कंप्यूटर क्या है? - परिभाषा, कार्य, प्रकार, विशेषताएं | computer kya hai | computer in hindi

कंप्यूटर (COMPUTER)

मानव शुरू से ही अपने कामों को सरल रूप से करने के तरीके ढूंढता रहा है। शारीरिक श्रम को कम करने के लिए जिस तरह उसने 'लीवर' की खोज की, लगभग उसी तरह से दिमागी मेहनत में कटौती करने के लिए कंप्यूटर की खोज कर डाली। सभ्यता के विकास के साथ-साथ मानव के पास जानकारियों का अंबार लगता गया जिसका प्रयोग कर लाभ उठाने के लिए ऐसे यंत्र की जरूरत पड़ी जो न केवल उस जानकारी को शीघ्रता से सही ढंग से संजो सके बल्कि जरूरत पड़ने पर उस जानकारी को शीघ्रता से प्रस्तुत कर सके या उस जानकारी के आधार पर निर्णय दे सके। computer in hindi
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जिस तरह रेडियो, टेलीविजन, म्यूजिक सिस्टम व वीसीआर इलेक्ट्रॉनिक मशीन है उसी तरह कंप्यूटर भी इलेक्ट्रॉनिक मशीन ही है, परंतु उनमें और अन्य मशीन में एक विशेष अंतर है। रेडियो, टेलीविजन आदि मशीनें अधिकतर मनोरंजन के काम में ही ली जाती हैं जबकि कंप्यूटर उपयोगी कार्य करने के लिये निर्मित मशीन है।
कंप्यूटर एक मानव निर्मित मशीन है जो घंटों का काम मिनटों में पूरा करता है। कंप्यूटर' अंग्रेजी भाषा का शब्द है। जिसका अभिप्राय गणना करने वाली मशीन से है। लेकिन यह परिचय अधूरा है। यह केवल हिसाब में है। जोड़, घटाव, गुणा करने वाली मशीन ही नहीं है बल्कि अन्य विषयों पर विचार करने एवं अविश्वसनीय गति से कार्य पूर्ण करने में समर्थ है। आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कंप्यूटर की सक्रिय भूमिका मानव इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

कंप्यूटर की परिभाषा

कंप्यूटर का शाब्दिक अर्थ है 'वह यंत्र जो 'कंप्यूट' यानि गणना करे। शुरुआत में कंप्यूटर का काम केवल गणना करना ही था इसलिए यह परिभाषा ठीक लगती थी लेकिन तकनीकी विकास के साथ कंप्यूटर के कामों में बढ़ोत्तरी हो गई।
ये सभी कार्य इन चार चरणों में होते हैं-
  1. आँकड़े ग्रहण करना या इनपुट (Collection & Input)
  2. आँकड़ों का संचयन यानि उन्हें जमा करना (Storage)
  3. आँकड़ों का संसाधन (Processing)
  4. परिणाम या जानकारी देना (Output या Retrieval)
अतः, कंप्यूटर की आधुनिक परिभाषा निम्न है-
कंप्यूटर वह युक्ति है जो स्वचालित रूप से विविध प्रकार के आँकड़ों को संचित (Store), संसाधित (Process) व पुनः प्राप्त (Retrieve) कर सके।

कम्प्यूटर का पूरा नाम क्या है? Computer Full Form in Hindi

कंप्यूटर का पूरा नाम (Computer Full Form)

C

Commonly

समरूपता

O

Operator

चालक

M

Machine

यंत्र

P

Particular

मुख्य

U

User

प्रयोग

T

Trade

व्यवसाय

E

Education

शिक्षा

R

Research

अनुसंधान


'कंप्यूटर' शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के 'Computare' शब्द से हुई है। परन्तु कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि 'कम्प्यूटर' शब्द की उत्पत्ति 'Compute' शब्द से हुई है। सामान्यतः दोनों का ही अर्थ 'गणना करना है। 'कम्प्यूटर' शब्द अंग्रेजी के 8 अक्षरों से मिलकर बना है, जो इसके अर्थ को और भी अधिक व्यापक बना देते हैं।
अतः 'कम्प्यूटर' का तात्पर्य एक ऐसे यन्त्र से हैं, जिसका उपयोग गणना, प्रक्रिया, यान्त्रिकी, अनुसन्धान, शोध आदि कार्यों में किया जाता है।

मानव और कंप्यूटर

प्रश्न उठता है कि क्या कंप्यूटर मानव से अधिक बुद्धिमान है ? इसका साफ उत्तर है, नहीं, क्योंकि कंप्यूटर में कोई बुद्धि नहीं होती और न ही वह स्वयं किसी तरह का निर्णय ले सकता है । यह क्षमता उसे मानव ही Computer Programming Language द्वारा देता है। कंप्यूटर बिना गलती के लगातार अत्यंत तेजी से काम कर सकता है, और दी गई जानकारी को न केवल सुरक्षित रख सकता है बल्कि जब चाहे उसे उपलब्ध करा सकता है। मानव की स्मृति (याद) में चीजें हमेशा साफ व व्यवस्थित नहीं रहतीं क्योंकि मानव की स्मृति पर उम्र, वातावरण तथा दैनिक जीवन के अनुभवों का असर पड़ता है। इसी कारण मानव सर्वाधिक तेज कंप्यूटर (सुपर कंप्यूटर) से सौगुना अधिक ज्ञान कोशिकाएँ होने के बाद भी अपनी जानकारी का उपयोग उतनी क्षमता से नहीं कर पाता।
मानव के मस्तिष्क होता है जिसके द्वारा वह स्वतंत्र-रूप से सोच सकता है, गणना कर सकता है, और आँख-कान जैसी ज्ञानेन्द्रियों द्वारा जानकारी प्राप्त करके तर्क-संगत निर्णय भी ले सकता है। वह अपने विचारों को बोल कर या लिख कर प्रकट कर सकता है। कंप्यूटर भी कुछ इसी प्रकार से कार्य करते हैं। उन्हें जानकारी कुंजीपटल या अन्य इनपुट युक्तियों से प्राप्त होती है। वह पहले से प्राप्त डिस्कों पर संचित जानकारियों का भी प्रयोग कर सकता है। किसी कार्य विशेष को करने के लिये क्रमबद्ध आदेश (प्रोग्राम) उसे कुंजीपटल पर टाइप करके भी दिया जा सकता है, और वह उसे रिकार्ड की हुई डिस्क में से भी ले सकता है। कंप्यूटर के अन्दर लगी सीपीयू उसके मस्तिष्क की तरह से कार्य करती है। वह सारी उपलब्ध जानकारी (डेटा और प्रोग्राम) के अनुसार संगणना कर देता है और परिणाम मॉनीटर के पटल पर दिखा देता है, या स्थाई रूप से संचित रखने के लिये प्रिन्टर द्वारा कागज पर छाप देता है।

