संज्ञा किसे कहते हैं - संज्ञा की परिभाषा, भेद, उदाहरण | sangya kise kahate hain

संज्ञा किसे कहते हैं

'संज्ञा' उस विकारी शब्द को कहते हैं, जिससे किसी विशेष वस्तु, भाव और जीव के नाम का बोध हो। यहाँ 'वस्तु' शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में हुआ है, जो केवल वाणी और पदार्थ का वाचक नहीं, वरन उनके धर्मों का भी सूचक है।
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साधारण अर्थ में 'वस्तु' का प्रयोग इस अर्थ में नहीं होता। अतः, वस्तु के अंतर्गत प्राणी, पदार्थ और धर्म आते हैं। इन्हीं के आधार पर संज्ञा के भेद किये गये हैं।

संज्ञा के भेद

संज्ञा के भेदों के संबंध में व्याकरण एकमत नहीं हैं। पर अधिकतर व्याकरण संज्ञा के पाँच भेद मानते हैं-
  • जातिवाचक
  • व्यक्तिवाचक
  • गुणवाचक
  • भाववाचक
  • द्रव्यवाचक
ये भेद अंग्रेजी के आधार पर हैं; कुछ रूप के अनुसार और कुछ प्रयोग के अनुसार। संस्कृत व्याकरण में 'प्रातिपदिक' नामक शब्दभेद के अंतर्गत संज्ञा, सर्वनाम, गुणवाचक (विशेषण) आदि आते हैं, क्योंकि वहाँ इन तीन शब्दभेदों का रूपांतर प्रायः एक ही जैसे प्रत्ययों के प्रयोग से होता है। किंतु, हिंदी व्याकरण में सभी तरह की संज्ञाओं को दो भागों में बाँटा गया है-
एक, वस्तु की दृष्टि से और दूसरा, धर्म की दृष्टि से-
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इस प्रकार, हिंदी व्याकरण में संज्ञा के मुख्यतः पाँच भेद हैं-
(1) व्यक्तिवाचक, (2) जातिवाचक, (3) भाववाचक, (4) समूहवाचक और (5) द्रव्यवाचक।
पं. गुरु के अनुसार, “समूहवाचक का समावेश व्यक्तिवाचक तथा जातिवाचक में और द्रव्यवाचक का समावेश जातिवाचक में हो जाता है।"

व्यक्तिवाचक संज्ञा

जिस शब्द से किसी एक वस्तु या व्यक्ति का बोध हो, उसे 'व्यक्तिवाचक संज्ञा' कहते हैं। जैसे-राम, गाँधीजी, गंगा, काशी इत्यादि। 'राम', 'गाँधीजी' कहने से एक-एक व्यक्ति का 'गंगा' कहने से एक नदी का और 'काशी' कहने से एक नगर का बोध होता है। व्यक्तिवाचक संज्ञाएँ जातिवाचक संज्ञाओं की तुलना में कम हैं। दीमशित्स के अनुसार व्यक्तिवाचक संज्ञाएँ निम्नलिखित रूपों में होती हैं-
  • व्यक्तियों के नाम - श्याम, हरि, सुरेश।
  • दिशाओं के नाम - उत्तर, पश्चिम, दक्षिण, पूर्व।
  • देशों के नाम - भारत, जापान, अमेरिका, पाकिस्तान, बर्मा।
  • राष्ट्रीय जातियों के नाम - भारतीय, रूसी, अमेरिकी।
  • समुद्रों के नाम - काला सागर, भूमध्य सागर, हिंद महासागर, प्रशांत महासागर।
  • नदियों के नाम - गंगा, ब्रह्मपुत्र, वोल्गा, कृष्णा, कावेरी, सिंधु।
  • पर्वतों के नाम - हिमालय, विंध्याचल, अलकनंदा, कराकोरम।
  • नगरों, चौकों और सड़कों के नाम - वाराणसी, गया, चाँदनी चौक, हरिसन रोड, अशोक मार्ग।
  • पुस्तकों तथा समाचारपत्रों के नाम - रामचरितमानस, ऋग्वेद, धर्मयुग, इण्डियन नेशन, आर्यावर्त।
  • ऐतिहासिक युद्धों और घटनाओं के नाम - पानीपत की पहली लड़ाई, सिपाही-विद्रोह, अक्टूबर-क्रांति।
  • दिनों व महीनों के नाम - मई, अक्टूबर, जुलाई, सोमवार, मंगलवार।
  • त्योहारों व उत्सवों के नाम - होली, दीवाली, रक्षाबंधन, विजयादशमी।

जातिवाचक संज्ञा

जिन संज्ञाओं से एक ही प्रकार की वस्तुओं अथवा व्यक्तियों का बोध हो, उन्हें “जातिवाचक संज्ञा' कहते हैं। जैसे-मनुष्य, घर, पहाड़, नदी इत्यादि। 'मनुष्य' कहने से संसार की मनुष्य-जाति का, 'घर' कहने से सभी तरह के घरों का, 'पहाड़' कहने से संसार के सभी पहाड़ों का और 'नदी' कहने से सभी प्रकार की नदियों का जातिगत बोध होता है।
जातिवाचक संज्ञाएँ निम्नलिखित स्थितियों की होती हैं-
  • संबंधियों, व्यवसायों, पदों और कार्यों के नाम - बहन, मंत्री, जुलाहा, प्रोफेसर, ठग।
  • पशु-पक्षियों के नाम - घोड़ा, गाय, कौआ, तोता, मैना।
  • वस्तुओं के नाम - मकान, कुर्सी, घड़ी, पुस्तक, कलम, टेबल।
  • प्राकृतिक तत्वों के नाम - तूफान, बिजली, वर्षा, भूकंप, ज्वालामुखी।

भाववाचक संज्ञा

जिस संज्ञा-शब्द से व्यक्ति या वस्तु के गुण या धर्म, दशा अथवा व्यापार का बोध होता है, उसे 'भाववाचक संज्ञा' कहते हैं। जैसे-लंबाई, बुढ़ापा, नम्रता, मिठास, समझ, चाल इत्यादि। हर पदार्थ का धर्म होता है। पानी में शीतलता, आग में गर्मी, मनुष्य में देवत्व और पशुत्व इत्यादि का होना आवश्यक है। पदार्थ का गुण या धर्म पदार्थ से अलग नहीं रह सकता। घोड़ा है, तो उसमें बल है, वेग है और आकार भी है। व्यक्तिवाचक संज्ञा की तरह भाववाचक संज्ञा से भी किसी एक ही भाव का बोध होता है। ‘धर्म गुण, अर्थ' और 'भाव' प्रायः पर्यायवाची शब्द हैं। इस संज्ञा का अनुभव हमारी इंद्रियों को होता है और प्रायः इसका बहुवचन नहीं होता।

भाववाचक संज्ञाओं का निर्माण
भाववाचक संज्ञाओं का निर्माण जातिवाचक संज्ञा, विशेषण, क्रिया. सर्वनाम और अव्यय में प्रत्यय लगाकर होता है।
उदाहरणार्थ-

जातिवाचक संज्ञा से भाववाचक
  • बूढा-बुढ़ापा
  • लड़का-लड़कपन
  • मित्र-मित्रता
  • दास-दासत्व
  • पंडित-पंडिताई

विशेषण से भाववाचक
  • गर्म-गर्मी
  • सर्द-सर्दी
  • कठोर-कठोरता
  • मीठा-मिठास
  • चतुर-चतुराई

क्रिया से भाववाचक
  • घबराना-घबराहट
  • सजाना-सजावट
  • चढ़ना-चढ़ाई
  • बहना-बहाव
  • मारना-मार
  • दौड़ना-दौड़

सर्वनाम से भाववाचक
  • अपना- अपनापन, अपनाव
  • मम-ममता, ममत्व
  • निज-निजत्व

अव्यय से भाववाचक
  • दूर- दूरी
  • परस्पर-पारस्पर्य
  • समीप-सामीप्य
  • निकट-नैकट्य
  • शाबाश-शाबाशी
  • वाहवाह-वाहवाही
भाववाचक संज्ञा में जिन शब्दों का प्रयोग होता है, उनके धर्म में या तो गुण होगा या अवस्था या व्यापार।

समूहवाचक संज्ञा

जिस संज्ञा से वस्तु अथवा व्यक्ति के समूह का बोध हो, उसे 'समूहवाचक संज्ञा' कहते हैं। जैसे-व्यक्तियों का समूह-सभा, दल, गिरोह; वस्तुओं का समूह-गुच्छा, कुंज, मंडल घौद इत्यादि।

द्रव्यवाचक संज्ञा

जिस संज्ञा से नाप-तौल वाली वस्तु का बोध हो, उसे 'दव्यवाचक संज्ञा' कहते हैं। इस संज्ञा का सामान्यतः बहुवचन नहीं होता। जैसे-लोहा, सोना, चाँदी, दूध, पानी, तेल, तेजाब इत्यादि।

संज्ञाओं का प्रयोग

संज्ञाओं के प्रयोग में कभी-कभी उलटफेर भी हो जाया करता है। कुछ उदाहरण यहाँ दिये जाते हैं-

जातिवाचक : व्यक्तिवाचक - कभी-कभी जातिवाचक संज्ञाओं का प्रयोग व्यक्तिवाचक संज्ञाओं में होता है। जैसे–'पुरी' से जगन्नाथपुरी का, 'देवी' से दुर्गा का, 'दाऊ' से कृष्ण के भाई बलदेव का, 'संवत्' से विक्रमी संवत् का, 'भारतेंदु' से बाबू हरिश्चंद्र का और 'गोस्वामी' से तुलसीदासजी का बोध होता है। इसी तरह, बहुत-सी योगरूढ़ संज्ञाएँ मूल रूप से जातिवाचक होते हुए भी प्रयोग में व्यक्तिवाचक के अर्थ में चली आती हैं। जैसे-गणेश, हनुमान, हिमालय, गोपाल इत्यादि।

व्यक्तिवाचक : जातिवाचक - कभी-कभी व्यक्तिवाचक संज्ञा का प्रयोग जातिवाचक (अनेक व्यक्तियों के अर्थ) में होता है। ऐसा किसी व्यक्ति का असाधारण गुण या धर्म दिखाने के लिए किया जाता है। ऐसी अवस्था में व्यक्तिवाचक संज्ञा जातिवाचक संज्ञा में बदल जाती है। जैसे-गाँधी अपने समय के कृष्ण थे; यशोदा हमारे घर की लक्ष्मी है; तुम कलियुग के भीम हो इत्यादि।

भाववाचक : जातिवाचक - कभी-कभी भाववाचक संज्ञा का प्रयोग जातिवाचक संज्ञा में होता है। उदाहरणार्थ-ये सब कैसे अच्छे पहरावे हैं! यहाँ 'पहरावा' भाववाचक संज्ञा है, किंतु प्रयोग जातिवाचक संज्ञा में हुआ। 'पहरावे' से 'पहनने के वस्त्र' का बोध होता है।

संज्ञा के रूपान्तर (लिंग, वचन और कारक में संबंध)

संज्ञा विकारी शब्द है। विकार शब्दरूपों को परिवर्तित अथवा रूपांतरित करता है। संज्ञा के रूप लिंग, वचन और कारक चिह्नों (परसर्ग) के कारण बदलते हैं।

लिंग के अनुसार
  • नर खाता है - नारी खाती है।
  • लड़का खाता है - लड़की खाती है।
इन वाक्यों में 'नर' पुल्लिग है और 'नारी' स्त्रीलिंग। 'लड़का' पुल्लिग है और 'लड़की' स्त्रीलिंग। इस प्रकार, लिंग के आधार पर संज्ञाओं का रूपांतर होता है।

वचन के अनुसार
  • लड़का खाता है-लड़के खाते हैं।
  • लड़की खाती है लड़कियाँ खाती हैं।
इन वाक्यों में 'लड़का' शब्द एक के लिए आया है और 'लड़के' एक से अधिक के लिए। 'लड़की' एक के लिए और 'लड़कियाँ' एक से अधिक के लिए व्यवहृत हुआ है। यहाँ संज्ञा के रूपांतर का आधार 'वचन' है। 'लड़का' एकवचन है और 'लड़के' बहुवचन में प्रयुक्त हुआ है।

कारक-चिह्नों के अनुसार
  • लड़का खाना खाता है - लड़के ने खाना खाया।
  • लड़की खाना खाती है - लड़कियों ने खाना खाया।
इन वाक्यों में लड़का खाता है' में 'लड़का' पुल्लिग एक वचन है और 'लड़के ने खाना खाया' में भी 'लड़के' पुल्लिग एकवचन है, पर दोनों के रूप में भेद है। इस रूपांतर का कारण कर्ता कारक का चिह्न 'ने' है, जिससे एकवचन होते हुए भी लड़के' रूप हो गया है। इसी तरह, लड़के को बुलाओ, लड़के से पूछो, लड़के का कमरा, लड़के के लिए चाय लाओ इत्यादि वाक्यों में संज्ञा (लड़का-लड़के) एकवचन में आयी है। इस प्रकार, संज्ञा बिना कारक-चिह्न के भी होती है और कारक-चिह्नों के साथ भी। दोनों स्थितियों में संज्ञाएँ एकवचन में अथवा बहुवचन में प्रयुक्त होती हैं।
उदाहरणार्थ-

बिना कारक-चिह्न के अनुसार
  • लड़के खाना खाते हैं। (बहुवचन)
  • लड़कियाँ खाना खाती हैं। (बहुवचन)

कारक-चिह्नों के साथ
  • लड़कों ने खाना खाया।
  • लड़कियों ने खाना खाया।
  • लड़कों से पूछो।
  • लड़कियों से पूछो।
इस प्रकार, संज्ञा का रूपांतर लिंग, वचन और कारक के कारण होता है।

लिंग
शब्द की जाति को लिंग कहते हैं।
संज्ञा के जिस रूप से व्यक्ति या वस्तु की नर या मादा जाति का बोध हो, उसे व्याकरण में 'लिंग' कहते हैं। 'लिंग' संस्कृत भाषा का एक शब्द है, जिसका अर्थ होता है 'चिह्न' या 'निशान'। 'चिह्न' या 'निशान' किसी संज्ञा का ही होता है। 'संज्ञा' किसी वस्तु के नाम को कहते हैं और वस्तु या तो पुरुषजाति की होगी या स्त्रीजाति की। तात्पर्य यह कि प्रत्येक संज्ञा पुल्लिग होगी या स्त्रीलिंग। संज्ञा के भी दो रूप हैं। एक, अप्राणिवाचक संज्ञा-लोटा, प्याली, पेड़, पत्ता इत्यादि और दूसरा, प्राणिवाचक संज्ञा-घोड़ा-घोड़ी, माता-पिता, लड़का-लड़की इत्यादि।

लिंग के भेद
सारी सृष्टि की तीन मुख्य जातियाँ हैं-
  1. पुरुष,
  2. स्त्री और
  3. जड़।

अनेक भाषाओं में इन्हीं तीन जातियों के आधार पर लिंग के तीन भेद किये गये हैं-
(1) पुल्लिग, (2) स्वीलिंग और (3) नपुंसकलिंग।
अंग्रेजी व्याकरण में लिंग का निर्णय इसी व्यवस्था के अनुसार होता है। मराठी, गुजराती आदि आधुनिक आर्य भाषाओं में भी यह व्यवस्था ज्यों-की-त्यों चली आ रही है। इसके विपरीत, हिंदी में दो ही लिंग-पुल्लिग और स्त्रीलिंग-हैं। नपुंसकलिंग यहाँ नहीं है। अतः, हिंदी में सारे पदार्थवाचक शब्द, चाहे वे चेतन हों या जड़, स्त्रीलिंग और पुल्लिग, इन दो लिंगों में विभक्त हैं।

वाक्यों में लिंग-निर्णय
हिंदी में लिंगों की अभिव्यक्ति वाक्यों में होती है, तभी संज्ञा शब्दों का लिंगभेद स्पष्ट होता है। वाक्यों में लिंग विशेषण, सर्वनाम, क्रिया और विभक्तियों में विकार उत्पन्न करता है। जैसे-

विशेषण में
  • मोटा-सा आदमी आया है। ('आदमी' पुल्लिग के अनुसार)
  • यह बड़ा मकान है। ('मकान' पुल्लिग के अनुसार)
  • यह बड़ी पुस्तक है। ('पुस्तक' स्त्रीलिंग के अनुसार)
  • यह छोटा कमरा है। ('कमरा' पुल्लिग के अनुसार)
  • यह छोटी लड़की है। ('लड़की' स्त्रीलिंग के अनुसार)

