गुलाम वंश (1206-1290 ई.) - गुलाम वंश का इतिहास | gulam vansh

गुलाम वंश (1206-1290 ई.)

दिल्ली पर शासन करने वाले सुल्तान तीन अलग-अलग वंशों के थे। कुतुबुद्दीन ऐबक ने कुतबी, इल्तुतमिश ने शम्सी व बलबन ने बलबनी वंश की स्थापना की थी। आरम्भ में कुतबी वंश को दास या गुलाम वंश का नाम दिया गया, क्योंकि इस वंश का प्रथम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक मुहम्मद गोरी का गुलाम था।
gulam-vansh
तेरहवीं शताब्दी की शुरुआत में तुर्कों द्वारा भारत में स्थापित प्रथम साम्राज्य को गुलाम वंश का नाम दिया गया। गुलाम वंश की स्थापना कुतुबुद्दीन ऐबक ने की थी, जो मोहम्मद गोरी का एक प्रमुख गुलाम था तथा आरंभिक तुर्क साम्राज्य को सुदृढ़ करने वाले सुल्तान इल्तुतमिश, बलबन आदि किसी न किसी शासक के गुलाम ही थे।

गुलाम वंश के शासक

 

शासक

शासनकाल

1.

कुतुबुद्दीन ऐबक

1206 - 1210 ई.

2.

आरामशाह

1210 - 1211 ई.

3.

शम्सुद्दीन इल्तुतमिश

211 - 1236 ई.

4.

रुकनुद्दीन फिरोज़शाह

1236

5.

रजिया सुल्तान

1236 - 1240 ई.

6.

मुइजुद्दीन बहरामशाह

1240 - 1242 ई.

7.

अलाउद्दीन मसूदशाह

1242 - 1246 ई.

8.

नासिरुद्दीन महमूद

1246- 1266 ई.

9.

गयासुद्दीन बलबन

1266 - 1286 ई.

10.

मोइजुद्दीन कैकुबाद

1287 - 1290 ई.

11.

कैयूमर्स

1290


कुतुबुद्दीन ऐबक (1206 - 1210 ई.)

कुतुबुद्दीन ऐबक को भारत में तुर्की राज्य का संस्थापक माना जाता है। वह भारत में स्थापित तुर्क साम्राज्य का प्रथम शासक था। मुइज्जुद्दीन मुहम्मद गोरी के गुलामों में सबसे योग्य और विश्वसनीय कुतुबुद्दीन ऐबक था। कुतुबुद्दीन ऐबक तुर्क जनजाति का था। ऐबक का अर्थ- चन्द्रमा का देवता होता है। बचपन में ही दास के रूप में वह निशापुर के बाजार में लाया गया। वहाँ उसे काजी फखरूद्दीन अब्दुल अजीज कूकी ने खरीद लिया। ऐबक ने कुरान पढ़ना सीख लिया और इसलिए वह कुरानख्वाँ (कुरान का पाठ करने वाला) के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ।
मुहम्मद गोरी की सेवा में आने के बाद कुतुबुद्दीन के जीवन में बड़ा परिवर्तन आया। गोरी ने उसे अमीर-ए-आखुर (शाही घुड़साल का अधिकारी) के पद पर प्रोन्नत कर दिया।
  • ऐबक का राज्याभिषेक 25 जून, 1206 को लाहौर में हुआ, लाहौर ही उसकी राजधानी थी। तराइन के द्वितीय युद्ध के बाद गोरी ने ऐबक को विजित प्रदेशों का प्रबंधक नियुक्त किया। इन क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए ऐबक ने दिल्ली के निकट इन्द्रप्रस्थ को अपना मुख्यालय बनाया।
  • 1208 ई. में गोरी के भतीजे ग्यासुद्दीन महमूद ने ऐबक को दास मुक्ति पत्र देकर उसे सुल्तान की उपाधि प्रदान की। ऐबक को भारत में तुर्की राज्य का संस्थापक माना जाता है।
  • ऐबक ने कभी सुल्तान की उपाधि धारण नहीं की उसने केवल मलिक और सिपहसालार की पदवियों से ही अपने को संतुष्ट रखा।
  • अपनी दानशीलता के कारण वह लाख बख्श (लाखों का दान करने वाला) व पील बख्श (हाथियों का दान देने वाला) के नाम से विख्यात था। इसके दरबार में हसन निजामी और फख्न -मुदव्विर जैसे विद्वान रहते थे।
  • इसने कुतुबमीनार का निर्माण कार्य प्रारम्भ करवाया। कुतुबमीनार का नाम प्रसिद्ध सूफी सन्त ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के नाम पर रखा गया।
  • इसने भारत की प्रथम मस्जिद कुव्वत-उल-इस्लाम (पृथ्वीराज-III के किले रायपिथौरागढ़ के स्थान पर निर्मित) दिल्ली में, जबकि अढ़ाई दिन का झोपड़ा (विग्रहराज वीसलेदव-IV के द्वारा निर्मित संस्कृत महाविद्यालय के स्थान पर) अजमेर में बनवाया था।
शासक बनने के बाद ऐबक ने सुल्तान की उपाधि ग्रहण नहीं की, न उसने अपने नाम का खुतबा पढ़वाया और न ही अपने नाम के सिक्के चलाए बल्कि वह केवल 'मलिक' और 'सिपहसालार' की पदवियों से ही खुश रहा।
कुतुबुद्दीन ऐबक को सन् 1208 में दासता से मुक्ति मिली। उसने लाहौर से ही शासन का संचालन किया तथा लाहौर ही उसकी राजधानी थी।
कुतुबुद्दीन ऐबक एक वीर एवं उदार हृदय वाला सुल्तान था, वह लाखों में दान दिया करता था। अपनी असीम उदारता के कारण उसे 'लाखबख्श' कहा गया।
ऐबक ने हसन निजामी और फक्र-ए-मुदब्बिर जैसे विद्वानों को संरक्षण दिया तथा प्रसिद्ध सूफी संत ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के नाम पर दिल्ली में कुतुबमीनार की नींव रखी जिसे इल्तुतमिश ने पूरा करवाया।
उसने दिल्ली में ही 'कुव्वत-उल-इस्लाम' मस्जिद का निर्माण करवाया जिसे भारत में इस्लामी पद्धति पर निर्मित प्रथम मस्जिद माना जाता है तथा अजमेर स्थित 'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' नामक मस्जिद का भी निर्माण उसी ने करवाया।
सन् 1210 ई. में चौगान (पोलो) खेलते समय घोड़े से गिर जाने के कारण ऐबक की अकस्मात् ही मृत्यु हो गई। कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के बाद उसका अयोग्य एवं अनुभवहीन पुत्र आरामशाह शासक बना जिसके कारण अमीरों ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। बंगाल, अलीमर्दान खाँ के अधीन स्वतंत्र हो गया। ऐसी परिस्थितियों में प्रमुख तुर्क, अमीर अली इस्माइल ने ऐबक के दामाद इल्तुतमिश को सुल्तान बनने के लिये आमंत्रित किया।
इल्तुतमिश ने 1210 ई. में आरामशाह को पराजित किया और स्वयं सल्तनत का सुल्तान बना।

आरामशाह (1210 ई.)

