जनसंचार से आप क्या समझते हैं? | jansanchar se aap kya samajhte hain

जनसंचार

हर्बर्ट ब्लूमर ने सन् 1939 में सर्वप्रथम जनसंचार शब्द को परिभाषित करने का प्रयास किया। ब्लूमर ने समान शब्दावलियों समूह (GROUP), भीड़ (CROWD) और जन-समुदाय (PUBLIC) के विरोधी तत्त्वों का प्रयोग कर जनसंचार में प्रयुक्त जन को परिभाषित किया। समूह के सभी सदस्य एक-दूसरे से परिचित होते हैं। एक समान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए समान दृष्टिकोण वाले स्थायी सदस्य होते हैं। भीड़ का स्वरूप समूह से बड़ा होता है। इसकी भौगोलिक सीमा निश्चित होती है। इसका अस्तित्व अस्थायी होता है। भीड़ में भावनात्मक और वैचारिक एकता हो सकती है किन्तु इसका कोई संरचनात्मक स्वरूप नहीं होता है। जन समुदाय के सदस्यों की संख्या समूह
और भीड़ से ज्यादा होती है। इसकी कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती किन्तु सदस्यों में 'विचार' का होना आवश्यक होता है। जनसंचार में प्रयुक्त 'जन' का क्षेत्र समूह, भीड़ अथवा जन समुदाय की तुलना में विस्तृत होता है। इसमें प्रेषक एवं बड़ी संख्या में ग्राहियों के बीच एक साथ सम्पर्क होता रहता है।
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इसमें इस बात की संभावना बनी रहती है, कि प्रेषक द्वारा प्रेषित सूचना से सूचना प्राप्त करने वाले लोगों में से अधिकांश में कुछ-न-कुछ प्रतिक्रिया अवश्य उत्पन्न होगी। जनसंचार के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है जो भारी संख्या में ग्राहियों को प्रभावित करते हैं और उनकी रुचि के अनुरूप होते हैं।

जनसंचार की परिभाषा

जनसंचार को विभिन्न संचार वैज्ञानिकों ने विभिन्न रूप से परिभाषित किया है। संचार का तात्पर्य भावों, विचारों, सूचनाओं का व्यक्तियों के बीच में आदान-प्रदान से है। अन्य विषयों की भाँति संचार की परिभाषा करना अपेक्षाकृत कठिन है। सन् 1928 में इंग्लैण्ड के प्रख्यात साहित्यकार एवं आलोचक आई.ए. रिचर्ड्स (IA. Richards) ने सर्वप्रथम और सम्भवतः आज तक सर्वोत्तम रूप से संचार को परिभाषित किया और इसे मानव जीवन का अनिवार्य अंग बताया। उन्होंने संचार को परिभाषित करते हुए कहा कि "Communication takes place when one mind so acts upon its environment that another mind is influenced and in that other mind an experience occurs which is like the experience in first mind, and is caused in part by that experience."
अर्थात संचार की प्रक्रिया तब आरंभ होती है जब एक व्यक्ति का दिमाग इस प्रकार कार्य करता है कि दूसरे व्यक्ति के दिमाग पर उसका असर न पड़े। इस प्रकार दूसरे व्यक्ति का दिमाग वैसा ही अनुभव करने लगता है जैसा कि पहले व्यक्ति का दिमाग। यही अनुभव संचार कहलाता है। अनुभव बांटने की प्रक्रिया भिन्न हो सकती है। इस परिभाषा को सार्वकालिक भी कहा जा सकता है क्योंकि दूसरे व्यक्ति के दिमाग पर पड़ने वाले प्रभाव की जानकारी प्राप्त हो जाती है। संचार की भाषा में इसे प्रतिपुष्टि (Feed Back) कहा जाता है। आधुनिक समय में भी संचार का सफल क्रियान्वयन इसी प्रक्रिया के आधार पर जांचा जाता है। इस प्रकार हम पाते हैं कि संचार की प्रथम परिभाषा में भी 'प्रभाव' की महत्ता है और वर्तमान में भी 'प्रभाव' ही संचार की सफलता का मानक है।
1920 के पश्चात् संचार जगत में अनेक क्रांतिकारी तकनीकी परिवर्तन हुए और इन परिवर्तनों के आलोक में संचार-विदों ने अपने - अपने तरीके से जन संचार को परिभाषित भी किया। कुछ मुख्य परिभाषाएं इस प्रकार से हैं -
  • डी. एस. मेहता के अनुसार - जनसंचार का तात्पर्य सूचनाओं, विचारों और मनोरंजन के विस्तृत आदान-प्रदान (विस्तारीकरण) से है जो किसी माध्यम जैसे रेडियो, टी.वी., फिल्म और प्रेस के द्वारा होता है।
  • जार्ज ए. मिलर के अनुसार - जनसंचार का तात्पर्य सूचनाओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाना है।
  • एमसे मोटगु और फ्लोएड मेन्स ने कहा- वह असंख्य ढंग जिससे मानवता से सम्बन्ध रखा जा सकता है, केवल शब्दों या संगीत, चित्रों या मुद्रण द्वारा, इशारों या अंग प्रदर्शन द्वारा, शारीरिक मुद्रा या पक्षियों के परों से सभी की आँखों तथा कानों तक संदेश पहुँचाना ही जनसंचार कहलाता है।
  • एडवर्ड सिल्स और डेविड एम. राइट के अनुसार - जनसंचार विश्व के लिए एक झरोखा प्रदान करता है। जनसंचार के द्वारा जो चीजें आम आदमी को उपलब्ध नहीं थी, अब होने लगी।
जनसंचार एक ऐसा सम्पर्क है जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक बहुगुणित रूप से स्थापित होता है।
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि जनसंचार एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें दो या दो से अधिक लोगों के बीच विचारों, अनुभवों, तथ्यों और प्रभावों का इस प्रकार से आदान-प्रदान होता है जिससे दोनों को संदेश के बारे में पर्याप्त ज्ञान हो जाए। किसी तथ्य, सूचना, ज्ञान, विचार और मनोरंजन को व्यापक ढंग से जनसामान्य तक पहुंचाने की प्रक्रिया ही जनसंचार है। समान लक्ष्य की प्राप्ति और पारस्परिक मेल-जोल के लिए जनसंचार अपरिहार्य है। आधुनिक जन जीवन और सांस्कृतिक, आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था का ताना-बाना जन संचार माध्यमों द्वारा सुव्यवस्थित है। जनसंचार ही विचारधाराओं और तथ्यों के विनिमय का विस्तृत क्षेत्र है।

जनसंचार की विशेषताएँ

  • जनसंचार प्रक्रिया में विशाल क्षेत्र में बिखरे हुए प्रापकों तक शीघ्रता से संपर्क हो जाता है। बिखरे हुए प्रापकों से तात्पर्य यह है कि प्रापक एक हे स्थान पर सीमित नहीं होते, बल्कि दूर-दूर तक फैले होते हैं। उनकी पृष्ठभूमि भी अलग-अलग होती है।
  • जनसंचार किसी एक व्यक्ति या व्यक्ति विशेष के लिए कार्य नहीं करता। जनसंचार द्वारा प्रेषित सूचना समस्त जनता के लिए सामान्य रूप से खुली होती है।
  • जनसंचार की प्रक्रिया सुस्पष्ट होती है तथा उसका ढाँचा भी स्पष्ट होता है।
  • प्रतिपुष्टि (Feedback) जनसंचार प्रक्रिया को प्रभावी बनाती है। जनसंचार माध्यम से मिली सूचनाओं पर प्रापक की क्या प्रतिक्रिया है और सूचनाओं पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है, आदि की जानकारी प्रतिपुष्टि के द्वारा हो जाती है।
  • जनसंचार में संदेश चूँकि मिश्रित जनसमूह को लक्ष्य करके भेजा जाता है, परंतु जनसमूह की स्थितियाँ एवं रुचियाँ विभिन्न प्रकार की होती हैं,
  • अतः संचार की विषय-वस्तु का चुनाव एवं विवेचन करना अत्यंत कठिन कार्य है। इसी कारण जनसंचार की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि इसमें व्यक्ति उस संदेश का चयन करता है, जो उसकी मान्यताओं एवं विशेषताओं के अनुकूल होता है।
  • जनसंचार के विकास ने भौगोलिक एवं समय की सीमाओं को तोड़ दिया है। जनसंचार के कारण ही आज ग्लोबल विलेज की परिकल्पना साकार हो रही है।
  • जनसंचार एक प्रहरी अथवा द्वारपाल की भाँति सजग होकर समाज की प्रत्येक गतिविधि पर निगाह एवं निगरानी रखता है।