टिप्पणी
हिंदी में विशेषण का लिंगभेद इन दो नियमों के अनुसार किया जा सकता है-
  • आकारांत विशेषण स्त्रीलिंग में ईकारांत हो जाता है; जैसे-अच्छा-अच्छी, काला-काली, उजला-उजली, भला-भली, पीला-पीली।
  • अकारांत विशेषणों के रूप दोनों लिंगों में समान होते हैं; जैसे-मेरी टोपी गोल है। मेरा कोट सफेद है। उसकी पगड़ी लाल है। लड़की सुंदर है। उसका शरीर सुडौल है। यहाँ सुंदर, गोल आदि विशेषण हैं।

सर्वनाम में
  • मेरी पुस्तक अच्छी है। ('पुस्तक' स्त्रीलिंग के अनुसार)
  • मेरा घर बड़ा है। ('घर' पुल्लिंग के अनुसार)
  • उसकी कलम खो गयी है। ('कलम' स्त्रीलिंग के अनुसार)
  • उसका स्कूल बंद है। ('स्कूल' पुल्लिंग के अनुसार)
  • तुम्हारी जेब खाली है। ('जेब' स्त्रीलिंग के अनुसार)
  • तुम्हारा कोट अच्छा है। ('कोट' पुल्लिग के अनुसार

क्रिया में
  • बुढ़ापा आ गया। ('बुढ़ापा' पुल्लिंग के अनुसार)
  • सहायता मिली है। ('सहायता' स्त्रीलिंग के अनुसार)
  • भात पका है। ('भात' पुल्लिग के अनुसार)
  • दाल बनी है। ('दाल' स्त्रीलिंग के अनुसार)

विभक्ति में
संबंध-गुलाब का रंग लाल है। ('रंग' पुल्लिंग के अनुसार)
आपका चरित्र अच्छा है। ('चरित्र' पुल्लिग के अनुसार)
आपकी नाक कट गयी। ('नाक' स्त्रीलिंग के अनुसार) 
संबोधन-अयि देवि! तुम्हारी जय हो। ('देवि' स्त्रीलिंग के अनुसार)

तत्सम (संस्कृत) शब्दों का लिंग निर्णय

संस्कृत पुल्लिग शब्द
पं. कामताप्रसाद गुरु ने संस्कृत शब्दों को पहचानने के निम्नलिखित नियम बताये हैं-
  • जिन संज्ञाओं के अंत में 'त्र' होता है। जैसे-चित्र, क्षेत्र, पात्र, नेत्र, चरित्र, शस्त्र इत्यादि।
  • 'नांत' संज्ञाएँ। जैसे-पालन, पोषण, दमन, वचन, नयन, गमन, हरण इत्यादि। अपवाद–'पवन' उभयलिंग है।
  • 'ज'-प्रत्ययांत संज्ञाएँ। जैसे-जलज, स्वेदज, पिंडज, सरोज इत्यादि।
  • जिन भाववाचक संज्ञाओं के अंत में त्व, त्य, व, य होता है। जैसे सतीत्व, बहूत्व, नृत्य, कृत्य, लाघव, गौरव, माधुर्य इत्यादि।
  • जिन शब्दों के अंत में 'आर', 'आय', वा 'आस' हो। जैसे-विकार, विस्तार, संसार, अध्याय, उपाय, समुदाय, उल्लास, विकास, ह्रास इत्यादि। अपवाद-सहाय (उभयलिंग), आय (स्त्रीलिंग)।
  • 'अ'-प्रत्ययांत संज्ञाएँ। जैसे-क्रोध, मोह, पाक, त्याग, दोष, स्पर्श इत्यादि। अपवाद-जय (स्त्रीलिंग), विनय (उभयलिंग) आदि।
  • 'त'-प्रत्ययांत संज्ञाएँ। जैसे-चरित, गणित, फलित, मत, गीत, स्वागत इत्यादि।
  • जिनके अंत में 'ख' होता है। जैसे-नख, मुख, सुख, दु:ख, लेख, मख, शंख इत्यादि।

संस्कृत स्त्रीलिंग शब्द
पं. कामताप्रसाद गुरु ने संस्कृत स्त्रीलिंग शब्दों को पहचानने के निम्नलिखित नियमों का उल्लेख अपने व्याकरण में किया है-
  • आकारांत संज्ञाएँ। जैसे-दया, माया, कृपा, लज्जा, क्षमा, शोभा इत्यादि।
  • नाकारांत संज्ञाएँ। जैसे-प्रार्थना, वेदना, प्रस्तावना, रचना, घटना इत्यादि।
  • उकारांत संज्ञाएँ। जैसे-वायु, रेणु, रज्जु, जानु, मृत्यु, आयु, वस्तु, धातु, ऋतु इत्यादि। अपवाद-मधु, अश्रु, तालु, मेरु, हेतु, सेतु इत्यादि।
  • जिनके अंत में 'ति' वा 'नि' हो। जैसे-गति, मति, रीति, हानि, ग्लानि, योनि, बुद्धि, ऋद्धि, सिद्धि (सिध् + ति = सिद्धि) इत्यादि।
  • 'ता'-प्रत्ययांत भाववाचक संज्ञाएँ। जैसे-नम्रता, लघुता, सुंदरता, प्रभुता, जड़ता इत्यादि।
  • इकारांत संज्ञाएँ। जैसे-निधि, विधि, परिधि, राशि, अग्नि, छवि, केलि, रुचि इत्यादि। अपवाद-वारि, जलधि, पाणि, गिरि, अद्रि, आदि, बलि इत्यादि।
  • 'इमा'-प्रत्ययांत शब्द। जैसे-महिमा, गरिमा, कालिमा, लालिमा इत्यादि।

तत्सम पुल्लिंग शब्द
चित्र, पत्र, पात्र, मित्र, गोत्र, दमन, गमन, गगन, श्रवण, पोषण, शोषण, पालन, लालन, मलयज, जलज, उरोज, सतीत्व, कृत्य, स्त्रीत्व, लाघव, वीर्य, माधुर्य, कार्य, कर्म, प्रकार, विहार, प्रचार, सार, विस्तार, प्रसार, अध्याय, स्वाध्याय, उपहार, हास, मास, लोभ, क्रोध, बोध, मोद, ग्रंथ, नख, मुख, शिख, दुःख, सुख, शंख, तुषार, तुहिन, उत्तर, प्रश्न, मस्तक, आश्चर्य, नृत्य, काष्ठ, छत्र, मेघ, कष्ट, प्रहर, सौभाग्य, अंकन, अंकुश, अंजन, अंचल, अंतर्धान, अंतस्तल, अंबुज, अंश, अकाल, अक्षर, कल्मष, कल्याण, कवच, कायाकल्प, कलश, काव्य, कास, गज, गण, ग्राम, गृह, चंद्र, चंदन, क्षण, छंद, अलंकार, सरोवर, परिमाण, परिमार्जन, संस्करण, संशोधन, परिवर्तन, परिवेष्टन, परिशोध, परिशीलन, प्रांगण, प्राणदान, वचन, मर्म, यवन, रविवार, सोमवार, मार्ग, राजयोग, रूप, रूपक, स्वदेश, राष्ट्र, प्रांत, नगर, देश, सर्प, सागर, साधन, सार, तत्व, स्वर्ग, दातव्य, दंड, दोष, धन, नियम, पक्ष, पृष्ठ, विधेयक, विनिमय, विनियोग, विभाग, विभाजन, विरोध, विवाद, वाणिज्य, शासन, प्रवेश, अनुच्छेद, शिविर, वाद, अवमान, अनुमान, आकलन, निमंत्रण, नियंत्रण, आमंत्रण, उद्भव, निबंध, नाटक, स्वास्थ्य, निगम, न्याय, समाज, विघटन, विसर्जन, विवाह, व्याख्यान, धर्म, वित्त, उपादान, उपकरण, आक्रमण, पर्यवेक्षण, श्रम, विधान, बहुमत, निर्माण, संदेश, प्रस्ताव, ज्ञापक, आभार, छात्रावास, अपराध, प्रभाव, उत्पादन, लोक, विराम, परिहार, विक्रम, न्याय, संघ, परिवहन, प्रशिक्षण, प्रतिवेदन, संकल्प इत्यादि।

तत्सम स्त्रीलिंग शब्द
दया, माया, कृपा, लज्जा, क्षमा, शोभा, सभा, प्रार्थना, वेदना, समवेदना, प्रस्तावना, रचना, घटना, अवस्था, नम्रता, सुंदरता, प्रभुता, जड़ता, महिमा, गरिमा, कालिमा, लालिमा, ईर्ष्या, भाषा, अभिलाषा, आशा, निराशा, पूर्णिमा, अरुणिमा, काया, कला, चपला, अक्षमता, इच्छा, अनुज्ञा, आज्ञा, आराधना, उपासना, याचना, रक्षा, संहिता, आजीविका, घोषणा, गणना, परीक्षा, गवेषणा, नगरपालिका, नागरिकता, योग्यता, सीमा, स्थापना, संस्था, सहायता, मंत्रणा, मान्यता, व्याख्या, शिक्षा, समता, संपदा, संविदा, सूचना, सेवा, सेना, अनुज्ञप्ति, विज्ञप्ति, अनुमति, अभियुक्ति, अभिव्यक्ति, उपलब्धि, विधि, क्षति, पूर्ति, विकृति, चित्तवृति, जाति, निधि, सिद्धि, समिति, नियुक्ति, निवृत्ति, रीति, शक्ति, प्रतिकृति, कृति, प्रतिभूति, प्रतिलिपि, अनुभति, युक्ति, धति, हानि, स्थिति. परिस्थिति. विमति, वृत्ति, आवृत्ति, शांति, संधि, समिति, संपत्ति, सुसंगति, कटि, छवि, रुचि, अग्नि, केलि, नदी, नारी, मंडली, लक्ष्मी, शताब्दी, श्री, कुंडली, कुंडलिनी, कौमुदी, गोष्ठी, धात्री, मृत्यु, आयु, वस्तु, ऋतु, रज्जु, रेणु, वायु इत्यादि। अपवाद-शशि, रवि, पति, मुनि, गिरि इत्यादि।
अब हम हिंदी के तद्भव शब्दों के लिंग विधान पर विचार करेंगे।

तद्भव (हिंदी) शब्दों का लिंग निर्णय
तद्भव शब्दों के लिंग निर्णय में अधिक कठिनाई होती है। तद्भव शब्दों का लिंगभेद, वह भी अप्राणिवाचक शब्दों का, कैसे किया जाए और इसके सामान्य नियम क्या हों, इसके बारे में विद्वानों में मतभेद है। पंडित कामताप्रसाद गुरु ने हिंदी के तद्भव शब्दों को परखने के लिए पुल्लिग के तीन और स्त्रीलिंग के दस नियमों का उल्लेख अपने 'हिंदी व्याकरण' में किया है। वे नियम इस प्रकार हैं-

तद्भव पुल्लिंग शब्द
  • ऊनवाचक संज्ञाओं को छोड़ शेष आकारांत संज्ञाएँ। जैसे-कपड़ा, गन्ना, पैसा, पहिया, आटा, चमड़ा इत्यादि।
  • जिन भाववाचक संज्ञाओं के अंत में ना, आव, पन, वा, पा होता है। जैसे-आना, गाना, बहाव, चढ़ाव, बड़प्पन, बढ़ावा, बुढ़ापा इत्यादि।
  • कृदंत की आनांत संज्ञाएँ। जैसे-लगान, मिलान, खान, पान, नहान, उठान इत्यादि। अपवाद-उड़ान, चट्टान इत्यादि।

तद्भव स्त्रीलिंग शब्द
  • ईकारांत संज्ञाएँ। जैसे-नदी, चिट्ठी, रोटी, टोपी, उदासी इत्यादि। अपवाद-घी, जी, मोती, दही इत्यादि।
  • ऊनवाचक याकारांत संज्ञाएँ। जैसे-गुड़िया, खटिया, टिबिया, पुड़िया, ठिलिया इत्यादि।
  • तकारांत संज्ञाएँ। जैसे-रात, बात, लात, छत, भीत, पत इत्यादि। अपवाद-भात, खेत, सूत, गात, दाँत इत्यादि।
  • ऊकारांत संज्ञाएँ। जैसे-बालू, लू, दारू, ब्यालू, झाडू इत्यादि। अपवाद-आँसू, आलू, रतालू, टेसू इत्यादि।
  • अनुस्वारांत संज्ञाएँ। जैसे-सरसों, खडाऊँ, भौं, चूँ, नूँ इत्यादि। अपवाद-गेहूँ।
  • सकारांत संज्ञाएँ। जैसे-प्यास, मिठास, निंदास, रास (लगाम), बाँस, साँस इत्यादि। अपवाद-निकास, काँस, रास (नृत्य)।
  • कृदंत नकारांत संज्ञाएँ, जिनका उपांत्य वर्ण अकारांत हो अथवा जिनकी धातु नकारांत हो। जैसे-रहन, सूजन, जलन, उलझन, पहचान इत्यादि। अपवाद-चलन आदि।
  • कृदंत की अकारांत संज्ञाएँ। जैसे-लूट, मार, समझ, दौड़, सँभाल, रगड़, चमक, छाप, पुकार इत्यादि। अपवाद-नाच, मेल, बिगाड़, बोल, उतार इत्यादि।
  • जिन भाववाचक संज्ञाओं के अंत में ट, वट, हट होता है। जैसे-सजावट, घबराहट, चिकनाहट, आहट, झंझट इत्यादि। जिन संज्ञाओं के अंत में 'ख' होता है। जैसे-ईख, भूख, राख, चीख, काँख, कोख, साख, देखरेख इत्यादि। अपवाद-पंख, रूख।

अर्थ के अनुसार लिंग निर्णय
कुछ लोग अप्राणिवाचक शब्दों का लिंग भेद अर्थ के अनुसार करते हैं। पं. कामताप्रसाद गुरु ने इस आधार और दृष्टिकोण को 'अव्यापक और अपूर्ण' कहा है; क्योंकि इसके जितने उदाहरण हैं, प्रायः उतने ही अपवाद हैं। इसके अलावा, इसके जो थोड़े-से नियम बने हैं, उनमें सभी तरह के शब्द सम्मिलित नहीं होते। गुरुजी ने इस संबंध में जो नियम और उदाहरण दिये हैं, उनमें भी अपवादों की भरमार है। उन्होंने जो भी नियम दिये हैं, वे बड़े जटिल और अव्यावहारिक हैं। यहाँ इन नियमों का उल्लेख किया जा रहा है-

अप्राणिवाचक पुल्लिग हिंदी शब्द
शरीर के अवयवों के नाम पुल्लिग होते हैं। जैसे- कान, मुँह, दाँत, ओठ, पाँव, हाथ, गाल, मस्तक, तालु, बाल, अँगूठा, मुक्का, नाखून, नथना, गट्टा इत्यादि। अपवाद- कोहनी, कलाई, नाक, आँख, जीभ, ठोड़ी, खाल, बाँह, नस, हड्डी, इंद्रिय, काँख इत्यादि।
रत्नों के नाम पुल्लिग होते हैं। जैसे- मोती, माणिक, पन्ना, हीरा, जवाहर, मूंगा, नीलम, पुखराज, लाल इत्यादि। अपवाद-मणि, चुन्नी, लाड़ली इत्यादि।
धातुओं के नाम पुल्लिग होते हैं। जैसे- ताँबा, लोहा, सोना, सीसा, काँसा, राँगा, पीतल, रूपा, टीन इत्यादि। अपवाद-चाँदी।
अनाजों के नाम पुल्लिग होते हैं। जैसे- जौ, गेहूँ, चावल, बाजरा, चना, मटर, तिल इत्यादि। अपवाद-मकई, जुआर, मूंग, खेसारी इत्यादि।
पेड़ों के नाम पुल्लिग होते हैं। जैसे-पीपल, बड़, देवदारु, चीड़, आम, शीशम, सागौन, कटहल, अमरूद, शरीफा, नींबू, अशोक, तमाल, सेब, अखरोट इत्यादि। अपवाद-लीची, नाशपाती, नारंगी, खिरनी इत्यादि।
द्रव्य पदार्थों के नाम पुल्लिग होते हैं। जैसे-पानी, घी, तेल, अर्क, शर्बत, इत्र, सिरका, आसव, काढ़ा, रायता इत्यादि। अपवाद-चाय, स्याही, शराब।
भौगोलिक जल और स्थल आदि अंशों के नाम प्रायः पुल्लिग होते हैं। जैसे-देश, नगर, रेगिस्तान, द्वीप, पर्वत, समुद्र, सरोवर, पाताल, वायुमंडल, नभोमंडल, प्रांत इत्यादि। अपवाद-पृथ्वी, झील, घाटी इत्यादि।