ऐबक की अकस्मात मृत्यु के कारण उसके उत्तराधिकारी के चुनाव की समस्या को तुर्की सरदारों ने स्वयं हल किया। कुछ तुर्की सरदारों ने आरामशाह को लाहौर का (1210 ई.) सुल्तान घोषित कर दिया।
आरामशाह एक अक्षम और अयोग्य व्यक्ति था। अनेक तुर्क सरदारों ने उसका विरोध किया।
दिल्ली के तुर्क सरदारों ने बदायूँ के गवर्नर इल्तुतमिश को दिल्ली आने का निमंत्रण भेजा, इल्तुतमिश शीघ्र ही दिल्ली पहुंच गया। आरामशाह भी उसके दिल्ली-आगमन की सचना पाकर दिल्ली तक आ पहुंचा, परन्तु इल्तुतमिश ने उसे पराजित कर उसकी हत्या कर दी और स्वयं सुल्तान बन गया। 

शम्सुद्दीन इल्तुतमिश (1211 - 1236 ई.)

इल्तुतमिश दिल्ली सल्तनत के आरंभ के इतिहास में सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। जिन विषम परिस्थितियों में उसने राज्य प्राप्त किया, उन्हें अपनी योग्यता, दूरदर्शिता और प्रतिभा के बल पर उसने समाप्त किया और अपने साम्राज्य को मज़बूत किया। इसीलिये उसे दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है। ऐबक की मृत्यु के बाद उसका दामाद इल्तुतमिश दिल्ली की गद्दी पर बैठा। इल्तुतमिश शम्सी वंश का था, इसलिए नए वंश का नाम शम्सी वंश पड़ा। इल्तुतमिश, इल्बरी जनजाति का तुर्क था। वह ग्वालियर और बुलंदशहर का सूबेदार था। 1206 में ऐबक ने उसे बदायूँ का सूबेदार बनाया। ऐबक की मृत्यु के बाद दिल्ली के कुलीन तुर्कों ने आरामशाह की अयोग्यता के कारण इल्तुतमिश को सुल्तान बनने के लिये आमन्त्रित किया। इल्तुतमिश ने आरामशाह को पराजित कर तुर्क सत्ता अपने हाथ में ले ली।
इल्तुतमिश ने लाहौर की बजाय दिल्ली को मुख्यालय बनाया। इल्तुतमिश ने 26 वर्ष तक शासन किया जिसे तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-
  • 1210 से 1220 ई. तक विरोधियों का दमन।
  • 1221 से 1229 ई. तक मंगोल आक्रमण और अन्य खतरों का सामना।
  • 1229 से 1236 ई. तक सत्ता के सुदृढीकरण के प्रयास।
इल्तुतमिश को शासक बनने के उपरांत सबसे पहली चुनौती ताजुद्दीन यल्दौज ने दी जिसे ऐबक ने पराजित किया था, परंतु वह फिर दिल्ली पर अपना अधिकार चाहता था। इल्तुतमिश इस समय अपने साम्राज्य में विद्रोह करने वाले कुत्बी और मुइज्जी सामंतों को कमजोर करने में लगा था। उसने अपने विश्वसनीय चालीस दास अधिकारियों को सामंतों के रूप में नियुक्त कर नया दल चालीसा (चहलगामी) का गठन किया तथा कुत्बी और मुइज्जी सामंतों को इन बड़े पदों से हटा दिया। इस प्रकार राजसत्ता पर इल्तुतमिश ने पूर्ण नियंत्रण प्राप्त कर अपनी आंतरिक स्थिति को मज़बूत किया।
  • 1215-16 में इल्तुतमिश का यल्दौज से युद्ध हुआ क्योंकि वह ख्वारिज्म के शासक से पराजित होकर पंजाब पर अधिकार कर उसे अपनी सत्ता का केन्द्र बनाना चाहता था। इल्तुतमिश ने उसे पराजित कर बंदी बना लिया और बाद में उसकी हत्या कर दी गई। यल्दौज की पराजय के साथ ही दिल्ली सल्तनत का संपर्क गज़नी से हमेशा के लिये समाप्त हो गया। यह इल्तुतमिश की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। इल्तुतमिश का दूसरा विरोधी मुल्तान और सिंध का गवर्नर नासिरुद्दीन कुबाचा था, जिसके ऐबक के साथ अच्छे संबंध थे। परंतु इल्तुतमिश के समय में वह तुर्की सल्तनत के क्षेत्रों पर अधिकार करने लगा, इल्तुतमिश ने उसे पराजित कर लाहौर पर अधिकार कर लिया।
लगभग इसी समय पश्चिमोत्तर सीमा पर परिस्थितियाँ विपरीत हो गई थीं। महान मंगोल विजेता चंगेज खाँ अपनी विशाल सेना के साथ सिंध की ओर बढ़ रहा था। ख्वारिज्म का राजकुमार जलालुद्दीन मंगबरनी मंगोलों से पराजित होकर सिंध चला आया था तथा मंगोलों के विरुद्ध इल्तुतमिश से सहायता चाहता था, परंतु इल्तुतमिश ने दूरदर्शिता अपनाते हुए मंगबरनी की सहायता नहीं की जिससे चंगेज खाँ ने भी दिल्ली पर आक्रमण नहीं किया। इस प्रकार इल्तुतमिश ने अपनी समझदारी से एक भयंकर संकट टाला। इसका एक अन्य फायदा यह भी हुआ कि मंगबरनी ने सिंध में कुबाचा की शक्ति कमज़ोर किया। इल्तुतमिश ने कुबाचा की शक्ति को 1224 ई. में नष्ट कर दिया तथा 1228 में कुबाचा के विरुद्ध अंतिम अभियान में उसके अधिकृत क्षेत्रों को सल्तनत में मिलाकर अपनी सरहद मकराना तक विस्तृत कर ली।
इसी समयावधि में इल्तुतमिश ने बंगाल और राजपुताना की समस्याओं का भी निपटारा किया। बंगाल में अपने स्वतंत्र शासन की घोषणा करने वाले हुसामुद्दीन एवाज खिलजी को इल्तुतमिश के पुत्र नासिरुद्दीन महमूद ने पराजित किया। इधर 1226 में रणथंभौर और 1227 में मंडोर पर भी इल्तुतमिश ने विजय पाई।
भारत में तुर्की शासन का वास्तविक संस्थापक इल्तुतमिश ही था।
