जीएसटी कब लागू हुआ? | GST kab lagu hua

जीएसटी कब लागू हुआ?

जीएसटी 1 जुलाई, 2017 से लागू हुआ। एक ऐतिहासिक कर बदलाव के रूप में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) 1 जुलाई, 2017 से लागू हुआ। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को भारतीय कराधान के इतिहास में सबसे क्रांतिकारी कर सुधार माना जा रहा है। केंद्र व राज्य दोनों स्तरीय अधिभारों को समेटते हुए जीएसटी को केंद्र एवं राज्य दोनों सरकारों द्वारा नियंत्रित किया जा रहा है। जीएसटी सहकारी संघवाद को सुदृढ़ बनाते हुए देश में आर्थिक एकीकरण को सुनिश्चित कर रहा है। स्वतंत्रता के पश्चात् किया गया सबसे बड़ा कर बदलाव जीएसटी-'एक देश-एक कर-एक बाज़ार' के लक्ष्य को पूरा करने के लिये संकल्पित है।
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जीएसटी वस्तुओं और सेवाओं के उपभोग पर लगाया गया गंतव्य आधारित कर है। इसे पिछले चरणों में क्षतिपूर्ति (सेटऑफ) हेतु उपलब्ध कर के भुगतान के क्रेडिट प्राप्त करने के लिये वस्तु के उत्पादन से लेकर अंतिम उपभोग तक के सभी चरणों पर लगाया गया है। इसमें केवल मूल्य संवर्द्धन (Value Addition) पर ही कर लगाया जाता है जिसका बोझ अंतिम उपभोक्ता द्वारा वहन किया जाता है।
101वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2016 के द्वारा अनुच्छेद 366 में एक नया खंड (12A) जोड़ा गया, जिसके अनुसार 'वस्तु एवं सेवा कर' का अर्थ है- मानव उपभोग के लिये मादक पेय पदार्थों की आपूर्ति पर लगने वाले कर को छोड़कर वस्तुओं या सेवाओं या दोनों की आपूर्ति पर लगने वाला कर। जीएसटी से एक आधुनिक कर व्यवस्था है, जो पहले से अधिक सरल एवं पारदर्शी और भ्रष्टाचार को रोकने के लिये कारगर उपाय भी है। जीएसटी से सरकार, उद्योग और उपभोक्ता सभी हितधारक लाभान्वित हो रहे हैं। भारत में जीएसटी के लागू होने से उपभोक्ताओं को दोहरे कराधान (कर पर कर-Cascading) से मुक्ति मिली है। जिससे होने वाले लाभों के कारण वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतों में कमी की अपेक्षा की जा रहा है।
पूरे देश में एकरूप एकल अप्रत्यक्ष कर, इनपुट टैक्स क्रेडिट के अखंड प्रवाह, अंतर्राज्यीय सीमाओं पर अवरोधों से संबंधित कर समाप्त होने, प्रचालन की कम लागत, शुरू से लेकर अंत तक आई टी सक्षम प्रणाली और कर प्राधिकरणों के साथ न्यूनतम संवाद के कारण व्यापार और उद्योग जगत को लाभ हो रहा है। केंद्र और राज्य सरकारों को कर राजस्व की अधिक प्राप्ति हो रही है और कर संग्रहण की लागत भी न्यूनतम हुई है। अब निर्यात अधिक प्रतिस्पर्धात्मक हो गए हैं, क्योंकि वस्तुएँ और सेवाएँ पुनः बिना किसी अतिरिक्त निहित कर के निर्यात की जा रही है। जीएसटी लागू होने पर व्यापार सुगमता बढ़ने के कारण 'मेक इन इंडिया' अभियान को बहुत बड़ा प्रोत्साहन मिला है। इसके साथ ही सस्ते आयातों से संरक्षण प्राप्त होगा, क्योंकि सभी प्रकार के आयातों पर आधारभूत सीमा शुल्क (कर) के अतिरिक्त एकीकृत जीएसटी भी लगाया गया है। ये सभी लाभ मध्यम एवं दीर्घकाल में भारत की आर्थिक संवृद्धि में महत्त्वपूर्ण रूप से सहायक होंगे।

