बाबर - मुग़ल सम्राट बाबर का इतिहास | babar history in hindi

प्रस्तावना

सन 1526 का वर्ष मध्यकालीन भारत के इतिहास में दिल्ली सल्तनत के पतन और मुगल राजवंश के संस्थापन का वर्ष था। 21 अप्रैल, 1526 ई. को पानीपत के मैदान में अंतिम लोदी सुल्तान इब्राहीम की पराजय और मृत्यु के साथ ही उस दिल्ली सल्तनत का अंत हो गया जिसकी नीवं 1206 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने डाली थी। यद्यपि 1540 ई. में शेरशाह सरी ने दिल्ली सल्तनत का उद्धार किया और सुरी-वंश की स्थापना की, लेकिन 1556 ई. में इस राजवंश की समाप्ति के साथ ही दिल्ली सल्तनत के इस पुनरूद्धारकाल का भी अंत हो गया और मुगल साम्राज्य की सुदृढ़ता के साथ स्थापना हो गई। भारत के इतिहास में दिल्ली सल्तनत का युग 1206 ई. से 1525 ई. तक और मुगल राजवंश का युग 1525 ई. से 1707 ई. तक माना जाता है, यद्यपि नाममात्र के अंतिम मुगल बादशाह 1858 ई. तक बने रहे।
babar history in hindi
औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी 'बादशाह' कहलाने योग्य नहीं थे। अंतिम मुगल बादशाह बहादुरशाह तो अंग्रेजों का पेन्शन–भोक्ता ही बन गया था और जब 1857 ई. में भारत की आजादी की प्रथम क्रांति असफल हो गई तो अंग्रेजों ने बहादुरशाह को गद्दी से उतार कर रंगून भेज दिया जहां 1862 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।
इस प्रकार वैधानिक रूप से 1858 ई. में मुगल साम्राज्य का सदैव के लिए अंत हो गया। मुगल राजवंश में-
  • बाबर (1526-1530 ई.),
  • हुमायूं (1530-1540 ई. एवं 1555-1556 ई.),
  • अकबर (1556-1530 ई.),
  • जहांगीर (1605-1627 ई.),
  • शाहजहां (1627-1657 ई.) तथा
  • औरंगजेब (1658-1707 ई.)
नाम के महत्त्वपूर्ण सम्राट दिल्ली के सिंहासन पर बैठे।
औरंगजेब के अयोग्य और निर्बल उत्तराधिकारी थे– बहादुरशाह प्रथम, जहादारशाह, फर्रुखसियर, मुहम्मदशाह, अहमदशाह, आलमगीर द्वितीय, शाहआलम द्वितीय, अकबर द्वितीय एवं बहादुरशाह द्वितीय।
भारतीय इतिहास का मुगल युग संसार के इतिहास का एक अत्यन्त गौरवशाली युग था। "तत्कालीन संसार के अन्य साम्राज्यों में मुगल साम्राज्य कदाचित् सबसे बड़ा एवं शक्तिशाली साम्राज्य था जिसकी उपलब्धि न केवल कला एवं संस्कृति के क्षेत्रों में, वरन् एक सुसंगठित राजनीतिक व्यक्तित्व की संरचना, तथा हिन्दू और मुसलमान सम्राटों को एक राष्ट्र के अन्तर्गत सूत्रबद्ध करने में, उसके विशाल सैनिक एवं भौतिक साधनों के अनुरूप थी। अपने सर्वोच्च उत्कर्ष काल में उसने कार्यकुशलता के उस उच्च स्तर को प्राप्त किया, जिसके लिए कोई भी शासन उचित ही अभिमान कर सकता है।

बाबर पूर्व भारत की राजनीतिक अवस्था

सोलहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारत की राजनीतिक स्थिति संतोषजनक नहीं थी। देश सल्तनत के पतन के कारण या तो प्रान्तपतियों के नेतृत्व में स्वतंत्र हो गया था या यहां के स्थानीय राज्य अधिक शक्तिशाली हो गये थे। इन राज्यों में दिल्ली, काश्मीर, जौनपुर, बंगाल, गुजरात, मालवा, बहमनी राज्य, विजयनगर और स्वतंत्र राजपूत राज्य आदि प्रमुख थे।

दिल्ली
दिल्ली में इस समय लोदियों का राज्य था जिसे नाम मात्र को केन्द्रीय साम्राज्य कहा जा सकता है। इब्राहीम लोदी, जो 1517 ई. में दिल्ली के राज्य सिंहासन पर बैठा एक निर्बल शासक था। उसके राज्य में दिल्ली. आगरा, जौनपुर, बयाना, चंदेरी तथा बिहार सम्मिलित थे। इब्राहीम ने अपनी हठधर्मी तथा कठोर नीति के कारण कई स्वाभिमानी लोदी, लोहानी, फरमूली और नियाजी, अमीरों को अपने विरूद्ध बना लिया था। उसके चाचा आलमखाँ लोदी ने कुछ अपने पक्ष के सरदारों की सहायता से राज्य सिंहासन को प्राप्त करने के प्रयल किये। इस स्थिति से चारों ओर असंतोष का वातावरण छा गया। बिहार के कई सरदार दरियाखाँ लोहानी के नेतृत्व में विद्रोही हो गए। यहां तक कि उसके पुत्र बहादुरखाँ ने तो अपने आपको बिहार का स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया। इसी प्रकार जौनपुर में नासीरखाँ लोहानी तथामारूफ फरमूली ने विद्रोह का झंडा उठाया और जौनपुर को स्वतंत्र सत्ता घोषित कर दिया। इस परिस्थिति ने दिल्ली राज्य के मान और प्रतिष्ठा को हानि पहुंचाई। विद्रोह और अशांति के वातावरण ने लोदी-राज्य को क्षुब्ध और निर्बल बना दिया।

पंजाब
दिल्ली के निकटवर्ती पंजाब का प्रान्त वैसे तो दिल्ली सल्तनत का एक प्रमुख अंग था, परन्तु विपरीत परिस्थिति के कारण उसका हाकिम दौलतखाँ लोदी केन्द्रीय शक्ति को निर्बल पाकर अपनी स्वतंत्र शक्ति की स्थापना में लगा हुआ था। धीरे धीरे उसके सम्बन्ध इब्राहीम के साथ बिगड़ते चले गये और वह अपने प्रान्त का एक प्रकार से स्वतंत्र शासक बन बैठा। जब इब्राहीम को इन गतिविधियों का भान हुआ तो वह उसे दबाने और अपमानित करने की चेष्टा करने लगा। जब इस प्रकार के विचारों की सुचना इब्राहीम को मिली तो वह सुलतान के विरुद्ध बाबर से साँठ-गाँठ जोड़ने लगा, यह समझते हुए कि बाबर की शक्ति से भयभीत होकर इब्राहीम उसे पंजाब में स्वतंत्र बनाये रखेगा। इस महत्त्वाकांक्षा ने न केवल दौलतखाँ का सर्वनाश किया वरन् दिल्ली राज्य के अस्तित्व को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया।

काश्मीर
पंजाब से सटा हुआ एक और मुस्लिम राज्य था जिस पर शाह मिर्जा नामक एक वीर योद्धा ने 1339 ई. में अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था। उसने वहां के हिन्दूवंश का अंत कर नये मुस्लिम राजवंश की स्थापना की थी। इसी वंश का एक शासक जिसे जैनुलआबीदीन कहते हैं अपने समय का बड़ा उदार तथा धर्म सहिष्णु सुल्तान था। उसने संस्कृत साहित्य को प्रोत्साहन देकर अपनी उदार भावनाओं का परिचय दिया। जब 1470 ई. में उसकी मृत्यु हो गई तो काश्मीर में अव्यवस्था तथा अराजकता का वातावरण पैदा हो गया। उसकी आंतरिक अवस्था इतनी बिगड़ गई कि एतदकालीन राजनीति में काश्मीर कोई प्रभावशाली भाग लेने में असमर्थ था।

सिन्ध और मूल्तान
मुहम्मद तुगलक के शासनकाल से ही सिन्ध और मुलतान दिल्ली सल्तनत से पृथक हो चुके थे। सुमरावंश, जो कि चौदहवीं शताब्दी के मध्य में सिन्ध में अपना प्रभुत्व स्थापित करने में सफल हुआ अब निर्बल हो चला था। इसी समय कन्धार का हाकिम शाहबेग अरधुन, जिसे बाबर के दबाव ने सिन्ध छोड़ने के लिये विवश किया था, 1516 ई. में सिन्ध की ओर बढ़ा। उसने सुमरावंश के नरेश को परास्त कर वहां अपना राज्य स्थापित कर लिया। उसके उत्तराधिकारी शाह हुसैन में एक सूझ थी। उसने अपनी विवेक बुद्धि से सिन्ध की शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने की चेष्टा की। अपने राज्य–विस्तार की नीति के अन्तर्गत उसने मुलतान को अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया। बाबर के आक्रमण के समय अरधुन राज्य में एक व्यवस्था थी और वह शक्ति सम्पन्न तथा प्रभावशाली राज्य था।

बंगाल
फिरोज तुगलक के शासनकाल से बंगाल हुसैनी वंश के नेतृत्व में स्वतंत्रता प्राप्त कर चुका था। इस वंश की शक्ति इतनी बढ़ चली थी कि यहां के शासक अलाउद्दीन हुसैन ने (1493-1519 ई.) जौनपुर के हुसैन शाह शरकी को शरण देकर अपने प्रभाव का परिचय दिया था। उसने अपने राज्य की सीमा भी उड़ीसा तथा आसाम के कामतपुर तक बढ़ा ली थी। उसका लड़का नुसरतशाह एक योग्य शासक था। उसके समय में बंगला साहित्य का विकास हुआ तथा महाभारत को बंगलाभाषा में अनुदित किया गया। उसके राज्य में सुख और शांति थी और बंगाल की गणना सम्पन्न राज्यों में की जाती थी। वहां की परम्परा में उसी शासक को मान्यता दी जाती थी जो अपने शौर्य एवं साहस का परिचय देकर राजगद्दी को प्राप्त करे। बाबर स्वयं अपनी आत्मकथा में लिखता है कि बंगाली उसी शासक को मान्यता देते थे जो अपनी शक्ति के बल पर शासक बनता था और अपना स्वतंत्र कोष संचित करता था। वहां के लोगों में सिंहासन के प्रति बड़ी भक्ति थी। बाबर ने नुसरतशाह से सन्धि कर अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया। वह अपनी आत्मकथा में उसकी प्रशंसा करता है।

मालवा
मध्यभारत के मुस्लिम राज्यों में मालवा की ख्याति एक स्वतंत्र राज्य के रूप में थी। तैमूर के आक्रमण के अनन्तर गौरी वंशी दिलावरखाँ के नेतृत्व में यह राज्य दिल्ली सल्तनत से स्वतंत्र हो गया। परन्तु इस वंश की प्रभुता 1435 ई. में मुहम्मद खिलजी ने समाप्त कर दी और तब से वहाँ खिलजी राज्य की स्थापना हुई। महमूद अपने समय का एक योग्य शासक था। अभाग्यवश जब खिलजी सत्ता महमूद द्वितीय के, जो बाबर का समकालीन था हाथ में आयी तो मालवा अव्यवस्था का शिकार बन गया। वहाँ की स्थिति सुधारने के लिए महमूद द्वितीय ने चंदेरी के राजा मेदिनीराय की सहायता प्राप्त की और उसे अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया। मेदिनीराय ने अपने पक्ष को प्राबल बनाने के लिए कई हिन्दू तथा राजपूत सहयोगियों को नियुक्त किया। इस स्थिति से असंतुष्ट होकर मुस्लिम सामन्तों ने उसके विरूद्ध षड्यंत्र रचे और महमूद को भड़का कर गुजरात के सुल्तान मुजफ्फरशाह की सहायता प्राप्त करने को प्रेरित किया। महमूद ने गुजरात की सहायता से मेदिनीराय पर आक्रमण कर दिया। मेदिनीराय ने अपनी स्थिति को यथावत् बनाये रखने के लिए महाराणा सांगा की सहायता ली। महाराणा अपने राजनैतिक प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाना चाहता था। उसे यह एक अच्छा अवसर मिल गया। उसने अपने सैनिक शक्ति से महमूद को करारी हार दी और उसे चित्तौड़ में बंदी बना लिया, परन्तु अंत में राजपूत उदारता से प्रेरित होकर उसने उसे मुक्त कर दिया। इस उथल-पुथल के समय मालवा की शक्ति क्षीण हो गई। इस स्थिति का लाभ उठाकर 1531 ई. में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने मांडू पर अपना अधिकार स्थापित कर मालवा की स्वतंत्रता को समाप्त कर दिया।

गुजरात
मालवा की भांति दिल्ली सल्तनत की निर्बल अवस्था में गुजरात भी एक स्वतंत्र राज्य घोषित हो गया। 1401 ई. में मुजफ्फरशाह जिसका पहले का नाम जाफर खाँ था गुजरात का प्रथम स्वतंत्र सुल्तान बना। इस वंश का सबसे अधिक योग्य शासक महमूद बेगड़ा था जिसके समय में गुजरात एक सम्पन्न राज्य कहा जाता था। उसका उत्तराधिकारी मुजफ्फरशाह द्वितीय, जो बाबर का समकालीन शासक था, 1511 ई. में गुजरात का स्वामी बना। उसके समय में इस राज्य को महाराणा साँगा जैसे वीर तथा साहसी योद्धा से संघर्ष करना पड़ा। इसके फलस्वरूप गुजरात को बड़ी हानि उठानी पड़ी। 1526 ई. में जब उसकी मृत्यू हो गई तो यहाँ थोड़े समय अशांति के बादल छा गये। परन्तु शीघ्र ही स्थिति में सुधार हो गया जब राज्य की बागडोर उसके लड़के बहादुरशाह के हाथ में आ गई। वह एक सेयोग्य तथा सफल शासक सिद्ध हुआ।

बहमनी राज्य
दक्षिण भारत का एक मुस्लिम राज्य बहमनी राज्य था जो सुल्तान मुहम्मद तुगलक के शासनकाल में अपना स्वतंत्र अस्तित्व स्थापित करने में सफल हुआ। परन्तु विजयनगर राज्य से संघर्ष में व्यस्त रहने के कारण उसकी आंतरिक स्थिति बिगड़ती चली गई और अंत में सम्पूर्ण राज्य पाँच राज्यों में बँट गया। ये राज्य बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुण्डा, बरार और बीरद थे। अभाग्यवश इन राज्यों के आपसी वैमनस्य के कारण इनकी शक्ति क्षीण होती चली गई। यह राज्य बाबर के आक्रमण के समय राजनैतिक असंतुलन और अव्यवस्था का शिकार बना हुआ था।