भारत में मुस्लिम प्रभुसत्ता का वास्तविक प्रारम्भ इल्तुतमिश से ही होता है। इल्तुतमिश को तुर्कों की भारत-विजय को स्थायित्व प्रदान करने का श्रेय दिया जाता है। उसकी गद्दीनशीनी (राज्याभिषेक)के समय अलीमर्दान खाँ ने स्वयं को बंगाल और बिहार का स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया था।
दूसरी ओर, ऐबक के एक साथी गुलाम कुबाचा ने खुद को मुल्तान का स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया था तथा लाहौर और पंजाब के कुछ हिस्सों पर अधिकार भी कर लिया था।
गुलाम का गुलाम इल्तुतमिश को कहा जाता है। मुहम्मद गोरी के गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक ने इल्तुतमिश को खरीदा था। ऐबक ने प्रारम्भ से ही इसे सर-ए जंहार (अंगरक्षकों का प्रधान) का महत्वपूर्ण पद दिया। ऐबक ने अपनी पुत्री का विवाह इल्तुतमिश से किया था।
अपने शासन काल के आरम्भिक वर्षों में इल्तुतमिश की दृष्टि उत्तर-पश्चिम पर टिकी हुई थी। उन दिनों ख्वारिज्म साम्राज्य मध्य एशिया का सबसे शक्तिशाली राज्य था। उसकी पूर्वी सीमा सिंधु नदी तक विस्तृत थी।
इस खतरे को टालने के लिए इल्तुतमिश ने लाहौर के लिए कूच किया और उस पर अधिकार कर लिया। 1220 ई. में ख्वारिज्मी साम्राज्य को मंगोलों ने ध्वस्त कर दिया।
वस्तुतः मंगोलों ने जिस साम्राज्य की स्थापना की वह इतिहास के सबसे बड़े साम्राज्यों में से था।
जब वह साम्राज्य अपने पूरे उत्कर्ष पर था, तब उस समय उसकी सीमा चीन से लेकर भूमध्यसागर के तट तक और कैस्पियन सागर से लेकर जक्सार्टिस नदी तक फैली हुई थी।
इल्तुतमिश को कुबाचा से निबटने का अवसर मिल गया तथा उसने उसे मुल्तान और उच्छ से उखाड़ फेंका। इस प्रकार, दिल्ली सल्तनत की सीमा एक बार फिर सिंधु नदी का स्पर्श कर रही थी।
बंगाल और बिहार में इवाज नामक एक व्यक्ति ने सुल्तान गयासुद्दीन की पदवी धारण कर अपनी आजादी की घोषणा कर दी।
  • 1226-27 ई. में इवाज लखनौती के निकट इल्तुतमिश के बेटे के खिलाफ लड़ता हुआ मारा गया। बंगाल और बिहार एक बार फिर दिल्ली के अधीन आ गए।
  • इल्तुतमिश ने कुतुबमीनार का निर्माण कार्य पूरा किया और राज्य को सुदृढ व स्थिर बनाया।
  • इल्तुतमिश ने इक्ता व्यवस्था शुरू की थी। इसके अंतर्गत सभी सैनिकों व गैर-सैनिक अधिकारियों को नकद वेतन के बदले भूमि प्रदान की जाती थी। इक्ता एक अरबी शब्द है, जिसका अर्थ भूमि है। यह भूमि इक्ता तथा इसे लेने वाले इक्तादार कहलाते थे।
इल्तुतमिश ने सर्वप्रथम अरबी सिक्के का प्रचलन किया उसने चाँदी के टंका तथा तांबे के जीतल का प्रचलन किया एवं दिल्ली में टकसाल स्थापित किए थे।
टंकों पर टकसाल का नाम लिखने की परम्परा भारत में प्रचलित करने का श्रेय इल्तुतमिश को जाता है।
सिक्कों पर शिव की नंदी व चौगान घुड़सवार अंकित होते थे।
वह दिल्ली का प्रथम शासक था. जिसने सल्तान की उपाधि धारण कर स्वतन्त्र सल्तनत (18 फरवरी, 1229 ई) को स्थापित किया।
उसने बगदाद के खलीफा (अल मुंतसिर बिल्लाह) से मान्यता प्राप्त की और ऐसा करने वाला वह प्रथम मुस्लिम शासक बना।
उसने 40 योग्य तुर्क सरदारों के एक दल चालीसा (चहलगानी) का गठन किया, जिसने इल्तुतमिश की सफलताओं में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
इल्तुतमिश एक न्यायप्रिय शासक था। इब्नबतूता के अनुसार, उसने अपने महल के सामने संगमरमर की 2 शेरों की मूर्तियाँ स्थापित कराई थीं, जिनके गले में घंटियाँ लटकी हुई थीं तथा जिनको बजाकर कोई भी व्यक्ति न्याय माँग सकता था। रणथम्भौर जीतने वाला प्रथम शासक इल्तुतमिश था।
ग्वालियर विजय के उपलक्ष्य में इल्तुतमिश ने सिक्कों पर रजिया का नाम भी लिखवाया था।
इल्तुतमिश ने मोहम्मद गोरी को स्मृति में मदरसा-ए-मुइज्जी व अपने पुत्र की स्मृति में नासिरी मदरसा बनवाया था। इल्तुतमिश को भारत में गुम्बद निर्माण का पिता कहा जाता है। उसने सुल्तानगढ़ी मकबरा अपने पुत्र नासिरूद्दीन महमूद की कब्र पर निर्मित करवाया। यह भारत का प्रथम मकबरा था। 30 अप्रैल, 1236 ई. को इसकी मृत्यु हो गयी। इसके शासनकाल में न्याय चाहने वाला व्यक्ति लाल वस्त्र धारण करता था।
  • फरवरी, 1229 को बगदाद के खलीफा द्वारा अभिषेक-पत्र प्राप्त होने के बाद वह दिल्ली सल्तनत का सर्वमान्य और सार्वभौमिक सुल्तान हो गया, जिससे उसकी प्रतिष्ठा बढ़ी। ए.बी.एम. हबीबुल्ला के अनुसार, “ऐबक ने जिस सल्तनत की सीमाओं और उसकी संप्रभुता की रूपरेखा बनाई, इल्तुतमिश निस्संदेह उसका पहला सुल्तान था। अपने परिश्रम, योग्यता और कुशलता से उसने गोरी द्वारा विजित प्रदेशों को सुसंगठित करके दिल्ली सल्तनत को केंद्रीकृत एवं सुदृढ़ता प्रदान की।"

