क्रिया किसे कहते हैं - परिभाषा, भेद एवं उदाहरण | kriya kise kahate hain

क्रिया किसे कहते हैं

जिस शब्द से किसी काम का करना या होना समझा जाए, उसे 'क्रिया' कहते हैं। जैसे-पढ़ना, खाना, पीना, जाना इत्यादि। क्रिया विकारी शब्द है, जिसके रूप लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार बदलते हैं। यह हिंदी की अपनी विशेषता है।

धातु
क्रिया का मूल 'धातु' है। 'धातु' क्रियापद के उस अंश को कहते हैं, जो किसी क्रिया के प्रायः सभी रूपों में पाया जाता है। तात्पर्य यह है कि जिन मूल अक्षरों से क्रियाएँ बनती हैं, उन्हें 'धातु' कहते हैं।
उदाहरणार्थ,
'पढ़ना' क्रिया को लें। इसमें 'ना' प्रत्यय है, जो मूल धातु 'पढ़' में लगा है। इस प्रकार, 'पढ़ना' क्रिया की धातु 'पढ़' है। इसी प्रकार, 'खाना' क्रिया 'खा' धातु में 'ना' प्रत्यय लगाने से बनी है। हिंदी में क्रिया का सामान्य रूप मूलधातु में 'ना' जोड़कर बनाया जाता है। जैसे-चल + ना = चलना, देख + ना = देखना। इन सामान्य रूपों में 'ना' हटाकर धातु का रूप ज्ञात किया जा सकता है। धातु की यह एक मोटी पहचान है।
हिंदी में क्रियाएँ धातुओं के अलावा संज्ञा और विशेषण से भी बनती है; जैसे-
  • काम + आना = कमाना, चिकना + आना = चिकनाना, दुहरा + आना = दुहराना।

धातु के भेद
व्युत्पत्ति अथवा शब्द-निर्माण की दृष्टि से धातु दो प्रकार की होती है-
  1. मूल धातु, और
  2. यौगिक धातु
मूल धातु स्वतंत्र होती है। यह किसी दूसरे शब्द पर आश्रित नहीं होती। जैसे-खा. देख, पी इत्यादि। यौगिक धातु किसी प्रत्यय के योग से बनती है। जैसे–'खाना' से खिला, 'पढ़ना' से पढ़ा।
इस प्रकार धातुएँ अनंत हैं- कुछ एकाक्षरी, दो अक्षरी, तीन अक्षरी और चार अक्षरी धातुएँ होती हैं।

यौगिक धातु की रचना
यौगिक धातु तीन प्रकार से बनती है-
  1. धातु में प्रत्यय लगाने से अकर्मक से सकर्मक और प्रेरणार्थक धातुएँ बनती हैं;
  2. कई धातुओं को संयुक्त करने से संयुक्त धातु बनती है;
  3. संज्ञा या विशेषण से नामधातु बनती है।

प्रेरणार्थक क्रिया (धातु) - जिन क्रियाओं से इस बात का बोध हो कि कर्ता स्वयं कार्य न कर किसी दूसरे को कार्य करने के लिए प्रेरित करता है, वे 'प्रेरणार्थक क्रियाएँ' (Causative Verb) कहलाती हैं। जैसे-काटना से कटवाना, करना से कराना। एक अन्य उदाहरण इस प्रकार है-मोहन मुझसे किताब लिखाता है। इस वाक्य में मोहन (कर्ता) स्वयं किताब न लिखकर 'मुझे' दूसरे व्यक्ति को लिखने की प्रेरणा देता है।
प्रेरणार्थक क्रियाओं के दो रूप हैं। जैसे–'गिरना' से 'गिराना' और 'गिरवाना'। दोनों क्रियाएँ एक के बाद दूसरी प्रेरणा में हैं। याद रखें, अकर्मक क्रिया प्रेरणार्थक होने पर सकर्मक (कर्म लेने वाली) हो जाती है।
जैसे -
  • राज लजाता है।
  • वह राम को लजवाता है।
प्रेरणार्थक क्रियाएँ सकर्मक और अकर्मक दोनों क्रियाओं से बनती हैं। ऐसी क्रियाएँ हर स्थिति में सकर्मक ही रहती हैं। जैसे-मैंने उसे हँसाया; मैंने उससे किताब लिखवाई। पहले में कर्ता अन्य (कर्म) को हँसाता है और दूसरे में कर्ता दूसरे को किताब लिखने को प्रेरित करता है। इस प्रकार हिंदी में प्रेरणार्थक क्रियाओं के दो रूप चलते हैं। प्रथम में 'ना' का और द्वितीय में 'वाना' का प्रयोग होता है-हँसाना-हँसवाना।

मूल

द्वितीय-तृतीय (प्रेरणा)

उठना

उठाना, उठवाना

उड़ना

उड़ाना, उड़वाना

चलना

चलाना, चलवाना

देना

दिलाना, दिलवाना

जीना

जिलाना, जिलवाना

लिखना

लिखाना, लिखवाना

जगना

जगाना, जगवाना

सोना

सुलाना, सुलवाना

पीना

पिलाना, पिलवाना

देना

दिलाना, दिलवाना


यौगिक क्रिया
दो या दो से अधिक धातुओं और दूसरे शब्दों के संयोग से या धातुओं में प्रत्यय लगाने से जो क्रिया बनती है, उसे 'यौगिक क्रिया' कहा जाता है। जैसे-चलना-चलाना, हँसना-हँसाना, चलना-चल देना।
नामधातु (Nominal Verb)-जो धातु संज्ञा या विशेषण से बनती है, उसे 'नामधातु' कहते हैं।
देखें-