अप्राणिवाचक स्त्रीलिंग हिंदी-शब्द

नदियों के नाम स्त्रीलिंग होते हैं। जैसे-गंगा, यमुना, महानदी, गोदावरी, सतलज, रावी, व्यास, झेलम इत्यादि।
अपवाद-शोण, सिंधु ब्रह्मपुत्र नद हैं, अतः पुल्लिग हैं।

नक्षत्रों के नाम स्त्रीलिंग होते हैं। जैसे-भरणी, अश्विनी, रोहिणी इत्यादि।
अपवाद-अभिजित, पुष्य आदि।

बनिये की दुकान की चीजें स्त्रीलिंग हैं। जैसे-लौंग, इलायची, मिर्च, दालचीनी, चिरौंजी, हल्दी, जावित्री, सुपारी, हींग इत्यादि।
अपवाद-धनिया, जीरा, गर्ममसाला, नमक, तेजपत्ता, केसर, कपूर इत्यादि।

खाने-पीने की चीजें स्त्रीलिंग हैं। जैसे-कचौड़ी, पूरी, खीर, दाल, पकौड़ी, रोटी, चपाती, तरकारी, सब्जी, खिचड़ी इत्यादि।
अपवाद-पराठा, हलुआ, भात, दही, रायता इत्यादि।

प्रत्ययों के आधार पर तद्भव हिंदी शब्दों का लिंग निर्णय
हिंदी के कृदंत और तद्धित-प्रत्ययों में स्त्रीलिंग-पुल्लिग बनानेवाले अलग-अलग प्रत्यय इस प्रकार हैं

स्त्रीलिंग कृदंत-प्रत्यय
अ, अंत आई, आन, आवट, आस, आहट, ई, औती, आवनी, क, की, त, ती, नी इत्यादि हिंदी कृदंत-प्रत्यय जिन धातु-शब्दों में लगे होते हैं, वे स्त्रीलिंग होते हैं। जैसे-लूट, चमक, देन, भिड़त, लड़ाई, लिखावट, प्यास, घबराहट, हँसी, मनौती, छावनी, बैठक, फुटकी, बचत, गिनती, करनी, भरनी।

द्रष्टव्य
इन स्त्रीलिंग कृदंत-प्रत्ययों में अ, क, और न प्रत्यय कहीं-कहीं पुल्लिग में भी आते हैं और कभी-कभी इनसे बने शब्द उभयलिंग भी होते हैं। जैसे-'सीवन' ('न'-प्रत्ययांत) क्षेत्रभेद से दोनों लिंगों में चलता है। शेष सभी प्रत्यय स्त्रीलिंग हैं।

पुल्लिग कृदंत-प्रत्यय
अक्कड़, आ, आऊ, आक, आकू, आप, आपा, आव, आवना, आवा, इयल, इया, ऊ, एरा, ऐया, ऐत, औता, औना, औवल, क, का, न, वाला, वैया, सार, हा इत्यादि हिंदी कृदंत-प्रत्यय जिन धातु-शब्दों में लगे हैं, वे पुल्लिग होते हैं। जैसे-पियक्कड़, घेरा, तैराक, लड़ाकू, मिलाप, पुजापा, घुमाव, छलावा, लुटेरा, कटैया, लईत, समझौता, खिलौना, बुझौवल, घालक, छिलका, खान-पान, खानेवाला, गवैया।
द्रष्टव्य-(1) क और न कृदंत-प्रत्यय उभयलिंग हैं। इन दो प्रत्ययों और स्त्रीलिंग प्रत्ययों को छोड़ शेष सभी पुल्लिंग हैं। (2) 'सार' उर्दू का कृदंत-प्रत्यय है, जो हिंदी में फारसी से आया है मगर काफी प्रयुक्त है।

स्त्रीलिंग तद्धित-प्रत्यय
आई, आवट, आस, आहट, इन, एली, औड़ी, औटी, औती, की, टी, ड़ी, त, ती, नी, री, ल, ली इत्यादि हिंदी तद्धित-प्रत्यय जिन शब्दों में लगे होते हैं, वे स्त्रीलिंग होते हैं। जैसे-भलाई, जमावट, हथेली, टिकली, चमड़ी।

पुल्लिग तद्धित-प्रत्यय
आ, आऊ, आका, आटा, आना, आर, इयल, आल, आड़ी, आरा, आलू, आसा, ईला, उआ, ऊ, एरा, एड़ी, ऐत, एला, ऐला, ओटा, ओट, औड़ा, ओला, का, जा, टा, ड़ा, ता, पना, पन, पा, ला, वंत, वान, वाला, वाँ, वा, सरा, सों, हर, हरा, हा, हारा इत्यादि हिंदी तद्धित प्रत्यय जिन शब्दों में लगे होते हैं वे शब्द पुल्लिंग होते हैं। जैसे-धमाका, खर्राटा, पैताना, भिखारी, हत्यारा, मुँहासा, मछुआरा, सँपेरा, गँजेड़ी, डकैत, अधेला, चमोटा, लँगोटा, हथौड़ा, चुपका, दुखड़ा, रायता, कालापन, बुढ़ापा, गाड़ीवान, टोपीवाला, छठा, दूसरा, खंडहर, पीहर, इकहरा, चुड़िहारा।

द्रष्टव्य-1, इया, ई, एर, एल, क तद्धित प्रत्यय उभयलिंग हैं। जैसे-

प्रत्यय

पद

तद्धित पद

इया

मुख

मुखिया (पुल्लिग)

 

खाट

खटिया (ऊनवाचक) (स्त्रीलिंग)

डोर

डोरी (स्त्रीलिंग)

एर

मूँड

मुंडेरा (स्त्रीलिंग)

 

अंध

अंधेर (पुल्लिग)

एल

फूल

फुलेल  (पुल्लिग)

 

नाक

नकेल (स्त्रीलिंग)

पंच

पंचक (पुल्लिग)

 

ठण्ड

ठंडक (स्त्रीलिंग)


2. विशेषण अपने विशेष्य के लिंग के अनुसार होता है। जैसे–'ल' तद्धित-प्रत्यय संज्ञा-शब्दों में लगने पर उन्हें स्त्रीलिंग कर देता है, मगर विशेषण में- 'घाव + ल = घायल'- अपने विशेष्य के अनुसार होगा, अर्थात् विशेष्य स्त्रीलिंग हुआ तो 'घायल' स्त्रीलिंग और पुल्लिग हुआ तो पुल्लिग।

3. 'क' तद्धित प्रत्यय स्त्रीलिंग है, किंतु संख्यावाचक के आगे लगने पर उसे पुल्लिग कर देता है। जैसे–चौक, पंचक, (पुल्लिग) और ठंडक, धमक (स्त्रीलिंग)। 'आन' प्रत्यय भाववाचक होने पर शब्द को स्त्रीलिंग करता है, किंतु विशेषण में विशेष्य के अनुसार। जैसे-लंबा + आन = लंबान (स्त्रीलिंग)।

4. अधिकतर भाववाचक और ऊनवाचक प्रत्यय स्त्रीलिंग होते हैं।

उर्दू-शब्दों का लिंग निर्णय
उर्दू से होते हुए हिंदी में अरबी-फारसी के बहुत-से शब्द आये हैं, जिनका व्यवहार हम प्रतिदिन करते हैं। इन शब्दों का लिंगभेद निम्नलिखित नियमों के अनुसार किया जाता है

पुल्लिंग उर्दू शब्द

1. जिनके अंत में 'आब' हो, वे पुल्लिग हैं। जैसे-गुलाब, जुलाब, हिसाब, जवाब, कबाब।
अपवाद-शराब, मिहराब, किताब, ताब, किमखाब इत्यादि

2. जिनके अंत में 'आर' या 'आन' लगा हो। जैसे-बाजार, इकरार, इश्तहार, इनकार, अहसान, मकान, सामान,
इम्तहान इत्यादि।
अपवाद-दुकान, सरकार, तकरार इत्यादि।

3. आकारांत शब्द पुल्लिग हैं। जैसे-परदा, गुस्सा, किस्सा, रास्ता, चश्मा, तमगा। (मूलतः ये शब्द विसर्गात्मक हकारांत उच्चारण के हैं। जैसे-परदः, तमगः। किंतु, हिंदी में ये 'परदा', 'तमगा' के रूप में आकारांत ही उच्चरित होते हैं।) अपवाद-दफा।

स्त्रीलिंग उर्दू शब्द

1. ईकारांत भाववाचक संज्ञाएँ स्त्रीलिंग होती हैं। जैसे-गरीबी, गरमी, सरदी, बीमारी, चालाकी, तैयारी, नवाबी इत्यादि।

2. शकारांत संज्ञाएँ स्त्रीलिंग होती हैं। जैसे-नालिश, कोशिश, लाश, तलाश, वारिश, मालिश इत्यादि।
अपवाद-ताश, होश आदि।

3. तकारांत संज्ञाएँ स्त्रीलिंग होती हैं। जैसे-दौलत, कसरत, अदालत, इजाजत, कीमत, मुलाकात इत्यादि।
अपवाद-शरबत, दस्तखत, बंदोबस्त, वक्त, तख्त, दरख्त इत्यादि।

4. आकारांत संज्ञाएँ स्त्रीलिंग होती हैं। जैसे-हवा, दवा, सजा, दुनिया, दगा इत्यादि।
अपवाद-मजा इत्यादि।

5. हकारांत संज्ञाएँ स्त्रीलिंग होती हैं। जैसे-सुबह, तरह, राह, आह, सलाह, सुलह इत्यादि।

6. 'तफईल' वजन की संज्ञाएँ स्त्रीलिंग होती हैं। जैसे-तसवीर, तामील, जागीर, तहसील इत्यादि।

अंग्रेजी शब्दों का लिंग निर्णय
विदेशी शब्दों में उर्दू (फारसी और अरबी)-शब्दों के बाद अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग भी हिंदी में कम नहीं होता। जहाँ तक अंग्रेजी शब्दों के लिंग निर्णय का प्रश्न है, मेरी समझ से इसमें कोई विशेष कठिनाई नहीं है। क्योंकि हिंदी में अधिकतर अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग पुल्लिग में होता है। इस निष्कर्ष की पुष्टि नीचे दी गयी शब्दसूची से हो जाती है। अतः, इन शब्दों के तथाकथित 'मनमाने प्रयोग' बहुत अधिक नहीं हुए हैं। मेरा मत है कि इन शब्दों के लिंग निर्णय में रूप के आधार पर अकारांत, आकारांत और ओकारांत को पुल्लिग और ईकारांत को स्त्रीलिंग समझना चाहिए। फिर भी, इसके कुछ अपवाद तो हैं ही। अंग्रेजी के 'पुलिस' (Police) शब्द के स्त्रीलिंग होने पर प्रायः आपत्ति की जाती है। मेरा विचार है कि यह शब्द न तो पुल्लिग है, न स्त्रीलिंग। सच तो यह है कि 'फ्रेंड' (Friend) की तरह उभयलिंग है। अब तो स्त्री भी 'पुलिस' होने लगी है। ऐसी अवस्था में जहाँ पुरुष पुलिस का काम करता हो, वहाँ 'पुलिस' पुल्लिग में और जहाँ स्त्री पुलिस का काम करेगी, वहाँ उसका व्यवहार स्त्रीलिंग में होना चाहिए। हिंदी में ऐसे शब्दों की कमी नहीं है, जिनका प्रयोग दोनों लिंगों में अर्थभेद के कारण होता है। जैसे-टीका, हार, पीठ इत्यादि। ऐसे शब्दों की सूची आगे दी गयी है।
लिंग निर्णय के साथ हिंदी में प्रयुक्त होनेवाले अंग्रेजी शब्दों की सूची निम्नलिखित है

अंग्रेजी के पुल्लिंग शब्द
अकारांत - ऑर्डर, आयल, ऑपरेशन, इंजिन, इंजीनियर, इंजेक्शन, एडमिशन, एक्सप्रेस, एक्सरे, ओवरटाइम, क्लास, कमीशन, कोट, कोर्ट, कैलेंडर, कॉलेज, कैरेम, कॉलर, कॉलबेल, काउंटर, कॉरपोरेशन, कार्बन, कंटर, केस, क्लिनिक, क्लिप, कार्ड, क्रिकेट, गैस, गजट, ग्लास, चेन, चॉकलेट, चार्टर, टॉर्च, टायर, ट्यूब, टाउनहॉल, टेलिफोन, टाइम, टाइमटेबल, टी-कप, ट्रांजिस्टर, टेलिग्राम, ट्रैक्टर टेंडर, टैक्स, टूथपाउडर, टिकट, डिवीजन, डांस, ड्राइंग-रूम, नोट, नंबर, नेकलेस, थर्मस, पार्क, पोस्ट, पोस्टर, पिंगपौंग, पेन, पासपोर्ट, पार्लियामेंट, पेटीकोट, पाउडर, पेंशन, परमिट, प्रमोशन, प्रोविडेंट फंड, पेपर, प्रेस, प्लास्टर, प्लग, प्लेग, प्लेट, पार्सल, प्लेटफार्म, फुटपाथ, फुटबॉल, फार्म, फ्रॉक, फर्म, फैन, फ्रेम, फुलपैंट, फ्लोर, फैशन, बोर्ड, बैडमिंटन, बॉर्डर, बाथरूम, बुशर्ट, बॉक्स, बिल, बोनस, ब्रॉडकास्ट, बजट, बांड, बोल्डर, ब्रश, ब्रेक, बैंक, बल्ब, बम, मैच, मेल, मीटर, मनीआर्डर, रोड, रॉकेट, रबर, रूल, राशन, रिवेट, रिकार्ड, रिबन, लैंप, लौंगक्लॉथ, लेजर, लीज, लाइसेंस, वाउचर, वार्ड, स्टोर, स्टेशनर, स्कूल, स्टोव, स्टेज, स्लीपर, स्टील, स्विच, स्टैंडर्ड, सिगनल, सेक्रेटेरियट, सैलून, हॉल, होल्डॉल, हैंगर, हॉस्पिटल, हेयर, ऑयल, हैंडिल, लाइट, लेक्चर, लेटर। 

आकारांत - कोटा, कैमरा, वीसा, सिनेमा, ड्रामा, प्रोपगैंडा, कॉलरा, फाइलेरिया, मलेरिया, कारवाँ।

ओकारांत - रेडिओ, स्टुडिओ, फोटो, मोटो, वीटो, स्नो।

अंग्रेजी के स्त्रीलिंग शब्द

ईकारांत
एसेंबली, कंपनी, केतली, कॉपी, गैलरी, डायरी, डिग्री, टाई, ट्रेजेडी, ट्रेजरी, म्युनिसिपैलिटी, यूनिवर्सिटी, बार्ली, पार्टी, लैबोरेटरी।

हिंदी के उभयलिंगी शब्द
हिंदी के कुछ ऐसे अनेकार्थी शब्द प्रचलित हैं, जो एक अर्थ में पुल्लिग और दूसरे अर्थ में स्त्रीलिंग होते हैं। ऐसे शब्द 'उभयलिंगी' कहलाते हैं।

