राजस्थान का एकीकरण PDF Download | rajasthan ka ekikaran pdf

राजस्थान का एकीकरण PDF

राजस्थान से हमारा आशय भूतपूर्व देशी रियासतों के विलय के फलस्वरूप गठित भारतीय गणतंत्र के उस राज्य या प्रदेश से है, जो संप्रति इस नाम से अभिहित किया जाता है। तथा जो स्वतंत्रता पूर्व जार्ज टॉमस द्वारा प्रयुक्त शब्द 'राजपूताना' नाम से जाना जाता था। इन देशी रियासतों या रजवाड़ों का सामूहिक रूप से बोध कराने के लिये "राजस्थान" शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग कर्नल जेम्स टॉड ने किया था। फलतः सन 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् जब राजपूताना की देशी रियासतों के विलय के फलस्वरूप इस प्रदेश का पुनर्गठन हुआ तो इस राज्य का कर्नल टॉड द्वारा प्रयुक्त "राजस्थान' नाम ही स्वीकार किया गया। rajasthan ka ekikaran pdf
जहाँ तक एकीकरण का प्रश्न है तो देश की स्वतंत्रता के समय भारत में 56246 छोटी-बड़ी देशी रियासतें थी। जिन्हे येन-केन प्रकरण ब्रिटिश भारत के साथ-मिलाकर भारत संघ का निर्माण किया गया। राजस्थान में इस समय 19 रियासतें, 3 ठिकानें तथा एक केन्द्र शासित प्रदेश था। इन सभी रियासतों को विभिन्न चरणों में एकत्रित करते हुये 30 मार्च 1949 को सरदार पटेल ने उद्घाटन किया,
इसका नाम जैसा कि हमने पूर्व में बताया राजस्थान रखा गया तथा राजस्थान को भारतीय संघ के एक राज्य के रूप में मान्यता प्रदान की गई। इस प्रकार सदियों से बिखरी हुई इन छोटी-बड़ी रियासतों को एकीकरण के माध्यम से एक भौगोलिक व राजनीतिक पहचान मिली।
प्रदेश या राज्य के अर्थ में 'राजस्थान' शब्द का प्रयोग कर्नल टॉड के द्वारा ही किया गया था तथापि एक भिन्न अर्थ में राजस्थान शब्द का प्रयोग हमें कर्नल टॉड से भी पहले मिलता है। वस्तुतः मध्ययुगीन राजस्थानी साहित्य एवं ऐतिहासिक ग्रन्थों में ‘राजस्थान' सहित इसके अपभ्रंश रूपों 'राजसथान, 'राजथान, राजस्थाण' आदि का जगह-जगह प्रयोग हुआ है, जो किसी राज्य या प्रदेश विशेष का वाचक न होकर राजधानी के अर्थ में व्यवह्त हुआ है। उदाहरणत :

"उठे खीचीयां रा गांव अर राजस भूम खरलां री।
सो खरलां रो राजथांन बांवरी-बांवरे।"