संज्ञा से

हाथ

हथियाना।

बात

बतियाना।

विशेषण से

चिकना

चिकनाना।

गरम

गरमाना।


कर्म की दृष्टि से क्रिया के भेद

ऊपर व्युत्पत्ति की दृष्टि से क्रिया के भेद किये गये। कर्म की दृष्टि से क्रिया के सामान्यत: दो भेद हैं-
  1. सकर्मक
  2. अकर्मक

सकर्मक क्रिया

'सकर्मक क्रिया' उसे कहते हैं, जिसका कर्म हो या जिसके साथ कर्म की संभावना हो, अर्थात् जिस क्रिया के व्यापार का संचालन तो कर्ता से हो, पर जिसका फल या प्रभाव किसी दूसरे व्यक्ति या वस्तु, अर्थात् कर्म पर पड़े। उदाहरणार्थ-श्याम आम खाता है। इस वाक्य में 'श्याम' कर्ता है, 'खाने' के साथ उसका कर्तृरूप से संबंध है। प्रश्न होता है, क्या खाता है? उत्तर है, 'आम'। इस तरह 'आम' का सीधा 'खाने' से संबंध है। अत: 'आम' कर्मकारक है। यहाँ श्याम के खाने का फल 'आम' पर, अर्थात् कर्म पर पड़ता है। इसलिए, 'खाना' क्रिया सकर्मक है। कभी-कभी सकर्मक क्रिया का कर्म छिपा रहता है। जैसे-वह गाता है। वह पढता है। यहाँ 'गीत' और 'पुस्तक' जैसे कर्म छिपे हैं।
दूसरे शब्दों में
स अर्थात् सहित, अतः सकर्मक का अर्थ है-कर्म के साथ। परिभाषा-जिस क्रिया का फल कर्ता को छोड़कर कर्म पर पड़े, वह सकर्मक क्रिया कहलाती है।
जैसे-बच्चा चित्र बना रहा है या गीता सितार बजा रही है।
अब यदि प्रश्न किया जाए कि बच्चा क्या बना रहा है तो उत्तर होगा-'चित्र' (कर्म) तथा गीता क्या बजा रही है तो उत्तर होगा-'सितार' (कर्म)।

सकर्मक क्रिया के दो भेद हैं-
  • (i) एक कर्मक- जिस वाक्य में क्रिया के साथ एक कर्म प्रयुक्त हो, उसे एक कर्मक क्रिया कहते हैं, जैसे-'माँ पढ़ रही है।' यहाँ माँ के द्वारा एक ही कर्म (पढ़ना) हो रहा है।
  • (ii) द्विकर्मक क्रिया- जिस वाक्य में क्रिया के साथ दो कर्म प्रयुक्त हों, उसे द्विकर्मक क्रिया कहते है। जैसे-अध्यापक छात्रों को कंप्यूटर सिखा रहे हैं। क्या सिखा रहे हैं? -कंप्यूटर। किसे सिखा रहे हैं? -छात्रों को (छात्र सीख रहे हैं।) इस प्रकार दो कर्म एक साथ घटित हो रहे हैं।

अकर्मक क्रिया

जिन क्रियाओं का व्यापार और फल कर्ता पर हो, वे 'अकर्मक' कहलाती हैं। अकर्मक क्रियाओं का 'कर्म' नहीं होता, क्रिया का व्यापार और फल दूसरे पर न पड़कर कर्ता पर पड़ता है। उदाहरण के लिए-श्याम सोता है। इसमें 'सोना' क्रिया अकर्मक है। 'श्याम' कर्ता है, 'सोने' की क्रिया उसी के द्वारा पूरी होती है। अतः, सोने का फल भी उसी पर पड़ता है। इसलिए, 'सोना' क्रिया अकर्मक है। सरल भाषा में जिस वाक्य में क्रिया का प्रभाव या फल केवल कर्ता पर ही पड़ता है कर्म की वहाँ संभावना ही नहीं रहती। उसे अकर्मक क्रिया कहते हैं, जैसे-आशा सोती है।

सकर्मक और अकर्मक क्रियाओं की पहचान
सकर्मक और अकर्मक क्रियाओं की पहचान, 'क्या', 'किसे' या 'किसको' आदि प्रश्न करने से होती है। यदि कुछ उत्तर मिले, तो समझना चाहिए कि क्रिया सकर्मक है और यदि न मिले तो अकर्मक होगी। उदाहरणार्थ, मारना, पढ़ना, खाना-इन क्रियाओं में 'क्या' 'किसे' लगाकर प्रश्न किए जाएँ तो इनके उत्तर इस प्रकार होंगे-

इन सब उदाहरणों में क्रियाएँ सकर्मक हैं।

प्रश्न-किसे मारा?
उत्तर-किशोर को मारा।

प्रश्न-क्या खाया?
उत्तर-खाना खाया।

प्रश्न-क्या पढ़ता है।
उत्तर-किताब पढ़ता है।

कुछ क्रियाएँ अकर्मक और सकर्मक दोनों होती हैं और प्रसंग अथवा अर्थ के अनुसार इनके भेद का निर्णय किया जाता है।
जैसे-

अकर्मक

सकर्मक

उसका सिर खुजलाता है।

वह अपना सिर खुजलाता है।

बूँद-बूँद से घड़ा भरता है।

मैं घड़ा भरता हूँ।

तुम्हारा जी ललचाता है।

ये चीजें तुम्हारा जी ललचाती हैं।

जी घबराता है।

विपदा मुझे घबराती है।

वह लजा रही है।

वह तुम्हें लजा रही है।


द्रष्टव्य- जिन धातुओं का प्रयोग अकर्मक और सकर्मक दोनों रूपों में होता है, उन्हें उभयविध धातु कहते हैं।

क्रिया के भेद

द्विकर्मक क्रिया

कुछ क्रियाएँ एक कर्म वाली और दो कर्म वाली होती हैं। जैसे-राम ने रोटी खायी। इस वाक्य में कर्म एक ही है-'रोटी'। किंतु 'मैं लड़के को वेद पढ़ाता हूँ' में दो कर्म हैं-'लड़के को' और 'वेद'।