जनसंचार के कार्य

समाचार और परिचर्चाएँ आपको सूचित करते हैं, रेडियो और टेलीविजन कार्यक्रम आपको शिक्षित कर सकते हैं, फिल्में तथा टेलीविजन धारावाहिक तथा कार्यक्रम आपका मनोरंजन करते हैं।
  • सूचना शिक्षा तथा मनोरंजन – जन माध्यमों के यही कार्य हैं।
आइए अब हम जन माध्यमों के कार्य के विषय में कुछ और जानें।
वे लोग जो लिखते हैं, कार्यक्रमों का निर्देशन या निर्माण करते हैं, ऐसे लोग हैं जो हमें एक संदेश देते हैं। आइए हम रेडियो या टेलीविजन की एक समाचार बुलेटिन या समाचारपत्र के एक समाचार पर विचार करें। ये सब हमें किसी घटना की सूचना देते हैं "नये राष्ट्रपति चुने गये", "देश ने एक नया मिसाइल विकसित कर लिया", "क्रिकेट में भारत ने पाकिस्तान को पराजित किया, "बम विस्फोट में 25 मरे",। यह सभी हमें एक सूचना देते हैं। ये सब समुचित रूप से प्रारूपित और लिखित संदेश हैं जो उन लोगों द्वारा दिये जाते हैं जिन्हें संप्रेषक कहते हैं।
एक डॉक्टर किसी रोग की रोकथाम के बारे में टेलीविजन या रेडियो पर बोलता है या समाचारपत्र में लिखता है। विशेषज्ञ रेडियो या टेलीविजन पर कृषकों को एक नयी फसल, बीज या खेती के तरीकों के विषय में बताते हैं। इस प्रकार कृषक शिक्षित होते हैं। सभी व्यावसायिक सिनेमा, टेलीविजन धारावाहिक तथा संगीत कार्यक्रम मनोरंजन करते हैं।
"चैनल" वह माध्यम हैं जिनके द्वारा संदेश प्रेषित किया जाता है। ये समाचारपत्र, फिल्में, रेडियो, टेलीविजन या इंटरनेट हो सकते हैं।
पाठक, श्रोता तथा दर्शक पर जन माध्यमों का गहरा असर पड़ता है। इसी को प्रभाव कहते हैं। लोग टेलीविजन पर एक विज्ञापन देखते हैं और वह उत्पाद खरीद लेते हैं।
विज्ञापन से वे उत्पाद खरीदने के लिए प्रेरित होते हैं और इससे उनकी इच्छा को संतुष्टि प्राप्त होती है।
जब भारत स्वतंत्र हुआ तो यहाँ कृषि विकसित नहीं थी। हमारे देश में इतना गेहूँ या चावल पैदा नहीं होता था कि हमारे देशवासियों का पेट भर सके। तब हम अनाज का आयात करते थे, साथ ही देश की आबादी तेजी से बढ़ती जा रही थी। इस तरह बहुत सारे लोग भूखे रह जाते थे। अतः सरकार ने इस स्थिति में बदलाव लाने के लिए जन माध्यमों, विशेषतः रेडियो का उपयोग शुरू किया। अधिकांश अनपढ़ कृषकों को रेडियो के माध्यम से सही बीज, उर्वरक तथा खेती की नयी तकनीकी अपनाने के लिए कहा गया। इसका प्रभाव उल्लेखनीय रहा। इस तरह कृषि के क्षेत्र में एक क्रांति आ गयी जिसे हरित क्रांति कहा गया। इसी तरह जन माध्यमों ने छोटा परिवार बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। बहुत से लोगों ने छोटा परिवार मानक का अनुकरण किया और केवल दो या तीन बच्चों को जन्म दिया। उदाहरण के लिए पल्स पोलियो अभियान को ले सकते हैं। पोलियो उन्मूलन के लिए जन माध्यमों ने लोगों को पोलियो की ड्रॉप के बारे में सूचित तथा शिक्षित किया। रचनात्मकता के साथ संदेशों को सृजन किया गया और फिल्मी सितारों ने ये संदेश लोगों को दिया। आपने अमिताभ बच्चन को टेलीविजन पर यह कहते देखा होगा, "दो बूंद जिंदगी की"।

जनसंचार प्रक्रिया के संघटक

जनसंचार प्रक्रिया के संघटक या तत्त्व संचार की प्रक्रिया जैसे ही होते हैं। हमने संचार को पढ़ते हुए प्रेषक या संचारक, ग्राहक या प्रापक, संदेश, संचार माध्यम एवं प्रतिक्रिया या प्रभाव (प्रतिपुष्टि) के बारे में सामान्य जानकारी प्राप्त कर ली है। वास्तव में, ये ही जनसंचार के भी प्रमुख घटक है। चूँकि 'संचार' मूल इकाई की भाँति है, जिसके एक विशेष रूप या स्तर के तौर पर जनसंचार को देखा जाता है। इस कारण जनसंचार में भी संचार के मूल तत्त्व एवं विशेषताएँ सन्निहित होती हैं।
इस प्रकार जनसंचार प्रक्रिया के निम्नलिखित संघटक होते हैं -
जनसंचार प्रक्रिया के संघटक
  • संचारक या प्रेषक
  • संदेश
  • प्रापक
  • संचार माध्यम
  • प्रतिपुष्टि या फीडबैक
  • शोर

संचारक या प्रेषक
सूचना के संचार में संचारक की भूमिका मुख्य होती है। सूचना की प्रस्तति एवं उसकी प्रभावशीलता संचारक या प्रेषक की प्रकृति पर निर्भर करती है। सचारक की प्रतिभा एवं साख जनसंचार की प्रभावशीलता में वृद्धि कर देते हैं। जनसंचार में प्रभावशीलता संवाद को अच्छी प्रकार से तैयार करने, प्रेषित करने, अच्छे लेखन एवं वाक प्रस्तुति (बोलने) से आती है। जनसंचार माध्यमों की जटिलता के कारण संचारक अकेले कार्य न करके, सामूहिक प्रयास के द्वारा संचार माध्यम से संदेश संचारित करते हैं। उदाहरण के लिए समाचार-पत्र में सूचना के संचार में संपादक, सह-संपादक, रिपोर्टर, फोटोग्राफर, प्रिंटर इत्यादि अनेक लोगों का योगदान होता है। इस प्रकार जनसंचार में एक समय में एक से अधिक संचारक कार्य करते हैं।

संदेश
जनसंचार में संदेश एक मिश्रित जनसमूह के लिए होता है। इसलिए इसकी विषय-वस्तु का चयन एवं विवेचन सामान्य प्रापक को ध्यान में रखकर किया जाता है। संदेश के अंतर्गत संदेश की भाषा, अर्थ, संदर्भ, स्वरूप इत्यादि महत्त्वपूर्ण अवयव होते हैं। संदेश का प्रभाव प्रायः दो रूपों में देखने को मिलता है-सकारात्मक एवं नकारात्मक।
सकारात्मक संदेश से अभिप्राय उस संदेश से है, जो प्रापक को आकर्षित करता है, जबकि नकारात्मक संदेश प्रापक को आकर्षित नहीं करते और वे आलोचनात्मक भी होते हैं।

प्रापक
जनसंचार में प्रापक कई प्रकार के हो सकते हैं। जैसे-प्रापक, पाठक एवं द्रष्टा। ये सभी प्रापक समरूप न होकर सामाजिक वर्ग, संस्कति. भाषा एवं रुचियों की दृष्टि से भिन्न-भिन्न होते हैं।