लिंग निर्णय के कुछ सरल सूत्र
अप्राणिवाचक संज्ञाओं के लिंगभेद में हिंदी के सामान्य पाठकों को कठिनाई होती है। हिंदी के वैयाकरणों ने अब तक जो भी नियम बताये हैं, वे काफी उलझन पैदा करते हैं। पं. गुरु ने लिंगभेद के लगभग चालीस नियम बताये हैं। इनसे लिंग की कठिनाई दूर नहीं होती। नियमों के अपवाद कभी-कभी उनके उदाहरण से कहीं अधिक हैं। हमें कुछ ऐसे सरल सूत्रों की आवश्यकता है, जो तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशज-सभी प्रकार की संज्ञाओं पर समानरूप से लागू हो सकें। यहाँ कुछ सूत्रों का उल्लेख किया जाता है। प्रयोग करके देखें कि ये सूत्र कहाँ तक उपयोगी और वैज्ञानिक हैं।
हिंदी ने संज्ञाओं के लिंगभेद में संस्कृत की लिंग-व्यवस्था का काफी हद तक अनुसरण किया है। हिंदी तद्भवों पर संस्कृत के तत्समों का सीधा प्रभाव है। तत्सम यदि पुल्लिग अथवा नपुंसक है, तो उसका तद्भव पुल्लिग ही होगा। इस प्रकार, संस्कृत का ज्ञान रखने वालों को हिंदी-तद्भव के लिंग निर्णय में विशेष कठिनाई नहीं होगी। सूत्र यह है कि तद्भव चाहे अकारांत हों या आकारांत, उनके तत्सम यदि अकारांत हैं, तो ऐसे शब्द पुल्लिंग होंगे।
जिस अकारांत अथवा आकारांत संज्ञा का बहुवचन बनाने में कोई विकार नहीं होता, वह पुल्लिग और जिस संज्ञा का बहुवचन बनाने में विकार (एँ, याँ) होता हो, वह स्त्रीलिंग है। यह नियम सभी अप्राणिवाचक तत्सम तथा तद्भव संज्ञाओं पर लागू होता है।
जैसे-
  • राम के चार भवन हैं। पुल्लिग (अविकृत)
  • राम की चार इमारतें हैं।-स्त्रीलिंग (विकृत)
  • राम की बातें हुईं।-स्त्रीलिंग (विकृत)
  • राम के वचन सुने हैं। पुल्लिग (अविकृत)
  • श्याम के चार पुत्र हैं। पुल्लिग (अविकृत)
  • मैंने कोशिशें की।-स्त्रीलिंग (विकृत)
  • कमरे में चार खिड़कियाँ हैं। स्त्रीलिंग (विकृत)
यह एक महत्त्वपूर्ण सूत्र है। इसके परीक्षण से हमारी लिंग-संबंधी समस्या की कठिनाई दूर हो सकती है।

आकारांत संज्ञाएँ

कामना-कामनाएँ, इच्छा-इच्छाएँ, दिशा-दिशाएँ, वार्ता-वार्ताएँ, टीका-टीकाएँ, कविता-कविताएँ, भाषा-भाषाएँ, परीक्षा-परीक्षाएँ इत्यादि।
  • आकारांत भाववाचक संज्ञाएँ स्त्रीलिंग होती हैं। जैसे-माया, लज्जा, दया, कृपा, छाया, करुणा, आभा, क्षमा इत्यादि।
  • यदि बहुवचन बनाने पर संज्ञाओं का अंत्य 'आ', 'ए' हो जाए, तो ये संज्ञाएँ पुल्लिग होती हैं। जैसे-ताला-ताले, पहिया-पहिये, कपड़ा-कपड़े, गला-गले, छाता-छाते, जूता-जूते, कुत्ता-कुत्ते इत्यादि।
  • द्रव्यवाचक संज्ञाएँ पुल्लिग होती हैं। जैसे-दही, मोती, पानी इत्यादि।
  • क्रियार्थक संज्ञाएँ पुल्लिग होती हैं। जिस शब्द के अंत में 'ना' लगा हो, वे पल्लिग होते हैं। जैसे-लिखना. पढ़ना, टहलना, गिरना, उठाना इत्यादि।
  • द्वंद्व समास के शब्द पुल्लिग होते हैं। जैसे-सीता-राम, राधा-कृष्ण, शिव-पार्वती, दाल-भात, लोटा-डोरी, __नर-नारी, राजा-रानी, माँ-बाप इत्यादि।

पुल्लिग से स्त्रीलिंग बनाने के नियम और प्रत्यय

हिंदी-स्त्रीप्रत्यय
निम्नलिखित सामान्य नियम द्रष्टव्य हैं
अकारांत तथा आकारांत पुल्लिग शब्दों को ईकारांत कर देने से वे स्त्रीलिंग हो जाते हैं। जैसे-
  • आकारांत शब्द
  • लड़का-लड़की
  • गधा-गधी
  • नाना-नानी
  • साला-साली
  • गूंगा-गूंगी
  • नाला-नाली
  • मोटा-मोटी
  • काला-काली
  • देव-देवी
  • पुत्र-पुत्री
  • गोप-गोपी
  • मेढक-मेढकी
  • नर-नारी
  • हिरन-हिरनी
  • बंदर-बंदरी
  • ब्राह्मण-ब्राह्मणी

'आ' या 'वा' प्रत्ययात पुल्लिग शब्दों में 'आ' या 'वा' की जगह इया लगाने से वे स्त्रीलिंग बनते है। जैसे
  • कुत्ता-कुतिया
  • बूढा-बुढ़िया
  • बाछा-बछिया

व्यवसायबोधक, जातिबोधक तथा उपनामवाचक शब्दों के अंतिम स्वर का लोप कर उनमें कहीं इन और कहीं आइन प्रत्यय लगाकर स्त्रीलिंग बनाया जाता हैं। जैसे-

इन

माली - मालिन

कुंजड़ा – कुंजडिन

कुँजड़ा - कुँजड़िन

बाघ-बाघिन

तेली – तेलिन

साँप-साँपिन

आइन

चौबे – चौबाइन

हलवाई – हल्वाइन

लाला - ललाइन

बनिया - बनियाइन

पंडा - पंडाइन

मिसिर-मिसिराइन


कुछ उपनामवाची शब्द ऐसे भी हैं, जिनमें आनी प्रत्यय लगाकर स्त्रीलिंग बनाया जाता है। जैसे
  • ठाकुर-ठकुरानी
  • चौधरी-चौधरानी
  • जेठ-जेठानी
  • सेठ-सेठानी
  • पंडित-पंडितानी
  • देवर-देवरानी
  • मेहतर-मेहतरानी
  • खत्री-खत्रानी

जाति या भाव बताने वाली संज्ञाओं का पल्लिग से स्त्रीलिंग करने में यदि शब्द का अन्य स्वर दीर्घ है. तो उसे ह्रस्व करते हुए नी प्रत्यय का भी प्रयोग होता है। जैसे
  • स्यार-स्यारनी
  • हिंदू-हिंदुनी
  • ऊँट-ऊँटनी
  • हाथी-हथिनी

कुछ शब्द स्वतंत्र रूप से स्त्री-पुरुष के जोड़े होते हैं। ये स्वतंत्र रूप से स्त्रीलिंग या पुल्लिग शब्द होते हैं। जैसे-
  • माँ-बाप
  • राजा-रानी
  • गाय-बैल
  • साहब-मेम
  • मर्द-औरत
  • भाई-बहन
  • वर-वधू
  • माता-पिता
  • पुत्र-कन्या
  • पुरुष-स्त्री
  • बेटी-दामाद
  • बेटा-पुतोहू

संस्कृत के 'वान्' और 'मान्' प्रत्ययांत विशेषण शब्दों में 'वान्' तथा 'मान्' को क्रमशः वती और मती कर देने से स्त्रीलिंग बन जाता है। जैसे-
  • बुद्धिमान्-बुद्धिमती
  • आयुष्मान्–आयुष्मती
  • पुत्रवान-पुत्रवती
  • बलवान-बलवती
  • श्रीमान्–श्रीमती
  • भगवान्-भगवती
  • भाग्यवान्–भाग्यवती
  • धनवान्-धनवती

संस्कृत के बहुत-से अकारांत विशेषण शब्दों के अंत में आ लगा देने से स्त्रीलिंग हो जाते हैं। जैसे-
  • तनुज-तनुजा
  • प्रिय-प्रिया
  • कांत-कांता
  • अबल-अबला
  • चंचल-चंचला
  • अनुज-अनुजा
  • प्रियतम-प्रियतमा
  • पंडित-पंडिता
  • आत्मज-आत्मजा
  • पूज्य-पूज्या
  • तनय-तनया
  • श्याम-श्यामा
  • सुत-सुता
  • पालित–पालिता
  • पीत-पीता

जिन पुल्लिग शब्दों के अंत में 'अक' होता है, उनमें 'अक' के स्थान पर इका कर देने से वे शब्द स्त्रीलिंग बन जाते हैं। जैसे-
  • सेवक-सेविका
  • बालक-बालिका
  • भक्षक-भक्षिका
  • नायक-नायिका
  • पालक-पालिका
  • संरक्षक-संरक्षिका
  • लेखक-लेखिका
  • पाठक-पाठिका

संस्कृत की अकारांत संज्ञाएँ पुल्लिग रूप में आकारांत कर देने और स्त्रीलिंग रूप में ईकारांत कर देने से
पुल्लिग-स्त्रीलिंग होती हैं। जैसे-

शब्द

पुल्लिंग रूप

स्त्रीलिंग रूप

कर्तृ

कर्ता

कर्त्री

धातृ

धाता

धात्री

दातृ

दाता

दात्री

कवयितृ

कवयिता

कवयित्री

नेतृ

नेता

नेत्री


हिंदी कृदंत-तद्धित-शब्दों से स्त्रीप्रत्यय
कृदंत-तद्धित-प्रत्ययांत पुल्लिग शब्दों को स्त्रीलिंग बनाने के लिए 'ई', 'इन', 'नी' इन तीन स्त्रीप्रत्ययों का ही अधिक प्रयोग होता है। 'आनी' और 'आइन' का प्रयोग संज्ञा-शब्दों को ही पुल्लिग से स्त्रीलिंग बनाने में अधिक होता है, तद्धितांत और कृदंत पुल्लिग को स्त्रीलिंग बनाने में बहुत ही कम। जैसे-

स्त्रीप्रत्यय

धातु या शब्द

कृत्-तद्धित-प्रत्यय

कृदंत-तद्धितात-रूप

स्त्रीप्रत्यय-रूप

ई -

घटना

आ (कृत्)

घट

घटी

 

फेरना

आ (कृत्)

फेरा

फेरी

 

सुहाना

आवना (कृत्)

सुहावना

सुहावनी

 

चुकाना

औता (कृत्)

चुकौता

चुकौती

 

ढलना

वाँ (कृत्)

ढलवाँ

ढलवीं

 

आधा

एला (कृत्)

अधेला

अधेली

 

बिल्ली

औटा (कृत्)

बिलौटा

बिलोटी

 

चाम

ओटा (कृत्)

चमोटा

चमोटी

 

लंग

ओट (कृत्)

लँगोट

लँगोटी

ई -

चोर

टा (तद्धित)

चोट्टा

चोट्टी

 

चाम

ड़ा (तद्धित)

चमड़ा

चमड़ी

 

टोपी

वाला (तद्धित)

टोपीवाला

टोपीवाली

 

एक

हरा (तद्धित)

एकहरा

एकहरी

इन -

पीना

अक्कड़ (कृत्)

पियक्कड़

पियक्कड़िन

 

तैरना

आक (कृत्)

तैराक

तैराकिन

 

लड़ना

ऐत (कृत्)

लडैत

लडैतिन

 

हँसना

ओड़ (कृत्)

हँसोड़

हँसोडिन

 

जानना

हार (कृत्)

जाननहार

जाननहारिन

 

सोना

आर (तद्धित)

सुनार

सुनारिन

 

लोहा

आर (तद्धित)

लोहार

लोहारिन

 

खेल

आड़ी (तद्धित)

खिलाड़ी

खिलाड़िन

 

हत्या

आरा (तद्धित)

हत्यारा

हत्यारिन

 

माछ

उआ (तद्धित)

मछुआ

मछुइन

 

साँप

एरा (तद्धित)

सँपेरा

सँपेरिन

 

गाँजा

एड़ी (तद्धित)

गँजेड़ी

गँजेडिन

नी -

घटना

अ (कृत्)

घट

घटनी

 

भागना

ओड़ा (कृत्)

भगोड़ा

भगोड़नी

 

चूड़ी

हारा (कृत्)

चूड़िहारा

चुड़िहारनी

आइन -

बूझना

अक्कड़ (कृत्)

बुझक्कड़

बुझक्कड़ाइन

 

धुनना

इया (कृत्)

धुनिया

धुनियाइन


लिंगकोश

पुल्लिग शब्द (Masculine)

अरमान, अनार, अदरख, अपराध, अनाज, अनुसार, अनुसरण, अबरख, अबीर, अन्वय, अमृत, अपरिग्रह, अपहरण, अनुदान, अनुमोदन, अनुसंधान, अपयश, अक्षत, अणु, अकाल, अक्षर, अनुच्छेद, अखरोट।

आलस्य, आचार, आईना, आचरण, आखेट, आभार, आलू, आवेश, आविर्भाव, आश्रम, आश्वासन, आसन, आषाढ़, आस्वादन, आहार, आसव, आशीर्वाद, आकाश, आयोग, आटा, आमंत्रण, आक्रमण, आरोप, आयात, आयोजन, आरोपण, आर्तनाद, आलोक, आवागमन, आविष्कार।

अं, अँ, आँ
अंधड़ अंगूर, अंक, अंबार, अंकुश, अंगार, अंतरीप, अंतरिक्ष, अंतर्धान, अंतस्तल, अंबुज, अंश, अंजन, अंचल, अंकन, अंगुल, अंकगणित, अंत:पुर, अंत:करण, अंधेरा, अंधेर, अंबर, अंशु, आँसू।

ओ, औ
ओठ, ओल, ओला, औजार, औसत।

इ, ई
इजलास, इंद्रासन, इकतारा, इलाका, इजहार, इनाम, इलाज, इस्तीफा, इस्पात, इस्तेमाल, इंतजार, इंसाफ, इलजाम, इत्र, ईंधन।

उ,ऊ
उद्धार, उतार, उपवास, ऊफान, उबटन, उबाल, उलटफेर, उपादान, उपकरण, उत्पादन, उत्कर्ष, उच्छेदन, उत्तरदायित्व, उत्तरीय, उत्ताप, उत्पीड़न, उत्साह, उत्सर्ग, उदय, उद्गार, उद्घाटन, उद्दीपन, उद्धरण, उद्बोधन, उद्यम, उद्वेग, उन्माद, उन्मूलन, उपकार, उपक्रम, उपग्रह, उपचार, उपनयन, उपसर्ग, उपहास, उपाख्यान, उपालंभ, उल्लंघन, उल्कापात, उल्लास, उल्लू, उल्लेख, ऊख, ऊन, ऊखल, ऊधम।

कंठ, कपूर, कर्म, कंबल, कलंक, कपाट, कछार, कटहल, कफन, कटोरा, कड़ाह, कलह, कचालू, कक्ष, कच्छा, कछुआ, कटिबंध, कत्था, कदंब, कनस्तर, कफ, कबाब, कवित्त, कब्ज, करकट, करतल, कर्णफूल, करार, करेला, करौंदा, कलाप, कलेवर, कल्प, कल्याण, कल्लोल, कवच। 

का
काग, काजल, काठ, कार्तिक, काँच (शीशा), कानन, कार्य, कायाकल्प।

कि, की
किन्नर, किमाम, किसलय, कीर्तन, कीचड़।

कु, कू
कुआँ, कुटीर, कुतूहल, कुमुद, कुल, कुहासा, कुशल, कुष्ठ, कूड़ा।

के, को, कौ
केवड़ा, केंकड़ा, केराव, केशर, केश, कोटर, कोल्हू, कोढ़, कोदो, कीप, कोष (श), कोहिनूर, कोष्ठ, कोट, कौतूहल, कौर, कौआ, कौशल।

खंडहर, खजूर, खटका, खटमल, खद्योत, खपड़ा, खरगोश, खरबूजा, खराद, (यंत्र), खर्राटा, खलिहान, खाँचा, खाका, खान, (पठान), खान-पान, खार, खिचाव, खीर-मोहन, खीरा, खुमार, खुदरा, खुर, खुलासा, खूट, (छोर), खूटा, खेमा, खेल, खेलवाड़, खोंचा, खोआ।

गंजा, गैंडासा, गंधक, गंधराज, गगन, गज, गजट, गजब, गठबंधन, गढ़, गदर, गद्य, गबन, गमन, गरुड़, गर्जन, गर्व, गर्भाशय, गलसुआ, गलियारा, गलीचा, गश, गाँजा, गार्हस्थ्य, गिरजा, गिरगिट, गड्ढा, गुणगान, गोदाम, गुनाह, गुंजार, गुलाब, गुलाम, गिलास, गूदा, गोंद, गेंद, गोत्र, गोधन, गोलोक, गौरव, ग्रह, ग्रीष्म, ग्रहण, ग्रास, गिलाफ, गिद्ध।