संयुक्त क्रिया

जो क्रिया दो या दो से अधिक धातुओं के मेल से बनती है, उसे संयुक्त क्रिया कहते हैं। जैसे-घनश्याम रो चुका, किशोर रोने लगा, वह घर पहुँच गया। इन वाक्यों में 'रो चुका', 'रोने लगा' और 'पहुँच गया' संयुक्त क्रियाएँ हैं। विधि और आज्ञा को छोड़कर सभी क्रियापद दो या अधिक क्रियाओं के योग से बनते हैं, किंतु संयुक्त क्रियाएँ इनसे भिन्न हैं, क्योंकि जहाँ एक ओर साधारण क्रियापद 'हो', 'रो', 'सो', 'खा' इत्यादि धातुओं से बनते हैं, वहाँ दूसरी ओर संयुक्त क्रियाएँ 'होना', 'आना', 'जाना', 'रहना', 'रखना', 'उठाना', 'लेना', 'पाना', 'पड़ना', 'डालना', 'सकना', 'चुकना', 'लगना', 'करना', 'भेजना', 'चाहना' इत्यादि क्रियाओं के योग से बनती हैं। सरल भाषा में जब दो या दो से अधिक भिन्न अर्थ रखनेवाली क्रियाओं का मेल हो, उसे संयुक्त क्रिया कहते हैं, जैसे-अतिथि आने पर स्वागत करो। इस वाक्य में आने' मुख्य क्रिया है तथा 'स्वागत करो' सहायक क्रिया है। इस प्रकार मुख्य एवं सहायक क्रिया दोनों का संयोग है। अतः इसे संयुक्त क्रिया कहते हैं।
इसके अतिरिक्त, सकर्मक तथा अकर्मक दोनों प्रकार की संयुक्त क्रियाएँ बनती हैं। जैसे
  • अकर्मक क्रिया से - लेट जाना, गिर पड़ना।
  • सकर्मक क्रिया से - बेच लेना, काम करना, बुला लेना, मार देना।
संयुक्त क्रिया की एक विशेषता यह है कि उसकी पहली क्रिया प्रायः प्रधान होती है और दूसरी उसके अर्थ में विशेषता उत्पन्न करती है। जैसे-मैं पढ़ सकता हूँ। इसमें 'सकना' क्रिया 'पढ़ना' क्रिया के अर्थ में विशेषता उत्पन्न करती है। हिंदी में संयुक्त क्रियाओं का प्रयोग अधिक होता है।

संयुक्त क्रिया के भेद
अर्थ के अनुसार संयुक्त क्रिया के 11 मुख्य भेद हैं-

आरम्भबोधक
जिस संयुक्त क्रिया से क्रिया के आरम्भ होने का बोध होता है, उसे 'आरम्भबोधक संयुक्त क्रिया' कहते हैं। जैसे-वह पढ़ने लगा. पानी बरसने लगा. राम खेलने लगा।

समाप्तिबोधक
जिस संयुक्त क्रिया से मुख्य क्रिया की पूर्णता, व्यापार की समाप्ति का बोध हो, वह “समाप्तिबोधक संयुक्त क्रिया' है। जैसे-वह खा चुका है; वह पढ़ चुका है। धातु के आगे 'चुकना' जोड़ने से समाप्तिबोधक संयुक्त क्रियाएँ बनती हैं। 

अवकाशबोधक
जिससे क्रिया को निष्पन्न करने के लिए अवकाश का बोध हो, वह 'अवकाशबोधक संयुक्त क्रिया' है। जैसे-वह मुश्किल से सोने पाया; जाने न पाया।

अनुमतिबोधक
जिससे कार्य करने की अनुमति दिए जाने का बोध हो, वह 'अनुमतिबोधक संयुक्त क्रिया' है। जैसे-मुझे जाने दो; मुझे बोलने दो। यह क्रिया ‘देना' धातु के योग से बनती है।

नित्यताबोधक
जिससे कार्य की नित्यता, उसके बंद न होने का भाव प्रकट हो, वह 'नित्यताबोधक संयुक्त क्रिया है। जैसे-हवा चल रही है। पेड़ बढ़ता गया; तोता पढ़ता रहा। मुख्य क्रिया के आगे 'जाना' या 'रहना' जोड़ने से नित्यताबोधक संयुक्त क्रिया बनती है।

आवश्यकताबोधक
जिससे कार्य की आवश्यकता या कर्तव्य का बोध हो, वह 'आवश्यकताबोधक संयुक्त क्रिया' है। जैसे- यह काम मुझे करना पड़ता है; तुम्हें यह काम करना चाहिए। साधारण क्रिया के साथ 'पड़ना', 'होना' या 'चाहिए' क्रियाओं को जोड़ने से आवश्यकताबोधक संयुक्त क्रियाएँ बनती हैं।

निश्चयबोधक
जिस संयुक्त क्रिया से मुख्य क्रिया के व्यापार की निश्चयता का बोध हो, उसे 'निश्चयबोधक संयुक्त क्रिया' कहते हैं। जैसे-वह बीच ही में बोल उठा; उसने कहा-मैं मार बैलूंगा. वह गिर पड़ा; अब दे ही डालो। इस प्रकार की क्रियाओं में पूर्णता और नित्यता का भाव वर्तमान है।

इच्छाबोधक
इससे क्रिया के करने की इच्छा प्रकट होती है। जैसे-वह घर आना चाहता है। मैं खाना चाहता हूँ। क्रिया के साधारण रूप में 'चाहना' क्रिया जोड़ने से इच्छाबोधक संयुक्त क्रियाएँ बनती हैं।

