बहमनी साम्राज्य - बहमनी साम्राज्य का इतिहास | bahmani samrajya

बहमनी साम्राज्य

बहमनी साम्राज्य की स्थापना

मुम्हमद तुगलक के शासन के अन्तिम वर्षों में दक्षिण भारत में नियुक्त उसके मुस्लिम अमीरों में सुल्तान की अत्याचारपूर्ण नीति के विरुद्ध जबरदस्त असन्तोश उत्पन्न हो गया था। उन्होंने मिलकर मुम्हमद तुगलक के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और शाही अधिकारियों को परास्त करके दौलताबाद पर अधिकार कर लिया। फिर उन्होंने सर्वसम्मति से वृद्ध तथा अनुभवी अमीर इस्माइल मख अफगान को "नासिरूद्दीनशाह" के नाम से सुल्तान घोषित कर दिया।
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मुहम्मद तुगलक ने विद्रोहियों को परास्त कर दौलताबाद को तो जीत लिया। परन्तु धारागिरि दुर्ग में मोर्चा जमाकर बैठे हुए इस्माइल मख और गुलबर्गा में डटे हुए हसन कांगू को परास्त नहीं कर पाया और गुजरात के विद्रोह को दबाने के लिए दौलताबाद से गुजरात चला गया। सुल्तान के जाते ही विद्रोहियों ने पुनः दौलताबाद पर अपना अधिकार जमा लिया। हसन कांगू ने सुल्तान के सेनापति इमादुलमुल्क को परास्त करके खदेड़ दिया।
इस अवसर पर अपूर्व पराक्रम दिखलाने वाले हसन कांगू से प्रभावित होकर इस्माइल मख ने स्वेच्छा से उसके पक्ष में दौलताबाद का सिंहासन त्याग दिया। 13 अगस्त, 1347 ई. को हसन कांगू “अलाउद्दीन अबल मुजफ्फर बहमनशाह' की उपाधि के साथ सिंहासन पर बैठा। "बहमनशाह' को उपाधि के कारण नये राज्य का नाम "बहमनी' पड़ा।

बहमनशाह (1347-58 ई.)
बहमनशाह के प्रारम्भिक जीवन के बारे में हमें अधिक जानकारी नहीं मिलती। फरिश्ता ने लिखा है कि हसन अपने प्रारम्भिक दिनों में गंग नामक एक ब्राह्मण के यहां नौकर था। ब्राह्मण ने उसके सुल्तान होने की भविष्यवाणी की ओर सुल्तान बनने के बाद हसन ने कृतज्ञतावश बहमनी की उपाधि धारण की। परन्तु आधुनिक शोध कार्यों से यह स्पष्ट हो गया है कि फरिश्ता की कहानी मनगढन्त है। आधुनिक विद्वानों का मत है कि हसनकांगू अपने आपकों ईरानी वीर बहमन का वंशज मानता था और इसीलिए बहमनशाह की उपाधि धारण की, न कि किसी ब्राह्मण उपकारी के नाम पर।
बहमनशाह योग्य तथा शक्तिशाली शासक था। उसने गुलबर्गा को अपनी राजधानी बनाया। निरन्तर युद्धों तथा सैनिक अभियानों से उसने बहमनी राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। अब उसकी सीमाएं उत्तर में बानगंगा, दक्षिण में कृष्णा नदी, पश्चिम में दौलताबाद और परब में भों गिरी तक विस्तृत हो गई। इस राज्य को उसने चार प्रान्तों-दौलताबाद, गुलबर्गा, बरार ओर बीदर में विभाजित किया। प्रत्येक प्रान्त के ऊपर सूबेदार होता था जो सैनिक तथा असैनिक-दोनों कार्यों को सम्पन्न करता था। बहमनशाह को एक न्यायप्रिय सुल्तान बतलाया जाता है परन्तु हिन्दुओं के लिए वह असहिष्णु तथा अत्याचारी शासक सिद्ध हुआ।

मुहम्मदशाह प्रथम (1358-73 ई.)
बहमनशाह का उत्तराधिकारी उसका बड़ा लड़का मुहम्मदशाह हुआ। उसने राज्य की शासन व्यवस्था को ठोस आधार प्रदान दिया। उसकी विदेश नीति का मुख्य ध्येय अपने पड़ौसी हिन्दू राज्यों की अधिक से अधिक भूमि हड़पना था और इसके लिए उसने अनेक युद्ध भी लड़े। तेलगाना से उसने गोलकुण्डा का प्रसिद्ध दुर्ग छीन लिया और 33 लाख रुपया युद्ध का हर्जाना भी वसूल किया। विजयनगर के विरुद्ध लड़े गये युद्ध अनिर्णायक सिद्ध हुए। उसने खलीफा से अपने राज्य तथा शासन की मान्यता भी प्राप्त कर ली।