घट, घटाटोप, घटाव, घडा, घडियाल, घन, घराना, घपला, घर्षण, घाघरा, घाघ, घाट, घाटा, घात, (चोट), घाव, घी, घुघरू, घुटना, घुन, घुमाव, घूघट, घुट, घृत, घेघा, घेर, घोंघा, घोटाला, घोल।

चकवा, चकोर, चक्कर, चक्र, चक्रव्यूह, चटावन, चढ़ाव, चढ़ावा, चप्पल, चमगादड़, चमत्कार, चमर, चम्मच, चंपक, चयन, चर्खा, चरागाह, चर्स, चलचित्र, चलन, चालान, चषक, चाँटा, चाँद, चाक, चातक, चातुर्य, चाप (धनुष), चाबुक, चाम, चरण, चाकू, चाव, चिक, (बूचर), चिंतन, चित्रकूट, चित्रपट, चिरकुट, चिराग, चीता, चीत्कार, चीर, चीलर, चीवर, चुंबक, चुंबन, चुनाव, चुल्लू, चैन, चोकर, चौक, चौपाल।

छंद, छछूदर, छज्जा, छटपट, छत्ता, छत्र, छप्पर, छलछंद, छलावा, छाजन, (आच्छादन), छार, छिद्र, छिपाव, छींटा, छेद, छोआ, छोर।

जख्म, जमघट, जहाज, जंजाल, जन्तु, जड़ाव, जत्था, जनपद, जनवासा, जप, जमाव, जलधर, जलपथ, जलपान, जाँता, जाकड़, जाम, जाप, जासूस, जिक्र, जिगर, जिन, जिहाद, जी, जीरा, जीव, ज्वारभाटा, जुआ, जुकाम, जुर्म, जुलाब, जुल्म, जुलूस, जूड़ा, जेठ, जेल, जौ, जैतून, जोश, ज्वर।

झंझा, झंझावात, झकझोर, झकोर, झाड़, (झाड़ी), झंखाड़, झाल, (बाजा), झींगुर, झुंड, झुकाव, झुरमुट, झूमर।

टंटा, टमटम, टकुआ, टाट, टापू, टिकट, टिकाव, टिफिन, टीन, टैक्स।

ठप्पा, ठर्रा, ठहराव, ठाटबाट, ठीकरा, दूंठ, ठौर।

डंक, डंठल, डंड, डंडा, डग, डब्बा, डमरू, डर, डीह, डोल।

ढंग, ढव, ढोल, ढेर, ढोंग।

तंतु, तंतुवाय, तंत्र, तंबाकू, तंबूरा, तकिया, तट, तत्व, तन, तनाव, तप, तपाक , तबला, तमंचा, तम, तरकश, तरबूज, तरस, तराजू, तर्ज, तर्पण, तल, तसर, तांबूल, तांडव, ताक, (आला), ताज, ताड़, तात, तानपूरा, ताप, तार, ताल, तालाब, ताश, तिनका, त्रिफला, तिल, तिलक, तिलकुट, तीतर, तीर, तीर्थ, तूत, तेजाब, तेल, तेज, तेवर, तोड़-जोड़, तोड़-फोड़, तौक, तौर, तौल, तौलिया, त्राण, त्रास, त्रिशंकु।

थन, थपेड़ा, थप्पड़, थल, थाक, थूक, थोक।

दंगल, दंगा, दंड, दंभ, दंश, दबाव, दम, दमन, दर्जा, दर्प, दर्पण, दल, दलन, दफ्तर, दलबल, दलाल, दरबार, दस्त, दस्तखत, दस्यु, दहेज, दाँत, दालान, दाग, दाद, (चर्मरोग-ना. प्र. शब्दसागर), दानपत्र, दानव, दाम, दामन, दाय, दही, दास, दाह, दिखाया, दिन, दिवाला, दिमाग, दियारा, दिल, दीप, दीपक, दीया, दुकूल, दु:ख, दुराव, दुर्ग, दुलार, दुशाला, दूतावास, दुन, (घाटी, तराई), दुध, दुग, दृश्य, देशाटन, देहात, देश, दैत्य, दोष, दोर, दोरा, दौरान, इंद्र, द्वार, द्वीप, द्वेष।

धंधा, धक्का , धड़, धन, धनुष, धर्म, धान, धाम, धैर्य, ध्यान, धनिया।

नगद, नक्षत्र, नख, नग, नजराना, ननिहाल, नभ, नगर, नमक, नसीब, नरक, नरमेध, नल, निकास, नाखून, निचोड़, निबाह, नियम, निर्झर, निर्वाण, निगम, निवास, निवेदन, निशान, निष्कर्ष, नीबू, नीर, नीड़, नीलम, नीलाम, नून, नूपुर, नृत्य, नेत्र, नेम, नैहर, नैवेद्य, न्याय, न्यास।

पंख, पंचनद, पंचरत्न, पंथ, पंछी, पकवान, पक्ष, पक्षपात, पक्षी, पग, पगहा, पट, पड़ाव, पटसन, पड़ोस, पतंग, पनघट, पतलून, पतन, पत्थर, पत्र, पथ, पथ्य, पदार्थ, पदार्पण. पनीर. पन्ना, पपीहा, पयोधि, पर्दा, परमाणु, परलोक, पराग, परिचय, परिवहन, परिणाम, परिधान, परिवर्तन, परिवर्धन, परिवार, परिहास, पर्यटन, पर्व, पलड़ा, पलास, पल्लव, पहर, पहलू, पहिया, पाक, पाखंड, पाचन, पाट, पाताल, पादप, पापड़, पाला, पिल्लू, पित्त, पीतांबर, पीपल, पुलाव, पीहर, पुखराज, पुआल, पुराण, पुर, पुरस्कार, पुल, पुलक, पुलिंदा, पुलाव, पुस्तकालय, पूजन, पूर्व, पोत, पोल, पोषण, पौरुष, पाजामा, प्याज, प्रकोप, प्रयोग, प्रणय, प्रतिद्वंद, प्रतिफल, प्रतिबंध, प्रतिबिंब, प्रतिशोध, प्रतिवाद, प्रतीक, प्रत्यय, प्रदेश, प्रपंच, प्रभाव, प्रमाद, प्रलाप, प्रलय, प्रसव, प्रसार, प्रस्ताव, प्रातः, प्रारंभ।

फण, फरेब, फर्क, फर्ज, फर्श, फल, फसाद, फाग, फाटक, फानूस, फल, फूल, फेंटा, फेन, फेफड़ा, फेर, फेरा, फोंक।

बंडल, बंदरगाह, बखान, बबूल, बखिया, बचपन, बचाव, बड़प्पन, बरतन, बरताव, बल, बलात्कार, बहलाव, बहाव, बहिष्कार, बटेर, बाँध, बाँस, बाग, बाज, बाजा, बाट, बाजार, बादाम, बाल, बाहुल्य, बिछावन, बीज, बिल, बुखार, बॅट, बेंत, बेलन, बेला, बेसन, बोझ, बोल, ब्योरा।

भंडाफोड़, भँवर, भजन, भवन, भत्ता, भरण, भस्म, भाग्य, भार, भाल, भाव, भाषण, भाष्य, भिनसार, भुजंग, भुजपाश, भुट्टा, भूचाल, भुलावा, भूकंप, भूषण, भेदभाव, भेड़िया, भोज, भोर, भौरा, भ्रमर, भ्रमण।

मंच, मंजन, मंडन, मंतव्य, मंत्रिमंडल, मकबरा, मकरंद, मजमा, मजमून, मजा, मजीरा, मटर, मसूर, मठ, मतलब, मद, मद्य, मच्छर, मनसूबा, मनोवेग, मरहम, मरोड़, मवेशी, मलय, मलयगिरि, मलाल, मवाद, महसूल, महुआ, माघ, माजरा, मातम, मिजाज, मील, मुकदमा, मुरब्बा, मुकुट, मूंगा, मृग, मेघ, मेवा, मोक्ष, मोड़, मोती, मोतीचूर, मोम, मोर, मोह, मौन, म्यान।

यंत्र, यक्ष्मा, यति, (संन्यासी), यत्न, यम, यश, यातायात।

रक्त. रत्न. रबर, रमण, रहम, रहस्य, राग, रासो, रूपा, रेंड, रेत, (वीर्य), रोंगटा, रोग, रोब, रोमांच, रोष, राँगा, रिवाज, रूमाल।

लंगर, लंब, लक्ष्य, लगान, लगाव, लटकन, लट्ट, लटाव, लाघव, लालच, लिहाज, लिबास, लेख, लेप, लोक, लोप, लोभ, लश्कर, लेनदेन, लौंग।

वजन, वज्र, वन, वनवास, वर, वरण, वर्जन, वसंत, वहिरंग, वह्नि, वाचन, वात, वाङ्मय, वार, वाष्प, विकल्प, विक्रय, विघटन, वित्त, विमर्श, विलंब, विलास, विलयन, विष, विवाद, विसर्जन, विस्फोट, विहार, वीतराग, वृत्तांत, वृत्त, वेग, वेदांत, वेश, वैभव, वैमनस्य, वैराग्य, वैष्णव, व्यंग्य, व्यंजन, व्यय, व्यवधान, व्याख्यान, व्याधात, व्याज, व्यास, व्यूह। 

शंख, शक, शतदल, शनि, शब्दवेध, शम, शयन, शर, शल्य, शव, शरबत, शहद, शहतूत, शाप, शिखर, शिल्प, शिविर, शीर्ष, शील, शुक्र, शून्य, शूल, शैशव, शोध, शोक, शौच, शौर्य, श्रम, श्वास

षड्यंत्र, षडानन, षट्कर्म, षष्ठी, षष्ठ, षोडश, षाण्मासिक।

संकट, संकलन, संकेत, संकोच, संखिया, संगठन, संगम, संगीन, संघटन, संचय, संचार, संयोग, संतुलन, संदूक, संदेह, संन्यास संर्पक, संबंध, संबल, संयम, संवर्द्धन, संविधान, संस्थान, संहार, सत्तू, सत्र, सत्त्व, सदन, सदावर्त, सफर, समीर, सर, सरकस, सरसिज, सरोवर, सलाम, सवैया, सहन, सहयोग, सहारा, साक्ष्य, साग, साधन, साया, सार, सारस, सिंगार, सिंदूर, सियार, सिर, सिरका, सिल्क, सींग, सीप, सुधांशु, सुमन, सुर, सुराग, सूअर, सूचीपत्र, सूत, सूत्र, सूना, सूद, सूप, सेतु, सेब, सेवन, सोच, सोन, सोना, सोफा, सोम, सोरठा, सोहर (गीत), सौख्य, सौजन्य, सौभाग्य, सौरभ, सौष्ठव, सौहार्द, स्तंभन, स्तर, स्थल, स्पंदन, स्पर्श, स्फोट, स्मारक, स्यापा, स्वत्व, स्वयंवर, स्वरूप, स्वर्ग, स्वर्ण, स्वांग, स्वाद।

हटर, हुंकार, हंस, हज, हक, हठधर्म, हठयोग, हड़कंप, हमला, हरण, हरिण, हल, हवन, हवाला, हार (माला), हाल (समाचार, दशा), हाशिया, हास्य, हित, हिम, हिल्लोल, हीरा, हीला, हुक्म, हुल्लड़, हुलास, हेतु, हेरफेर, हेलमेल, हैजा, होंठ, होटल, होश, ह्रास।

स्त्रीलिंग शब्द (Feminine)

अंगडाई, अंतड़ी, अंत्येष्टि, अकड़, अक्ल, अड़चन, अदालत, अदावत, अनबन, अचकन (ना. प्र. शब्दसागर), अप्सरा, अफवाह, अपेक्षा, अपील, अफीम, अभिधा, अभीप्सा, अवज्ञा, अहिंसा, अरहर, अवस्था।

आँच, आँत, आग, आजीविका, आज्ञा, आड़, आत्मा, आत्मजा, आत्महत्या, आदत, आन, आपदा, आफत, आमद, आबहवा, आय, आयु, आराधना, आवाज, आशंका, आस्तीन, आह, आहट, आशीष, आँख।

इं, ई
इंच, इंद्रिय, इच्छा, इजाजत, इज्जत, इमारत, इला, ईंट, ईद, ईख, ईर्ष्या। 

उ, ऊ
उड़ान, उत्कंठा, उथल-पुथल, उधेड़बुन, उपनिषद्, उपासना, उपेक्षा, उमंग, उम्र, उर्दू, (भाषा), उलझन, उल्का, उषा, उमस, ऊब, ऊहा।

ए, ऐ,
एकता, ऐंठ, ऐंठन, ऐनक।

ओ,औ
ओट, ओस, औलाद।

कक्षा, कटार, कटुता, कड़क, कतरन, कतार, कथा, कद, कदर, कन्या, कब्र, कमर, कमाई, कमान, कमीज, करवट, करुणा, कवायद, कसक, कसम, कसरत, कपास, कसौटी, कस्तूरी, कापा, कालिख, कांग्रेस, काश्त, करतूत, किलक, किस्मत, किशमिश, किस्त (ऋण चुकाने का भाग), कीमत, कील, कुंजी, कुटिया, कुशल (कुशलता), कुल्हाडी, कूक, कृपा, कैद, कोख, कोयल, कौम, क्रिया, क्रीड़ा, क्षमा।

खटपट, खटास, खटिया, खड़क, खड़ाऊँ, खनक, खपत, खबर, खरीद, खींच, खरोंच, खाँड, खाई, खाज, खाट, खातिर, खाद, खाल, खान (खनि), खिजाँ, खिदमत, खोच, खीझ, खीर, खील, खुदाई, खुरमा, खुशामद, खैरात, खोट, खोज, खोह।

गंगा, गंध, गजल, गटपट, गठिया, गड़बड़, गणना, गति, गदा, गनीमत, गफलत, गरज, गर्दन, गरिमा, गोरैया, गर्द, गर्दिश, गाँउ, गाजर, गाज (बिजली), गागर, गाथा, गाद, गिरपिट, गिरफ्त, गिरह, गिलहरी, गीता, गीतिका, गुंजाइश, गुड़िया, गुड्डी, गुफा, गुरुता, गेरु, गुलेल, गूज, गैल, गैस, गोट, गोद, गोपिका, गौ।

घटा, घटिका, घास, घिन, घुड़दौड़, घुड़साल, घूस, घृणा, घोषणा।

चमेली, चकई, चटक (चमक-दमक), चट्टान, चपत, चपला, चर्चा, चमक, चहक, चहल-पहल, चाँदी, चाँप, चाट, चादर, चारपाई, चाल, चाह, चाहत, चालढाल, चिकित्सा, चिट, चिमनी, चिलक, चिल्लाहट, चिढ़, चिता, चिंता, चित्रकला, चिनक, चिनगारी, चिप्पी, चिलम, चील, चीख, चींटी, चीनी, चुटिया, चुडैल, चुनरी, चुनौती, चुहल, चुहिया, चूक, चें-चे, चेचक, चेतक, चेतना, चेष्टा, चोंच, चोट, चौपड़ चौखट।

छटा, छत, छमछम, छलाँग, छवि, छाँह, छाछ, छानबीन, छाप, छाया, छाल, छींक, छींट, छीछालेदर, छूट, छूत, छेनी, छुआछूत।

जंग, जंजीर, जंभाई, जगह, जटा, जड़, जनता, जमात, जलवायु, जमानत, जमावट, जमीन, जलन, जय, जरा, जरूरत, जाँच, जाँघ, जागीर, जान, जायदाद, जिज्ञासा, जिद, जिरह, जिल्द, जिल्लत, जिह्वा, जीत, जीभ, नूँ, जुगुप्सा, जूठन, जेब, जेवनार, जोंक, जोत, ज्वाला।

झंकार, झंझट, झख, झिझक, झड़प, झनकार, झपक, झपट, झपास, झरझर, झकझक, झलमल, झाड़फूंक, झाड़ (झाड़ने की क्रिया), झाड़, झाँझ, झाँझर, झाँप, झाड़न, झाल, (तितास), झालर, झिड़क, झील, झूम।