मानव व कंप्यूटर में अंतर

कार्य

मानव

कंप्यूटर

गति

अत्यन्त तीव्र

धीमी

कल्पना + विचार

प्रबल

शून्य

निर्देश-पालन

निश्चित नहीं

99%

क्षमता

असीमित

सीमित

स्मरण शक्ति

सामान्य

उच्च

शुद्धता

त्रुटियाँ

त्रुटि रहित


कंप्यूटर के प्रकार

कार्य पद्धति के आधार पर वर्गीकरण (Classification on Working Technology)
तकनीक के आधार पर कम्प्यूटर को तीन प्रकार में बांटा जाता है-

(i) एनालॉग कम्प्यूटर (Analog Computer)
Analog-Computer
समय के साथ लगातार परिवर्तित होने वाली भौतिक राशियों को एनालॉग राशि कहते हैं। जैसे- तापक्रम, दबाव, विद्युत वोल्टेज आदि। एनालॉग कम्प्यूटर में डाटा का निरूपण लगातार परिवर्तित होने वाली राशि के रूप में होता है। एनालॉग कम्प्यूटर की गति अत्यंत धीमी होती है। इस प्रकार के कम्प्यूटर अब प्रचलन से बाहर हो गये हैं।
एक साधारण घड़ी, वाहन का गति मीटर (Speedo meter), वोल्टमीटर आदि एनालॉग कम्प्यूटिंग के उदाहरण हैं।

(ii) डिजिटल कम्प्यूटर (Digital Computer)
Digital Computer
ये इलेक्ट्रानिक संकेतों पर चलते हैं तथा गणना के लिए द्विआधारी अंक पद्धति (Binary System- 0 या 1) का प्रयोग किया जाता है। डिजिटल कम्प्यूटर में डाटा का निरूपण बाइनरी रूप (0 या 1) में किया जाता है। इनकी गति तीव्र होती है। वर्तमान में प्रचलित अधिकांश कम्प्यूटर इसी प्रकार के हैं। इसमें आंकड़ों को इलेक्ट्रॉनिक पल्स के रूप में निरूपित किया जाता है।

(iii) हाइब्रिड कम्प्यूटर (Hybrid Computer)
Hybrid Computer
यह डिजिटल व एनालॉग कम्प्यूटर का मिश्रित रूप है। इसमें गणना तथा प्रोसेसिंग के लिए डिजिटल रूप का प्रयोग किया जाता है, जबकि इनपुट तथा आउटपुट में एनालॉग संकेतों का उपयोग होता है। इस तरह के कम्प्यूटर का प्रयोग अस्पताल, रक्षा क्षेत्र व विज्ञान आदि में किया जाता है।

आकार और कार्य के आधार पर वर्गीकरण (Classification Based on Size & Work)
आकार और कार्य के आधार पर कम्प्यूटर को मेनफ्रेम; मिनी; माइक्रो कम्प्यूटर तथा सुपर कम्प्यूटर में बांटा जाता है। पर्सनल कम्प्यूटर, नोटबुक, नेटबुक, टैबलेट, लैपटॉप, वर्कस्टेशन तथा पामटॉप आदि माइक्रो कम्प्यूटर के ही विभिन्न रूप हैं।

मेन फ्रेम कम्प्यूटर (Main Frame Computer)
Main Frame Computer
सुपर कंप्यूटर के अतिरिक्त बड़े आकार के सभी कंप्यूटरों को मेनफ्रेम कंप्यूटर कहते हैं। मेनफ्रेम कंप्यूटर की प्रोसेसिंग शक्ति मिनी कंप्यूटरों से बहुत ज्यादा होती है और यह वैज्ञानिक कार्यों में यह बहुत बड़ी व्यापारिक कंपनियों द्वारा डेटा प्रोसेसिंग के संदर्भ में प्रयोग किए जाते हैं। इस कंप्यूटर पर एक साथ बहुत से व्यक्ति अलग-अलग कार्य कर सकते हैं।
मेनफ्रेम कंप्यूटर में निम्न विशेषताएँ हैं-
  • इनकी मेमोरी 10 से लेकर 128 मेगाबाइट होती है। तृतीय जनरेशन के आइ. बी. एम.-370 की मुख्य मेमोरी 10 मेगाबाइट थी।
  • इनकी डेटा स्थानांतरण दर (Data Transfer Rate) 10 लाख बाइट प्रति सेकंड है।
  • इनकी क्षमता 5 से लेकर 100 MIPS (Million Instructions Per Second) होती है यानि ये 50 लाख से 10 करोड़ अनुदेश प्रति सेकंड execute कर सकते हैं।
  • इनकी word length 32 से 64 बिट होती है।
  • इनकी कीमत 1 करोड़ से 10 करोड़ रुपयों तक हो सकती है।
  • इन कंप्यूटरों पर सभी प्रकार की हाई-लेवल भाषाओं का प्रयोग किया जा सकता है।

मिनी कम्प्यूटर (Mini Computer)
Mini Computer
मिनी कंप्यूटरों का नंबर माइक्रो कंप्यूटर के पश्चात् आता है। यह कंप्यूटर मेनफ्रेम कंप्यूटरों से छोटे और पर्सनल कंप्यूटरों से बड़े हैं। इन कंप्यूटरों का प्रयोग बड़ी-बड़ी कंपनियाँ करती हैं और इन्हें विश्वसनीय माना जाता है। कीमत में यह माइक्रो कंप्यूटर से बहुत महँगे हैं। इसलिए इनका व्यक्तिगत रूप से इस्तेमाल संभव नहीं है।