सल्तनत के निर्माण में इल्तुतमिश का योगदान
  • मोहम्मद गोरी भारत में अपने विजित क्षेत्रों में शासन की कोई उचित व्यवस्था न कर सका, क्योंकि उसका ध्यान मध्य एशिया की राजनीति में भी था और कुतुबुद्दीन ऐबक ने मात्र चार वर्ष शासन किया, वे भी चुनौतियों तथा समस्याओं को निपटाने में ही व्यतीत हो गए।
  • शासक बनने के बाद इल्तुतमिश को विरासत में बिखरा राज्यक्षेत्र, अव्यवस्थित शासन और अधूरे निर्माण संबंधी कार्य मिले थे। अपने 26 वर्ष के शासनकाल में इल्तुतमिश ने लगभग इन सभी समस्याओं को सुलझाया। राजत्व सिद्धांत, मुद्रा व्यवस्था, चालीसा दल का गठन करके उसने सल्तनत को एक आकार प्रदान किया।
  • इल्तुतमिश ने फारसी राजत्व व परंपराओं को अपनाया तथा कुलीनता पर बल दिया। संभवतः रज़िया को अपना उत्तराधिकारी घोषित करते समय भी इल्तुतमिश ईरानी परंपरा से प्रेरित था, जहाँ पिता का उत्तराधिकार पुत्र की बजाय पुत्री को मिलने के उदाहरण मिले हैं।
  • युद्धों और चुनौतियों से निपटने के पश्चात् अपने शासन के अंतिम वर्षों में इल्तुतमिश ने प्रशासनिक व्यवस्था को मज़बूत किया। आरंभिक प्रशासन के लिये उसने इक्तादारी प्रथा प्रारंभ की। अपने साम्राज्य को उसने इक्ताओं में विभाजित कर कुलीन एवं योग्य व्यक्तियों को इक्तादार नियुक्त किया और उन्हें सेवा के बदले में इक्ता दी जाती थी। इस व्यवस्था से सामंतवाद का अंत और केन्द्रीकृत प्रशासन मज़बूत हुआ।
  • इल्तुतमिश ने अरबी परंपरा के आधार पर भारत में नई मुद्रा व्यवस्था लागू की। उसने तांबे का जीतल (सिक्का) और चांदी का टंका नाम से सिक्के ढलवाए जिन पर अरबी लिपि में इल्तुतमिश का नाम अंकित था। इन सिक्कों द्वारा व्यापार सुगम हुआ और साथ ही ये सिक्के भारत में तुर्कों की सत्ता की मजबूती के प्रतीक थे।
  • इल्तुतमिश कुशल सेनानायक और योग्य प्रशासक होने के साथ कला और संस्कृति का भी प्रेमी था। उसने मध्य एशिया से आने वाले कलाकारों, विद्वानों एवं शिल्पियों को आश्रय दिया जिससे दिल्ली सांस्कृतिक राजधानी के रूप में भी विकसित हुई। उसके दरबार में प्रसिद्ध इतिहासकार मिनहाज-उस-सिराज रहते थे जिन्होंने 'तबकाते नासिरी' की रचना की थी, जिससे सल्तनतकालीन आरंभिक इतिहास ज्ञात होता है।
  • उसने कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा अधूरी कुतुबमीनार का निर्माण पूरा करवाया। राजकुमार नासिरुद्दीन महमूद के मकबरे का निर्माण उसके काल का उत्कृष्ट निर्माण था। साथ ही, उसे भारत में मकबरा निर्माण प्रारंभ करवाने का श्रेय भी दिया जाता है। अन्य इमारतों में इल्तुतमिश का मकबरा और शम्सी मदरसा जैसी भव्य इमारतें आज भी दर्शनीय हैं।
निष्कर्षत : इल्तुतमिश ने नवसृजित तुर्की सल्तनत के स्थायित्व के अनेक उचित निर्णय लिये, परंतु उसकी नीतियाँ ही उसकी मृत्यु के बाद उसके वंश के नाश का कारण बनीं और 30 वर्ष बाद ही उसका वंश समाप्त हो गया। परंतु फिर भी उसने ही प्रथमतः दिल्ली सल्तनत के प्रशासन, व्यवस्था के लिये प्रयत्न किये और नीतियाँ बनाईं। ऐबक द्वारा दिल्ली सल्तनत के निर्माण का जो कार्य प्रारंभ किया गया था, उसे इल्तुतमिश ने ही पूरा किया। अपने परिश्रम और उचित नीतियों द्वारा वह अपने साम्राज्य को संगठित कर सका। इल्तुतमिश को मध्यकालीन भारत का श्रेष्ठ शासक माना जाता है। आर. पी. त्रिपाठी के अनुसार, “भारत में मुस्लिम प्रभुसत्ता का वास्तविक श्रीगणेश उसी से होता है।"

इल्तुतमिश के उत्तराधिकारी (Successor of lltutmish)
  • इल्तुतमिश ने उत्तराधिकारी के रूप में ज्येष्ठ पुत्र को चयन करने की सामान्य प्रथा को त्यागकर ईरानी परंपरा के अनुसार अपनी पुत्री रजिया को सल्तनत का उत्तराधिकारी घोषित किया।
  • इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद तुर्क अमीरों ने रज़िया की जगह उसके अयोग्य पत्र रुकनुद्दीन को गद्दी पर बैठाया। उसके शासनकाल में सल्तनत की वास्तविक सत्ता उसकी माता शाहतुर्कान के हाथों में थी। वह अति महत्त्वाकांक्षी और निर्दयी महिला थी जिसने अपने विरोधियों का दमन करना प्रारंभ किया, जिस कारण राज्य में विद्रोह एवं अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई।
  • राज्य में फैली अराजकता और विद्रोह का लाभ रज़िया ने उठाया। उसने जनता के सामने लाल वस्त्र पहनकर सहायता मांगी, दिल्ली की जनता ने समर्थन किया और रुकनुद्दीन को बंदी बनाकर रज़िया को दिल्ली का सुल्तान बना दिया गया।

रूकुनुद्दीन फिरोजशाह (1236ई.)

इल्तुतमिश ने अपनी मृत्यु के पूर्व अपना राज्य अपनी पुत्री रजिया को सौंपने की इच्छा व्यक्त की थी। इसका कारण यह था कि उसके योग्य और बड़े पुत्र, लखनौती के शासक, नासिरूद्दीन महमूद की मृत्यु हो चुकी थी तथा छोटा पुत्र रूकुनुद्दीन फिरोजशाह एक दुर्बल और अक्षम व्यक्ति था।
तर्क अमीर एक स्त्री को राज्य करते हुए देखना अपना अपमान समझते थे। अतः अनेक तुर्क अमीरों, फिरोजशाह की माता (शाहतुर्कन) और अनेक अक्तादारों ने षड्यंत्र कर रूकुनुद्दीन फिरोजशाह को 1236 ई. में सुल्तान घोषित कर दिया।
फिरोजशाह सुल्तान तो बन गया, परन्तु वह राज्य पर नियंत्रण नहीं । रख सका। वास्तविक सत्ता शाहतुर्कन के हाथों चली गयी। वह एक क्रूर महिला थी।
इल्तुतमिश के छोटे पुत्र कुतुबुद्दीन को अंधा करवाकर उसकी हत्या करवा दी गयी। प्रशासन पर नियंत्रण ढीला पड़ गया।

रजिया सुल्तान (1236 - 1240 ई.)