टकसाल, टक्कर, टपक, टहल, टाँक, टाँग, टाँय-टाँय, टाप, टाल-मटोल, टिकिया. टिप-टिप, टिप्पणी, टीक, टोपटाप, टीमटाम, टीस, ट, टेंट, टेंटे, टेक, टेर, टोह, टोक, ट्रेन।

ठंडक, ठक-ठक, ठनक, ठमक, ठिठक, ठिलिया, ठ, ठेक, ठोकर, ठेस।

डग, डगर, डपट, डाक, डाट, डाँक, डाल, डींग, डीठ, डोर, डिबिया।

ढोलक।

तंद्रा, तकरीर, तकदीर, तकरार, तड़क-भड़क, तड़प, तबीयत, तमन्ना, तरंग, तरकीब, तरफ, तरह, तरावट, तराश, तलब, तलवार, तलाश, तशरीफ, तह, तहजीब, तहसील, तान, ताकझोंक, ताकत, तादाद, ताकीद, तातील, तारीफ, तालीम, तासीर, तिजारत, तीज, तुक, तुला, तोंद, तोबा, तोप, तोल, तोशक, त्योरी, त्रिया।

थकान, थकावट, थरथर, थलिया, थाप, थाह।

दक्षिण, दगा, दतवन, दमक, दरखास्त, दरगाह, दरार, दलदल, दलील, दस्तक, दहाड़, दारू, दहशत, दावत, दिनचर्या, दिव्या, दीक्षा, दीठ्, दीद, दीमक, दीवार, दुआ, दुकान, दुविधा, दुत्कार, दुम, दूरबीन, दुनिया, दुर्दशा, दूर, दूब, देखभाल, देखरेख, देन, देह।

धड़क, धड़कन, धरपकड़, धमक, धरा, धरोहर, धाक, धातु, धाय, धार, धारणा, धुंध, धुन, धूम, धूप (सूर्य-प्रकाश), धूप-छाँह, धौंक, धौंस, ध्वजा।

नकल, नस (स्नाय), नकाव, नकेल, नजर, नहर, नजाकत, नजात, नफरत, नफासत, नसीहत, नब्ज, नमाज, नाँद, नाक, निगाह, निद्रा, निराशा, निशा, निष्ठा, नींद, नीयत, नींव, नुमाइश, नोक, नोकझोंक, नौबत, नालिश, नेत्री।

पंचायत, पंगत, पकड़, पखावज, पछाड़, पतवार, पटपट, पतझड़, पताका, पत्तल, पनाह, परख, पसंद, परवाह, परत, परात, परिक्रमा, परिषद्, परीक्षा, पलटन, पहचान, पहुँच, पायल, पाँत, पिपासा, पिस्तौल, पुलिस, पुश्त, पुड़िया, पुकार, पूछताछ, पूँछ, पेंसिल, पेंशन, पेचिश, पोशाक, पैदावार, पौध, प्रक्रिया, प्रतिज्ञा, प्रतिभा, प्रतीक्षा, प्रभा।

फजीहत, फटकार, फटकन, फतह, फरियाद, फसल, फाँक, फाँस, फिक्र, फुरसत, फुलिया, फुहार, फॅक, फूट, फीस, फौज।

बंदूक, बकवास, बयार, बख्शीश, बगल, बचत, बदबू, बदौलत, बधाई, बनावट, बरात, बर्दाश्त, बर्फ, बला, बहार, बाँह, बातचीत, बागडोर, बाबत, बरसात, बारिश, बारूद, बाला, बाढ़, बालिका, बिछलन, बुदिया, बुनावट, बुलबुल, बुलाहट, बूंद, बूझ, बेर (दफा या बार), बैठक, बोतल, बोलचाल, बौखलाहट, बौछार।

भगदड़, भड़क, भनक, भभक, भरमार, भभूत, भर्त्सना, भाँग, भाप, भार्या, भिक्षा, भीख, भीड़, भुजा, भूख, भेंट, भेड़, भैंस, भौंह।

मंजिल, मँझधार, मंत्रणा, मंशा, मचक, मचान, मजाल, मज्जा, मखमल, मटक, मणि, मसनद, ममता, मरम्मत, मर्यादा, मलमल, मशाल, मशीन, मस्जिद, महक, मसल, महफिल, महिमा, माँग, माता, मात्रा, माया, माप, माला, मिठास, मिर्च, मिलावट, मीनार, मुद्रा, मुराद, मुलाकात, मुठभेड़, मुसकान, मुसीबत, मुस्कराहट, मुहब्बत, मुद्दत, मुहर, मूंग, मूंछ, मूर्खता, मेखला, मेहनत, मैना, मैल, मौज, मौत, मृत्यु।

यंत्रणा. यमना, यति (छंद में ठहराव का स्थान), याचना, यादगार, यातना, यात्रा, याद, यामा, योजना।

रंगत, रकम, रक्षा, रंग, रज (धूलि उभयलिंग), रगड़, रचना, रज्जु, रसद, रफ्तार, रसना, रस्म, रसा (धरती), राका, राख, रामायण, राय, राल, रास, राह, राहत, रियासत, रियायत, रिपोर्ट, रिश्वत, रिमझिम, रीझ, रीढ़, रुकावट, रुनझुन, रूह, रेखा, रेंडी, रेणु, रेत (बालू), रेल, रोक, रोकड़, रोर, रौनक, रोकटोक।

लंका, लकीर, लगन, लगाम, लटक, लताड़, लचर, लचक, लज्जा, लट, लड़ाई, लत, लता, लपक, लपट, ललक, ललकार, लहर, लात, लाग, लार, लाज, लालमिर्च, लागत, लानत, लालटेन, लालसा, लाश, लाह, लिप्सा, लियाकत, लीक, लीख, लू, लूट, लोटपोट, लोच, लौ।

वकालत, वसीयत, वांछा, वायु, विचारणा, विजय, विडंबना, विदाई, वंद्या, विधवा, विनय, वीप्सा, वेश्या, व्यथा, व्याख्या, विदुषी।

शंका, शपथ, शक्कर, शरण, शक्ल, शर्म, शतरंज, शर्त, शराफत, शबनम, शराब, शरारत, शलाका, शमशीर, शहादत, शान, शाखा, शाम, शामत, शिखा, शिकायत, शिरा, श्रृंखला, शौकत, श्रद्धा।

संतान (औलाद), संपदा, संसद्, सँभाल, संवेदना, संस्कृत (भाषा), संस्था, सजा, सजधज, सजावट, सटक, सड़क, सत्ता, सनक, सनद, सभ्यता, समझ, समस्या, सरसों, सरकार, सराय, सलामत, सलतनत, ससुराल, साँझ, सॉस, साजिश, सिफारिश, सीक, सीध, सीड़, सीमा, सुगंध, सुध, सुधा, सुरंग, सुलह, सुविधा, सुबह, सूजन, सूर्या (सूर्याणी), सूझ, सूरत, सेज, सेंध, सेना, सेवा, सेहत, सौगंध (कसम), सौगात, सौंफ, स्थापना।

हकीकत, हजामत, हड़प, हड़ताल, हड़बड़, हत्या, हद, हरकत, हवा, हलचल, हाँक, हाजत, हाय, हाट, हालत, हार (पराजय), हाल (हिलना, चक्के पर लोहे का घेरा), हाला, हिंसा, हिकमत, हिचक, हिदायत, हिफाजत, हिमायत, हिम्मत, हींग, हूक, हूर, हूल, हेला, हैसियत, होड़।

वचन
संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया के जिस रूप से संख्या का बोध हो, उसे 'वचन' कहते हैं। दूसरे शब्दों में, शब्दों के संख्याबोधक विकारी रूप का नाम 'वचन' है। 'वचन' का शाब्दिक अर्थ है-'संख्यावचन'।
संख्यावचन को ही संक्षेप में 'वचन' कहते हैं। 'वचन' का अर्थ 'कहना' भी है।

वचन के प्रकार
अंग्रेजी की तरह हिंदी में भी वचन के दो प्रकार हैं-
  1. एकवचन, और
  2. बहुवचन।

विकारी शब्द में जिस रूप से एक पदार्थ या व्यक्ति का बोध होता है, उसे एकवचन कहते हैं।
जैसे-नदी, लड़का, घोड़ा, बच्चा इत्यादि।

विकारी शब्द के जिस रूप से अधिक पदार्थों अथवा व्यक्तियों का बोध होता है, उसे बहुवचन
कहते हैं, जैसे-नदियाँ, लड़के, घोड़े, बच्चे इत्यादि।

वचन के रूपांतर
वचन के कारण सभी शब्दों-संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया के रूप विकृत होते हैं। किंतु, यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि सर्वनाम, विशेषण और क्रिया के रूप मूलत: संज्ञाओं पर ही आश्रित हैं। इसलिए 'वचन' में संज्ञा-शब्दों का रूपांतर होता है।
वचन के अधीन संज्ञा के रूप दो तरह से परिवर्तित होते हैं- (क) विभक्तिरहित और (ख) विभक्तिसहित।

विभक्तिरहित संज्ञाओं के बहुवचन बनाने के नियम
पुल्लिग संज्ञा के आकारांत को एकारांत कर देने से बहुवचन बनता है। जैसे-

एकवचन

बहुवचन

लड़का

लड़के

गधा

गधे

पहिया

पहिये

घोड़ा

घोड़े

कपड़ा

कपड़े

बच्चा

बच्चे


अपवाद
किंतु कुछ ऐसी भी पुल्लिग संज्ञाएँ हैं, जिनके रूप दोनों वचनों में एक-से रहते हैं। ये कुछ शब्द संबंधवाचक, संस्कृत के अकारांत और नकारांत हैं। जैसे-मामा, नाना, बाबा, दादा, कर्ता, दाता, पिता (तीनों 'कर्त' आदि ऋकारांत); योद्धा, युवा, आत्मा (युवन्-आत्मन् नकारांत); देवता जामाता इत्यादि।
उदाहरण-
  • एकवचन- हरि तुम्हारे मामा हैं। (बहुवचन-प्रेम और हरि तुम्हारे मामा हैं।)
  • एकवचन- मैं तुम्हारा नाना हूँ। (बहुवचन-श्याम और हरि के नाना आए हैं।)
  • एकवचन- राम एक योद्धा है। (बहुवचन-लड़ाई में बड़े-बड़े योद्धा खेत आए।)
  • एकवचन- किशोर एक दाता है। (बहुवचन-स्कूल के अनेक दाता हैं।)

पुल्लिग आकारांत के सिवा शेष मात्राओं से अंत होनेवाले शब्दों के रूप दोनों वचनों में एक-से रहते हैं।
जैसे-

एकवचन

बहुवचन

बालक पढ़ता है।

बालक पढ़ते हैं।

हाथी आता है।

हाथी आते हैं।

साधु आया है।

साधु आये हैं।

पति है।

पति हैं।

दयालु आया।

दयालु आए।

उल्लू बैठा है।

उल्लू बैठे हैं।


आकारांत स्त्रीलिंग एकवचन संज्ञा-शब्दों के अंत में 'एँ' लगाने से बहुवचन बनता है।
जैसे-

एकवचन

बहुवचन

शाखा

शाखाएँ

कथा

कथाएँ

लता

लताएँ

कामना

कामनाएँ

वार्ता

वार्ताएँ

अध्यापिका

अध्यापिकाएँ


आकारांत स्त्रीलिंग शब्दों का बहुवचन संज्ञा के अंतिम 'अ' को 'एँ' कर देने से बनता है।
जैसे-

एकवचन

बहुवचन

गाय

गायें

बात

बातें

बहन

बहनें

रात

रातें

सड़क

सड़कें

आदत

आदतें


इकारांत या ईकारांत स्त्रीलिंग संज्ञाओं में अंत्य 'ई' को ह्रस्व कर अंतिम वर्ण के बाद 'याँ' जोड़ने, अर्थात् अंतिम 'इ' या 'ई' को 'इयाँ' कर देने से बहुवचन बनता है। जैसे-

एकवचन

बहुवचन

तिथि

तिथियाँ

रीति

रीतियाँ

नीति

नीतियाँ

नारी

नारियाँ


जिन स्त्रीलिंग संज्ञाओं के अंत में 'या' आता है, उनमें 'या' के ऊपर चंद्रबिंदु लगाने से बहुवचन बनता है। जैसे-

एकवचन

बहुवचन

डिबिया

डिबियाँ

चिड़िया

चिड़ियाँ

गुडिया

गुड़ियाँ


अ-आ-इ-ई के अलावा अन्य मात्राओं से अंत होनेवाली स्त्रीलिंग संज्ञाओं के अंत में 'एँ' जोड़कर बहुवचन बनाया जाता है। अंतिम स्वर 'क' हुआ, तो उसे ह्रस्व कर 'एँ' जोड़ते हैं। जैसे-बहू-बहुएँ, वस्तु-वस्तुएँ।

संज्ञा के पुल्लिग अथवा स्त्रीलिंग रूपों में बहुवचन का बोध प्रायः 'गण', 'वर्ग', 'जन', 'लोग', 'चूंद' इत्यादि लगाकर कराया जाता है। जैसे-

एकवचन

बहुवचन

पाठक

पाठकगण

स्त्री

स्त्रीजन

नारी

नारिबंद

अधिकारी

अधिकारीवर्ग

आप

आपलोग


विभक्तिसहित संज्ञाओं के बहुवचन बनाने के नियम
विभक्तियों से युक्त होने पर शब्दों के बहुवचन का रूप बनाने में लिंग के कारण कोई परिवर्तन या व्यवधान नहीं होता। इसके कुछ सामान्य नियम निम्नलिखित हैं-

अकारांत, आकारांत (संस्कृत-शब्दों को छोड़कर) तथा एकारांत संज्ञाओं में अंतिम 'अ', 'आ' या 'ए' के स्थान पर बहुवचन बनाने में ‘ओं' कर दिया जाता है।
जैसे-

एकवचन

बहुवचन

विभक्तिचिह्न के साथ प्रयोग

लड़का

लड़कों

लड़कों ने कहा।

घर

घरों

घरों का घेरा।

गधा

गधों

गधों की तरह।

घोड़ा

घोड़ों

घोड़ों पर चढ़ो।

चोर

चोरों

चोरों को पकड़ो।


संस्कृत की आकारांत तथा संस्कृत-हिंदी की सभी उकारांत, ऊकारांत, अकारांत, औकारांत संज्ञाओं को बहुवचन का रूप देने के लिए अंत में 'ओं' जोड़ना पड़ता है। ऊकारांत शब्दों में 'ओं' जोड़ने के पूर्व 'ऊ' को 'उ' कर दिया जाता है।
जैसे-

एकवचन

बहुवचन

विभक्तिचिह्न के साथ प्रयोग

लता

लताओं

लताओं को देखो।

साधू

साधुओं

यह साधुओं का समाज है।

वधु

वधुओं

वधुओं से पूछो।

घर

घरों

घरों में जाओ।

जौ

जौओं

जौओं को काटो।


सभी इकारांत और ईकारांत संज्ञाओं का बहुवचन बनाने के लिए अंत में 'यों' जोड़ा जाता है। 'इकारांत' शब्दों में 'यों' जोड़ने के पहले 'ई' का 'इ' कर दिया जाता है।
जैसे-