"इतरे गोहिलां पिण आलोज कियौ जो पुंवारा का लिया।
लुदखे राजस्थान बांध्यो।

"रावलजी श्री देवराजजी नव कोट पुंवारां का लिया।
लुदखे राजस्थान बांध्यों।

उपर्युक्त उद्धरणों में "राजस्थान' शब्द 'राजधानी' के अर्थ में ही प्रयुक्त हुआ है। परन्तु 'राजपूताने' के भूतपूर्व राजवाड़ों के लिये सामूहिक रूप से बोधक एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र या पृथक राजनैतिक इकाई के रूप में इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम कर्नल टॉड ने ही किया जो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इस पुनर्गठित राज्य के लिए स्वीकार कर लिया गया। हमने इसे यहां इसी अर्थ में ग्रहण किया है।
यहां प्रसंगतः राजस्थान के प्रचीन इतिहास की चर्चा कर देना भी समीचीन होगा। यदि राजस्थान के प्राचीन इतिहास पर दृष्टि निक्षेप करें तो विदित होगा कि प्रस्तुत नामकरण से पूर्व राजस्थान प्रदेश के विविध भू–भाग विभिन्न नामों से जाने जाते थे तथा समय-समय पर यहाँ विभिन्न राजवंशों का शासन रहा। उदाहरणतः राजस्थान के सैकत भू–भाग, जिसके अन्तर्गत मारवाड़ तथा थार रेगिस्तान का भू-क्षेत्र (जैसलमेर, बीकानेर, बाडमेर, आदि जिले) सम्मिलित था, के लिये मरू या मरूदेश का उल्लेख हमें ऋग्वेद महाभारत' वृहतसंहिता इत्यादि प्राचीन ग्रंथों तथा रूद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख तथा पाल अभिलेखों में मिलता है। आगे चलकर मरूदेश केवल मारवाड़ आदि के रेतीले भू–भाग का ही वाचक न रहकर अधिक व्यापक अर्थ में प्रयुक्त होने लगा, जैसा कि यहां की भाषा डिंगल या मारवाड़ी के लिये व्यवह्त शब्दों - मरुभाषा, मरूभूम-भाषा, मरूबानी आदि से प्रकट है जैसे
मुरभुर- भाषा तणों मारग आछी रीत तूं।
मुरधर भाषा जिस निमंत, किसने रूपग किद्ध।
डिंगल अपनामक कहुंक, मरूबारी हु विधेय,
वस्तुत
यह मरूभाषा किंचित स्थानीय परिवर्तनों के साथ समूचे राजस्थान प्रदेश की भाषा थी। मरूभाषा का सर्वप्रथम उल्लेख 8-9 वीं शताब्दी में उद्योतन सूरी रचित, कुवलयमाला में मिला है:

अप्पा-तुप्पा मणि रे अह पेच्छर मारूए तत्तों
तात्पर्य यह कि 12 वीं शताब्दी तक आते-शोर 'मरूदेश' संज्ञा अधिक व्यापक क्षेत्र के लिये प्रयुक्त होने लगी थी।"
17वीं शताब्दी के लगभग लिखित 'शक्ति संगम तंत्र' के षटपंचाशदेश विभाग में जिन अनेक देशों की सूची गिनाई गई है, उनमें मरूदेश भी एक है जिसका ग्रंथ रचयिता ने 'रोचक' वर्णन किया है

गुर्जरात्पर्व भागे त टूरकातो हि दक्षिणे।
मरूदेशों महेशानि उष्ट्रोत्पत्ति मरायणः ।।

मरू के बाद जांगल क्षेत्र का नाम आता है। वानस्पतिक दृष्टि से जांगल का अर्थ वह भू–भाग है जहाँ साधारणतः आकाश साफ रहता हो जन और वनस्पति का अभाव हो तथा वृक्षों में शमी (खेजड़ी) कैर, पीलू और कंटकुंड (करील) का आधिक्य हो।

महाभारत में प्रयुक्त 'कुरू-जांगल' एवं मद्र जांगल के उल्लेख से प्रतीत होता है कि जांगल के अंतर्गत केवल राजस्थान का उत्तरार्द्ध भाग ही नहीं बल्कि पंजाब का दक्षिण पूर्वी भाग भी सम्मिलित था। मूलतः जांगल क्षेत्र जिसमें हर्ष, नागौर व सांभर सम्मिलित थे, के अधीश्वर होने के कारण शाकम्भरी और अजमेर के चौहान नरेश को प्रायः 'जागलेश' भी कहा जाता था। तथा इसी जांगल क्षेत्र के अधिपति होने के कारण ही आगे चलकर बीकानेर के राजा 'जंगलधरपातिशाह' कहलाये।" इसी जांगल क्षेत्र में 'जांगल-कूप' (जांगल) भी था। जहां श्रावक लिल्हन द्वारा भगवान शांन्तिनाथ की प्रतिमा प्रतिष्ठापित कराये जाने का वि.सं. 1176 का अभिलेख मिलता है, जो अब बीकानेर में सुरक्षित है।2 राजस्थानी इतिहास व साहित्य-ग्रंथों में जांगल का प्रचुर उल्लेख हुआ है जैसे

सांखलो खींवसी चरू सुकाल, जांगल राज कैरे।
राजस्थान का पूर्वी भाग(जयपुर, अलवर, भरपुर का कुछ भाग) मत्स्य कहलाता
था। जिसका "शक्तिसंगमतंत्र" में इस प्रकार उल्लेख हुआ है

पुलिन्दादुत्तरे, भागे कच्छाच्छ पश्चिमें शिवे।
मत्स्य देश, समाख्यातः मत्स्य बाहुल्य कारकः ।।