रोचक तथ्य
कम्प्यूटर निर्माण उद्योग में अग्रणी होने के कारण भारत का बंग्लुरू शहर सिलिकॉन वैली (Silicon Valley) के नाम से प्रसिद्ध है।

इम्बेडेड कम्प्यूटर (Embedded Computer)
Embedded Computer
किसी उपकरण जैसे टेलीविजन, वाशिंग मशीन, माइक्रोवेव, कार आदि से जुड़ा छोटा कम्प्यूटर जिसे किसी विशेष कार्य के लिए तैयार किया जाता है, इम्बेडेड कम्प्यूटर कहलाता है। इम्बेडेड कम्प्यूटर एक माइक्रो प्रोसेसर या इंटिग्रेटेड चिप के रूप में होता है जो उस उपकरण के कार्य को सरल बनाता है।

माइक्रो कम्प्यूटर (Micro Computer)
इस कंप्यूटर का विकास सन् 1970 में हो गया था। माइक्रो प्रोसेसर लगे होने के कारण इन्हें माइक्रो कंप्यूटर कहा गया। इस तकनीक वाले कंप्यूटर आकार में छोटे, कीमत में सस्ते और क्षमता में पहले से बेहतर हैं। अभी तक हम जो भी पर्सनल कंप्यूटर प्रयोग करते हैं वह माइक्रो कंप्यूटर के ही श्रेणी में आते हैं। माइक्रो कंप्यूटर में सबसे पहला सफल कंप्यूटर पीसी एक्सटी था। जिसमें 8088 माइक्रो प्रोसेसर का प्रयोग किया गया था। इसमें 64 किलोबाइट रैम अर्थात् प्राइमरी मेमोरी और 10 मेगाबाइट वाली हार्डडिस्क को प्रयोग किया जा सकता था। बाद में इसकी मेमोरी प्रयोग करने की क्षमता एक मेगाबाइट हो गई। इस कंप्यूटर में फ्लॉपी डिस्क का भी प्रयोग किया गया। जिसकी स्टोरिंग क्षमता 180-360 किलोबाइट तक थी।

माइक्रो कंप्यूटर की सुविधाएँ:-
  • इनमें 640 किलोबाइट से लेकर 8 मेगाबाइट तक की संचय क्षमता होती है।
  • मुख्य आंतरिक मेमोरी के दो भाग होते हैं-रॉम एवं रैम ROM कंप्यूटर की परमानेंट मेमोरी और RAM टैम्प्रेरी मेमोरी होती है।
  • सपोर्ट मेमोरी-होम कंप्यूटरों में मैग्नेटिक टेप (रैम कार्टरिट्ज) या ऑडियो कैसेट में तथा पर्सनल कंप्यूटरों में डिस्क ड्राइव की सहायता से फ्लॉपी डिस्क में जानकारी संचित की जा सकती है।
  • कंप्यूटर में एक हार्ड डिस्क भी होती है, जो कि मुख्य बाह्य स्मृति (मेमोरी) का काम करती है।
  • कम स्पीड वाला लेजर प्रिंटर, डाट मैट्रिक्स या इंक जेट प्रिंटर।
  • विजुअल डिस्प्ले यूनिट या स्क्रीन। होम कंप्यूटरों में टी. वी. के स्क्रीन से यह काम लिया जाता है।
  • एक 84 या 101 कुंजियों (Keys) वाला की-बोर्ड।
  • कंप्यूटर का सबसे महत्वपूर्ण काम चिप की सहायता से किया जाता है। आजकल एक ही चिप में पूरा माइक्रोप्रोसेसर आ जाता है, जिसमें 45000 से अधिक ट्रांजिस्टर होते हैं।

पीसी-एटी - पीसी एक्सटी के पश्चात् पीसी-एटी का चलन का प्रारंभ हुआ और 1985 में यह कंप्यूटर बाजार में आए। यह पहले से ज्यादा शक्तिशाली थे और इसमें 16 बिट का सिद्धांत प्रयोग किया गया था। जबकि एक्सटी कंप्यूटरों में आठ बिट का सिद्धांत इस्तेमाल हुआ था।
पीसी-एटी की श्रृंखला में निम्न कंप्यूटर आज तक बाजार में आ चुके हैं-
  • पीसी-एटी 286
  • पीसी-एटी 386
  • पीसी-एटी 386-DX
  • पीसी-एटी 486
  • पीसी-एटी 486-DX
  • पेंटियम-4
आज हम पेंटियम सीरीज के चौथे संस्करण को प्रयोग कर रहे हैं। इसकी कार्य क्षमता मेगाहर्ज से बढ़कर गेगाहों में पहुँच गई है।

पर्सनल कम्प्यूटर (Personal Computer-PC)
इसे डेस्कटॉप कम्प्यूटर (Desktop Computer) भी कहा जाता है। आजकल प्रयुक्त होने वाले पीसी (PC - Personal Computer) वास्तव में माइक्रो कम्प्यूटर ही हैं। इसमें की-बोर्ड, मानीटर तथा सिस्टम यूनिट होते हैं। सिस्टम यूनिट में सीपीयू (CPU-Central Processing Unit), मेमोरी तथा अन्य हार्डवेयर होते हैं। यह छोटे आकार का सामान्य कार्यों के लिए बनाया गया कम्प्यूटर है। इस पर एक बार में एक ही व्यक्ति (Single User) कार्य कर सकता है। इसी कारण, इसे पर्सनल कम्प्यूटर कहा जाता है।
इसका आपरेटिंग सिस्टम एक साथ कई कार्य करने की क्षमता वाला (Multitasking) होता है। पीसी को टेलीफोन और मॉडेम (Modem) की सहायता से आपस में या इंटरनेट से जोड़ा जा सकता है।
कुछ प्रमुख पीसी निर्माता कम्पनी हैं—
  • आईबीएम (IBM)
  • लेनोवो (Lenovo)
  • एप्पल (Apple)
  • काम्पैक (Compaq)
  • जेनिथ (Zenith)
  • एचसीएल (HCL)
  • एचपी (HP-Hewlett Packard)।
उपयोग : पीसी का विस्तृत उपयोग घर, ऑफिस, व्यापार, शिक्षा, मनोरंजन, डाटा संग्रहण, प्रकाशन आदि अनेक क्षेत्रों में किया जा रहा है।
पीसी का विकास 1981 में हुआ जिसमें माइक्रो प्रोसेसर-8088 का प्रयोग किया गया। इसमें हार्ड डिस्क ड्राइव लगाकर उसकी क्षमता बढ़ायी गयी तथा इसे पीसी-एक्स टी (PC-XT - Personal Computer-Extended Technology) नाम दिया गया। 1984 में नये माइक्रो प्रोसेसर-80286 से बने पीसी को पीसी-एटी (PC-AT - Personal Computer-Advanced Technology) नाम दिया गया। वर्तमान पीढ़ी के सभी पर्सनल कम्प्यूटर को पीसी-एटी ही कहा जाता है।