जीएसटी का इतिहास

वस्तु एवं सेवा कर की उत्पत्ति 17 जुलाई, 2000 को मानी जा सकती है, जब भारत सरकार ने पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, उत्तर प्रदेश, गुजरात, दिल्ली और मेघालय राज्यों के माननीय वित्त मंत्रियों को सदस्यों के तौर पर शामिल करते हुए राज्य के वित्त मंत्रियों की अधिकार प्राप्त समिति स्थापित की थी, जिसके उददेश्य निम्नलिखित थे-
  • राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों द्वारा बिक्री कर की समान न्यूनतम दरों के कार्यान्वयन की निगरानी करना
  • बिक्री-कर आधारित प्रोत्साहन योजनाओं को हटाने की निगरानी करना
  • वैट को अपनाने के लिए राज्यों की उपलब्धियों और विधियों का निर्णय करना; और
  • देश में मौजूदा केंद्रीय बिक्री कर प्रणाली में सुधार की निगरानी करना ।
  • इसके बाद, असम, तमिलनाडु, जम्मू और कश्मीर, झारखंड और राजस्थान के माननीय राज्य वित्त मंत्रियों को भी अधिकार प्राप्त समिति के सदस्य के रूप में अधिसूचित किया गया। 12 अगस्त, 2004 को भारत सरकार ने राज्यों के सभी माननीय वित्त/कराधान मंत्रियों की सदस्यता वाली अधिकार प्राप्त समिति के पुनर्गठन का निर्णय लिया। बाद में, इस निकाय को सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत एक संस्था के रूप में पंजीकृत करने का निर्णय लिया गया। जीएसटी ने पारित होने और कार्यान्वयन के लिए लंबे समय तक प्रतीक्षा की है।
भारत में जीएसटी की यात्रा की प्रमुख उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए एक संक्षिप्त अतीतावलोकन यहां प्रस्तुत है:

2003 : अप्रत्यक्ष कर पर केलकर कार्यबल ने वैट सिद्धांत पर आधारित एक व्यापक वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) का सुझाव दिया था।

फरवरी, 2007 : तत्कालीन माननीय केन्द्रीय वित्त मंत्री द्वारा केन्द्रीय बजट (2007-08) में 1 अप्रैल, 2010 से जीएसटी को लागू करने की घोषणा की गई।

सितंबर, 2009 : अधिकार प्राप्त समिति (ईसी) ने सभी राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों के व्यापारिक करों के प्रमुख सचिवों/सचिवों (वित्त/कराधान) और आयुक्तों से मिलकर निम्नलिखित पर अपनी सिफारिशें देने के लिए एक कार्यकारी समूह का गठन करने का निर्णय लिया।
  • वस्तुओं और सेवाओं जिन्हें छूट दी गई सूची में रखा जाना चाहिए
  • अंतरराज्यीय सेवाओं में लेनदेन सहित सेवाओं के लेन-देन पर कर लगाने के नियम और सिद्धांत; और
  • भारतीय स्टेट बैंक और कुछ अन्य राष्ट्रीयकृत बैंकों से परामर्श करके स्टॉक अंतरण सहित वस्तुओं के अंतरराज्यीय लेनदेन/चालान के लिए सुझाए गए मॉडल को अंतिम रूप देना।

नवंबर, 2009 : केंद्र और राज्य सरकारों से इनपुट्स के आधार पर अधिकार प्राप्त समिति ने जीएसटी पर अपना पहला चर्चा पत्र जारी किया।

मार्च, 2011 : संविधान (एक सौ पचासवें संशोधन) विधेयक, 2011 संघ और राज्यों को समवर्ती कराधान अधिकार देने के लिए लोकसभा में पेश किया गया था। विधेयक में वस्तु एवं सेवा कर परिषद् के सृजन और वस्तु एवं सेवा कर विवाद निपटारा प्राधिकरण का सुझाव दिया गया। विधेयक 2014 में समाप्त हो गया था और इसे संविधान (122वें संशोधन) विधेयक, 2014 से बदल दिया गया।