इसका सर्वप्रथम उल्लेख हमें ऋग्वेद में मिलता है। जहां मत्स्य निवासियों को सुदास का शत्रु कहा गया है। महाभारत में मत्स्य राज्य की राजधानी विराटनगर (आधुनिक बैराठ) तथा मत्स्य राजा का पाण्डवों का प्रबल पक्षधर होने का उल्लेख मिलता है। साथ ही उसमें मत्स्य वासियों की सत्यवादिता की भी प्रशंसा की गई है। अंगुत्तरनिकाय में उनकी शूरसेन प्रदेशवासियों के साथ गणना की गई है। इससे पता चलता है कि मत्स्य प्रदेश के अन्तर्गत जयपुर, अलवर तथा भरतपुर का भाग सम्मिलित था।

मत्स्यवासियों से ही अभिन्नत
सम्बद्ध साल्व वासी थे। प्रसिद्ध पुरातत्वेत्ता कनिंघम का मत है कि साल्व जनपद की राजधानी 'साल्वपुर ही वर्तमान अलवर है।

शूरसेन जनपद के अन्तर्गत मथुरा सहित अलवर, भरतपुर, धौलपुर तथा करौली का सीमावर्ती क्षेत्र सम्मिलित था। रणथम्भौर के प्रसिद्ध चौहान शासक राव हम्मीर का मंत्री रणमल्ल शूरवंशीय क्षत्रिय ही था। अपभ्रंश की एक हस्तप्रति में उपलब्ध वंशावली से पता चलता है कि शूरसेन, जनपद या इसका अधिकांश भाग 'भादानक' अथवा' 'भानय' के नाम से जाना जाता था। जिसका विकृत ही वर्तमान' बयाना है।

इसी प्रकार राजस्थान का दक्षिण-पूर्वी भू–भाग शिवि, दक्षिण का मेदपाट (मेवाड़) बागड़ (डूंगरपुर) प्राग्वाट, मालव और गुर्जरत्रा तथा पश्चिम का माड, माडबल्ल आदि नामों से जाने जाते थे।

शिवि जनपद चितौड़ का समीपवर्ती क्षेत्र था चितौड़ से 7 मील उत्तर-पूर्व में स्थित नगरी नामक गांव से उपलब्ध मुद्राओं पर उत्कीर्ण "माज्झिममिकया शिवि जनपदस्य” से इसकी पुष्टि होती है। मालव भी मध्यप्रदेश के मालवा भू–भाग में बसने से पहले काफी समय तक राजस्थान में रहे थे। रेड़ में खुदाई से मिली वस्तुओं पर उत्कीर्ण 'मालव जनपदस्य' से यह असंदिग्ध रूप से सिद्ध है कि 'मालव-जनपद' भी राजस्थान के इसी क्षेत्र के अन्तर्गत था। गुर्जर अथवा 'गुर्जरत्रा' नाम से अभिहित क्षेत्र में राजस्थान का दक्षिण-पश्चिमी भू–भाग (सिवाणा, जालौर) आता था जिसकी प्राचीन राजधानी, भीनमाल थी। जैसा कि प्रसिद्ध चीनी यात्री हवेन्सांग के उल्लेख से संकेत मिलता है। 8वीं शताब्दी (778ई0) में उद्योतन सूरि द्वारा रचित कुवलयाला में भी गुर्जरदेस तथा भिल्लमाल का उल्लेख हुआ है। मेदपाट, मेवाड़ का ही पुराना नाम है। मेवाड़ के गुहिल वंश की स्थापना से पहले यहां कदाचित "मेदों" या "मेरो' का शासन था। इसलिये इसका प्राचीन नाम मेदपाट था। मेदपाट को ही 'प्राग्वाट' भी कहा जाता था, जैसा कि जयसिंह कलचुरि के अभिलेखों में मेवाड़ के राजाओं को प्राग्वाट नरेश लिखा होने से ज्ञात होता है।

माड' नाम जैसलमेर के लिए आज भी प्रचलित है, जिससे सम्बद्ध ‘माड' राग राजस्थान में अतिशय लोकप्रिय है। अन्य क्षेत्रीय नामों में वल्लमण्डल, अनन्त गोचर आदि भी उपलब्ध होते है। घटियाला अभिलेख में कवक्क के त्रवणी वल्ल का माड में विख्यात हो जाने का उल्लेख है, जिससे अनुमान किया जा सकता है कि वल्ल 'माड' का कोई समीपवर्ती ही भूक्षेत्र था। "बागड़ राजस्थान में दो भूक्षेत्रों का वाचक रहा हैवर्तमान डूंगरपुर, बाँसवाड़ा क्षेत्र का तथा नरहड़ पिलानी भादरा, नोहर, एवं कनाणा आदि भू-भाग का, जिसे जिनपाल संकलित खतरगच्छ पट्टावली में बागड़ के नाम से बहुशः अभिहित किया गया है।

