भ्रष्टाचार पर निबंध | bhrashtachar par nibandh

भ्रष्टाचार पर निबंध

प्रस्तावना

भ्रष्टाचार को भारत की एक गंभीर एवं जटिल समस्या के रूप में स्वीकार किया जाता है। यहाँ राजनीतिक भ्रष्टाचार एवं प्रशासनिक भ्रष्टाचार घनिष्ठ रूप से संबद्ध हैं इसलिये भारत में अन्य देशों की तुलना में अधिक गंभीर एवं व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार पाया जाता है। देश के विकास में भ्रष्टाचार बहुत बड़ी बाधा है। लोक-कल्याणकारी राज्य एवं संविधान में उल्लेखित उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिये भ्रष्टाचार का उन्मूलन अत्यंत आवश्यक है। वर्तमान भारत में भ्रष्टाचार एक सामाजिक मूल्य के रूप में स्वीकृत हो गया है, जहाँ राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी, उद्योगपति और अपराधियों की गठजोड़ से ऊपर से नीचे तक चलने वाला भ्रष्टाचार का दुश्चक्र समाज के संसाधनों का दुरुपयोग करता है। जो धन सार्वजनिक कार्य में लगना चाहिये वह भ्रष्टाचारियों की भेंट चढ़ जाता है। भारत में भ्रष्टाचार का दायरा निरंतर बढ़ता जा रहा है। नित नए सामने आते भ्रष्टाचार के मामले भारतीय लोकतंत्र को भी गंभीर हानि पहुँचा रहे हैं।
bhrashtachar par nibandh
आजाद हिंदुस्तान की तकदीर में भ्रष्टाचार का दीमक कुछ इस तरह समाया है कि आज जीवन, समाज और सरकार का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं बना जो सुरक्षित हो। संसद से सड़क तक, मंदिर से दफ्तर तक तथा आम आदमी से खासोखास तक जिसको जहाँ मिलता है, लूटने में लगा है। 1 लाख 86 हजार करोड़ रुपए का कोयला घोटाला, 2300 करोड़ रुपए का राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, 900 करोड़ रुपए का चारा घोटाला, 400 करोड़ रुपए का आई.पी.एल. घोटाला, आदर्श सोसायटी घोटाला, बोफोर्स तोप घोटाला, रक्षा खरीद घोटाला, ताबूत घोटाला आदि तथा विदेशी बैंकों में पड़ा 120 लाख करोड़ रुपए का काला धन क्या साबित करता है? जनप्रतिनिधि सरकारी ठेके के नाम पर ठगता है, न्यायाधीश गलत न्याय के नाम पर लूटता है, पत्रकार खबर दबाने तथा झूठे प्रचार के नाम पर मालामाल होता है तो सरकारी बाबू, इंजीनियर, डॉक्टर, पुलिस, क्लर्क और चपरासी दफ्तर में लोगों से घूस लेते हैं। शिक्षाविद् शिक्षा बेचने पर उतारू है, पुजारी मंदिर की आस्था और भगवान बेचने पर उतारू है, डॉक्टर इनसान बेचने पर उतारू है, तो न्यायाधीश ईमान बेचने पर उतारू है। कोई दहेज़ से कमाता है तो कोई चापलूसी और दलाली से। भ्रष्टाचार के इस दौर में धनवान इतराता है, बुद्धिजीवी खामोश है, मीडिया बिका हुआ है तथा आम जनता त्रस्त है
भ्रष्टाचार की उपस्थिति किसी भी लोकतंत्र के लिये स्वस्थता का लक्षण नहीं है। वर्तमान समय की अनेक समस्याओं की जड़ भ्रष्टाचार को माना जा सकता है। भ्रष्टाचार केवल नैतिकता पर प्रश्न नहीं है बल्कि भारत जैसे विकासशील देश की आर्थिक उन्नति में सबसे बड़ी बाधा है इसलिये भारतीय लोकतंत्र के सशक्तीकरण, आर्थिक उन्नति, चहुंमुखी विकास एवं लोक-कल्याणकारी शासन की स्थापना के लिये भ्रष्टाचार उन्मूलन की अत्यंत आवश्यकता है।
भ्रष्टाचार अपने स्वरूप में इतना अधिक व्यापक है कि उसकी कोई एक स्पष्ट, सटीक एवं सुनिश्चित परिभाषा देना संभव नहीं है। फिर भी इसे सार्वजनिक धन के व्यक्तिगत लाभ के लिये प्रयोग के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। हालाँकि यह परिभाषा भी पूर्णतः दोषमुक्त नहीं है। सार्वजनिक क्षेत्र में इसे राजनीतिक भ्रष्टाचार व प्रशासनिक भ्रष्टाचार के रूप में विभाजित किया जा सकता है। राजनीतिक भ्रष्टाचार मूलतः नीति निर्माण से जुड़ा है। इसके अंतर्गत नीतियों, कानूनों, नियमों, विनियमों में इस तरह का परिवर्तन लाने की चेष्टा की जाती है कि ये किसी समूह विशेष या व्यक्ति विशेष को अधिक लाभ पहुँचाए। नौकरशाही से जुड़ा हुआ भ्रष्टाचार नीतियों को लागू करने से संबंधित है। रिश्वत, भाई-भतीजावाद, घोटाले, धोखाधड़ी भ्रष्टाचार के सर्वाधिक प्रचलित रूप हैं।
भ्रष्टाचार नैतिकता की विफलता का एक महत्त्वपूर्ण आविर्भाव है। अंग्रेज़ी का 'corrupt' शब्द लैटिन शब्द 'corruptus' से लिया गया है, जिसका अर्थ है- 'तोड़ना या नष्ट करना'। भ्रष्टाचार भ्रष्ट (बिगड़ा हुआ) + आचरण (व्यवहार) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है ऐसा बिगड़ा हुआ आचरण करना जिसकी अपेक्षा लोकसेवकों से नहीं की जाती। भ्रष्टाचार की परिभाषा भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) की धारा 161 में दी गई है तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1947 के अंतर्गत ऐसी गतिविधियों की सूची दी गई है। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1947 के अनुसार भ्रष्टाचार आपराधिक कृत्य है। इस अधिनियम के तहत आपराधिक कदाचार में निम्नलिखित पाँच तरह के कार्य आते हैं
किसी शासकीय कार्य के लिये या अन्य किसी कर्मचारी पर अपने प्रभाव का प्रयोग करने के लिये कानूनी तौर पर वेतन के अतिरिक्त (शासकीय कर्मचारी द्वारा) उपहार या पारितोषण माँगना या स्वीकार करना।
  1. किसी ऐसे व्यक्ति से बिना मूल्य दिये या अपर्याप्त मूल्य देकर कोई मूल्यवान वस्तु प्राप्त करना जिससे उसका सरकारी काम पड़ता है या पड़ सकता है या जिसके साथ उसके अधीनस्थों का कार्य-व्यवहार है या जहाँ वह अपने प्रभाव का उपयोग कर सकता है।
  2. स्वयं या किसी अन्य व्यक्ति के लिये कोई मूल्यवान वस्तु या अधिक लाभ, भ्रष्ट या गैर-कानूनी साधनों से या शासकीय कर्मचारी की अपनी स्थिति का दुरुपयोग करके प्राप्त करना।
  3. अपनी आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक की चल एवं अचल परिसंपत्तियाँ रखना।
  4. जालसाजी, धोखाधड़ी या गबन तथा इसी प्रकार के अन्य आपराधिक मामले।
इस रूप में भ्रष्टाचार का आशय है, किसी शासकीय कर्मचारी द्वारा अपने सार्वजनिक पद, स्थिति अथवा अधिकार का दुरुपयोग करते हुए किसी प्रकार का आर्थिक या अन्य प्रकार का लाभ प्राप्त करना। के. संथानम समिति के अनुसार, "सरकारी कर्मचारी द्वारा कार्य निष्पादन के दौरान ऐसा कृत्य जो किसी स्वार्थ की दृष्टि से किया जाए अथवा जानबूझकर कार्य नहीं किया जाए, भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है।" जनप्रतिनिधि अधिनियम, 1950 के तहत भ्रष्टाचार की परिभाषा में राजनीतिक कदाचार को भी शामिल किया गया है।

भ्रष्टाचार क्या है?