खानदेश
यह भी एक मुस्लिम राज्य था जो मालवा के दक्षिण में विन्ध्य और सतपुड़ा के पर्वतीय क्षेत्र में बसा हुआ था। इसकी स्वतंत्रता मलिक राजा फरूकी के द्वारा सन 1388 ई. में हुई थी। 1399 ई. में फरूकी की मृत्य हो गई। इस घटना के अनन्तर खानदेश को गुजरात से आये दिन झगड़े मोल लेने पड़े जिससे इस राज्य की आंतरिक स्थिति बिगड़ चली। 1508 ई. में जब यहाँ के एक शासक दाउद की मृत्यु हो गई तो राज्य में उत्तराधिकार के प्रश्न को लेकर संघर्ष छिड़ गया। दो विभिन्न उत्तराधिकारियों के समर्थक अहमदनगर तथा गुजरात की बाह्य शक्तियाँ थी। गुजरात का एक दावेदार आदिलखाँ का पोषक था जिसे खानदेश का सिंहासन प्राप्त करने में सफलता मिली। जब 1520 ई. में आदिलखों की मृत्यु हो गई तो महमूद प्रथम उसका उत्तराधिकारी बना। आंतरिक निर्बलता और सतत् संघर्ष के कारण खानदेश की गणना शक्तिशाली राज्य के रूप में न हो सकी।

उपरोक्त मस्लिम शक्तियाँ अपनी-अपनी समस्याओं में उलझी हुई थीं जिससे दिल्ली सल्तनत में होने वाली उथल-पुथल पर ये शक्तियाँ अपनी सक्रियता नहीं बतला सकीं। केन्द्रीय शक्ति से दूर होना भी एक बहुत बड़ा कारण था जिससे ये राज्य दिल्ली की राजनीति पर कोई विशिष्ट प्रभाव स्थापित न कर सके। इन राज्यों के कई शासक या तो निर्बल थे या उनमें महत्त्वकांक्षा न थी। अतएव तत्कालीन राजनीति में उनको कोई प्रभाव नहीं था। वे तो अपनी-अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने के लक्ष्य को लेकर आपस में झगडते थे। उन्हें इस बात का भान भी न था कि कोई बाह्य शक्ति उनकी फूट और निर्बलता का लाभ उठा सकती है और उनके अस्तित्व पर खतरा उपस्थित हो सकता है। बाबर के लिये इन परिस्थितियों ने अनुकूल वातावरण बनाया।
इन मुस्लिम राज्यों के साथ-साथ कुछ एक हिन्दू राज्य भी थे जो अपने-अपने क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण थे। इन राज्यों में दक्षिण का विजयनगर राज्य और उत्तर के उड़ीसा तथा मेवाड़ प्रमुख थे।

विजयनगर राज्य
दक्षिण प्रदेश का यह राज्य तत्कालीन हिन्दू राज्यों में बड़ा शक्तिशाली राज्य था। इस राज्य की उत्पत्ति ही हिन्दू धर्म और संस्कृति के आधार को लेकर हुई थी। इसी कारण यहाँ के राजा निरन्तर अपने पड़ौसी बहमनी राज्य से संघर्ष करते रहे। यहाँ के अनेक योग्य शासक भी हुए थे जिनमें कृष्णदेव राय का नाम विशेष उल्लेखनीय है। उसकी गणना उस युग के उन महान शासकों में की जाती है जो रण-कुशल तथा साहित्य और कला के प्रेमी थे। बाबर के आक्रमण के समय इस राज्य की राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति अच्छी थी। उस युग के विदेशी यात्रियों ने विजयनगर की समृद्धि और सम्पन्नता की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। वे उस राज्य के ऐश्वर्य और सुख-शांति को देखकर विस्मित हो गये थे, जैसा कि उनके द्वारा दिये गये वर्णन से स्पष्ट है। अपनी आंतरिक और पड़ोसी राज्य द्वारा उत्पन्न की गई समस्याओं के कारण सशक्त होते हुए यह राज्य उत्तर भारत की राजनीति में कोई सक्रिय भाग नहीं ले सका।

उड़ीसा
यह पूर्वीय भारत का एक विशाल राज्य था। यहाँ के सशक्त शासकों के कारण दिल्ली के शासक इस राज्य पर अपनी अच्छी तरह से प्रभुता स्थापित करने में असफल रहे। दूरस्थ होने से इस राज्य का उत्तर भारत की राजनीति पर कोई प्रभाव नहीं था। परन्तु उड़ीसा ने अपने बल और प्रभाव से अलबत्ता बंगाल की शक्ति को पश्चिम की ओर प्रसारित होने से रोके रखा। इस अर्थ में उड़ीसा की शक्ति का अपना एक स्वतंत्र महत्त्व था।

मेवाड़
ऊपर दिये गये हिन्दू राज्यों में मेवाड़ राज्य अपने आप में एक स्वतंत्र शक्ति थी जिसे छठी शताब्दी से लेकर 16वीं शताब्दी के प्रथम चरण तक वहाँ के कर्मण्य शासकों ने निर्मित किया था। ऐसे शसको में गुहिल, बाया, जैतसिंह आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। इन शासकों की मानमर्यादा का दूसरा प्रतीक महाराणा कुम्भा भी था जिसने अपने साहस, धैर्य और विद्यानुराग से देश में एक विशिष्ट नाभ अर्जित किरा था। अनेकों किले, राजप्रासाद तथा मन्दिरों के निर्माण द्वारा उसने अपूर्व ख्याति अर्जित की थी तथा सैनिक बल और जनहित कल्याण के पक्ष को परिपुष्ट किया था। उसने मालवा के सुल्तान को पराजित कर मध्यभारत में अपने प्रभाव को स्थापित करने में सफलता प्राप्त की थी। बाबर के आक्रमण के समय यहाँ का शासक महाराणा साँगा (संग्रामसिंह) था जिसने अनेकों युद्धों में भाग लेकर एक अच्छे योद्धा होने का परिचय दिया था। कई युद्धों में भाग लेने से उसकी एक आँख और एक बाँह जाती रही थी और वह एक पैर से लंगड़ा भी हो गया था। शरीर पर अनेक शस्त्रों के घाव लगने के कारण कर्नल टॉड ने उसे सैनिक का भग्नावशेष' कहा है, जो उसके कुशल सैनिक गुण का द्योतक है। वह न केवल एक वीर योद्धा ही था वरन् कुशल राजनीतिज्ञ भी। उसने अपने राजनीतिज्ञ प्रभाव से अनेक राजा और महाराजाओं को अपना सहयोगी बना रखा था जो बड़ी संख्या में अपनी सैनिक शक्ति से उसके नेतृत्व में शत्र का मुकाबला करने को सर्वदा उद्यत रहते थे। गुजरात मालवा और मध्यभारत की राजनीति में सक्रिय भाग लेकर उसने उत्तरी भारत में अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था। जब बाबर भारत आया तो उसने उससे इब्राहीम को परास्त करने के लिए सहयोग चाहा। इसी घटना को लेकर बाबर और साँगा का वैमनस्य बढ़ा जिसका विस्तार से वर्णन यथास्थान किया जायेगा।

ऊपर वर्णित हिन्दू राज्यों की स्थिति से ऐसा प्रतीत होता है कि वे शक्तिशाली अवश्य थे, परन्तु उनके लिए अपनी-अपनी समस्याएँ थीं। उनकी भौगोलिक दूरी भी उस समय की परिस्थिति के लिए उपयोगी न थी। इस प्रकार की राजनीतिक परिस्थिति से हमें एक नवीन स्थिति स्पष्ट होती है कि स्थानीय शक्तियाँ या तो निर्बल थीं या वे अपनी निजी शक्ति के परिवर्तन में पडौसी शक्तियों से संघर्ष में लगी हुई थीं। इसका प्रत्यक्ष फल यह हुआ कि कोई भी शक्ति सक्रिय रूप से न तो अफगानों के साथ और न मुगलों के साथ मिल सकी। जो अफगान-मुगल संघर्ष हुआ वह इन दोनों शक्तियों में अकेला हुआ जिसमें लोदियों की शक्ति जो निर्बल थी मुगलों की होड़ में विजयी न हो सकी। सम्पूर्ण देश में कोई भी ऐसा शक्तिशाली शासक न था जो बाहरी आक्रमण से देश की रक्षा करने के लिए देश को संगठित कर सकता था।

सैनिक स्थिति

सैन्य व्यवस्था– बाबर के आक्रमण के समय भारत की सैन्य-व्यवस्था अत्यन्त दोषपूर्ण हो चुकी थी। नये युद्ध उपकरणों से अपरिचितता- संसार में निर्मित होने वाले युद्ध उपकरणों से भारतीय अपरिचित थे तथा तोप, जिनका प्रयोग मध्य एशिया में बहुलता से किया जाने लगा था, भारतीयों के लिए सर्वथा नवीन वस्तु थी।
संगठन का अभाव भारत की सैन्य व्यवस्था का अन्य महत्त्वपूर्ण दोष था, सैनिकों में संगठन का अभाव । भारतीय सेना में तुर्क, अफगान, देशी मुसलमान, हिन्दू आदि अनेक वर्गो के सैनिक थे जो सुल्तान से अधिक अपनी जाति अथवा वर्ग के नेता के प्रति स्वामिभक्त होते थे तथा यदि उनके नेता चाहें तो वह सुल्तान विरुद्ध युद्ध करने को तैयार रहते थे। सेना में राष्ट्रीयता का अभाव था।

दोषपर्ण विभाजन
सेनाओं का विभाजन भी प्राचीन पद्धति के अनुसार चार भागों में था इस्तिसेना को प्राध्यान्य दिया जाता था, जो तोपों की भयंकर अग्नि के सम्मुख पीछे की ओर अपनी ही सेना को रौंदते हुए भागने लगते थे। इस दोषपूर्ण सैन्य-व्यवस्था के कारण भारतीय संख्या में अत्यधिक होते हुए भी बाबर की गिनी-चुनी सुशिक्षित सेना के सम्मुख टिक न सके तथा बाबर को भारत पर विजय प्राप्त करने में सफलता मिली। भारत की राजनीति श्रृंखला तथा प्राचीन सैन्य व्यवस्था भारतीयों की पराजय का सर्वप्रमुख कारण बन । बाबर के आक्रमण के समय भारत की आर्थिक दशा बाबर ने भारत की आर्थिक समृद्धि से आकृष्ट होकर भारत-विजय करने का निश्चय किया था। जिसे समय बाबर ने भारत पर आक्रमण किया था उस समय धन-सम्पन्न एवं समृद्धिशाली देश था तथा इस गुण के लिए यह विदेशों में विख्यात था। भारत की आर्थिक सम्पन्नता का प्रमुख कारण कृषि तथा व्यापार का सुन्दर सामंजस्य था। कृषि प्रधान देश होते हुए भी इस समय भारत विदेशों के साथ व्यापार करता था जिससे अत्यधिक लाभ होता था।

कृषि

कृषि इस समय भारत का प्रमुख उद्यम था। सिंचाई की सुव्यवस्था के कारण देश में अनाज बहुतायत से उत्पन्न होता था। डॉ. श्रीवास्तव के शब्दों में, "इस युग में कृषि की अवस्था बड़ी अच्छी थी।' यद्यपि बाबर लिखता है कि भारत के गांव थोड़े ही समय में आबाद और बर्बाद हो जाते हैं। जब-जब कृषि की ओर उचित ध्यान और कृषकों को समुचित प्रोत्साहन दिया जाता था खेतों और खलिहानों में फसलों का अपार वैभव नाचता था, परन्तु किसी युद्ध अथवा राज्य परिवर्तन के समय दूर-दूर तक विनाश ही दिखाई देता था।

व्यापार

यद्यपि सल्तानों ने राज्य की ओर से व्यापार को कोई प्रोत्साहन नहीं दिया, तथापि इस समय व्यापार उन्नत दशा में था। भारत का पृथकत्व समाप्त हो जाने के कारण विदेशों से व्यापारिक सम्पर्क स्थापित हो गये। भारत कनाड़ा, मसाला, बर्तन आदि बाहर भेजता था। इसके बदले हीरे, जवाहरात, घोड़े तथा गुलाम बाहर से आते थे। इस समय भारत में अनेक घरेलू उद्योग-धन्धे प्रचलित थे। इनमें कपड़ों का उद्योग महत्त्वपूर्ण था। सूती, ऊनी तथा रेशमी तीनों प्रकार का कपड़ा भारत में तैयार होता था जो विदेशों में विलासिता की सामग्री समझा जाता था। बंगाल, बिहार, उड़ीसा, गुजरात आदि कपड़े के लिए प्रसिद्ध थे। चमड़े की वस्तुएं भी बहुतायत से निर्मित होती थीं। इन वस्तुओं के निर्माण का अधिकतर भार हिन्दुओं पर था। सामाजिक दशा इस समय समाज दो वर्गों में विभाजित था हिन्दू और मुसलमान। परन्तु ये परस्पर विरोधी जातियां अपने मतभेद त्याग कर परस्पर सहयोग तथा समन्वय की भावनाएं रखती थीं। कुछ पीढ़ियों के पश्चात विदेश से आने वाले मुसलमानों ने भारतीय संस्कृति के प्रमुख तत्त्वों को ग्रहण करना आरम्भ कर दिया तथा उनमें सहिष्णुता और उदारता के भाव जाग्रत होने लगे। बाबर जिस समय भारत में आया उसने इस तथ्य का स्पष्टतः अनुभव किया। अपनी आत्मकथा में उसने इस ओर संकेत भी किया है। उनका कथन है कि भारत के मुसलमानों में एक अद्भुत भारतीयपन दृष्टिगोचर होता है जो भारत के अतिरिक्त अन्य कहीं भी प्रतीत नहीं होता। यह भारतीयपन भारत के मुसलमानों को अन्य देश के मुसलमानों से पृथक करता है। प्रान्तीय शासकों के उदारतापूर्ण व्यवहार के कारण तथा भक्ति आंदोलन के कारण हिन्दू तथा मुसलमान जातियां परस्पर मतभेद भूलकर एक-दूसरे के निकट आ रही थीं। धार्मिक अत्याचार कम हो गये थे तथा मुस्लिम शासकों का विदेशीपन धीरे-धीरे कम होता जा रहा था। इस तथ्य का वर्णन डॉ. आशीर्वादी लाल ने इन शब्दों में किया है, "कश्मीर के सुल्तान जैनुल आबेदीन ने न केवल अनेक निर्वासित ब्राह्मण परिवार को ही वापस बुलवाया वरन् उसने अनेक विद्वान पंडितों को अपने दरबार में आश्रय दिया। जिन्हें धर्म की पूर्ण स्वतंत्रता थी। उसने राज्य में गोहत्या बंद करवा दी और अपने दरबार में संस्कृत और हिन्दी के विद्वानों को आश्रय दिया। इस सुयोग्य शासक के राज्य काल में जिसे "कश्मीर का अकबर" के नाम से ठीक ही पुकारा जाता है, लोग प्रसन्न और संतुष्ट थे और समान जीवन का सुख ले रहे थे। इसी प्रकार बंगाल के शासक अलाउद्दीन हुसैन शाह ने भी हिन्दू-मुसलमान के भेदभाव को आश्रय नहीं दिया।"
इस प्रकार बाबर ने जिस समय भारत पर आक्रमण किया उस समय भारत में सामाजिक भेदभाव की भावना कम होने लगी थी, जिसका पूर्ण उत्कर्ष बाबर के महान पौत्र अकबर के काल में दृष्टिगोचर होता है।