मुजाहिद और दाऊद (1373-78)
मुहम्मदशाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र मुजाहिद शासक बना। उसने भी विजयनगर पर दो बार आक्रमण किया परन्तु उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली। उसने मध्यएशिया से आने वाले विदेशी अमीरों की उच्च पदों पर नियुक्त करने की नीति अपनाकर अपने अमीरों को रूष्ट कर दिया। परिणाम यह निकला कि उन्होंने षडयन्त्र रचकर 1377 ई. में उसकी हत्या कर दी और उसके चचेरे भाई दाऊद को सुल्तान बना दिया गया। परन्तु वह भी अधिक दिनों तक सिंहासन का सुख नहीं उठा पाया। मुजाहिद की एक बहिन ने षड़यन्त्र रच कर उसकी हत्या करवा दी।

मुजाहिद द्वितीय (1378-97 ई.)
मुजाहिद द्वितीय को मुहम्मदशाह द्वितीय भी कहा जाता है। वह बहमनशाह का पौत्र था। बहमनी राज्य के सिंहासन पर उस जैसा शान्तिप्रिय और विद्वानुरागी सुल्तान कभी नहीं बैठा। उसने अपने राज्य में भव्य मस्जिदों का निर्माण करवाया तथा अपने दरबार में विद्वानों का जमघट लगवा दिया। उसे हर समय अपनी प्रजा की भलाई की चिन्ता लगी रहती थी और उसने जनकल्याण के लिए बहुत से काम किये। उसने विजयनगर राज्य के साथ भी मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध रखे। 1397 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

ताजुद्दीन फीरोजशाह (1397-1422 ई.)
मुजाहिद द्वितीय के बाद गयासुद्दीन और शम्सुद्दीन क्रमश सुल्तान बने परन्तु दोनों को ही अयोग्यता के कारण जल्दी-जल्दी से अपदस्थ कर दिया गया और बहमनशाह के एक पौत्र ताजुद्दीन फीरोजशाह ने सिंहासन पर अधिकार कर लिया। ताजुद्दीन में अनेक गुणों और दोषों का अपूर्व समन्वय था। वह एक पराक्रमी सैनिक और कुशल सेनानायक था। उसे कला, साहित्य एवं विद्या में अनुराग था। परन्तु वह अत्यधिक भोग-विलासी एवं कट्टर धर्मान्ध शासक भी था। उसने विस्तारवादी नीति को अपनाते हुए विजयनगर पर तीन बार आक्रमण किये। प्रथम दोनों आक्रमणों में उसे सफलता मिली और विजयनगर के शासकों को अपमानजनक सन्धियां करनी पड़ी। परन्तु तीसरी बार उसे देवराय द्वितीय के हाथों बुरी तरह से पराजित होना पड़ा। विजयनगर की सेना ने बहमनी राज्य को बुरी तरह से रौंद डाला और उसके कई इलाकों पर अधिकार कर लिया। इस पराजय के बाद वह शासन कार्यों की उपेक्षा करने लगा। 1422 ई. में उसके भाई अहमदशाह ने उसे अपदस्थ करके सिंहासन पर अधिकार कर लिया।

अहमदशाह (1422-35 ई.)
सुल्तान बनते ही अहमदशाह ने गुलबर्गा के स्थान पर बीदर को अपनी राजधानी बनाया क्योंकि एक तो उसकी किलेबन्दी सुदृढ थी और दूसरा विजयनगर की सीमा से बहुत अधिक दूरी पर होने की वजह से विजयनगर के आक्रमण से सुरक्षित था। अहमदशाह भी एक पराक्रमी शासक था। उसने विजयनगर, वारंगल और मालवा के सुल्तानों से युद्ध लड़े। विजयनगर के साथ लड़े गये युद्धों का परिणाम विवाद का विषय है। परन्तु वह वारंगल से कुछ प्रदेश जीतने में सफल रहा ओर मालवा के सुल्तान होशंगशाह को भी पराजित किया। उसने गुजरात पर भी आक्रमण किया था परन्तु असफल रहा। वह अपने समय का एक क्रूर तथा अत्याचारी शासक था। धर्मान्धता की नीति पर चलते हए गैर-मुसललानों पर बहुत अधिक अत्याचार किये। उसके शासनकाल में दरबार में दक्षिणी दल तथा विदेशी दल में पारस्परिक प्रतिद्वन्द्विता बहुत अधिक बढ़ गई जिसके परिणामस्वरूप शासन-व्यवस्था में शिथिलता आ गई। 1435 ई. में अहमदशाह की मृत्यु हो गई।

