान और तुलनात्मक अध्ययन ने विशेष योगदान किया है । लैटिन, ग्रीक, अवेस्ता, आदि भाषाओं के अध्ययन ने अनेक वैदिक शब्दों का अर्थ स्पष्ट किया है।

प्राचीन संस्कृति और सभ्यता का ज्ञान
प्राचीन काल की संस्कृति और सभ्यता के ज्ञान में भाषा-विज्ञान का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है । भाषाशास्त्री के लिए भाषा के प्रत्येक शब्द बोलते हुए प्राणी हैं और वे अपना परिचय स्वयं देते हैं । इन शब्दों के सूक्ष्म अध्ययन से उस समय की संस्कृति और सभ्यता का ज्ञान होता है। प्रागैतिहासिक काल की संस्कृति के ज्ञान का साधन एकमात्र भाषा-विज्ञान है। आर्य जाति, द्रविड़ जाति, प्राचीन मिश्र और असीरिया की जातियों की संस्कृति का बोध भाषा-विज्ञान के द्वारा ही हुआ है।

विविध भाषा-ज्ञान
भाषा-विज्ञान की सहायता से अनेक भाषाओं का ज्ञान सरलता से प्राप्त किया जा सकता है। इस विषय में स्वनिम-विज्ञान हमारा विशेष सहायक होता है।

विश्व-बन्धुत्व-भावना का प्रेरक
भाषा-विज्ञान विश्व की प्रमुख भाषाओं का ज्ञान कराकर हमारे अंदर व्याप्त संकीर्ण भावना को दूर करता है। अनेक भाषाओं के साथ सम्बन्ध का ज्ञान होते ही उनसे आत्मीयता की अनुभूति होती है। जैसे, यह ज्ञात होते ही कि संस्कृत उसी परिवार की भाषा है, जिस परिवार के अंग लैटिन, ग्रीक, अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, रूसी, अवेस्ता, फारसी आदि भाषाएं हैं, हमारी आत्मीयता इन भाषाओं के साथ हो जाती है और हम इन्हें अपने परिवार का अंग समझने समझने लगते हैं। इस प्रकार यह विश्वबन्धुत्व की भावना फैलाती जाती है।

साहित्य-ज्ञान का सहायक
भाषा-विज्ञान भाषा के सूक्ष्म अर्थों का विश्लेषण करता है। इसका अर्थ-विज्ञान अंग अर्थ-विकास की कहानी प्रस्तुत करता है। इससे न केवल शब्दों का अर्थ ज्ञात होता है, अपितु उनमें छिपी हुई काव्य की आत्मा 'ध्वनि' भी प्रस्फुटित होती है।

व्याकरण दर्शन
भाषा-विज्ञान व्याकरण का व्याकरण है । व्याकरण के नियमों का क्या दार्शनिक आधार है, इसका निरूपण भाषा-विज्ञान करता है। शब्द और अर्थ का संबंध, प्रकृति और प्रत्यय का मौलिक, पद-विभाजन का आधार आदि बातों का विवेचन दार्शनिक दृष्टि से भाषा-विज्ञान करता है।

वाक्-चिकित्सा
चिकित्सा-शास्त्र की दृष्टि से भाषा-विज्ञान एक आवश्यक अंग माना जाता है । तुतलाना, हकलाना, अशुद्ध उच्चारण, अशुद्ध या अस्पष्ट श्रवण आदि दोषों को दूर करने के लिए पाश्चात्य जगत् में वाक्-चिकित्सा को विशेष महत्त्व दिया जा रहा है। भाषाविज्ञान यह बताने में समर्थ होता है कि किस दोष के कारण अमुक व्यक्ति स्पष्ट बोलने में असमर्थ है तथा किस उपचार से उस रोग का उपशम हो सकता है।

संचार-साधनों का उपयोगी सहायक
दूर-संचार तथा यांत्रिक प्रतीकात्मक अनुवाद के लिए भाषा-विज्ञान की सहायता ली जाती है । भाषा-विज्ञान के संकेतों के द्वारा दूर-संचार-पद्धति के लिए आवश्यक संकेत उपलब्ध होते हैं।

भाषिक यंत्रीकरण में सहायक
भाषा विज्ञान भाषा-विषयक यंत्रों के निर्माण में विशेष सहयोगी है । टाइपराइटर, टेलीप्रिंटर, आडियोविजुअल आदि के विकास में विशेष सहयोगी है। भाषा-विज्ञान इनके लिए शुद्ध एवं उपयोगी संकेत चिन्ह प्रदान करता है।

लिपि-विकास में सहायक
भाषा-विज्ञान सांकेतिक लिपि के उन्नयन के द्वारा लिपियों में संशोधन, परिवर्तन और परिवर्धन करने में सहायक होता है।

विभिन्न शास्त्रों में समन्वय
भाषा-विज्ञान का ज्ञान और विज्ञान की अनेक शाखाओं से निकटतम संपर्क है । अतः भाषा-विज्ञान का विद्यार्थी व्याकरण, साहित्य, मनोविज्ञान, शरीर-विज्ञान, भूगोल, इतिहास, भौतिक-विज्ञान आदि विषयों में सामान्यतया स्वतः परिचित हो जाता है।

अनुवाद, पाठ-संशोधन, अर्थ-निर्णय आदि में सहायक
विभिन्न भाषाओं के ग्रन्थों आदि का अन्य भाषाओं में अनुवाद करने में, प्राचीन ग्रन्थों के पाठ-निर्णय में तथा प्राचीन शब्दों के अर्थ-निर्णय में भाषा-विज्ञान विशेष सहायक सिद्ध होता है।

