कृषि के प्रकार | krishi ke prakar

कृषि के प्रमुख प्रकार

भारत के विशाल आकार के साथ भौगोलिक दशाओं में अधिक विविधता तथा सांस्कृतिक व तकनीकी कारकों के परिणामस्वरूप हमारे देश में अनेक प्रकार की कृषि पद्धतियों का विकास हुआ है। देश के कुछ भागों में वर्षा पर्याप्त होती है तथा कृषि के लिये सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती, जबकि कुछ अन्य भागों में सिंचाई करना आवश्यक है। इसी तरह, देश के कुछ भागों में स्थानीय उपभोग के लिए विभिन्न फसलों की खेती की जाती है, जबकि कुछ अन्य भागों में फसलों को बेचने के लिये उगाया जाता है।
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सिंचाई सुविधाओं के उपयोग, उत्पादन के उद्देश्य, फसलों की विविधता तथा भूमि उपयोग की क्रियाओं के आधार पर भारत में अनेक प्रकार की कृषि पद्धतियों को पहचाना जा सकता है। भारत में अपनायी गई प्रमुख कृषि पद्धतियों का वर्णन निम्न प्रकार से है।

आर्द्र कृषि

यह कृषि पद्धति देश के जलोढ़ मृदा वाले उन भागों में अपनायी जाती है, जहाँ औसत वार्षिक वर्षा 200 से. मी. से अधिक होती है।
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हिमालय के मध्य व पूर्वी भाग, प. बंगाल, मालावार तट, असम, नागालैण्ड, मेघालय, त्रिपुरा तथा मणीपुर इन प्रदेशों में शामिल हैं, जहाँ एक वर्ष में एक से अधिक फसलें बोयी जाती हैं। चावल, पटसन तथा गन्ना आदि इन प्रदेशों की प्रमुख फसलें हैं, जिन्हें सिंचाई के बिना उगाया जाता है।

शुष्क कृषि

यह कृषि पद्धति उन क्षेत्रों में अपनायी गयी है, जहाँ वार्षिक वर्षा सामान्यतया 80 से.मी. से कम होती है। ऐसे प्रदेशों में भी किसान सिंचाई के बगैर फसलों को उगाते हैं। चूँकि वर्षा की मात्रा सीमित होती है, अत: मृदा में नमी वर्ष में एक ही फसल को उगाने के लिए पर्याप्त होती है।
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किसान ऐसी फसलों को उगाते हैं, जिन्हें कम नमी की आवश्यकता होती है। ज्वार-बाजरा इस कृषि की प्रमुख फसलें हैं। मध्य प्रदेश, गुजरात तथा राजस्थान के विस्तृत भागों में इस प्रकार की कृषि की जाती है।

सिंचित कृषि

इस प्रकार की कृषि उन भागों में की जाती हैं जहाँ या तो वर्षा मौसमी है या कुछ फसलों के लिये अपर्याप्त होती है। भारत के सबसे अधिक विस्तृत भागों में इस प्रकार की कृषि की जाती है। इन प्रदेशों में सिंचाई के प्रमुख साधान कुएं, नहरें तथा तालाब हैं। सिंचित कृषि केवल ऐसे भागों में ही की जा सकती है, जहां जल की पर्याप्त मात्रा नदियों, तालाबों और भौम जल के रूप में मौजूद हो तथा भूमि समतल हो।
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भारत में इस प्रकार के प्रदेश पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तरी-पश्चिमी तमिलनाडु तथा प्रायद्वीपीय नदियों के डेल्टाओं में स्थित हैं। इन प्रदेशों में सिंचाई की मदद से गेहूँ, चावल तथा गन्ना आदि उगाया जाता है। प्रायद्वीपीय पठार के महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा आन्ध्र प्रदेश राज्यों में कुछ महत्वपूर्ण सीमित क्षेत्रों में सिंचित कृषि द्वारा मुख्य रूप से गन्ने की खेती की जाती है। इस कृषि के अन्तर्गत कुछ प्रदेशों में एक तथा अन्य प्रदेशों में वर्ष में दो फसलें पैदा की जाती हैं।

जीवन निर्वाह कृषि

इस प्रकार की कृषि स्थानीय लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए की जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य किसी दिये गये क्षेत्र के अधिक से अधिक लोगों के जीवन निर्वाह से होता है। स्थानान्तरी कृषि, स्थायी कृषि तथा गहन कृषि जीवन निर्वाह कृषि के प्रकार हैं। इस कृषि में जोतों का आकार छोटा होता है, मानवीय श्रम तथा साधारण कृषि यंत्रों का अधिक उपयोग होता है।
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मिट्टी की उर्वरता बनाये रखने के किये सभी प्रकार की खादों का उपयोग किया जाता है। जीवन निर्वाह कृषि मध्य प्रदेश, पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा दक्षिण बिहार के कुछ भागों, साथ ही देश के अधिकांश पर्वतीय प्रदेशों में की जाती है।