अभ्यासबोधक
इससे क्रिया के करने के अभ्यास का बोध होता है। सामान्य भूतकाल की क्रिया में 'करना' क्रिया लगाने से अभ्यासबोधक संयुक्त क्रियाएँ बनती हैं। जैसे-यह पढ़ा करता है; तुम लिखा करते हो; मैं खेला करता हूँ।

शक्तिबोधक
इससे कार्य करने की शक्ति का बोध होता है। जैसे-मैं चल सकता हूँ, वह बोल सकता है। इसमें 'सकना' क्रिया जोड़ी जाती है।

पुनरूक्त संयुक्त क्रिया
जब दो समानार्थक अथवा समान ध्वनि वाली क्रियाओं का संयोग होता है, तब उन्हें 'पुनरुक्त संयुक्त क्रिया' कहते हैं। जैसे-वह पढ़ा-लिखा करता है; वह यहाँ प्रायः आया-जाया करता है; पड़ोसियों से बराबर मिलते-जुलते रहो।

सहायक क्रिया

सहायक क्रियाएँ मुख्य क्रिया के रूप में अर्थ को स्पष्ट और पूरा करने में सहायक होती हैं। कभी एक क्रिया और कभी एक से अधिक क्रियाएँ सहायक होती हैं। हिंदी में इन क्रियाओं का व्यापक प्रयोग होता है। इनके हेर-फेर से क्रिया का काल बदल जाता है।
जैसे -
  • वह खाता है। मैंने पढ़ा था।
  • तुम जगे हुए थे। वे सुन रहे थे।
इनमें खाना, पढ़ना, जगना और सुनना मुख्य क्रियाएँ हैं; क्योंकि यहाँ क्रियाओं के अर्थ की प्रधानता है। शेष क्रियाएँ जैसे-है, था, हुए थे, रहे थे- सहायक क्रियाएँ हैं। ये मुख्य अर्थ को स्पष्ट और पूरा करती हैं।

नामबोधक क्रिया

संज्ञा अथवा विशेषण के साथ क्रिया जोड़ने से जो संयुक्त क्रिया बनती है, उसे 'नामबोधक क्रिया' कहते हैं। जैसे
  • संज्ञा+क्रिया - भस्म करना।
  • विशेषण+क्रिया - दुखी होना, निराश होना।

द्रष्टव्य
नामबोधक क्रियाएँ संयुक्त क्रियाएँ नहीं हैं। संयुक्त क्रियाएँ दो क्रियाओं के योग से बनती हैं और नामबोधक क्रियाएँ संज्ञा अथवा विशेषण के मेल से बनती हैं। दोनों में यही अंतर है।

पूर्वकालिक क्रिया

परिभाषा
जब कर्ता एक क्रिया समाप्त कर उसी क्षण दूसरी क्रिया में प्रवृत्त होता है तब पहली क्रिया 'पर्वकालिक' कहलाती है। जैसे- उसने नहाकर भोजन किया। इसमें 'नहाकर' पूर्वकालिक क्रिया है। क्योंकि इससे 'नहाने' की क्रिया की समाप्ति के साथ ही भोजन करने की क्रिया का बोध होता है।

क्रियार्थक संज्ञा
जब क्रिया संज्ञा की तरह व्यवहार में आए, तब वह "क्रियार्थक संज्ञा' कहलाती है। जैसे-टहलना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है। देश के लिए मरना कहीं अच्छा है।

वाच्य
क्रिया के उस परिवर्तन को 'वाच्य' कहते हैं, जिसके द्वारा इस बात का बोध होता है कि वाक्य के अंतर्गत कर्ता, कर्म अथवा भाव-इनमें से किसकी प्रधानता है। इनमें किसके अनुसार क्रिया के पुरुष, वचन आदि आए हैं। इस परिभाषा के अनुसार वाक्य में क्रिया के लिंग, वचन चाहे तो कर्ता के अनुसार होंगे अथवा कर्म के अनुसार अथवा भाव के अनुसार।

वाच्य के प्रयोग
वाक्य में क्रिया के लिंग, वचन तथा पुरुष का अध्ययन 'प्रयोग' कहलाता है। ऐसा देखा जाता है कि वाक्य की क्रिया का लिंग, वचन एवं पुरुष कभी कर्ता के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार होता है, तो कभी कर्म के लिंग-वचन-पुरुष के अनुसार, लेकिन कभी-कभी वाक्य की क्रिया कर्ता तथा कर्म के अनुसार न होकर एकवचन, पुल्लिग तथा अन्यपुरुष होती है; ये ही प्रयोग है। अतः 'प्रयोग' तीन प्रकार के होते हैं-
  1. कर्तरि प्रयोग
  2. कर्मणि प्रयोग
  3. भावे प्रयोग

कर्तरि प्रयोग
जब वाक्य के लिंग, वचन और पुरुष कर्ता के लिंग, वचन और पुरुष की क्रिया के अनुसार हों तब कर्तरि प्रयोग होता है; जैसे-मोहन अच्छी पुस्तकें पढ़ता है।

कर्मणि प्रयोग
जब वाक्य की क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष कर्म के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार हों तब कर्मणि प्रयोग होता है; जैसे-सीता ने पत्र लिखा।

भावे प्रयोग
जब वाक्य की क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष कर्ता अथवा कर्म के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार न होकर एकवचन, पुल्लिग तथा अन्य पुरुष हों तब भावे प्रयोग होता है; जैसे-मुझसे चला नहीं जाता।

वाच्य के भेद
उपर्युक्त प्रयोगों के अनुसार वाच्य के तीन भेद हैं
  1. कर्तृवाच्य,
  2. कर्मवाच्य और
  3. भाववाच्य

कर्तवाच्य
क्रिया के उस रूपांतर को कर्तवाच्य कहते हैं, जिससे वाक्य में कर्ता की प्रधानता का बोध हो। जैसे-लड़का खाता है, मैंने पुस्तक पढ़ी।