नवंबर 2012 : भारत सरकार, राज्य सरकारों और अधिकार प्राप्त समिति (ईसी) के अधिकारियों को शामिल करते हुए "जीएसटी डिजाइन पर समिति का गठन किया गया।

जनवरी, 2013 : अधिकार प्राप्त समिति ने संविधान (115) संशोधन विधेयक सहित प्रस्तावित प्रारूप पर विचार-विमर्श किया और रिपोर्ट प्रस्तुत की।
इस रिपोर्ट के आधार पर, अधिकार प्राप्त समिति ने संविधान संशोधन विधेयक में कुछ परिवर्तनों की सिफारिश की और जीएसटी के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा और रिपोर्ट करने के लिए अधिकारियों की निम्न तीन समितियों का गठन करने का निर्णय लिया :
  1. आपूर्ति स्थान के नियमों और राजस्व तटस्थ दरों पर समिति
  2. दोहरी नियंत्रण, सीमा और छूटों पर समिति
  3. आयातों पर आईजीएसटी और जीएसटी पर समिति

मार्च, 2013 : मुख्य रूप से वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के कार्यान्वयन के लिए केन्द्र और राज्य सरकार(रों), करदाताओं और अन्य हितधारकों को सूचना प्रौद्योगिकी और सेवाएं प्रदान करने के लिए सरकार द्वारा स्थापित विशेष प्रयोजन वाहन के तौर पर वस्तु एवं सेवा कर नेटवर्क (जीएसटीएन) के नाम पर एक लाभ रहित गैर-सरकारी, निजी लिमिटेड कम्पनी का गठन किया गया।

अगस्त, 2013 : संसदीय स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट लोकसभा को सौंपी। मंत्रालय ने विधायी विभाग के परामर्श से अधिकार प्राप्त समिति (ईसी) की सिफारिशों और संसदीय स्थायी समिति की सिफारिशों की जांच की। अधिकार प्राप्त समिति और संसदीय स्थायी समिति द्वारा की गई अधिकांश सिफारिशें स्वीकार कर ली गईं और मसौदा संशोधन विधेयक उपयुक्त रूप से संशोधित किया गया।

सितंबर, 2013 : उक्त उल्लिखित परिवर्तनों को शामिल करते हुए अंतिम मसौदा संविधान संशोधन विधेयक, विचार के लिए अधिकार प्राप्त समिति को भेजा गया था।

नवंबर, 2013 : अधिकार प्राप्त समिति ने शिलांग में अपनी बैठक के बाद विधेयक पर फिर से कुछ सिफारिशें की। जिनमें से कुछ सिफारिशें मसौदा संविधान (115 संशोधन) विधेयक में शामिल की गई और संशोधित मसौदा फिर से विचार के लिए अधिकार प्राप्त समिति को भेजा गया था।

जून, 2014 : नई सरकार के अनुमोदन के बाद मार्च 2014 में मसौदा संविधान संशोधन विधेयक अधिकार प्राप्त समिति को भेजा गया।

दिसंबर, 2014 : वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लागू करने और राज्य मूल्य वर्धित कर, चुंगी और प्रवेश कर, विलासिता कर इत्यादि को समाहित करने के लिए संविधान में संशोधन के लिए इच्छित संविधान (एक सौ बाइसवां संशोधन) विधेयक, 2014 माननीय वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली ने 19 दिसंबर, 2014 को लोकसभा में पेश किया था।

मई, 2015 : संविधान संशोधन (122) विधेयक लोकसभा द्वारा 06 मई, 2015 को पारित किया गया।

मई, 2015 : राज्यसभा में, विधेयक को राज्यसभा की 21 सदस्यीय चयन समिति को भेजा गया।

जुलाई 2015 : चयन समिति ने 22 जुलाई, 2015 को राज्यसभा को अपनी रिपोर्ट सौंपी।

जून, 2016 : 14 जून, 2016 को वित्त मंत्रालय ने सार्वजनिक क्षेत्र में जीएसटी पर विचारों और सुझावों के लिए मसौदा मॉडल कानून जारी किया।