विभिन्न विज्ञानों का जन्मदाता
भाषा-विज्ञान के द्वारा ही कई नवीन विज्ञानों की उत्पत्ति हुई है। भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर तुलनात्मक भाषा-विज्ञान का जन्म हुआ है। इसी प्रकार तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर तुलनात्मक देव-विज्ञान, पुरण-विज्ञान, विश्वसंस्कृति-विज्ञान, नृजाति-विज्ञान आदि विज्ञानों का उद्भव हुआ है। ये विज्ञान तुलनात्मक पद्धति पर आश्रित हैं।
उपर्युक्त विवेचन भाषा-विज्ञान की उपयोगिता का अनुमान लगाया जा सकता है।

हिन्दी भाषा और उसका विकास

संसार में बोली जाने वाली भाषाओं की निश्चित संख्या बता पाना संभव नहीं है। फिर भी यह अनुमान है कि विश्व में लगभग सात हजार भाषाएँ बोली जाती हैं। ध्वनि, व्याकरण तथा शब्द-समूह के आधार पर भौगोलिक दृष्टि से इन भाषाओं का वर्गीकरण पारिवारिक संबंधों के अनुसार किया गया है। इस वर्गीकरण में भारोपीय भाषा-परिवार बोलने वालों की संख्या, क्षेत्रफल और साहित्यिकता की दृष्टि से सबसे बड़ा परिवार है और यह भारत से यूरोप तक फैला हुआ है। भारोपीय परिवार की दस शाखाएँ मानी गई है, जिनमें एक है भारत-ईरानी शाखा। भारत-ईरानी शाखा की भारतीय आर्यभाषा, ईरानी और दरदी उपशाखाएं हैं।
भारतीय-आर्य भाषाओं को काल की दृष्टि से तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:-
  1. प्राचीन भारतीय आर्य-भाषाएँ (1500 ई.पू. तक)- संस्कृत आदि।
  2. मध्य भारतीय आर्यभाषाएँ (500 ई.पू. से 1000 ई. तक) – पालि, प्राकृत, अपभ्रंश आदि।
  3. आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएँ (1000 ई. से आज तक) - हिन्दी, बंगाली, मराठी आदि।
आधुनिक भारतीय-आर्य भाषाओं में हिन्दी भी एक मुख्य भाषा है। इसके विकास के इतिहास को भी तीन मुख्य कालों में बाँटा जा सकता है:-

आदि काल (1000 ई. से 1500 ई. तक)
इस काल में अपभ्रंश तथा प्राकृत का प्रभाव हिन्दी पर था और उस समय हिन्दी का स्वरूप निश्चित रूप से स्पष्ट नहीं हो पाया था। इस काल में मुख्य रूप से हिन्दी की वही ध्वनियाँ (अर्थात् स्वर एवं व्यंजन) मिलती हैं जो अपभ्रंश में प्रयुक्त होती थीं। कुछ ध्वनियों का अलग से आगम हुआ है - जैसे – अपभ्रंश में 'ड' और 'ढ' व्यंजन नहीं थे किंतु आदिकालीन हिन्दी में ये ध्वनियाँ मिलती हैं। इसके अतिरिक्त 'च, छ, ज, झ' ध्वनियाँ संस्कृत से अपभ्रंश तक स्पर्श ध्वनियाँ थीं, किंतु हिन्दी में आकर ये ध्वनियाँ स्पर्श-संघर्षी-सी हो गई (हालांकि कुछ विद्वान इन्हें स्पर्श ध्वनियाँ ही मानते हैं)। संस्कृत और अरबी-फारसी के शब्दों के आ जाने के कारण कुछ नए व्यंजन आ गए जो अपभ्रंश में नहीं थे। अपभ्रंश संयोगात्मकता से वियोगात्मकता की ओर मुड़ने लगी थी जिसे हिन्दी ने अपनाना आरंभ कर दिया। सहायक क्रियाओं और परसर्गों का प्रयोग अधिक होने लगा, जिससे हिन्दी का वियोगात्मक रूप और अधिक उभरने लगा। इसके अतिरिक्त वाक्य रचना में शब्दक्रम धीरे-धीरे निश्चित होने लगा और आदिकालीन हिन्दी में नपुंसक लिंग भी प्रायः समाप्त हो गया जो अपभ्रंश तक विद्यमान था। इसमें संस्कृत की तत्सम शब्दावली की वृद्धि हुई और मुसलमानों के आगमन से अरबी-फारसी तथा तुर्की शब्द भी आने लगे।

मध्यकाल (1500 ई. से 1800 ई. तक)
इस काल में अपभ्रंश का प्रभाव पूर्णतया समाप्त हो गया था और हिन्दी की सभी बोलियाँ विशेषकर ब्रज, अवधी और खड़ीबोली स्वतंत्र रूप में प्रयुक्त होने लगी थीं। इसमें शब्दांत में मूल व्यंजन के बाद 'अ' का लोप होने लगा - जैसे 'राम' का उच्चारण 'राम' हो गया। न केवल यही, दीर्घ स्वर से संयुक्त व्यंजन के पहले अक्षर में भी 'अ' का लोप होने लगा; जैसे - जनता - जन्ता। अरबीफारसी के प्रभाव से उच्चवर्ग की हिन्दी में 'क', ख, ग, ज़, फ़' पाँच नए व्यंजनों का आगम हुआ।
इस काल में भाषा आदिकालीन हिन्दी की अपेक्षा अधिक वियोगात्मक हो गई। सहायक क्रियाओं और परसों का प्रयोग और भी बढ़ गया। भक्ति-आंदोलन के अत्यधिक प्रभाव के कारण तत्सम शब्दों की अत्यधिक वृद्धि भी हई। इसके साथ-साथ अरबी-फारसी आदि आगत शब्दों की संख्या भी काफी बढ़ी। न केवल यही, यूरोप से संपर्क हो जाने के कारण पुर्तगाली, स्पेनी, फ्रांसीसी और अंग्रेजी के भी कमीज़, तौलिया, पिस्तौल, नीग्रो, कूपन, कारतूस, कोट, स्वेटर, माचिस, सिगरेट आदि कई शब्द आ गए। इसी काल में दक्खिनी हिन्दी का भी विकास हुआ जो हैदराबाद दक्षिण (गोलकुंडा, बीदर, गुलबर्गा आदि) में प्रचलित हुई।

