बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री कौन थे? | bihar ke pratham mukhyamantri kaun the

बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री कौन थे?

बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह थे. उनको बिहार केसरी और श्रीबाबू के नाम से भी जाना जाता है. श्री बाबू एक महान समाज सुधारक और न्यायप्रेमी व्यक्ति थे. उनके समय में बिहार विकास के क्षेत्र में भारत का पहला राज्य था. उन्होंने सबसे पहले जमीदारी प्रथा का उन्मूलन किया था. वह बिहार के मुख्यमंत्री होने के साथ ही एक प्रसिद्ध अधिवक्ता भी थे.

राज्य मंत्रिपरिषद एवं मुख्यमंत्री
संविधान के अनुच्छेद 163 के अनुसार राज्यपाल को उनके कार्यों में सहायता एवं सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद् होगी, जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होगा। राज्य की कार्यपालिका शक्तियाँ राज्यपाल में सन्निहित हैं, परंतु वास्तविक रूप में ये शक्तियाँ मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिपरिषद् को प्राप्त हैं।

मंत्रिपरिषद् का गठन

भारत के संविधान के अनुच्छेद 164 के अनुसार मंत्रिपरिषद् के प्रधान 'मुख्यमंत्री' की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं। राज्य की विधानसभा में बहुमत वाले दल या गठबंधन के नेता को मुख्यमंत्री बनाने का प्रावधान है, परंतु अगर विधानसभा में किसी दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला हो तो राज्यपाल स्वविवेक से मुख्यमंत्री की नियुक्ति करते हैं। यदि बहुमतवाला दल किसी ऐसे व्यक्ति को नेता चुनता है, जो विधायक नहीं है, तो ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनने के बाद अगले छह माह के अंदर राज्य विधानमंडल के किसी सदन की सदस्यता ग्रहण करना अनिवार्य होता है। मंत्रिपरिषद् के शेष सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर करते हैं। अगर मंत्रिपरिषद् का कोई सदस्य मंत्री बनने के समय राज्य विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं हो तो उसे भी अगले छह माह के अंदर विधानमंडल के किसी भी सदन की सदस्यता पाना मंत्री बने रहने के लिए अनिवार्य है।
संविधान संशोधन अधिनियम (91वाँ) 2003 से राज्य में मंत्रियों की कुल संख्या (मुख्यमंत्री सहित) विधानसभा सदस्यों की कुल संख्या के 15 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होगी, किंतु इसकी न्यूनतम संख्या 12 होगी। मंत्रिपरिषद् सामूहिक रूप से राज्य की विधानसभा के प्रति और व्यक्तिगत रूप से राज्यपाल के प्रति उतरदायी होती है। मंत्रियों का मासिक वेतन एवं भत्ता समय-समय पर विधानमंडल द्वारा निर्धारित किया जाता है। सभी मंत्री पद ग्रहण करने से पूर्व राज्यपाल के सम्मुख पद एवं गोपनीयता की शपथ लेते हैं। संविधान संशोधन अधिनियम (91वाँ) 2003 से राज्य में मंत्रियों की कुल संख्या (मुख्यमंत्री सहित) विधानसभा सदस्यों की कुल संख्या के 15 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होगी, किंतु इसकी न्यूनतम संख्या 12 होगी।