संचार माध्यम
संचार प्रक्रिया में संचार माध्यम का तात्पर्य ऐसी तकनीक अथवा उपकरण से है, जिसके द्वारा समान संदेश लगभग एक ही समय में बहुत से व्यक्तियों तक पहुँचाया जा सके| जनसंचार माध्यम हमारे चारों ओर स्थित है। आज का युग उपग्रह तकनीक का युग है। इस युग में मनुष्य सूचनाओं. तथ्यों. आँकड़ों एवं विचारों के बिना प्रगति नहीं कर सकता। इस संदर्भ में जनसंचार माध्यम उपभोक्ता के लिए महत्त्वपूर्ण होते हैं। वर्तमान यग में प्रेस या मद्रण संचार माध्यम, इलेक्ट्रॉनिक सार्वजनिक माध्यम, चलचित्र तथा कंप्यूटर, इंटरनेट आदि जनसंचार के प्रमख माध्यम हैं। जनसंचार माध्यम का संचालन व्यक्तिगत चयन से होता है। जनसंचार माध्यम से अभिप्राय यह नहीं है कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति उससे जुड़ा रहे। उदाहरण के तौर पर समाचार-पत्र से केवल शिक्षित वर्ग ही जुड़ा रहता है। सभी पढ़े-लिखे व्यक्ति भी समाचार-पत्र का हमेशा समर्थन नहीं करते। उनकी रुचि टीवी, रेडियो या अन्य किसी जनसंचार माध्यम के लिए भी हो सकती है।

प्रतिपुष्टि या फीडबैक
जनसंचार में प्रतिपष्टि की अपनी भूमिका है। इसमें फीडबैक धीमा एवं कमज़ोर या देर से मिलने वाला होता है। उदाहरणार्थ संपादक अपने समाचार-पत्र के प्रति लोगों की प्रतिक्रिया तुरंत नहीं जान पाता। टीवी तथा रेडियो द्वारा प्रसारित कार्यक्रम में प्रस्तुतकर्ता यह नहीं जान पाता कि देखा या बीच में ही छोड़ दिया। यद्यपि प्रापकों के पत्र समय-समय पर प्राप्त होते रहते हैं, लेकिन इनकी संख्या बहुत कम होती है। जनसंचार में फीडबैक समय-समय पर प्राप्त होता रहे, इसके लिए आवश्यक है कि समय-समय पर फीडबैक सर्वे कराया जाए. अन्यथा तो फीडबैक के अभाव में मीडिया बेअसर साबित होता जाता है।

शोर या विघ्न
जनसंचार में शोर या विघ्न की संभावना सर्वाधिक होती है। यह माध्यम में ही नहीं बल्कि जनसंचार प्रक्रिया के किसी भी बिंदु पर प्रविष्ट हो सकता है। उदाहरण के लिए, टीवी एवं रेडियो में विद्युत संबंधी गड़बड़ियाँ, घटिया मुद्रण, फ़िल्मों के घिसे-पिटे प्रिंट, बाहरी शोर इत्यादि। इनके कारण संदेश प्रदूषित होता है और प्रापक तक सही रूप में नहीं पहुँच पाता। अगर संदेश विकृत अवस्था में पहुँच भी जाए तो ग्राह्य नहीं होता, फलस्वरूप संचार विफल हो जाता है।

जनसंचार के माध्यम

जनसंचार का शब्द आते ही हमारे मस्तिष्क में कुछ परिष्कृत उपकरणों और विभिन्न प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक संयंत्रों का बोध होने लगता है। प्राचीन काल में जब इन उपकरणों का आविष्कार नहीं हुआ था तब धार्मिक प्रवचन, कथा, कविता, नाटक, नौटंगी, गीत-संगीत, चौपाल आदि के माध्यम से संचार का काम लिया जाता था। आदि काल से चले आ रहे जनसंचार के इन माध्यमों की प्रासंगिकता अब भी बनी हुई है। जनसंचार के लिए माध्यम का होना अनिवार्य है। वर्तमान में प्रचलित जनसंचार माध्यमों को हम तीन श्रेणी में बाँट सकते हैं:
  1. पारम्परिक माध्यम
  2. मुद्रित माध्यम
  3. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम

पारम्परिक माध्यम
जनसंचार के पारम्परिक माध्यमों का उद्भव आदिकाल में ही हो चुका था। जब मनुष्य जनसंचार का तात्पर्य भी नहीं जानता था तभी से ये माध्यम अस्तित्व में है। सभ्यता के विकास से लेकर मुद्रण यंत्र के आविष्कार होने तक ये माध्यम ही संदेश सम्प्रेषित करते थे। जनसंचार का यह सर्वाधिक प्रभावी माध्यम है। इस माध्यम के द्वारा सन्देश साक्षर एवं निरक्षर दोनों समूहों में प्रभावी ढंग से सम्प्रेषित होते हैं। इसके अंतर्गत धार्मिक प्रवचन, कथा, वार्ता, यात्रा, वृत्तांत, पर्यटन, गीत-संगीत, लोक संगीत, नाटक, लोकनाट्य आदि आते हैं। इन माध्यमों की यह प्रमुख विशेषता है कि मनुष्यों द्वारा उस समूह की भाषा, संस्कृति एवं रुचि के अनुसार संदेशों का सम्प्रेषण किया जाता है जिस समूह में संदेश प्रसारित करना होता है। जनसंचार के पारम्परिक माध्यम आदिकाल से ही अस्तित्व में है। अपने उदयकाल से लेकर आज तक ये संदेश सम्प्रेषण में प्रभावी एवं सशक्त भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं और भविष्य में भी ये भारत जैसे विकासशील देश के लिए प्रभावी जनसंचार माध्यम के रूप में स्थापित होंगे।

मुद्रित माध्यम
मुद्रण यंत्र के आविष्कार और मुद्रण कला के विकास से जनसंचार के क्षेत्र में क्रान्ति आई। छपाई के आविष्कार से पूर्व हस्तलिखित पत्रों एवं पुस्तकों का प्रचलन था जो जनसाधारण की पहुँच से बाहर था। ज्ञान और जानकारी का आदान-प्रदान और प्रचार-प्रसार समाज में बहुत सीमित था। मुद्रणालय के आविष्कार से पुस्तकों, समाचारपत्रों और अन्य पाठ्य सामग्रियों का प्रकाशन इतना बढ़ गया कि जन साधारण के लिए ज्ञान और पथ-प्रदर्शन प्राप्त करना सुलभ हो गया। आज के शिक्षित जनमानस में संचार का यह एक सशक्त माध्यम बन चुका है। इसके अन्तर्गत दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक, अर्धवार्षिक, वार्षिक आदि नियतकालीन और अनियत-कालीन समाचार पत्र-पत्रिकाएं आते हैं। इसके अतिरिक्त पुस्तकें, धार्मिक ग्रंथ, पोस्टर, बैनर, पम्फलेट एवं अन्य मुद्रित सामग्री जो किसी भी प्रकार की सूचना एवं ज्ञान से सम्बद्ध हो, भी मुद्रित माध्यम के रूप में प्रचलित है। मुद्रण तकनीक के अंतर्गत निरन्तर हो रहे विकास ने अब मुद्रित माध्यमों को और भी प्रभावी बना दिया है।