आधुनिक काल (1800 ई. से अब तक)
साहित्य के क्षेत्र में खड़ीबोली का व्यापक प्रचार होने के कारण हिन्दी की अन्य बोलियाँ लगभग दब गईं। यह बात अलग है कि अपने-अपने प्रदेशों में इनका प्रयोग अब भी जारी है लेकिन उन पर भी खड़ीबोली का प्रभाव है। इसके अतिरिक्त अंग्रेजी के प्रभाव के कारण अरबी-फारसी की 'क', 'ख़', और 'ग' ध्वनियों का प्रयोग बहुत कम हो गया है लेकिन 'ज़' एवं 'फ़' का प्रयोग और अधिक बढ़ गया है। अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार से शिक्षित वर्ग में 'ऑ' ध्वनि का आगम हुआ है; जैसे - डॉक्टर, कॉलिज, ऑफिस।
इस काल में हिन्दी पूर्णतया वियोगात्मक भाषा बन गई है। इसके व्याकरण का मानक रूप काफी सुनिश्चित हो गया है। हिन्दी जहाँ संस्कृत के अतिरिक्त अरबी-फारसी से काफी प्रभावित रही है, वहाँ प्रेस, रेडियो और सरकारी काम-काज में अंग्रेजी का अत्यधिक प्रयोग होने के कारण हिन्दी की वाक्य-रचना और महावरे-लोकोक्तियों में अंग्रेजी का बहुत प्रभाव पड़ा है। स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद हिन्दी को सरकारी काम-काज की राजभाषा बनाने तथा विज्ञान, वाणिज्य आदि में प्रयोजनमूलक कार्य करने के कारण इसकी पारिभाषिक शब्दावली में अत्यधिक वृद्धि हुई है और अभी भी हो रही है। इस प्रकार शब्द-संपदा के समृद्ध होने से हिन्दी अपनी अभिव्यक्ति में अधिक समर्थ और गहरी होती जा रही है।
हिन्दी शब्द का उद्भव संस्कृत शब्द 'सिंधु' से माना गया है। यह सिंधु नदी के आसपास की भूमि का नाम है। ईरानी 'स' का उच्चारण प्रायः 'ह' होता है, इसलिए 'सिंधु' का रूप 'हिन्दू' हो गया और बाद में हिन्द' हो गया। इसका अर्थ हुआ 'सिंध प्रदेश' बाद में 'हिन्द' शब्द पूरे भारत के लिए प्रयुक्त होने लगा। इसमें ईरानी का 'इक' प्रत्यय लगने से 'हिन्दीक' शब्द बना, जिसका अभिप्राय है 'हिन्द् का' कहा जाता है कि इसी 'हिन्दी का' शब्द से यूनानी शब्द 'इंदिका' और वहीं से अंग्रेजी' शब्द 'इंडिया' बना है। विद्वानों के मतानुसार 'हिन्दीक' से 'क' शब्द के लोप हो जाने से हिन्दी शब्द रह गया जिसका मूल अर्थ 'हिन्द का होता है।
छठी शताब्दी के कुछ पहले ईरान में भारत की भाषाओं के लिए 'जुबान-ए-हिन्दी' का प्रयोग होता था। ईरान के प्रसिद्ध बादशाह नौशेरवाँ (531-579 ई.) ने अपने एक विद्वान हकीम बजरोया को 'पंचतंत्र' का अनुवाद कर लाने के लिए भारत भेजा था। बजरोया ने अपने अनुवाद में 'कर्कटक और दमनक' का 'कलीला और दिमना' नाम रखा। नौशेरवाँ के मंत्री बुजर्च मेहर ने इसकी भूमिका लिखते हुए इस अनुवाद को 'जुबान-ए-हिन्दी' से किया हुआ कहा है। यहाँ 'जुबान-ए-हिन्दी से अभिप्राय भारतीय भाषा अर्थात् संस्कृत से है। इसके बाद पद्य और गद्य में कई अनुवाद हुए और इन सभी अनुवादों में मूल पुस्तक को 'जुबान-ए-हिन्दी' ही कहा गया। संस्कृत के लिए यह नाम दसवीं शताब्दी तक चलता रहा। इसके पश्चात् 1227 ई. में मिनहाजुस्सिराज ने अपनी पुस्तक 'तबकाते नासिरी' में 'जबान-ए-हिन्दी' के संदर्भ में विहार का अर्थ 'मदरसा' रखा। इससे यह संकेत मिलता है कि इस काल में 'जुबान-ए-हिन्दी का प्रयोग संस्कृत के लिए न होकर भारतीय भाषा या भारत के मध्य भाग अर्थात् मध्यदेशीय बोलियों के लिए हो रहा था।
14वीं शताब्दी में "हिन्दी' शब्द का प्रयोग एक ही भाषा के लिए होने लगा। सन् 1333 ई. में इब्न बतूता ने अपने 'रेहला इब्न बतूता' में 'किताबत अलाबज अलजदरात विल हिन्दी अर्थात् 'कुछ दीवारों पर हिन्दी में लिखा था, उल्लेख किया है। सन् 1424 ई. में तैमूरलंग के पोते के शासनकाल में शरफुददीन यज़्दी के 'ज़फरनामा' में 'हिन्दी शब्द मिलता है। इस प्रकार विदेश में यह हिन्दी के लिए 'हिन्दी' शब्द का प्रथम प्रयोग माना जाता है। हिन्दी शब्द का प्रयोग वस्तुतः विदेश में मुसलमानों ने किया था।
भारतीय परंपरा में 'प्रचलित भाषा' के लिए प्राचीन काल से ही 'भाषा' शब्द का प्रयोग होता आया है जो क्रमशः संस्कृत, प्राकृत और बाद में हिन्दी के लिए प्रयुक्त हुआ है। कबीर, जायसी, तुलसी आदि ने अपने साहित्य में प्रयुक्त भाषा को 'भाषा' की संज्ञा दी है जबकि वह हिन्दी थी; जैसे -
  • 'संस्कृत कबिरा कूप-जल भाषा बहता नीर। - कबीर
  • आदि अंत जसि कथ्था अहै, लिखि भाषा चौपाई कहे। - जायसी
  • भाषा भनति मोर मति थोरी। - तुलसी
फोर्ट विलियम कॉलिज में हिन्दी के अध्यापक के लिए भाषा मुंशी' का प्रयोग हुआ है। यह 'भाषा' शब्द बाद में 'भाखा' के रूप में भी प्रयुक्त होता रहा जो आधुनिक काल तक चलता रहा। वास्तव में 'भाखा' शब्द ब्रजभाषा के लिए रूढ़ हो गया।
विद्वानों के मतानुसार भारत में 'हिन्दी' शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम अमीर खुसरो ने किया था – 'जुज़्बे चंद नज़में हिन्दी नीज़ नज़ेदोस्तां करदा शुदा अस्त' बाद में 'खालिकबारी' कोश में इसका प्रयोग कई बार हुआ है। यह भी उल्लेखनीय है कि 'हिन्दी' की अपेक्षा 'हिन्दवी' शब्द अधिक प्राचीन है। हिन्दी, हिन्दवी शब्द का प्रयोग अमीर खुसरो ने भी कई स्थलों पर किया है। एक स्थान पर वे कहते हैं – 'तुर्क हिन्दुस्तानिम मन हिन्दवी गोयम जवाब' अर्थात् 'हिन्दुस्तानी तुर्क हूँ, हिन्दवी में जवाब देता हूँ। यह भी तर्क दिया जाता है कि हिन्दी शब्द का प्रयोग पहले भारतीय मुसलमानों के लिए होता था और 'हिन्दवी' शब्द मध्यदेशीय भाषा के संदर्भ में। यह 'हिन्दवी' शब्द वस्तुतः हिन्दवी या हिन्दुई है। कुछ विद्वान इसे हिन्दुओं की भाषा भी कहते हैं – (हिन्दू + ई अर्थात् हिन्दुओं की भाषा) बाद में यह हिन्दवी शब्द हिन्दी भाषा के लिए प्रयुक्त होने लगा। इस दृष्टि से 'हिन्दवी' शब्द पुराना है और 'हिन्दी' अपेक्षाकृत बाद का । तुलसी के 'फारसी पंचनामे', जटमल की 'गोरा बादल की कथा' तथा इंशा अल्ला खां की 'रानी केतकी की कहानी' में भी केवल हिन्दवी शब्द समानार्थी हो गए। 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक हिन्दवी 'भाखा' या भाषा के संदर्भ में प्रयुक्त होती रही। हातिम के 'दीवानजादे' के दोबाचे में लिखा है 'जबान दर दार ता बहिन्दवी कि आरां माका गोयन्द'। इससे स्पष्ट होता है कि 'हिन्दवी' और 'भाखा' प्रायः एक ही अर्थ में प्रयुक्त होते थे किंतु हिन्दवी या हिन्दी का नाम अकबर की शासनकालीन स्वीकृत भाषाओं में उपलब्ध नहीं होता। अमीर खुसरो के ग्रंथ 'नुहसिपर' में उस काल की जिन ग्यारह भाषाओं-सिंधी, लाहौरी, कश्मीरी, गौड़ी, तिलंगी, मारवाड़ी, गुजराती, मराठी, कर्नाटकी, बंगाली, सिंधी, अफगानी-बलूचिस्तानी मिलते हैं उनमें भी हिन्दी या हिन्दवी का उल्लेख नहीं है। किंतु ऐसा माना जाता है कि अमीर खुसरो और अबुल फजल ने 'देहलवी' भाषा का भी उल्लेख किया है। वह मध्यदेशीय भाषा या हिन्दी से ही अभिप्रेत है। इस दृष्टि से यह कह सकते हैं कि हिन्दवी या हिन्दी शब्द कदाचित् साहित्य तक सीमित हो।
हिन्दवी या हिन्दी शब्द के अविच्छिन्न प्रयोग की परंपरा दक्खिनी कवियों और गद्यकारों में भी पाई जाती है। हज़रत बंदेनवाज़ गेसूदराज, शाह बुरहानुददीन जानम, मीराजें शम्सुल इश्शाक, मुल्ला वजही आदि दक्खिनी साहित्यकारों ने अपनी कृतियों में हिन्दवी या हिन्दी शब्द का प्रयोग किया है। वास्तव में दक्षिण भारत में हिन्दी को 'दक्खिनी' कहा जाता था। पूर्व और पश्चिम भारत में हिन्दी 'भाखा' के नाम से विख्यात थी। 18वीं शताब्दी तक आते-आते 'हिन्दी' नाम ने अपना स्थायी रूप ले लिया। 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक उर्दू के लेखकों में प्रायः हिन्दी का प्रयोग उर्दू या रेख्ता के समानार्थी के रूप में चलता था, किंतु आज 'हिन्दी' शब्द विवादास्पद बन गया है।
यह प्रश्न प्रायः उठता है कि उर्दू एक अलग भाषा है या हिन्दी की एक शैली है। हिन्दुस्तानी शब्द से क्या तात्पर्य है? क्या यह हिन्दी-उर्दू दोनों का सामान्यीकृत रूप है और बोलचाल की भाषा के रूप में बोली जाती है? इसलिए इन तीनों शब्दों - हिन्दी. हिन्दुस्तानी, और उर्दू की व्युत्पति के बारे में जानने के बाद हिन्दी के स्वरूप को सही परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है:

उर्दू
'उर्दू' शब्द तुर्की भाषा का है जिसका अर्थ है 'शाही शिविर' या 'खेमा' जब मुगल बादशाह भारत आए तो उन्होंने यहाँ बड़े-बड़े फौजी पड़ाव डाले जिन्हें 'उर्दू-ए-मुअल्ला' कहा जाता था। स्थानीय लोगों से परस्पर संप्रेषण करते-करते इनकी भाषा अरबी-फारसीतुर्की में पंजाबी, बाँगरू, कौरवी, ब्रज आदि का मिश्रण होने लगा, जिससे एक नए भाषारूप का विकास हुआ। इस नए भाषा रूप को 'जुबान-ए-मुअल्ला' कहा गया। बाद में इसका संक्षिप्त रूप 'उर्दू' हो गया। कुछ लोग इसे 'हिन्दी' या 'रेख्ता' भी कहते हैं। इस प्रकार उर्दू और हिन्दी में कोई भेद नहीं है किंतु अलगाव की प्रवृत्ति आने से उर्दू में अरबीफारसी शब्दों, मुहावरों आदि का अधिकाधिक प्रयोग किया गया और अरबी-फारसी लिपि को अपनाया गया जिससे इसे अलग रूप देने का प्रयास किया गया जबकि इन दोनों का व्याकरण एक ही है। वास्तव में उर्दू एक ओर हिन्दी की एक विशिष्ट शैली है किंतु दूसरी ओर इसने एक विशिष्ट साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपरा का निर्माण भी किया है जिसे हिन्दी परंपरा के समानांतर रखा जा सकता है और इसी कारण इसकी अपनी भाषायी अस्मिता भी है।