वर्क स्टेशन (Work Station)
यह एक शक्तिशाली पी. सी. है जो अधिक प्रोसेसिंग क्षमता, विशाल भंडारण और बेहतर डिस्प्ले (Display) को ध्यान में रखकर बनाया जाता है। इस पर एक बार में एक ही व्यक्ति कार्य कर सकता है।
उपयोग : वैज्ञानिक, इंजिनियरिंग, भवन निर्माण आदि क्षेत्रों में वास्तविक परिस्थितियों को उत्पन्न कर (Simulation) उनका अध्ययन करने के लिए।

नोटबुक कम्प्यूटर या लैपटॉप (Notebook Computer or Laptop)
यह नोटबुक के आकार का ऐसा कम्प्यूटर है जिसे ब्रीफकेस में रखकर कहीं भी ले जाया जा सकता है। इसमें पर्सनल कम्प्यूटर की सभी विशेषताएं मौजूद रहती हैं। चूंकि इसका उपयोग गोद (Lap) पर रखकर किया जाता है, अतः इसे लैपटॉप कम्प्यूटर (Laptop Computer) भी कहते हैं।
लैपटॉप का विकास एडम आसबर्न (Adam Osborne) द्वारा 1981 में किया गया था। इसमें एक मडने योग्य एलसीडी (LCD मॉनीटर, की-बोर्ड, टच पैड (Touch Pad), हार्डडिस्क, फ्लापी डिस्क ड्राइव, सीडी/डीवीडी ड्राइव और अन्य पोर्ट (Port) रहते हैं। विद्युत के बगैर कार्य कर सकने के लिए इसमें चार्ज की जाने वाली बैटरी (Chargeable Battery) का प्रयोग किया जाता है। सामान्यतः, लैपटॉप में लीथियम आयन बैटरी (Lithium Ion Battery) का प्रयोग किया जाता है। वाई-फाई (WiFi) और ब्लट्थ (Bluetooth) की सहायता से इसे इंटरनेट द्वारा भी जोड़ा जा सकता है।

नेटबुक (Netbook)
यह नोटबुक या लैपटॉप कम्प्यूटर का लघु संस्करण है जिसे गतिमान अवस्था में वायरलेस नेटवर्क द्वारा इंटरनेट का उपयोग करने के लिए विशेष रूप से डिजाइन किया जाता है। नेटबुक का आकार व वजन लैपटॉप कम्प्यूटर से छोटा होता है तथा प्रोसेसिंग और स्टोरेज क्षमता भी कम होती है।
Netbook शब्द की उत्पत्ति internet तथा notebook शब्द के मिलने से हुआ है। नेटबुक द्वारा इंटरनेट से जुड़ने, वर्ल्ड वाइड वेब (www) पर सर्किंग करने, ई-मेल भेजने तथा प्राप्त करने, सोशल मीडिया का प्रयोग करने, वीडियो तथा आडियो फाइल अपलोड या डाउनलोड करने आदि का काम आसानी से किया जा सकता है।

टैबलेट कम्प्यूटर (Tablet Computer)
टैबलेट एक छोटा कम्प्यूटर है जिसमें की-बोर्ड या माउस का प्रयोग नहीं होता। इसमें इनपुट के लिए स्टाइलस (Stylus), पेन या टच स्क्रीन (Touch Screen) तकनीक का प्रयोग होता है। टैबलेट में डाटा डालने के लिए Virtual या On Screen key board का प्रयोग किया जाता है। इसे वायरलेस नेटवर्क द्वारा इंटरनेट से भी जोड़ा जा सकता है। इसका प्रयोग स्मार्टफोन की तरह भी किया जा सकता है।
चूंकि टैबलेट कम्प्यूटर का प्रयोग हाथ में रखकर किया जाता है, अतः इसे Hand held computer भी कहा जाता है। Apple कंपनी का आईपैड (i Pad) टैबलेट कम्प्यूटर का एक उदाहरण है।

पॉमटाप (Palmtop)
यह बहत ही छोटा कम्प्यूटर है जिसे हाथ में रखकर कार्य किया जा सकता है। इसे मिनी लैपटॉप भी कहा जा सकता है। की-बोर्ड की जगह इसमें आवाज द्वारा इनुपट का कार्य लिया जाता है। पीडीए (PDA-Personal Digital Assistant) भी एक छोटा कम्प्यूटर है जिसे नेटवर्क से जोड़कर अनेक कार्य किये जा सकते हैं। इसे फोन की तरह भी व्यवहार किया जा सकता है।