इलेक्ट्रानिक माध्यम
जनसंचार के क्षेत्र में नई क्रान्ति टेलीग्राफ के आविष्कार के साथ आई। टेलीग्राफ के माध्यम से दूर-दराज के क्षेत्रों में सन्देश प्रेषण को गति मिली। टेलीग्राफ के पश्चात् टेलीफोन के आविष्कार से संचार व्यवस्था में और तेजी आई। इसके पश्चात रेडियो, वायरलेस, ट्रान्जिस्टर, टेपरिकार्डर, टेलीविजन, वीडियो, कैसेट रिकार्डर, कम्प्यूटर, मोडम और चलचित्रों के आविष्कार से संचार व्यवस्था में एक नई क्रान्ति आई। इसके पश्चात् अन्तरिक्ष में कृत्रिम उपग्रहों को प्रक्षेपित करके जनसंचार की नई तकनीक का विकास किया गया। ये सभी इलेक्ट्रानिक जनसंचार माध्यम आज के व्यस्तता भरे वैज्ञानिक युग में संचार के सर्वाधिक शक्तिशाली और प्रभावी माध्यम है। शिक्षा, मनोरंजन और सूचना के प्रचार-प्रसार में ये इलेक्ट्रानिक माध्यम महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वर्तमान विश्व में जहाँ भूमण्डलीकरण की भावना का प्रचार किया जा रहा है। वहीं इस भावना को मूर्त रूप देने का काम ये आधुनिक इलेक्ट्रानिक, दृश्य-श्रव्य माध्यम ही करते हैं।
जनसंचार के उपर्युक्त तीनों माध्यम मानव सभ्यता के क्रमिक विकास का भी परिचय देते हैं। तीनों माध्यमों की अपनी अलग-अलग उपयोगिता है। संचार क्रान्ति के इस वर्तमान युग में भी अपने अस्तित्व को बनाए रखने में पारम्परिक माध्यम पूर्णतया सक्षम है। शिक्षित जनमानस में मुद्रित माध्यमों की लोकप्रियता सर्वविदित है। इलेक्ट्रानिक माध्यमों की प्रसार सीमा सुनिश्चित होती है। अपने प्रसार क्षेत्र में ये भी लोकप्रिय संचार माध्यम है। तीसरी दुनिया समेत भारत में भी कुछ ऐसे क्षेत्र है जहां जनसंचार माध्यम तो दूर, सभ्यता की एक किरण भी नहीं पहँच सकी है। यहां पर सार्थक सन्देश-सम्प्रेषण पारम्परिक माध्यमों द्वारा ही सम्भव है। आधुनिक इलेक्ट्रानिक माध्यमों का प्रयोग करके इन पारम्परिक माध्यमों की प्रचार एवं प्रसार सीमा में वृद्धि की जा सकती है। मुद्रित अथवा इलेक्ट्रानिक माध्यमों की अपेक्षा पारम्परिक माध्यमों की प्रभाव क्षमता अधिक होती है। इसका मुख्य कारण यह है कि पारम्परिक माध्यमों की भाषा उस क्षेत्र की भाषा एवं परिवेश की ही होती है जहां इसके द्वारा सन्देश प्रसारित किया जाता है। ये माध्यम अपने द्वारा प्रसारित सन्देशों का व्यापक प्रभाव जनमानस पर छोड़ते हैं।
मास मीडिया या जन संचार माध्यम ऐसे माध्यम हैं जिनके द्वारा, जनता तक समाचार, सूचना का सम्प्रेषण टी.वी. रेडियो और प्रेस से होता है।
Mass Mediaa means by which news information etc. is communicated to the public eg. television, radio and the press collectively.
वस्तुतः मीडिया अभिव्यक्ति का सम्पूर्ण विज्ञान है, आदर्श कला है, एक स्पृहणीय व्यवसाय है तथा मानव-चेतना को उद्दीप्त करने का सशक्त साधन है,। युग बोध के प्रमुख तत्वों के साथ ही मानवता के बहुआयामी विकास और विचारोत्तेजन का राजमार्ग यही मीडिया है। समाज, संस्कृति, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, उपग्रह के व्यापक प्रसार और मानव-संघर्ष, क्रान्ति-प्रतिक्रान्ति, प्रगति-दुर्गति का मुखर वक्ता मीडिया ही है। जीवन-सागर में उठने वाले ज्वार-भाटे का दिग्दर्शक मीडिया है जो भ्रमविभ्रम, अविश्वास-अन्धविश्वास, अंधेरगर्दी को मिटाता है। मीडिया न्यूनतम घटनाओं का उद्घोषक, प्रदर्शक, वैचारिक आन्दोलन का अभिव्यंजक तथा नये जीवन-दर्शक का वाहक है। आज मीडिया सभी का गुरू तथा विश्व का नियन्ता है।
किसी समाचार, सूचना, मत, विचार एवं कथन को जन-जन तक सम्प्रेषित करने का साधन ही मीडिया है। टीवी, रेडियो तथा मुद्रित माध्यमों से सूचनाओं का सम्प्रेषण ही नहीं होता अपितु उनके द्वारा प्रभावित भी किया जाता है। यह प्रभावकारी माध्यम ही मीडिया है। मीडिया सूचना पहुँचाने वाला, शिक्षित करने वाला, मनोरंजन करने वाला ऐसा संस्थान है जिसके द्वारा समाज और राष्ट्र का नव निर्माण सम्भव है।
लोकप्रिय मीडिया समाचार पत्र है। अधिकांश लोगों की दिनचर्या समाचार पत्र के साथ शुरू होती है। हत्या, बलात्कार, डकैती, नेताओं के आरोप-प्रत्यारोप इत्यादि समाचार-पत्र के स्थायी स्तंभ हैं। समाचार-पत्र ने सिर्फ समाज के अंधेरे पक्ष को दिखाने का ही बीड़ा उठाया है अपितु सकारात्मक खबरों को नजर अंदाज कर पत्रों ने विचित्र स्थिति पैदा कर दी है।
जब से इलेक्ट्रानिक मीडिया आया है सूचना-संचार क्रांति आई है। इसकी अपरिमित और बहुआयामी शक्ति अकल्पनीय हैं। घटनाएँ कम समय में इतनी तीव्र गति से घटित हो रही हैं कि आम आदमी एक सम्मोहन के वातावरण से घिरा हुआ है। नित नए अविष्कारों और प्रयोगों की नई प्रविधियों के विकास ने मीडिया को इतनी शक्ति दे दी है कि समाज के सभी वर्ग इस सर्वशक्तिमान की स्तुति कर रहे हैं।

राष्ट्रीय विकास में जनसंचार की भूमिका

अब तक जनसंचार के अर्थ को आपने समझा, जनसंचार का इतिहास आपने पढ़ा तथा जनसंचार के विभिन्न माध्यमों को भी आपने जाना। आपने जाना कि जनता में सूचना और संदेश पहुंचाकर जनसंचार माध्यम एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जनसंचार में यह भी खूबी है कि इसमें जनता को सीधे तौर पर कम खर्च करना होता है। सरकार या संस्था को तो व्यय करना पड़ता है लेकिन जनता को बहुत कम खर्च करना होता है। जनसंचार इस व्यापकता से जन-जीवन के साथ जुड़ गया है कि वे किसी राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आइये, संक्षेप में इसका जायजा लिया जाए। आपने जाना कि अनेक देशों में रेडियो, टेलीविजन और सिनेमा जैसे माध्यमों का उपयोग शिक्षा में गुणात्मक सुधारों के लिए किया जा रहा है। कुछ जनसंचार विशेषज्ञों के अनुसार जनसंचार माध्यम काल्पनिक सोच के लिए आधारभूमि बनाते हैं। वे विद्यार्थियों में विषय के प्रति रूचि पैदा करने के साथ-साथ उनके सीखने की प्रक्रिया को भी गति प्रदान करते हैं।
समाचार पत्रों, रेडियो और टेलीविजन में योग्य व्यक्तियों के विचार शामिल होते हैं जिनका प्रचार आम व्यक्ति तक पहुंचता है। टेलीविजन और फिल्मों के कारण बच्चों और युवाओं में फैशन, चकाचौंध और प्रसिद्धि की चाह भी बढ़ती है। नौकरी और व्यवसाय के बारे में भी रेडियो, टेलीविजन अपेक्षाएं बढ़ाने में मददगार हुए हैं। नौकरियों और धंधों के बारे में युवाओं की जिज्ञासा बढ़ी है, जिससे बेरोजगारी की समस्या में सुलझाने में वे सहायक बने है। जनसंचार माध्यम लोगों का मनोरंजन भी करते हैं। रेडियो, सिनेमा, टेलीविजन, सूचना और खबरों के साथ मनोरंजन भी करते हैं। विज्ञापन द्वारा रेडियो में राष्ट्रीय एकता, बचत की भावना पैदा की जा सकती है।
जनसंचार के माध्यम लोगों में जागृति भी लाते हैं। अपने स्वास्थ्य, परिवार कल्याण, टीकाकरण, संतुलिन भोजन, गोबर गैस चुल्हों से अब वे भली भांति परिचित हैं। जनसंचार समाज सुधार का कार्य भी करता है। नशाबंदी, परिवार नियोजन, दहेज प्रथा की समाप्ति के प्रचार से लोगों की विचारधारा में धीरे-धीरे परिवर्तन आया है।
बाढ़-अकाल या युद्ध के समय जनसंचार माध्यम प्रभावी भूमिका निभाते हैं। चीन और पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध में जनसंचार माध्यमों ने सफलतापूर्वक अपना दायित्व निभाया है।
सबसे महत्वपूर्ण यह कि जनसंचार के माध्यम सरकार या व्यापारिक संस्थाओं को अपनी नीतियों, योजनाओं और आम जनता के बीच, उनकी समस्याओं के बीच एक मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं।
आने वाले समय में जनसंचार में अधिक परिवर्तन आएंगे। इनके विकास की गति तेज है, ऐसे में किसी भी राष्ट्र के लिए जनसंचार की महत्ता और बढ़ती ही जाएगी।