भ्रष्टाचार एक बहुआयामी अवधारणा है। सामान्य शब्दों में भ्रष्टाचार को बुरा या बिगड़े हुए आचरण से रूपायित किया जाता है। वैसा आचरण जो अनैतिक और अनुचित हो। समाज विज्ञानियों के अनुसार भ्रष्टाचार में धन की उपस्थिति और सार्वजनिक पद का दुरुपयोग अनिवार्य है यानी निजी लाभ के लिये सार्वजनिक शक्ति का इस प्रकार प्रयोग करना जिससे कानून भंग होता हो या समाज के मापदंडों का विचलन होता हो उसे भ्रष्टाचार कहते हैं। किंतु इतने भर से भ्रष्टाचार परिभाषित नहीं हो जाता है। क्या परीक्षा में शिक्षक द्वारा नकल करवाना, कॉपी में परीक्षक द्वारा अंक बढ़ाया जाना भ्रष्टाचार नहीं है? भले इसमें धन की उपस्थिति न हो बल्कि यह एहसान भर हो, परंतु इस प्रकार का एहसान भी भ्रष्टाचार ही कहा जाएगा, क्योंकि उसमें सार्वजनिक पद का दुरुपयोग सम्मिलित है। क्या क्लर्क, चपरासी, अधिकारी या शिक्षक, प्रोफेसर द्वारा अटेंडेंस लगाने के बाद भी अपने कार्य-स्थल से गायब रहना भ्रष्टाचार नहीं है? बिल्कुल है, क्योंकि यह भी सार्वजनिक पद का दुरुपयोग ही है। भोजन में मिलावट या नकली दवाएँ बेचना भी भ्रष्टाचार ही है क्योंकि यह लोक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। दहेज लेना भी भ्रष्टाचार ही है क्योंकि इसमें सामाजिक नैतिक मूल्यों का क्षरण होता है। इस प्रकार मामलों के विस्तार में विलंब भ्रष्टाचार है, कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्व को अधिकार के रूप में प्रदर्शित करना भ्रष्टाचार है। जाति, पंथ, गोत्र, मूल, लिंग या वंश के आधार पर पक्षपात करना भ्रष्टाचार है तथा उत्तरदायित्व को स्वीकारने से भागना भ्रष्टाचार है। अतः नि:संदेह भ्रष्टाचार के विविध आयाम हैं जिसे परिभाषित करना कठिन है।
भ्रष्टाचार एक विश्वव्यापी तथ्य है। अनंत समय से प्रत्येक समाज में किसी-न-किसी रूप में बेबीलोनिया और रोमन समाजों में न्यायाधीशों एवं राज्याधिकारियों को रिश्वत दी जाती थी। भारत में कौटिल्य ने भी अपने अर्थशास्त्र में 50 प्रकार के गबन और भ्रष्ट तरीकों का वर्णन किया गया है। मध्यकाल में भी अलाउद्दीन खिलजी, मोहम्मद बिन तुगलक तथा औरंगज़ेब द्वारा रिश्वत रोकने के अनेक उपायों का जिक्र मिलता है। आधुनिक ब्रिटिश काल में तो पूरी की पूरी 'ड्रेन ऑफ वेल्थ' थ्योरी ही अंग्रेज़ों के भ्रष्टाचार का नायाब नमूना पेश करती है। विकसित देशों में उच्च स्तरीय व्यापार या खरीदारी में ही भ्रष्टाचार है जबकि भारत में रेल आरक्षण से लेकर सिनेमा का टिकट खरीदने तक में, बच्चों को प्राथमिक स्कूल से लेकर सरकारी कॉलेजों में एडमिशन तक में तथा सरकारी अस्पताल के बिस्तर से लेकर गैस सिलेंडर खरीदने तक में हर जगह घूस देना पड़ता है यानी अन्य देशों में अवैध या गैर-कानूनी चीजों के लिये भ्रष्टाचार होता है परंतु भारत में वैध या आधिकारिक चीज़ों के लिये भी पैसा दिया जाता है।

भ्रष्टाचार के प्रकार (Types of corruption)