अगस्त, 2016 : 3 अगस्त 2016 को, संविधान (122 संशोधन) विधेयक, 2014 राज्यसभा द्वारा कुछ खास संशोधनों के साथ पारित किया गया।

अगस्त 2016 : राज्यसभा द्वारा किए गए परिवर्तनों को लोकसभा द्वारा सर्वसम्मति से 8 अगस्त, 2016 को पारित किया गया।

सितंबर 2016 : विधेयक अधिकांश राज्य विधानसभाओं द्वारा अपनाया गया जिसमें राज्य विधानसभाओं में कम से कम 50% अनुमोदन आवश्यक था।

सितंबर, 2016 : 8 सितंबर, 2016 को भारत के माननीय राष्ट्रपति की अंतिम सहमति दी गई।

अप्रैल, 2017 : संसद ने निम्नलिखित चार विधेयक पारित किए
  • केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर (सीजीएसटी) विधेयक
  • एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर (आईजीएसटी) विधेयक
  • संघ राज्य क्षेत्र वस्तु एवं सेवा कर (यूटीजीएसटी) विधेयक
  • वस्तु एवं सेवा कर (राज्यों को प्रतिपूर्ति) विधेयक

अप्रैल, 2017 : वस्तु एवं सेवा कर पर उपरोक्त चार प्रमुख कानूनों को राष्ट्रपति की स्वीकृति दी गई।
(राज्य अपनी संबंधित विधायिकाओं में अलग और समर्पित कानून अर्थात एसजीएसटी विधेयक पारित करने की प्रक्रिया में हैं)

वस्तु एवं सेवा कर (जी.एस.टी.) क्या है?

यह वस्तुओं और सेवाओं के उपभोग पर लगाया गया गंतव्य आधारित कर है। इसे पिछले चरणों में, क्षतिपूर्ति (सेटऑफ) हेतु उपलब्ध करके भुगतान के क्रेडिट प्राप्त करने के लिए उत्पादक से अन्तिम उपभोग के सभी चरणों पर लगाने के लिए प्रास्तवित किया गया है। संक्षेप में, केवल मूल्य संवर्धन (value addition) पर ही कर लगाया जाएगा और कर का बोझ अंतिम उपभोक्ता द्वारा वहन किया जाएगा।

जीएसटी और केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध
इस समय वित्तीय शक्तियों का केंद्र और राज्यों के बीच विभाज संविधान में बिल्कुल स्पष्ट किया गया है और एक-दूसरे के क्षेत्र में किसी का कोई दखल नहीं है। केंद्र को वस्तुओं के विनिर्माण/उत्पादन पर (केवल मानव के द्वारा प्रयोग में आने वाले शराब, अफीम, मादक पदार्थों आदि को छोड़कर) पर कर लगाने की शक्ति प्राप्त है जबकि राज्यों को वस्तुओं की होने वाली बिक्री पर कर लगाने की शक्ति प्राप्त है। यदि बिक्री अंतर्राज्यीय होती है तब केंद्र को इस पर कर (केंद्रीय बिक्री कर) लगाने की शक्ति प्राप्त है लेकिन इस प्रकार के संपूर्ण कर को मूल राज्य वसूलता है और पूरा का पूरा अपने पास रख लेता है। जहां तक सेवाओं की बात है, सेवाकर को लगाने की शक्ति केवल केंद्र के पास ही है। चूंकि भारत में आयात किए जाने या भारत से निर्यात किए जाने के दौरान वस्तुओं की होने वाली बिक्री पर राज्यों को कोई कर लगाने की शक्ति नहीं है अत: केंद्र ही वस्तुओं के आयात या निर्यात पर कर लगाता है और वही उसे वसूल भी करता है। यह कर अतिरिक्त सीमा शुल्क के रूप जाना जाता है जोकि आधारभूत सीमा शुल्क के अलावा होता है। इस अतिरिक्त सीमाशुल्क (जिसे सामान्यतया सीवीडी और एसएडी के नाम से जाना जाता है) उत्पाद शुल्क, बिक्री कर, राज्य वैट और अन्य करों को संतुलित कर देता है जोकि इसी प्रकार के घरेलू उत्पादों पर लगाए जाते हैं। जीएसटी को लागू करने के लिए संविधान में संशोधन करने की जरूरत पड़ेगी, जिससे कि जीएसटी के लगाने और उसको वसूलने के लिए केंद्र और राज्यों को समवर्ती शक्तियां प्रदान की जा सकें।
जीएसटी को लगाने के लिए केंद्र और राज्यों का समवर्ती क्षेत्राधिकार दिए जाने के लिए एक ऐसे अद्वितीय तथा संस्थागत तंत्र की जरूरत पड़ेगी जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि जीएसटी की संरचना और इसके डिजाइन में तथा इसको लागू करने में दोनों और केंद्र और राज्य के द्वारा संयुक्त रूप से निर्णय लिए जाएं। इसको कारगर बनाने के लिए ऐसे तंत्र के पास संवैधानिक शक्ति का होना जरूरी है।