बाबर द्वारा हिन्दुस्तान का वर्णन
बाबर ने अपनी आत्मकथा 'बाबरनामा' अथवा 'तुजुक-ए-बाबरी' में अपनी भारतीय अभियानों के समय का विवरण दिया है, जिसके कुछ पहलू यहां दिये जा रहे हैं

हिन्दुस्तान के शासक-"जब मैंने हिन्दुस्तान को विजय किया, तो वहां पांच मुसलमान तथा दो काफिर बादशाह राज्य करते थे। इन लोगों को बड़ा सम्मान प्राप्त था और ये स्वतंत्र रूप में शासन करते थे। इनके अतिरिक्त पहाड़ियों तथा जंगलों में भी छोटे-छोटे राय एवं राजा थे, किन्तु उनको अधिक आदर सम्मान प्राप्त नहीं था।"
"सर्वप्रथम अफगान थे, जिनकी राजधानी देहली थी, मीरा से बिहार तक के स्थान उनके अधिकार में थे। अफगानों के पूर्व जौनपुर सुल्तान हुसैन शर्की के अधीन था। इन लोगों के वंश को हिन्दुस्तानी पूर्वी कहते हैं। देहली सुल्तान इब्राहीम के अधिकार में थी। वे लोग सैय्यद थे। दूसरे, गुजरात में सुल्तान मुजफ्फर था। इब्राहीम की पराजय के कुछ दिन पूर्व उसकी मृत्यु हो गयी थी। तीसरे, दक्षिण में बहमनी थे, किन्तु आजकल दक्षिण के सुल्तानों की शक्ति एवं अधिकार छिन्न-भिन्न हो गया है। उनके समस्त राज्य पर उनके बड़े-बड़े अमीरों ने अधिकार जमा लिया है। चौथे, मालवा में, जिसे मन्दू भी कहते हैं, सुल्तान महमूद भी था। वे खिलजी सुल्तान कहलाते हैं, किन्तु राणा सांगा ने उसे पराजित करके उसके राज्य के अधिकांश भाग पर अधिकार जमा लिया था। यह वंश भी शक्तिहीन हो गया था। पांचवें, बंगाल के राज्य में नुसरतशाह था। वह सैय्यद था। उसकी उपाधिक सुल्तान अलाउद्दीन थी।

प्रदेश और नगर

"हिन्दुस्तान के प्रदेश और नगर अत्यन्त कुरूप हैं। इसके जगर और प्रदेश सब एक जैसे हैं। इसके बागों के आस-पास दीवारें नहीं हैं और इसका अधिकांश हिस्सा मैदान है। कई स्थान पर ये मैदान कांटेदार झाड़ियों से इतने ढके हुए हैं कि परगनों के लोग इन जंगलों में छिप जाते हैं। वे समझते हैं कि वहां पर उनके पास कोई नहीं पहुंच सकता। इसप्रकार ये लोग प्रायः विद्रोह करते रहते हैं और कर नहीं देते हैं। भारतवर्ष में गांव ही नहीं, बल्कि नगर भी एकदम उजड़ जाते हैं और बस जाते हैं। बड़े-बड़े नगरों, जो कितने ही बरसों से बसे हुए हैं, खतरे की खबर सुनकर एक दिन में या डेढ़ दिन में ऐसे सूने हो जाते हैं कि वहां आबादी का कोई चिन्ह भी नहीं मिलता। लोग भाग जाते हैं।" बाबर ने अपने अभियान के दौरान जिन भू-खण्डों को देखा था, उन्हीं का उल्लेख किया है।

हिन्दुस्तान की विशेषताएं

"हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह बहुत बड़ा देश है।यहां अत्यधिक सोना-चांदी है। वर्षा ऋतु में यहां की हवा बड़ी ही उत्तम होती है। शीतकाल तथा ग्रीष्म ऋतु में भी हवा बड़ी ही उत्तम रहती है। यहां बल्ख तथा कन्द गार के समान तेज गर्मी नहीं पड़ती और जितने समय तक वहां गर्मी पड़ती है, उसकी अपेक्षा यहां आधे समय तक भी गर्मी नहीं रहती। हिन्दुस्तान का एक बहुत बड़ा गुण यह है कि यहां हर प्रकार एवं हर कला के जानने वाले असंख्य कारीगर पाये जाते हैं। प्रत्येक कार्य तथा कला के लिए जातियां निश्चित हैं, जो पूर्वजों के समय से वहीं कार्य करती चली आ रही हैं।"

समय का विभाजन

"हमारे देश में दिन और रात को 24 भागों में विभाजित किया जाता है। प्रत्येक भाग को एक साअत कहते हैं। हर साअत को 60 भागों में विभाजित करते हैं। प्रत्येक भाग को एक दकीका कहते हैं। इस प्रकार पूरे दिन तथा रात में 1440 दकीके होते हैं।"
"हिन्दुस्तान वाले रात और दिन को 60 भागों में विभाजित करते हैं। प्रत्येक भाग घड़ी कहलाता है। ये दिन तथा रात को चार-चार भागों में विभाजित करते हैं और प्रत्येक भाग पहर कहलाता है, जिसे फारसी में पास कहते हैं। हिन्दुस्तान के सभी बड़े-बड़े नगरों में कुछ ऐसे लोग नियुक्त किये जाते हैं, जो घड़ियाली कहलाते हैं। दो अंगुल मोटा, थाली के बराबर एक पीतल का टुकड़ा काट लिया जाता है, जो घड़ियाल कहलाता है। इसे किसी ऊंचे स्थान पर लटका दिया जाता है।"
"इसके अतिरिक्त हिन्दुस्तान वाले प्याले के समान एक बर्तन रखते हैं। उसके पेंदे में छेद होता है। हर घड़ी पर वह भर जाता है। घड़ियाली इस बर्तन में जल भरकर प्रतीक्षा किया करते हैं। जब एक बर्तन भर जाता है, तो वे मुरगी से घड़ियाल पर एक चोट मार देते हैं। जब वह बर्तन पुनः भर जाता है, तो वे दो बार मुरगी को घड़ियाल पर मार देते हैं। इसी प्रकार पहर के अंत तक वे एक बढ़ाकर मुरगी मारते जाते हैं। पहर समाप्त हो जाने के उपरान्त वे जल्दी-जल्दी कई बार घड़ियाल को बजाते हैं और यदि एक पहर समाप्त हो जाता है, तो जल्दी-जल्दी बजाने के उपरान्त क्षण भर ठहरकर एक बजा देते हैं। यदि दूसरा पहर समाप्त हो जाता है, तो जल्दी-जल्दी बजाने के उपरान्त दो बजाते हैं, इसी प्रकार तीन और चार। जब दिन के चार पहर समाप्त हो जाते हैं, तो रात के चार पहरों में भी इसी नियम से घड़ियाल बजाए जाते हैं।"

बाबर द्वारा भारत पर आक्रमण

समरकंद पर उजबेक नेता उबैदुल्ला खान का अधिकार हो जाने के बाद बाबर 1591 ईत्र तक काबुल में शांतिपूर्वक शासन करता रहा, लेकिन 1513 ई. के बाद वह भारत अभियान की तैयारी भी करता रहा। बाबर ने उजबेकों से तुलुगमा पद्धति, मंगोलों व अफगानों से व्यूह रचना, ईरानियों से बन्दूकों का प्रयोग और अपने सजातीय तुकों से अश्वारोही सेना का संचालन सीख लिया था। इस प्रकार बाबर ने भारत पर आक्रमण करने से पूर्व अपनी युद्ध कला को अत्यन्त विकसित कर लिया था। भारत पर बाबर के आक्रमण के अनेक कारण थे। सर्वप्रथम तो स्वयं बाबर अत्यन्त ही महत्वाकांक्षी और साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का था। इसलिये काबुल जैसे छोटे से प्रदेश से वह संतुष्ट नहीं रह सकता था। दूसरा, बाबर भारत पर अपना पैतृक अधिकार मानता था, क्योंकि तैमुर ने पश्चिमी पंजाब पर अधिकार किया था तथा उसके प्रतिनिधि खिज खां ने दिल्ली पर भी अपना अधिकार कर लिया था। अतः बाबर अपने पूर्वजों के राज्य को पुनः प्राप्त करना चाहता था। तीसरा, उस समय भारत की तत्कालीन राजनीति भी बाबर के अनुकूल थी। पंजाब का सूबेदार दौलत खां लोदी वहां का स्वतंत्र शासक बनना चाहता था। अतः उसने इब्राहीम लोदी के विरुद्ध बाबर को भारत आने का निमंत्रण दे दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि बाबर को दिल्ली दरबार के षड़यंत्रों की जानकारी मिल गई। अंत में, वह भारत में इस्लाम का प्रचार-प्रसार करना चाहता था। इन सभी कारणों ने बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया।

बाबर के भारत में प्रारम्भिक प्रयास

प्रथम आक्रमण
बाबर ने भारत पर पहला अभियान 1519 ई. में किया था। बाबर ने बाजौर  पर आक्रमण कर दूर्ग को घेर लिया। दुर्ग रक्षकों ने बड़ी वीरता से सामना किया, लेकिन वे बन्दकों के सामने टिक नहीं सके। अतः कुछ ही घण्टों में 7 जनवरी 1519 को बाबर ने बाजौर लिला जीत लिया। बाजौर निवासियों ने प्रतिरोध किया था, अत: बाबर ने लगभग तीन हजार लोगों की हत्या करवा दी तथा स्त्रियों व बच्चों को कैद कर लिया। अपने इस कार्य का औचित्य सिद्ध करते हुए बाबर ने लिखा है कि इस्लाम के शत्रु थे तथा उनमें काफिरों की प्रथाएँ प्रचलित थी। बाजौर पर अधिकार करने के बाद फरवरी 1519 में वह झेलम नदी के तट पर स्थित भेरा नामक स्थान पर पहुंचा। भेरा के निवासियों ने बिना किसी प्रतिरोध के आत्मसमर्पण कर दिया। अतः बाबर ने अपने सैनिकों को वहां लूटमार न करने की सलाह दी। मेरा से बाबर ने मुल्ला मुर्शीद नामक अपने चूत को इब्राहीम लोदी के पास भेजकर उन सभी प्रदेशों की मांग की जो कभी तों के अधीन रह चुके थे। लेकिन दौलत खां लोदी ने मुल्ला मुर्शीद को लाहौर में ही रोक लिया और उसे इब्राहीम लोदी के पास जाने की अनुमति नहीं दी। अतः लगभग पांच महीने पश्चात् मुल्ला मुर्शीद वापिस काबुल लौट गया। कुछ दिन भेरा में रहने के बाद बाबर भी काबुले लौट गया था। मेरा हिन्दूबेग को सौंपकर शाह मुहम्मद को उसकी सहायता के लिए नियुक्त कर दिया। भेरा से सिन्धु तक का प्रदेश मुहम्मदअली जंग को तथा खुशाब लंगरखान को दे दिया।

दूसरा आक्रमण
बाबर ने ज्योंही अपनी पीठ फेरी, स्थानीय अफगानों व हिन्दुओं ने मिलकर हिन्दूबेग को भेरा से खदेड़ दिया। हिन्दूबेग जान बचाकर काबुल पहुंचा। अतः 1519 ई. के अंत में बाबर ने दूसरी बार युसुफजई अफगानों के विरूद्ध अभियान किया। लेकिन पेशावर पहुंचने के पहले ही उसे सूचना मिली कि सुल्तान सैदखान बदख्शा की ओर बढ़ रहा है। अतः बाबर को वापिस काबुल लौटना पड़ा।
बाबर के उपर्युक्त दोनों आक्रमणों का उद्देश्य भारत की राजनीति की जानकारी प्राप्त करना था।

तीसरा आक्रमण
बाबर ने तीसरा आक्रमण 1520 ई. में किया। बाबर बाजौर, भीरा होता हुआ स्यालकोट तक जा पहुंचा। भेरा में उसने उन लोगों को दण्डित किया जिन्होंने विद्रोह किया था। स्यालकोट के पास स्थित सैयदपुर के पठान शासक और वहां के निवासियों ने बाबर का मुकाबला किया था, किन्तु उन्हें कुचल दिया गया। सैयदपुर में बाबर के सैनिकों ने भयंकर लूटमार की। इसी समय उसे सूचना मिली कि कन्धार के शासक शाह अरधुन ने काबुल की सीमा पर आक्रमण कर दिया है, अतः बाबर को तुरन्त काबुल को और लौटना पड़ा। अब बाबर भारत पर कोई सैनिक अभियान आरम्भ करने से पूर्व कन्धार को जीत कर काबुल को सुरक्षित करना चाहता था। अतः 1522 ई. में उसने कन्धार पर अधिकार कर लिया तथा अपने दूसरे पुत्र कामरान को वहां का सूबेदार बना दिया।

चौथा आक्रमण
कम्धार पर अधिकार हो जाने के बाद बाबर अपने आपको सुरक्षित अनुभव करने लगा और अब उसके लिये भारत की ओर अधिक ध्यान देना संभव हो गया। इसी समय सुल्तान इब्रहीम लोदी का चाचा आलम खां सुल्तान के दुर्व्यवहार से तंग आकर बाबर से प्रार्थना की कि दिल्ली का तखत दिलाने हेतु वह उसकी सहायता करे। इE पर पंजाब के सूबेदार ने भी इब्राहीम लोदी के विरूद्ध बाबर से सहायता मांगी। अतः बाबर ने जनवरी 1524 ई. में चौथी बार भारत पर आक्रमण किया। लाहौर में सुल्तान की अफगान सेनाओं ने बाबर का मुकाबला किया, लेकिन पराजित हुई। चार दिन बाद बाबर दीपालपुर पहुंचा, जहां दौलत खां ने बाबर से भेंट की। दौलत खां का अनुमान था कि तैमूर की भांति बाबर भी लूटमार करके लौट जायेगा। लेकिन उसका अनुमान गलत सिद्ध हुआ, क्योंकि किसी प्रदेश पर एक बार अधिकार करने के बाद उसे छोड़ देना बाबर के स्वभाव में नहीं था। अत: बाबर के इरादे से दौलत खां बड़ा क्षब्ध हुआ और उसने बाबर के साथ विश्वासघात करना चाहा। लेकिन बाबर ने उसे कैद कर काबुल लौटते हुए मार्ग में छोड़ दिया। बाबर ने उसकी पैतृक जागीर दिलावर खां को दे दी और पंजाब के जीते हुए प्रदेशों में अपने अधिकारी नियुक्त कर स्वयं काबुल लौट गया। इस बार बाबर के पुनः काबुल लौटने के प्रमुख तीन कारण थे। प्रथम तो बाबर जिन अमीरों के निमंत्रण पर भारत आया था, उन्हीं अमीरों ने बाबर का विरोध किया था। दूसरा इब्राहीम लोदी को इतना कमजोर नहीं पाया, जितनी उसने आशा कर रखी थी। तीसरा और अंतिम कारण इस समय बल्ख में उजबेकों का उपद्रव बढ़ रहा था, जिससे उसे वापिस काबुल लौटना पड़ा।
बाबर के काबुल लौटते ही दौलत खां ने सेना एकत्र कर सुल्तानपुर पर अधिकार कर लिया तथा दीपालपुर से आलम खां को भगा दिया। आलम खां भागकर काबुल पहुंचा और बाबर के साथ एक सन्धि की जिसके अनुसार बाबर ने उसे दिल्ली का तख्त दिलाने का वादा किया। इसके बदले में आलम ख ने बाबर को लाहौर और उसके पश्चिम के प्रदेश सौंपने का आश्वासन दिया। लेकिन वापिस लौटकर आलम खां ने सन्धि की उपेक्षा करते हुए पंजाब दौलत खां के पास रहने दिया और दोनों ने मिलकर दिल्ली पर आक्रमण कर दिया। लेकिन दोनों सुल्तान की सेना से पराजित हुए।