अलाउद्दीन द्वितीय (1435-57 ई.)
अहमदशाह के बाद उसका बड़ा लड़का अलाउद्दीन द्वितीय सुल्तान बना। सुल्तान बनते ही उसे अपने भाई मुहम्मद के विद्रोह का सामना करना पड़ा। उसने भाई के विद्रोह को कुचलने के बाद भी उसके साथ अच्छा व्यवहार किया और उसे रायचुर का सूबेदार बना दिया। इसके बाद अलाउद्दीन ने अपनी सैन्य शक्ति को संगठित किया और 1443 ई. में विजयनगर पर आक्रमण किया और देवराय द्वितीय को बुरी तरह से पराजित किया। देवराय द्वितीय को अपमानजनक सन्धि करनी पड़ी। उसने कोंकण पर आक्रमण कर उसे भी अपनी अ निता मानते के लिए विवश किया। वह अत्यधिक विलासी भी था। उसने संगमेश्वर राजा की पुत्री से बलपूर्वक विवाह किया। परन्तु वह अपनी जनता की भलाई में रूचि रखने वाला शासक भी था। उसने अनेक पाठशालाओं, दानशालाओं और मस्जिदों का निर्माण करवाया। राजधानी में अनेक भव्य भवन बनवाये।

हुमायूं (1457-61 ई.)
अलाउद्दीन द्वितीय के बाद उसका बड़ा लडका हुमायूं सिंहासन पर बैठा। इतिहास में उसे "जालिम हुमायू" के नाम से याद किया जाता था। वह क्रूर तथा अत्याचारी शासक था। सौभाग्य से उसे महमूद गवां जैसा सुयोग्य मंत्री मिल गया जिसने साम्राज्य में शान्ति और व्यवस्था को बनाये रखा।

मुहम्मदशाह तृतीय (1463-82)
हुमायूं की मृत्यु के बाद उसके अल्पवयस्क लड़के निजामशाह को सुल्तान बनाया गया जो 1463 ई. में मर गया। उसकी मृत्यु के बाद उसके छोड़े भाई को मुहम्मदशाह तृतीय के नाम से सिंहासन पर बैठा दिया गया। उरो गदिरा तथा व्यभिचार क अत्यधिक शौक था। शारान सूत्र गहगूद गवां के हाथ में ही रहा। महमूद गवां ने अपनी योग्यता एवं प्रतिभा से बहमनी साम्राज्य को उन्नति की चरम सीमा पर पहुंचा दिया। उसने कोंकण के हिन्दू राजाओं को परास्त कर उनके दुर्गों पर अधिकार कर लिया। उसने विजयनगर वालों से गोआ छीन लिया। इसके बाद उसने विजयनगर पर आक्रमण किया और अपार धन सम्पदा लूट कर ले गया। उसने उड़ीसा के हिन्दू राज्य पर भी आक्रमण किया। मुहम्मदशाह ने कांजीवरम पर आक्रमण किया और अनेक भव्य मन्दिरों को भूमिसात किया। यहां उसने अनेक ब्राह्मण गुजारियों को मौत के घाट उतार कर गाजी की उपाधि धारण की। उसने जरा से सन्देह पर अपने सुयोग्य वजीर महमूद गवां की हत्या करवा दी और कुछ महीनों बाद अत्यधिक मद्यपान के कारण उसका भी देहान्त हो गया।

बहमनी राज्य का प्रशासन एवं जन-जीवन

बहमनी राज्य में भी स्वेच्छाचारी निरंकुश राजतन्त्र था। अतः राज्य की समस्त शक्ति का केन्द्र बिन्दु सुल्तान था। उसके अधिकारों पर किसी पर भी प्रकार का कोई अंकुश नहीं था। बहमनी वंश के अधिकांश सुल्तान धर्मान्ध, भोगविलासी तथा अत्याचारी निकले। दरबार की गुटबन्दी तथा उत्तराधिकार के अनिश्चित नियम के कारण राज्य में कुचक्र होते रहे दरबार की गुटबन्दी से शासन व्यवस्था को काफी क्षति पहुंची। महमूद गंवा ने निःसन्देह ही शासन व्यवस्था को मजबूती प्रदान करने का प्रयास किया था। मुस्लिम शासकों ने गैर-मुस्लिम जनता को प्रजा नहीं समझा।