जीएसटी की प्रमुख विशेषताएं

जीएसटी की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं
  • (i) जीएसटी को वस्तुओं को विनिर्माण, या वस्तुओं की बिक्री या सेवाओं के प्रावधान पर, जो कर की वर्तमान अवधारणा है, उसके एवज में वस्तुओं और सेवाओं के आपूर्ति पर लगाया जाएगा।
  • (ii) जीएसटी उत्पत्ति आधारित करारोपण के वर्तमान सिद्धांत के बदले गंतव्य आधारित उपभोग करारोपण के सिद्धांत पर आधारित होगा।
  • (iii) यह एक प्रकार केंद्रीय जीएसटी होगी, जिसमें केंद्र और राज्य एक ही आधार पर साथ-साथ कर लगा सकते हैं। केंद्र के द्वारा लगायी जाने वाली जीएसटी को केंद्रीयजीएसटी (सीजीएसटी) और राज्यों के द्वारा(इनमें वे संघ राज्य भी आते हैं जिनका अपना विधानमंडल है) लगाए जाने वाले जीएसटी को राज्य जीएसटी (एसजीएसटी) कहा जाएगा। बिना विधान मंडल वाले संघ राज्यों द्वारा लगान जाने वाले जीएसटी को संघ राज्य जीएसटी (यूटीजीएसटी) कहा जाएगा।
  • (iv) समेकित जीएसटी(आईजीएसटी) को वस्तुओं और सेवाओं की अंतर्राज्यीय आपूर्ति(जिसमें स्टाक ट्रांफर भी शामिल है) पर लगाया जाएगा। इसे केंद्र द्वारा वसूला जाएगा ताकि 'क्रेडिट चेन' में कोई व्यवधान आने पाए।
  • (v) वस्तुओं के आयात को अंतर्राज्यीय आपूर्ति माना जाएगा और इस पर लागू सीमाशुल्क के अलावा आईजीएसटी लगेगा।
  • (vi) सेवाओं के आयात को अंतर्राज्यीय- आपूर्ति माना जाएगा और इनपर आईजीएसटी लगेगा।
  • (vii) सीजीएसटी, एसजीएसटी/यूटीजीएसटी एवं आईजीएसटी को उस दर से लगाया जाएगा जिस पर केंद्र और राज्य जीएसटी परिषद (जीएसटीसी) तत्वावधान में सहमत होंगे।
  • (viii)जीएसटी निम्नलिखित करों की जगह लगाया जाएगा जिन्हें इस समय केंद्र लगा रहा है और वसूल रहा है
(क) केंद्रीय उत्पाद शुल्क;
(ख) उत्पाद शुल्क (औषधिक एवं प्रसाधन उत्पाद);
(ग) अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (विशेष महत्व की वस्तुएं);
(घ) अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (वस्त्र एवं वस्त्र उत्पाद);
(ड) अतिरिक्त सीमाशुल्क (जिसे सामान्यता सीवीडी के नाम से जाना जाता है);
(च) विशेष अतिरिक्त सीमाशुल्क (एसएडी);
(छ) सेवा कर;
(ज) उपकर और अधिकार, जहां तक कि वे वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति से संबंधित है;
(ix) जो राज्य कर इस जीएसटी में मिलाए जाएंगे वे इस प्रकार हैं
(क) राज्य वैट;
(ख) केंद्रीय बिक्री कर;
(ग) खरीद कर;
(घ) विलासिता कर;
(ड) प्रवेश कर (सभी प्रकार के);
(च) मनोरंजन कर (उनको छोड़कर जो स्थानीय निकायों द्वारा लगाए जाते हैं);