स्मार्टफोन (Smartphone)
स्मार्टफोन एक मोबाइल फोन है जिसमें कम्प्यूटर की लगभग सभी विशेषताएं मौजूद रहती हैं। इसमें डाटा इनपुट के लिए टच स्क्रीन तकनीक का प्रयोग किया जाता है। टैबलेट या पीडीए एक कम्प्यूटर है जिसका प्रयोग वैकल्पिक फोन की तरह भी किया जा सकता है। दूसरी तरफ, स्मार्टफोन मुख्यतः एक फोन है जिसका प्रयोग कम्प्यूटर प्रोसेसिंग के कुछ कार्यों तथा इंटरनेट का प्रयोग करने के लिए किया जा सकता है। स्मार्टफोन का उपयोग एक हाथ से किया जा सकता है जबकि टैबलेट या पीडीए को दोनों हाथों से चलाना पड़ता है। स्मार्टफोन, टैबलेट तथा पीडीए हैंड हेल्ड डिवाइस (Hand Held Devices) कहलाता है।

लैपटॉप, नोटबुक, नेटबुक, टैबलेट तथा पीडीए में अंतर (Difference between Laptop, Notebook, Netbook, Tablet and PDA)
कम्प्यूटर तकनीक में हो रहे विकास और उपकरणों के आकार में आयी कमी ने इन उपकरणों के बीच के अंतर को कम किया है। इन उपकरणों के बीच एक रेखा खींच पाना अत्यंत कठिन हो गया है।
लैपटॉप डेस्कटॉप कम्प्यूटर का मोबाइल संस्करण है। इसमें की-बोर्ड, माउस तथा स्पीकर उपकरण के साथ ही बना होता है। इसमें डेस्कटॉप कम्प्यूटर की सभी विशेषताएं रहती हैं, हालांकि प्रोसेसिंग तथा स्टोरेज क्षमता अपेक्षाकृत कम होती है।
नोटबुक लैपटॉप कम्प्यूटर का लघु संस्करण है। इसका वजन अपेक्षाकृत कम होता है तथा इसे साथ में लेकर घूमना आसान होता है। इसके मानीटर स्क्रीन का आकार 12 से 15 इंच तक हो सकता है।
नेटबुक कम्प्यूटर को मुख्यतः गतिमान अवस्था में इंटरनेट तथा उससे जुड़ी सुविधाओं का इस्तेमाल करने के लिए डिजाइन किया जाता है। इसमें प्रोसेसिंग तथा स्टोरेज क्षमता की अपेक्षा नेटवर्क स्पीड पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। इसके मानीटर स्क्रीन का आकार 10 से 14 इंच तक हो सकता है। नेटबुक में सामान्यतः आप्टिकल डिस्क ड्राइव नहीं होता है।
टैबलेट कम्प्यूटर में की-बोर्ड तथा माउस का प्रयोग नहीं होता। डाटा तथा निर्देश डालने के लिए स्टाइलस या टच स्क्रीन तथा वर्चुअल की-बोर्ड का प्रयोग किया जाता है। लैपटॉप, नोटबुक तथा नेटबुक का प्रयोग गोद में रखकर किया जाता है जबकि टैबलेट कम्प्यूटर तथा स्मार्टफोन का प्रयोग हाथ में पकड़कर किया जाता है।

सुपर कम्प्यूटर (Super Computer)
आधुनिक परिभाषा के अनुसार, वे कंप्यूटर जिनकी मेमोरी 512 गाइगाबाइट से अधिक हो एवं जो 500 एम. फ्लाप की क्षमता से कार्य कर सकते हों, सुपर कंप्यूटर कहलाते हैं। सुपर कंप्यूटर अभी तक बनाए गए कंप्यूटरों से सबसे ज्यादा शक्तिशाली हैं और इसका प्रयोग हमारे देश में मौसम विज्ञान और अंतरिक्ष विज्ञान में होता है। हमारे देश में सुपर कंप्यूटर बनाने वाली संस्था का नाम सीडॅक है। इस संस्था ने परम-10000 के नाम से दुनिया का सबसे शक्तिशाली सुपर कंप्यूटर बनाया है। सुपर कंप्यूटर की डेटा प्रोसेसिंग की क्षमता इतनी तेज होती है कि यह एक सेकेण्ड में खरबों गणनाएँ कर लेता है। आज हमारा देश भी सुपर कंप्यूटर बनाने वाले देशों की श्रेणी में आता है।
विश्व के प्रथम सुपर कम्प्यूटर के निर्माण का श्रेय अमेरिका के क्रे रिसर्च कम्पनी (Cray Research Company) को जाता जिसकी स्थापना Seymour Cray ने की थी। सुपर कम्प्यूटर के क्षेत्र में सर्वाधिक योगदान के लिए Seymour Cray को सुपर कम्प्यूटर का जन्मदाता (Father of Super Computer) कहा जाता है।

भारत में सुपर कम्प्यूटर (Super Computer in India)
भारत में 'परम' सीरीज के सुपर कम्प्यूटर का निर्माण सी-डैक (C-DAC-Centre for Development of Advanced Computing), पुणे द्वारा किया गया है। ‘परम-8000' सी-डैक द्वारा विकसित पहला सुपर कम्प्यूटर था जिसका निर्माण 1991 में किया गया था। इसके निर्माण का श्रेय सी-डैक के निदेशक डॉ. विजय भास्कर को जाता है। ‘परम पद्म' सुपर कम्प्यूटर का निर्माण 2003 में किया गया जिसकी गणना क्षमता 1 टेरा फ्लाप्स (1 Tera = 1012) यानि 1 खरब गणना प्रति सेकेण्ड थी। ‘परम युवा-II' सुपर कम्प्यूटर का निर्माण 2013 में किया गया जो सी-डैक द्वारा विकसित सबसे तेज सुपर कम्प्यूटर है। इसकी गणना क्षमता 500 टेरा फ्लाप्स (T Flops) है। इस तरह के सुपर कम्प्यूटर विश्व के कुल पांच देशों-अमेरिका, जापान, चीन, इजराइल और भारत के पास ही उपलब्ध है।
'अनुपम' सीरीज के सुपर कम्प्यूटर का विकास बार्क (BARC-Bhabha Atomic Research Centre) मुम्बई द्वारा किया गया है। पेस (PACE-Processor forAerodynamic Computation and Evaluation) सीरीज के सुपर कम्प्यूटर का निर्माण अनुराग (ANURAG-Advanced Numerical Research and Analysis Group) हैदराबाद द्वारा डीआरडीओ (DRDO-Defence Research and Development Organization) के लिए किया गया।
भारत के प्रथम सुपर कम्प्यूटर 'फ्लोसाल्वर' (Flosalver) का विकास नाल (NAL-National Aeronautical Lab), बंगलुरू द्वारा 1980 में किया गया था।