हिन्दुस्तानी
'हिन्दुस्तानी' शब्द 'हिन्दुस्तान' + 'ई' के योग से बना है। निर्यसन, धीरेन्द्र वर्मा आदि कई विद्वानों का मत है कि इसका प्राचीन प्रयोग हिन्दवी, हिन्दुई या हिन्दुवी नाम से मिलता है। 13वीं शताब्दी में औफी और अमीर खुसरो ने इसका प्रयोग किया है। बाद में 'हिन्दवी' नाम उस भाषा के लिए सीमित हो गया जिसमें अरबी-फारसी के शब्दों का बाहुल्य था। बाद में हिन्दुस्तानी हिन्दी, उर्दू के बीच की भाषा मानी जाने लगी जिसमें सरल शब्दावली थी। इसमें संस्कृत तथा अरबी-फारसी के तद्भव रूप थे जो जनसाधारण की भाषा में खप गए। गांधीजी जैसे कई मनीषियों ने हिन्दुस्तानी शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में किया था। वास्तव में हिन्दी-उर्दू भाषा को सांप्रदायिकता से जोड़ कर मज़हबी भाषा बनाने का जो कुप्रयास हुआ, उसे मिटाने के लिए महात्मा गांधी जैसे राजनेता और प्रेमचंद जैसे साहित्यकार ने हिन्दुस्तानी को अपनाया। इस प्रकार हिन्दुस्तानी हिन्दी की बोल चाल का एक सरल रूप है जो भाषा की प्रकृति से जड़ी स्वाभाविक शैली है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि हिन्दी और उर्द के स्रोत क्रमशः संस्कृत और अरबी-फारसी हैं। यदि संस्कृत और अरबी-फारसी के शब्दों की बहुलता न हो तो इन दोनों भाषाओं में कोई अंतर नहीं होगा। इन दोनों का सामान्यीकृत रूप ही 'हिन्दुस्तानी' कहलाता है। वास्तव में प्रारंभ में 'हिन्दी शब्द का प्रयोग हिन्दी और उर्द दोनों के लिए होता था - 'दर जुबान-ए-हिन्दी की मुराद उर्दू अस्त' बाद में अंग्रेजों ने पृथकतावादी नीति के कारण ऐसी भाषा-नीति अपनाई जिसमें हिन्दी और उर्दू को अलग-अलग माना गया। इन दोनों भाषाओं का व्याकरण भी कलकत्ता के फोर्ट-विलियम कॉलिज में डॉ. गिलक्राइस्ट के निर्देशन में अलग-अलग लिखा गया।

हिन्दी भाषा का स्वरूप और क्षेत्र

आज 'हिन्दी' शब्द का प्रयोग मुख्यतः तीन संदर्भ में हो रहा है:-
  1. भौगोलिक संदर्भ
  2. साहित्यिक संदर्भ
  3. प्रयोग-विस्तार का संदर्भ