भ्रष्टाचार के कई प्रकार प्रचलित हैं। यह केवल धन के रूप में ही नहीं बल्कि अन्य रूपों, जैसे- राजनीतिक दलों के लिये चंदा एकत्रित करना, सार्वजनिक धन का अपव्यय करना, स्थानांतरण या पदोन्नति के लिये रिश्वत लेना, औद्योगिक प्रतिष्ठानों के अतिथि गृहों में रुकना, विवाह या जन्मदिन पर उपहार लेना, निजी आवश्यकताओं को पूर्ण करने का दबाव डालना आदि भ्रष्टाचार ही हैं। केंद्रीय सतर्कता आयोग ने भ्रष्टाचार के निम्नलिखित 27 प्रकारों का उल्लेख किया है-
  1. शासकीय पद या अधिकारों एवं शक्तियों का दुरुपयोग करना।
  2. सार्वजनिक धन और भंडार का अनावश्यक प्रयोग या दुरुपयोग करना।
  3. निम्नस्तरीय वस्तुओं या कार्य को स्वीकार करना।
  4. आय से अधिक संपत्ति रखना।
  5. अनैतिक आचरण करना।
  6. उपहार प्राप्त करना।
  7. ठेकेदारों एवं फर्मों को रियायतें प्रदान करना।
  8. लालच एवं अन्य कारण से शासन को हानि पहुँचाना।
  9. टेलीफोन कनेक्शन देने में अनियमितता व लापरवाही करना।
  10. आयकर, संपत्ति कर आदि का कम मूल्यांकन करना या छिपाना।
  11. भर्ती, नियुक्ति, स्थानांतरण एवं पदोन्नति के संबंध में गैर-कानूनी रूप से धन लेना।
  12. शासकीय आवास (क्वार्टरों) पर अनाधिकृत कब्जा एवं उन्हें गलत ढंग से किराये पर देना।
  13. विस्थापितों के दावों का गलत मूल्यांकन करना।
  14. रेल एवं वायुयान के सीट आरक्षण एवं कोटे में अनियमितता बरतना।
  15. पुराने स्टांप या डाक टिकट का प्रयोग पत्र-व्यवहार में करना।
  16. जाति प्रमाण-पत्र, जन्मतिथि का जाली प्रमाण-पत्र पैसे लेकर तैयार करना।
  17. शासकीय कर्मचारियों को अपने निजी कार्यों में प्रयोग करना।
  18. बिना पूर्वानुमति या पूर्व सूचना के अचल संपत्ति अर्जित करना।
  19. विस्थापितों के दावों के निपटान में अनावश्यक विलंब करना।
  20. मनीऑर्डर, बीमा एवं मूल्य देय पार्सलों को प्राप्तकर्ता को न देना।
  21. आयात-निर्यात लाइसेंस देने में अनियमितता।
  22. शासकीय कर्मचारी की जानकारी एवं सहयोग से साँठ-गाँठ करके कंपनियों के आयातित एवं आवंटित कोटे का दुरुपयोग करना।
  23. झूठे दौरों, भत्ते, बिल एवं गृह किराया आदि का दावा करना।
  24. वाहन खरीदने के लिये स्वीकृत अग्रिम धनराशि का दुरुपयोग करना।
  25. ऐसी फर्मों या व्यक्तियों से ऋण लेना जिनसे उनके कार्यालयीन संबंध होते हैं।
  26. जिन व्यक्तियों से अधिकारियों के कार्यालयीन संबंध हैं उनके वित्तीय दायित्वों को वहन करना।
  27. आवासीय भूमि की खरीद-बिक्री में धोखाधड़ी करना।
भारत में व्याप्त भ्रष्टाचार सामान्यतः दो वर्गों में विभाजित है। पहला स्तर है घोटाले के माध्यम से उच्च स्तर पर किये जाने वाले उस भ्रष्टाचार का जिसमें राजनीतिज्ञों से लेकर उच्च अधिकारी तक प्रत्यक्ष रूप से लिप्त होते हैं। हालाँकि आम जनता पर इसका प्रभाव अप्रत्यक्ष तरीके से ही पड़ता है। दूसरा है निचले स्तर पर व्याप्त उस छोटे या फुटकर भ्रष्टाचार का जो कि ज़ोर-ज़बरदस्ती के साथ किया जाता है तथा आम जनता को सीधे तौर पर प्रभावित करता है और यह फुटकर या छोटा भ्रष्टाचार पूरे देश में व्यापक पैमाने पर फैला हुआ है। लोक कार्य केंद्र (Public Affairs Center) के आँकड़े भारत में निचले स्तर की व्यापकता का प्रमाण देते हैं। इन आँकड़ों के अनुसार चेन्नई में हर चौथा आदमी शहरी विकास प्राधिकरण (Urban Development Authority), बिजली बोर्ड, नगर-निगम और दूरभाष जैसी एजेंसियों में अपना काम करवाने के लिये घूस देता है जबकि बंगलौर में यह आँकड़ा 8 में से एक व्यक्ति का और पुणे में 17 में से एक व्यक्ति का है। भ्रष्टाचार के तमाम फुटकर माध्यमों द्वारा देश की जनता को असंख्य तरीकों से 'बाबुओं' द्वारा लूटा जा रहा है, जहाँ क्लर्क के मन में यह धारणा गहरे से व्याप्त है कि बिना कुछ रकम लिये काम नहीं करना।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में स्पष्टतः भ्रष्टाचार की कोई परिभाषा नहीं दी गई है। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 में धारा 7 से 15 में रिश्वत के अपराधों और अन्य संबंधित अपराधों एवं जुर्मानों को सूचीबद्ध किया गया है जिसमें शामिल है कि किसी पद पर रहते हुए किसी कार्य को करने अथवा न करने के लिये उपहार अथवा धन ग्रहण करना, किसी का अनुचित पक्षपात धन लाभ के कारण करना, आय से अधिक संपत्ति रखना, किसी कार्य को व्यक्ति विशेष के हित में करने के लिये आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त होना। इस प्रकार के अपराधों के प्रयास को भी अपराधों की सूची में ही रखा गया है। अधिक से अधिक बल भ्रष्टाचार के आर्थिक पक्ष पर ही दिया गया है जिसकी आड़ में भ्रष्टाचार के कई कृत्य किये जाते हैं।
भ्रष्टाचार ऐसी व्यवस्था है जिसके अंतर्गत शामिल व्यक्तियों के बीच मिलीभगत होती है तथा उनके बीच स्वैच्छिक और योजनाबद्ध सहयोग की सहमति प्रभावी होती है। अधिकारियों द्वारा ज़बर्दस्ती रिश्वत लिये जाने की स्थिति में भी किसी संगठन का पूरा तंत्र सम्मिलित होता है। संपर्क सूत्र के माध्यम से भी भ्रष्टाचार का निरंतर प्रसार होता रहता है। इसमें संपर्क सूत्र के रूप में कार्य करने वाला व्यक्ति अपने पूर्व निर्धारित प्लान के तहत वरिष्ठ अधिकारियों से घनिष्ठ संबंध स्थापित करता है। ये भ्रष्ट अधिकारी शासकीय नीतियों को अपने पक्ष में तथा संपर्क किये हुए व्यक्ति के हित में प्रयोग करने की स्थिति में होते हैं। इसके एवज़ में वे वित्तीय एवं अन्य लाभ प्राप्त करते हैं। भ्रष्टाचार के कुछ अन्य प्रचलित रूपों में रुपयों या वस्तुओं को दान के रूप में ग्रहण करना, निजी कंपनियों द्वारा सेवानिवृत्त अधिकारियों की नियुक्ति कर कार्य को प्रभावित करना, निर्माण कार्यों में बिक्री का ठेका अपने परिचितों आदि को देना शामिल किया जाता है।

भ्रष्टाचार के कारण (Causes of corruption)

भ्रष्टाचार एक जटिल समस्या है और इस समस्या की जड़ देश विशेष के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, प्रशासनिक ढाँचे में खोजी जा सकती है। प्रायः भ्रष्टाचार को प्रशासनिक या आर्थिक समस्या माना जाता है, परंतु इसका सामाजिक पहलू अपेक्षाकृत अधिक महत्त्वपूर्ण है। किसी भी समाज में ईमानदारी का स्तर दो बातों पर निर्भर करता है। पहला यह कि समाज अपने सदस्यों को क्या लक्ष्य देता है और दूसरा यह कि समाज अपने सदस्यों को उन लक्ष्यों को पूरा करने के लिये कौन-से साधन प्रदान करता है। वर्तमान भारतीय समाज में आर्थिक समृद्धि लोगों के लिये एकमात्र लक्ष्य के रूप में उभरी है। परंतु, इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिये समाज अपने सदस्यों को साधन उपलब्ध नहीं करा पाया परिणामस्वरूप धीरे-धीरे आर्थिक समृद्धि के साधन के रूप में भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लिया गया। इससे भ्रष्टाचार की सामाजिक स्वीकार्यता भी बढ़ी है। आज भ्रष्टाचार करने वाले को सामाजिक बहिष्कार का भय नहीं सताता बल्कि उसे समाज में अपनी आर्थिक समृद्धि के कारण सम्मान की नज़रों से देखा जाता है।
भ्रष्टाचार ही शुरुआत लोभ से होती है और अवैध धन-अर्जन के बावजूद इसका समापन नहीं होता, क्योंकि लोभ बढ़ता ही जाता है। भ्रष्टाचार के कारणों में स्वार्थ, आर्थिक विषमता, असंतोष, भाई-भतीजावाद तथा नैतिक मूल्यों का ह्रास शामिल हैं। कुछ अन्य कारणों में लालफीताशाही, सरकार की आर्थिक नीतियाँ, आवश्यक वस्तुओं की कमी, वैश्वीकरण- उदारीकरण के कानून, उपभोक्तावादी संस्कृति में वृद्धि तथा चुनावी खर्च का बढ़ता स्तर ज़िम्मेदार है।