पांचवा आक्रमण
दौलत खा के विद्रोह की सूचना मिलने पर बाबर ने दिसम्बर 1525 में पांचवी बार भारत पर आक्रमण किया। स्यालकोट पहुचने पर बाबर को दौलत खां और आलम खां के बीच हुई सन्धि तथा दोनों के दिल्ली पर असफल अभियान की सूचना मिली। 15 जनवरी, 1526 को बाबर ने मिलवट का किला घेर लिया। दौलत खां किले में था, लेकिन उसका पुत्र गाजी खां भागकर उसके शत्रु इब्राहीम लोदो के पास चला गया। उसके दूसरे पुत्र दिलावर खां ने आरम्भ से ही बाबर का साथ दिया था। अतः दौलत खां ने बाबर का प्रतिरोध करना उचित न समझ आत्मसमर्पण कर दिया। बाबर की इस सफलता से प्रोत्साहित होकर इब्राहीम लोदी के असंतुष्ट अमीरों ने बाबर के प्रति अपनी शुभकामनाएं प्रकट करने के लिये अपने दूत भेजे और अन्य अमीरों ने भी अपनी अधीनता के प्रस्ताव भेजे। इन अनुकूल परिस्थितियों के कारण बाबर ने अब आगे बढ़ने का निश्चय किया।

भारत विजय

बाबर ने अब भारत विजय का निश्चय किया। 1526 ई. में उसने स्वयं लिखा, "काबुल विजय करने के समय से अब तक मैं हिन्दस्तान पर अधिकार करने के लिए सदैव तुला हुआ था, परन्तु कभी अपने अमीरों के दुराचरण के कारण, कभी अपने भाइयों आदि के विरोध के कारण मुझे रूठना पड़ा। अंत में वह बाधाएं दूर हो गई और मैं एक सेना एकत्रित करके बाजौर और स्वात की ओर चला, जहां से झेलम नदी के पश्चिम से भेरा की ओर बढ़ा।'' 1519 ई. से 1524 ई. के बीच बाबर ने पंजाब पर चार बार आक्रमण किये, किन्तु लाहौर से आगे नहीं बढ़ सका।

पानीपत का प्रथम युद्ध (21 अप्रैल, 1526 ई.)

नवम्बर, 1525 में बाबर ने पंजाब के सूबेदार दौलत खां लोदी तथा इब्राहीम के चाचा आलम खां के निमंत्रण पर 12,000 सैनिकों सहित दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। दिल्ली तक पहुंचते-पहुंचते उसकी सेना में 25,000 सैनिक हो गये। पानीपत के युद्ध से पहले इब्राहीम का सरदार बिब्बन तीन हजार सैनिकों सहित उससे आ मिला। राणा सांगा ने भी बाबर के पास आगरा की तरफ से आक्रमण करने का संदेश भिजवाया। इनसे उत्साहित होकर बाबर पानीपत के मैदान में पहुंच गया, जहां इब्राहीम उसकी सेना सहित प्रतीक्षा कर रहा था।

युद्ध की घटनाएं
21 अप्रैल, 1526 ई को बाबर तथा इब्राहीम लोदी के बीच पानीपत का प्रथम युद्ध हआ था। बाबर के पास 25,000 सैनिक व 700 तोपें थीं, जबकि इब्राहीम के साथ एक लाख सैनिक थे। इब्राहीम एक अयोग्य सेनापति था। उसके अधिकतर सैनिक किराये के थे, जिनमें न तो वीरता थी और न ही अनुशासन । दोनों पक्षों की व्यूह रचना के सम्बन्ध में एस.आर. शर्मा लिखते हैं, "एक ओर निराशाजनित साहस और वैज्ञानिक युद्ध प्रणाली के कुछ साधन थे, दूसरी ओर मध्यकालीन ढंग के सैनिकों की भीड़ थी, जो भाले और धनुष-बाण से सुसज्जित थी और मूर्खतापूर्ण ढंग से जमा हो गई थी।"
21 अप्रैल, 1526 ई. को बाबर ने इब्राहीम पर आक्रमण कर दिया और दोनों पक्षों में घमासान संघर्ष शुरू हो गया। इब्राहीम परास्त हुआ और मारा गया। इस युद्ध के सम्बन्ध में बाबर ने अपनी आत्मकथा 'बाबरनामा' में लिखा है, "सवेरे सूर्य निकलने के बाद लगभग नौ दस बजे युद्ध आरम्भ हुआ था, दोपहर तक दोनों सेनाओं के बीच भयानक युद्ध होता रहा। दोपहर के बाद शत्रु कमजोर पड़ने लगा और उसके बाद वह भीषण रूप से परास्त हुआ। उसकी पराजय को देखकर हमारे शुभचिन्तक बहुत प्रसन्न हुए। सुल्तान इब्राहीम को पराजित करने का कार्य बहुत कठिन था, लेकिन ईश्वर ने उसे हम लोगों के लिए सरल बना दिया।"

युद्ध के परिणाम
पानीपत का प्रथम युद्ध मध्यकालीन भारतीय इतिहास की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटना है। इससे भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना हुई। डॉ. ईश्वरीप्रसाद के अनुसार, "लोदी वंश की सत्ता टूटकर नष्ट हो गई और हिन्दुस्तान का प्रभुत्व चुगताई तुर्कों के हाथों में चला गया। इस युद्ध के प्रमुख परिणाम इस प्रकार थे-
  1. इस युद्ध से लोदी वंश समाप्त हुआ और मुगल वंश स्थापित हुआ। लेनपूल के शब्दों में, “अफगानों के लिए पानीपत का प्रथम युद्ध बड़ा भयंकर सिद्ध हुआ। इससे उनका साम्राज्य समाप्त हो गया और उनकी शक्ति का अंत हो गया। डॉ. आर.पी.त्रिपाठी के अनुसार, "लोदियों की सैन्य शक्ति पूर्णतः छिन्न-भिन्न हो गई और उनका राजा युद्ध क्षेत्र में मारा गया। हिन्दुस्तान की सर्वोच्च सत्ता कुछ काल के लिए अफगान जाति के हाथों से निकल कर मुगलों के हाथ में चली गई।"
  2. दिल्ली तथा आगरा पर बाबर का अधिकार हो गया। अब उसने साम्राज्य विस्तार का निश्चय किया। रशब्रुक विलियम्स के अनुसार, “बाबर के इधर-उधर भटकने के दिन बीत गये थे और अब उसे अपने प्राणों की रक्षा के लिए अथवा सिंहासन को सुरक्षित रखने के लिए चिंतित होने की जरूरत नहीं रही थी, उसे तो अब राज्य विस्तार के लिए युद्ध योजनाओं में शक्ति लगानी थी।"
  3. बाबर को आगरा एवं दिल्ली से अपार धन तथा विख्यात कोहिनूर हीरा मिला। अब उसकी आर्थिक दशा सुधर गई। डॉ. आर.पी. त्रिपाठी के अनुसार बाबर ने जो धन दिल्ली एवं आगरा में प्राप्त किया था, उसमें से बहुत-सा धन अपने सैनिकों को दे दिया। वह समरकन्द, इराक, खुरासान व काश्गर में स्थित सम्बन्धियों को तथा समरकन्द मक्का व मदीना तथा खुरासान के पवित्र आदमियों को भी भेंट भेजना न भूला।"
  4. विजय के बाद बाबर के नाम का खुतबा पढ़ा गया, जिससे उसका गौरव बढ़ गया। डॉ. स्मिथ के अनुसार, "वह अपने समय का एशिया का महान प्रतिभाशाली राजा था तथा भारत के सम्राटों में एक उच्च स्थान के योग्य था।"
  5. यह युद्ध निर्णायक था। एस.एम. जाफर के अनुसार, "इस युद्ध से भारतीय इतिहास में एक नये युग का आरम्भ हुआ। लोदी वंश के स्थान पर मुगल वंश की स्थापना हुई। इस नये वंश ने समय आने पर ऐसे प्रतिभाशाली तथा महान बादशाहों को जन्म दिया, जिनकी छत्रछाया में भारत ने असाधारण उन्नति तथा महानता प्राप्त की।"
  6. इस युद्ध का सभ्यता तथा संस्कृति पर प्रभाव पड़ा। डॉ. त्रिपाठी के अनुसार, "भारत में मुगल संस्कति व सभ्यता के समन्वय से भारत में नवीन सभ्यता का सूत्रपात हुआ। मुगलों के ठाठ-बाट ने भारतीयों के जनजीवन में महान परिवर्तन किया। ईरान की कला व साहित्य ने भारत पर अपना प्रभाव जमाना आरम्भ कर दिया।"

बाबर की सफलता के कारण
बाबर ने इब्राहीम की विशाल सेना को परास्त किया था। बाबर की विजय के मुख्य कारण इस प्रकार थे-
  1. बाबर एक अनुभवी तथा योग्य सेनानायक था। डॉ.आर.पी. त्रिपाठी के अनुसार, "वास्तव में उत्कृष्ट नेतृत्व, वैज्ञानिक रण कला, श्रेष्ठ शस्त्राशस्त्र तथा सौभाग्य के कारण बाबर की विजय हुई।" विलक्षण सैन्य प्रतिभा वाले बाबर के समक्ष इब्रहीम पूर्णत: अयोग्य था। लेनपूल के अनुसार, “पानीपत के रणक्षेत्र में मुगल सेनाओं ने घबराकर युद्ध आरम्भ किया, परन्तु उनके नेता की वैज्ञानिक योजना तथा अनोखी चालों ने उन्हें आत्मविश्वास और विजय प्रदान की।"
  2. बाबर ने कशल तोपखाने की मदद से इब्राहीम को परास्त किया। आर.बी. विलियम्स के अनुसार, "बाबर के शक्तिशाली तोपखाने ने भी उसे सफल होने में बहुमूल्य सहायता दी।"
  3. इब्राहीम की सेना में एकता तथा अनुशासन नहीं था। इब्राहीम के अविवेकपूर्ण कार्यों से जनता तथा सरदारों में उसके विरूद्ध असंतोष था। उसकी सेना के अधिकांश सैनिक किराये के थे, जिनके बारे में बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा, "हिन्दुस्तान के सैनिक मरना जानते हैं, लड़ना नहीं।"
  4. इब्राहीम एक अयोग्य सेनापति था। जे.एन. सरकार के अनुसार, "इब्राहीम ने भारत के राजसी तरीके से लड़ाई के लिए कूच किया था अर्थात् दो तीन मील तक कूच करता था और तदुपरांत दो दिन तक अपनी सेनाओं के साथ आराम करता था। उसका फौजी खेमा एक चलते-फिरते अव्यवस्थित शहर की तरह था।" बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, "इब्राहीम एक योग्य सेनापति नहीं था। वह बिना किसी सूचना के कूच कर देता था और बिना सोचे-समझे पीछे हट जाता था। इसके अतिरिक्त वह बिना दूरदर्शिता के युद्ध में कूद पड़ता था।" अतः बाबर ने उसे आसानी से परास्त किया।
  5. मुगल सैन्य संगठन अफगान सैन्य संगठन से बहुत उत्तम था। मुगल सैनिक वीर, अनुभवी, साहसी तथा कुशल योद्धा थे, जबकि इब्राहीम के अधिकतर सैनिक किराये के थे और उनमें एकता, अनुशासन, संगठन एवं राष्ट्रीय हित की भावना नहीं थी।

पानीपत के युद्ध के बाद बाबर की कठिनाइयां
  • यद्यपि पानीपत के मैदान में विजय प्राप्त करने से बाबर दिल्ली का शासक बन गया था, किन्तु उसका अधिकार क्षेत्र बहुत सीमित था। लेनपूल के अनुसार, "भारत कहां, उसे तो अभी उत्तरी भारत का भी राजा नहीं कहा जा सकता था।" अतः बाबर के लिए साम्राज्य विस्तार करना अनिवार्य था।
  • उसे अपने सिंहासन की सुरक्षा के लिए मध्यपती भरत के पिद्रोही सरदारों का दमन करना था तथा राजपूतों को परास्त करना था।
  • भारत की जनता बाबर को विदेशी समझकर उससे नफरत करती थी। लेनपूल के अनुसार, "भारत का प्रत्येक गांव मुगलों के लिए शत्रु शिविर था।" अतः बाबर को भारतीयों का विश्वास जीतना था।
  • बाबर के सैनिक तथा सरदार अपने घर लौटने के लिए व्यग्र थे तथा वे भारत की गर्मी सहन नहीं कर पा रहे थे। अतः बाबर को उन्हें अगले आक्रमण के लिए तैयार करना था।
बाबर ने बड़े साहस तथा धैर्य से इन कठिनाइयों पर विजय प्राप्त की। बाबर ने सैनिकों तथा सरदारों को यह कहकर समझा लिया कि वर्षों के परिश्रम से, कठिनाइयों का सामना करके, लम्बी यात्राएं करके, अपने वीर सैनिकों को युद्ध में झोंककर और भीषण हत्याकांड करके हमने खुदा की कृपा से दुश्मनों के झुण्ड को हराया है, ताकि हम उनकी लम्बी-चौड़ी विशाल भूमि को प्राप्त कर सकें। अब ऐसी कौन-सी शक्ति है, जो हमे विवश कर रही है और ऐसी कौन-सी आवश्यकता है, जिसके कारण हम उन प्रदेशों को छोड़ दें, जिन्हें हमने जीवन को संकट में डालकर जीता है।"
मध्यवर्ती भारत के विद्रोहियों को कुचलना-महमद, फीरोज खां, शेख बयाजीद आदि अफगान सरदारों ने युद्ध लड़े बिना ही बाबर का आधिपत्य स्वीकार कर लिया। बाबर ने अन्य विद्रोही अफगान सरदार को कुचल दिया तथा सम्भल, बयाना, इटावा, धौलपुर, कन्नौज, ग्वालियर तथा जौनपुर पर अधिकार कर लिया।