मंत्रिपरिषद् का कार्य

राज्य मंत्रिपरिषद् संघ की मंत्रिपरिषद् की तरह विभिन्न प्रकार के प्रशासनिक, विधायी एवं वित्तीय कार्यों का संपादन करती है। राज्य मंत्रिपरिषद् राज्य प्रशासन का केंद्र एवं विधानमंडल की पथ प्रदर्शक है। मंत्रिपरिषद् कार्यपालिका एवं व्यवस्थापिका के बीच कड़ी का काम करती है। विधानसभा के प्रत्येक अधिवेशन के प्रारंभ में उसकी व्यवस्था से संबंधित सभी कार्यक्रम मंत्रिपरिषद् के द्वारा तैयार किए जाते हैं।
विधेयकों की विधानसभा में प्रस्तुति के संदर्भ में कोई भी निर्णय इसी के द्वारा किया जाता है। विधानमंडल के सदस्य होने के कारण मंत्रिपरिषद् के सभी सदस्य विधानमंडल की बैठकों में भाग लेते हैं। विधानमंडल के सत्र के दौरान विधायकों द्वारा पूछे गए प्रश्नों का उत्तर संबंधित विभाग के मंत्री को देना पड़ता है। विधानसभा में बजट प्रस्तुत करने से पहले मंत्रिपरिषद् बजट को स्वीकृत करती है। विभिन्न मदों में व्यय की जानेवाली राशि का निर्धारण, राज्य की जनता पर किसी भी प्रकार के कर का आरोपण, स्थानीय संस्थाओं को दी जानेवाली अनुदान की राशि का निर्धारण आदि मंत्रिपरिषद् के महत्त्वपूर्ण कार्य हैं। राज्य के विधानमंडल द्वारा बनाए गए किसी कानून को राज्य में लागू करना राज्य मंत्रिपरिषद् की जिम्मेवारी है। राज्य की सभी महत्त्वपूर्ण नियुक्तियाँ राज्यपाल मंत्रिमंडल के परामर्श से करता है।

कार्यकाल

संविधान के अनुच्छेद 164 (1) के अनुसार मंत्रिपरिषद् का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। सभी सदस्य राज्यपाल के प्रसादपर्यंत अपने पद पर बने रहते हैं। मंत्रिपरिषद् से किसी मंत्री को उसके पद से हटाने हेतु राज्यपाल को मुख्यमंत्री की सलाह से काम करना होता है। सामान्यत: विधानसभा में सरकार को जब तक बहमत प्राप्त रहता है, मंत्रिमंडल बना रहता है। यदि मुख्यमंत्री अपने पद से त्याग-पत्र देते हों तो मंत्रिपरिषद् स्वतः विघटित हो जाती है।
राज्य में संवैधानिक मशीनरी फेल हो जाने पर, देश पर बाह्य आक्रमण होने की स्थिति में केंद्र द्वारा अनुच्छेद 356 का प्रयोग करके राज्य मंत्रिपरिषद् का अंत किया जा सकता है। विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होते ही राज्य मंत्रिपरिषद् का कार्यकाल भी स्वतः समाप्त हो जाता है। राज्य मंत्रिपरिषद का गठन मुख्यमंत्री की सलाह से राज्यपाल के द्वारा किया जाता है। मंत्रिपरिषद् में कैबिनेट मंत्री, स्वतंत्र प्रभार का राज्यमंत्री एवं राज्यमंत्री निर्धारण मुख्यमंत्री के द्वारा किया जाता है।

मुख्यमंत्री के कार्य

राज्य की मंत्रिपरिषद् का प्रधान मुख्यमंत्री होता है। राज्य प्रशासन पूरी तरह से मुख्यमंत्री के नियंत्रण में रहता है। राज्य मंत्रिपरिषद् का गठन मुख्यमंत्री की सलाह से राज्यपाल के द्वारा किया जाता है। मंत्रिपरिषद् में कैबिनेट मंत्री, स्वतंत्र प्रभार का राज्यमंत्री एवं राज्यमंत्री का निर्धारण मुख्यमंत्री के द्वारा किया जाता है। मंत्रियों के बीच विभागों का विभाजन मुख्यमंत्री की सलाह से राज्यपाल करते हैं। समय-समय पर मंत्रिपरिषद् का पुनर्गठन मुख्यमंत्री की सलाह से किया जा सकता है। राज्यपाल एवं मंत्रिपरिषद् के बीच मुख्यमंत्री एक कड़ी का कार्य करते हैं। मंत्रिपरिषद् के निर्णयों की सूचना राज्यपाल को एवं राज्यपाल की कोई सलाह मंत्रिपरिषद् को मुख्यमंत्री के द्वारा दी जाती है। राज्य विधानमंडल का नेता मुख्यमंत्री को माना जाता है।
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