भ्रष्टाचार की समस्या के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

नैतिक मूल्यों का पतन
भारतीय समाज में व्यक्तियों में नैतिक मूल्यों का पतन होने के कारण भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला है। आज व्यक्ति किसी अनुचित तरीके को भी अपनाकर अपना काम निकालना चाहता है।

नौकरशाही
भारत में नौकरशाही की कार्यप्रणाली कानूनों, कठोर नियमों, जटिल प्रक्रियाओं तथा लिखित कार्यवाही से घिरी होने के कारण धन, श्रम एवं समय साध्य होती है। अधिकांश व्यक्ति इन प्रक्रियाओं से परेशान होकर शीघ्रता से अपना कार्य करवाने के लिये रिश्वत देने के लिये बाध्य होते हैं। शासकीय कर्मचारी भी धीरे-धीरे रिश्वत लेने के आदी हो जाते हैं।

भ्रष्टाचार निवारण हेतु कठोर कानूनों का अभाव
भारतीय न्याय प्रणाली भ्रष्टाचार के मामलों का शीघ्र निपटारा करने में असफल रही है। भ्रष्टाचार के मामलों के निपटारे में देरी, कम सज़ा का प्रावधान तथा सज़ा मिलने की न्यूनतम प्रतिशतता की प्रवृत्ति के कारण भ्रष्टाचारियों को कानून का भय नहीं है और इसके कारण  वे निरंतर ऐसी गतिविधियों में संलिप्त रहते हैं। भ्रष्टाचार करके भी दंड नहीं मिलने से समाज में गलत संदेश जाता है और दूसरे लोग भी भ्रष्टाचार करने के लिये प्रेरित होते हैं।

उपभोक्तावादी संस्कृति
समाज में बढ़ती उपभोक्तावादी संस्कृति एवं भौतिकवाद भ्रष्टाचार का एक महत्त्वपूर्ण कारण है। भौतिक समृद्धि स्टेटस सिंबल बन गई है। व्यक्ति का सम्मान और सफलता पैसे से  आँकी जाती है। ऐसी मानसिकता के चलते लोग अच्छे या बुरे का  विचार किये बिना भ्रष्टाचार की अंधी दौड़ में शामिल हो जाते हैं।

नेता-अधिकारियों की साँठ-गाँठ
भ्रष्टाचार का एक महत्त्वपूर्ण कारण नेता-अधिकारियों की मिलीभगत एवं उन्हें मिलने वाला राजनीतिक प्रश्रय है। नेता एवं प्रशासनिक अधिकारी मिल-जुलकर घोटाले करते हैं जिस पर राजनीतिक या प्रशासनिक नियंत्रण नहीं होता। 2G स्पेक्ट्रम घोटाला, कोल ब्लॉक आवंटन घोटाला, बोफोर्स घोटाला, चारा घोटाला, संसद में प्रश्न पूछने के लिये नोट की मांग जैसे कई भ्रष्टाचार राजनीतिक एवं प्रशासनिक नेतृत्व के गठजोड़ के चलते हुए हैं। इसमें अपराधियों की संलिप्तता ने समस्या को और अधिक विकराल कर दिया है।

पारदर्शिता का अभाव
पारदर्शिता का अभाव भ्रष्टाचार की प्रक्रिया को आसान बनाता है क्योंकि गोपनीयता की आड़ में ऐसे आँकड़े छुपा लिये जाते हैं जो भ्रष्टाचार को सामने ला सकें। शासकीय संस्थाओं में अपारदर्शिता के कारण भ्रष्टाचार के अधिक रास्ते मिलते हैं।

कम वेतन
भ्रष्टाचार बढ़ने का एक बड़ा कारण शासकीय कर्मचारियों का कम वेतन भी है। कर्मचारियों को वेतन कम मिलता है, साथ ही महँगाई बढ़ने के अनुरूप महँगाई भत्ता भी नहीं मिलता। महँगाई की मार वेतनभोगियों पर पड़ने से वे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये अनुचित साधनों का प्रयोग कर भ्रष्टाचार करते हैं।

प्रशासकीय अनिश्चितता
प्रशासकीय अनिश्चितता के कारण भी भ्रष्टाचार बढ़ता है। प्रशासन में लालफीताशाही, अक्षमता, औपचारिकता एवं असंवेदनशीलता के कारण प्रशासकीय अनिश्चितता की स्थिति रहती है। जब तक अवैध साधनों का सहारा नहीं लिया जाता तब तक फाइल दबी रहती है। साथ ही शासकीय कार्य संस्कृति में जनसामान्य से दूरी बनाकर रहने से संवाद के अभाव में लोग शीघ्र काम कराने के लिये पैसे एवं अन्य साधनों की मांग स्पीड मनी के रूप में करते हैं।

सरकार की अक्षमता
सरकार की अक्षमता तथा देश की बड़ी जनसंख्या भ्रष्टाचार का एक अन्य बड़ा कारण है। इतनी बड़ी जनसंख्या को सरकार गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक सेवाएँ उपलब्ध नहीं करा पा रही है इसलिये इन सेवाओं को प्राप्त करने के लिये रिश्वत दी जाती है। कुछ सेवाओं (स्वास्थ्य सेवाओं आदि) का निजीकरण कर इस समस्या को हल करने का प्रयास किया गया है लेकिन इससे कई नई समस्याएँ उठ खड़ी हुई हैं। निजी क्षेत्र द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाएँ गुणवत्ता की दृष्टि से तो बेहतर हैं परंतु उनकी कीमत अत्यधिक है। सेवाओं की इस बढ़ी हुई कीमत को चुकाने के लिये धन भी भ्रष्टाचार से आ रहा है।

भ्रष्टाचार विरोधी लोक-चेतना का अभाव
भारत में भ्रष्टाचार विरोधी लोक-चेतना का अभाव (Lack of Civil Conciousness) देखने को मिलता है। जनता भ्रष्टाचार की शिकायतें नहीं करती। भ्रष्टाचार का विरोध न होना भी इसे बढ़ावा देता है।

प्रशासनिक कार्य-संस्कृति में भ्रष्टाचार की स्वीकार्यता
प्रशासनिक कार्य-संस्कृति में भ्रष्टाचार की स्वीकार्यता बढ़ने से भ्रष्टाचार को अधिक बढ़ावा मिला है। 'स्पीड मनी' के रूप में स्वीकार्य रिश्वत प्रशासनिक संस्कृति का हिस्सा बन गई है।

भ्रष्टाचार के प्रभाव (Effects of Corruption)