दिल्ली में बाबर के नाम का खुतबा पढ़ा जाना
पानीपत का मैदान फतह करने के बाद उसी दिन बाबर ने हुमायूं मिर्जा को आदेश दिया कि वह यथासंभव शीघ्रता के साथ आगे बढ़कर आगरा पर अधिकार जमाए और वहां सारा कोष अपने कब्जे में लेकर उसकी रक्षा के लिए आदमी नियक्त कर दे। साथ ही मेहन्दी ख्वाजा (या मंहदी ख्वाजा) को आदेश दिया कि वह अपने साथ मुहम्मद सुल्तान मिर्जा, आदिल सुल्तान, सुल्तान जुनैद बरलास और कुतलूक कदम को साथ लेकर तुरन्त दिल्ली पहुंच जाए और वहां के खजाने की रक्षा का काम प्रारम्भ कर दें। दूसरे दिन स्वयं बाबर ने दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। 25 अप्रैल को बाबर ने वली किजील को दिल्ली का शिकदार और दोस्त (बेग) को दीवान नियुक्त किया और आदेश दिया कि खजानों पर मुहर लगाकर उन्हें सौंप दिए जाए। 26 अप्रैल बृहस्पतिवार को बाबर ने यमुना नदी पर तुगलकाबाद (कुतुबमीनार के पूर्व में लगभग पांच मील पर स्थित) के सामने पड़ाव किया और अगले ही दिन शुक्रवार, 15 रजब अर्थात् 27 अप्रैल को उसी पड़ाव पर ठहरे हुए मौलाना महमूद, शेलजैन तथा अन्य लोगों ने दिल्ली जाकर जुमे की सामूहिक नमाज पढ़ी। वहां बाबर के नाम का खुतबा पढ़वाया और फकीरों तथा गरीबों को कुछ धन बांटकर वे वापिस शिविर में लौट आए।

हुमायूं का आगरे को जीतना और बाबर का वहां पहुंचना
हुमायूं को आगरा पहुंच कर मलिक दादा कर्रानी, मिल्ली सुरदूक, फिरोज खां मेवाती आदि अफगान सरदारों के विरोध का सामना करना पड़ा। हुमायूं ने दुर्ग को घेर लिया। घेरा चल ही रहा था कि उसे शहर पर अधिकार जमाने और खजाने को प्राप्त करने में सफलता प्राप्त हो गई। ग्वालियार के शासक राजा विक्रमादित्य के परिवार के सदस्य सुल्तान इब्राहीम की पराजय के समय आगरा में ही थे। उन्होंने भागने का प्रयत्न किया लेकिन हुमायूं द्वारा मार्गों की रक्षा के लिए सैनिक नियुक्त कर देने से उनका भागना संभव न हो सका। उन लोगों ने, जैसा कि बाबर ने लिखा है, हुमायूं को स्वेच्छा से भारी मात्रा में जवाहरात और बहुमूल्य वस्तुएं दीं जिनमें वह प्रसिद्ध हीरा भी था जिसे सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी लाया था। उसका मूल्य समस्त संसार के ढाई दिन के भोजन के व्यय के बराबर आंका जाता था और वह लगभग आठ मिस्कल (लगभग 320 रत्ती) के बराबर था। हुमायूं ने दुर्ग के सैनिकों को दुर्ग समर्पित करने पर बाध्य कर दिया। दुर्ग को जीतकर उसने बाबर के नाम का खुतबा पढ़ा।
बाबर भी दिल्ली न ठहर कर 28 अप्रैल को ही आगरे की ओर रवाना हो गया। हुमायूं द्वारा आगरे को जीतने के समाचार उसे मिल चुके थे। 4 मई को आगरे के निकट पहुंच कर उसने सुलेमान फारमूली की मंजिल में पड़ाव डाला और अगले 6 दिनों तक वह इस स्थान पर रूका रहा। इस अवधि में हुमायूं उसकी सेवा में उपस्थित हुआ। आगरे में बाबर के कुछ प्रमुख कार्य ये रहे
विरोधी सरदारों को दण्ड–बाबर ने मलिक दाद कर्शनी, मिल्ली सूरदूक तथा फिरोज खां मेवाती को मृत्यु का दण्ड दिया क्योंकि उन्होंने हुमायूं का विरोध किया था। किन्तु लोगों द्वारा बहुत आग्रह करने पर बाबर ने अंत में तीनों व्यक्तियों को न केवल क्षमा कर दिया बल्कि उनकी सम्पत्ति भी उन्हें लौटा दी। बाबर ने उन्हें परगने भी प्रदान किए।
इब्राहीम लोदी की माता के प्रति उदारता मत सल्तान इब्राहीम लोदी की माता के प्रति उदारता दिखाते हुए बाबर ने उसे सात लाख (दाम) के मूल्य का एक परगना प्रदान किया। साथ ही उसे उसके प्राचीन सेवकों सहित आगरा के निकट ही निवास स्थान भी प्रदान किया।
कोहिनूर हीरा हुमायूं को प्रदान करना-10 मई को बाबर ने आगरा में प्रवेश किया, वह सुल्तान इब्राहीम के महल में ठहरा। हुमायूं ने कोहिनूर हीरा बाबर को भेट किया किन्तु बाबर ने उसे हुमायूं को ही दे दिया।
आगरे के खजाने का वितरण-12 मई को बाबर ने अगरे के खजाने का निरीक्षण व वितरण का कार्य प्रारम्भ किया। स्वयं बाबर के शब्दों में-"शनिवार 29 रजब को खजाने का निरीक्षण तथा वितरण प्रारम्भ हुआ। हुमायूं को खजाने से 70 लाख प्रदान किए गए। इसके अतिरिक्त एक खजाना इस बात का पता लगाए बिना कि इसमें क्या है तथा लिखे बिना उसी तरह उसे दे दिया गया। कुछ बेगों को 10 लाख और कुछ को 8, 7 और 6 लाख प्रदान किए गए। जितने लोग सेना में थे अफगान, हजारा, अरब, बिलोच इत्यादि-उन्हें उनकी श्रेणी के अनुसार ख्जाने से नकद इनाम दिए गए। प्रत्येक व्यापारी, विद्यार्थी अपितु प्रत्येक व्यक्ति को जो इस सेना के साथ आया था, इनाम तथा दान द्वारा पूर्ण रूप से लाभ पहुंचाया गया और प्रसन्न कर दिया गया। उदाहरणार्थ कामरान को 17 लाख, मुहम्मद जमान मिर्जा को 15 लाख तथा अस्करी एवं हिन्दाल अपितु समस्त सम्बन्धियों , निकटवर्तियों एवं छोटे बच्चों को अत्यधिक लाल व सफेद वस्त्र, जवाहरात तथा दास भेजे गए। इस देश के बेगों (अमीरों) तथा सैनिकों को भी बहुत कुछ उपहार भेजे गए। समरकंद, खरासान, काशगर तथा ईराक में जो बहुत से सम्बन्ध | थे उन्हें भी बहुमूल्य उपहार भेजे गए। खुरासान तथा समरकन्द के मशायख को भी नजरें भेजी गई और इसी प्रकार मक्का और मदीना को। काबुल तथा वरसक की घाटी की ओर से प्रत्येक नर-नारी, दास, स्वतंत्र तथा बालिक एवं नाबालिग को एक-एक शाहरूखी इनाम में दी गई।
अपनी दयालुता, उदारता और दानशीलता के कारण बाबर इतना प्रसिद्ध हो गया कि लोग उसे 'कलन्दर' कहने लगे और बाबर ने भी इस उपाधि को सहर्ष स्वीकार किया। दिल्ली और आगरे को विजित करने के साथ ही बाबर द्वारा हिन्दुस्तान को जीतने का प्रथम चरण समाप्त हो गया।

खानवा का युद्ध (17 मार्च, 1527 ई.)

बाबर ने पानीपत के युद्ध के बाद अफगानों की शक्ति को कुचल दिया था। अब उसने मेवाड़ के राणा सांगा अथवा संग्रामसिंह से निपटने का निश्चय किया।

युद्ध के कारण
  1. राणा सांगा राजस्थान का सबसे शक्तिशाली सरदार था। वह असाधारण युद्ध सामग्री और साधनों का स्वामी था। कर्नल टॉड के अनुसार, "अस्सी हजार घुड़सवार, 7 बड़े-बड़े नरेश, 9 राव और 104 रावल तथा रावत हर समय उसके इशारे पर रणक्षेत्र में कूदने के लिए तैयार रहते थे।" राणा सांगा की शक्ति को कुचले बिना बाबर सम्पूर्ण उत्तरी भारत का शासक नहीं बन सकता था। इसके अतिरिक्त राणा सांगा भारत में हिन्दू साम्राज्य अथवा 'हिन्दू-पद-पादशाही' स्थापित करना चाहता था।
  2. सांगा का यह विचार था कि बाबर भी अन्य मुस्लिम आक्रमणकारियों की भांति धने-दौलत लूटकर भारत से चला जाएगा। इस प्रकार उसे भारत में हिन्दू-पद-पादशाही स्थापित करने का अवसर मिल जाएगा, लेकिन जब उसे बाबर के इस निश्चय का पता चला कि वह भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना करेगा, तो उसके सम्मुख केवल एक ही मार्ग था-बाबर से युद्ध । संक्षेप में, सांगा और बाबर की परस्पर विरोधी महत्त्वाकांक्षाओं के कारण दोनों के बीच युद्ध अनिवार्य हो गया था।
  3. कहा जाता है कि जब बाबर काबुल में था, तब सांगा और उसके बीच एक सन्धि हुई थी। बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, "जब मैं काबुल में था और हिन्दुस्तान नहीं आया था, उन दिनो राणा सांगा ने अपना दूत मेरे पास भेजा था और उसके द्वारा मेरे प्रति सम्मान प्रकट किया गया था। उस दूत के द्वारा यह निश्चय हो गया कि बादशाह काबुल से चलकर दिल्ली पर आक्रमण करे और उसी समय मैं आगरा पर आक्रमण करूंगा। इस प्रकार निश्चय हो जाने के बाद राणा सांगा का दूत काबुल से लौटकर चला गया था।” पूर्व में की गई सन्धि के अनुसार सांगा ने पानीपत के युद्ध के समय इब्राहीम लोदी पर आक्रमण नहीं किया। अत: बाबर ने सांगा पर वचन भंग करने का दोष लगाया। यह युद्ध का एक कारण बना।
  4. राणा सांगा ने बाबर को उखाड़ फेंकने के लिए इब्राहीम लोदी के भाई महमद लोदी और हसन खां मेवाती से गठजोड़ कर लिया था। बाबर इस राजपूत-अफगान गठबन्धन को अपने लिए खतरनाक मानता था। इसी कारण एस.आर. शर्मा ने लिखा है, "यह युद्ध मुसलमानों के विरूद्ध हिन्दुओं का युद्ध न था, बल्कि एक विदेशी शत्रु के विरूद्ध संयुक्त राष्ट्रीय प्रयत्न था।"
  5. पानीपत के युद्ध के बाद बाबर ने बयाना पर अधिलार कर लिया था। सांगा बयाना को अपने अधीन समझता था। अतः सांगा ने बयाना पर पुनः अधिकार कर लिया। अतः दोनों पक्षों के बीच युद्ध अनिवार्य हो गया था।

युद्ध की घटनाएं
फरवरी, 1527 ई. में दोनों पक्षों की सेनाएं आगरा के पास करवाहा के रणक्षेत्र में एकत्र हो गईं। युद्ध आरम्भ होने से पूर्व बाबर को एक विचित्र कठिनाई का सामना करना पड़ा। जब राजपूतों ने मुगलों के अग्रिम पहरियों को हरा दिया, तो इससे मुगल सैनिकों में बड़ी निराशा फैल गई। इसी समय रणक्षेत्र में उपस्थित ज्योतिषी मुहम्मद शरीफ ने यह भविष्यवाणी की कि इस युद्ध में विजय राजपूतों की होगी। इससे मुगल सैनिकों को अधिक निरुत्साहित कर दिया था। ऐसे संकट के समय में भी बाबर ने असाधारण योग्यता तथा धैर्य का परिचय दिया। बाबर ने अपने सैनिकों में आत्मविश्वास और उत्साह संचार करने के लिए शराब के भण्डार को पृथ्वी पर बहा दिया, शराब के पात्रों को तोड़ डाला और आजीवन शराब न पीने की शपथ ली। उसने ज्योतिषी को भला-बुरा कहकर बन्दीगृह में डाल दिया। इस नाटकीय कार्य के बाद बाबर ने मुलक सैनिकों को सम्बोधित करते हुए कहा-"सरदारों और सिपाहियों! प्रत्येक व्यक्ति जो इस संसार में आता है, नाशवान है। जब हम लोग मर जाते है और इस संसार से चल बसते हैं, तो केवल ईश्वर ही अपरिवर्तनीय होकर अमर रहता है। जो कोई भी जीवन मौज में बिताता है, उसके समाप्त होने से पहले ही उसको मृत्यु का प्याला पीना पड़ता है, जो मृत्यु की सराय में पहुंचता है, उसका दुनिया से जो दुःखों का घर है, लौट जाना निश्चित है। बदनामी के साथ जीने की अपेक्षा सम्मान के साथ मरना कितना अच्छा है। यश के साथ मरूं भी, तो मैं संतुष्ट हूँ। इस कारण कि यह यश हमारा हो, क्योंकि शरीर पर तो मौत का अधिकार है। सबसे सच्चे ईश्वर ने हम लोगों के प्रति दया दिखाई है और हमें ऐसे संकट में डाल दिया है कि यदि हम लड़ाई के मैदान में खेलते रहते हैं, तो शहीद की मौत मरते हैं। यदि जीवित रहते हैं, तो ईश्वर की इच्छा को कार्यान्वित करते हुए विजयी निकलते हैं। इसलिए आओ! हम लोग एक स्वर से अल्लाह के पवित्र नाम की शपथ ग्रहण करें कि जब तक आत्मा हमारे शरीर को छोड़ नहीं जाती, तब तक हममें से कोई भी इस युद्ध भूमि में मुंह मोड़ने की बात नहीं सोचेगा और न ही इस युद्ध और रक्तपात से, जो आगे होने जा रहा है, भगेगा।"
बाबर के इस भाषण ने मुगल सैनिकों में प्राण फूंक दिये और प्रत्येक सैनिक ने पवित्र कुरान' को उठाकर बाबर का साथ देने की सौगन्ध खाई।
17 मार्च, 1527 ई. को राजपूतों और मुगलों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में राजपूतों की बुरी तरह पराजय हुई। “ऐसा कोई भी राजपूत दल नहीं रहा, जिसके श्रेष्ठ नायक का रक्त न बहा हो।" राणा सांगा बुरी तरह घायल हुआ। उसे मुर्छित अवस्था में उस भूमि से ले जाया गया। इस आकस्मिक घटना से राजपूतों में भगदड़ मच गई। विजय बाबर की हुई। बाबर ने इस समय 'गाजी' की उपाधि धारण की।