राजस्व व्यवस्था

बहमनी राज्य की राजस्व व्यवस्था भी काफी दोषपूर्ण थी। राजस्व व्यवस्था की वसूली की जांच-पड़ताल सम्बन्धी कोई व्यवस्था नहीं थी, जिसके कारण सरकारी अधिकारी एवं कर्मचारी प्रायः सरकारी धन का गबन कर जाते थें इसके अतिरिक्त ये लोग जनता से निर्धारित करों से अधिक कर वसूल करते थे। सुल्तानों ने राज्य तथा जनता की भौतिक उन्नति के लिए किसी प्रकार की ठोस स्थायी नीति का पालन नहीं किया।

वाणिज्य एवं व्यापार

बहमनी सुल्तानों ने व्यापार तथा वाणिज्य एवं उद्योग-धन्धों को भी उदारतापूर्वक प्रोत्साहन नहीं दिया।

सामाजिक जीवन

बहमनी राज्य का सामाजिक जीवन प्रायः अशान्त रहा जिसका मुख्य कारण समाज के दो मुख्य वर्गों में समानता का व्यवहार न होना था। समाज का अल्पसंख्यक मुस्लिम वर्ग राजधर्म का अनयायी होने के कारण बहुसंख्यक हिन्दू वर्ग से कहीं अच्छी स्थिति में था। अधिकांश हिन्दू कषि कार्य तथा उद्योग-धन्धों से आजीविका चलाते थे। हिन्दुओं को समाज में कोई सम्मान प्राप्त नहीं था। राजकीय पदों में भी उन्हें निम्न पदों पर नियुक्त किया जाता था। समाज में साम्प्रदायिक हत्याएं तथा सामूहिक लूटमार सामान्य बात थी। कभी-कभी धार्मिक उन्माद के क्षणों में कई निर्दोष व्यक्तियों का मारा जाना आश्चर्यजनक नहीं था। गैर-मुस्लिम जनता से जजिया कर सख्ती से वसूल किया जाता था। मुसलमानों का जीवन भी अधिक सुखी नहीं था। उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। केवल सम्पन्न तथा अमीर अधिकारी ही भोग-विलासिता एवं ऐश्वर्य का जीवन व्यतीत करते थे। अमीर वर्ग में ऐश्वर्य के प्रदर्शन में होड़ लगी रहती थी। जिसके लिए वे अक्सर बड़े-बड़े आयोजनों एवं प्रीति-भोजों का आयोजन करते थे। समाज में सबसे बुरी स्थिति मजदूरों की थी। उन्हें अपने परिश्रम का बहुत ही कम धन मिल पाता था। स्त्रियों की स्थिति भी गिरि हुई थी। वे भोग-विलासिता तथा पारिवारिक कार्यों तक ही सीमित थी।

शिक्षा, साहित्य एवं कला

अनेक कमियों के बावजूद भी बहमनी शासक इस्लामी विद्या के प्रति अनुराग रखते थे। शिक्षा की ओर भी उन्होंने ध्यान नहीं दिया। प्रत्येक गांव में एक मस्जिद बनवायी गयी जिनमें एक-एक मुल्ला नियुक्त किया गया जिसका एक कार्य ग्रामीण बच्चों को शिक्षा देना भी था। प्रत्येक बड़े शहर में एक-एक मकतब, जिन्हें उच्च विद्यालय कहा जा सकता है, बनवाये गये। सरकार की तरफ से इन शैक्षणिक संस्थाओं को उदारतापूर्वक अनुदान दिया जाता था। राजधानी बीदर से अरबी-फारसी की उच्च शिक्षा के लिए एक महाविद्यालय एवं विशाल पुस्तकालय की स्थापना की गयी। सभी शिक्षण संस्थाओं में इस्लामी धर्म, कानून, सभ्यता तथा संस्कृति के पठन-पाठन की व्यवस्था थी। लेकिन हिन्दुओं की शिक्षा के लिए किसी भी सुल्तान ने रूचि नहीं दिखायी। स्त्री शिक्षा की ओर भी राज्य की तरफ से कोई व्यवस्था नहीं थी। धनी एवं सम्पन्न लोग अपनी लड़कियों को घर पर ही संगीत, नृत्य एवं धार्मिक शिक्षा देते थे।
बहमनी शासकों ने भव्य भवनों का निर्माण भी करवाया। पहले राजधानी गुलबर्गा तथा बाद में बीदर में अपने निवास हेतु भव्य एवं विशाल राजप्रासादों का निर्माण करवाया, अनेक विशाल राजभवन एवं मस्जिदें बनवायी। सार्वजनिक प्रयोग हेतु सरायों, जलाशयों, नहरों, पुलों तथा बीदर में अनेक सुन्दर बाग भी लगवाये । बहमनी काल में एक विशिष्ट स्थापत्य शैली का जन्म हुआ जो भारतीय, तुर्की, मिस्त्री, ईरानी, आदि तत्वों के सम्मिश्रण से बनी थी। बहमनी काल की अधिकांश इमारतों पर हिन्दू शैली का प्रभाव था क्योंकि ये हिन्दू मन्दिरों के स्थान पर एवं उसकी सामग्री से बनी थी।

