भ्रष्‍टाचार निवारण अधिनियम | bhrashtachar nivaran adhiniyam

भ्रष्‍टाचार निवारण अधिनियम

भ्रष्टाचार को अल्पतम करने तथा उसके निवारण एवं रोकथाम के लिये भारत में कानूनी व संस्थागत दोनों उपाय किये गए हैं। भारतीय दंड संहिता की धारा 161 से 165 भ्रष्टाचार से संबंधित हैं। 1947 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1947 बनाया गया जिसे 1952 और 1964 में संशोधित किया गया। 1988 में एक अधिक सशक्त भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 बनाया गया। भ्रष्टाचार की चुनौती से निपटने के लिये संथानम समिति की सिफारिश पर 1964 में केंद्रीय सतर्कता आयोग का गठन किया गया। इसके अतिरिक्त भ्रष्टाचार से निपटने के लिये विभिन्न मंत्रालयों तथा विभागों की सतर्कता इकाइयाँ व केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की स्थापना भी की गई है।
भ्रष्टाचार को कम करने के लिये निम्नलिखित ढाँचे विकसित किये गए हैं-

भ्रष्टाचार को अल्पतम करने के ढाँचे/संरचना

संवैधानिक ढाँचा

संस्थागत ढाँचा

सामाजिक ढाँचा

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1947

संघ सरकार-कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग

नागरिक पहल-नागरिक घोषणा पत्र (Citizen Charter), सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005, व्हिसल

ब्लोअर आदि।

दंड विधि संशोधन अधिनियम, 1952

केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC)

मिथ्या दावा अधिनियम

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988

भारत सरकार के सभी मंत्रालयों/विभागों में सतर्कता यूनिटें

प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक एवं सोशल मीडिया  की भूमिका

भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018

केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI)

सामाजिक लेखा-जोखा

निजी क्षेत्र में लिप्त भ्रष्टाचार से निपटनेहेतु कंपनी अधिनियम, 1953 अधिनियम, 2013

राज्य सतर्कता आयोग एवं अन्य सतर्कता प्रणालियाँ

सामाजिक सर्वसहमति बनाना

भ्रष्ट तरीकों से प्राप्त की गई गैर-कानूनी संपत्तियों को जब्त करना।

भारत में भ्रष्टाचार निवारण व्यवस्था का मूल्यांकन

 

बेनामी लेन-देन का निषेध

लोकपाल

 

व्हिसल ब्लोअर की सुरक्षा

लोकायुक्त

 

गंभीर आर्थिक अपराध नियंत्रण संबंधी कानून

स्थानीय स्तर पर ओम्बुड्समैन

(Ombudsman)

 

मामलों के पंजीकरण के लिये पूर्व सहमति : दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना  अधिनियम, 1946 की धारा 6(क)

जाँच और अभियोजन को सुदृढ़ करना

 

सिविल सेवकों को संवैधानिक रक्षण अनुच्छेद 311

 

 

सांविधिक रिपोर्ट देने की बाध्यताएँ

 

 

  • भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1947
  • दंड विधि (संशोधन) अधिनियम, 1952
  • भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988
  • भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1947

इस अधिनियम में भारतीय दंड संहिता की धारा 161 से 165 तक जिसमें भ्रष्ट लोक-सेवकों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही करने के लिये भ्रष्टाचार संबंधी परिभाषा के वैधानिक उपबंधों को यथावत् रखा गया। तथापि, इस कानून में एक नए अपराध की परिभाषा दी गई-“पद कर्त्तव्य के निर्वहन में आपराधिक कदाचार।" जिसके लिये सज़ा का प्रावधान न्यूनतम एक वर्ष
और अधिकतम 7 वर्ष किया गया था। इसके अंतर्गत कुछ मामलों में सबूत देने का प्रभार भी अभियुक्त पर ही डाला गया जिसमें यह उपबंध किया गया कि जब कभी यह साबित कर दिया जाता है कि 'लोक-सेवक' ने कोई परितोषण ग्रहण किया है तो यह उपधारणा की जाएगी कि लोक-सेवक ने भारतीय दंड सहिता की धारा 161 के तहत भ्रष्टाचार किया है। यह अधिनियम भ्रष्टाचार नियंत्रण के लिये बना प्रथम कानून था।

दंड विधि (संशोधन) अधिनियम, 1952

दंड विधि संशोधन अधिनियम, 1952 के आ जाने से भ्रष्टाचार से संबंधित कानूनों में कुछ परिवर्तन हुए। भारतीय दंड संहिता की धारा 165 के अधीन उल्लिखित सज़ा को दो वर्षों की बजाय तीन वर्षों तक कर दिया गया। इसके साथ ही भारतीय दंड संहिता में एक नई धारा 165(क) जोड़ दी गई जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 161 और 165 में परिभाषित किये गए अपराधों को दुष्प्रेरित करना भी अपराध बना दिया गया। यह भी अनुबंध किया गया कि भ्रष्टाचार से संबंधित सभी अपराधों की सुनवाई विशेष न्यायाधीशों द्वारा ही की जाए।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988

इस अधिनियम में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1947, दंड विधि (संशोधन) अधिनियम, 1952 और भारतीय दंड संहिता के कुछ उपबंधों को समेकित किया गया है। इस अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं 
  • इसमें 'लोक-सेवक' शब्द की परिभाषा का विस्तार किया गया है, साथ ही इसमें जहाँ 'लोक कर्त्तव्य' की नवीन अवधारणा को भी समिलित किया गया। भारतीय दंड संहिता में भ्रष्टाचार से संबंधित अपराधों को अधिनियम के अध्याय 3 में रखा गया है। और भारतीय दंड संहिता से उन अपराधों को हटा दिया गया है।
  • अधिनियम के अधीन सभी मामलों की  सुनवाई विशेष न्यायाधीशों द्वारा ही होगी। साथ ही न्यायालय की कार्यवाही दिन-प्रतिदिन के आधार पर होगी।
  • विविध अपराधों के लिये जाने में वृद्धि की गई है।
  • दंड प्रक्रिया संहिता (केवल इस अधिनियम के प्रयोजन के लिये) में मामलों की सुनवाई के शीघ्र निपटान के लिये संशोधन किया गया है।
  • यह अनुबंध किया गया है कि कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन कार्यवाही पर रोक के आदेश मंजूर की गई
  • शास्ति में किसी चूक या अनियमितता के आधार पर तब तक नहीं जारी करेगा, जब तक न्यायालय के विचार में उचित न्याय करने में विफलता न हुई हो।
  • रिश्वत देने वाले व्यक्ति को उपधारणा, उन्मुक्ति, उपपुलिस अधीक्षक के स्तर के अधिकारी द्वारा बैंकों के रिकॉर्डों तक पहुँच आदि प्रावधानों को पहले जैसा ही रखा गया है।
  • भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 में धारा 7 से धारा 15 में रिश्वत के अपराधों और अन्य संबंधित अपराधों एवं जुर्मानों को सूचीबद्ध किया गया है। इन अपराधों में किसी पदेन कृत्य को करने या न करने के लिये किसी लाभ हेतु उपहार या इनाम के रूप में असंवैधानिक परितोषण को ग्रहण करना या किसी व्यक्ति के प्रति पक्षपात करना या पक्षपात न करना, किसी मूल्यवान वस्तु को बिना प्रतिफल या अपर्याप्त प्रतिफल के प्राप्त करना, परितोषण प्राप्ति में संलिप्त आपराधिक कदाचार, बिना किसी लोकहित के किसी व्यक्ति से धन लाभ प्राप्त करना या किसी व्यक्ति की आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक आर्थिक संसाधन या संपत्तियाँ होना शामिल हैं।
भ्रष्ट लोक-सेवकों द्वारा क्षतिपूर्ति करने का दायित्व
एक ओर लोकसेवकों द्वारा किये जाने वाले भ्रष्ट कृत्य के कारण वे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत सज़ा के पात्र हैं, वहीं दूसरी ओर गलत काम करने वालों के लिये कोई सिविल दायित्व नहीं है और न ही ऐसे व्यक्ति/संगठन को प्रतिपूर्ति करने का प्रावधान है जिसके प्रति गलत काम हुआ है या जो लोक-सेवक के कदाचार के कारण पीडित हुआ है। 
द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग का यह मत है कि उन मामलों में जहाँ लोक-सेवक अपने भ्रष्ट कृत्यों से सरकार या नागरिकों को कोई हानि पहुँचाते हैं तो उन्हें इस पर हुई हानि को पूरा करने का पात्र बनाया जाना चाहिये और इसके अलावा उन्हें क्षतिपूर्ति करने का पात्र भी बनाया जाना चाहिए इस संबंध में आयोग ने आपराधिक मामलों में दंड  के अतिरिक्त कानून में प्रावधान करने की भी सिफारिश की है।

भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018

संसद ने भ्रष्टाचार रोकथाम (संशोधन) अधिनियम, 2018 पारित किया है जो रिश्वत देने वालों और रिश्वत लेने वालों को दंडित करने का प्रावधान करता है। यह अधिनियम लोक सेवकों के रिश्वत देने या लेने का दोषी पाए जाने पर जुर्माना के अलावा तीन से सात साल तक के जेल की सजा का प्रावधान करता है।

अधिनियम की विशेषताएँ
  • रिश्वत देना एक विशिष्ट और प्रत्यक्ष अपराध है।
  • रिश्वत लेने के दोषी व्यक्ति को जुर्माने के अलावा तीन से सात वर्ष तक की कैद की सजा हो सकती है।
  • कानून में पहली बार रिश्वत देने वालों को भी शामिल किया गया है। इसके लिये सात वर्ष का कारावास या दंड अथवा दोनों का प्रावधान है।
  • वर्तमान कानून "कपटपूर्ण रिश्वत देने वाले" (Collusive bribe givers) और मजबूरन (Coerced) के बीच विभेद करता है।
  • उल्लेखनीय है कि इस अधिनियम के अंतर्गत मज़बूरी में ली गई रिश्वत (Coercive bribery) के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान की गई है, बशर्ते पीड़ित व्यक्ति सात दिनों के भीतर सक्षम अधिकारी से इसकी रिपोर्ट करे।
  • अधिनियम आपराधिक दुर्व्यवहार को भी पुनर्परिभाषित करता है। अब इसमें केवल संपत्ति के दुरुपयोग और असमान संपत्ति के आधार को शामिल किया गया है।
  • यह अधिनियम सरकारी कर्मचारियों के लिये कवच का काम करता है। इसके अंतर्गत सेवानिवृत्त सहित सभी कर्मचारियों के विरुद्ध अभियोग के लिये जाँच एजेंसियों को जाँच करने से पहले सक्षम अधिकारी से पूर्व अनुमोदन प्राप्त करना अनिवार्य है।
  • सरकारी कर्मचारियों को प्राप्त सुरक्षा में यह शामिल है कि उनके विरुद्ध किसी भी भ्रष्टाचार के मामले में 'अनुचित लाभ' का कारक स्थापित करना होगा।
  • अधिनियम में भ्रष्टाचार और रिश्वत के लेन-देन से संबंधित मामलों में मुकदमे का निर्णयन दो साल के भीतर करने का प्रावधान है। यदि तर्कपूर्ण विलंब होता है तो भी मुकदमे को चार साल से अधिक समय तक नहीं चलाया जा सकता है।
  • इस अधिनियम में रिश्वत देने वाले वाणिज्यिक संगठनों को अभियोग या दंड के लिये उत्तरदायी माना गया है। हालाँकि धर्मार्थ संस्थानों को इस परिधि से बाहर रखा गया है।

भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम एवं संशोधन विधेयक की तुलना

 

भ्रष्टाचार रोकथाम एक्ट, 1988

भ्रष्टाचार रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2013

वर्तमान या भावी सरकारी कर्मचारी द्वारा रिश्वत लेना

वेतन के अलावा किसी प्रकार के इनाम को प्राप्त करना या इस प्रकार का प्रयास करना।  यह इनाम किसी सरकारी काम को करने या काम को किये जाने की इच्छा रखने से जुड़ा  होना चाहिये।

 

किसी ऐसे सरकारी काम के लिये इनाम स्वीकार करना जो किसी व्यक्ति के पक्ष   या विरोध में हो।

 

किसी सरकारी कर्मचारी के ऊपर निजी प्रभाव डालने के लिये अन्य व्यक्ति से इनाम स्वीकार करना।

अनुचित तरीके से सरकारी काम करने के  लिये इनाम को प्राप्त करना या इस प्रकार का प्रयास करना।

 

इनाम के बदले में अन्य सरकारी कर्मचारियों को अनुचित तरीके से उसका सरकारी काम करने के लिये उकसाना।

 

सरकारी काम को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया गया है: सार्वजनिक प्रकृति का, रोज़गार से संबंधित, निष्पक्ष भाव से अच्छी नीयत के साथ किया जाने वाला।

 

प्रासंगिक उम्मीद को इस प्रकार से परिभाषित किया गया है: अच्छी नीयत से किया गया काम या विश्वास की स्थिति में किया गया काम।

सरकारी कर्मचारी को रिश्वत देना

कोई विशेष प्रावधान नहीं।

 

उकसाने के प्रावधान के तहत आता है।

किसी सरकारी अधिकारी से गलत तरीके से उसका सरकारी काम करवाने के लिये किसी व्यक्ति को इनाम देने की पेशकश करना या वादा करना।

किसी सरकारी कर्मचारी इनाम देने की पेशकश पेश करना, यह जानते हुए कि उसे | स्वीकार करने से वह अपना सरकारी काम गलत तरीके से करेगा।

उकसाना

किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा अन्य सरकारी कर्मचारियों को प्रभावित करने से संबंधित अपराध में उकसाने को शामिल किया गया है किसी व्यक्ति द्वारा निम्नलिखित में संबंधित अपराध के लिये उकसाने को शामिल किया गया है

रिश्वत लेना और व्यावसायिक लेन-देन से जुड़े व्यक्ति से बहुमूल्य चीज़ लेना।

विधेयक के तहत सभी अपराधों के लिये किसी भी व्यक्ति द्वारा उकसाने को शामिल करता है।