रोचक तथ्य
आईबीएम (IBM) के डीप ब्लू (Deep Blue) कम्प्यूटर ने शतरंज के विश्व चैंपियन गैरी कास्परोव को पराजित किया था। यह 1 सेकेण्ड में शतरंज की 20 करोड़ चालें सोच सकता है।

कंप्यूटर की विशेषताएँ Characteristics of Computer

  • यह तीव्र गति से कार्य करता है अर्थात समय की बचत होती है। अर्थात् समय की बचत होती है।
  • यह त्रुटिरहित कार्य करता है।
  • यह स्थायी तथा विशाल भंडारण क्षमता की सुविधा देता है।
  • यह पूर्व निर्धारित निर्देशों (Pre defined instructions) के अनुसार तीव्र निर्णय लेने में सक्षम है।

कंप्यूटर के कार्य

कंप्यूटर एक मानव निर्मित मशीन है, जो अपने आप काम नहीं करता है। इससे काम लिया जाता है । यह हमारे आदेश का अक्षरशः पालन करता है। आदेश का जरिया की-बोर्ड' होता है। वैसे आजकल आवाज सुनकर अथवा स्क्रीन पर हाथ/ऊँगलियों को फेर कर भी इससे काम कराया जा सकता है । परन्तु प्रचलन में की-बोर्ड ही है । यह एक टाइपराइटर की तरह होता है। आप किसी भी प्रकार के आदेश को इसके माध्यम से कंप्यूटर को देते हैं । इसके बाद कंप्यूटर में एक हलचल होती है । आप क्या चाहते हैं इसकी जानकारी स्क्रीन पर उभर आती है। किसी भी प्रकार की कमी होने पर मॉनीटर में एरर मैसेज अंकित हो जाता है । मॉनीटर (टीवी स्क्रीन की तरह), सीपीयू (टावर अथवा फ्लैट आकार में) और की-बोर्ड मिलकर एक टर्मिनल बनता है।
हालांकि साथ में एक माउस भी होता है और वह भी आपके आदेश को कंप्यूटर तक पहुँचाने का ही काम करता है। लेकिन उसकी क्षमता की-बोर्ड से कम होती है।
एक कंप्यूटर को कार्य करने के लिये दो चीजों की आवश्यकता होती है : एक तो वह सूचना, अर्थात् डेटा जिस पर संगणना करनी है, और दूसरी वस्तु वे सूचीबद्ध आदेश हैं जिनके अनुरूप संगणना की जानी होती है। प्रोग्राम की आवश्यकता इसलिये पड़ती है क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक प्रोसेसर तो एक निर्जीव वस्तु है जिसकी अपनी कोई बुद्धि नहीं होती।
प्रोग्राम व डेटा, दोनों को ही कंप्यूटर के कुंजीपटल पर टाइप करके भरा जा सकता है, या फिर रिकार्ड किये हुए टेप या डिस्क में से लिया जा सकता है। इलेक्ट्रॉनिक प्रोसेसर दिये हुए प्रोग्राम के आदेशों को क्रम से पढ़ता जाता है और डेटा पर उन्हीं आदेशों के अनुसार संगणना करता चला जाता है। परिणामों को मॉनीटर के पटल पर प्रदर्शित कर दिया जाता है, या प्रिन्टर द्वारा कागज पर छाप दिया जाता है। हाँ, इस प्रक्रिया को करने के लिये एक अस्थाई स्मृति (रैम) परम आवश्यक है।

कंप्यूटर के प्रमुख भाग

वर्तमान समय में प्रयोग किए जा रहे माइक्रो कंप्यूटर के मुख्य भागों और सहायक उपकरणों की जानकारी प्राप्त करेंगे। इसके अलावा यह भी पढ़ेंगे कि कौन-सा सहायक उपकरण क्या कार्य करता है।

CPU (सीपीयू)
कंप्यूटर का दिल और दिमाग 'सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट' होता है और उसी का संक्षिप्त नाम 'सीपीयू' है। कंप्यूटर के इस अंग के पास सूचनाओं का अंबार होता है। पर जब हम कोई कमांड देते हैं तो कंप्यूटर का यही उपकरण उसे खोजकर हमारे सामने लाता है। इस प्रकार इनपुट को अउटपुट में बदलने का काम यही करता है। खास बात यह है, कि ये सभी इतना जल्दी होता है कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। मात्र सेकेण्ड के लाखवें भाग में सीपीयू निवेश इकाई से विद्युत स्पंदों अथवा 'बिटों- के (8 बिट = 1 बाईट अर्थात् 1 अक्षर) रूप में डाटा हासिल करता है। वहाँ से मेमोरी अंकगणितीय तर्क इकाई में पहुँचाकर उसका विश्लेषण करता है और इसका परिणाम आउटपुट है, जिसे आप मॉनिटर पर अथवा प्रिंट के रूप में देखते हैं।

माइक्रोप्रोसेसर
सीपीयू एक जटिल इलेक्ट्रॉनिक सर्किट होता है। यह सिलिकॉन की एक छोटी पट्टी पर बना होता है, जिसे बाहर से कनेक्शन लगाने के लिए पिनें लगी होती हैं यही माइक्रोप्रोसेसर कहलाता है। इसी माइक्रोप्रोसेसर चिप को ध्यान में रखकर कंप्यूटर बनाया जाता है। कंप्यूटर की क्षमता का आधार ही माइक्रोप्रोसेसर हो गया है। कंप्यूटर की गति में निरन्तर विकास होता रहा है और अब काफी शक्तिशाली माइक्रोप्रोसेसर चिपें मिलने लगी हैं। प्रत्येक कंप्यूटर में एक क्लॉक सर्किट होता है जो घड़ी की तरह नियमित विद्युत् संकेत देता रहता है। यह क्लॉक जिस तेजी से संकेत देती है, कंप्यूटर भी अपनी संगणनाएँ या अन्य कार्य उतनी तेजी से करता है। इसकी रफ्तार को मेगाहर्ज यानि कि एक सेकेण्ड के दस लाखवें हिस्से के रूप में आंका जाता है। माइक्रोप्रोसेसर की क्षमता को बिट्स में आंका जाता है। पहले 8 बिट वाले कंप्यूटर होते थे जबकि अब 16 से 32 बिट वाले प्रोसेसर होते हैं। अधिक बिट वाले प्रोसेसर का मतलब है अधिक क्षमता और तेज रफ्तार, बड़े कंप्यूटरों में सहायक प्रोसेसर चिप भी लगे होते हैं।