वाणिज्यिक कृषि

भारत में यद्यपि अधिकांश कृषि जीवन निर्वाह. प्रकार की है, जिसमें उत्पादन का बहुत बड़ा भाग स्थानीय उपयोग के लिये ही पर्याप्त होता है, लेकिन कुछ प्रदेशों में वाणिज्यिक कृषि भी की जाती है। इस कृषि के अन्तर्गत किसान फसलों को मुख्य रूप से बाजार में बेचने के लिये पैदा करते हैं।
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कृषि के इस प्रकार में फसलों का उत्पादन सामान्यतः उद्योगों के कच्चे माल के रूप में किया जाता है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र तथा अन्य राज्यों में गन्ने की कृषि, महाराष्ट्र, गुजरात तथा पंजाब में कपास की कृषि तथा पं. बंगाल व समीपवर्ती राज्यों में पटसन की कृषि इस प्रकार की कृषि के उदाहरण हैं। देश के कुछ प्रदेशों में जहां जोतों का आकार बड़ा है, जीवन-निर्वाह कृषि के अन्तर्गत भी वाणिज्यिक स्तर पर फसलों को उगाया जाता है। पंजाब व हरियाणा में चावल व गेहूँ एवं तराई क्षेत्र में सब्जियाँ एवं अन्य फसलें इस प्रकार के उदाहरण हैं।
वाणिज्यिक कृषि का लक्ष्य एक उच्च उपज वाली फसल पैदा करना होता है ताकि उत्पादन अन्य देशों या लाभ के लिए दूसरे क्षेत्रों में निर्यात किया जा सके।
गेहूं, कपास, गन्ना, तम्बाकू और मक्का कुछ वाणिज्यिक फसलें हैं और ये उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब, हरियाणा और महाराष्ट्र सहित राज्यों में नकद बिक्री हेतु उगाए जाते हैं।

रोपण कृषि

बड़े पैमाने पर एक ही फसल की खेती जिसका संगठन औद्योगिक स्तर का हो, रोपण कृषि कहलाती है। इस प्रकार की खेती बड़े आकार की जोतों पर की जाती है। इसके लिये पर्याप्त पूंजी की आवश्यकता होती है। फसलों के उत्पादन तथा विपणन में आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक का उपयोग किया जाता है। भारत में चाय के बागानं या एस्टेट रोपण कृषि के आदर्श उदाहरण हैं। इनमें जोतों का आकार बड़ा है.
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प्रबंधन केन्द्रीय है तथा कृषि अत्यधिक वैज्ञानिक व वाणिज्यिक स्तर पर की जाती है।' दूसरी ओर कहवा, रबर तथा नारियल की रोपण कृषि छोटी जोतों पर छोटे या मध्यम वर्गीय किसानों के स्वामित्व में की जाती है। रोपण कृषि की सफलता में यातायात और संचार के विकसित साधन और अच्छे बाजार का हाथ होता है। चाय मुख्य रूप से असम और उत्तरी बंगाल के चाय बागानों में उगाई जाती है। कॉफी का उत्पादन तमिल नाडु में होता है। केले का उत्पादन बिहार और महाराष्ट्र में होता है।

स्थानांतरित कृषि

यह कृषि अभ्यास मुख्य रूप से जनजातीय समूहों द्वारा कंद और जड़ो वाली फसलों को विकसित करने के लिए उपयोग किया जाता है।
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भूमि के जंगली या पहाड़ी क्षेत्र की वनस्पतियो को जलाकर उसे प्राप्त राख से उर्वर हुई मृदा पर दो-तीन वर्ष तक कृषि की जाती है तत् पश्चात मृदा के अनुर्वर होने पर दूसरे स्थान पर समान विधि अपनाकर यह कृषि चलती रहती है।
  • बार-बार स्थान परिवर्तन होने के कारण इसे स्थानान्तरित या झूम खेती भी कहा जाता है।
  • कुछ स्थानों पर इसे ‘काटो और जलाओ’ तथा ‘बुश फेलो कृषि ‘ भी कहा जाता है।
स्थानीय रुप से इस कृषि को पूर्वोत्तर राज्यों में झूम, आंध्र प्रदेश और ओडिशा में ‘ पौद ‘, केरल में ‘ओनम’ , मध्य प्रदेश तथा छत्तीशगढ में ‘बीवर’ , ‘मशान’, ‘पेडा’ तथा ‘बीरा’  और दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान में ‘वालरा’ कहा जाता है।
इस प्रकार की कृषि पद्धति में फसलों को उगाने के लिये वन भूमाग को साफ किया जाता है। कुछ वर्षों तक ही यहाँ फसलों को उगाया जाता है। मिट्टी की उर्वरता कम होने तथा खर पतवार के उग आने के साथ ही इस भू भाग को छोड़ दिया जाता है तथा नये साफ भूभाग की ओर किसान चले जाते हैं। भारत में इस प्रकार की कृषि मेघालय, मणीपुर, त्रिपुरा, नागालैण्ड तथा मिजोरम में की जाती है। कम घने आबाद क्षेत्रों में इस प्रकार की कृषि मुख्य रूप से स्थानीय जन जातियों के लोगों द्वारा की जाती है। इसे स्थानीय भाषा में 'झूम' कृषि कहते हैं।