भौगोलिक संदर्भ : हिन्दी का क्षेत्र बिहार, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली तथा पंजाब के कुछ भाग तक फैला हुआ है। इन्हें हिन्दीभाषी प्रदेश भी कहा जाता है। हिन्दी को पाँच वगों अथवा उपभाषाओं में बाँटा गया है जिनके अंतर्गत 18 मुख्य बोलियाँ आती हैं। ये वर्ग हैं - पश्चिमी हिन्दी, पूर्वी हिन्दी, बिहारी, राजस्थानी और पहाड़ी। यह वर्गीकरण जार्ज ग्रिर्यसन द्वारा किया गया है, जो भ्रामक और अवैज्ञानिक माना गया है क्योंकि ग्रिर्यसन ने ऐतिहासिक दृष्टि से व्याकरणिक समानता को देखा और उसके कारण परस्पर बोधगम्यता तथा साहित्य और संस्कृति के आधार पर उसकी जातीय अस्मिता को ध्यान में रखा न कि भाषा और बोली के विभेदक लक्षणों को। इन विभेदक लक्षणों में जातीय अस्मिता और जातीय बोध की अवधारणा निहित है। इन वर्गों के अंतर्गत तीन-चार बोलियाँ आती हैं जिनका विवरण इस प्रकार है:
  • पश्चिमी हिन्दी – खड़ीबोली (या कौरवी), ब्रजभाषा, हरियाणवी (या बाँगरू), कनौजी और बुंदेली।
  • पूर्वी हिन्दी - अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी।
  • बिहारी – भोजपुरी, मगही और मैथिली
  • राजस्थानी - जयपुरी, मारवाड़ी, मेवाती और मालवी।
  • पहाड़ी – पश्चिमी पहाड़ी (हिमाचली) और मध्यवर्ती पहाड़ी (कुमायूंनी-गढ़वाली)।
इन सभी बोलियों को आरेख में दिया गया है। इनका संक्षिप्त परिचय नीचे दिया जा रहा है।

खड़ीबोली
'खड़ीबोली' का विकास शौरसेनी अपभ्रंश के उत्तरी रूप से हुआ है। इसमें 'खड़ी' शब्द 'खड़ी पाई' की अधिकता के कारण (जैसे आया, बड़ा, लड़का आदि) तथा ध्वनि में कर्कशता के कारण जोड़ते हैं। कुछ विद्वानों ने इसका प्रयोग कौरवी बोली के रूप में किया है क्योंकि इसका संबंध कुरु प्रदेश से है। सामान्य बोलचाल में इसे हिन्दुस्तानी भी कहा जाता है। यह बोली मुख्यत: देहरादून के मैदानी भाग, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, दिल्ली, गाजियाबाद, बिजनौर, मुरादाबाद, रामपुर तथा आस-पास के क्षेत्रों में बोली जाती हैं। खड़ीबोली के दो रूप हो गए हैं – एक हिन्दी और दूसरा उर्दू। हिन्दी में संस्कृत शब्दों की प्रधानता और उर्दू में अरबी-फारसी के शब्दों की भरमार है। इन भाषाओं के भेद का कारण लिपि भी है। हिन्दी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है और उर्दू अरबी-फारसी लिपि में। साहित्यिक रूप और लिपि के इन दोनों कारणों को हटा दिया जाए तो इन दोनों में कोई विशेष अंतर दिखाई नहीं देगा। इसीलिए हिन्दी और उर्दू को एक ही भाषा (हिन्दी-उर्दू) की साहित्यिक बोलियाँ कहा गया है। खड़ीबोली पहले एक बोली के रूप में थी, लेकिन बाद में इसका अत्यधिक प्रसार, परिष्कार और विकास हुआ जिससे यह आज संपूर्ण भारत की राजभाषा और संपर्क भाषा के रूप में अभिमंडित है। वर्तमान काल में यह साहित्य-भाषा और शिक्षा के माध्यम की भाषा के रूप में प्रयुक्त हो रही है।

ब्रजभाषा
ब्रज भाषा का विकास शौरसेनी अपभ्रंश के मध्यवर्ती रूप से हुआ है। साहित्य और लोक साहित्य की दृष्टि से ब्रजभाषा का बहुत ही महत्व है। मध्यकाल में साहित्यभाषा के रूप में इसका प्रसार एवं प्रचार गुजरात से लेकर बंगाल तक था। आज इसका स्थान खड़ीबोली ने ले लिया है। इस भाषा के प्रसिद्ध कवि सूरदास, नंददास, रहीम, रसखान, बिहारी, देव, रत्नाकर आदि हुए। यह बोली मथुरा, आगरा, अलीगढ़, मैनपुरी, एटा, बदायूँ तथा आस-पास के क्षेत्रों में बोली जाती है।

हरियाणवी
हरियाणवी बोली हरियाणा राज्य में, दिल्ली के ग्रामीण क्षेत्रों में और पटियाला के आस-पास बोली जाती है। इसका शौरसेनी और पंजाब की सीमा के साथ लगे रहने के कारण इस पर राजस्थानी और पंजाबी का प्रभाव पाया जाता है। यह खड़ीबोली से काफी मिलती-जुलती है। हरियाणवी के लोक साहित्य का महत्वपूर्ण स्थान है, यद्यपि साहित्यिक रूप बहुत ही कम है।

कनौजी
इस बोली का केंद्र कनौज है। इसका क्षेत्र अवधी और ब्रजभाषा के बीच में पड़ता है। यह मुख्यतः फरूखाबाद, इटावा, शाहजहाँपुर, कानपुर, पीलीभीत, हरदोई आदि क्षेत्रों में बोली जाती है। इसका विकास भी शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है। यह ब्रजभाषा से काफी मिलती-जुलती है। कनौजी का लोक साहित्य काफी उत्कृष्ट है किंतु साहित्यिक रूप बहुत ही कम मिलता है।