  • दिल्ली की जनता ने पहली बार उत्तराधिकार के प्रश्न पर स्वयं निर्णय लिया और सन् 136 ई. में रजिया को सल्तनत का सुल्तान बनाया।
  • रज़िया एक महान सुल्तान थी। शासक बनने के बाद उसने अपने विद्रोहियों का दमन किया। उसने पर्दा प्रथा को त्याग दिया तथा पुरुषों की भाँति कुबा (कोट) और कुलाह (टोपी) पहनकर दरबार आने लगी तथा शासन का कार्य स्वयं देखने लगी।
  • उसने अपने हिसाब से इक्ताओं में परिवर्तन एवं अधिकारियों को नियुक्त किया। इस क्रम में एतगीन को बदायूँ का इक्तादार और फिर 'अमीर-ए-हाजिब' का पद दिया, अल्तुनिया को सरहिन्द (भटिण्डा) का इक्तादार एवं 'जलालुद्दीन याकूत' को अमीर-ए-आखूर (अश्वशाला का प्रधान) नियुक्त किया।
  • सन् 1240 ई. में सरहिन्द के सूबेदार अल्तुनिया ने विद्रोह कर दिया तथा अमीरों के साथ मिलकर उसके भाई बहरामशाह को सुल्तान बनाया।
  • रज़िया ने अल्तुनिया से विवाह कर एक बार पुनः दिल्ली की सत्ता प्राप्त करने की कोशिश की परंतु बहरामशाह ने उसे पराजित कर दिया।
  • युद्ध में पराजित होने के बाद कैथल के निकट अक्तूबर 1240 ई. में डाकुओं ने उन दोनों की हत्या कर दी।
  • ग्वालियर से वापस आने पर इल्तुतमिश ने रजिया को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।
  • रजिया को अपने भाइयों और शक्तिशाली तुर्क अमीरों के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ा। वह केवल तीन वर्ष शासन कर पाई।
  • दिल्ली में सुल्तान की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर रजिया लाल वस्त्र पहनकर (न्याय की माँग का प्रतीक) नमाज के अवसर पर जनता के सम्मुख उपस्थित हुई।
  • उसने शाहतुर्कान के अत्याचारों व राज्य में फैली अव्यवस्था का वर्णन किया तथा आश्वासन दिया कि शासक बनकर वह शांति एवं सुव्यवस्था स्थापित करेगी। रजिया से तुर्क अमीर और आम जनमानस प्रभावित हो उठे। क्रुद्ध जनता ने राजमहल पर आक्रमण कर शाहतुर्कान को गिरफ्तार कर लिया एवं रजिया को सुल्तान घोषित कर दिया। फिरोजशाह जब विद्रोहियों से भयभीत होकर दिल्ली पहुंचा तब उसे भी कैद कर लिया गया तथा उसकी हत्या कर दी गयी। नवंबर, 1236 ई. में रजिया सुल्तान के पद पर प्रतिष्ठित हो गयी।
  • रजिया दिल्ली सल्तनत की प्रथम व अन्तिम मुस्लिम महिला शासक थी।
  • रजिया के शासनकाल में सत्ता के लिए राजतंत्र और उन तुर्क सरदारों के बीच संघर्ष आरम्भ हुआ, जिन्हें कभी-कभी चहलगानी या चालीसा कहा जाता है।
  • रजिया ने पर्दा प्रथा को त्याग दिया और पुरुषों के समान कुबा (कोट) और कुलाह (टोपी) पहनकर दरबार में बैठती थी तथा शासन का कार्य वह स्वयं संभालती थी।
  • वजीर निजाम-उल-मुल्क जुनैदी ने उसकी गद्दीनशीनी (राज्यारोहण) का विरोध किया था और उसके विरुद्ध अमीरों के विद्रोह का समर्थन किया था।
  • तुर्क अमीरों ने उस पर नारी सुलभ शील का त्याग करने और याकूत खाँ नामक अबीसीनियाई अमीर पर अत्यधिक मेहरबान होने का आरोप लगाया।
लाहौर और सरहिंद में विद्रोह भड़क उठा। उसने खुद ही सेना लेकर लाहौर पर आक्रमण कर दिया। जब वह सरहिंद की ओर बढ़ रही थी, उसी समय उसके खेमे में विद्रोह भड़क उठा।
याकूत खाँ की हत्या कर दी गयी। रजिया को तबरहिंद (भटिंडा) में बंदी बना लिया गया। रजिया ने अपने को बंदी बनाने वाले सरदार अल्तूनिया को अपने पक्ष में मिला लिया।

मध्यकालीन महिला शासिकाएँ, व उनका कालक्रम

महिला शासक

शासनकाल

वंश

राज्य

1. रजिया सुल्तान

1236-1240 ई.

गुलाम

दिल्ली

2. रानी रूद्रम्मा

1260-1291 ई.

काकतीय

द्वार समुद्र

3. मरदूमजहाँ

1461-1469 ई.

बहमनी

दक्षिण

बहमनी

4. रानी दुर्गावती

1560-1564 ई.

गोंड

गढ़कटंगा

5. चाँदबीबी सुल्तान

1595-1596 ई.

अहमदशाही

अहमदनगर

6. बेगम बड़ी सहिब

1656-1663 ई.

आदिलशाही

बीजापुर

7. ताराबाई

1700-1707 ई.

भोंसले

मराठा


रजिया ने अल्तूनिया से विवाह कर दिल्ली को फिर से विजय करने की एक और असफल कोशिश की। रजिया बहुत बहादुरी से लड़ी लेकिन पराजित हो गयी तथा उन्हें भटिण्डा की ओर वापस लौटना पड़ा परन्तु कैथल के पास 13 अक्टूबर 1240 ई. को कुछ डाकुओं द्वारा उसकी हत्या कर दी गयी।
यद्यपि रज़िया का शासनकाल अत्यंत अल्प था परंतु मात्र तीन वर्ष और छ: माह के शासनकाल में वह इल्तुतमिश के सभी उत्तराधिकारियों में सबसे योग्य और प्रशंसा की पात्र थी।

मुइजुद्दीन बहरामशाह (1240 - 1242 ई.)

दिल्ली के विद्रोही अमीरों ने षड्यंत्र कर इल्तुतमिश के तीसरे पुत्र बहरामशाह को 21 अप्रैल, 1240 ई. को सल्तनत का सुल्तान बनाया। रजिया के पश्चात् 1240 ई. में बहरामशाह सुल्तान बना, परन्तु वह कुछ वर्षों तक ही गद्दी पर रह सका। वह नाममात्र का सुल्तान था। राज्य की वास्तविक शक्ति का संचालन चालीस गुलामों का दल ही करता था।
शासक पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए तुर्की अमीरों ने नायब-ए-मुमलकत (संरक्षक) का पद बनाया और उस पर एतगीन को बहाल किया गया, परन्तु उसकी बढ़ती लोकप्रियता से भयभीत होकर बहरामशाह ने उसकी हत्या कर दी।
एतगीन की हत्या के पश्चात बदरूद्दीन सुंकर रूमी ने नायब के अधिकार प्राप्त कर लिए। उसने बहराम की हत्या का षड्यंत्र रचा परन्तु वह स्वयं ही एक षड्यंत्र में मारा गया। इन हत्याओं से तुर्की अमीर भयभीत हो उठे। उन लोगों ने सुल्तान को पदच्युत करने का षड्यंत्र रचा।
सल्तनत की शक्ति को संरक्षित करने के लिये तुर्क अमीरों ने एक नवीन पद "नायब-ए-मुमलकत" की स्थापना की जो संपूर्ण अधिकारों का स्वामी था। यह एक प्रकार का संरक्षक का पद था।
इस प्रकार वास्तविक शक्ति व सत्ता के अब तीन दावेदार थे- सुल्तान, नायब व वजीर। इस नायब-ए-मुमलकत का प्रथम पद रज़िया के विरुद्ध षड्यंत्र करने वाले नेता एतगीन को प्राप्त हुआ।
बहरामशाह के शासनकाल में ही सल्तनत में प्रथम बार सन् 1241 ई. में मंगोलों ने “तैर" के नेतृत्व में भारत पर आक्रमण किया, उसका प्रथम आक्रमण मुल्तान पर था।
सन् 1242 ई. में दिल्ली की एक विद्रोही सेना ने बहरामशाह को बंदी बनाकर हत्या कर दी। 1241 ई. में लाहौर पर मंगोलों ने आक्रमण कर दिया। 13 मई, 1242 ई. को बहरामशाह की हत्या कर दी गयी।