सीढ़ीदार कृषि

इस प्रकार की कृषि हिमालय तथा प्रायद्वीपीय प्रदेश की पहाड़ियों के ढालों.पर की जाती है। इन प्रदेशों में लोग फसलों को उगाने के लिये मृदा व जल संरक्षण के लिये पर्वतीय ढालों पर सीढ़ीदार खेत बनाते हैं। इसके लिये उन्हें कठोर श्रम करना पड़ता है।
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सीढ़ीदार कृषि भारत के उ.प. राज्यों के उन किसानों द्वारा की जाती है जो स्थानान्तरी कृषि में लगे हुए है इससे यह स्पष्ट होता है की ब्रद्धि का भूमि पर दबाब लगातार बद रहा है इसके परिणामस्वरूप इन राज्यों में स्थानान्तरी कृषि का क्षेत्र भी क्रमशः कम हो रहा है।

गहन तथा विस्तृत कृषि

कृषि की वह विधि, जिसमें छोटे-छोटे भू-भागों पर अधिकतम मानव श्रम द्वारा अधिकतम उत्पादन प्राप्त किया जाय, गहन कृषि कहलाती है। इस प्रकार की कृषि घनी जनसंख्या वाले भूभागों में की जाती है। जनसंख्या का भूमि पर दबाव अधिक होता है। इस प्रकार की कृषि श्रम प्रधान होती है तथा अधिक उत्पादन लेने के लिये खेतों में खादों का उपयोग किया जाता है। गंगा के पूर्वी मैदानी भाग में इस प्रकार की कृषि की जाती है। इसके विपरीत, जब बड़ी-बड़ी जोतों पर मशीनों की सहायता व कम मानव श्रम द्वारा खेती की जाती है तो उसे विस्तृत कृषि कहते हैं। इस प्रकार की कृषि उन क्षेत्रों में की जाती है जहाँ जनसंख्या का घनत्व कम होता है। इस कृषि पद्धति में मानव श्रम की कमी के कारण मशीनों का विस्तृत उपयोग किया जाता है। इसे. पूंजी प्रधान कृषि भी कहते हैं। इस विधि द्वारा खेती करने में यह प्रयत्न किया जाता है कि विस्तृत भूभाग को कृषि के अन्तर्गत लाकर उत्पादन बढ़ाया जाय। यद्यपि भारत में इस प्रकार की कृषि का कोई आदर्श क्षेत्र नहीं है लेकिन सीमित वर्षा वाले भागों जैसे राजस्थान तथा मध्य प्रदेश व गुजरात के कुछ क्षेत्रों में की जाने वाली कृषि विस्तृत कृषि से मिलती-जुलती है। हिमालय के कम घने आबाद तराई प्रदेश में भी जोतों का आकार बड़ा  है। अत: यहाँ भी विस्तृत कृषि जैसी ही कृषि पद्धति अपनायी गयी है।
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वर्षा के वितरण, जोतों के आकार, तकनीकी विकास की असमानता तथा अन्य कारकों के परिणामस्वरूप विभिन्न कृषि पद्धतियों का विकास हुआ है। भारतीय किसानों द्वारा अपनायी गयी कुछ प्रमुख कृषि पद्धतियों में आई कृषि, शुष्क कृषि, सिंचित कृषि, जीवन निर्वाह कृषि, वाणिज्यिक कृषि, सीढ़ीदार कृषि, गहन तथा विस्तृत कृषि शामिल हैं।
भारत में घनी आबादी वाले क्षेत्रों में इस प्रकार का कृषि अभ्यास देखा जा सकता है।
यह हर संभव प्रयास करके पूँजी एवं श्रम का उपयोग करके एक निश्माचित समयांतराल के दौरान अधिकतम संभव प्रयास के द्वारा उत्पादन को अधिकतम करने का प्रयास है।
सामान्यत: 200% से अधिक सस्य गहनता वाला छेत्र गहन (सघन) कृषि छेत्र माना जाता है।
वास्तव में अधिक जनसंख्या घनत्व तथा भूमि की कम उपलब्धता वाले छेत्रों में रासायनिक उर्वरको, उन्नत बीजों, कीटनाशक दवाइयों, सिंचाई फसल परिवर्तन आदि का अधिकतम प्रयोग द्वारा यह खेती की जाती है।