सिस्टम यूनिट
यह एक पावर हाउस होता है । यह किसी भी पीसी की सभी क्रियाओं को नियंत्रित करता है । यह एक बक्से की तरह होता है। यह दो रूपों में आता है-डेस्कटॉप और टॉवर टाइप। कंप्यूटर के सभी इलेक्ट्रॉनिक सर्किट इसी बक्से में बन्द होती हैं। इसी सर्किट बोर्ड में माइक्रोप्रोसेसर और अन्य आईसी (इंटीग्रेटेड सॉकेट) लगे होते हैं, जो स्लॉट्स कहलाते हैं। इसमें अनेक प्रकार के इंटरफेस कार्ड लगाये जाते हैं। एक कार्ड की-बोर्ड के लिए, दूसरा मॉनिटर के लिए और तीसरा प्रिट के लिए लगाया जा सकते हैं। अन्य स्लॉट्स में आवश्यकतानुसार कार्ड लगाकर कंप्यूटर को बहुउद्देशीय बनाया जाता है। जैसे-फैक्स, मॉडम, कार्ड, इंटरनेट, ध्वनि, फिल्म आदि।

कंप्यूटर की मेमोरी

कंप्यूटर की मेमोरी दो प्रकार की होती है।
  1. स्थायी
  2. अस्थायी

स्थायी मेमोरी में सूचना हमेशा के लिए संग्रहित रहती हैं, जबकि अस्थायी नाम से ही स्पष्ट है कि इसका प्रयोग गणना करते समय किया जाता है। आप अपनी आवश्यकता के अनुसार उसका उपयोग करते हैं। स्थायी मेमोरी का संबन्ध रोम (रीड ऑनली मेमोरी) तथा अस्थायी मेमोरी का सम्बन्ध रैम (रैंडम ऐक्सेस मेमोरी) से है ।
रैम में लिखा गया डाटा परिमार्जन और परिवर्धन की दृष्टि से सरल होता है। आप इसे घटा और बढ़ा सकते हैं। लेकिन इसका अस्तित्व अस्थायी होता है। जबकि रोम एक स्थायी स्मृति है। असल में रोम का निर्माण करते समय उसमें कुछ ऐसे प्रोग्राम भर देते हैं। जिनकी आवश्यकता कंप्यूटर को हमेशा होती है। हाँ, एक बात थोड़ी परेशानी वाली है- इसमें हम अपनी इच्छानुसार परिवर्तन नहीं कर सकते हैं। स्मृति की शक्ति और क्षमता किलोबाइट में आंकी जाती है। जैसे पहले 640 किलोबाइट की रैम होती थी। मगर इन दिनों 64 मेगाबाइट से 320 मेगाबाइट की मेमोरी होती है । साथ ही अलग से चिप्स लगाकर मेमोरी और बढ़ाई जा सकती है।

फ्लापी डिस्क
कंप्यूटर के क्षेत्र में आईबीएम ने फ्लापी लगाकर तहलका मचा दिया। उसने लगभग 20 वर्ष पूर्व 8 इंच व्यास वाली एक पतली प्लास्टिक की डिस्क बनाई। बाद में छोटी डिस्क बनी। आज सवा तीन इंच व्यास वाली डिस्क प्रचलित है। इस पर लगभग डेढ़ मेगाबाइट तक की सूचनायें अंकित अथवा संग्रहित होती हैं। इन सूचनाओं को पढ़ने के लिए एक विशेष प्रकार की मशीन में घुमाया जाता है। इस मशीन को डिस्क ड्राइव कहते हैं। इस पर अंकित सूचनाओं को पढ़ने के लिए डिस्क के कवर पर एक आयताकार खुली पट्टी होती है, जिसे ड्राइव का हेड पढ़ता है।

सीडी रोम
यह फ्लापी की तरह डाटा स्टोरेज का माध्यम है। साथ ही इसमें डाटा बैकअप की भी सुविधा है । एक सीडी में आसानी से 640 मेगाबाइट तक डाटा लिखा अथवा संग्रहित किया जा सकता है। साथ ही इसमें संगीत और फिल्म को भी रिकार्ड किया जा सकता है। पहले सीडी पर एक ही बार लिखा जा सकता था मगर अब तो सीडी उपलब्ध है, उस पर बार-बार लिखा जा सकता है। हार्ड डिस्क ड्राइव-हार्ड डिस्क ड्राइव सूचनाओं को स्थायी रूप से संग्रहित करता है। इसके पढ़ने-लिखने की गति काफी तेज होती है, जबकि फ्लापी की क्षमता कम होती है। यह एक स्थायी उपकरण है। इसे आप बाहर नहीं निकाल सकते हैं। इससे आप सूचनाओं को फ्लापी में स्थानांतरित कर सकते हैं। इन पर दोनों ओर चुम्बकीय पदार्थ की पतली सी परत लगी होती है। इसमें एक साथ पढ़ने-लिखने के लिए दोनों ओर हेड लगे होते हैं।

मेन मेमोरी (Main Memory)
यह कंप्यूटर की भीतरी मेमोरी है, जिसका वह उपयोग करता है । इसे प्राइमरी आंतरिक या मेन मेमोरी भी कहते हैं। इस भाग में सूचनाएँ या जानकारी स्टोर रहती हैं, जिन्हें जरूरत पड़ने पर बाहर निकाला जा सकता है। जानकारी बाहर निकालने में कुछ नैनो सेकंड ही लगते हैं। कंप्यूटर पर गणना या प्रोसेसिंग के लिए जो प्रोग्राम बनाया जाता है, वह की-बोर्ड पर टाइप होने के बाद सीधा मेन मेमोरी में आ जाता है।