सरकारी कर्मचारी द्वारा आपराधिक दुर्व्यवहार

आदतन रिश्वत या मुफ्त में बहुमूल्य चीज़ लेना।

उसके नियंत्रण वाली संपत्ति पर धोखे से कब्जा धोखे से कब्जा करना।

आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक पैसे या संपत्ति रखना

सरकारी कर्मचारी को सौंपी गई संपत्ति पर धोके से कब्जा करना

अवैध साधनों द्वारा जान-बूझकर पैसा या संपत्तिइकट्ठा करना और आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक रखना।संपत्ति या संसाधन रखना।

संपत्ति की कुर्की और कब्जा

एक्ट के तहत कोई विशेष प्रावधान नहीं।

अगर किसी अधिकृत पुलिस जांच अधिकारी को विश्वास हो कि सरकारी अधिकारी अपराध का दोषी है, तो वह संपत्ति की कुर्की के लिये स्पेशल जज के पास जा सकता है।

मुकदमे के लिये पूर्व अनुमति

 

सरकारी अधिकारियों पर मुकदमे के लिये उपयुक्त प्राधिकारी से पूर्व अनुमति की आवश्यकता है।

भूतपूर्व सरकारी अधिकारियों के लिये भी पूर्व अनुमति की आवश्यकता है, यदि वह कार्य उनकी आधिकारिक क्षमता में किया गया है।

दंड: आदतन अपराधी आपराधिक दुर्व्यवहार अन्य (रिश्वत लेना, उकसाना)

5-10 वर्ष का कारावास और जुर्माना।

 

4-10 वर्ष का कारावास और जुर्माना।

 

3-7 वर्ष का कारावास और जुर्माना।

3-10 वर्ष का कारावास और जुर्माना।

 

बिल में कोई बदलाव नहीं किया गया है।

 

3-7 वर्ष का कारावास और जुर्माना।


भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अन्य महत्त्वपूर्ण उपबंध

भ्रष्ट तरीकों से प्राप्त की गई गैर-कानूनी संपत्तियों को जब्त करना
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में लोक-सेवकों की आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक की संपत्तियों को जब्त करने का उपबंध है। ऐसी ज़ब्ती दोष सिद्ध हो जाने की स्थिति में ही संभव है। दोष सिद्ध होने पर लोक-सेवकों की असंवैधानिक रूप से अर्जित की गई संपत्ति को जब्त और कुर्क करने के लिये दंड विधि संशोधन अध्यादेश, 1944 के प्रावधानों का आधार लिया जाता है। इस अध्यादेश के अधीन असंवैधानिक रूप से अधिगृहीत संपत्ति की अंतरिम कुर्की के लिये प्रावधान है। अपराध के मामले की पूरी सुनवाई के बाद नतीजे पर विचार करते हुए कुर्क की गई संपत्ति को या तो ज़ब्त कर लिया जाता है या विमुक्त कर दिया जाता है। परंतु कुर्की के लिये प्रक्रिया तभी चालू होगी जब न्यायालय अपराध का संज्ञान ले लेगा।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत सुनवाई में तेजी लाना
भ्रष्टाचार के मामलों के शीघ्र विचारण को सुनिश्चित करने के लिये भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में प्रावधान किये गए हैं जिसके तहत सभी मामलों पर विचारण विशेष न्यायाधीश द्वारा किये जाते हैं। न्यायालय की कार्यवाही भी प्रतिदिन के आधार पर की जाती है। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने सिफारिश की है कि सुनवाई के विविध चरणों के लिये समय सीमा नियत करने के लिये एक कानूनी प्रावधान लाने की आवश्यकता है।

निजी क्षेत्र में भ्रष्टाचार
निजी क्षेत्र में भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। तथापि यदि कोई निजी क्षेत्र (या उनके द्वारा काम पर लगाए गए किसी व्यक्ति) किसी लोक प्राधिकारी को रिश्वत देने में लिप्त होता है तो वह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत रिश्वत लेने के अपराध के लिये सज़ा का पात्र हो सकता है। भारत में कंपनी अधिनियम, 1956 तथा कंपनी अधिनियम, 2013 ऐसा सांविधिक ढाँचा प्रदान करता है जो कंपनी की आंतरिक प्रक्रियाओं, जिनमें भ्रष्टाचार भी सम्मिलित है, पर नियंत्रण करता है।

अभियोजन के लिये स्वीकृति
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19 में यह उपबंध है कि न्यायालय को अधिनियम
की धारा 7, 10, 11, 13 और 15 के अंतर्गत परिभाषित अपराधों का संज्ञान लेने से पहले सक्षम प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति लेनी आवश्यक होगी ताकि ईमानदार लोक-सेवकों को विद्वेषपूर्ण और कष्टमय शिकायतों द्वारा उत्पीड़न होने से बचाया जा सके। सक्षम प्राधिकारी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह उसके समक्ष रखे गए साक्ष्य पर अपने विवेक का प्रयोग करते हुए इस बात से अपने को संतुष्ट कर ले कि अभियुक्त के विरुद्ध कोई प्रथमद्रष्टया मामला बनता है या नहीं। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अध्याय-III में विविध अपराधों और जुर्मानों का उल्लेख किया गया है।

बेनामी लेन-देन (प्रतिषेध) अधिनियम, 1988
यह अधिनियम उस व्यक्ति पर प्रतिबंध लगाता है जिसने संपत्ति किसी दूसरे व्यक्ति के नाम से लेकर अपने नाम में दावा करने के लिये अधिगृहीत की हो। अधिनियम की धारा 3 बेनामी लेन-देनों का निषेध करती है जबकि धारा 4 अधिग्रहण करने वाले को बेनामीदार से संपत्ति वसूल करने से निषिद्ध करती है। बेनामी लेन-देन (निषेध) अधिनियम, 1988 को सख्ती से लागू करने से ऐसी संपत्तियों को बाहर निकाला जा सकता है और भ्रष्ट अधिकारियों के लिये संपत्तियों को एकत्र करना एक कठिन काम बनाया जा सकता है और अन्यों के लिये भी यह एक रोकथाम का काम कर सकता है।

बेनामी लेन-देन (प्रतिषेध) संशोधन अधिनियम, 2016
बेनामी लेन-देन कानून को प्रभावी बनाने के लिये 1 नवंबर, 2016 को बेनामी लेन-देन (प्रतिषेध) अधिनियम, 2016 लागू किया गया था। संशोधित कानून निर्दिष्ट प्राधिकारियों को अस्थायी तौर पर बेनामी संपत्तियों को संलग्न करने का अधि कार देता है, जिन्हें बाद में ज़ब्त भी किया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति बेनामी लेन-देन के अपराध का दोषी पाया जाता है तो वह एक साल से कम अवधि के लिये सश्रम कारावास के दंड का भागी होगा, जिसकी अधिकतम अवधि 7 वर्ष भी हो सकती है। साथ ही वह संपत्ति के बाजार मूल्य का 25% तक जुर्माना देने के लिये भी ज़िम्मेदार होगा। इस अधिनियम में असली मालिक द्वारा बेनामीदार से प्राप्त बेनामी संपत्ति की वसूली भी प्रतिबंधित की गई है। भारत सरकार ने संशोधित कानून के प्रभावी कार्यान्वयन के लिये निर्णयन प्राधिकरण और अपीलीय न्यायाधिकरण बनाए हैं।