भविष्य में जनसंचार की संभावनाएं

जनसंचार का अर्थ बताते समय हमने जिक्र किया था कि अभी तक जनसंचार माध्यमों में संदेश का प्रसार केवल एक तरफा ही हो पा रहा है किंतु जल्द ही जनसंचार माध्यम अपनी इस कमी को पूरा करने वाले हैं। रेडियो प्रसारण में अब “फोन इन" कार्यक्रम आकाशवाणी दिल्ली से प्रसारित किए जा रहे हैं। इन कार्यक्रमों का पूर्व प्रचार रेडियो उद्घोषणा तथा समाचार पत्रों में विज्ञापन द्वारा कर दिया जाता है। कार्यक्रम प्रसारित होते समय श्रोता इस तरह के कार्यक्रमों में बताये गये टेलीफोन नम्बर पर फोन करके सीधा भाग ले पाते है तथा पहुंचा पाते हैं। तुरंत ही प्रसारक द्वारा उनका उत्तर भी दे दिया जाता है। टेलीफोन सुविधाएं हर व्यक्ति के पास न होने के कारण यह सेवा सीमित लोगों के लिए ही उपलब्ध हो रही है। जनसंचार के क्षेत्र में संदेश के प्राप्तकर्ता को फीड बैक आम तरीके से मिल सकेगा और संदेश के प्राप्तकर्ता के साथ दोहरा संपर्क स्थापित हो सकेगा। भविष्य में ऐसी संभावनाएं प्रबल हैं। जनसंचार को पिछले 50 वर्षों में दूरसंचार के क्षेत्र में हुए नये आविष्कारों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लाभ मिलता रहा है। समाचार पत्रों को सक्षम बनाने में टेलीप्रिंटर एक वरदान सिद्ध हुआ। टेलीप्रिंटर एक ऐसा विद्यत चालित यंत्र है जो टाइप जैसी मशीन पर रेडियो तरंगों द्वारा संदेश भेजने और प्राप्त करने का कार्य करता है। किसी संदेश को भेजने के लिए जैसे ही आपरेटर उचित "की" को दबाता है वैसे ही एक विद्यत संद (electric impulse) पैदा होता है, तार या रेडियो-तरंगों द्वारा वांछित स्थान पर लगे टेलीप्रिंटर तक पहुंच जाता है और कागज के एक रोल पर अपने आप संदेश टाइप होता चला जाता है। टेलेक्स टेलीप्रिंटर का ही परिवर्तित रूप है। एक टेलेक्स एक्सचेंज का संपर्क दुनिया के किसी भी टेलेक्स एक्सचेंज से किया जा सकता है। प्रत्येक टेलेक्स का अपना एक नम्बर होता है। आप अपने । टेलेक्स से इस नम्बर को डायल करके संपर्क स्थापित कर सकते हैं और संदेश भेज सकते हैं। टेलीकापियर मशीनों द्वारा किसी भी महत्वपूर्ण दस्तावेज को अपने मूल रूप में दूरस्थ स्थानों तक पहुंचाया जा सकता है। बस, संदेश भेजने वाला व्यक्ति एक स्थान से संदेशयुक्त कागज को टेलीकापियर मशीन में प्रवेश करके टेलीफोन द्वारा सूचित करता है। दूसरा व्यक्ति निर्देशानुसार अपनी मशीन का बटन दबाते ही दस्तावेज की फोटो कापी प्राप्त कर लेता है। समाचार संकलन में भी यह प्रणाली उपयोगी और द्रुतगामी है। विभिन्न आविष्कारों में कंप्यूटर ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। कंप्यूटर से ही टेलीटेक्स्ट प्रणाली विकसित हुई। टेलीटेक्स्ट संचार प्रणाली में टेलीविजन प्रसारण केंद्र पर संदेशों को एक कंप्यूटर में संचित कर लिया जाता है। जिसे डाटा बेस कहते हैं। यहां से सूचना को टेलीविजन नेटवर्क द्वारा प्रसारित किया जाता है जिसे दर्शक एक “डीकोडर" की सहायता से अलग-अलग पृष्ठों के रूप में अपने टी.वी. पर प्राप्त कर सकते हैं। टेलीटेक्स्ट प्रणाली समाचार पत्रों के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध हुई है। वीडियो टेक्स्ट टेलीटेक्स्ट का ही विस्तृत रूप है । टेलीटेक्स्ट में सीमित रूप से पाठ्य सामग्री प्रसारित की जा सकती है जबकि वीडियो टेक्स्ट में शब्दों की सीमा नहीं है। 21वीं सदी के आरंभ तक दूरसंचार की अनेक उपलब्धियां सामने आने की संभावनाएं हैं। जनसंचार को इन उपलब्धियों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लाभ मिलते रहे हैं और भविष्य में इनसे जनसंचार के प्रबल होने की संभावनाएं बराबर बनी हुई है।
आज संसार में भारत सहित कई विकसित और विकासशील देशों ने अंतरिक्ष में अपने-अपने उपग्रह छोडे हैं। कोई सौ से अधिक देशों में इन्हीं संचार उपग्रहों द्वारा टेलीविजन संदेश भेजे और प्राप्त किये जाते हैं। इनमें हजारों टेलीफोन चैनेल हैं जिनपर अलग-अलग संदेश भेजे जाते हैं। इनमें बहुत से रेडियो और टेलीविजन चैनल भी है। संचार उपग्रहों के कार्यक्रमों में अब तक सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम इंटलसेट संचार उपग्रहों का रहा है ये व्यापारिक उपग्रह हैं जिनके 109 राष्ट्र सदस्य हैं और इन उपग्रहों द्वारा समस्त विश्व में 500 केन्द्र एक दूसरे से जुड़े हैं। कृत्रिम संचार उपग्रह की सहायता से टेलीफोन, रेडियो और टेलीविजन संदेशों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजना अत्यंत आसान हो गया है। उपग्रहों की मदद से केबल टी.वी. का लाभ भी मिल रहा है।
आज विश्व में ऐसे संचार उपग्रहों का निर्माण भी हो रहा है जिनमें सैकड़ों टेलीविजन चैनेल और लाखों टेलीफोन चैनेल होंगे। इस समय विश्व के कई देशों में टेलीविजन के अतिरिक्त चैनेलों पर शैक्षिक कार्यक्रम का प्रसारण हो रहा है। भारत के दूरदर्शन पर आंशिक रूप से जो शैक्षिक कार्यक्रम आज प्रसारित किये जा रहे हैं उपग्रह की सहायता से निकट भविष्य में उन्हें भी टेलीविजन के अतिरिक्त चैनेल पर प्रसारित करने की संभावनाएं हैं। कुल मिलाकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि निकट भविष्य में जनसंचार के विकास की गति तेज होगी और जनसंचार को नये आयाम मिल सकेंगे।