कर्मवाच्य
क्रिया के उस रूपांतर को कर्मवाच्य कहते हैं, जिससे वाक्य में कर्म की प्रधानता का बोध हो। जैसे- पुस्तक पढ़ी जाती है; आम खाया जाता है।
यहाँ क्रियाएँ कर्ता के अनुसार रूपांतरित न होकर कर्म के अनुसार परिवर्तित हुई हैं। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि अंग्रेजी की तरह हिंदी में कर्ता के रहते हुए कर्मवाच्य का प्रयोग नहीं होता; जैसे–'मैं पानी पीता हूँ' के स्थान पर 'मुझसे पानी पीया जाता है' लिखना गलत होगा। हाँ, निषेध के अर्थ में यह लिखा जा सकता है-मुझसे पत्र लिखा नहीं जाता; उससे पढ़ा नहीं जाता।

भाववाच्य
क्रिया के उस रूपांतर को भाववाच्य कहते हैं, जिससे वाक्य में क्रिया अथवा भाव की प्रधानता का बोध हो। जैसे
  • राम से टहला भी नहीं जाता।
  • मुझसे बैठा नहीं जाता।
  • धूप में चला नहीं जाता।
इन वाक्यों में कर्ता और कर्म के स्थान पर क्रियाएँ ही अधिक प्रधान हो गयी हैं।

टिप्पणी
यहाँ यह द्रष्टव्य है कि कर्तृवाच्य में क्रिया सकर्मक और अकर्मक दोनों हो सकती है, किंतु कर्मवाच्य में केवल सकर्मक और भाववाच्य में अकर्मक होती है।

काल
क्रिया के उस रूपान्तर को 'काल' कहते हैं, जिससे उसके कार्य व्यापार का समय और उसकी पूर्ण अथवा अपूर्ण अवस्था का बोध हो। काल के तीन भेद हैं-
  1. वर्तमानकाल,
  2. भूतकाल, और
  3. भविष्यत्काल

वर्तमानकाल
क्रियाओं के व्यापार की निरंतरता को 'वर्तमानकाल' कहते हैं। इसमें क्रिया का आरंभ हो चुका होता है। जैसे-वह खाता है। यहाँ 'खाने' का कार्यव्यापार चल रहा है, समाप्त नहीं हुआ।

वर्तमानकाल के भेद
वर्तमानकाल के पाँच भेद हैं
  1. सामान्य वर्तमान
  2. तात्कालिक वर्तमान
  3. पूर्ण वर्तमान
  4. संदिग्ध वर्तमान
  5. संभाव्य वर्तमान

सामान्य वर्तमान
क्रिया का वह रूप जिससे क्रिया का वर्तमानकाल में होना पाया जाए, 'सामान्य वर्तमान' कहलाता है। जैसे-वह आता है; वह देखता है।

तात्कालिक वर्तमान
इससे यह पता चलता है कि क्रिया वर्तमानकाल में हो रही है। जैसे-मैं पढ़ रहा हूँ; वह जा रहा है।

पूर्ण वर्तमान
इससे वर्तमानकाल में कार्य की पूर्ण सिद्धि का बोध होता है। जैसे-वह आया है; लड़के ने पुस्तक पढ़ी है।

सन्दिग्ध वर्तमान
जिससे क्रिया के होने में संदेह प्रकट हो, पर उसकी वर्तमानता में संदेह न हो। जैसे-राम खाता होगा; वह पढ़ता होगा।

सम्भाव्य वर्तमान
इससे वर्तमानकाल में काम के पूरा होने की सम्भावना रहती है। जैसे-वह आया हो; वह लौटा हो।

भूतकाल
भूतकाल- जिस क्रिया से कार्य की समाप्ति का बोध हो, उसे भूतकाल की क्रिया कहते हैं। जैसे-लड़का आया था; वह खा चुका था; मैंने गाया।

भूतकाल के छः भेद हैं
  1. सामान्यभूत
  2. आसन्नभूत
  3. पूर्णभूत
  4. अपूर्णभूत
  5. संदिग्धभूत
  6. हेतुहेतुमद्भूत

सामान्यभूत
जिससे भूतकाल की क्रिया के विशेष समय का ज्ञान न हो। जैसे-मोहन आया; सीता गयी।

आसन्नभूत
इससे क्रिया की समाप्ति निकट भूत में या तत्काल ही सूचित होती है। जैसे-मैंने आम खाया है। मैं चला हूँ।

पूर्णभूत
क्रिया के उस रूप को पूर्ण भूत कहते हैं, जिससे क्रिया की समाप्ति के समय का स्पष्ट बोध होता है कि क्रिया को समाप्त हुए काफी समय बीता है। जैसे-उसने मुरारि को मारा था; वह आया था।

अपूर्णभूत
इससे यह ज्ञात होता है कि क्रिया भूतकाल में हो रही थी, किंतु उसकी समाप्ति का पता नहीं चलता। जैसे-सुरेश गीत गा रहा था; गीता सो रही थी।

संदिग्धभूत
इसमें यह संदेह बना रहता है कि भूतकाल में कार्य पूरा हुआ या नहीं। जैसे-तुमने गाया होगा; तू गाया होगा।

हेतुहेतुमद्भूत
इससे यह पता चलता है कि क्रिया भूतकाल में होनेवाली थी, पर किसी कारण न हो सकी। जैसे-मैं आता; तू जाता; वह खाता।

भविष्यत्काल
भविष्यत्काल-भविष्य में होने वाली क्रिया को भविष्यत्काल की क्रिया कहते हैं। जैसे वह कल घर जाएगा। भविष्यत्काल के तीन भेद हैं
  1. सामान्य भविष्य
  2. संभाव्य भविष्य
  3. हेतुहेतुमद्भविष्य