व्हिसल ब्लोअर्स संरक्षण अधिनियम, 2011
भारत का व्हिसल ब्लोअर्स संरक्षण अधिनियम, 2011 कुल 6 अध्यायों और 31 धाराओं वाला एक कानून है। यह कानून भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के लिये सूचना का अधिकार कानून का पूरक है। इसमें 'व्हिसल ब्लोअर' को परिभाषित नहीं किया गया है बल्कि इसे एक परिवादी (शिकायतकर्ता) के रूप में दर्शित करते हुए उसकी सुरक्षा, दोषी लोक-सेवकों के विरुद्ध कार्यवाही, गवाहों एवं अन्य व्यक्तियों की भी सुरक्षा, 'व्हिसल ब्लोअर्स' की पहचान गुप्त रखने, झूठे या तंग करने वाले खुलासे के विरुद्ध दंड और इस कानून के अंतर्गत पारित आदेशों के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील किये जाने से संबंधित प्रावधान किये गए हैं।
सामान्य रूप में व्हिसल ब्लोअर वह होता है जो भ्रष्टाचार तथा अन्य अनैतिक कार्यों का खुलासा करता है। सूचना देने वाले व्यक्ति भ्रष्टाचार के बारे में सूचना प्रदान करने में एक आवश्यक भूमिका अदा करते हैं। किसी विभाग/एजेंसी में काम करने वाले लोक-सेवक अपने संगठन में अन्य लोगों के संबंध में जानकारी रखते हैं एवं उनकी गतिविधियों से परिचित होते हैं तथापि प्रायः वे डर से इस सूचना को देने के इच्छुक नहीं होते। लोक-सेवक द्वारा अपने संगठन में भ्रष्टाचार की सूचना देने की तत्परता और उसे तथा उसकी पहचान को संरक्षण दिये जाने में बहुत ही नज़दीकी संबंध होता है। यदि पर्याप्त रूप से सांविधिक संरक्षण प्रदान कर दिया जाए तो इस बात की बहुत ही संभावना होती है कि सरकार को भ्रष्टाचार के बारे में पर्याप्त सूचना मिल सकती है। भ्रष्टाचार, घोटाले की सूचना देने वाला व्यक्ति 'व्हिसल ब्लोअर' कहलाता है।

विशेषताएँ
व्हिसल ब्लोअर्स संरक्षण अधिनियम, 2011 की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
  • इस कानून में जहाँ भ्रष्टाचार की जानकारी देने वाले लोगों की सुरक्षा के पर्याप्त प्रावधान हैं, वहीं इसमें गलत या फर्जी शिकायत करने वाले लोगों के लिये दंड की व्यवस्था भी है।
  • इस कानून में किसी सरकारी सेवक के खिलाफ भ्रष्टाचार या प्रदत्त शक्ति का सोच-समझकर दुरुपयोग करने के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के लिये एक तंत्र की स्थापना की व्यवस्था की गई है।
  • इस कानून में खुलासे की जाँच की प्रक्रिया निर्धारित करने के साथ ही जानकारी देने वाले लोगों को निशाना बनाए जाने या प्रताड़ना से बचाने की पर्याप्त व्यवस्था की गई है।
  • यह कानून भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने हेतु बनाई गई स्वतंत्र इकाई केंद्रीय सतर्कता आयोग को सशक्त करेगा और आवश्यकता पड़ने पर जानकारी देने वालों को पुलिस संरक्षण की गारंटी भी देगा। प्रतिकार की आशंका से भयभीत कोई भी व्यक्ति इस कानून के तहत संरक्षण पा सकता है।

क्यों पड़ी आवश्यकता?
हालिया समय में अशोक खेमका, दुर्गा शक्ति नागपाल, संजीव चतुर्वेदी जैसे कुछ अधिकारी सरकारी व्यवस्था में व्याप्त खामियों तथा भ्रष्टाचार को सामने लाने का काम करते रहे हैं। 2003 में राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के इंजीनियर सत्येंद्र दूबे को बिहार के गया सर्किट हाउस में गोली मार दी गई थी, क्योंकि उन्होंने एन.एच.ए.आई. में भ्रष्टाचार के संबंध में जानकारी सरकार को दी थी। इसी तरह इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC) में व्याप्त भ्रष्टाचार को सामने लाने वाले आई.ओ. सी. अधिकारी मंजूनाथ की हत्या उत्तर प्रदेश के जिला लखीमपुरी खीरी के गोला गोकर्णनाथ में 2005 में कर दी गई थी। इसके बाद देश में आर.टी.आई. कानून लागू हुआ था और तब से अब तक कई आर.टी.आई. कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है। मध्य प्रदेश में 50 से अधिक ऐसे लोगों की हत्या हो चुकी है जो व्यापम घोटाले से किसी-न-किसी रूप में व्हिसल ब्लोअर्स के तौर पर जुड़े हुए थे। सूचना का अधिकार के तहत जानकारी लेने वालों में 2005 से 2016 तक 67 आर.टी.आई. कार्यकर्ता अपनी जान गंवा चुके हैं। इसके अलावा उनके मानसिक उत्पीड़न और उनसे मारपीट के 311 मामले दर्ज किये गए हैं।
सरकारी कार्यों में भ्रष्टाचार उजागर करने वालों (व्हिसल ब्लोअर्स) को संरक्षण देने तथा सरकारी कार्यों में पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिये 2011 में व्हिसल ब्लोअर संरक्षण अधिनियम पेश किया गया था जो लोकसभा ने तो उसी वर्ष पारित कर दिया था लेकिन राज्यसभा ने 2014 में पारित किया था। इस अधिनियम के प्रावधान लागू भी नहीं हुए कि इसमें संशोधन के लिये सरकार ने व्हिसल ब्लोअर संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2015 पेश किया है। इसे भी लोकसभा पारित कर चुकी है, लेकिन राज्यसभा में यह अभी भी लंबित है।