अलाउद्दीन मसूदशाह (1242 - 1246 ई.)

बहरामशाह की मृत्यु के बाद इल्तुतमिश का पौत्र अलाउद्दीन मसूदशाह सुल्तान बना। परंतु उसे इस शर्त पर सुल्तान बनाया गया कि वह स्वयं अपनी शक्ति का प्रयोग न कर अपने 'नायब' के द्वारा करेगा।
अलाउद्दीन मसूदशाह के शासनकाल में समस्त शक्ति चालीस अमीरों के समूह तुर्कान-ए-चहलगानी के हाथों थी। इसके शासनकाल में बलबन अमीर-ए-हाज़िब के पद पर नियुक्त हुआ।
जून 1246 ई. को 4 वर्ष के शासन के बाद मसूदशाह को गद्दी से हटाकर नासिरुद्दीन महमूद को शासक बनाया गया। अलाउद्दीन मसूदशाह, रूकुनुद्दीन फिरोजशाह का पुत्र व इल्तुतमिश का पौत्र था। मसूदशाह भी एक दुर्बल और अयोग्य व्यक्ति या वह नाममात्र का शासक था। अब मलिक कुतुबद्दीन हसन नायब और अब बक्र वजीर बना।
बलबन को हाँसी का इक्ता प्राप्त हुआ। शासन की वास्तविक सत्ता वजीर मुहाजुबुद्दीन के हाथों में थी जो एक ताजिकस्तान का गैर-तुर्क था। धीरे-धीरे बलवन ही सबसे प्रमुख व्यक्ति बन गया। बलबन ने षड्यंत्र कर मसूदशाह को गद्दी से हटाकर कैद कर लिया। कैदखाने में ही उसकी मृत्यु हो गयी।

नासिरुद्दीन महमूद (1246 - 1266 ई.)

10 जून, 1246 ई. में युवा नसिरूद्दीन महमूद शम्सी मलिकों द्वारा सुल्तान के पद पर आसीन हुआ। उसने तुर्की अमीरों की शक्ति का अनुमान लगाकर सम्पूर्ण सत्ता चालीसा के सरगना और नायब बलबन के हाथों में सौंप दी। नसिरुद्दीन महमूद के शासनकाल में समस्त शक्ति बलबन के हाथों में थी।
1249 ई. में उसने बलबन को उलूग खाँ की उपाधि प्रदान की और सेना पर पूर्ण नियंत्रण के साथ नायबे मुमलकात का पद दिया।
नासिरुद्दीन महमूद इल्तुतमिश का पौत्र तथा शम्सी वंश का अंतिम शासक था, वह संत स्वभाव का था, शासक बनने से पूर्व वह हकीम था तथा खाली समय में कुरान की नकल करना उसकी आदत थी।
मिनहाज-उस-सिराज के अनुसार नासिरुद्दीन महमूद दिल्ली का आदर्श सुल्तान था, उसने अपनी रचना तबकात-ए-नासिरी उसे ही समर्पित की।
नासिरुद्दीन एक नाममात्र का शासक था, उसने अपनी समस्त शक्ति नायब बलबन को सौंप दी। बलबन ने अपनी पुत्री का विवाह सुल्तान से किया था।
नायब के रूप में बलबन ने सर्वप्रथम अपने विरोधी अमीरों का दमन किया। इस क्रम में उसने इमामुद्दीन रैहान, कुतुलुग खाँ और किश्लू खाँ का दमन किया।
1266 ई. में नसिरूद्दीन की अचानक मृत्यु हो गयी। वह शम्सी वंश का अंतिम शासक था। इसका कोई पुत्र नहीं था इसलिए अगला शासक गयासुद्दीन बलबन बना, जिसने बलबनी वंश की स्थापना की थी।

गयासुद्दीन बलबन (1266 - 1286 ई.)