जनसंचार माध्यमों का कार्य एवं महत्त्व

सभी जनसंचार माध्यम विभिन्न रूपों में समाज के लिए कार्य करते हैं। वास्तव में, वे देश एवं विश्व के विकास में एक निश्चित एवं महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। सामान्यतः जनसंचार के कार्य एवं महत्त्व को निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर समझा जा सकता है।
  • सूचनाओं एवं समाचारों का एकत्रीकरण, विश्लेषण एवं प्रचार : जनसंचार माध्यम शिक्षा, ज्ञान तथा सूचनाओं का एकत्रीकरण, विश्लेषण एवं उनका प्रचार-प्रसार करते हैं। विश्लेषण का उददेश्य लोगों को प्रभावित करना होता है। संचार माध्यमों द्वारा विश्लेषण उन्हीं घटनाओं का किया जाता है, जो लोगों के लिए आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण होती हैं। विश्लेषण प्रक्रिया द्वारा एक ही घटना अथवा विचार पर अनेक प्रकार के दृष्टिकोणों का विकास होता है। इनके द्वारा ज्ञान-वृद्धि भी होती है।
  • मतैक्य एवं सर्वसम्मति बनाने में सहायक : जनसंचार माध्यम मतैक्य एवं सर्वसम्मति बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं। समाज की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए, समाज के सदस्यों को उनके उत्तरदायित्वों का बोध कराते हुए चुनौतीपूर्ण समस्याओं का हल ढूँढने हेतु समाज में मतैक्य का निर्माण करते हैं। इसके अतिरिक्त किसी घटना या प्रक्रिया के संदर्भ में विभिन्न दृष्टिकोणों का परीक्षण करके उचित दृष्टिकोण के विकास में मदद करते हैं।
  • संस्कृति एवं विरासत के हस्तांतरण में सहायक : संस्कृति एवं विरासत का हस्तांतरण करने में जनमाध्यम के रूप में या लोकमाध्यम के रूप में जनसंचार माध्यम अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विशेष रूप से रेडियो, टेलीविजन आदि इस क्षेत्र में उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।
  • मनोरंजन : जनसंचार माध्यम लोगों का मनोरंजन भी करते हैं। संचार माध्यम; जैसे-लेख, वृत्तचित्र, फ़िल्म, कार्टून, कविता, संगीत इत्यादि लोगों को तनावमुक्त एवं मानसिक रूप से तरोताज़ा बनाने का कार्य भी करते हैं।
  • वस्तुओं एवं उत्पादों के विक्रय एवं विज्ञापन में मददगार : वर्तमान आर्थिक व्यवस्था में मार्केटिंग एवं वितरण प्रक्रिया में जनसंचार माध्यमों का उपयोग किया जाता है। विज्ञापन सामान्य जनता के नए उत्पादों एवं सेवाओं के विषय में उपयोगी तथा आकर्षक जानकारी उपलब्ध कराते है तथा मूल्यों से संबंधित जानकारी देकर ग्राहकों में विश्वास उत्पन्न करके उन्हें खरीदने के लिए प्रेरित करते हैं।
  • शिक्षा की प्राप्ति एवं प्रसार में सहायक : मीडिया का उपयोग शैक्षिक क्रियाओं को संपन्न करने हेतु भी किया जाता है। समाजीकरण, सामान्य शिक्षा कक्षा-कक्ष प्रशिक्षण आदि में संचार माध्यमों की विशिष्ट भूमिका है। मीडिया, समाज की सामाजिक परंपरा को सदढ रूप से रूपांतरित एवं प्रतिस्थापित करने का कार्य करता है।
  • अन्य बहुआयामी उपयोग : विलियम स्टीफेंस के मत में जनसंचार माध्यमों का बहुआयामी उपयोग भी किया जाता है। जैसे-समय बिताने के लिए. आमोद-प्रमोद के लिए, भोजन बनाते हुए, लंबी यात्रा आदि में समाचार-पत्र, पुस्तक आदि पढनाः रेडियो, टेप. टीवी आदि सनना-देखना। कई बार इन्हें स्टेटस सिंबल के रूप में भी प्रयुक्त किया जाता है। कहने का तात्पर्य है कि जनसंचार माध्यमों के बहुआयामी उपयोग है।

जनसंचार एवं अन्य ज्ञान-विज्ञान
जनसंचार की विषय-वस्तु मनुष्य है। मानवीय अभिव्यक्ति के विज्ञान को ही जनसंचार कहा जाता है। ऐसे सभी विषय जिनकी विषय-वस्तु मनुष्य या मनुष्य द्वारा संचालित अभिक्रियाएं है, उनका जनसंचार से गहरा सम्बन्ध होता है। अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, मनोविज्ञान, इतिहास, कृषि, ग्रामीण विकास, प्रौद्योगिकी एवं चिकित्सा विज्ञान आदि ऐसे विषय हैं जिनसे जनसंचार से अन्तर्सम्बन्ध स्वतः स्पष्ट है। इनका क्रमवार विवेचन करने करने से स्थिति और स्पष्ट होगी।

जनसंचार और अर्थशास्त्र
अर्थशास्त्र को विद्वानों ने धन का विज्ञान और मानव कल्याण का विज्ञान कहा है। मनुष्य को आदि काल से ही अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए धन का आश्रय लेना पड़ा है। धनार्जन के तरीके, उपभोग की वस्तु आवश्यकताओं की प्राथमिकता आदि के सन्दर्भ में जनसंचार माध्यमों द्वारा ही मनुष्य को जानकारी प्राप्त होती है। विज्ञापन, प्रचार आदि के द्वारा उत्पादक अपने उत्पाद की विस्तृत जानकारी उपभोक्ता तक पहुंचाता है और उपभोक्ता इनमें से अपनी रूचि और आवश्यकता के अनुरूप सामान क्रय करके उपभोग करता है। इसी प्रकार जनसंचार माध्यमों में कार्यरत व्यक्ति भी अर्थ प्राप्ति के लिए इस व्यवसाय का चयन करते हैं। व्यावसायिक कुशलता के चलते धनार्जन और धनार्जन के पश्चात अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए अपना जीवन यापन करते हैं।
अर्थशास्त्र ने जनमाध्यमों को सर्वाधिक प्रभावित किया है। जनसंचार के मूल उद्देश्य सूचना, शिक्षा तथा मनोरंजन की पूर्ति के लिए अर्थ का विशेष महत्व होता है। जिस संचार माध्यम के पास जितनी अधिक पूंजी निवेश की क्षमता होती है उपभोक्ता बाजार में वह उतना ही शीघ्र और अधिक लोकप्रिय होता है। अब तो जन माध्यमों ने उद्योग का रूप ले लिया है और अन्य उद्योगों की भांति इस उद्योग का भी मूल उद्देश्य लाभार्जन हो गया है तथा इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए जन माध्यम आदर्शों को भूलकर कुछ भी व्यक्त करने लगे हैं। धन कमाने की प्रवृत्ति ने ही पीत पत्रकारिता को जन्म दिया है और यह प्रवृत्ति आज भी बदस्तूर जारी है। अर्थशास्त्र ने जनसंचार के सारे आदर्शों को दरकिनार कर इसे पूर्ण रूप से व्यावहारिक और व्यवसायिक बना दिया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि अर्थशास्त्र और जनसंचार एक दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित है।

जनसंचार और समाजशास्त्र
जनसंचार और समाजशास्त्र दोनों की ही विषय-वस्तु मनुष्य है। समाजशास्त्र मानव सम्बन्धों के जाल का अध्ययन करता है और जनसंचार इन मानवीय सम्बन्धों को चिरस्थायी बनाए रखने का दायित्व निभाता है। समाजशास्त्र में हम धर्म, परिवार, विवाह, जाति, आदि का अध्ययन करते हैं। जनसंचार के द्वारा हमें समाज के अतीत स्वरूप की जानकारी प्राप्त होती है जिसके आधार पर हम वर्तमान में हो रहे सामाजिक परिवर्तन का मूल्यांकन कर पाते हैं। सांस्कृतिक क्षेत्र में हो रहे अवमूल्यन का ज्ञान हमें जनसंचार के द्वारा ही प्राप्त होता है और जनसंचार के द्वारा ही हम समाज में निरन्तर हो रहे सांस्कृतिक अवमूल्यन को रोक पाते हैं। परम्परा और आधुनिकता में सामंजस्य एवं संतुलन बनाने का कार्य जनसंचार द्वारा ही सम्भव है। भारतीय समाज की संरचना इतनी जटिल है कि इसके बारे में किसी सार्वभौम सिद्धान्त या नियम की कल्पना नहीं की जा सकती। अनेकता में एकता का सिद्धान्त भारतीय समाज में पूर्णतया विद्यमान है। इस महत्वपूर्ण सिद्धान्त की सार्वभौमिकता को बनाए रखने में जनसंचार का बहुत बड़ा योगदान है। भारतीय समाज परम्पराओं में जकड़ा हुआ है और इसमें रूढ़िवादी तत्त्वों की प्रधानता है। धार्मिक अन्धविश्वास, अशिक्षा, दहेज, कुपोषण, जादू-टोना जैसी विकृत रूढ़ियां आज भी समाज में विद्यमान है। यही कारण है कि भौतिक रूप से विकसित होते हुए भी हमारा भारतीय समाज आज भी अल्पविकसित अवस्था में है। जनसंचार के द्वारा ही हम समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करके समाज का सर्वांगीण विकास कर सकते हैं। जनसंचार माध्यमों द्वारा प्राप्त सूचनाओं के माध्यम से हम अन्य संस्कृतियों के साथ सामन्जस्य स्थापित कर सकते हैं। परम्परा और आधुनिकता को सन्तुलित रूप से समन्वित कर हम अल्पविकसित समाज को पूर्ण विकसित समाज में बदल सकते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि जनसंचार और समाजशास्त्र का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है।