भ्रष्टाचार एक संक्रामक रोग की तरह है। वर्तमान में यह और अधिक तीव्रता के साथ बढ़ता जा रहा है एवं इसका प्रभाव अत्यंत व्यापक हो रहा है। जीवन का कोई भी क्षेत्र भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं है। व्यापक प्रभाव पड़ने से ही भ्रष्टाचार कार्य-संस्कृति का हिस्सा बन गया है। भ्रष्टाचार ने हमारे समाज को कई प्रकार से प्रभावित किया है। सरकारी आँकड़े चाहे कुछ कहें पर भ्रष्टाचार ने देश के आर्थिक विकास को अवरुद्ध किया है। इसने समाज में हिंसा और अराजकता को जन्म दिया। इससे नैतिकता का स्तर गिरा है, वैयक्तिक चरित्र नष्ट हुआ है। इसने जनता की नज़र में अफसरों की विश्वसनीयता को घटाया है तथा सरकार को अस्थिर बनाया है। भ्रष्टाचार ने अकुशलता और अनुशासनहीनता को बढ़ाया है तथा अंततः आम आदमी का जीवन कष्टप्रद कर दिया है। हद की बात यह है कि भ्रष्टाचार सर्वग्रास करता जा रहा है। इसके प्रभाव निम्नलिखित हैं

प्रशासनिक अकर्मण्यता में वृद्धि
भ्रष्टाचार बढ़ने से प्रशासनिक अकर्मण्यता में वृद्धि होती है। रिश्वत या स्पीड मनी के रूप में पैसा लिये जाने की प्रवृत्ति प्रशासनिक अधिकारियों में भ्रष्टाचार की आदत का विकास करती है जिसके परिणामस्वरूप लोक-सेवक बिना रिश्वत लिये काम नहीं करते। यह समस्या न केवल प्रशासनिक जड़ता में वृद्धि करती है बल्कि लालफीताशाही को भी जन्म देती है।

लालफीताशाही
प्रशासनिक अधिकारी बिना रिश्वत लिये काम नहीं करते और फाइलों पर फाइल इकट्ठा होती जाती है। लालफीताशाही भ्रष्टाचार से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है। लाल कपड़े में बँधी हुई सरकारी फाइलें भ्रष्टाचार के प्रभाव की स्थिति बताती हैं।

प्रशासकीय व्यय में वृद्धि
भ्रष्टाचार के कारण प्रशासकीय व्यय में भी वृद्धि होती है। कार्य में अनावश्यक देरी, कार्य को टाला जाना, समयबद्धता का अभाव आदि प्रत्यक्ष रूप से सरकारी खर्च को ही बढ़ाते हैं।

सरकारी कोष को हानि
भ्रष्टाचार का सबसे बुरा प्रभाव सरकारी कोष पर पड़ता है। अधिकांश व्यक्ति शीघ्र कार्य करवाने के लिये सरकारी कर, शुल्क या प्रशुल्क देने के स्थान पर अवैध धन देते हैं जिससे पैसा भ्रष्ट अधिकारियों के पास पहुँचता है और सरकारी कोष को भारी नुकसान होता है। । विभिन्न घोटालों से जो सरकारी कोष का नुकसान होता है, उसकी उगाही या नुकसान की भरपाई न होने का पूरा बोझ सरकारी कोष एवं अप्रत्यक्ष रूप से जनता पर पड़ता है।

प्रशासनिक अकुशलता में वृद्धि
भ्रष्टाचार के कारण भ्रष्ट व्यक्तियों को हर तरह से लाभ होने तथा ईमानदार अधिकारियों को परेशान करने से असंतोष में वृद्धि होती है। ईमानदार अधिकारियों के नैतिक बल पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। अधिकारियों के पदस्थापन, पदोन्नति एवं रिपोर्ट में भ्रष्टाचार के द्वारा अंतर किया जाता है। इन सब कारणों से प्रशासनिक दक्षता में वृद्धि होने के स्थान पर अकुशलता व अक्षमता में वृद्धि होती है।

राष्ट्रहित को हानि
आर्थिक लाभ के लिये राष्ट्रीय हितों से समझौता करने की प्रवृत्ति राष्ट्रहितों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती है। ऐसे निर्णय गुणवत्ता के आधार पर नहीं बल्कि स्वहित के आधार पर दिये जाते हैं। सेना के लिये स्तरहीन हथियार खरीदना, बोफोर्स घोटाला, शासकीय संस्थाओं के लिये गुणवत्ताहीन वस्तु खरीदा जाना इसी तरह के भ्रष्टाचार हैं।

सरकार एवं व्यवस्था पर अविश्वास
भ्रष्टाचार का एक बड़ा नकारात्मक प्रभाव यह है कि इससे आम जनता को सरकार, प्रशासन एवं संपूर्ण व्यवस्था पर विश्वास नहीं रह जाता। लोक-सेवकों के नैतिक पतन से उनकी विश्वसनीयता में कमी आती है। आम जनता सरकार एवं प्रशासन के रवैये के प्रति हताश-निराश रहती है। एक लोकतांत्रिक देश के लिये भ्रष्टाचार लोकतंत्र की जड़ों को दीमक की तरह धीरे-धीरे समाप्त करने वाला कीटाणु है।

सामाजिक असमानता का बढ़ना
भ्रष्ट साधनों से आय अर्जित कर, कर चोरी द्वारा एवं अन्य आर्थिक लाभ प्राप्त कर भ्रष्ट लोग देश में सामाजिक असमानता को बढ़ाते हैं। अधिकांश धन कुछ लोगों के पास केंद्रित हो जाने से गरीब और अधिक गरीब तथा अमीर और अधिक अमीर होता जाता है। यह सारी स्थितियाँ समाज में घोर असमानता को बढ़ावा देती हैं।

सामाजिक असंतोष का बढ़ना
सामाजिक असमानता बढ़ने से सामाजिक असंतोष में भी वृद्धि होती है। जो लोग ईमानदार होते हैं उन्हें बहुत अधिक मानसिक, शारीरिक, सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक यंत्रणाओं का सामना करना पड़ता है। इससे देश की प्रतिभाओं को अवसर नहीं मिलतें। भ्रष्टाचार के कारण मानसिक यंत्रणा बढ़ने से सामाजिक असंतोष में वृद्धि होती है और कई बार लोग आत्महत्या भी कर लेते हैं।

लोक-कल्याण में कमी
भ्रष्टाचार के कारण लोक-कल्याण में भी कमी आती है। किसी भी लोक-कल्याणकरी राज्य के लिये भ्रष्टाचार दीमक के समान है जो उसकी नींव को कमजोर करता है। इससे देश को विकास की योजनाओं का लाभ भ्रष्टाचार के कारण नहीं मिल पाता है बल्कि जनकल्याण के लिये आया हुआ पैसा भ्रष्टाचारियों की जेब में जाता है। व्यापक रूप से फैला हुआ भ्रष्टाचार हर तरह से देश एवं उसके नागरिकों को हानि ही पहुँचाता है।