सामान्य भविष्य
इससे यह प्रकट होता है कि क्रिया सामान्यतः भविष्य में होगी। जैसे-मैं पढूंगा; वह जाएगा।

संभाव्य भविष्य
जिससे भविष्य में किसी कार्य के होने की संभावना हो। जैसे-संभव है, रमेश कल आए।

हेतुहेतुमद्भविष्य
इसमें एक क्रिया का होना दूसरी क्रिया के होने पर निर्भर करता है। जैसे-वह आए तो मैं जाऊँ; वह कमाये तो खाए।

संरचना के आधार पर क्रिया के भेद

  • प्रेरणार्थक क्रिया
  • संयुक्त क्रिया
  • अनुकरणात्मक क्रिया
  • नामधातु क्रिया 
  • कृदंत क्रिया

प्रेरणार्थक क्रिया
जब कर्ता कार्य स्वयं न करके किसी अन्य को करने की प्रेरणा दे, यथा-
अभय ने उदय को जगाया। (उदय अभय की प्रेरणा से जागा) अर्थात्- अभय से उदय को जगवाया।
सरल भाषा में जब कर्ता स्वयं कार्य का संपादन न कर किसी दूसरे को करने के लिए प्रेरित करे या करवाए उसे प्रेरणार्थक क्रिया कहते हैं, जैसे
सरपंच ने गाँव में तालाब बनवाया। इसमें सरपंच ने स्वयं कार्य नहीं किया, बल्कि अन्य लोगों को प्रेरित कर उनसे तालाब का निर्माण करवाया, अतः यहाँ प्रेरणार्थक क्रिया है।

संयुक्त क्रिया
क्रिया जो किसी अन्य क्रिया अथवा संज्ञा आदि शब्दों के साथ दूसरी क्रिया का योग करने से बनती है; यथा- वह जाना चाहता है।

अनुकरणात्मक क्रिया
किसी वास्तविक या काल्पनिक ध्वनि के अनुकरण से निर्मित क्रियाः यथा सनसन से सनसनाना, थरथर से थरथराना 

नामधातु क्रिया
संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण से बनी क्रियाएँ- हाथ से हथियाना, बात से बतियाना।

कृदंत क्रिया
ऐसी क्रिया जो कृत-प्रत्ययों के संयोग से बनती है: हँसता, चलता, दौड़ता। प्रयोग के आधार पर क्रिया के प्रमुख रूप से पाँच (5) प्रकार (भेद) होते हैं, जो निम्नलिखित है
  1. सहायक क्रिया
  2. पूर्वकालिक क्रिया
  3. सजातीय क्रिया
  4. द्विकर्मक क्रिया
  5. विधि क्रिया

सहायक क्रिया
ऐसी क्रिया जो मुख्य क्रिया के संपादन में सहायता करती है, वह सहायक क्रिया कहलाती है। यह
मुख्य क्रिया के बाद आती है तथा उसी पर निर्भर होती है। जैसे
  • वह घर जा चुका था।
  • वे यह काम कर लेंगे।
  • यह बात मैं तुम्हें बता दूंगा।
इसी प्रकार पाना, चुकना, है, हैं, था, थी, थे. करना आदि आना सहायक क्रियाएँ हैं।

पूर्वकालिक क्रिया
जब कर्त्ता एक क्रिया को समाप्त करके तत्काल किसी दूसरी क्रिया को शुरू या आरंभ करता है तो इस स्थिति में पहली क्रिया को पूर्वकालिक क्रिया कहते हैं। सरल भाषा में जब किसी वाक्य में दो क्रियाएँ प्रयुक्त हुई हों तथा उनमें से एक क्रिया दूसरी क्रिया से पहले संपन्न हुई हो तो पहले संपन्न होनेवाली क्रिया पूर्वकालिक क्रिया कहलाती है।
इन क्रियाओं पर लिंग, वचन, पुरुष, काल आदि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ये अव्यय तथा क्रिया विशेषण के रूप में भी प्रयुक्त होती हैं।
मूल धातु में 'कर' लगाने से सामान्य क्रिया को पूर्वकालिक क्रिया का रूप दिया जा सकता है, जैसे-
  • बलवीर खेलकर पढ़ने बैठेगा।
  • वह पढ़कर सो गया।
  • वह खाकर सो गया।
  • मैं जागकर दफ्तर गया।
इन वाक्यों में खेलकर ('खेल' मूल धातु + कर) एवं पढ़कर (पढ़ मूल धातु + कर) पूर्वकालिक क्रिया कहलाएगी।
पूर्वकालिक क्रिया का एक रूप 'तात्कालिक क्रिया' भी है। इसमें एक क्रिया के समाप्त होते ही तत्काल दूसरी क्रिया घटित होती है तथा धातु + ते से इस क्रिया पद का निर्माण होता है, जैसे
  • पुलिस के आते ही चोर भाग गया।
  • इसमें 'आते ही' तात्कालिक क्रिया है।

सजातीय क्रिया
कुछ अकर्मक एवं सकर्मक क्रियाओं के साथ उनके धातु से बनी क्रिया जो भाववाचक संज्ञा के रूप में प्रयोग होती है वह सजातीय क्रिया कहलाती है।
जैसे-
  • वह अच्छा लेख लिख रहा है।
  • वह मन से पढ़ाई करता है।

द्विकर्मक क्रिया
क्रिया के दो कर्म होने की स्थिति को द्विकर्मक क्रिया कहते हैं।
जैसे
'मैं लड़के को विज्ञान पढ़ाता हूँ' में दो कर्म हैं- 'लड़के को' और 'विज्ञान'।

विधि क्रिया
ऐसी क्रिया जिसके द्वारा किसी प्रकार की आज्ञा का बोध होता हो, वैसी क्रिया विधि क्रिया कहलाती है।
जैसे
  • पढ़ाई करो।
  • स्कूल जाओ।