युद्ध का महत्त्व एवं परिणाम
खानवाहा का युद्ध भारतीय इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना है। इस युद्ध के परिणामस्वरूप बाबर के लिए मुगल साम्राज्य स्थापित करने का कार्य सुगम हो गया। बाबर निश्चयपूर्वक इब्राहीम लोदी के सिंहासन पर बैठ गया। भाग्य की खोज में घूमने के उसके दिन समाप्त हो गये। इस युद्ध से बाबर के जीवन में एक महत्त्वपूर्ण इकाई आरम्भ हुआ। रशब्रुक विलियम्स के अनुसार, "अब उसके भाग्य की खोज में भटकने के दिन समाप्त हो गये थे। उसका भाग्य जाग उठा था और अब उसे अपने आपको इस भाग्य के योग्य सिद्ध करना था। निःसंदिह उसे कई और युद्ध लड़ने थे, परन्तु ये युद्ध शक्ति के विस्तार, शत्रुओं के दमन तथा राज्य में व्यवस्था लाने के लिए थे, सिंहासन-प्राप्ति के लिए नहीं।"
इस युद्ध के परिणामस्वरूप राजपूत शक्ति को गहरा आघात पहुंचा। सैनिक संगठन छिन्न-भिन्न होने से उनकी शक्ति क्षीण हो गई और राजपूतों का वैभव नष्ट हो गया। लेनपूल के अनुसार, “कनबाहा का युद्ध राजपूतों के लिए इतना विनाशकारी सिद्ध हुआ कि कोई बिरली ही ऐसी राजपूत जाति होगी, जिसके श्रेष्ठ योदा इस युद्ध में काम न आये हों।" एस.आर. शर्मा के शब्दों में, "राजपूतों की सर्वोच्चता का भय, जो गत दस वर्षों से मंडरा रहा था, वह सदैव के लिए समाप्त हो गया।"
डॉ. आर.पी. त्रिपाठी के अनुसार, "इस युद्ध का प्रभाव बहुत दूर तक पहुंचा। राजपूत संगठन का अस्तित्व, जाति, बन्धुत्व, धर्म या संस्कृति के किसी बौद्धिक आधार पर न था। वह केवल उदयपुर राजघराने के ऐश्वर्य, उसके लड़ाकू नेताओं की सैनिक या कूटनीतिक विजयों पर आधारित था। इस घराने का नैतिक ऐश्वर्य अस्त हुआ, तो राजपूर संगठन मी विकृत हुआ। उत्तरी भारत के मुस्लिम राज्य अपने अस्तित्व के लिए चिन्तित थे। राजपूत संगठन के टूटने पर उनका दुःखद स्वप्न भंग हुआ। बहुत-से सशक्त राजपूत सरदारों के विनाश और राणा की निर्बलता से राजपूत संगठन में टूट-फूट होने लगी, तो पड़ोसी राज्यों के लिए राजपूताना पर आक्रमण का मार्ग खुल गया और वे शीघ्र ही इसके लिए तैयार भी हो गये। खानवाहा की विजय ने मुगल साम्राज्य के बीजवपन के मार्ग से बहुत बड़ी बाधा हटा दी। बाबर ने 'गाजी' की उपाधि ग्रहण की और भारत में उसकी गद्दी पूर्णतया सुरक्षित हो गई। उसकी शक्ति का आकर्षण केन्द्र निश्चित रूप से काबुल से हटकर भारत में आ गया। राजपूतों की पराजय से अफगानों की शक्ति को भी धक्का लगा। राजपूताना के अशक्त और स्वतंत्र शासकों की सहायता से वे मुगलों के जीतने हेतु भीषण प्रतिद्वन्द्वी हो सकते थे, उतना अकेले होने पर उनके लिए असंभव था।"
राजपूतों की पराजय से हिन्दू-पद-पादशाही की स्थापना का भय जाता रहा। डॉ. आर.सी. मजुमदार के अनुसार, "दिल्ली सल्तनत के हास से उत्साहित होकर राजपूत अपनी सैनिक-शक्ति के पुनरुत्थान की जो आशा लिए हुए थे, वह इस युद्ध के परिणामस्वरूप समाप्त हो गई, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि राजनीतिक क्षेत्र से राजपूतों का प्रभाव सदैव के लिए समाप्त हो गया। केवल तीस वर्ष बाद उन्हें मुगल साम्राज्य में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त हो गया और उन्होंने मुगल साम्राज्य के इतिहास पर गहरा प्रभाव डाला।" इस विजय के उपरान्त बाबर की गतिविधियों का केन्द्र काबुल के बजाय हिन्दुस्तान हो गया।

चन्देरी का युद्ध (1528 ई.)

खानवाहा युद्ध के पश्चात् बाबर ने राजपूतों के एक महत्त्वपूर्ण दुर्ग चन्देरी (भूपाल के समीप) पर अधिकार करने का निश्चय किया। चन्देरी पर मेदिनी राव नामक शक्तिशाली राजपूत सरदार का अधिकार था। 20 जनवरी, 1528 ई. को बाबर ने चन्देरी के दुर्ग को घेरे में ले लिये। मेदिनीराव अपने कुछ हजार योद्धाओं सहित किले के भीतर बन्द होकर शत्रु का सामना करता रहा। अंत में विवश होकर मेदिनीराव और उसके साथियों ने अपने बीवी-बच्चों को मार दिया तथा युद्ध में लड़ते हुए वीर गति प्राप्त की। चन्देरी पर बाबर का अधिकार हो गया। लहा जाता है कि इस दुर्ग पर विजय प्राप्त करने के बाद बाबर ने चन्देरी और पड़ोसी राज्यों की मस्जिदों की मरम्मत करवाई।

घाघरा का युद्ध (1529 ई.)

पानीपत के प्रथम युद्ध में अफगान सरदार परास्त हुए थे, कुचले नहीं गये थे। लेनपूल के शब्दों में, "अफगान सर्प घायल हो गया था, मरा नहीं था।' अफगानों के विद्रोह को हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त करने के उद्देश्य से बाबर उनके साथ युद्ध पर उतारू था। अफगान विद्रोही बंगाल के शासक नुसरत शाह के यहां राजनीतिक सुरक्षा प्राप्त कर लेते थे। बाबर और नुसरत शाह के बीच मित्रता थी। किन्तु विद्रोही अफगानों को लेकर नुसरत शाह से वह एक समझौता करना चाहता था। किन्तु, इसमें उसे सफलता नहीं मिल पायी। इस असफलता से तिलमिलाकर बाबर ने उसको चुनौती भेज दी, 'यदि तुमने मार्ग खुला न छोडा और मेरी शिकायतों पर ध्यान न दिया तो जो कुछ विपत्ति तुम्हारे सिर पर पड़े, उसको अपने ही कुकी का फल समझना चाहिए और जो भी अवांछनीय घटनाएं घटे उसके लिए तुम्हें अपने को दोषी ठहराना चाहिए। अन्ततोगत्वा 6 मई, 1529 ई. को घाघरा के तट पर अफगानों से युद्ध प्रारम्भ हुआ। इस भीषण संघर्ष में दोनों ओर से तोपखानों और नावों का प्रयोग हुआ। अफगान पराजित हुए। बाबर और नुसरत शाह के बीच एक सन्धि सम्पन्न हुई। इस संधि के अनुसार दोनों ने एक-दूसरे की सर्वोच्च सत्ता को स्वीकार किया तथा नुसरत शाह ने विद्रोही अफगानों को भविष्य में शरण ले देने का भी वादा किया। बाबर के जीवन का यह अंतिम युद्ध था। इसके पश्चात् प्रायः सभी अफगान सरदानों ने बाबर की अधीनता स्वीकर कर ली। अब बाबर के अधिकार में इस देश का सिन्धु नदी से बिहार तक और हिमालय से ग्वालियर और चन्देरी तक का भाग था।

बाबर का साम्राज्य

पानीपत के युद्ध में विजय प्राप्त करके बाबर ने भारत में मुगल साम्राज्य की नींव डाली। अगले चार वर्षों में इस नींव को मजबूत बनाने और साम्राज्य का विस्तार करने के लिए उसे प्रादेशिक शक्तियों से लगातार संघर्ष भी करना पड़ा। दिसम्बर, 1530 ई. में जब बाबर इस संसार से विदा हुआ तो वह अपने पुत्र हुमायू के लिए एक विशाल साम्राज्य विरासत में छोड़ गया। डॉ. परमात्मा शरण ने उसकी सीमाओं की रूपरेखा खींचते हुए लिखा है
"मृत्यु के समय बाबर का राज्य बहुत विस्तुत था और मध्य एशिया की वंशु नदी से लेकर बिहार तक फैला हुआ था। सिन्धु नदी के उरा पार लगे हुए काबुल, गजनी और कधार तथा हिन्दूकुश के बहुत रो पहाड़ी प्रदेश थे, जहां वराने वाले फिरके उसकी नाम मात्र की अधीनता स्वीकार कर चुके थे। काबुल, गजनी और कन्धार के पश्चिमी तथा सिन्धु नदी के पूर्वी सीमान्तों के बीच निम्नस्तरीय प्रदेशों, जलालाबाद, पेशावर और कोहदामन तथा स्वात और बाजौर पर भी उसका अधिकार था, किन्तु अफगानिस्तान के अधिक दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र तथा सीमान्त की पट्टी आजाद ही थी और वहां कबाइली फिरकों के आक्रमण और मुगलों के प्रत्याक्रमण का दौर कभी खत्म ही न हुआ। उपरले तथा निचले सिन्ध में उसके नाम का खुजबा पढ़ा जाता था और उसकी सर्वोपरिता सभी मानते थे, परन्तु इससे उसका अधिकार मान्य न था।"
"हिन्दुस्तान में सिन्ध के पूर्व की ओर पंजाब और मुल्तान के अतिरिक्त सतलज से बिहार तक सारा प्रदेश उसके अधि कार में था। उत्तर से दक्षिण की ओर उसका राज्य, उत्तर की पहाड़ियों की उपत्यकाओं से लगाकर मालवा और राजपूताने तक विस्तृत था। उसके राज्य की दक्षिणी सीमा बयाना, रणथम्भौर, ग्वालियर तथा चन्देरी को मिलाने वाली रेखा तक थी। ये स्थान उसकी तरफ की विजय यात्रा के अंतिम स्थल थे। चूंकि बिहार का दक्षिणी भाग पहाड़ी और वन-संकुल था, इसलिए उस तरफ उसको अधिकार प्रभावी न था। उस भाग पर अफगान सरदारों का ही करुजा उस समय भी था।"
"बाबर का राज्य दक्षिण में बुन्देलखण्ड के छोटे-छोटे राज्यों तथा छिन्न-भिन्न मालवा राज्य से, पूर्व में बंगाल से और उत्तर में हिमालयी सरदारों के छोटे-छोटे राज्यों से घिरा हुआ था।"

बाबर की मृत्यु

यह बाबर का दुर्भाग्य ही था कि इतनी कठिनाई से अर्जित की हई अपनी विजयों के फल को वह अधिक समय तक भोग नहीं सका। घाघरा के युद्ध के बाद बाबर ने मई, 1529 ईके मध्य तक बिहार की शासन व्यवस्था पूरी की। अपने राज्य की पूर्वी सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए उसने बंगाल के शासक नुसरतशाह के प्रति उदारता का व्यवहार किया और उसके साथ सन्धि कर ली। इस सन्धि का परिणाम यह हुआ कि अनेक अफगान सरदार बाबर की सेवा में उपस्थित हो गए।
भारत में आकर भी बाबर ने मध्य एशिया का ध्यान नहीं छोड़ा था और हुमायूं को बदख्शाँ भेजकर हिसार, हिरात तथा समरकन्द के प्रदेश जीतने के आदेश दिए थे। ये प्रदेश उजबेगों के हाथों में थे।
बाबर ने पुत्र के प्रति स्नेह और स्वागत प्रदर्शित करते हुए उसे सम्भल की जागीर प्रदान की। 1530 ई.के गर्मी के दिनों में हुमायूं बुरी तरह बीमार हो गया उसे आगरा लाया गया। गुलबदन बेगन ने 'हुमायूंनामा' में लिखा है
बाबर ने, जैसा कि अबुल फजल ने लिखा है, प्रार्थना-कक्ष में एकान्त में पहुंचकर विशेष प्रार्थना की ओर तीन बार हुमायूं के चारों ओर चक्कर लगाए। ईश्वर ने बाबर की प्रार्थना स्वीकार कर ली अतः उसे अपनी तबीयत भारत महसूस होने लगी और वह चिल्ला उठा-"उठा लिया, उठा लिया।” तत्काल ही बादशाह को विचित्र प्रकार का ज्वर आने लगा और उधर हुमायूं का रोग कम होने लगा। हुमायूं अल्प समय में ही स्वस्थ हो गया, किन्तु बाबर का रोग बढ़ गया और मृत्यु के चिन्ह साफ दिखाई देने लगे। बाबर ने राज्य के उच्च पदाधिकारियों को बुलवाया और उनसे हुमायूं के प्रति अधीनता की शपथ दिलवाई तथा हुमायूं को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। बाबर तब स्वयं राजसिंहासन के नीचे रोग-शैया पर लेट गया। उसने हुमायूं को सलाह और शिक्षा दी। बाबर ने कहा-"मेरी शिक्षा का सारांश यह है कि अपने भाइयों की हत्या का बाहे वे इसके कितने ही योग्य क्यों न हो, कभी विचार भी न करना।" हुमायूं के पक्ष में अपनी वसीयत करने के तीन दिन बाद ही बाबर 5 जमादि उल-अव्वल 937 हिजरी अर्थात् 26 दिसम्बर, 1530 को चल बसा।