चौहान नरेशों के राज्य शाकम्भरी एवं अजमेर को 'जांगल' के साथ-साथ सपादलक्ष भी कहा जाता था। आगे चलकर 'सपादलक्ष' शब्द चौहान अधिकृत क्षेत्र से इतर भू–भाग के लिए प्रयुक्त होने लगा जिसमें जांगल शेखावाटी से रणथम्भौर तक का भू–भाग, कोटा का कुछ भाग, मेवाड़ का माँडलगढ़ दुर्ग तथा बूंदी, अजमेर एवं किशनगढ़ का पश्चिमी भाग सम्मिलित था।" इसी प्रकार नाडौल के चौहानों का राज्य 'सप्तशत' के नाम से जाना जाता था। इसी भाँति राजस्थान के विविध भू–भागों के लिए और भी अनेक नाम समय-समय पर प्रचलित रहें हैं, जो उस पर शासन करने वाले शासक वंश में हुए परिवर्तन के साथ या अन्य कारणों से परिवर्तित होते रहे हैं। इन नामों के साथ राजस्थान के अनेक छोटे-बड़े राजवंशों के उत्थान-पतन और उदय-पराभव का इतिहास जुड़ा हुआ है। कई नाम ऐसे भी है, जो काल के प्रभाव से मुक्त रह किसी प्रकार बचे रह गये हैं और आज भी लोक-व्यवहार में अतिशय प्रचलित है।

राजस्थान की उपर्युक्त ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में वर्तमान पुनर्गठित राजस्थान राज्य का मानचित्र देखने पर हम निश्चय ही गर्वित हुए बिना नहीं रह सकते। कारण जैसा कि हम देख आए है, वैसे तो इस प्रदेश के विविध भू–भागों पर समय-समय पर विभिन्न राजवंशों का शासन रहा है। तथापि इस समूचे प्रदेश पर किसी एक सत्ता का एकछत्र प्रभुत्व कभी नहीं रहा। दूसरे शब्दों में एक राजनीतिक इकाई अथवा एकीकृत, विशाल राज्य के रूप में इन भूतपूर्व रजवाड़ों का जैसा पुनर्गठन स्वातन्त्र्योत्तर भारत में हुआ है, वैसा पहले कभी नहीं हुआ। जैसा कि डॉ0 दशरथ शर्मा ने कहाँ है

जनमानस एवं जनचेनता
19 वीं शताब्दी का राजपूताना छोटी-छोटी इकाईयों में बंटा हुआ त्रि-पक्षीय दमन और अत्याचार को सहता हुआ प्रदेश था। जिसमें सामान्य जनता, परम्परागत रूढ़िवादी समाज, अप्रत्यक्ष औपनिवेशिकता, निरकुंश राजतंत्र शाही, बेलगाम जागीरदारी व्यवस्था, चरमराती अर्थव्यवस्था, उद्योगधंधों का पतन, करों का बोझ तथा अशिक्षा जैसी अनगिनत समस्याओं से जूझ रही थी। ऐसे में कोई उनका मार्गदर्शक या पथदर्शक नहीं था। सामान्य जन के दृष्टिकोण से देखा जाये तो यह युग राजनीतिक जीवन के क्षेत्र मे घोर निराशा का युग था। रियासतों में किसी भी प्रकार के सुधार विषयक प्रयासों को विद्रोह के रूप में देखा जाता था। सामान्य जन का किसी भी प्रकार का कोई सामूहिक या सार्वजनिक जीवन नहीं था। राजनीतिक संस्थाएं व सभाएं नहीं थीं। अखबार भी नहीं निकलते थे। प्रजा के अधिकार व कर्त्तव्य, राज्य के शासन सुधार और देश की राजनीती में जनता की सहभागिता का जहां तक सम्बन्ध है। रियासतों में ये सब कल्पनातीत थे। इस प्रकार समस्त 19वीं शताब्दी में राजपूताना एक सामंती प्रदेश बना रहा जिसके तीन स्वामी अंग्रेज रियासती शासक और जागीरदार थे। रियासतों के भाग्य विधाता अंग्रेज थे तथा जनता के भाग्य विधाता रियासत नरेश व जागीरदार थे। इन तीनों शक्तियों ने अपने अपने हितों के वशीभूत होकर ऐसी स्थितियां बनाएं रखने के अथक प्रयास किये जिससे रियासती प्रजा के अन्तर्मन में चेतना का संचार न हो सकें। यही कारण था की 19वीं शताब्दी में जहां ब्रिटिश भारत में पुनर्जागरण के अन्तर्गत नवचेतना उत्पन्न हुई उससे राजपूताना की रियासतें पूर्णतया अप्रभावित रही। न यहां अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई न संचार व्यवस्था और न ही शिक्षा के क्षेत्र में कोई प्रभाव उत्पन्न हुआ, यहां तक कि संचार व्यवस्था और प्रेस पर नियंत्रण के द्वारा ब्रिटिश भारत के समाचार पत्रों को भी नियमित रूप से रियासतों में उपलब्ध नहीं होने दिया गया।"