कृदन्त क्रिया

क्रिया शब्दों मे जुड़नेवाले प्रत्यय 'कृत' प्रत्यय कहलाते हैं तथा कृत प्रत्ययों के योग से बने शब्द कृदन्त कहलाते हैं। क्रिया शब्दों के अंत में प्रत्यय योग से बनी क्रिया कृदन्त क्रिया कहलाती है,
जैसे-

क्रिया

कृदन्त क्रिया

चल

चलना, चलता चलकर

लिख

लिखना, लिखता, लिखकर।


क्रिया के पक्ष (रूप)

सभी कालों और वाच्यों में क्रिया के विविध और व्यापक रूप हैं। यहाँ उनका विस्तार अपेक्षित नहीं। किंतु नमूने के तौर पर नीचे 'देखना' क्रिया से कर्मवाच्य के कुछ रूप तीनों कालों में दिये जा रहे हैं। विद्यार्थी इसी के आधार पर शेष रूप बनाने का अभ्यास करें-

पुरुष

लिंग

सामान्य वर्तमान

सामान्य भूत

सामान्य भविष्यत्

उत्तम

मैं

पुं०

स्त्री०

देखा जाता हूँ

देखी जाती हूँ

देखा गया

देखी गयी

देखा जाऊँगा

देखी जाऊँगी

मध्यम

तूं

पुं०

स्त्री०

देखा जाता है

देखी जाती है

देखा गया

देखी गयी

देखा जायेगा

देखी जायेगी

अन्य

वह

पुं०

स्त्री०

देखा जाता है

देखी जाती है

देखा गया

देखी गयी

देखा जायेगा

देखी जायेगी

उत्तम

हम

पुं०

स्त्री

देखे जाते हैं

देखी जाती हैं

देखे गये

देखी गयीं

देखे जायेंगे

देखी जायेंगी

मध्यम

तुम

पुं०

स्त्री

देखे जाते हो

देखी जाती हो

देखे गये

देखी गयी

देखे जाओगे

देखी जाओगी

अन्य

वे

पुं०

स्त्री

देखे जाते हैं

देखी जाती हैं

देखे गये

देखी गयी

देखे जायेंगे

देखी जायेगी


काल के अन्य भेदों के कुछ रूप (उदाहरण) नीचे दिए जा रहे हैं -
  • संदिग्ध वर्तमान - देखा जाता होगा, देखी जाती होगी, देखे जाते होंगे।
  • संभाव्य वर्तमान - देखा जाता हो, देखी जाती हो, देखे जाते हों।
  • आसन्नभूत - देखा गया है, देखी गयी हैं, देखे गये हैं।
  • पूर्णभूत - देखा गया था, देखी गयी थीं, देखे गये थे।
  • संभाव्यभूत - देखा गया हो, देखी गयी हों, देखे गये हों।
  • संदिग्धभूत - देखा गया होगा, देखी गयीं होंगी, देखे गये होंगे।
  • संभाव्य भविष्यत् - देखा जाऊँगा, देखी जाऊँगी, देखे जायेंगे।

क्रिया का पद-परिचय

क्रिया के पद-परिचय में क्रिया का प्रकार, वाच्य, पुरुष, लिंग, वचन, काल और वह शब्द जिससे क्रिया का संबंध है. इतनी बातें बतानी चाहिए।
  • उदाहरण - मैं जाता हूँ।
इसमें जाता हूँ' क्रिया है। इसका पदान्वय होगा
जाता हूँ-अकर्मक क्रिया, कर्तृवाच्य, सामान्य वर्तमान, उत्तमपुरुष, पुल्लिग, एकवचन, 'मैं' इसका कर्ता।

सारांश (Summary)

  • जिस शब्द से किसी काम का करना या होना समझा जाए, उसे 'क्रिया' कहते हैं। क्रिया विकारी शब्द है, जिसके रूप लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार बदलते हैं।
  • क्रिया का मूल 'धातु' है। 'धातु' क्रियापद के उस अंश को कहते हैं, जो किसी क्रिया के प्रायः सभी रूपों में पाया जाता है।
  • व्युत्पत्ति अथवा शब्द- निर्माण की दृष्टि से धातु दो प्रकार की होती है- (1) मूल धातु, और यौगिक धातु। मूल धातु स्वतंत्र होती है। यह किसी दूसरे शब्द पर आश्रित नहीं होती। यौगिक धातु किसी प्रत्यय के योग से बनती है।
  • क्रिया के उस परिवर्तन को 'वाच्य' कहते हैं, जिसके द्वारा इस बात का बोध होता है कि वाक्य के अंतर्गत कर्ता, कर्म अथवा भाव-इनमें से किसकी प्रधानता है; इनमें किसके अनुसार क्रिया के पुरुष, वचन आदि आए हैं।
  • क्रिया के उस रूपान्तर को 'काल' कहते हैं, जिससे उसके कार्य-व्यापार का समय और उसकी पूर्ण अथवा अपूर्ण अवस्था का बोध हो। काल के तीन भेद हैं- (1 )वर्तमानकाल, (2) भूतकाल, और (3) भविष्यत्काल
  • वाक्य में क्रिया के लिंग, वचन तथा पुरुष का अध्ययन 'प्रयोग' कहलाता है। ऐसा देखा जाता है कि वाक्य
  • की क्रिया का लिंग, वचन एवं पुरुष कभी कर्ता के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार होता है, तो कभी कर्म के लिंग-वचन-पुरुष के अनुसार, लेकिन कभी-कभी वाक्य की क्रिया कर्ता तथा कर्म के अनुसार न होकर एकवचन, पुल्लिग तथा अन्यपुरुष होती है; ये ही प्रयोग है। 'प्रयोग' तीन प्रकार के होते हैं - (1) कर्तरि प्रयोग, (2) कर्मणि प्रयोग, (3) भावे प्रयोग।