एकवचन

बहुवचन

विभक्तिचिह्न के साथ प्रयोग

मुनि

मुनियों

मुनियों की यज्ञशाला।

गली

गलियों

गलियों में गए।

नदी

नदियों

नदियों का प्रवाह।

साड़ी

साड़ियों

साड़ियों के दाम दीजिए।

श्रीमती

श्रीमतियों

श्रीमतियों का मिलन हुआ।


वचन-संबंधी विशेष निर्देश
  • 'प्रत्येक' तथा 'हरएक' का प्रयोग सदा एकवचन में होता है। जैसे - प्रत्येक व्यक्ति यही कहेगा; हरएक कुआँ मीठे जल का नहीं होता।
  • दूसरी भाषाओं के तत्सम या तद्भव शब्दों का प्रयोग हिंदी व्याकरण के अनुसार होना चाहिए। उदाहरणार्थ, अंग्रेजी के 'फुट' (foot) का बहुवचन 'फीट' (feet) होता है, किंतु हिंदी में इसका प्रयोग इस प्रकार होगा-दो फुट लंबी दीवार है; न कि 'दो फीट लंबी दीवार है।' फारसी से आये 'मकान' या 'कागज' का बहुवचन हिंदी में फारसी के ही अनुसार 'मकानात' या 'कागजात' नहीं होगा। फारसी से आये 'वकील' शब्द का बहुवचन 'वकला' हिंदी में नहीं चलेगा। हमलोग हिंदी में लिखेंगे. 'वकीलों की राय लीजिए।' इसी प्रकार, अंग्रेजी के 'स्कूल' शब्द का बहुवचन अंग्रेजी की ही तरह 'स्कूल्स' बनाना अनुचित है। हिंदी में 'स्कूल' का बहुवचन 'स्कूलों' होगा।
  • भाववाचक और गुणवाचक संज्ञाओं का प्रयोग एकवचन में होता है। जैसे-मैं उनकी सज्जनता पर मुग्ध हूँ। लेकिन, जहाँ संख्या या प्रकार का बोध हो, वहाँ गुणवाचक और भाववाचक संज्ञाएँ बहुवचन में भी प्रयुक्त हो सकती हैं। जैसे-इस ग्रंथ की अनेक विशेषताएँ या खूबियाँ हैं; मैं उनकी अनेक विवशताओं को जानता हूँ।
  • प्राण, लोग, दर्शन, आँसू, ओठ, दाम, अक्षत इत्यादि शब्दों का प्रयोग हिंदी में बहुवचन में होता है। जैसे - आपके ओठ खुले कि प्राण तृप्त हुए, आपलोग आये, आशीर्वाद के अक्षत बरसे, दर्शन हुए।
  • द्रव्यवाचक संज्ञाओं का प्रयोग एकवचन में होता है। जैसे-उनके पास बहुत सोना है; उनका बहुत-सा धन बरबाद हुआ; न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी। किंतु, यदि द्रव्य के भिन्न-भिन्न प्रकारों का बोध हो, तो द्रव्यवाचक संज्ञा बहुवचन में प्रयुक्त होगी। जैसे-यहाँ बहुत तरह के लोहे मिलते हैं। चमेली, गुलाब, तिल इत्यादि के तेल अच्छे होते हैं।

कारक
संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से वाक्य के अन्य शब्दों के साथ उनका (संज्ञा या सर्वनाम का) संबंध सूचित हो, उसे ( उस रूप को) 'कारक' कहते हैं। अथवा संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से उनका (संज्ञा या सर्वनाम का) क्रिया से संबंध सूचित हो, उसे (उस रूप को) 'कारक' कहते हैं। इन दो ‘परिभाषाओं' का अर्थ यह हुआ कि संज्ञा या सर्वनाम के आगे जब 'ने', 'को', 'से' आदि विभक्तियाँ लगती हैं, तब उनका रूप ही 'कारक' कहलाता है, तभी वे वाक्य के अन्य शब्दों से संबंध रखने योग्य 'पद' होते हैं और 'पद' की अवस्था में ही वे वाक्य के दूसरे शब्दों से या क्रिया से कोई लगाव रख पाते हैं। 'ने', 'को', 'से' आदि विभिन्न विभक्तियाँ विभिन्न कारकों की हैं। इनके लगने पर ही कोई शब्द 'कारकपद' बन पाता है और वाक्य में आने योग्य होता है। 'कारकपद' या 'क्रियापद' बने बिना कोई शब्द वाक्य में बैठने योग्य नहीं होता। जैसे–“रामचंद्रजी ने खारे जल के समुद्र पर बंदरों से पुल बँधवा दिया।" इस वाक्य में 'रामचंद्रजी ने', 'समुद्र पर', 'बंदरों से' और 'पुल' संज्ञाओं के रूपांतर हैं, जिनके द्वारा इन संज्ञाओं का संबंध 'बँधवा दिया' क्रिया के साथ सूचित होता है।

कारक के भेद
हिंदी में कारक आठ हैं और कारकों के बोध के लिए संज्ञा या सर्वनाम के आगे जो प्रत्यय (चिह्न) लगाये जाते हैं, उन्हें व्याकरण में 'विभक्तियाँ' कहते हैं। कुछ लोग इन्हें परसर्ग भी कहते हैं। विभक्ति से बने शब्दरूप को 'विभक्त्यंत शब्द' या 'पद' कहते हैं। हिंदी कारकों की विभक्तियों के 'चिह्न' इस प्रकार हैं-

कारक

विभक्तियाँ

कर्ता (Nominative)

, ने

कर्म (Objective)

, को

करण (Instrumental)

से

संप्रदान (Dative)

को, के लिए

अपादान (Ablative)

से

संबंध (Genitive)

का, के की; रा, रे, री

अधिकरण (Locative)

में, पर

संबोधन (Addressive)

, हे, अजी, अहो, अरे इत्यादि।


कुछ लोग 'विभक्ति' के स्थान पर 'परसर्ग' लिखते हैं। लगता है, 'उपसर्ग' शब्द के अनुकरण पर 'परसर्ग' गढ़ लिया गया है, क्योंकि उपसर्ग का पूर्वप्रयोग होता है और विभक्ति का परप्रयोग। यदि उपसर्ग का नाम पूर्वसर्ग होता, तो विभक्ति का नाम भी भ्रांति से परसर्ग कोई रख सकता था। पं. किशोरीदास वाजपेयी का यह कहना ठीक है कि 'विभक्ति' शब्द हमें परंपरा से प्राप्त है, सुप्रसिद्ध है। उसकी जगह 'परसर्ग' चलाना किस काम का? क्या लाभ?

विभक्तियों की प्रायोगिक विशेषताएँ
प्रयोग की दृष्टि से हिंदी कारक की विभक्तियों की कुछ अपनी विशेषताएँ हैं। इनका व्यवहार करते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए-
  • सामान्यतः विभक्तियाँ स्वतंत्र हैं। इनका अस्तित्व स्वतंत्र है। चूंकि इनका काम शब्दों का संबंध दिखाना है, इसलिए इनका अर्थ नहीं होता है। जैसे-ने, से आदि।
  • हिंदी की विभक्तियाँ विशेष रूप से सर्वनामों के साथ प्रयुक्त होने पर प्रायः विकार उत्पन्न कर उनसे मिल जाती हैं। जैसे-मेरा, हमारा, उसे, उन्हें।
  • विभक्तियाँ प्रायः संज्ञाओं या सर्वनामों के साथ आती हैं। जैसे-मोहन की दुकान से यह चीज आयी है।
आगे इन पर विचार किया गया है।

विभक्तियों का प्रयोग
हिंदी व्याकरण में विभक्तियों के प्रयोग की विधि निश्चित है। हिंदी में दो तरह की विभक्तियाँ हैं-(1) विश्लिष्ट और (2) संश्लिष्ट। संज्ञाओं के साथ आने वाली विभक्तियाँ विश्लिष्ट होती हैं, अर्थात अलग रहती हैं। जैसे-राम ने, वृक्ष पर, लड़कों को, लड़कियों के लिए। सर्वनामों के साथ विभक्तियाँ संश्लिष्ट या मिली होती हैं। जैसे-उसका, किस पर, तुमको, तुम्हें, तेरा, तुम्हारा, उन्हें। यहाँ यह ध्यान रखना है कि तुम्हें-इन्हें में 'को' और तेरा-तुम्हारा में 'का' विभक्ति चिह्न संश्लिष्ट है। अतः, 'के लिए' जैसे दो शब्दों की विभक्ति में पहला शब्द संश्लिष्ट होगा और दूसरा विश्लिष्ट जैसे-तू-रे लिए तेरे लिए; तुम+रे लिए तुम्हारे लिए; मैं+रे लिए मेरे लिए। यहाँ प्रत्येक कारक और उसकी विभक्ति के प्रयोग का परिचय उदाहरण सहित दिया जाता है।

कर्ताकारक
वाक्य में जो शब्द काम करने वाले के अर्थ में आता है, उसे 'कर्ता' कहते हैं। जैसे–'मोहन खाता है।' इस वाक्य में खाने का काम 'मोहन' करता है। अतः, 'कर्ता' मोहन है। इसकी दो विभक्तियाँ हैं-ने और ०। संस्कृत का कर्ता ही हिंदी का कर्ताकारक है। वाक्य में कर्ता का प्रयोग दो रूपों में होता है-पहला वह, जिसमें 'ने' विभक्ति नहीं लगती, अर्थात् जिसमें क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष कर्ता के अनुसार होते हैं। इसे 'अप्रत्यय कर्ता कारक' कहते हैं। इसे 'प्रधान कर्ता कारक' भी कहा जाता है। उदाहरणार्थ, 'मोहन खाता है।' यहाँ 'खाता है' क्रिया है, जो कर्ता 'मोहन' के लिंग वचन के अनुसार है। इसके लिए विपरीत जहाँ क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष कर्ता के अनुसार न होकर कर्म के अनुसार होते हैं, वहाँ 'ने' विभक्ति लगती है। इसे व्याकरण में 'सप्रत्यय कर्ता कारक' कहते हैं। इसे 'अप्रधान कर्ता कारक' भी कहा जाता है। उदाहरणार्थ, 'श्याम ने मिठाई खाई।' इस वाक्य में क्रिया 'खाई' कर्म 'मिठाई' के अनुसार आयी है।

कर्ता के 'ने' चिह्न का प्रयोग
कर्ता कारक की विभक्ति 'ने' है। बिना विभक्ति के भी कर्ता कारक का प्रयोग होता है। 'अप्रत्यय कर्ता कारक' । में 'ने' का प्रयोग न होने के कारण वाक्य रचना में कोई खास कठिनाई नहीं होती। 'ने' का प्रयोग अधिकतर 'पश्चिमी हिंदी' में होता है। बनारस से पंजाब तक इसके प्रयोग में लोगों को विशेष कठिनाई नहीं होती; क्योंकि इस 'ने' विभक्ति की सृष्टि उधर ही हुई है। हिंदी भाषा की इस विभक्ति से अहिंदीभाषी घबराते हैं। लेकिन, थोड़ी सावधानी रखी जाए और इसकी व्युत्पत्ति को ध्यान में रखा जाए, तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि "इसका स्वरूप तथा प्रयोग जैसा संस्कृत में है, वैसा हिंदी में भी है, हिंदी में वैशिष्ट्य नहीं आया।"
खडी बोली हिंदी में 'ने' चिह्न कर्ता कारक में संज्ञा-शब्दों की एक विश्लिष्ट विभक्ति है, जिसकी स्थिति बडी नपी-तुली और स्पष्ट है। किंतु, हिंदी लिखने में इसके प्रयोग की भलें प्रायः हो जाया करती हैं। 'ने' का प्रयोग केवल हिंदी और उर्दू में होता है। अहिंदीभाषियों को 'ने' के प्रयोग में कठिनाई होती है। यहाँ देखना है कि हिंदी भाषा में 'ने' का प्रयोग कहाँ होता है और कहाँ नहीं होता।

'ने' का प्रयोग कहाँ होता है?
'ने' का प्रयोग कर्ता के साथ तभी होता है, जब क्रिया सकर्मक तथा सामान्यभूत, आसन्नभूत, पूर्णभूत, हेतुहेतुमद्भूत और संदिग्ध भूतकालों की और कर्तृवाच्य की हो।
  • सामान्यभूत-राम ने रोटी खायी।
  • आसन्नभूत-राम ने रोटी खायी है।
  • पूर्णभूत-राम ने रोटी खायी थी।
  • संदिग्धभूत-राम ने रोटी खायी होगी।
  • हेतुहेतुमद्भूत-राम ने पुस्तक पढ़ी होती, तो उत्तर ठीक होता।
तात्पर्य यह कि केवल अपूर्णभूत को छोड़ शेष पाँच भूतकालों में 'ने' का प्रयोग होता है।

जब संयुक्त क्रिया के दोनों खंड सकर्मक हों, तो अपूर्णभूत को छोड़ शेष सभी भूतकालों में कर्ता के आगे 'ने' चिह्न का प्रयोग होता है।
जैसे-
  • श्याम ने उत्तर कह दिया।
  • किशोर ने खा लिया।
इन उदाहरणों में काले टाइप वाली संयुक्त क्रियाओं के दोनों खंड सकर्मक हैं।

सामान्यतः अकर्मक क्रिया में 'ने' विभक्ति नहीं लगती, किंतु कुछ ऐसी अकर्मक क्रियाएँ हैं-जैसे-नहाना, छींकना, थूकना, खाँसना-जिनमें 'ने' चिह्न का प्रयोग अपवादस्वरूप होता है। इन क्रियाओं के बाद कर्म नहीं आता।
जैसे-
  • उसने थूका।
  • राम ने छीका।
  • उसने खाँसा।
  • उसने नहाया।

जब अकर्मक क्रिया सकर्मक बन जाए तब 'ने' का प्रयोग होता है, अन्यथा नहीं। जैसे
  • उसने टेढ़ी चाल चली।
  • उसने लड़ाई लड़ी।

प्रेरणार्थक क्रियाओं के साथ, अपूर्णभूत को छोड़ शेष सभी भूतकालों में 'ने' का प्रयोग होता है। जैसे
  • मैंने उसे पढ़ाया।
  • उसने एक रुपया दिलवाया।

'ने' का प्रयोग कहाँ नहीं होता?
  • सकर्मक क्रियाओं के कर्ता के साथ भविष्यत्काल में 'ने' का प्रयोग बिलकुल नहीं होता।
  • बकना, बोलना, भूलना-ये क्रियाएँ यद्यपि सकर्मक हैं, तथापि अपवादस्वरूप सामान्य, आसन्न, पूर्ण और संदिग्ध भूतकालों में कर्ता के 'ने' चिह्न का व्यवहार नहीं होता। यथा-वह बका; मैं बोला; वह भूला; मैं भूला! हाँ, 'बोलना' क्रिया में कहीं-कहीं 'ने' आता है। जैसे-उसने बोलियाँ बोलीं। 'वह बोलियाँ बोला'-ऐसा भी लिखा या कहा जा सकता है।
  • यदि संयुक्त क्रिया का अंतिम खंड अकर्मक हो, तो उसमें 'ने' का प्रयोग नहीं होता। जैसे- मैं खा चुका हूँगा। वह पुस्तक ले आया। उसे रेडियो ले जाना है।
  • जिन वाक्यों में लगना, जाना, सकना तथा चुकना सहायक क्रियाएँ आती हैं उनमें 'ने' को प्रयोग नहीं होता। जैसे - वह खाना चुका। मैं पानी पीने लगा। उसे पटना जाना है।

कर्मकारक
वाक्य में क्रिया का फल जिस शब्द पर पड़ता है, उसे कर्म कारक कहते हैं। इसकी विभक्ति 'को' है। कर्मकारक का प्रत्यय चिह्न 'को' है। बिना प्रत्यय के या अप्रत्यय कर्म के कारक का भी प्रयोग होता है। इसके नियम हैं-

बुलाना, सुलाना, कोसना, पुकारना, जगाना, भगाना इत्यादि क्रियाओं के कर्मों के साथ 'को' विभक्ति लगती है। जैसे-
  • मैंने हरि को बुलाया।
  • माँ ने बच्चे को सुलाया।
  • शीला ने सावित्री को जी भर कोसा
  • पिता ने पुत्र को पुकारा।
  • हमने उसे (उसको) खूब सबेरे जगाया।
  • लोगों ने शोरगुल करके डाकुओं को भगाया।