इस प्रकार राजस्थान की रियासतों में जन-जागरण एंव चेतना का स्पष्ट, सामूहिक संगठित स्वरूप एवं प्रभाव 20वीं शताब्दी में ही देखने को मिला। इस नवजागरण के पीछे 19वीं शताब्दी के सामाजिक सुधार अंग्रेजी शिक्षा एवं समाचार पत्रों का योगदान, प्रवासी व्यापारी वर्ग की भूमिका, ब्रिटिश भारत की गतिविधियां तथा कांग्रेस जैसी संस्थाओं के योगदान के साथ-साथ आर्थिक कारणों को भी गिना जा सकता है। 20वीं सदी में एक के बाद एक उभरने वाले कृषक आंदोलन, आदिवासी आंदोलन तथा प्रजामण्डल आदोलन, रियासती जन मानस में लम्बे समय से पनप रहे असंतोष का परिणाम थे। रियासतों में जन आंदोलनों का संचालन करने वाले तील तत्व थे और तीनों ही अनुयायी सामान्य जन का अवतार थे। इसने कृषक, आदिवासी तथा शहरी मध्यम वर्ग सम्मिलित था।
जहा तक जनमानस एवं जनचेतना, शब्दों की अवधारणात्मक व्याख्या का प्रश्न है। जनमानस शब्द, जन+मान दो शब्दों से मिलकर बना है। जिसका अर्थ है सर्वसाधारण जनता अथवा समूह के अन्तर्मन अर्थात हृदय के संकल्प विकल्प' या मन-मस्तिष्क में पलने वाली अकांक्षाएं इसी प्रकार जन-चेतना शब्द भी जन+चेतना शब्दों से मिलकर बना है जिसका अर्थ है। लोक जन, अथवा समूह की ज्ञानात्मक मनोवृत्ति 80 अर्थात अपने चारों ओर की घटनाओं और वातावरण के विषय में सजग व सचेत रहना।

अतः हम कह सकते है कि राजपूताना की रियासती प्रजा में अपने चारों ओर घटित घटनाओं की प्रतिक्रिया स्वरूप कुछ उद्देश्य व संकल्प घर करने लगे। उनमें जागरण के कारण धीरे-धीरे अंसतोष तथा विद्रोह की भावनाएं पनपने लगी। अपनी स्थिति को लेकर राजनीतिक व्यवस्था के विरूद्ध मन-मस्तिष्क में प्रश्न दौड़ने लगे, सामान्य जन की इसी मनोवृत्ति के फलस्वरूप राजपूताना में एक के बाद एक विद्रोह, प्रदर्शन, धरने, जूलूस व राजनीतिक जन-जागरण से परिपूर्ण घटनाएं जन्म लेने लगी। किसी भी स्थान पर जन आंदोलन तभी प्रारम्भ हो सकते हैं जब वहां की जनता स्वयं तैयार हो। और अब रियासत की जनता तैयार थी। आम जन में राजनीतिक घटनाओं के प्रति सजगता, जिज्ञासा, असंतोष, न्याय-अन्याय का भान व्यवस्था परिवर्तन की इच्छा, अधिकारों के लिए संघर्ष इत्यादि विशेषताएं देखने को मिली जो हमें इससे पूर्व राजपूताना के आम जन में दृष्टव्य नहीं हुई। 20 वीं शताब्दी की राजपूताना की रियासती जनता की इसी विशेषता को हम जनमानस की जनचेतना का नाम दे सकते है। 

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