भारत में बाबर की सफलता के कारण

भारत की डावांडोल राजनीतिक स्थिति
भारत में बाबर की सफलता का सर्वप्रथम कारण भारत की बिगड़ी हुई राजनीतिक अवस्था थी। तैमुर के आक्रमण ने देश की केन्द्रीय सत्ता के खोखलेपन का पर्दाफाश कर दिया था। जैसाकि स्वाभाविक है केन्द्रीय सत्ता के कमजोर पड़ जाने से प्रान्तों के बीच स्वतंत्रता की भावना तेज होती गयी और अनेक प्रान्तीय शासक एक के बाद दूसरे स्वतंत्र होचले गये। देश अनेक छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों का समूह बन गया। इन स्वतंत्र राज्यों के बीच एकता नाम मात्र की नहीं रह गयी। ठीक इसके विपरीत उनके बीच ईर्ष्या, द्वेष एवं कलह की भावना शक्तिशाली होती गयी। वे राज्य आपस में संघर्ष करते और ऐसे मौके की तलाश में रहते कि जब एक राज्य कमजोर हो जाये तो उस पर चढ़ाई करके उसे हड़प लिया जाये। इन राज्यों में दिल्ली के पूर्व जौनपुर का राज्य, बिहार के लोहानी शासकों का राज्य, बंगाल में नुसरत खां के अधीन स्वतंत्र राज्य, राजपूताना के अनेक स्वतंत्र हिन्दू राज्य, दक्षिण भारत में बहमनी शासकों और विजयनगर का हिन्दू राज्य आदि प्रमुख थे। इनके बीच राज्य सत्ता के लिए निरन्तर संघर्ष जारी था। देश में सत्ता स्थापना हेतु अफगान सरदारों और राजपूतों के बीच निरन्तर शक्ति की आजमाईश हो रही थी। अगर ये एक साथ मिलकर बाबर का सामना करते तो संभव था बाबर को भारत वर्ष में वांछित सफलता नहीं मिल पाती।

इब्राहीम की कमजोरिया
दिल्ली पर लोदी वंश का शासन चल रहा था। लोदियों का अंतिम शासक इब्राहीम लोदी का व्यक्तित्व और उसके कारनामें तत्कालीन परिस्थितियों में युक्तसंगत नहीं कहे जा सकते हैं। वह प्रान्तीय शासकों, वरिष्ठ अधिकारियों, शक्तिशाली सामंत एवं जनता के बीच धीरे-धीरे अलोकप्रिय होता चला गया। वह एक हट्टी, अत्याचारी एवं निर्दयी शासक था। सामन्तों एवं अधिकारियों के ऊपर उसने दरवार के कठोर नियमों को थोप दिया था। परिणामस्वरूप राज्य की शक्ति के मुख्य स्तम्भ, अफगान अधिकारी एवं समन्त, उससे बिगड़ गये एवं उन्होंने इब्राहीम के विरुद्ध षडयंत्र प्रारम्भ कर दिये। मेवाड़ के शासक राणा सांगा एवं पंजाब का शासक दौलत खां ने बाबर को भारत पर आक्रमण के लिए निमंत्रण भी भेज दिया। दिल्ली के सुल्तान को जनता का सहयोग भी प्राप्त न था। शासन में भ्रष्टाचार, बेइमानी, ईर्ष्या आदि का बाजार गर्म हो गया। चारों ओर अशांति एवं अव्यवस्था फैल गयी। देश को पुनः सुव्यवस्थित करना अब लोदी शासन के बस के बाहर की बात थी। इन परिस्थितियों में बाबर की सफलता कोई आश्चर्य की बात नहीं कही जा सकती है।

बाबर का व्यक्तित्व
बाबर की सफलता का श्रेय उसके व्यक्तित्व को भी दिया जा सकता है। बाबर बचपन से ही कठिनाइयों से जूझता चला आ रहा था। एक सिपाही और सेनापति के रूप में वह अद्वितीय था। व्यूह रचना में बाबर बहुत कुशल था। कठिन-से-कठिन परिस्थितियों में वह विचलित नहीं होता था और अपने ओजस्वी भाषणों के द्वारा वह सतत् अपनी सेना को उत्साहित करने में समर्थ था। उसका सैन्य संगठन बहुत अच्छा था। बाबर के तोपखाने में उस काल की उन्नत सामग्री थी। इसकी देखरेख एवं प्रबन्ध का भार उसने अपने कुशल सेनापति उस्ताद अली के हाथों में रखी थी। भारतीय सेना में इसका नितान्त अभाव था और वह बाबर के तोपखाने एवं पटु तोपचियों का सामना करने में असमर्थ थी। भारत में बाबर को जो भिन्न-भिन्न युद्धों सफलता मिली उसमें उसके तोपखाने का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योगदान था।

बाबर की सेना का सहयोग
बाबर की सफलता का श्रेय उसकी साहसी एवं निपुण सेना को भी दिया जा सकता है। बाबर के सैनिक शक्तिशाली तेजस्वी थे। भारत विजय की आकांक्षा उनका लक्ष्य था। विजय अथवा मृत्यु उनके दो विकल्प थे। युद्धों में सफलता के लिए उन्होंने अपनी जान की बाजी लगा दी। ऐसी शक्तिशाली एवं महत्वाकांक्षी सेना का सामना इब्राहीम की सेना, जो न तो अपने स्वामी के प्रति भक्ति रखती थी और न विजय की महत्वाकांक्षा रखती थी, के लिए असंभव था। लोदी सेना में सैनिक व्यवस्था, सहयोग, महत्वाकांक्षा, आशा जैसे सदगुणों की कमी थी। वह युद्ध-कला में अयोग्य एवं अनुभवहीन थे। अतः बाबर की सफलता स्वाभाविक थी।

सैनिकों का धार्मिक उत्साह
भारत एक हिन्दू प्रधान देश था। बाबर के सैनिकों में इस्लाम की कट्टरता मौजूद थी। हिन्दू शासकों के विरूद्ध बाबर की लड़ाई जिहाद' थी। विशेष रूप से जब बाबर ने राणा सांगा के विरूद्ध खानुवा की लड़ाई शुरू की तो उसने अपने सैनिकों को अल्लाह एवं पवित्र कुरान पर भरोसा रखकर हिन्दू काफिरों को रौंद डालने का आदेश दिया। बाबर के सैनिकों का आदर्श युद्ध में सफलता अथवा मृत्यु रह गया।

राजपूतों का दोषपूर्ण सैन्य संगठन
अगर सांगा के विरूद्ध उन्हें सफलता मिल जाती तो सारा देश उनकी मुट्ठी में चला जाता और अगर युद्ध में उनकी मृत्यु हो जाती तो वे 'गाजी' हो जाते। इस तरह से बाबर तथा उसकी सेना के लिए हिन्दुओं के विरुद्ध युद्ध एक राजनीतिक एवं धर्मिक महत्व की चीज थी। अतः इससे भी बाबर को वांछित सफलता मिली। यहां हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बाबर ने राजपूतों की कमजोरियों तथा उनकी आपसी फेट का पूरा-पूरा फायदा उठाया। इसके अतिरिक्त, राजपूतों के विरूद्ध बाबर की सफलता राजपूत सेना की कमजोरियों के चलते भी संभव हो पायी, क्योंकि राजपूतों की युद्ध-कला एवं युद्ध-सामग्री दोनों ही पुराने थे।

चरित्र तथा मूल्यांकन
तत्कालीन तथा आधुनिक युग के प्रायः सभी इतिहासकारों ने एकमत होकर राय प्रकट की है कि बाबर मध्यकाल में एशिया के अत्यन्त प्रतिभाशाली सम्राटों में से एक था। उसके एक कुटुम्बी मिर्जा हैदर ने, जो 'तारीखे रशीदी' के लेखक है, उसके बारे में लिखा है कि उसके अन्दर बहुत-से गुण और अनेक विशेषताएं थीं; वीरता और मानवता के सद्गुण इनमें सर्वोपरि थे। वास्तव में उसके परिवार में उससे पहले ऐसा कोई नहीं हुआ जिसमें ऐसे गुण हों, और न उसकी जाति में ही ऐसा कोई व्यक्ति हुआ था जिसने ऐसी आश्चर्यजनक वीरता, शौर्य, साहस और पराक्रम का परिचय दिया हो। उसकी लड़की गुलबदन बेगम ने उसके बारे में हुमायूंनामा' में ऐसे ही विचार प्रकट किये हैं, और आधुनिक इतिहासकारों में प्रायः सभी ने तत्कालीन इतिहासकारों की ही राय का समर्थन किया है। उदाहरण के लिए, वी.ए. स्मिथ ने लिखा है कि उस युग के एशियाई शासको में वह सर्वाधिक प्रतिभाशाली थे, और किसी भी देश अथवा युग के राजाओं के बीच में उसे उच्च स्थान दिया जा सकता है...'' उसके बारे में हैवेल की राय है कि "इस्लाम के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ व्यक्तियों में से वह एक है।" रशबुक विलियम्स ने तो व्यक्ति के रूप में और एक राजा के रूप में उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है और इतिहासकार डेनीसन रोस ने भी उस युग के सम्राटों में उसका स्थान ऊंचा रखा है।

व्यक्ति के रूप में
बाबर का व्यक्तिगत जीवन बड़ा ही आदर्शमय था। अपने बाल्यकाल में वह अपने पिता का बड़ा ही आज्ञाकारी और कर्तव्यपरायाण पुत्र था। यद्यपि बचपन में ही, जबकि वह ग्यारह वर्ष की अवस्था से कुछ ही बड़ा होगा, उसके पिता का स्वर्गवास हो गया था, लेकिन उनके प्रति उसके हृदय में अपार प्रेम और श्रद्धा थी। वह अपनी माँ, दादी और नानी को अत्यन्त प्रेम करता था और यह प्रेम उनके प्रति अगाध श्रद्धा का ही दूसरा रूप था। यद्यपि अनेक मुसलमान शासक और सरदारों की भांति ही उसने भी बहु-विवाह किये थे, तथापि अपनी पत्नियों के प्रति वह पूर्णरूप से अनुरक्त था। मित्र भी वह बहुत अच्छा था; अपने बचपन के साथियों को वह केवल याद ही नहीं करता था, बल्कि उनकी मृत्यु पर बहुत रोता था। अपने कुटुम्बीजनों और अन्य रिश्तेदारों के प्रति भी उसका वही प्रेम भाव था, और जिन लोगों को सहायता की जरूरत होती थी, वह उनकी पूरी मदद करता था। मानवीय स्वभाव की मूल अच्छाइयों में उसका पूरा विश्वास था और उसकी हृदय एवं इनसे भरा हुआ था। यद्यपि उन दोष-दुर्गुणों से, जो साधारणतया अभिजात्य वर्ग के लोगों में पाये जाते हैं, वह बिलकुल मुक्त नहीं था, तथापि अपने व्यक्तिगत जीवन में उसने उच्चकोटि की नैतिकता को स्थान दिया था, जो उसकी जन्मभूमि और उसके युग विशेष में मुश्किल से दिखायी देती है। वह शराब का शौकीन अवश्य था और कभी-कभी बहुत अEि क भी पी लेता था, लेकिन अपने बेटे हुमायूं की तरह वह नशे का गुलाम कभी नहीं बना। स्त्रियों के प्रति उसके व्यवहार में एक प्रकार का संयम रहता था, जिस संयम से उस काल में मध्य एशिया के लोग अपरिचित थे। जीवन के ऐश, आराम और विलासिता का गुलाम वह नहीं था। स्वभाव से ही साहसिक कृत्यों के प्रति प्रेम रखने के कारण उसके दिल-दिमाग में एक अजीब-सी बेचैनी दिखायी देती थी और जीवन की असामान्य और भयानक स्थितियों का सामना करने में वह बड़ा आनन्द लेता था। आरम्भ से ही कठिनाइयों के विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने के कारण अभावों से तो वह अभ्यस्त हो गया था और धैर्य, साहस औ सहनशीलता आदि विशेषताओं का उसने अपने चरित्र में पूर्णतया विकास किया था। शारीरिक शक्ति उसमें इतनी थी कि बगल में दो आदमियों को दबाये किले की चहारदीवारी की छत पर वह मजे से दौड़ लेता था। भारतवर्ष में उसके रास्ते में गंगा को छोड़कर जो भी नदियां पड़ी, उन सबको तैरकर ही उसने पार किया और एक बार तो उत्साह में आकर गंगा को भी वह तैरकर पार कर गया।

विद्वान के रूप में
संस्कृति और लोक-शिष्टाचार में अद्वितीय होने के साथ ही बाबर एक महान पण्डित और ललित कलाओं का प्रेमी भी था। प्राकृतिक सौन्दर्य की विशेषताओं का वह अद्भुत पारखी था तथा व्यक्ति और जीवन के बहुरंगी रूपों के समझने में वह दक्ष था। वह तुर्की भाषा का एक उच्चकोटि का सुयोग्य लेखक था और उसकी लेखन-शैली विशुद्ध थी। उसकी सुप्रसिद्ध आत्मकथा 'बाबरनामा' ने उसे अमरत्व प्रदान कर दिया है। कवि भी वह उच्चकोटि का था। तुर्की भाषा में उसका दीवान (कविता संग्रह) काव्य-कला का एक अनुपम उदाहरण है जिसकी प्रशंसा उसके समसामयिक काव्य प्रेमियों से लेकर आज तक की जाती है। फारसी में भी उसने कविताएं लिखी थीं और मुबइयान' नाम की एक विशेष पद्य-शैली का वह जन्मदाता माना जाता है। एक सुलेखक और ललित कलाओं–विशेषकर कविता और संगीत का प्रेमी होने के साथ-साथ उसकी आलोचनात्मक अभिरूचि भी अत्यन्त विशिष्ट थी। 'आत्मचरित्र लेखकों में उसका स्थान एक राजा की भांति ही ऊंचा माना जा सकता है। 'बाबरनामा' में अपने कार्यकलापों का उसने ऐसा सजीव चित्रण किया है और भविष्य के लिए वह मनोरंजक सामग्री छोड़ी है कि बस प्रशंसा करते ही बनती है। इन वृत्तान्तों में भ्रमण किये हुए देश-विदेशों का वर्णन है, वहां की भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक दृश्य और वृक्षादि का वर्णन है। वैसे तो बाबर में एक विद्धान की सभी विशेषताएं विद्यमान थीं, फिर भी उसे सैनिक विद्वान कहना ठीक होगा। वह सैनिक पहले था, और विद्वान बाद में। उसकी विद्वत्ता और संस्कृति ने अविश्रान्त सैनिक कार्य-कलापों में कोई बाधा नहीं डाली और न इनके द्वारा उसके अन्दर उन अतिशय कोमल भावनाओं का ही उदय हुआ, जो प्रायः विद्वत्ता के साथ सम्बन्धित रहती है।