चुनौतियाँ
व्हिसल ब्लोअर अधिनियम के समक्ष निम्नलिखित चुनौतियाँ हैं
  • सर्वप्रथम तो यह कि जो अधिनियम 2014 में कानून बना था, वह भी कई कारणों से (नियुक्ति संबंधी नियम आदि न पाने के कारण) अभी तक लागू नहीं हो पाया है।
  • इसे लागू करने के लिये राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है। जिस प्रकार कोई दल चुनाव सुधार नहीं चाहता, ठीक कुछ ऐसा ही इस कानून के साथ होता दिखाई दे रहा है।
  • भ्रष्टाचार का खुलासा करने वालों पर सरकारी गोपनीयता कानून, 1923 (Official Secrets Act) भी लागू हो गया है। इसके तहत उन लोगों पर भी मुकदमा चलाया जा सकता है जो सरकारी दस्तावेज़ों के आधार पर भ्रष्टाचार का खुलासा करने वाले हैं अर्थात् यह प्रतिबंधित सूचनाओं के खुलासे की अनुमति को प्रतिबंधित करता है।
  • व्हिसल ब्लोअर संरक्षण अधिनियम में जो प्रावधान किये गए हैं, वह भ्रष्टाचार का खुलासा करने वालों को प्रोत्साहित करने के बजाय हतोत्साहित करने वाले हैं।
  • हालिया वर्षों में देश भर में गलत कार्यों की जानकारी देने वालों ने उत्पीड़न, धमकी और हिंसा की शिकायतें की हैं। इसके चलते सार्वजनिक क्षेत्र में गलत कार्यों के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले नागरिक हतोत्साहित हुए हैं।
  • संशोधन प्रस्ताव के ज़रिये व्हिसल ब्लोअर संरक्षण अधिनियम में आर.टी.आई. अधिनियम की धारा 8(1) को शामिल करने का प्रयास किया जा रहा है, जो किसी भी प्रकार से उचित नहीं है।

केंद्रीय सतर्कता आयोग (Central Vigilance Commission-CVC)
केंद्रीय सतर्कता आयोग की स्थापना भारत सरकार द्वारा केंद्रीय सरकार के संस्थानों में भ्रष्टाचार निवारण के लिये 11 फरवरी, 1964 को एक संकल्प द्वारा एक सर्वोच्च निकाय के रूप में की गई थी। यह एक स्थापित सतर्कता प्रशासनिक ढाँचे, दिशा-निर्देशों तथा नियमावली द्वारा कार्य करता है। 25 अगस्त, 1998 को राष्ट्रपति द्वारा एक अध्यादेश जारी कर आयोग को सांविधिक दर्जा देकर इसे बहुसदस्यीय आयोग बना दिया गया। संसद ने वर्ष 2003 में केंद्रीय सतर्कता आयोग विधेयक पारित किया तथा 11 सितंबर, 2013 को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद इसने अधिनियम का रूप लिया।
इसकी स्थापना भ्रष्टाचार निवारण समिति 'संथानम समिति' की अनुशंसा पर हुई है। यह केंद्रीय सरकार के अंतर्गत सभी सतर्कता गतिविधियों की निगरानी करता है एवं केंद्रीय सरकारी संगठनों में विभिन्न प्राधिकारियों को उनके सतर्कता कार्यों की योजना बनाने, निष्पादन करने, समीक्षा करने तथा सुधार करने में सलाह देता है।

आयोग की संरचना एवं संगठन
केंद्रीय सतर्कता आयोग की संरचना निम्नलिखित है
  • एक केंद्रीय सतर्कता आयुक्त-अध्यक्ष 
  • सतर्कता आयुक्त जिनकी संख्या दो से अधिक नहीं होगी-सदस्य
केंद्रीय सतर्कता आयोग का अपना स्वयं का सचिवालय, मुख्य तकनीकी परीक्षण खंड तथा एक विभागीय जाँच आयुक्त खंड है। सचिवालय में भारत सरकार के अपर सचिव स्तर के एक सचिव, भारत सरकार के संयुक्त सचिव के स्तर के चार अधिकारी, निदेशक/उपसचिव के स्तर के तीस अधिकारी (दो विशेष कार्य अधिकारियों सहित), चार अवर सचिव तथा कार्यालय स्टाफ हैं। मुख्य तकनीकी परीक्षक संगठन केंद्रीय सतर्कता आयोग का तकनीकी खंड है। तकनीकी खंड में मुख्य इंजीनियर के स्तर के दो इंजीनियर (मुख्य तकनीकी परीक्षक के रूप में पदनामित) तथा सहायक इंजीनियरिंग स्टाफ है।
आयोग में विभागीय जाँच आयुक्तों के 14 पद हैं जिनमें से 11 पद निदेशक स्तर के तथा 3 पद उपसचिव स्तर के हैं। विभागीय जाँच आयुक्त लोक-सेवकों के विरुद्ध प्रारंभ की गई विभागीय कार्यवाहियों में मौखिक जाँच करने के लिये जाँच अधिकारी के रूप में कार्य करते हैं।

आयोग का अधिकार क्षेत्र
केंद्रीय सतर्कता आयोग का अधिकार क्षेत्र निम्नलिखित है
  • अखिल भारतीय सेवाओं के सदस्य जो संघ के कार्यों के संबंध में सेवा कर रहे हैं तथा केंद्रीय सरकार के समूह 'क' अधिकारी।
  • सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में श्रेणी V के स्तर के तथा उससे ऊपर के स्तर के अधिकारी।
  • भारतीय रिज़र्व बैंक, नाबार्ड तथा सिडबी में श्रेणी 'घ' तथा इससे ऊपर के स्तर के अधिकारी।
  • अनुसूची 'क' तथा 'ख' सार्वजनिक उपक्रमों में मुख्य कार्यपालक तथा कार्यपालक मंडल एवं ई-8 तथा इससे ऊपर के अन्य अधिकारी।
  • अनुसूची 'ग' तथा 'घ' सार्वजनिक उपक्रमों में मुख्य कार्यपालक तथा कार्यपालक मंडल एवं ई-7 तथा इससे ऊपर के अन्य अधिकारी।
  • सामान्य बीमा कंपनियों में प्रबंधक तथा इससे ऊपर के अधिकारी।
  • जीवन बीमा निगमों में वरिष्ठ मंडलीय प्रबंधक एवं इससे ऊपर के अधिकारी।
  • समितियों तथा अन्य स्थानीय प्राधिकरणों में अधिसूचना की तिथि को तथा समय-समय पर यथासंशोधित अनुसार केंद्र सरकार डी.ए. प्रतिमान पर 8700 रुपए प्रतिमाह तथा इससे ऊपर वेतन पाने वाले सभी अधिकारी।

आयोग के कार्य
केंद्रीय सतर्कता आयोग मुख्य रूप से एक परामर्शदात्री निकाय है। यह केवल परामर्श देता है और इसके पास न्यायिक शक्तियाँ नहीं हैं। यह केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों/उपक्रमों में भ्रष्टाचार, कदाचार, सत्यनिष्ठा में कमी, वित्तीय गड़बड़ियों सहित भ्रष्टाचार से संबंधित शिकायतों पर कार्यवाही करता है। केंद्रीय सतर्कता आयोग अपने समक्ष आए मामले की जाँच स्वयं करने हेतु अधिकृत नहीं है, बल्कि वह मामले को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) या संबंधित मंत्रालय या फिर जाँच विभाग के पास भेजता है।
केंद्रीय सतर्कता आयोग निम्नलिखित मामलों में कार्यवाही करने का परामर्श दे सकता है
  • सार्वजनिक क्षेत्र के सभी उपक्रमों एवं निगमों से सामने आए भ्रष्टाचार के मामलों पर।
  • केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सी.बी.आई.) द्वारा की गई जाँच पर प्राप्त रिपोर्ट के विषय में जिसमें आयोग या किसी अन्य द्वारा भेजे गए विभागीय कार्रवाई या अभियोजन के मामले सम्मिलित होते हैं।
  • आयोग द्वारा उल्लिखित मामलों में अनुशासनात्मक कार्रवाई से संबंधित मंत्रालय या विभाग की रिपोर्ट।
केंद्रीय सतर्कता आयोग प्रतिवर्ष गृह मंत्रालय को अपनी वार्षिक रिपोर्ट प्रेषित करता है। इस वार्षिक रिपोर्ट में उन सभी मामलों का उल्लेख होता है जिन पर केंद्रीय सतर्कता आयोग द्वारा की गई सिफारिशों के आधार पर सक्षम अधिकारी द्वारा कार्यवाही की जाती है। केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) भारतीय संघ को प्रशासन में सत्यनिष्ठा बनाए रखने से संबंधित सभी मामलों पर परामर्श देता है। यह केंद्रीय जांच ब्यूरो के कामकाज की और संघ सरकार के विविध मंत्रालयों और अन्य संगठनों के सतर्कता प्रशासन की निगरानी करता है।