भ्रष्टाचार को अल्पतम करने के उपाय

भ्रष्टाचार को अल्पतम करने तथा उसके निवारण एवं रोकथाम के लिये भारत में कानूनी व संस्थागत दोनों उपाय किये गए हैं। भारतीय दंड संहिता की धारा 161 से 165 भ्रष्टाचार से संबंधित हैं। 1947 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1947 बनाया गया जिसे 1952 और 1964 में संशोधित किया गया। 1988 में एक अधिक सशक्त भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 बनाया गया। भ्रष्टाचार की चुनौती से निपटने के लिये संथानम समिति की सिफारिश पर 1964 में केंद्रीय सतर्कता आयोग का गठन किया गया। इसके अतिरिक्त भ्रष्टाचार से निपटने के लिये विभिन्न मंत्रालयों तथा विभागों की सतर्कता इकाइयाँ व केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की स्थापना भी की गई है। भ्रष्टाचार को कम करने के लिये निम्नलिखित ढाँचे विकसित किये गए हैं-
  • भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1947
  • दंड विधि (संशोधन) अधिनियम, 1952
  • भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988
  • भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018

भ्रष्टाचार रोकने के लिये उपाय

भ्रष्टाचार रोकने के लिये निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं:
  • सेवा-शर्ते आकर्षक बनाना : सरकारी कर्मचारियों के वेतन में महंगाई के अनुरूप समय-समय पर सुधार किये जाने की आवश्यकता है। यदि अधिकारियों-कर्मचारियों को अच्छे वेतन दिये जाएंगे तो वे भ्रष्ट तरीकों से आर्थिक लाभ या धन प्राप्त करने की कोशिश नहीं करेंगे। रिश्वतखोरी की समाप्ति के लिये सेवा-शर्तों को आकर्षक किया जाना आवश्यक है।
  • उच्च अधिकारियों में आचरण के लिये उच्च मापदंड स्थापित करना : प्रशासनिक अधिकारियों एवं नेताओं के लिये आचार संहिता लागू किया जाना चाहिये। अपने दायित्वों को पूर्ण करने के दौरान स्वविवेक से निर्णय करने, उपहार आमंत्रण एवं अन्य लाभ दिये जाने के समय अनुशासित रहने का नियम अनिवार्य रूप से लागू किया जाना चाहिये।
  • विवेकशीलता को कम करना : सरकारी क्षेत्र में स्व-विवेक की शक्तियों से प्रशासन के निचले स्तरों पर भ्रष्टाचार की संभावना बढ़ती है। सरकारी कार्मिक/लोक-सेवक आवेदक को रिश्वत देने पर मजबूर करते हैं अन्यथा उनकी याचिका/आवेदन/कार्य में जान-बूझकर देरी कर दी जाती है या उस कार्य को किया ही नहीं जाता है इसलिये स्वविवेक से निर्णय करने को न्यूनतम किया जाना चाहिये।
  • भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनमत को प्रभावित करना : भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने के लिये सबसे प्रभावी साधन है जनता को इसके दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक करना। यदि जनता भ्रष्टाचार की भागीदार नहीं बनेगी और न ही भ्रष्टाचारियों को सहन करेगी तो इससे भ्रष्टाचार में कमी आएगी। लोकतांत्रिक राज्य में जनमत का भ्रष्टाचार के विरुद्ध जागरूक होना भ्रष्टाचार पर पूरी तरह से रोक लगाता है।
  • सार्वजनिक व व्यक्तिगत जीवन में उच्च नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देना : भ्रष्टाचार से निपटने के लिये ब्रिटेन की लॉर्ड नोलन की रिपोर्ट में प्रस्तुत 7 सिद्धांत नि:स्वार्थता, सत्यनिष्ठा, वस्तुनिष्ठता, उत्तरदायित्व की भावना, खुलापन, ईमानदारी और नेतृत्व विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
  • गोपनीयता की संस्कृति के स्थान पर पारदर्शिता की संस्कृति का विकास करना पारदर्शिता नागरिकों को सरकार के कामों की जानकारी प्रदान कर उन्हें सरकार के कार्यों की समीक्षा करने में सक्षम बनाती है। उत्तरदायित्व का सुनिश्चित व वस्तुनिष्ठ निर्धारण किया जाना चाहिये।
  • विकेंद्रीकरण तथा शासन में लोगों की सहभागिता बढ़ाना चाहिये।
  • प्रशासन में नागरिक समाज की भागीदारी बढ़ाई जानी चाहिये।
  • शिक्षा व्यवस्था में सुधार तथा शिक्षा द्वारा भ्रष्टाचार विरोधी मूल्यों को बढ़ावा दिया जाना चाहिये।
  • केंद्रीय सतर्कता आयोग, प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो जैसी संस्थाओं को राजनीतिक नियंत्रण व दबाव से मुक्त रखना चाहिये।
  • सशक्त लोकपाल/लोकायुक्त प्रणाली की स्थापना करना।
  • सूचना का अधिकार एवं नागरिक घोषणा-पत्र के लिये जन जागरूकता बढ़ाना।
  • ई-गवर्नेस को बढ़ावा देना।
  • भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई एवं कठोर दंड की व्यवस्था की जानी चाहिये।
  • भ्रष्टाचार संबंधी मुकदमों की कार्रवाई में तीव्रता लाना चाहिये।
  • सत्यनिष्ठ अधिकारियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
  • भ्रष्टाचार रोकने एवं जनजागरूकता के लिये मीडिया को सक्रिय करना।
  • लोक-सेवकों में भ्रष्टाचार के प्रति विरोध की भावना विकसित करना।
  • अधिकारियों की निगरानी संबंधी भूमिका पर पुन: ज़ोर दिये जाने की आवश्यकता है।
  • प्रत्येक अधिकारी की वार्षिक निष्पादन रिपोर्ट में एक कॉलम होना चाहिये जहाँ अधिकारी को यह प्रकट करना चाहिये कि उसने अपने अधीनस्थों के बीच भ्रष्टाचार नियंत्रण हेतु क्या उपाय किये हैं।
  • सूचना एकत्र करना : लोक-सेवकों के बारे में सूचना एकत्र करना, जैसे-चल-अचल संपत्ति का विवरण, बैंक बैलेंस के ब्योरे, आय के स्रोतों का उल्लेख, वाहन सहित विदेश यात्रा के संबंध में सारी सूचना एकत्रित की जानी चाहिये। इनमें संदिग्ध लोक-सेवकों पर निगरानी रखना, उनकी जीवन शैली का अध्ययन करना, उनके द्वारा किये गए निर्णयों का अध्ययन करना, नागरिकों से उनके बारे में शिकायतों के मूल्यांकन द्वारा भ्रष्टाचार पर नियंत्रण किया जा सकता है। 
  • विभागीय कार्यवाहियों में नियमितता लाना ताकि भ्रष्टाचार संबंधी मामलों का निपटारा संभव हो सके।
  • सिविल सेवकों का संवैधानिक रक्षण अनुच्छेद 311 हटाना : भारतीय संविधान के अनुच्छेद 311 में सिविल सेवकों को संवैधानिक संरक्षण दिया गया है अर्थात् इनकी पदच्युति, पदावनति इनके अधीनस्थों द्वारा नहीं की जा सकती। यह अनुच्छेद भ्रष्ट अधिकारियों पर कार्यवाही करने में एक बाधा है इसलिये इस अनुच्छेद को समाप्त किये जाने की अत्यंत आवश्यकता है।
इसके अतिरिक्त संदिग्ध अधिकारियों को संवेदनशील पदों से दूर रख, उदारवादी नीतियों को सावधानी से लागू किया जाए तथा नियमों के उल्लंघन पर त्वरित व उचित दंड का प्रावधान सुनिश्चित किया जाए तो बहुत हद तक भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सकता है। हालाँकि ये सारे उपाय भी नाकाफी सिद्ध होंगे यदि समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना न की जा सके। भले हम गरीबी मिटा दें लेकिन लोभ संवरण तो नैतिक आदर्शों की मजबूती से ही संभव है। ईमानदारी एक जीवन मूल्य थी और भ्रष्टाचार एक अवमूल्य। ईमानदारी, नैतिक मूल्य तथा सच्चा जीवनादर्श ही आत्मिक उन्नयन कर लोभ एवं स्वार्थ पर लगाम लगा सकता है और अंततः भ्रष्टाचार को पराजित कर सकता है।