गहन जीविका कृषि की समस्याएँ
इस तरह की खेती की सबसे बड़ी समस्या है पीढ़ी दर पीढ़ी जमीन का बँटवारा होना। इससे भूखंड का आकार छोटा होता चला जाता है, जिससे होने वाली पैदावार लाभप्रद नहीं रह जाती है। इसके परिणामस्वरूप किसानों को रोजगार की तलाश में पलायन करना पड़ता है।

भारत में कृषि का महत्व
कृषि फसलों को पैदा करने एवं पशुओं को पालने का व्यवसाय है। यह भारतीय लोगों के महत्वपूर्ण व्यवसायों में से एक है, जिसमें लगभग 65 प्रतिशत कार्यशील जनसंख्या लगी हुई है। कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी है। स्वतंत्रता के बाद से .. औद्योगीकरण के लिये किये गये अनेकों प्रयत्नों के बावजूद, आज भी देश की जनसंख्या का दो तिहाई भाग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपनी जीविका के लिये कृषि पर निर्भर करता है। हमारे सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का लगभग एक तिहाई भाग है। भारत के निर्यात की आय में कृषि उत्पादों का माग लगभग 30 प्रतिशत है। यह न केवल हमें खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराती है, अपितु पशुओं के लिए चारा तथा कृषि पर आधारित उद्योगों के लिये कच्चा माल जैसे कपास, पटसन, गन्ना तथा तिलहन भी पैदा करती है। इस प्रकार, कृषि भारतीय लोगों की जीविका का एक अत्यधिक महत्वपूर्ण साधन है तथा अत्यधिक में रोजगार उपलब्ध कराने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

भारतीय कृषि की प्रमुख विशेषतायें
यद्यपि भारत मुख्य रूप से एक कृषि प्रधान देश है, तथापि कृषि अनेक कमियों की शिकार है। देश के कुल श्रम शक्ति के 65 प्रतिशत भाग को रोजगार उपलब्ध कराने वाला यह क्षेत्र राष्ट्रीय आय में 30 प्रतिशत से कम का योगदान देता है। भारतीय कृषि एक परम्परागत पद्धति पर आधारित है। लोग इसे एक व्यवसाय के रूप में उतना नहीं अपनाये हुये है जितना कि एक जीविकोपार्जी साधन के रूप में अपनाये हुये हैं। विश्व के अनेकों विकसित राष्ट्रों की तुलना में देश में कृषि उत्पादकता काफी कम है। भारतीय कृषि की प्रमुख विशेषतायें इस प्रकार हैं-

प्रतिव्यक्ति भूमि की निम्न उपलब्धता
भारत में प्रतिव्यक्ति 0.29 हैक्टेयर भूमि उपलब्ध है; जबकि यह संयुक्त राज्य अमेरिका में 0.89 हेक्टेयर, रूस में 0.92 हैक्टेयर अर्जेन्टिना में 1.25 हैक्टेयर, कनाडा में 2.00 हैक्टेयर तथा आस्ट्रलिया में 3.40 हैक्टेयर है। संसार में औसत प्रति व्यक्ति भूमिं 0.36 हैक्टेयर है भारत में प्रति व्यक्ति भूमि संसार के औसत से भी कम है। प्रति व्यक्तिं भूमि की कम उपलब्धता इस तथ्य की सूचक है कि भारत में इस संसाधन पर जनसंख्या का दबाव अधिक है।

खाद्य फसलों की प्रधानता
भारत में छोटे खेतों पर कृषि कार्य मुख्यत: जीवको पार्जी स्तर पर किया जाता है। कुल जोती गयी भूमि के लगभग 67 प्रतिशत भाग पर खाद्य फसलों को उगाया जाता है। अभी तक उद्यान तथा व्यापारिक कृषि का विकास अधिक नहीं हुआ है।