धार्मिक विचार
वैसे तो बाबर एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था, लेकिन धार्मिक कट्टरता उसमें नहीं थी और अन्य कट्टरपंथी सुन्नी मतावलम्बियों की तरह उसने गैर-मुसलमान काफिरों को सताना अपना कर्तव्य नहीं बना लिया था। सुन्नी मत के प्रति उसकी श्रद्धा और विश्वास ने दूसरे मल-पंथ के लोगों के साथ मित्रता करने से उसे नहीं रोका । फारस के शिया मतावलम्बी शासक शाह इस्माइल सफवी के साथ भी, जो अपने क्षेत्र में सुन्नियों पर जोर-जुल्म करने के लिए बदनाम था, उसने एक समझौता किया था और समरकन्द में शिया मत को प्रोत्साहन देने के लिए भी वह राजी हो गया था। ईश्वर के प्रति उसका इतना अटूट विश्वास था कि उसे एक विशिष्ट धार्मिक व्यक्ति' ठीक ही कहा गया है। वह कहा करता था, "ईश्वर की इच्छा के बिना कछ भी नहीं हो सकता: उसकी शरण में ही रहकर था कि ईश्वर ही उसे आगे कदम बढाने के लिए प्रेरित करता है। जब-जब उसे विजयश्री प्राप्त होती थी, वह भगवान को अनेकानेक धन्यवाद देता था और उसे उसकी अनुकम्पा का ही परिणाम मानता था। भारतवर्ष में अपने युग की परिस्थितियों से ऊपर उठना उसके लिए कठिन था। हमारे देश के लोगों के साथ उसने धार्मिक उदारता और सहिष्णुता की नीति नहीं बरती। राणा सांगा के विरुद्ध उसने धर्मयुद्ध (जिहाद) आरम्भ किया था और अपने आदमियों को यह कहकर उसके विरुद्ध लड़ने के लिए भड़काया था कि वह काफिर है और उसके खिलाफ युद्ध करना उनका धार्मिक कर्तव्य है। विजय-प्राप्ति के पश्चात् उसने गाजी किाफिरों का नाशक) का खिताब प्राप्त किया था। चंदेरी के मेदिनीराय के विरूद्ध भी उसने ऐसा ही धर्मयुद्ध लड़ा था और एक धर्मान्ध सुन्नी के रूप में व्यवहार किया था। अयोध्या में उसने अपनी मस्जिद ऐसे स्थान पर निर्माण करायी थी जिसे श्री रामचन्द्रजी का जन्म स्थान मान लाखों हिन्दू पूजते थे। चुंगी-कर हटाने में भी उसने हिन्दू-मुसलमान के भेदभाव को माना था। मुसलमान व्यापारियों से तो चुंगी बिलकुल हटा दी गयी थी जबकि हिन्दुओं से यह पूर्ववत ली जाती थी। लेकिन यह सब होते हए भी यह कहना उचित ही होगा कि यहां की जनता के प्रति बाबर का व्यवहार सल्तनत-युग के अन्य शासको के व्यवहार की भांति बुरा नहीं था।

सैनिक और रण
कुशल सेनापति के रूप में बचपन से लेकर मृत्युपर्यन्त बाबर को अपने जीवन की सुरक्षा, सिंहासन छीनने और अन्य स्थानों पर विजय प्राप्ति के निमित्त निरन्तर लड़ाइयां लड़नी पड़ी थी। इस प्रकार अपने बाल्यकाल से ही मुख्य रूप से वह एक सैनिक बन गया था। वह "एक प्रशंसनीय घुड़सवार, कमाल का निशानेबाज, बढ़िया तलवारबाज और एक कुशल शिकारी था।" इसके अतिरिक्त उसके अन्दर अमित शारीरिक शक्ति और अपूर्व साहस था, शौर्य-कृत्यों के लिए उसके मन में विकट उत्साह रहता था और मृत्यु को उसने सदैव उपेक्षा की दृष्टि से देखा। असाधारण धैर्य और सहनशीलता के सद्गुण भी उसके अन्दर थे। वह उच्चकोटि का सेनापति और नेता था। दूसरों के ऊपर कमान करने की उसके अन्दर स्वतः शक्ति और प्रतिभा होने के कारण वह अपने अनुयायियों और सैनिकों से सरलता से अपने आदेशों का पालन करा लेता था। स्वभाव से ही सैनिकों के साथ निकटता प्राप्त करने का भाव रखने और मानव चरित्र का पारखी होने के कारण उसके सैनिक और अन्य अधिकारी उसके स्वभाव और चरित्र से अच्छी तरह परिचित हो गये थे, और वह उनमें अत्यन्त लोकप्रिय बन गया था। उसकी आत्मकथा (बाबरनामा) से पता चलता है कि अपने एक अभियान के समय जब वह अपने फौजी दस्तों के साथ ही एक छोटी-सी पर्वतीय गुफा में शरण लेने के लिए गया, तो किस प्रकार भयंकर हिमपात से उसने अपने प्राणों की रक्षा की थी। इधर-उधर छायी हिम-राशि को अपने हाथों से साफकर गुफा के दरवाजे के निकट उसने अपने बैठने के लिए स्थान बना लिया था। उसके आदमियों ने उससे गुफा के अन्दर जाकर आराम से बैठने के लिए अपार आग्रह और अनुरोध किया, लेकिन वह राजी नहीं हुआ, क्योंकि वह तो उन्हीं लोगों के साथ वहां का कष्ट भोगना चाहता था। वह लिखता है, "मैंने अनुभव किया कि मैं गरमाहट लूं और आराम से रहूं और उधर मेरे आदमी हिमपात से गलते रहें, अन्दर मैं आराम से सोता रहूं और उधर मेरे आदमी कष्ट और असुविधाएं भोगते रहें नहीं, यह एक भले आदमी का काम नहीं है और बन्धु भावना से गिरी हुई चीजें हैं। एक बलवान आदमी को जो सहना चाहिए वह मैं सहूंगा, क्योंकि एक फारसी कहावत है, 'मित्रों की मण्डली में मृत्यु भी एक विवाह-भोज मालूम होता है। इस प्रकार मैं अपने हाथ से खोदी हुई गुफा में बरफ और ठण्डी हवा की मार सहन करते हुए बैठा रहा,; मेरी खोपड़ी, कान और कमर पर चार हाथ मोटी बरफ की मोटी-मोटी तहें जम गयी थीं। "यद्यपि अपने सिपाहियों को इस तरह प्यार करता था; किन्तु जरूरत के समय उसे सख्ती से पेश भी आना पड़ता था।

शासक और कूटनीतिज्ञ के रूप में
एक सफल फौजी नेता के लिए जैसा स्वाभाविक होता है, बाबर ने भी एक शक्तिशाली शासक के रूप में केवल भारतवर्ष में ही अपनी विशेषताओं का परिचय नहीं दिया. बल्कि अपने स्वदेश ट्रान्स-ऑक्सियाना में भी उसने शांति और अनुशासन की स्थापना की थी। अपने सुविस्तृत साम्राज्य में, जिसका विस्तार बदख्शां से लेकर बिहार की पश्चिमी सीमा तक था, उसने लुटेरों से अपनी प्रजा के जान-माल की रक्षा की व्यवस्था की थी। सुविधा से आने-जाने के लिए उसने अपने क्षेत्र के मुख्य–मुख्य भागों में सड़कें सुरक्षित करवा दी थीं। उसने यह भी ध्यान रखा कि स्थानीय अधिकारी लोगों के ऊपर जोर-जुल्म न करें। उसका दरबार संस्कृति का ही केन्द्र-स्थल नहीं था, बल्कि कठोर अनुशासन का भी केन्द्र था। एक शासक के रूप में वह अपने प्रजाजनों की सुख-सुविधा का बड़ा ख्याल रखता था
और बाहरी आक्रमण तथा आंतरिक अशांति से उन्हें बचाने की पूरी चेष्टा करता था। लेकिन अपनी प्रजा की नैतिक और भौतिक स्थिति सुधारने का न तो उसका विचार था और न उसमें योग्यता ही थी। वह एक कुशल कूटनीतिज्ञ था। 1494 ई.में जब वह ग्यारह वर्ष की अवस्था से कुछ ही बड़ा होगा, उसने अपने चाचा अहमद मिर्जा को जो संवाद भेजा था उससे ज्ञात होता है कि यह गुण उसमें स्वाभाविक ही था। शायद उसका यह विश्वास था कि सच्चाई ही सर्वोत्तम कूटनीति है। अपने विरोध पी पर अभियान आरम्भ करने से पूर्व वह अपने पक्ष का लेखा तैयार कर लेता था। काबुल के लोगों के साथ अपनी कूटनीतिज्ञता का जिस रूप में उसने उपयोग किया, उस रूप में फरगाना और समरकन्द में अपने निकट के लोगों के साथ नहीं कर सका था, और भारतवर्ष में उसने जो सफलता प्राप्त की उसका श्रेय बहुत कुछ उसकी कूटनीति को ही है जिसके द्वारा उसने अपने शत्रुओं में फूट डाल दी थी। डेनीसन रौस के शब्दों में, "जिस नीति से उसने सुल्तान इब्राहीम के विद्रोही सामन्तों को आपस में एक-दूसरे से भिड़ाया, वह मैक्यावेली की योग्यता से कम न थी।''

शासन-प्रबन्धक के रूप में
एक सैनिक और विजेता के रूप में बाबर ने इतनी सफलता अवश्य प्राप्त की, किन्तु शासन-प्रबन्धक वह अच्छा नहीं था। उसमें रचनात्मक बुद्धि का अभाव था। हर जगह उसने पुरानी, जीर्ण और दकियानुसी संस्थाओं को जारी रखा और उनकी जगह समय के अनुकूल एवं नवीन शासन-प्रणाली को व्यवहार में लाने का प्रयत्न नहीं किया। ऐसा करने में वह अयोग्य था। हमारे देश में उसके कार्यकलाप विध्वंसात्मक ही रहे, रचनात्मकता उनमें नहीं थी। मुगलों के आक्रमण से दिल्ली सल्तनत का शासन-तंत्र ध्वस्त हो गया था, किन्तु बाबर ने उसकी जगह किसी अच्छी शासन-प्रणाली की स्थापना करने की चेष्टा नहीं की। उसने अपने साम्राज्य को अपने सामन्तों तथा अन्य अधिकारियों में बांट दिया था और उन्हीं को शासन प्रबन्ध का काम भी सौंप दिया गया था। इस प्रकार सारे साम्राज्य में फौजी गवर्नरों के छोटे-छोटे राज्य स्थापित हो गये, जो अर्द्ध-स्वतंत्र थे। केवल सम्राट का व्यक्तित्व ही उन्हें एकसूत्र में बांधे हुए था। बाबर बा साम्राज्य, जैसा ऐस्किन ने लिखा है, "छोटे-छोटे राज्यों का समूह मात्र था. वह एकसे शासन-प्रबन्ध के अन्तर्गत विधिपूर्वक सुसंगठिन साम्राज्य नहीं था। सीमान्त और पर्वतीय जिलो में से बहुत से तो नाममात्र के लिए उसकी अधीनता मानते थे।" प्रत्येक स्थानीय गवनेर शासन-प्रबन्ध में अपना ही तौर-तरीका बरतता था और अपने
क्षेत्र के लोगों के जीवन-मरण का स्वामी था। जब बादशाह की मांग होती थी तो वह अपने फौजी दस्ते भेज देता था और केन्द्रीय कोष में वार्षिक कर जमा कर देता था। बस उसके उत्तरदायित्व की यहीं तक इतिश्रीथी। वैसे वह स्वतंत्र होता था। साम्राज्य में एकसी लगान-व्यवस्था स्थापित करने की ओर बाबर ने कोई कदम नहीं उठाया। जमीन की नाप-जोख तथा उसकी पैदावार को ध्यान में रखते हुए एकसे कर की मांग रखने की ओर कोई चेष्टा नहीं की गयी। न्याय-प्रबंध भी बड़ा अव्यवस्थित था। इस प्रकार "इस विशाल साम्राज्य के विभिन्न भागों की राजनीतिक स्थिति में बहुत कम समानता थी। राजा की निरंकुश शक्ति को छोड़कर शायद ही ऐसा कोई कानून था जो उस समय सारे साम्राज्य में लागू समझा जाता हो।"

इतिहास में बाबर का स्थान और सारांश

बाबर का एक राजा के रूप में अपनी मातृभूमि ट्रान्स-ऑक्सियाना के इतिहास में, जहां से उसे अपमानपूर्वक काबुल में शरण लेने के लिए निकाल बाहर किया गया था, कोई प्रमुख स्थान नहीं है और न अफगान लोग ही उसे श्रद्धापूर्वक याद करते हैं, क्योंकि अफगानिस्तान में उसने शासन-प्रणाली में ऐसे कोई उपयोगी सुधार नहीं किये जिनके साथ उसका स्मरण किया जाता। यदि उसके पुत्र हुमायूं के निष्कासन के बाद मुगलों के हाथ से सारा साम्राज्य हमेशा के लिए निकल गया होगा, तो भारतवर्ष के इतिहास में भी उसकी याद शेष नहीं रहती। किन्तु यह उसका सौभाग्य था कि अकबर जैसा उसका पोता उत्पन्न हुआ, जिसने मुगल साम्राज्य की ऐसी गहरी और सुदृढ़ नींव डाली जिससे दो सौ वर्ष से अधिक काल तक यह फलता-फूलता रहा। इसलिए भारतवर्ष में मुगल साम्राज्य का स्थापक वास्तव में अकबर को ही माना जाता है, उसके दादा बाबर को नहीं। बाबर ने तो मुगल साम्राज्य की नीवं का पहला पत्थर ही रखा था, इसलिए भारतीय इतिहास में उसका स्थान एक विजेता और साम्राज्य का शिलान्यास करने वाले व्यक्ति के रूप में ही है। इस विशाल मुगल साम्राज्य को पुनःस्थापित करने और उसे शानदार शासन प्रणाली द्वारा संचालित करने का श्रेय तो उसके पोते अकबर महान् को ही है।
यदि बाबर को हिन्दुस्तान पर विजय प्राप्त करने में सफलता नहीं भी मिली होती और अपने बेटे के लिए उसने साम्राज्य नहीं छोड़ा होता, तो भी साहित्य जगत में उसकी स्मृति सदैव जीवित रहती। सामान्य पाठक के लिए तो बाबर के राजनीतिक कार्यकलापों की अपेक्षा उसके भव्य व्यक्तित्व का आकर्षण ही अधिक है। विश्व इतिहास में उसका बड़ा ही दिलचस्प व्यक्तित्व है। वह उन लोगों में से था "जो मन और शरीर से इतने स्फूर्तिवान होते हैं कि कभी प्रमाद में नहीं रहते और सब कुछ कर लेने के लिए समय निकाल लेते हैं।'' उसके चरित्र में एक महान राजा और एक श्रेष्ठ पुरुष के सद्गुणों का बड़ा सुन्दर मिश्रण था। वह इतना प्रसन्नचित्त, स्पष्ट और साहस–सम्पन्न था कि किसी भी प्रकार की कमी, कठिनाई अथवा आपत्ति उसके स्थिर मन को विचलित नहीं कर सकती थी। साहसिकता उसके जीवन की प्राण मात्र थी। कभी-कभी स्वभाव से वह बड़ा भयंकर, कठोर और निर्दयी दिखायी देता था, किन्तु वह यह मनोदशा क्षणिक होती थी और वह पुनः अपने और सौम्य रूप में आ जाता था।

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