भ्रष्टाचार को रोकने में समाज की भूमिका
भ्रष्टाचार के उन्मूलन में जितना महत्त्व निगरानी तंत्र और कानूनों का है, उससे भी कहीं अधिक महत्त्व एवं आवश्यकता इसमें लोगों की भागीदारी बढ़ाने की है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध जब तक जनता जागरूक नहीं होगी तब तक केवल कानूनों के माध्यम से भ्रष्टाचार का उन्मूलन नहीं किया जा सकता है। बढ़ते हुए भ्रष्टाचार को रोकने में सबसे सशक्त एवं प्रमुख भूमिका नागरिक समाज की है। समाज व्यक्तियों का समूह है जहाँ सभी एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं एवं एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं इसलिये भ्रष्टाचार को कम करने के लिये समाज को सक्रिय भूमिका निभाने की आवश्यकता है।
भ्रष्टाचार के मामले में नागरिकों की आवाज़ को सामने लाने, उसे खत्म करने और उस पर रोक लगाने के लिये प्रभावकारी ढंग से प्रयोग किया जा सकता है। इसमें नागरिकों को भ्रष्टाचार की बुराइयों के बारे में शिक्षा देने, उनके जागरूकता के स्तरों को बढ़ाने और उन्हें आवाज़ देकर उनकी भागीदारी प्राप्त करने में सिविल सोसाइटी और मीडिया को सक्रिय करने की आवश्यकता है। इससे वैधानिक, पारंपरिक व्यवस्थाओं और कार्यपालिका की कानूनी जवाबदेही और आंतरिक जवाबदेही के माध्यम से अलग सरकार की लोगों के प्रति जवाबदेही की अवधारणा के एक नए आयाम का आगम होता है।

भ्रष्टाचार को रोकने में परिवार की भूमिका
प्रत्येक मनुष्य अपने जन्म के साथ ही परिवार प्राप्त कर लेता है, यही परिवार उसकी प्रथम पाठशाला होती है जहाँ वह समाज को देखता, समझता और सीखता है। यह प्रक्रिया मनुष्य के समाजीकरण एवं सर्वांगीण विकास में बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण है। बच्चा मूल्यों को ग्रहण करना परिवार से ही शुरू करता है। किसी भी नागरिक के नैतिक मूल्य, सामाजिक मूल्य, पेशेवर मूल्य, सांस्कृतिक मूल्य आदि सीधे-सीधे परिवार के मूल व्यवहार से संबंधित होते हैं एवं परिवार का इन मूल्यों पर गहरा प्रभाव होता है। किसी भी नागरिक के व्यक्तित्व निर्माण एवं व्यवहार को परिवार ही बनाता है।
भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिये परिवार की ही प्रमुख भूमिका होती है। यदि परिवार अपने बच्चों में उच्च नैतिक मूल्य, सांवेगिक बुद्धि एवं सत्यनिष्ठा बढ़ाने पर बचपन से ध्यान दें तो वह बच्चा भ्रष्ट कम होगा, इसकी अधिकतम संभावना होती है। भ्रष्ट व्यक्ति के परिवार में बच्चों को भ्रष्टाचार करने का प्रशिक्षण एवं स्वीकार्यता परिवार से ही मिल जाती है। भ्रष्टाचार का प्रभाव परिवार पर नकारात्मक पड़ता है।
भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्ति वाले परिवार में बच्चों को भी यही मूल्य मिलते हैं तथा उनके नैतिक मूल्यों का पतन हो जाता है। भ्रष्टाचार से उन्हें अधिक सुविधा एवं विलासितापूर्ण जीवन-यापन की आदत हो जाती है तथा वे और अधिक भ्रष्टाचार करने की ओर अग्रसर होते हैं।
यदि संस्कारवान परिवार होगा तो बच्चों में भी नैतिकता के उच्च मूल्य बचपन से ही रोपित हो जाएंगे। ऐसी नैतिकता व्यक्ति को आजीवन अनैतिक होने से बचाती है।
यदि बच्चे को दुर्गुण एवं कुसंस्कार उसे बचपन से ही मिलेंगे तो वह अवसर के अनुसार उन्हें प्रदर्शित करने में कोई कोताही नहीं बरतेगा।

भ्रष्टाचार को रोकने में मीडिया की भूमिका
जनसंचार का सबसे सशक्त माध्यम मीडिया है। मीडिया के अंतर्गत तीन प्रकार की मीडिया होती है जिसमें प्रिंट मीडिया, जैसे- अखबार, पत्र-पत्रिका (मैग्जीन), इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, जैसे- टी.वी., रेडियो, दूरदर्शन, आकाशवाणी, वेब पोर्टल, न्यूज ऐप्स, मोबाइल आधारित न्यूज सर्विस तथा सोशल मीडिया, जैसे- फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर, लिंक्ड इन आदि को सम्मिलित किया जाता है। मीडिया भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। साथ ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनमत एवं जनजागरूकता लाने में भी इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
एक स्वतंत्र मीडिया की भ्रष्टाचार रोकने, अनुवीक्षण करने और नियंत्रण करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसी मीडिया जनता को भ्रष्टाचार पर सूचना और शिक्षा दे सकता है। मीडिया सरकार, निजी क्षेत्र और सिविल सोसाइटी संगठनों में भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करता है और भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपने को नीतिबद्ध करते हुए आचार संहिता पर निगरानी में सहायता करता है।
मीडिया द्वारा जाँच की रिपोर्ट देना और भ्रष्टाचार की घटनाओं की वैसी ही सूचना देना जैसी वे घटी हों तो वह भ्रष्टाचार पर सूचना का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत हो सकती है। भ्रष्टाचार की घटनाओं की ठीक वैसी ही दैनिक सूचना देना दूसरा योगदान है। ऐसी रिपोर्टों का उत्तर देने के लिये प्राधिकारियों को समय पर कार्यवाही कर लेनी चाहिये, सही तथ्यों से अवगत करा देना चाहिये, दोषियों को पकड़ने के लिये कदम उठाने चाहिये और प्रेस तथा जनता को समय-समय पर ऐसी कार्यवाही की प्रगति की सूचना देते रहना चाहिये। यह आम अनुभव रहा है कि अक्सर ऐसे आरोपों पर ध्यान देकर उनका अनुसरण करने के लिये कोई व्यवस्थित प्रबंध नहीं किये जाते। मीडिया को विभिन्न क्षेत्रों में आने वाली रिपोर्टों का मिलान करना और उनका अनुसरण करना सभी सार्वजनिक कार्यालयों में शिकायतों के अनुवीक्षण करने वाली व्यवस्थाओं का एक अभिन्न हिस्सा होना चाहिये।
मीडिया द्वारा सभी आरोपों/शिकायतों के लिये आवश्यक समुचित जाँच के लिये मानदंड और प्रणाली को अपनाया जाना और उन्हें जनता के सामने लाने के लिये कार्यवाही करना आवश्यक है।