बुंदेली
मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश की सीमा के आस-पास के क्षेत्र को बुंदेलखंड कहते हैं। इस क्षेत्र की बोली को बुंदेली या बुंदेलखंडी कहा जाता है। इस बोली का विकास भी शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है। बुंदेली लोक साहित्य काफी समृद्ध है जिसमें 'इसुरी के फाग' प्रसिद्ध हैं। बुंदेली और ब्रजभाषा में काफी समानता मिलती है। यह झाँसी, हमीरपुर, ग्वालियर, सागर, ओरछा, होशंगाबाद तथा आस-पास के क्षेत्रों में बोली जाती है।

अवधी
यह अयोध्या अर्थात् अवध के आस-पास बोली जाती है। इसका क्षेत्र लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली, सीतापुर, सीरी, फैजाबाद, बहराइच, सुलतानपुर, प्रतापगढ़, और बाराबंकी तक फैला हुआ है। इसके अतिरिक्त यह इलाहाबाद, मिर्जापुर, फतेहपुर, जौनपुर आदि के कुछ भागों में भी बोली जाती है। अधिकतर विद्वान इसका विकास अर्द्ध-मगधी अपभ्रंश से मानते हैं। अवधी में साहित्य और लोक साहित्य दोनों काफी मात्रा में उपलब्ध है। इसके प्रसिद्ध कवि जायसी, गोस्वामी तुलसीदास, कुतुबन, उसमान आदि हैं।

बघेली
अवधी के दक्षिण में बघेली का क्षेत्र है। इसका केंद्र रीवाँ तथा आस-पास का इलाका है किंतु यह दमोह, जबलपुर, मांडला और बालाघाट के जिलों तक भी फैली हुई है। इसका विकास भी अर्द्ध-मगधी अपभ्रंश से माना गया है। यह बोली अवधी के काफी निकट है।

छत्तीसगढ़ी
इसका मुख्य केन्द्र छत्तीसगढ़ होने के कारण इसे छत्तीसगढ़ी कहा जाता है। इसे लरिया या खल्ताही भी कहते हैं। इसका क्षेत्र रायपुर, बिलासपुर, सरगुजा, रायगढ़, कौरिया, खैरागढ़, दुर्ग, नंदगाँव, कांकेर आदि तक फैला हुआ है। इसका विकास भी अर्द्ध-मगही से हुआ है। छत्तीसगढ़ी में मुख्यतः लोक साहित्य उपलब्ध है।

भोजपुरी
यह प्राचीन काशी जनपद की बोली है। बिहार के शाहबाद जिले के भोजपुर कस्बे के नाम पर इस बोली का नाम 'भोजपुरी' पड़ा है. हालांकि इसका क्षेत्र बहुत बड़ा है। यह बोली बनारस, मिर्जापुर, जौनपुर, गाजीपुर, बलिया, गोरखपुर, देवरिया, बस्ती, आजमगढ़, शाहबाद, चंपारन, सारण, सीवान, बक्सर तथा आस-पास के क्षेत्रों में प्रयुक्त होती है। इसका विकास मागधी अपभ्रंश के पश्चिमी रूप से माना जाता है। इसमें अधिकतर लोक साहित्य मिलता है।

मगही
मगही गंगा के दक्षिण में पटना और गया जिलों तथा हजारीबाग और भागलपुर के कुछ हिस्सों में बोली जाती है। इसका नाम संस्कृत के 'मगध' शब्द के अपभ्रंश रूप 'मगह' पर आधारित है और यह मागधी अपभ्रंश से विकसित हुई है। इसका लोक साहित्य पर्याप्त मात्रा में मिलता है।

मैथिली
मैथिली का क्षेत्र गंगा के उत्तर में दरभंगा, सहरसा, समस्तीपुर, पूर्णिया जिलों तथा मुजफ्फरपुर जिले के पूर्वी भाग तक फैला हुआ है। वास्तव में यह मागधी अपभ्रंश के मध्यवर्ती रूप से विकसित होकर हिन्दी और बंगाली क्षेत्र के संधि-स्थल पर मिथिला में बोली जाती है। मैथिली का लोक साहित्य काफी समृद्ध है। इसके अतिरिक्त इसमें साहित्य-रचना प्राचीन काल से होती चली आई है। इसके प्रसिद्ध कवि विद्यापति हुए हैं। इसकी अपनी लिपि है जो बंगाली लिपि से मिलती-जुलती है। इस बोली को संविधान की आठवीं अनुसूची की मुख्य भाषाओं में स्थान दिया गया है।

जयपुरी
राजस्थान के पूर्वी भाग में जयपुरी बोली जाती है। इसी के साथ हाड़ौती भी बोली जाती है। जयपुरी बोली का विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है। इसको ढूँढाणी भी कहते हैं। इसमें लोक साहित्य काफी रचा गया है। इसका क्षेत्र जयपुर, अजमेर, कोटा तथा बूंदी तक फैला हुआ है।

मारवाड़ी
इसका विकास भी शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है। पुरानी मारवाड़ी को डिंगल भी कहते हैं। यह पश्चिमी राजस्थान अर्थात् जोधपुर, उदयपुर, जैसलमेर, बीकानेर, मेवाड़, आदि में बोली जाती है। मारवाड़ी में लोक साहित्य पर्याप्त मात्रा में मिलता है और साहित्य की दृष्टि से मीरा के पद इसी में लिखे गए हैं।

मेवाती
इसका क्षेत्र उत्तरी राजस्थान के अलवर, भरतपुर, तथा हरियाणा के गुड़गाँव जिले के आस-पास है। यह नाम 'मेओ' जाति के इलाके मेवात के नाम पर पड़ा है। इसका विकास भी शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है। इसमें केवल लोक साहित्य उपलब्ध है।