'मारना' क्रिया का अर्थ जब 'पीटना' होता है, तब कर्म के साथ विभक्ति लगती है, पर यदि उसका अर्थ 'शिकार करना' होता है, तो विभक्ति नहीं लगती, अर्थात् कर्म अप्रत्यय रहता है। जैसे-
  • लोगों ने चोर को मारा।
  • पर-शिकारी ने बाघ मारा।
  • हरि ने बैल को मारा।
  • पर-मछुए ने मछली मारी।
  1. बहुधा कर्ता में विशेष कर्तृत्वशक्ति जताने के लिए कर्म सप्रत्यय रखा जाता है। जैसे-मैंने यह तालाब खुदवाया है, मैंने इस तालाब को खुदवाया है। दोनों वाक्यों में अर्थ का अंतर ध्यान देने योग्य है। पहले वाक्य के कर्म से कर्ता में साधारण कर्तृत्वशक्ति का और दूसरे वाक्य में कर्म से कर्ता में विशेष कर्तृत्वशक्ति का बोध होता है। इस तरह के अन्य वाक्य हैं-बाघ बकरी को खा गया, हरि ने ही पेड़ को काटा है, लड़के ने फलों को तोड़ लिया इत्यादि। जहाँ कर्ता में विशेष कर्तृत्वशक्ति का बोध कराने की आवश्यकता न हो, वहाँ सभी स्थानों पर कर्म को सप्रत्यय नहीं रखना चाहिए। इसके अतिरिक्त, जब कर्म निर्जीव वस्तु हो, तब 'को' का प्रयोग नहीं होना चाहिए। जैसे–'राम ने रोटी को खाया' की अपेक्षा 'राम ने रोटी खायी ज्यादा अच्छा है। मैं कॉलेज को जा रहा हूँ। मैं आम को खा रहा हूँ; में कोट को पहन रहा हूँ-इन उदाहरणों में 'को' का प्रयोग भद्दा है। प्रायः चेतन पदार्थों के साथ 'को' चिह्न का प्रयोग होता है और अचेतन के साथ नहीं। पर, यह अंतर वाक्य-प्रयोग पर निर्भर करता है।
  2. कर्म सप्रत्यय रहने पर क्रिया रादा पुल्लिग होगी, किंतु अप्रत्यय रहने पर कर्म के अनुसार। जैसे - राम ने रोटी को खाया (सप्रत्यय), राम ने रोटी खायी (अप्रत्यय)।
  3. यदि विशेषण संज्ञा के रूप में प्रयुक्त हों, तो कर्म में 'को' अवश्य लगता है। जैसे-बड़ों को पहले आदर दो, छोटों को प्यार करो।

करण कारक
वाक्य में जिस शब्द से क्रिया के संबंध का बोध हो, उसे करण कारक कहते हैं। करण कारक के सबसे अधिक प्रत्ययचिह्न हैं। 'ने' भी करण कारक का ऐसा चिह्न है, जो करण कारक के रूप में संस्कृत में आये कर्ता के लिए 'एन' के रूप में, कर्मवाच्य और भाववाच्य में आता है। किंतु, हिंदी की प्रकृति 'ने' को सप्रत्यय कर्ता कारक का ही चिह्न मानती है। हिंदी में करण कारक के अन्य चिह्न हैं-से, द्वारा, के द्वारा, के जरिए, के साथ, के बिना इत्यादि। इन चिह्नों में अधिकतर प्रचलित 'से', 'द्वारा', 'के द्वारा' 'के जरिये' इत्यादि ही हैं। 'के साथ', के बिना' आदि साधनात्मक योग-वियोग जताने वाले अव्ययों के कारण, साधनात्मक योग बताने वाले 'के द्वारा' की ही तरह के करण कारक के चिह्न हैं। 'करण' का अर्थ है 'साधन'। अतः, 'से' चिह्न वहीं करण कारक का चिह्न है जहाँ यह 'साधन' के अर्थ में प्रयुक्त हो। जैसे-मुझसे यह काम न सधेगा। यहाँ 'मुझसे' का अर्थ है 'मेरे द्वारा', 'मुझ साधनभूत के द्वारा' या 'मुझ-जैसे साधन के द्वारा'। अतः 'साधन' को इंगित करने के कारण यहाँ 'मुझसे' का 'से' करण का विभक्ति चिह्न है। अपादान का भी विभक्ति चिह्न 'से' है। 'अपादान' का अर्थ है 'अलगाव की प्राप्ति'। अतः, अपादान का 'से' चिह्न अलगाव के संकेत का प्रतीक है, जबकि करण का, अपादान के विपरीत, साधना का, साधनभूत लगाव का। 'पेड़ से फल गिरा', 'मैं घर से चला' आदि वाक्यों में 'से' प्रत्यय 'पेड' को या घर को 'साधन' नहीं सिद्ध करता, बल्कि इन दोनों से बिलगाव सिद्ध करता है। अतः, इन दोनों वाक्यों में 'घर' और 'पेड़' के आगे प्रयुक्त 'से' विभक्ति चिह्न अपादान कारक का है और इन दोनों शब्दों में लगाकर इन्हें अपादान कारक का 'पद' बनाता है।

करण कारक का क्षेत्र अन्य सभी कारकों से विस्तृत है। इस करण में अन्य समस्त कारकों से छूटे हुए प्रत्यय या वे पद जो अन्य किसी कारक में आने से बच गए हों, आ जाते हैं। अतः, इसकी कुछ सामान्य पहचान और नियम जान लेना आवश्यक है-

'से' करण और अपादान दोनों विभक्तियों का चिह्न है, किंतु साधनभूत का प्रत्यय होने पर करण माना जायेगा, जबकि अलगाव का प्रत्यय होने पर अपादान जैसे-

करण
वह कुल्हाड़ी से वृक्ष काटता है।
मुझे अपनी कमाई से खाना मिलता है।
साधुओं की संगति से बुद्धि सुधरती है।

अपादान
पेड़ से फल गिरा।
घर से लौटा हुआ लड़का।
छत से उतरी हुई लता।

'ने' सप्रत्यय कर्ता कारक का चिह्न है। किंतु, 'से', 'के द्वारा' और 'के जरिये' हिंदी में प्रधानतः करण कारक के ही प्रत्यय माने जाते हैं : क्योंकि ये सारे प्रत्यय 'साधन' अर्थ की ओर इंगित करते हैं। जैसे-
  • मुझसे यह काम न सधेगा।
  • तीर से बाघ मार दिया गया।
  • उसके द्वारा यह कथा सुनी थी।
  • मेरे द्वारा मकान ढहाया गया था।
  • आपके जरिये ही घर का पता चला।

भूख, प्यास, जाड़ा, आँख, कान, पाँव इत्यादि शब्द यदि एकवचन, करण कारक में सप्रत्यय रहते हैं, तो एकवचन होते हैं और अप्रत्यय रहते हैं, तो बहुवचन। जैसे-

वह भूख से बेचैन है;

वह भूखों बेचैन है।

लड़का प्यास से मर रहा है।

लड़का प्यासों मर रहा है।

स्त्री जाड़े से काँप रही है;

स्त्री जाड़ों काँप रही है।

मैंने अपनी आँख से यह घटना देखी;

मैंने अपनी आँखों यह घटना देखी।

कान से सुनी बात पर विश्वास नहीं करना चाहिए;

कानों सुनी बात पर विश्वास नहीं करना चाहिए।

लड़का अब अपने पाँव से चलता है;

लड़का अब अपने पाँवों चलता है।


संप्रदान कारक
जिसके लिए कुछ किया जाए या जिसको कुछ दिया जाए, इसका बोध कराने वाले शब्द के रूप को संप्रदान कारक कहते हैं।
कर्म और संप्रदान का एक ही विभक्ति प्रत्यय है 'को', पर दोनों के अर्थों में अंतर है। संप्रदान का 'को', 'के लिए' अव्यय के स्थान पर या उसके अर्थ में प्रयुक्त होता है, जबकि कर्म के 'को' का 'के लिए' अर्थ से कोई संबंध नहीं है। नीचे लिखे वाक्यों पर ध्यान दीजिए।
  • कर्म-हरि मोहन को मारता है।
  • संप्रदान-हरि मोहन को रुपये देता है।
  • कर्म-उसके लड़के को बुलाया।
  • संप्रदान-उसने लड़के को मिठाइयाँ दीं।
  • कर्म-माँ ने बच्चे को खेलते देखा।
  • संप्रदान-माँ ने बच्चे को खिलौने खरीदे।

साधारणत:
जिसे कुछ दिया जाता है या जिसके लिए कोई काम किया जाता है, वह पद संप्रदान कारक का होता है। जैसे- भूखों को अन्न देना चाहिए और प्यासों को जल। गुरु ही शिष्य को ज्ञान देता है।

'के हित', 'के वास्ते', 'के निमित्त' आदि प्रत्यय वाले अव्यय भी संप्रदान कारक के प्रत्यय हैं। जैसे-
  • राम के हित लक्ष्मण वन गये थे।
  • तुलसी के वास्ते ही जैसे राम ने अवतार लिया।
  • मेरे निमित्त ही ईश्वर की कोई कृपा नहीं।

अपादान कारक
संज्ञा के जिस रूप से किसी वस्तु के अलग होने का भाव प्रकट होता है, उसे अपादान कारक कहते हैं। जिस शब्द में अपादान कारक की विभक्ति लगती है, उससे किसी दूसरी वस्तु के पृथक् होने का बोध होता है। जैसे-
  • हिमालय से गंगा निकलती है।
  • वह घर से बाहर आया।
  • मोहन ने घड़े से पानी ढाला।
  • बिल्ली छत से कूद पड़ी।
  • लड़का पेड़ से गिरा।
  • चूहा बिल से बाहर निकला।
करण और अपादान के 'से' प्रत्यय में अर्थ का अंतर करण कारक के प्रसंग में बताया जा चुका है।

संबंध कारक
संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से किसी अन्य शब्द के साथ संबंध या लगाव प्रतीत हो, उसे संबंध कारक कहते हैं। 
संबंध कारक का विभक्ति चिह्न 'का' है। वचन और लिंग के अनुसार इसकी विकृति 'के' और 'की' है। इस कारक से अधिकार कर्तृत्व, कार्य-कारण, मोल-भाव, परिमाण इत्यादि का बोध होता है। जैसे-
  • अधिकार-राम की किताब, श्याम का घर।
  • कर्तृत्व-प्रेमचंद के उपन्यास, भारतेंदु के नाटक।
  • कार्य-कारण-चाँदी की थाली. सोने का गहना।
  • मोल-भाव-एक रुपए का चावल, पाँच रुपए का घी।
  • परिमाण-चार भर का हार, सौ मील की दूरी, पाँच हाथ की लाठी।

द्रष्टव्य
बहुधा संबंध कारक की विभक्ति के स्थान में 'वाला' प्रत्यय भी लगता है। जैसे-रामवाली किताब, श्यामवाला घर, प्रेमचंदवाले उपन्यास, चाँदी वाली थाली इत्यादि।

संबंध कारक की विभक्तियों द्वारा कुछ मुहावरेदार प्रयोग भी होते हैं। जैसे-
  • दिन के दिन, महीने के महीने, होली की होली, दीवाली की दीवाली, रात की रात, दोपहर के दोपहर इत्यादि।
  • कान का कच्चा, बात का पक्का, आँख का अंधा, गाँठ का पूरा, बात का धनी, दिल का सच्चा इत्यादि।
  • वह अब आने का नहीं, मैं अब जाने का नहीं, वह टिकने का नहीं इत्यादि।

दूसरे कारकों के अर्थ में भी संबंध कारक की विभक्ति लगती है।
जैसे- जन्म का भिखारी-जन्म से भिखारी (करण), हिमालय का चढ़ना हिमालय पर चढ़ना (अधिकरण)

संबंध, अधिकार और देने के अर्थ में बहुधा संबंध कारक की विभक्ति का प्रयोग होता है।
जैसे-
हरि को बाल-बच्चा नहीं है। राम के बहन हई है। राजा के आँखें नहीं होती, केवल कान होते हैं। रावण ने विभीषण के लात मारी। ब्राह्मण को दक्षिणा दो।

सर्वनाम की स्थिति में संबंध कारक का प्रत्यय रा-रे-री और ना-ने-नी हो जाता है।
जैसे-
मेरा लड़का, मेरी लड़की, तुम्हारा घर, तुम्हारी पगड़ी, अपना भरोसा, अपनी रोजी।

अधिकरण कारक
क्रिया या आधार को सूचित करने वाली संज्ञा या सर्वनाम के स्वरूप को अधिकरण कारक कहते हैं।
कभी-कभी 'में' के अर्थ में 'पर' और 'पर' के अर्थ में 'में' का प्रयोग होता है।
जैसे-
  • तुम्हारे घर पर चार आदमी हैं-घर में।
  • दूकान पर कोई नहीं था-दूकान में।
  • नाव जल में तैरती है-जल पर।

कभी-कभी अधिकरण कारक की विभक्तियों का लोप भी हो जाता है।
जैसे-
  • इन दिनों वह पटने है।
  • वह संध्या समय गंगा-किनारे जाता है।
  • वह द्वार-द्वार भीख माँगता चलता है।
  • जिस समय वह आया था, उस समय मैं नहीं था।
  • उस जगह एक सभा होने जा रही है।
किनारे, आसरे और दिनों जैसे पद स्वयं सप्रत्यय अधिकरण कारक के हैं और यहाँ. वहाँ. समय आदि पदों का अर्थ सप्रत्यय अधिकरण कारक का है। अतः, इन पदों की स्थिति में अधिकरण कारक का प्रत्यय नहीं
लगता। इसके उदाहरण दिये जा चुके हैं।

संबोधन कारक
संज्ञा के जिस रूप से किसी के पुकारने या संकेत करने का भाव पाया जाता है, उसे संबोधन कारक कहते हैं। जैसे-हे भगवान्! मेरी रक्षा कीजिए। इस वाक्य में 'हे भगवान्' से पुकारने का बोध होता है। संबोधन कारक की कोई विभक्ति नहीं होती है। इसे प्रकट करने के लिए 'हे', 'अरे', 'रे' आदि शब्दों का प्रयोग होता है।

संज्ञा का पद-परिचय

संज्ञापदों का अन्वय करते समय संज्ञा, उसका भेद, लिंग, वचन, कारक और अन्य पदों का परिचय देते हुए अन्य पदों से उसका संबंध भी दिखाना चाहिए।
उदाहरण-
राम कहता है कि मैं मोहन की पुस्तकें पढ़ सकता हूँ।
इसमें 'राम', 'मोहन' और 'पुस्तकें' तीन संज्ञापद हैं। इनका पदान्वय इस प्रकार होगा
राम-संज्ञा, व्यक्तिवाचक, पुल्लिग, एकवचन, कर्ता कारक, 'कहता है' क्रिया का कर्ता।
मोहन-संज्ञा, व्यक्तिवाचक, पुल्लिग, एकवचन, संबंध कारक, इसका संबंध 'पुस्तकें' से है।
पुस्तकें-संज्ञा, जातिवाचक, स्त्रीलिंग, बहुवचन, कर्म कारक, 'पढ़ सकता हूँ' क्रिया का कर्म।

सारांश (Summary)

  • 'संज्ञा' उस विकारी शब्द को कहते हैं, जिससे किसी विशेष वस्त. भाव और जीव के नाम का बोध हो। वस्तु के अंतर्गत प्राणी, पदार्थ और धर्म आते हैं। इन्हीं के आधार पर संज्ञा के भेद किये गये हैं।
  • हिंदी व्याकरण में संज्ञा के मुख्यतः पाँच भेद हैं-(1) व्यक्तिवाचक, (2) जातिवाचक, (3) भाववाचक, (4) समूहवाचक और (5) द्रव्यवाचक। पं. गुरु के अनुसार, “समूहवाचक का समावेश व्यक्तिवाचक तथा जातिवाचक में और द्रव्यवाचक का समावेश जातिवाचक में हो जाता है।"
  • संज्ञा विकारी शब्द है। विकार शब्दरूपों को परिवर्तित अथवा रूपांतरित करता है। संज्ञा के रूप लिंग, वचन और कारक चिह्नों (परसर्ग) के कारण बदलते हैं।
  • शब्द की जाति को लिंग कहते हैं। संज्ञा के जिस रूप से व्यक्ति या वस्तु की गर या मादा जाति का बोध हो, उसे व्याकरण में 'लिंग' कहते हैं। 'लिंग' संस्कृत भाषा का एक शब्द है, जिसका अर्थ होता है 'चिह्न' या 'निशान'।
  • संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया के जिस रूप से संख्या का बोध हो, उसे 'वचन' कहते हैं। 'वचन' का शाब्दिक अर्थ है-'संख्यावचन'।
  • संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से वाक्य के अन्य शब्दों के साथ उनका (संज्ञा या सर्वनाम का) संबंध सूचित हो, उसे (उस रूप को) 'कारक' कहते हैं। हिंदी में कारक आठ हैं और कारकों के बोध के लिए संज्ञा या सर्वनाम के आगे जो प्रत्यय (चिह्न) लगाये जाते हैं, उन्हें व्याकरण में 'विभक्तियाँ' कहते हैं।
  • शब्द और पद-वाक्य से अलग रहने वाले शब्दों को 'शब्द' कहते हैं, किंतु जब किसी वाक्य में पिरो दिये जाते हैं, तब 'पद' कहलाते हैं। 'शब्द' सार्थक और निरर्थक दोनों हो सकते हैं।

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