बलबन का वास्तविक नाम बहाउद्दीन था, वह इलबारी जाति का तुर्क था। वह सल्तनत का एक ऐसा व्यक्ति था जो सुल्तान न होकर सुल्तान के छत्र का उपयोग करता था। उसने 20 वर्ष नायब की हैसियत से तथा 20 वर्ष सुल्तान के रूप में शासन किया।
  • उलूग खाँ नामक एक तुर्क सरदार 1265 ई. में दिल्ली सल्तनत की गद्दी पर बैठा।
  • वह अपने खिताबी नाम बलबन के रूप में इतिहास में प्रसिद्ध हआ। बलबन राजपद की शक्ति और प्रतिष्ठा की अभिवद्धि करने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहा।
  • गद्दी पर अपने दावे को मजबूत करने के लिए उसने घोषणा की, कि वह विख्यात ईरानी शहंशाह अफरासियाब का वंशज है।
  • अपने कुलीन रक्त का दावा साबित करने के लिए बलबन ने खुद को तुर्क अमीरों के हितों के रक्षक के रूप में पेश किया।
  • इतिहासकार बरनी ने लिखा है कि, बलबन कहता था, जब भी मैं किसी नीच कुल में उत्पन्न हुए व्यक्ति को देखता हूँ तो मेरी आँखों में अंगारे फूटने लगते हैं और क्रोध से मेरा हाथ (उसे मारने के लिए) मेरी तलवार पर चला जाता है।
  • बलबन पहला सुल्तान था जिसने राजत्व के सिद्धांत का प्रतिपादन किया उसने राजत्व को नियाबते-खुदाई (ईश्वर द्वारा प्रदत्त) तथा राजा को जिल्ले-इलाही (ईश्वर की छाया) कहा उसने मद्यपान का निषेध किया।
  • बलबन ने फारसी-नववर्ष की शुरूआत पर मनाये जाने वाले उत्सव नौरोज को भारत में प्रारम्भ किया था तथा सुल्तान की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए दरबार में फारसी परंपरा सिजदा (घुटनों के बल बैठकर सुल्तान के सामने सिर झुकाना) तथा पेबोस (पेट के बल लेटकर सुल्तान के पैरों को चूमना) प्रथाएँ प्रारम्भ की थीं। 
  • अपनी स्थिति को सुरक्षित रखने के लिये बलबन ने चालीसा दल को पूर्णतः समाप्त कर दिया।
  • स्वयं को राज्य के हालातों से परिचित रखने के लिये गुप्तचर प्रणाली प्रारम्भ की। गुप्तचरो को बरीद कहा गया। दिल्ली सल्तनत के लिए खतरा बने मंगोलों का सामना करने के लिए बलबन ने एक शक्तिशाली केंद्रीयकत सेना संगठित की। इस प्रायोजन से उसने सैन्य विभाग (दीवान-ए-अर्ज) का पुनर्गठन किया। विरोधियो एवं लुटेरों से निपटने के लिए बलबन ने रक्त और लौह की नीति अपनाई। इसके अन्तर्गत लुटेरों का दूर तक पीछा कर उनकी हत्या कर दी जाती थी।
बलबन ने गढ़मुक्तेश्वर के मस्जिद की दीवारों पर उत्कीर्ण शिलालेख पर स्वयं को खलीफा का सहायक कहा है।
बलबन द्वारा बदायूँ के आस-पास के इलाकों में राजपूतों के गढ़ों को नष्ट कर दिया गया। लोगों पर अपनी शक्ति और सामर्थ्य को प्रदर्शित करने के लिए बलबन अपने दरबार का वातावरण अत्यधिक शानो-शौकत से भरा रखता था। बलबन की मृत्य 1286 ई. में हुई।
बरनी लिखता है कि, 1286 ई. में बलबन की मृत्यु से दु:खी हुए मलिकों ने अपने वस्त्र फाड़ डाले तथा सुल्तान के शव को नंगे पैरों दारुन-अमन के कब्रिस्तान को ले जाते हुए उन्होंने अपने-अपने सिरों पर धूल फेंकी। उन्होंने चालीस दिनों तक उसकी मृत्यु का शोक मनाया तथा भूमि पर सोये।
सुल्तान बनने के पश्चात् बलबन के समक्ष सबसे पहली चुनौती थी सुल्तान के पद की गरिमा को बढ़ाना जो कि इल्तुतमिश के कमज़ोर उत्तराधिकारियों के काल में काफी गिर गई थी। तुर्क, अमीर सुल्तान को कठपुतली समझते थे, जनता में भी सुल्तान को लेकर घृणा थी। बलबन को ये धारणाएँ बदलनी थीं। उसके शासन में चालीसा दल का भी काफी हस्तक्षेप था। चूँकि स्वयं बलबन इस दल का सदस्य रह चुका था अतः वह उनकी भावनाओं से अच्छी तरह वाकिफ था। सल्तनत में विरोधियों द्वारा काफी षड्यंत्र हो रहे थे। इन सभी समस्याओं के समाधान के लिये तथा सुल्तान की शक्ति एवं मान-मर्यादा तथा उसकी प्रतिष्ठा पुनःस्थापित करने के उद्देश्य से ही बलबन ने राजत्व के सिद्धान्तों की स्थापना की।

बलबन का राजत्व सिद्धांत (Balban's theory of kingship)
बलबन सल्तनतकालीन प्रथम सुल्तान था जिसने राजत्व संबंधी सिद्धांतों की स्थापना की। अपने राज्यारोहण के समय ही उसने यह महसूस किया था कि सुल्तान की शक्ति, मान-प्रतिष्ठा काफी गिर गई है, अतः इसे पुनः स्थापित करने की ज़रूरत है। इसी उद्देश्य से बलबन ने राजत्व का सिद्धांत दिया।
बलबन के राजत्व सिद्धांत का स्वरूप ईरान के फारसी तत्त्वों से लिया गया है। इसके अंतर्गत बलबन 'सुल्तान को पृथ्वी पर अल्लाह का प्रतिनिधि' मानता था, वह कहता था कि सुल्तान नियाबते-खुदाई एवं जिल्ले-इलाही है। अर्थात् सुल्तान का स्थान पैगम्बर के बाद का है, वह ईश्वर का प्रतिनिधि है और अल्लाह के निर्देशानुसार ही शासन करता है। "सुल्तान को कार्य करने की प्रेरणा और शक्ति ईश्वर से प्राप्त होती है इस कारण जनसाधारण या सरदारों को उसके कार्यों की आलोचना करने का अधिकार नहीं है।" वह यह भी कहता था कि “सुल्तान का हृदय ईश्वर-कृपा का विशेष भंडार है और इस संबंध में मानव जाति में कोई उसके समान नहीं है।"
इस प्रकार बलबन का राजत्व सिद्धांत राजा के दैवीय उत्पत्ति सिद्धांत के समान है। इसके तहत उसने दरबार में सिजदा (घुटने पर बैठकर सिर झुकाना) व पायबोस (सुल्तान का हाथ चुंबन) जैसी ईरानी प्रथाओं की शुरुआत की। राजदरबार में पूर्णतः अनुशासन लागू किया। दरबार में वह न तो स्वयं हँसता था और न ही उसने औरों को इसकी छूट दे रखी थी। वह केवल वजीर से ही वार्तालाप करता था।
सुल्तान की प्रतिष्ठा के अनुकूल उसने अपने व्यवहार को अत्यंत गंभीर बनाया। मद्यपान, नृत्य-संगीत जैसे समारोह पर प्रतिबंध लगा दिया, यहाँ तक कि छोटे अमीरों से भी मिलना बंद कर दिया। इसके अतिरिक्त, सुल्तान की शक्ति स्थापित करने के लिये रक्त एवं लौह नीति का पालन किया तथा तुर्क अमीरों के चालीसा दल को भंग किया। नायब का पद समाप्त किया और वज़ीर के अधिकार भी सीमित कर दिये।

बलबन के कार्य (Works of Balban)
बलबन ने साम्राज्य में होने वाले विद्रोहों और मंगोल आक्रमण से बचने के लिये एक केंद्रीकृत शक्तिशाली सेना का गठन किया तथा 'दीवान-ए-अर्ज' नामक सैन्य विभाग स्थापित किया। सेना को अन्य सभी अधिकारियों से पृथक् रखा।
उसने एक सशक्त गुप्तचर विभाग भी स्थापित किया, इसके सदस्य समस्त राज्य में फैले थे और सुल्तान को सूचना देते थे। बलबन द्वारा निर्मित कुशल गुप्तचर प्रणाली के कारण सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों में इतना भय व्याप्त हो गया कि सुल्तान के विरोध के स्वर समाप्त हो गए।
कानून व्यवस्था की स्थापना में भी उसने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। अपने राज्य की जनता को मेवातियों (डाकुओं) के आतंक से मुक्त कराया। दिल्ली के चारों ओर जंगलों को साफ करवाया और आवागमन के लिये सड़कें बनवाईं तथा पुलिस चौकियाँ स्थापित की।
बलबन ने मंगोल आक्रमण से राज्य की रक्षा के लिये उत्तर-पश्चिम में एक दुर्ग श्रृंखला का निर्माण कराया तथा अपने ज्येष्ठ पुत्र शाहजादा मुहम्मद को वहाँ का शासन सौंपा, जो एक प्रबल मंगोल आक्रमण का सामना करते हुए मारा गया।
प्रसिद्ध कवि एवं विद्वान अमीर खुसरो तथा हमीर हसन ने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत बलबन के समय ही की थी।
बलबन ने कोई राज्य विस्तार नहीं किया बल्कि आंतरिक प्रशासन और केंद्रीकृत व्यवस्था को सुदृढ़ किया। बंगाल के सूबेदार तुगरिल खाँ के विद्रोह को दबाया। सन् 1286 ई. में बलबन की मृत्यु हो गई।

कैकुबाद (1287 - 1290 ई.)