मालवी
यह राजस्थान के दक्षिणी क्षेत्र मालवा और उसके आस-पास बोली जाती है। इसके अन्य क्षेत्र इंदौर, उज्जैन, रतलाम, होशंगाबाद आदि हैं। यह बोली शौरसेनी अपभ्रंश से विकसित हुई है। इसमें भी पर्याप्त लोक साहित्य मिलता है। 

पश्चिमी पहाड़ी (हिमाचली)
इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है और इसमें लोक साहित्य काफी मात्रा में मिलता है। पश्चिमी पहाड़ की बोलियाँ हिमाचल प्रदेश के शिमला, कल्ल, मंडी, कांगड़ा, चंबा, आदि हैं। इसकी कांगडी. मडियाली. चंबआली. कुलंबी, सिरमौरी, क्यिोथली, बघाटा आदि कई उपबोलियाँ हैं। इन उपबोलियाँ के समग्र रूप को 'हिमाचली बोली' भी कहते हैं। गढ़वाली : यह मध्यवर्ती पहाड़ी बोली है जिसका मुख्य क्षेत्र उत्तराखंड प्रदेश के गढ़वाल और उसके आस-पास का इलाका है। यह गढ़वाल तथा मसूरी के निकटवर्ती पहाड़ी प्रदेश में बोली जाती है। यह बोली भी शौरसेनी अपभ्रंश से विकसित हुई और इसका लोक साहित्य पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है।

कुमायूँनी
यह मध्यवर्ती पहाड़ी बोली है जो उत्तराखंड प्रदेश के नैनीताल, अलमोड़ा के निकटवर्ती पहाड़ी इलाकों में बोली जाती है। यह बोली भी शौरसेनी अपभ्रंश से विकसित हुई है और इसका लोक साहित्य भी काफी समृद्ध है। कुछ विद्वानों ने उपर्युक्त बोलियों के अतिरिक्त निमाड़, हाड़ौली, अंगिका को भी मुख्य बोली के रूप में स्वीकार किया है। इनका अध्ययन करने से हम देखते हैं कि हिन्दी का विकास शौरसेनी, अर्द्ध-मागधी और मागधी अपभ्रंश से हुआ है। यद्यपि इसके कुछ रूप पालि- प्राकृत में मिल जाते हैं किंतु इसका विकसित रूप अपभ्रंश के बाद ही माना जाता है।

साहित्यिक संदर्भ
इसमें साहित्य अथवा काव्य क्षेत्र में मैथिली, राजस्थानी (मारवाड़ी), ब्रजभाषा, अवधी तथा खड़ीबोली आते हैं। इन बोलियों में हिन्दी के पद्य और गद्य की रचना हुई है। इन बोलियों के प्रतिनिधि कवि एवं साहित्यकार विद्यापति, चंदबरदाई, तुलसीदास, सूरदास, बिहारी, अमीर खुसरो, भारतेंदु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद, रामचंद्र शुक्ल, अज्ञेय आदि हैं।

प्रयोग-विस्तार का संदर्भ
यह खड़ीबोली से विकसित साहित्य और मानक भाषा है जिसमें हिन्दी की अन्य बोलियों और कई भाषाओं का भी योगदान है। इसका प्रयोग संघ की राजभाषा के रूप में हो रहा है। खड़ीबोली का यह मानक रूप क्षेत्र-निरपेक्ष और सार्वदेशिक है जो समूचे भारत में बोली और समझी जाती है।
इस प्रकार हिन्दी का क्षेत्र बिहार, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, दिल्ली, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ तक फैला हुआ है। इन्हें हिन्दी भाषी क्षेत्र कहा जाता है। इन प्रदेशों की सीमाएँ पश्चिमी बंगाल, उड़ीसा, महाराष्ट्र, गुजरात और पंजाब राज्यों के साथ जुड़ी हुई हैं। यह महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, अंडमान-निकोबार और गोवा प्रदेशों में द्वितीय भाषा के रूप में प्रयुक्त होती है।

सारांश

इस प्रकार हम देखते हैं कि भाषा प्रतीकों की आंतरिक व्यवस्था है, जिसमें ध्वनिपरक एवं व्याकरणिक इकाइयाँ एक-दूसरे के साथ व्यवस्थित रूप में जुड़ी होती हैं। इससे अर्थ का बोधन होता है। ये भाषिक इकाइयाँ अपने-आप में स्वायत्त न होकर संरचनात्मक संबंधों के प्रकार्य के रूप में कार्य करती है। प्रत्येक व्यक्ति अपने अंतस में इन संबंधों के नियमों को जानता है जो उसके भीतर अज्ञात रूप से या सुषुप्त भाव से पड़े रहते हैं। वह अपनी सर्जनात्मक शक्ति के द्वारा उन नियमों के आधार पर ऐसे नए वाक्यों का निर्माण करता है, जो न कभी पहले बोले गए हों न कभी सुने गए हों। ये वाक्य व्याकरण और अर्थ के धरातल पर समझे जाते हैं। भाषा को विभिन्न संदर्भो में प्रयुक्त किया जाता है, जिससे उसके विविध रूप आते हैं, जैसे - व्यक्ति बोली, बोली, भाषा, राजभाषा, राष्ट्रभाषा, मानक भाषा, कृत्रिम भाषा, मृतभाषा।
इसी संदर्भ में हिन्दी भाषा को अपनी विकास यात्रा में कई पड़ावों से गुजरना पड़ा जिससे हिन्दी का स्वरूप निखरता गया। हिन्दी का एक व्यापक रूप स्थापित हो गया है जिसकी परिभाषा भौगोलिक, साहित्यिक और प्रयोग-विस्तार की दृष्टि से की जाती है। इस भाषा की अट्ठारह प्रमुख बोलियाँ मानी गई हैं। इसी व्यापकता के कारण यह भारत की राजभाषा के पद पर सुशोभित है।

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