केंद्रीय जांच ब्यूरो (Central Bureau of Investigation-CBI)
केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सी.बी.आई.) संघीय सरकार की भ्रष्टाचार निवारण मामलों की प्रधान जाँच एजेंसी है। यह भ्रष्टाचार से संबंधित कुछ विशिष्ट अपराधों अथवा अपराध के वर्गों और अन्य प्रकार के अनाचारों की, जिसमें लोक-सेवक लिप्त हों तथा केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो उनकी जाँच करने के लिये दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 (DSPEAct) से अधिकार प्राप्त करता है। यह दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम के तहत विभिन्न जाँच खंड का गठन करता है। इनमें कुछ प्रमुख यूनिटें हैं
  • भ्रष्टाचार निवारण खंड
  • आर्थिक अपराध खंड
  • विशेष अपराध खंड
भ्रष्टाचार निवारण खंड भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अंतर्गत पंजीकृत सभी मामलों और भारतीय दंड संहिता की अन्य धाराओं अथवा अन्य कानून के अंतर्गत अपराधों, यदि उन्हें घूसखोरी तथा भ्रष्टाचार के अपराधों के साथ किया गया हो, के मामले की भी जाँच करता है। भ्रष्टाचार निवारण खंड लोक-सेवकों द्वारा की गई गंभीर अनियमितताओं से संबंधित आरोपित किये गए मामलों की जाँच करता है। यह राज्य सरकारों के लोक-सेवकों के विरुद्ध मामलों की भी जाँच करता है, यदि मामला सी.बी.आई. को सौंपा जाता है। विशेष अपराध खंड आर्थिक अपराधों और परंपरागत अपराधों के सभी मामलों की जाँच करता है जैसे कि आंतरिक सुरक्षा, जासूसी, तोड़-फोड़, नारकोटिक्स और नशीले पदार्थ, पुरातन अवशेष, हत्या, डकैतियाँ/लूट, धोखाधड़ी, विश्वास का आपराधिक तौर पर भंग होना, जालसाजी, दहेज के कारण मौतें, संदेहास्पद मौतें और अन्य अपराध और भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अन्य अपराध और डी.एस.पी.ई. अधिनियम की धारा 3 के अंतर्गत अधिसूचित अन्य कानून।

लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 (The Lokpal and Lokayukta Act, 2013)
भारतीय प्रशासनिक तंत्र में भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करने के लिये लोकपाल एवं लोकायुक्त विधेयक, 2013 पारित किया गया। भारत के राष्ट्रपति द्वारा लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 पर 1 जनवरी, 2014 को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर करते ही यह अधिनियम अधिनियम बन गया। इस अधिनियम के प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित हैं
  • इसमें केंद्र स्तर पर लोकपाल और राज्य स्तर पर लोकायुक्त का प्रावधान किया गया है।
  • लोकपाल में एक अध्यक्ष और अधिकतम आठ सदस्य हो सकते हैं जिनमें से 50% सदस्य न्यायिक पृष्ठभूमि से तथा अन्य 50% सदस्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक व स्त्रियों के बीच से होने चाहिये।
  • लोकपाल के अध्यक्ष और सदस्यों का चयन एक 'चयन समिति' के माध्यम से किया जाएगा जिसमें भारत के प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा के विपक्ष के नेता, भारत के प्रमुख न्यायाधीश या मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश शामिल होगा। एक अन्य सदस्य कोई प्रख्यात विधिवेत्ता होगा जिसे इन चार सदस्यों की सिफारिश पर राष्ट्रपति नामित करेंगे।
  • लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में लोकसेवक की सभी श्रेणियाँ होंगी।
  • कुछ सुरक्षा उपायों के साथ प्रधानमंत्री को भी इस अधिनियम के दायरे में लाया गया है।
  • अधिनियम के अंतर्गत ईमानदार लोक-सेवकों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान की जाएगी।
  • अधिनियम में भ्रष्ट तरीकों से अर्जित की गई संपत्ति को जब्त करने का भी प्रावधान है चाहे अभियोजन का मामला लंबित ही क्यों न हो।
  • अधिनियम में प्रारंभिक जाँच और ट्रायल के लिये स्पष्ट सीमा निर्धारित की गई है। ट्रायल के लिये विशेष अदालतों के गठन का भी प्रावधान है।
इस अधिनियम के वर्ष 2014 में लागू हो जाने के बावजूद आज तक लोकपाल की नियुक्ति नहीं हो पाई है। लोकपाल के अभाव में यह अधिनियम क्रियान्वित नहीं हो पा रहा है। एक गैर-सरकारी संगठन 'कॉमन कॉज' ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की है कि सरकार जान-बूझकर लोकपाल की नियुक्ति नहीं कर रही है। नवंबर 2016 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी सरकार की खिंचाई करते हुए कहा कि लोकपाल कानून को एक 'मृत पत्र' (Dead Letter) नहीं बनने दिया जा सकता।
  • लोकपाल की नियुक्ति न हो पाने के संदर्भ में सरकार का अपना एक तर्क है। सरकार के अनुसार लोकपाल के चुनाव के लिये जो चयन समिति होती है, उसमें एक सदस्य 'लोकसभा में विपक्ष का नेता' होता है। परंतु 16वीं लोकसभा में किसी भी विपक्षी पार्टी के पास कुल लोकसभा सदस्यों की 10% या अधिक सदस्य संख्या नहीं है, जो किसी पार्टी के नेता को विपक्ष के नेता का दर्जा दिलाने की पूर्व शर्त होती है।
अतः बिना 'विपक्ष के नेता' के सरकार लोकपाल का चुनाव कैसे करे? अब सरकार अधिनियम में 'विपक्ष के नेता' की परिभाषा में संशोधन का प्रस्ताव लाई है जो अभी संसद में पारित नहीं हो पाया है जिसके अनुसार विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी के नेता को 'विपक्ष का नेता' मान लिया जाएगा। सरकार को शीघ्रता से यह संशोधन पारित करवाना चाहिये ताकि एक सक्षम और सशक्त लोकपाल की प्रणाली प्रारंभ हो सके।
  • लोकपाल के अध्यक्ष और सदस्यों को राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर हटा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय लोकपाल को हटाने के संबंध में यह निर्देश राष्ट्रपति द्वारा संसद के कम से कम 100 सदस्यों के द्वारा पारित प्रस्ताव पर राय मांगे जाने की स्थिति में ही देगा।
  • लोकपाल के समक्ष झूठी, कपटपूर्ण या दुर्भावना से शिकायतें करने पर शिकायतकर्ता को 1 वर्ष से अधिक की सज़ा एवं अधिकतम एक लाख रुपए जुर्माना का प्रावधान अधिनियम में किया गया है।
  • लोकपाल को पक्षपात से मुक्त रखने के लिये पदमुक्ति के बाद अध्यक्ष एवं सदस्यों पर निम्नलिखित प्रतिबंध होंगे-
  1. लोकपाल एवं सदस्यों की पुन: सदस्य या अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति नहीं की जा सकती है।
  2. इन्हें केंद्रशासित प्रदेश में गवर्नर के रूप में नियुक्त नहीं किया जा सकता।
  3. इन्हें कूटनीतिक पदों पर नियुक्त नहीं किया जा सकता।
  4. ऐसा कोई भी उत्तरदायित्व नहीं दिया जा सकता जिसके लिये राष्ट्रपति को अपने हस्ताक्षर एवं मुहर से आदेश जारी करना पड़े।
  5. पदमुक्ति के पाँच वर्ष उपरांत तक ये राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभा, राज्यसभा, किसी राज्य की विधानसभा या विधानपरिषद, नगर निगम या नगर पंचायत के चुनाव में भाग नहीं ले सकते हैं।