भ्रष्टाचार निवारण हेतु की गई पहलों के उदाहरण
भ्रष्टाचार निवारण करने के लिये दंडात्मक और रोकथाम के उपायों के अनुकूलतम मिले-जुले रूप की आवश्यकता है। दंडात्मक उपाय निवारण का काम करते हैं जबकि रोकथाम के उपाय व्यवस्था में पारदर्शिता लाकर, जवाबदेही बढ़ाकर, विवेक को कम करके, कार्य-पद्धतियों को तर्कसंगत करने आदि से भ्रष्टाचार के अवसर कम कर देते हैं। बेहतर रोकथाम उपाय 'सर्वांगीण सुधारों' का काम करते हैं, क्योंकि वे प्रणालियों और प्रक्रियाओं में सुधार लाते हैं। इस दिशा में हाल ही में पहल किये गए कुछ कदम निम्नलिखित हैं

रेलवे यात्री आरक्षण (भारतीय रेलवे)
रेलवे यात्री आरक्षण, जिसमें ऑनलाइन आरक्षण एवं 'ई-टिकटिंग' शामिल हैं, के कंप्यूटरीकरण ने मध्यस्थों को हटा दिया है, आरक्षण कार्यालयों को कम भीड़-भाड़ वाला कर दिया है और रेलवे आरक्षण प्रक्रिया में पर्याप्त पारदर्शिता ला दी है।

एम.पी. ऑनलाइन
मध्य प्रदेश सरकार ने एम.पी. ऑनलाइन के माध्यम से नागरिक सेवाओं, सरकारी नीतियों, शिकायतों तथा जानकारी के संदर्भ में एक एकीकृत प्लेटफॉर्म उपलब्ध करा दिया है। इसके माध्यम से ऑनलाइन सेवाएँ प्रदान करने से काफी हद तक बिचौलियों एवं दलालों की भूमिका कम हुई है।

ई-पुलिस
ई-पुलिस में दिल्ली, पंजाब सहित कई राज्यों ने शिकायतों के ऑनलाइन पंजीकरण और उनका व्यवस्थित रूप से अनुवर्तन सुनिश्चित किया है जिससे शिकायतकर्ताओं को शिकायत के नतीजे और उनकी शिकायतों पर ऊँचे स्तर के पुलिस अधिकारी किस प्रकार निपटान करते हैं, इसका पता चल सके। साथ ही इस पर वास्तविक समय (Real Time) निगरानी रखने के लिये उच्च पुलिस स्तरों की जानकारी मिल सके।

ई-पंजीकरण और ई-स्टांप
मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र सहित विभिन्न राज्यों ने ई-पंजीकरण और ई-स्टांप की व्यवस्था शुरू की है। इसमें और अधिक पारदर्शी संपत्ति मूल्यांकन तालिकाएँ, रिकॉर्डों का कंप्यूटरीकरण, पंजीकरण प्रलेख को वापस करने की समय सीमा निर्धारित करना, फिंगर प्रिंटिंग और फोटो खींचने के लिये डिजिटल कैमरों का प्रयोग करने के लिये रूपरेखा बनाने की मंशा है। मूल्यांकन तालिकाओं के समय पर आ जाने से स्टांप ड्यूटी के मनमाने ढंग से निर्धारण करने पर स्पष्ट रूप से रोक लगी है और इससे भ्रष्टाचार को कम करने के अनेक उद्देश्य प्राप्त किये जा सके हैं, अचल संपत्ति के खरीदारों के साथ उत्पीड़न समाप्त हुआ है और कर संग्रह में वृद्धि हुई है।

सामान्य ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा
कर्नाटक और मध्य प्रदेश में सामान्य ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा से व्यावसायिक कॉलेजों में योग्यता आधारित चयन को समय पर और अधिक पारदर्शी तरीके से सुनिश्चित किया जाता है।

अध्यापकों की नियुक्ति की स्कीम
कर्नाटक, मध्य प्रदेश, जम्मू-कश्मीर आदि राज्यों में अध्यापकों की नियुक्ति की स्कीम ऑनलाइन कर दी गई है। यह अद्भुत प्रयास अध्यापकों को नियुक्त करने के लिये एक सुस्पष्ट, उद्देश्यपूर्ण और पारदर्शी व्यवस्था प्रदान करता है।

यूनिट क्षेत्र स्कीम (दिल्ली)
इसने स्वयं निर्धारण और गणना के नियामक आधार से संबंधित संपत्ति कर और संपत्ति पंजीकरण के भुगतान के लिये एक व्यवस्था प्रदान की है।

उपसंहार

एक भ्रष्टाचार  मुक्त  समाज बनाने की कोशिश साफ़ तौर पर करनी होगी। आने वाली पीढ़ी इस भ्रष्टाचार के जाल में ना फंसे। भारत के कई सिस्टम में भ्रष्टाचार का कीड़ा घुसा हुआ है। इसे ख़त्म करने का समय आ गया है। स्वार्थी और लालची लोग सम्पूर्ण देश को भ्रष्टाचार जैसे कृत्यों से बदनाम कर रहे है। हमे एक जुट होकर इस पर अंकुश लगाना होगा और राष्ट्र को इस धोखेदारी से बचाना होगा। लोगो को लगता है अधर्म का मार्ग अपनाकर, वह कुछ भी हासिल कर सकते है। इस रवैये को बदलना बेहद आवश्यक है। इसके लिए कानून व्यवस्था को मज़बूत बनाने की ज़रूरत है।
भ्रष्टाचार हमारे नैतिक जीवन मूल्यों पर सबसे बड़ा प्रहार है भ्रष्टाचार से जुड़े लोग अपने स्वार्थ में अंधे होकर राष्ट्र का नाम बदनाम कर रहे हैं अतः यह बेहद ही आवश्यक है कि हम भ्रष्टाचार केएस जहरीले सांप को कुचल डाले साथ ही सरकार को ही भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए प्रभावी कदम उठाने होंगे जिससे हम एक भ्रष्टाचार मुक्त भारत के सपने को सच कर सकें।
हम कह सकते हैं कि भ्रष्टाचार रूपी समस्या से पूर्णतः छुटकारा पाने के लिए मनुष्य को अपने नैतिक कर्तव्यों को समझना होगा तथा “हम न तो रिश्वत लेंगे और ना ही किसी को रिश्वत देंगे” इस संकल्प को कृतसंकल्पित होकर आत्मसात करना होगा। तब जाकर कहीं सच्चे अर्थों में वास्तविक धरातल पर भ्रष्टाचार का समूल उन्मूलन संभव है अन्यथा कदापि नहीं। भ्रष्टाचार हमारे नैतिक जीवन मूल्यों पर सबसे बड़ा प्रहार है। इससे जुड़े लोग अपने स्वार्थ में अंधे होकर राष्ट्र का नाम बदनाम कर रहे हैं।

एक टिप्पणी भेजें

Post a Comment (0)

और नया पुराने