शब्दकोश (Keywords)
  • काल - समय
  • निष्पन्न - भलीभाँति पूरा किया हुआ
  • भूतकाल - बीता हुआ समय
kriya-kise-kahate-hain

क्रिया से संबंधित प्रश्न उत्तर

1. निमन में से सकर्मक क्रिया है?
  • (अ) हाथी सो रहा था
  • (ब) वह छत पर है
  • (स) हाथी नहाता है
  • (द) राम कार चलाता है
(द) राम कार चलाता है

2. निम्नलिखित में प्रेरणार्थक क्रिया है ?
  • (अ) वह सीता से पत्र लिखवाती है
  • (ब) तोता उड़ता है
  • (स) बच्चा सोता है
  • (द) खेल खेलता है
(अ) वह सीता से पत्र लिखवाती है

3. अकर्मक वाक्य कौन सा है ?
  • (अ) बंदर केला खाता है
  • (ब) सीता ढोलक बजाती थी
  • (स) ताजमहल आगरा में बना है
  • (द) खुशबू पत्र लिख दी थी
(स) ताजमहल आगरा में बना है

4. निम्नलिखित में से पूर्व कालिक वाक्य है?
  • (अ) राम गाना गाता है
  • (ब) रमेश पढ़ाई करता है
  • (स) सीता खाना खाती है
  • (द) मोहन नहाकर चला गया
(द) मोहन नहाकर चला गया

5. रमेश कल दिल्ली जाएगा इस वाक्य में कल शब्द है?
  • (अ) संज्ञा
  • (ब) क्रिया विशेषण
  • (स) संज्ञा विशेषण
  • (द) कर्म
(ब) क्रिया विशेषण

6. अकर्मक क्रिया है?
  • (अ) खाना
  • (ब) उठना
  • (स) पीना
  • (द) लिखना
(ब) उठना

7. सकर्मक क्रिया कौन सी है?
  • (अ) हरीश बस पर चढ़ गया
  • (ब) राजू सदा रोता रहता है
  • (स) केला छत से गिर पड़ा
  • (द) सतीश ने केले खरीदे
(द) सतीश ने केले खरीदे

8. वह आसमान में उड़ता है निम्न में कौन सी क्रिया है ?
  • (अ) अकर्मक क्रिया
  • (ब) सकर्मक क्रिया
  • (स) प्रेरणार्थक क्रिया
  • (द) पूर्वकालिक क्रिया
(अ) अकर्मक क्रिया

9. चिड़िया आकाश में उड़ रही है इसमें क्रिया है?
  • (अ) अकर्मक
  • (ब) सकर्मक
  • (स) समाप्ति
  • (द) समापिक
(अ) अकर्मक

10. निम्नलिखित में पूर्वकालिक क्रिया?
  • (अ) भयंकर
  • (ब) उभर कर
  • (स) करती हुई
  • (द) के रूप में
(ब) उभर कर

11. द्विर्कमक क्रिया में होता हैं
  • (अ) प्रथय कर्म अप्राणी होता है द्वितीय कर्म प्राणीविची होता हैं
  • (ब) प्रथम कर्म प्राणी वाची होता है और द्वितीय कर्म अप्राणीवाची होता है
  • (स) प्रथम एवं द्वितीय कर्म अप्राणीवाची होता है
  • (द) कोई नहीं
(ब) प्रथम कर्म प्राणी वाची होता है और द्वितीय कर्म अप्राणीवाची होता है

12. सकर्मक क्रिया वाला. वाक्य. छाटिएँ
  • (अ) राजू सदा रोता रहताहै
  • (ब) हरीश. बस.पर. चढध.गया
  • (स) कैलाश छत से गिर पड़ा
  • (द) सतीश ने केले खरीदे
(द) सतीश ने केले खरीदे

13. किस वाक्य में सकर्मक क्रिया नहीं है
  • (अ) बच्चे फिल्म देख रहे है
  • (ब) रजत दूध पी रहा है
  • (स) मनीषा ने कार खरीदी
  • (द) मोर नाचता हैं
(द) मोर नाचता हैं

14. किस वाक्य में अकर्मक क्रिया है
  • (अ) ठूँठ खड़ा है
  • (ब) रजत दूध पी रहा है
  • (स) हम.सिनेमा देखते हैं
  • (द) रजनी ने गाना गाया
(अ) ठूँठ खड़ा है

15. लोग रामायण पढते हैं मे कौन सी क्रिया हैं
  • (अ) सकर्मक
  • (ब) अकर्मक
  • (स) प्रेरणार्थक
  • (द) कोई नहीं
(अ) सकर्मक

16. कमला ने शांति को पुस्तक दी मै कौन सी क्रिया हैं?
  • (अ) अकर्मक क्रिया
  • (ब) द्विकर्मक क्रिया
  • (स) संयुक्त क्रिया
  • (द) कोई नहीं
(ब) द्विकर्मक क्रिया

17. कर्म के आधार पर क्रिया के कितने भेद होते है
  • (अ) 1
  • (ब) 2
  • (स) 3
  • (द) 4
(ब) 2

18. रचना के आधार पर क्रिया के कितने भेद होते है?
  • (अ) 5
  • (ब) 4
  • (स) 6
  • (द) 7
(द) 7


19. मां ने चिट्ठी लिखवाई? में कौन सी क्रिया है
  • (अ) पूर्वकालिक
  • (ब) प्रेरणार्थक
  • (स) सहायक
  • (द) संयुक्त
(ब) प्रेरणार्थक

20. हमें किसी का दिल नहीं दुखाना चाहिए दुखाना शब्द में कौन सी क्रिया है ?
  • (अ) नाम धातु
  • (ब) प्रेरणार्थक
  • (स) सहायक
  • (द) संयुक्त
(अ) नाम धातु

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