प्रकृति पर अत्यधिक निर्भरता
भारतीय कृषि मौसम की मनमानी का शिकार होती है। हमारे देश में कृषि की सफलता मानसून के व्यवहार पर निर्भर करती है जो अत्यधिक परिवर्तनशील तथा अनिश्चित है। सिचाई सुविधायें कुल बोये गये क्षेत्र के लगभग 28 प्रतिशत भाग पर ही उपलब्ध है। स्वतंत्रता के बाद से सिंचाई की सुविधायें अत्यधिक विस्तृत भाग पर उपलब्ध करायी गयी है। फिर भी, यह ध्यान देने योग्य तत्थ्य है कि आने वाले समय में इसे कुल बोये गये क्षेत्र के 45 से 50 प्रतिशत भाग से अधिक क्षेत्र पर नहीं बढ़ाया जा सकता।

निम्न उत्पादन
कुछ विकसित देशों की तुलना में भारत में प्रति हैक्टेयर - उत्पादन काफी कम है। वास्तव में यह कुछ विकासशील देशों जैसे चीन की तुलना में भी काफी कम है। इसके लिये बीजों का पटिया होना तथा कृषि की परम्परागत विधियाँ मुख्यरूप से उत्तरदायी है, यद्यपि अधिक उत्पादन देने वाले बीजों तथा रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते उपयोग के कारण इस स्थिति में काफी हद तक सुधार हुआ है। वर्तमान में, देश के कुल जोते गये भू भाग के लगभग 20 प्रतिशत भाग पर उन्नत किस्म के बीज बोये जाते हैं।

कृषि में मशीनीकरण का निम्न स्तर
भारत में अधिकांश किसान परम्परागत तरीके से खेती करते हैं। कृषि जोतों का आकार इतना छोट है कि उनमें बड़ी मशीनों मे खेती नहीं की जा सकती। छोटे खेतों के योग्य मशीनों की कमी भी भारत में कृषि के मशीनीकरण के निम्न स्तर के लिये उत्तरदायी है। भारतीय किसान आज भी पुराने कृषि यंत्रों व विधियों का उपयोग कृषि कार्यों में कर रहे हैं। भारतीय कृषि श्रम प्रधान है। प्रति हेक्टेयर उत्पादन के कम होने का यह एक मुख्य कारण है। यद्यपि, पिछले कुछ दशकों में, कृषि में मशीनीकरण का स्तर कुछ ऊपर उठा है, लेकिन यह अभी भी काफी निम्न है।

जीविकोपार्जी कृषि पर अधिक जोर
भारतीय कृषि अभी भी मुख्यतः जीविकोपार्जी प्रकार की ही है। किसान सामान्यतया उन फसलों को उगाते हैं जिनका उपयोग वे स्वयं करते हैं। परिणामस्वरूप, कृषि में मुनाफा का स्तर सामान्यतया निम्न है।

अनेक प्रकार की फसलें
फसलों की बाहुल्यता भारतीय कृषि की एक अन्य विशेषता है। ऐसा आंशिक रूप से कृषि को जीवकोपार्जी प्रकृति तथा आंशिक रूप से देश के विभिन्न भागों में पायी जाने वाली प्राकृतिक, आर्थिक तथा सामाजिक परिस्थितियों के कारण है। इस प्रकार, भारतीय कृषि में विशिष्टता की कमी है। यह अक्सर उन फसलों के उत्पादन को प्रोत्साहित करती है जिनके लिए प्राकृतिक पर्यावरण उपयुक्त नहीं है। हालांकि, दूसरी ओर मृदा व जलवायु दशाओं ने हमें हर प्रकार की उपयोगी फसलों के पैदा करने के योग्य बनाया है चाहे वे अच्दे या मोटे खाद्यान्न या ज्वार बाजरा हो, दालें, तिलहन, गर्म-मसाले, सब्जियाँ, फल, रेशेदार फसलें पेय पदार्थ हों तथा चाहे औद्योगिक फसलें जैसे गन्ना, रबर, तथा तम्बाकू हों। इस के साथ ही, चरागाहों के अन्तर्गत बहुत छोटे क्षेत्र के बाबजूद हम संसार के दुग्ध व दुग्ध उत्पाद के दूसरे सबसे बड़े उत्पादक हैं।

भारतीय कृषि की विशेषतायें
  • जनसंख्या का भूमि पर अधिक दबाव
  • कृषि में खाद्यान्नों की प्रधानता
  • प्रकृति पर अत्यधिक निर्भरता
  • प्रति हेक्टेयर उत्पादन कम
  • मशीनीकरण में धीमी प्रगति
  • कृषि का श्रम प्रधान होना
  • फसलों की बाहुल्यता

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