बलबन ने अपने शासनकाल में ही अपने पौत्र कैखसरो (मुहम्मद के पुत्र) को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था परंतु कोतवाल मुहम्मद ने बलबन की मृत्यु के बाद षड्यंत्र कर उसके दूसरे पौत्र कैकुबाद (बुगरा खाँ का पुत्र) को सुल्तान बनाया तथा कैखुसरो की हत्या करवा दी।
सुल्तान की मृत्यु के बाद उसके अमीर पुनः सक्रिय हो उठे। उन लोगों ने कैखुसरो को मुल्तान भेज दिया एवं उसकी जगह पर बुगरा खाँ के पुत्र कैकूबाद को सुल्तान घोषित किया।
कैकूबाद को सुल्तान बनाने में दिल्ली के कोतवाल मलिक फखरूद्दीन ने महत्वपर्ण भमिका निभाई।
राज्यारोहण के समय कैकूबाद की आयु मात्र सत्रह वर्ष की थी। उसका पालन-पोषण उसके दादा बलबन के संरक्षण में हुआ था, जो आचार-विचार के सम्बंध में अत्यन्त कट्टर था। अतः वह विलासिता पूर्ण जीवन से पूर्णतः दूर था।
अब वह सभी प्रतिबन्धों से मुक्त हो गया तथा एक विशाल राज्य का स्वामी बन गया, इसलिए उसकी दबी हुई इच्छाएँ उमड़ पड़ों और वह शराब, स्त्री-प्रसंग तथा विलासिता के जीवन में लिप्त हो गया।
उसके दरबारियों ने भी उसका अनुसरण किया, क्योंकि पूर्व-सुल्तान द्वारा लगाए गए प्रतिबन्धों से वे ऊब गए थे। राज्य की शकि दिल्ली के कोतवाल के दामाद निजामहीन नामक एक चरित्रहीन व्यक्ति के हाथों में चली गयी।
कैकूबाद उसके हाथों की कठपुतली बन गया। इस परिवर्तन का लाभ उठाकर मंगोलों ने अपने नेता तैमूर खाँ के नेतृत्व में पंजाब पर आक्रमण किया और समाना तक बढ़ आए। कैकूबाद का पिता बुगरा खाँ बलबन के समय से ही बंगाल की सूबेदारी करता आया था।
जब उसने दिल्ली से ये खबर सुना तो एक शक्तिशाली सेना लेकर वह राजधानी की ओर चल पड़ा।
कहा जाता है कि, अपने दुर्बल पुत्रों के हाथों से गद्दी छीन लेना उसका मुख्य उद्देश्य था, किन्तु एक अन्य लेखक का कहना है कि, यह कैकूबाद को उचित सलाह देना चाहता था जिससे वह आमोदप्रिय जीवन त्यागकर राज-काज की ओर ध्यान देने लगे।
उसका उद्देश्य कुछ भी रहा हो, 1288 ई. में उसने अयोध्या के निकट घाघरा नदी के किनारे अपना डेरा जमा दिया। कैकूबाद ने भी एक बड़ी सेना लेकर उसके विरुद्ध कूच किया।
निजामुद्दीन ने पिता और पुत्र को मिलने से रोकने का प्रयत्न किया और कैकूबाद को उसने युद्ध के लिए प्रोत्साहित किया, किन्तु बलबन के समय के कुछ स्वामिभक्त सेवकों के प्रभाव के कारण अन्त में पिता-पुत्र में समझौता हो गया।
तुर्की अमीर जो खिलजियों को गैर-तुर्क समझते थे, जलालुद्दीन के शत्रु थे। इसके कुछ ही समय बाद कैकूबाद लकवा ग्रस्त हो गया। इसलिए तुर्की अमीरों ने उसके पुत्र को (जो अभी शिशु ही था) शम्सुद्दीन क्यूमर्स के नाम से सिंहासन पर बैठा दिया।
कैकुबाद एक अत्यंत विलासी एवं कामुक व्यक्ति था, परिणामस्वरूप प्रशासन में अराजकता फैल गई, राजदरबार में फिर षड्यंत्र होने लगे। मात्र तीन वर्षों में ही बलबन द्वारा स्थापित व्यवस्थाएँ और सुल्तान की पद-प्रतिष्ठा नष्ट हो गई। अमीरों के समूह के एक नेता जलालुद्दीन खिलजी ने कैकबाद की हत्या कर उसे यमुना में फेंकवा दिया तथा उसके तीन माह के पुत्र कैयमर्स को अपने संरक्षण में सुल्तान घोषित किया, परंतु 'तीन माह बाद ही उसने सन् 1290 ई. में कैयमर्स की भी हत्या कर दी और सल्तनत में खिलजी वंश की नींव डाली।
कैयमर्स की हत्या के बाद ही मामलूक या गुलाम वंश के शासन का अंत हो गया और दिल्ली सल्तनत पर सामान्य कुल के खिलजियों का शासन स्थापित हुआ।

क्यूमर्स (1290 ई.)

तुर्की अमीरों ने कैकूबाद के नाबालिग पुत्र क्यूमर्स को गद्दी पर बिठाया। जलालुद्दीन उसका संरक्षक नियुक्त हुआ। तीन माह पश्चात् क्यूमर्स को बंदी बनाकर उसकी हत्या कर स्वयं जलालुद्दीन सुल्तान बन गया। इस प्रकार, इल्बरी तुर्कों का शासन समाप्त हुआ तथा खिलजी वंश की सत्ता स्थापित हुई।

FAQ :

गुलाम वंश संस्थापक कौन था?
कुतुबुदीन ऐबक

गुलाम वंश का प्रथम शासक कौन था?
कुतुबुदीन ऐबक
      
गुलाम वंश का अन्तिम शासक कौन था?
शम्सुद्दीनक्यूमर्स
       
गुलाम वंश को अन्य किस नाम से जाना जाता है?
ममलूक साम्राज्य

प्रथम मुस्लिम महिला शासक रजिया सुल्तान किस वंश की शासिका बनी थी?
गुलाम वंश

दिल्ली की सल्तनत पर काबिज होने वाला प्रथम मुस्लिम वंश कौन सा था?
गुलाम वंश

किसे हराकर दिल्ली में गुलाम वंश की स्थापना की गई थी?
पृथ्वीराज चौहान

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