जीएसटी से लाभ

(क) मेक इन इंडिया
(i) से भारत में एक सामान्य राष्ट्रीय बाजार पैदा होगा जिससे विदेशी निवेश को और 'मेक इन इंडिया' अभियान को बढ़ावा मिलेगा।
(ii) से करों के प्रपात को रोका जा सकेगा क्योंकि इनपुट टैक्स क्रेडिट सभी प्रकार की वस्तुओं और सेवाओं पर तथा इनकी आपूर्ति के हर स्तर पर उपलब्ध होगी।
(iii) से कानूनी प्रक्रियाओं और कर की दरों में एकरूपता आएगी।
(iv) से निर्यात और उत्पादन क्रियाकलापों को बढ़ावा मिलेगा तथा रोजगार का और अधिक सृजन हो सकेगा। इस प्रकार जीडीपी में बढ़ोतरी होगी तथा लाभप्रद रोजगार पैदा होगा जिससे पर्याप्त आर्थिक विकास हो सकेगा।
(v) से अंतत: गरीबी के उन्मूलन में मदद मिलेगी क्योंकि इससे और अधिक रोजगार पैदा होंगे तथा और वित्तिय संशाधन विकसित किए जा सकेंगे।
(vi) से करों को संतुलित किया जा सकेगा विशेषकर निर्यात को माध्यम से क्योंकि इससे हमारे उत्पाद अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धा ले सकेंगे तथा भारतीय निर्यात को बढ़ावा मिलेगा।
(vii) देश में समग्र निवेश के परिवेश में सुधार आएगा जिससे राज्यों के विकास में मदद मिलेगी।
(viii) एसजीएसटी और आईजीएसटी की एक समान दरों से अपवंचन में कमी आएगी क्योंकि इससे पड़ोसी राज्यों में मनमाना दर नहीं लागू होगा तथा राज्य के भीतर तथा राज्य-राज्य की बिक्री में भी मनमानी दरें नहीं लागू होंगी।
(ix) से कंपनियों पर औसत कर भार भी कम हो सकेगा जिससे कीमतों में भी कमी आने की संभावना है और कीमतों में कमी होने का मतलब है खपत में बढ़ोतरी होगा जिससे उत्पादन बढ़ेगा और उद्योगों के विकास में मदद मिलेगी। इससे भारत एक 'मैन्युफेक्चरिंग हब' के रूप में उभरकर सामने आएगा।

(ख) इज ऑफ डूइंग बिजनेस
(i) कर व्यवस्था आसान होगी और छूटों की संख्या बहुत कम होगी।
(ii) करों की बलता में कमी आएगी जोकि इस समय अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था पर हावी है। इससे सरलता और एकरूपता आएगी।
(iii) अनुपालन लागत में कमी आएगी- क्योंकि तरह-तरह के करों को बनाए रखने के लिए ढेर सारे रिकार्ड की जरूरत नहीं पड़ेगी- इससे रिकार्डों को बनाए रखने के लिए संशाधनों और श्रमशक्ति में ज्यादा निवेश नहीं करना पड़ेगा।
(iv) विभिन्न प्रकार की प्रक्रियाओं जैसे कि पंजीकरण, रिटर्न, रिफंड, करभुगतान इत्यादि की प्रक्रियाएं सरल और स्वचालित हो सकेंगी।
(v) सारी बातचीत जीएसटीएन के सामान्य पोर्टल पर हो सकेगी। इससे करदाताओं और कर प्रशासन के बीच परस्पर बातचीत की जरूरत कम पड़ेगी।
(vi) इससे ऑनलाइन दायर किए जाने वाले सभी प्रकार के रिटर्न के अनुपालन के परिवेश में सुधार आएगा। इनपुट टैक्स क्रेडिट का ऑनलाइन सत्यापन हो सकेगा।और कागज रहित संव्यवहार को बढ़ावा मिलेगा।
(vii) करदाताओं के पंजीकरण, करों के रिफंड, करों के रिटर्न के एक समान फारमेट, करों के सामान्य आधार वस्तुओं और सेवाओं के सामान्य वर्गीकरण आदि से कर प्रणाली में ज्यादा से ज्यादा सुनिश्चितता आएगी।
(viii) पंजीकरण, रिफंड आदि जैसे प्रमुख क्रियाकलापों को समय से पूरा किया जा सकेगा।
(ix) पूरे भारत वर्ष में इनपुट टैक्स क्रेडिट की इलैक्ट्रॉनिक मेंचिग की जा सकेगी और इस प्रकार की प्रक्रिया और अधिक पारदर्शी तथा उत्तर दायी होगी।