लोकपाल एवं लोकायुक्त (संशोधन) अधिनियम 2016
लोकपाल और लोकायुक्त (संशोधन) अधिनियम 2016 जनवरी 2014 से प्रभावी माना गया है।
  • संसद ने लोकपाल तथा लोकायुक्त (संशोधन) विधेयक, 2016 इसलिये पारित किया ताकि मूल लोकपाल अधिनियम 2013 की धारा 44 में संशोधन किया जा सके।
  • इसके तहत सरकारी कर्मचारियों को पदभार ग्रहण करने के तीस दिन के भीतर अपनी सम्पत्ति, लेनदारी और देनदारी का विवरण देना अनिवार्य होगा।
  • इस अधिनियम की धारा 44 के उप-भाग 4 में व्यवस्था थी कि परिसंपत्तियों का खुलासा 31 जुलाई तक हर हाल में कर दिया जाना चाहिए।
  • इस धारा के तहत सभी लोक सेवकों के लिए अनिवार्य था कि अपने पति/पत्नी और आश्रित बच्चों की परिसंपत्तियों और देनदारियों का खुलासा करें. इसे सरकारी वेबसाइट्स पर डाला जाना आवश्यक था।
  • धारा 44 में संशोधन पेश करने की जरूरत इसलिए थी क्योंकि सम्पत्ति और देनदारी की घोषणा 31 जुलाई तक करनी है।
  • लेकिन अभी कई तरह के मुद्दे रह गए थे जिन पर निष्कर्ष आना है और स्थायी समिति उन बिन्दुओं पर विचार करेगी।
  • संशोधन अधिनियम, 2016 के बाद लोक सेवकों, उनके पति/पत्नी और आश्रित बच्चों के लिए अपनी परिसम्पत्तियों और देनदारियों को सार्वजनिक करने की वैधानिक बाध्यता अब नहीं रह गई है।
  • संशोधन विधेयक से अब लोक सेवकों की परिसंपत्तियों और देनदारियों के खुलासे केंद्र सरकार द्वारा नियत नियमों के तहत ही किये जा सकेंगे।
  • लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013 के तहत अधिसूचित नियमों के अनुसार, प्रत्येक लोक सेवक अपनी सम्पत्ति की घोषणा के साथ अपनी पत्नी या पति और आश्रित बच्चों की संयुक्त सम्पत्ति और देनदारियों की भी घोषणा करेंगे।
  • लोक सेवक इस संबंध में सक्षम प्राधिकार के पास प्रत्येक वर्ष 31 मार्च या 31 जुलाई से पहले वाषिर्क रिटर्न दाखिल करेंगे।
  • विदित हो कि इसी वर्ष अप्रैल में सरकार ने लोक सेवकों के लिए रिटर्न दायर करने की समय सीमा को 15 अप्रैल से बढ़ाकर 31 जुलाई कर दिया था।
  • यह जनवरी 2014 को कानून के प्रभाव में आने के बाद समयसीमा में पांचवा विस्तार है।
  • नियमों के अनुसार, जिन संगठनों को एक करोड़ रुपये से अधिक सरकारी अनुदान या विदेशों से ₹10 लाख से अधिक दान प्राप्त होता है, वे लोकपाल के दायरे में आएंगे।
  • उल्लेखनीय हैं कि लोकपाल का गठन प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट, 1988 के तहत दंडनीय अपराधों संबंधी शिकायतों को प्राप्त करके उनकी जांच करने के मद्देनजर किया गया था।
भारत में सार्वजनिक अधिकारियों की कई श्रेणियों को पहले से ही उनकी, उनके पति/पत्नी और आश्रित बच्चों परिसंपत्तियों की बाबत खुलासा किए जाने संबंधी कड़े नियम हैं. संसद और विधानसभाओं के चुनाव लड़ने वाले तमाम उम्मीदवारों के लिए अपनी परिसंपत्तियों और देनदारियों की सार्वजनिक घोषणा किए जाने का नियम लागू है।
इसी प्रकार सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के लिए परिसंपत्तियों के खुलासे का नियम भी 2009 से लागू है। लोक सेवक के साथ ही उसके पति/पत्नी और आश्रित बच्चों के वित्तीय खुलासे को वैश्विक स्तर पर भ्रष्टाचार-विरोधी ढाँचे का महत्त्वपूर्ण अंग माना जाता है, दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका, फिलीपींस, द. कोरिया, आयरलैंड, न्यूजीलैंड, ब्राजील, चिली, यूगांडा, ऑस्ट्रेलिया, थाईलैंड, रोमानिया आदि कई ऐसे देश हैं, जहाँ लोक सेवक के साथ ही उसके पति/पत्नी और आश्रित बच्चों की परिसंपत्तियों की जानकारियों के खुलासे को अनिवार्य बनाया गया है।

भ्रष्टाचार निवारण हेतु की गई पहलों के उदाहरण

भ्रष्टाचार निवारण करने के लिये दंडात्मक और रोकथाम के उपायों के अनुकूलतम मिले-जुले रूप की आवश्यकता है। दंडात्मक उपाय निवारण का काम करते हैं जबकि रोकथाम के उपाय व्यवस्था में पारदर्शिता लाकर, जवाबदेही बढ़ाकर, विवेक को कम करके, कार्य-पद्धतियों को तर्कसंगत करने आदि से भ्रष्टाचार के अवसर कम कर देते हैं। बेहतर रोकथाम उपाय 'सर्वांगीण सुधारों' का काम करते हैं, क्योंकि वे प्रणालियों और प्रक्रियाओं में सुधार लाते हैं। इस दिशा में हाल ही में पहल किये गए कुछ कदम निम्नलिखित हैं-