जनसंचार और राजनीतिशास्त्र
राजनीतिशास्त्र में मनुष्य का राज्य के साथ सम्बन्ध और व्यवहार का अध्ययन करते हैं। मनुष्य जब शिक्षित होगा तो वह राजनीतिक प्रक्रिया में सक्रिय सहयोग कर सकेगा। प्राचीन राजनीतिक व्यवस्था और अन्य देशों की राजनीतिक व्यवस्था का अध्ययन करके हम एक परिष्कृत राजनीतिक व्यवस्था का संचालन कर सकते हैं। शिक्षा का दायित्व जनसंचार के द्वारा कुशलता से निभाया जा सकता है। जनसंचार किसी भी राज्य सत्ता अथवा नीति के पक्ष-विपक्ष में जनमत का निर्माण करने में सक्षम है। संचारमाध्यमों की इसी शक्ति के कारण राजनीतिज्ञ हमेशा जनसंचार पर अपना नियन्त्रण बनाए रखने का प्रयास करते हैं। इसके लिए राजनेता पुरस्कार का सहारा लेते हैं। एम0पी0, एम0एल0सी0 बनाने का आश्वासन (प्रलोभन) देते हैं और गाहे-बगाहे दण्ड के प्रति भी आतंकित करते रहते हैं। इस प्रकार राजनीति सदा से ही जनसंचार के प्रति आकर्षित रही है। वर्तमान युग प्रचार का युग है। राजनीतिक दल अपनी नीतियों का प्रचार-प्रसार जनसंचार द्वारा ही करते हैं।
जनसंचार का दायित्व होता है समाज को शिक्षित करना। राजनीतिक व्यवस्था में व्याप्त बुराइयों को जनसंचार के द्वारा उजागर किया जा सकता है तथा इनको दूर करने का सार्थक प्रयास भी किया जा सकता है। लोकतंत्रीय राजनीतिक व्यवस्था में जनसंचार को इतनी महत्ता प्राप्त होती है कि इसे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की ही भांति एक (चतुर्थ) स्तम्भ कहा जाता है। इस चतुर्थ स्तम्भ का सबसे बड़ा दायित्व शासन के अन्य तीनों अंगो में सामन्जस्य स्थापित करना है। यही कारण है कि हम राजनीति को जनसंचार से पृथक एक विषय के रूप में नहीं देख पाते हैं। जनसंचार और राजनीति दोनों ही लोकतांत्रिक समाज के लिए नितान्त आवश्यक है।

जनसंचार और मनोविज्ञान
मनोविज्ञान मनुष्य की अभिक्रियाओं का विज्ञान है। मनुष्य किस परिस्थिति में कैसा व्यवहार करता है और किस परिस्थिति में कैसा व्यवहार करेगा इसका विस्तृत विवेचन मनोविज्ञान करता है। जनसंचार मानव-अभिव्यक्ति का विज्ञान है। इसका अध्ययन जनसंचार में किया जाता है। अर्थात् अभिव्यक्ति की क्रिया भी एक मनोविज्ञान प्रक्रिया है और इसी प्रक्रिया को जनसंचार कहा जाता है। अनेक संचार वैज्ञानिकों ने जनसंचार की मनोवैज्ञानिक व्याख्या की है जो आज भी सर्वमान्य है। उदाहरणस्वरूप प्रो0 हेराल्ड लास्वेल ने जनसंचार प्रक्रिया को स्पष्ट करने के लिए प्रश्नों की एक श्रृंखला प्रस्तुत की जो पूर्णत मनोविज्ञान पर आधारित है। उन्होंने कहा है कि किसने कहा, क्या, किसको, किस माध्यम से, क्या प्रभाव पड़ा, इन प्रश्नों का उत्तर मनोविज्ञान पर ही आधारित है। अर्थात् 'कहने वाले व्यक्ति के व्यक्तित्व का प्रभाव कहे गए संदेश के साथ श्रोता पर पड़ता है। इसी प्रकार माध्यम का भी मनोवैज्ञानिक असर श्रोता पर असर पड़ता है।
मनोविज्ञान और जनसंचार दोनों की ही विषय-वस्तु मनुष्य ही है। मनुष्य किस अवस्था में सन्देश ग्रहण करना चाहता है, किन परिस्थितियों में उसके ऊपर प्रसारित सन्देश का व्यापक प्रभाव पड़ेगा इसका ज्ञान हमें मनोविज्ञान द्वारा ही प्राप्त होता है। मनोविज्ञान द्वारा अनुकूल परिस्थितियों का ज्ञान होने पर हम सार्थक सन्देश सम्प्रेषण कर सकते हैं और उसके वांछित परिणाम भी प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए यह कहना ज्यादा उचित होगा कि जनसंचार के प्रभाव स्तर को बनाए रखने एवं उसमें वृद्धि के लिए मनोविज्ञान का ज्ञान होना आवश्यक है। इस सत्य में इन दोनों विषयों के अन्तर्सम्बन्ध की पुष्टि होती है।

जनसंचार एवं प्रौद्योगिकी
प्रौद्योगिकी का जनसंचार से गहरा सम्बन्ध है। प्रौद्योगिक विकास का सीधा असर जनसंचार पर पड़ता है। परिष्कृत संचार माध्यमों का प्रयोग जनसंचार और प्रौद्योगिकी के सम्बन्ध को स्वतः परिलक्षित करता है। इस सम्बन्ध का इतना व्यापक क्षेत्र हो गया है कि सूचना प्रौद्योगिकी के नाम से एक नए विषय की ही स्थापना कर दी गई है। आज का युग संचार क्रान्ति का युग कहा जाता है। सूचनाओं के अबाध प्रवाह में अब दूरी और समय की कोई सीमा नहीं रह गई है। वर्षों पहले विख्यात संचार वैज्ञानिक मार्शल मैकलूहन ने जिस 'ग्लोबल विलेज' की कल्पना की थी वह अब मूर्त रूप ले चुकी है। कम्प्यूटर के आविष्कार और मल्टीमीडिया ने सम्पूर्ण विश्व को एक कमरे में समेट दिया है। यह प्रौद्योगिकी का ही कमाल है कि आज हमारे सामने समुद्र तल की वस्तु हो या अन्तरिक्ष की बातें सभी स्पष्ट है। आज हम विश्व के किसी भी भाग की कोई भी जानकारी तत्काल प्राप्त करने में समर्थ है तो यह प्रौद्योगिकी का ही परिणाम है। सूचना-प्रौद्योगिकी आज मानव जीवन का अनिवार्य अंग बन चुका है। जीवन का ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है जो सूचना प्रौद्योगिकी से अछूता हो। संचार क्रान्ति के वर्तमान युग में जनसंचार और प्रौद्योगिकी आपस में इतने घुल मिल गये हैं कि अब इन्हें पृथक करके देखना सम्भव नहीं है। यही कारण है कि प्रौद्योगिकी की एक नई विधा के रूप में सूचना प्रौद्योगिकी के पृथक से अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था हो रही है।

जनसंचार और चिकित्सा विज्ञान
चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में नित नए प्रयोगों के द्वारा अनेक तकनीकों का विकास किया जा रहा है। अब सर्जरी के क्षेत्र में मानवीय जटिलता को दूर करने के लिए रोबोट का प्रयोग होने लगा है। दूर-दराज के क्षेत्रों के मरीज कम्प्यूटर के द्वारा अपने चिकित्सक से परामर्श कर सकते हैं और बिना डॉक्टर से मुलाकात किए अपनी समस्या का समाधान कर सकते हैं। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में इतनी अधिक प्रगति हो चुकी है कि अब इस विषय का नाम ही मेडिकल टेक्नोलॉजी हो गया है। आज मनुष्य का ऐसा कोई भी रोग नहीं है जिसका निदान संभव न हो। सर्जरी के द्वारा भी अनेक असाध्य रोगों का इलाज संभव हो गया है। प्लास्टिक सर्जरी के बाद अब कास्मेटिक सर्जरी का जमाना आ गया है। चिकित्सा विज्ञान और प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में हो रहे इस प्रकार के तकनीकी विकास का ज्ञान जनसामान्य को जनसंचार द्वारा ही प्राप्त होता है। जनसंचार द्वारा प्राप्त सूचनाओं के आधार पर ही मनुष्य अपनी शक्ति एवं सामर्थ्य के अनुसार बेहतर चिकित्सा सुविधा की तलाश करता है और उसका उपभोग कर स्वास्थ्य लाभ करता है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि ऐसा कोई भी ज्ञान-विज्ञान, जिसकी विषय-वस्तु मनुष्य है, का सीधा और घनिष्ठ सम्बन्ध जनसंचार से है।