(ग) उपभोक्ताओं को लाभ
(i) उपभोक्ताओं, खुदरा विक्रेताओं और सेवा प्रदाताओं के बीच इनपुट टैक्स क्रेडिट के निर्वात प्रवाह के कारण वस्तुओं की अंतिम कीमतें कम हो सकेंगी।
(ii) ऐसी आशा है कि छोटे विक्रेताओं की संख्या तुलनात्मक रूप से बड़ी होने से या तो इनको कर से छूट मिल सकेगी या इन पर कम दर से कर लगाया जा सकेगा। ऐसा एक संयुक्त योजना के तहत हो सकेगा- क्योंकि इन लोगों से खरीद करने में उपभोक्ताओं को ज्यादा व्यय नहीं करना पड़ेगा।
(iii) कंपनियों पर औसत कर भार कम होगा जिससे कीमतों में कमी आने की उम्मीद है और कीमतों में कमी होने का मतलब है इनकी खपत में बढ़ोतरी होना।

वस्तु एवं सेवाकर नेटवर्क
सरकार द्वारा एतश्मिन पूर्व कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 25 के अंतर्गत एक निजी कंपनी के रूप में वस्तु एवं सेवाकर नेटवर्क (जीएसटीएन) की स्थापना की गई है। यह जीएसटीएन तीन तरह की सेवाएं प्रदान करेगा जैसे कि करदाताओं के पंजीकरण, भुगतान और रिटर्न संबंधी सेवा। करदाताओं को इन सेवाओं को प्रदान करने के अलावा जीएसटीएन 25 राज्यों के लिए बैक-एंड आईटी मॉड्यूल्स स्थापित करेगा। यह राज्यों के लिए वैकल्पिक होगा। वर्तमान करदाताओं का माइग्रेशन नवंबर 2016 से शुरू हो गया है। केंद्र और राज्य दोनों के ही राजस्व विभाग इस समय के पंजीकृत करदाताओं को इस बात के लिए राजी कर रहा है कि वे वस्तु एवं सेवाकर नेटवर्क द्वारा संचालित आईटी सिस्टम में अपनी सारी औपचारिकताएं पूरी कर ले ताकि उनका सफलतापूर्वक माइग्रेशन हो सके। लगभग 60 प्रतिशत वर्तमान पंजीकर्ताओं ने जीएसटी सिस्टम में पहले ही माइग्रेट कर लिया है। जीएसटीएन ने पहले ही मैसर्स इनफोसिस को मैनेज्ड सर्विस प्रोवाइडर के रूप में पाँच वर्ष की अवधि के लिए नियुक्त कर लिया है और इस पर लगभग 1380 करोड़ रुपए का खर्च आएगा।
जीएसटीएन ने 34 आईटी, आईटीईएस और वित्तीय प्रौद्योगिकी कंपनियों का चयन किया है। जिनको जीएसटी सुविधा प्रदाता (जीएसपी) कहा जाएगा। जीएसपी ऐसा आवेदन तैयार करेगा जिसका कि करदाता जीएसटीएन के साथ संपर्क के लिए प्रयोग कर सकेंगे।

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