रेलवे यात्री आरक्षण (भारतीय रेलवे)
रेलवे यात्री आरक्षण, जिसमें ऑनलाइन आरक्षण एवं 'ई-टिकटिंग' शामिल हैं, के कंप्यूटरीकरण ने मध्यस्थों को हटा दिया है, आरक्षण कार्यालयों को कम भीड़-भाड़ वाला कर दिया है और रेलवे आरक्षण प्रक्रिया में पर्याप्त पारदर्शिता ला दी है।

एम.पी. ऑनलाइन
मध्य प्रदेश सरकार ने एम.पी. ऑनलाइन के माध्यम से नागरिक सेवाओं, सरकारी नीतियों, शिकायतों तथा जानकारी के संदर्भ में एक एकीकृत प्लेटफॉर्म उपलब्ध करा दिया है। इसके माध्यम से ऑनलाइन सेवाएँ प्रदान करने से काफी हद तक बिचौलियों एवं दलालों की भूमिका कम हुई है।

ई-पुलिस
ई-पुलिस में दिल्ली, पंजाब सहित कई राज्यों ने शिकायतों के ऑनलाइन पंजीकरण और उनका व्यवस्थित रूप से अनुवर्तन सुनिश्चित किया है जिससे शिकायतकर्ताओं को शिकायत के नतीजे और उनकी शिकायतों पर ऊँचे स्तर के पुलिस अधिकारी किस प्रकार निपटान करते हैं, इसका पता चल सके। साथ ही इस पर वास्तविक समय (Real Time) निगरानी रखने के लिये उच्च पुलिस स्तरों की जानकारी मिल सके।

ई-पंजीकरण और ई-स्टांप
मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र सहित विभिन्न राज्यों ने ई-पंजीकरण और ई-स्टांप की व्यवस्था शुरू की है। इसमें और अधिक पारदर्शी संपत्ति मूल्यांकन तालिकाएँ, रिकॉर्डों का कंप्यूटरीकरण, पंजीकरण प्रलेख को वापस करने की समय सीमा निर्धारित करना, फिंगर प्रिंटिंग और फोटो खींचने के लिये डिजिटल कैमरों का प्रयोग करने के लिये रूपरेखा बनाने की मंशा है। मूल्यांकन तालिकाओं के समय पर आ जाने से स्टांप ड्यूटी के मनमाने ढंग से निर्धारण करने पर स्पष्ट रूप से रोक लगी है और इससे भ्रष्टाचार को कम करने के अनेक उद्देश्य प्राप्त किये जा सके हैं, अचल संपत्ति के खरीदारों के साथ उत्पीड़न समाप्त हुआ है और कर संग्रह में वृद्धि हुई है।

सामान्य ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा
कर्नाटक और मध्य प्रदेश में सामान्य ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा से व्यावसायिक कॉलेजों में योग्यता आधारित चयन को समय पर और अधिक पारदर्शी तरीके से सुनिश्चित किया जाता है।

अध्यापकों की नियुक्ति की स्कीम
कर्नाटक, मध्य प्रदेश, जम्मू-कश्मीर आदि राज्यों में अध्यापकों की नियुक्ति की स्कीम ऑनलाइन कर दी गई है। यह अद्भुत प्रयास अध्यापकों को नियुक्त करने के लिये एक सुस्पष्ट, उद्देश्यपूर्ण और पारदर्शी व्यवस्था प्रदान करता है।

यूनिट क्षेत्र स्कीम (दिल्ली)
इसने स्वयं निर्धारण और गणना के नियामक आधार से संबंधित संपत्ति कर और संपत्ति पंजीकरण के भुगतान के लिये एक व्यवस्था प्रदान की है।

आंध्र प्रदेश में ई-गवर्नेस (ई-सेवा) और केरल में फ्रेंड्स (फ्रेंड्स अर्थात् फास्ट, रिलाइबल, इन्स्टैंट नेटवर्क फॉर डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ सर्विस)
इनके द्वारा सरकार और नागरिकों के बीच लेन-देन को सरलीकृत करते हुए, उपयोगिता बिलों के भुगतान अथवा विभिन्न सेवाओं को एक ही प्लेटफॉर्म पर देने हेतु सूचना तकनीक का प्रयोग करके सुधरी हुई सेवा सुपुर्दगी प्रदान की जाती है। किसानों को उत्पादन बेचने के लिये लाभदायक मध्य प्रदेश में 'ई-चौपाल' की पहल भी उल्लेखनीय है।

आंध्र प्रदेश में आर.एस.डी.पी. (रूरल सर्विस डिलीवरी प्वांइट्स) के नाम से ग्रामीण कियोस्क और मध्य प्रदेश में कॉमन सर्विस सेंटर
यह ई-सेवा की पहुँच इंटरनेट के माध्यम से बिलों के भुगतान, सूचना, प्रपत्र की डाउनलोडिंग आदि की सुविधा देकर लोक असुविधा को कम करने और कर्मचारियों को और अधिक पर्याप्त लोक कर्तव्यों का पालन करने के लिये राहत देना सुनिश्चित करता है।

भ्रष्टाचार रोकने में व्हिसल ब्लोअर की भूमिका
भ्रष्टाचार के मामले सामने लाने में व्हिसल ब्लोअर की अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इनकी सहायता से सरकारी, अर्द्धसरकारी एवं निजी संस्थाओं में हो रहे कई तरह के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश होता है। व्हिसल ब्लोअर किसी संगठन विशेष के अधिकारी या लोक-सेवक होते हैं जिन्हें संगठन की सभी बारीकियाँ एवं गतिविधियों के संदर्भ में पूर्ण जानकारी होती है। सरकारी कार्यालयों, विभागों और एजेंसियों में कार्य करने वाले लोकसेवक अपने विभाग में भ्रष्ट आचार-व्यवहार तथा धोखाधड़ी के कार्यों में लिप्त अधिकारियों की पहचान बड़ी आसानी से कर सकते हैं और कई बार वे उनके खिलाफ आवाज़ भी उठाना चाहते हैं परंतु बदले की भावना के डर से वे चुप हो जाते हैं, उन्हें कानूनी और वैधानिक सुरक्षा मुहैया कराने के बाद सरकार को भ्रष्टाचार के बारे में पर्याप्त सूचना मिल सकती है जिससे कि ऐसे मामलों से निपटने में सरकार को आसानी होगी।
व्हिसल ब्लोअर की भूमिका भ्रष्टाचार को अल्पतम करने में अत्यंत आवश्यक है क्योंकि ये संगठन में रहते हुए भ्रष्टाचार की जानकारी प्रदान करते हैं। ईमानदार एवं सत्यनिष्ठ कार्मिकों के होने से भ्रष्ट अधिकारियों पर दबाव बना रहता है। साथ ही भ्रष्टाचार संबंधी मामलों में साक्ष्य एकत्र करना और अधिक आसान हो जाता है। कई बड़े घोटाले, जैसे- व्यापम घोटाला, इंडियन ऑयल निगम घोटाला आदि व्हिसल ब्लोअर के कारण ही सामने आ सका है।

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