जनसंचार और ग्रामीण विकास
भारत गांवो का देश है। भारत का विकास यहां के ग्रामीण विकास में ही निहित है। विद्वानों ने विकास के चार आधार बताए है। मैन (मानव श्रम), मशीन (कलकारखानों), मनी (पूंजी) और मीडिया (जनसंचार)। इसमें मीडिया का कार्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि यह शेष तीनों में सन्तुलन स्थापित करता है। भारतीय ग्रामीण समाज की संरचना ऐसी है कि तमाम तरह की विकृतियां इसमें भरी पड़ी है। दहेज, अन्धविश्वास, अशिक्षा, मद्यपान, जादू-टोना आदि ऐसी बुराइयां है जिन्हें दूर किए बिना गांव के विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इन बुराइयों को जनसंचार के द्वारा शिक्षा और ज्ञान के प्रसार से ही दूर किया जा सकता है। ज्ञान शक्ति है। विज्ञान विशिष्ट शक्ति है। जनसंचार माध्यमों द्वारा प्रसारित ज्ञान और सूचनाएं परम शक्ति है इन तीनों अर्थात् शक्ति (शिक्षा), विशिष्ट शक्ति (विज्ञान) और परम शक्ति (जनसंचार) का सन्तुलित समन्वय ही विकास है और सन्तुलन का यह कार्य जनसंचार द्वारा ही संभव है। अतः यह कहा जा सकता है कि ग्रामीण विकास के लिए जनसंचार का होना आवश्यक है। जनसंचार के माध्यम से हम सरकार द्वारा चलाए जा रहे ग्रामीण विकास की योजनाओं की जानकारी जनता तक पहुँचा कर उन्हें लाभान्वित कर सकते हैं। विकास योजनाओं के सफल क्रियान्वयन के मार्ग में आ रही बाधाओं की सूचना नीति-निर्माताओं तक पहुँचा कर उसे दूर करने का प्रयास कर सकते हैं। जनसंचार द्वारा प्राप्त सूचनाओं का उपयोग भविष्य की नीतियां तय करने में किया जा सकता है। इस प्रकार ग्रामीण विकास का स्वप्न साकार हो सकता है।
विकसित देशों की उन्नत कृषि तकनीक का ज्ञान जनसंचार द्वारा प्राप्त करके कृषि की स्थिति में सुधार किया जा सकता है। कृषि आधारित उद्योग की स्थापना, उत्पादन, विपणन आदि सभी का लाभ हम जनसंचार के द्वारा ही प्राप्त कर पाते हैं। शुष्क कृषि, हरित क्रान्ति, पशुपालन, डेयरी उद्योग आदि की सफलता का श्रेय जनसंचार को ही प्राप्त है। भारत में रेडियो, टी0वी0 आदि पर कृषि आधारित कार्यक्रम नियमित रूप से प्रसारित किए जाते हैं। कृषक वर्ग इन कार्यक्रमों से ज्ञान प्राप्त कर उसका कृषि कार्य में उपयोग करते हैं और लाभान्वित होते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि भारत जैसे देश में जनसंचार और कृषि दोनों ही एक समान उद्देश्य के लिए कार्य करते हैं। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के विकास के लिए जनसंचार की उपयोगिता स्वतः सिद्ध है।

सारांश

संचार एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें मानव अभिव्यक्ति की साझेदारी होती है। अर्थात् सूचनाओं विचारों, भावनाओं आदि की परस्पर साझेदारी ही संचार है। संचार की यही प्रक्रिया जब एक विशाल जनसमूह के साथ होती है तो उसे जन संचार कहा जाता है। जन संचार के लिए माध्यम का होना अनिवार्य है। अब तक के प्रचलित जन संचार माध्यमों को तीन वर्ग में बांटा गया है वे हैं पारम्परिक, मुद्रित और इलेक्ट्रानिक। जनसंचार के ये तीनों माध्यम मानव सभ्यता के क्रमिक विकास को दर्शाते हैं।
विचार या सूचना या जानकारी सामूहिक रूप से लोगों तक पहुंचाई जाए तो वह जनसंचार है। अभी तक यह प्रक्रिया एक तरफ ही है। जनसंचार के इतिहास से भी आप भलीभांति परिचित हुए होंगे कि जनसंचार की प्रक्रिया आदि मानव से शुरू हो गई थी लेकिन समय के परिवर्तन के साथ इसका विकास होता गया। पिछले 100 वर्षों में जनसंचार को नये-नये माध्यम मिले हैं और विकास की गति बहुत तेज रही है।
लिखित माध्यम, श्रव्य माध्यम और श्रव्य-दश्य माध्यम । लिखित माध्यम में समाचार पत्र सबसे प्रभावी माध्यम है। समाचार पत्रों ने अपनी विषय-वस्तु तथा अपने प्रारूप में बहत तरक्की की है। मनुष्य की दिनचर्या से जुड़ा शायद ही कोई क्षेत्र बचा हो जिसको समाचार पत्र स्थान नहीं दे रहे हों । पत्रिकाओं और विज्ञापन ने जनसंचार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान बनाया है। विज्ञापन अब मनुष्य के जीवन का अंग बन गए हैं। इसीलिए जनसंचार के हर माध्यम ने विज्ञापनों को महत्व दिया है। आपने यह भी जाना कि रेडियो के रूप में जनसंचार को ऐसा श्रव्य माध्यम मिला जिससे जनसंचार का कार्य अधिक सहज और आसान हो गया और जनसंचार प्रभावी भी हो सका। श्रव्य माध्यम होने के कारण इससे अधिक लोग जुड़ सके । बिना पढ़े लिखे यहां तक कि दृष्टिहीन भी इससे लाभान्वित हो सके।
दृश्य-श्रव्य माध्यमों में सिनेना, टेलीविजन ने जनसंचार को नये आयाम दिए जब सूचना या संदेश देने वाला स्वयं संपर्क बना सका यद्यपि ये एकतरफा ही हो सका पर इसके प्रभाव व्यापक हुए हैं। सिनेमा और टेलीविजन आज मनुष्य के दोस्त के रूप में उभरे हैं। टेलीविजन ने घर के ही एक सदस्य का स्थान बना लिया है। वीडियो कैसेट ने शिक्षा और समाचारों के क्षेत्र में मनुष्य की रूचि को प्रेरित किया है। कुल मिलाकर जनसंचार के आधुनिक माध्यम, जैसे समाचार पत्र, रेडियो और टेलीविजन, सशक्त माध्यमों के रूप में सामने आये हैं इन्हें लोकप्रियता भी मिली है। योग्य व्यक्तियों के विचार, शिक्षा को लोगों तक पहुंचाने में इन्होंने मदद की है। राजनैतिक, व्यवसायिक और सामाजिक समस्याओं से आम व्यक्ति को अवगत कराया है। सामाजिक बुराइयों से आगाह किया है। स्वास्थ्य, खेल और मनोरंजन की तरफ लोगों को आकर्षित किया है। अपनी इन अनगिनत खूबियों के कारण ही विशेषज्ञ मानते हैं कि जनसंचार राष्ट्रीय विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आपने यह भी जाना कि सभी माध्यमों में भाषा ही रीढ़ की हड्डी का काम करती है। सक्रिय और सही भाषा से माध्यम प्रभावी बन सकते हैं। आपने यह भी पढ़ा कि लिखित, श्रव्य और श्रव्य-दृश्य माध्यमों की भाषा में अंतर होता है। इसकी विस्तृत जानकारी आपको आगामी इकाई में भी दी जाएगी। आशा है इस इकाई को पढ़ने के बाद जनसंचार के विभिन्न माध्यमों से आप भलीभांति परिचित हुए होंगे।

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