बहमनी राज्य के पतन के कारण

बहमनी राज्य के उत्थान और पतन की कहानी हम पढ़ चुके हैं। इस कहानी में बहमनी राज्य के पतन के कारण छिपे हैं। उन्हें हम निम्नलिखित रूप से प्रकट कर सकते हैं -

विभिन्न वर्गों व दलों का संघर्ष
बहमनी राज्य में मुसलमानों के अनेक वर्ग और दल निवास करते थे। इनमें तुर्क, मुगल, अरबी, अबीसिनियन और भारतीय मुसलमान प्रमुख थे। ये दल एक दूसरे को घृणा की दृष्टि से देखते थे। विशेष रूप से देशी और विदेशी अमीरों का वर्ग एक दूसरे को विनिष्ट करने में संलग्न रहता था। इस प्रकार बहमनी राज्य में राष्ट्रीयता के कोई भाव नहीं थे। इस अभाव के फलस्वरूप यह राज्य धीरे-धीरे पतन की ओर बढ़ता गया।

सुल्तानों की अविवेकपूर्ण नीति
बहमनी सुल्तान अपनी अविवेकपूर्ण नीति से शासन को संगठित और स्थायी रूप प्रदान नहीं कर सके। उनकी धार्मिक असहिष्णुता ने बहुसंख्यक हिन्दू जनता को राज्य का विरोधी बना दिया। बहमनी शासक दृढ नीति का अवलम्बन नहीं कर सके, फलस्वरूप अमीरों के आपसी मतभेद उग्र होते गए। सुल्तानों की दुर्बल नीति राज्य के लिए बड़ी घातक हुई।

विजयनगर से युद्ध
बहमनी सुल्तानों ने साम्राज्य–विस्तार के लिए विजयनगर पर बार-बार आक्रमण किया। दोनों राज्यों का युद्ध वंशानुगत हो गया। निरन्तर युद्धों से बहमनी राज्य की शक्ति का बड़ा ह्रास हुआ और राजकोष को बड़ी हानि पहुंची। निरन्तर युद्धों में संलग्न रहने के कारण बहमनी सुल्तान शासन प्रबन्ध के लिए समय नहीं निकाल सके और जनता को सन्तोष नहीं दे सके।

विदेशी अमीरों की भर्ती
बहमनी सुल्तानों ने विदेशी अमीरों पर अधिक विश्वास किया। फलस्वरूप विदेशी और देशी अमीरों में वैमनस्य बढ़ता गया। महमूद गवां जैसे मन्त्री को छोड़कर अन्य अधिकांश विदेशी अमीरों ने राजभक्ति नहीं दिखाई।

महमूद गवां का वध
महमूद गवां ने अपनी निःस्वार्थ सेवा और अद्भुत कार्यकुशलता से बहमनी राज्य की अनेक संकटों से रक्षा की। लेकिन उसके वध के बाद राज्य में अराजकता फैल गई। अब विनाशकारी शक्तियां प्रबल हो गई ओर शीघ्र ही अनेक राज्य स्वतन्त्र हो गए। महमूद गावां के बाद जो भी मन्त्री हुए वे स्वार्थी निकले।

अयोग्य उत्तराधिकारी
मुहम्मद तृतीय की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी बड़े अयोग्य और विलासी निकले। वे अपने अमीरों और प्रान्तपतियों पर नियन्त्रण नहीं रख सके। शासन-सत्ता मन्त्री के हाथों में चली गई। अन्त में, बहमनी वंश के अन्तिम सुल्तान कलीम अल्लाशाह की मृत्यु के बाद साम्राज्य का अन्त हो गया।

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