मेन मेमोरी दो प्रकार की होती है :
  1. फेराइट कोर मेमोरी
  2. अर्द्धचालक (Semiconductor) मेमोरी
ट्रांजिस्टरों के चलन से पहले फेराइट कोर मेमोरी का चलन था। उसके बाद सेमी कंडक्टर मेमोरी का प्रयोग होने लगा। इनके अलावा संग्रहीत करने से कुछ अन्य तरीके हैं, मर्करी डिले लाइन, चार्ल्ड कपल डिवाइसेज और बबल मेमोरी। कंप्यूटरों की क्षमता बढ़ाने के लिए ऐसी मेमोरी का प्रयोग किया जाता है जिसके द्वारा बहुत तेजी से सूचनाएँ भेजी जा सकें। इस मेमोरी का मूल्य बहुत होता है इसीलिए यह सीमित मात्रा में बनाई जाती है। जरूरत पड़ने पर इसकी जगह बाह्य मेमोरी भंडार से काम चला लिया जाता है।

आंतरिक मेमोरी के दो भाग होते हैं
  1. रॉम (Read Only Memory : ROM)
  2. रैम (Random Access Memory : RAM)

रॉम (Read Only Memory : ROM)
यह मेमोरी कंप्यूटर को बनाते समय उसमें स्थाई रूप से भर दी जाती है। अर्थात् ऐसे अनुदेश भर दिये जाते हैं जो कंप्यूटर को अपना कार्य करने के लिए मार्गदर्शन देते हैं। इस मेमोरी को, जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, केवल पढ़ा जा सकता है। इसमें कुछ लिखने, छापने या टाइप करने की गुंजाइश नहीं होती। इसमें ऐसे प्रोग्राम भी भर दिये जाते हैं, जिनको बार-बार प्रयोग करने की जरूरत पड़ सकती है। जैसे कि वैज्ञानिक उपयोग के लिए बनाये गये कंप्यूटरों में त्रिज्यात्मक फलन भरे होते हैं।

रॉम के प्रकार
रॉम के बहुत सारे प्रकार प्रयोग में लाये जाते हैं-

(क) प्रॉम (Programmable Read Only Memory : PROM) - प्रॉम में अपना प्रोग्राम स्टोर करने की सुविधा होती है । इसका प्रयोग करके ऑपरेटर मनचाहे ढंग से प्रयोग में ला सकता है । जैसे कि किसी प्रयोगशाला में किसी खास तरह की वैज्ञानिक सारिणी का बार-बार उपयोग किया जाना हो तो उसे 'प्रॉम' में भरा जा सकता है । लेकिन यहाँ पर यह बात ध्यान में रखने की है कि इसमें एक बार कोई प्रोग्राम डालने के बाद फिर उसे बदला नहीं जा सकता।

(ख) ईप्रॉम (Erasable PROM) - जैसा कि हमने पढ़ा, प्रॉम में प्रोग्राम भरने के बाद फिर उसे बदला नहीं जा सकता इसीलिए ईप्रॉम की व्यवस्था की गई है, ताकि उसमें स्टोर किये गये प्रोग्राम की गलतियों को किसी विशेष ढंग से मिटाया जा सके और मेमोरी को किसी तरह का नुकसान भी न पहुँचे । इस काम के लिए मेमोरी के उस भाग को, जिसका परिमार्जन करना है, पराबैंगनी किरणों (Ultraviolet Rays) में लगभग 20 मिनट के लिए रख देते हैं । तृतीय जनरेशन के कंप्यूटरों में इस प्रकार की मेमोरी का प्रयोग किया गया था।

ई-ई-प्रॉम (Electrically Erasable PROM) - के बन जाने के बाद यह भी संभव हो गया है कि इसमें गलती से टाइप हो गये अक्षरों को विद्युतीय विधि से मिटाया जा सके । इसके बाद मेमोरी को फिर से प्रोग्राम दिया जा सकता है। चतुर्थ जनरेशन के कंप्यूटरों में EPROM का प्रयोग किया जाता है।

रैम (Random Access Memory : RAM)
यह कंप्यूटर की आंतरिक मेमोरी का वह भाग है, जिसमें डेटा को बार-बार स्टोर करके मिटाया जा सकता है। इसमें कंप्यूटर का प्रोग्राम, जिन पर काम होना है वह डेटा तथा संसाधन (प्रोसेसिंग) के बाद के तैयार परिणाम स्टोर रहते हैं। इस मेमोरी की संचय क्षमता रॉम की तुलना में बहुत अधिक है लेकिन यह अस्थाई होती है। कंप्यूटर का स्विच ऑफ होते ही (बिजली जाते ही) इसमें स्टोर जानकारी विसर्जित हो जाती है। इसीलिए इस स्मृति को वोलेटाइल (Volatile) मेमोरी भी कहते हैं। रॉम (ROM) मेमोरी में संग्रहीत जानकारी का किसी बाह्य प्रोग्राम द्वारा प्रयोग नहीं किया जा सकता जबकि रैम में स्टोर जानकारी को जब चाहें आसानी से प्रयोग में ला सकते हैं । इस मेमोरी से डेटा को निकालने में 80 से 100 नैनो सेकंड समय लगता है।

रैम के प्रकार
यह मेमोरी दो प्रकार की होती है-
  1. स्टैटिक रैम (Static RAM)
  2. डायनेमिक रैम (Dynamic RAM)
स्टैटिक मेमोरी डायनेमिक मेमोरी से अधिक कीमती होती है। डायनेमिक मेमोरी में विद्युत् आवेश कुछ ही मिलीसेकंड में लीक होने लगता है, जिससे इसमें स्टोर जानकारी के मिट जाने का भय बना रहता है। इसलिए डायनेमिक रैम को बार-बार एक निश्चित समय बाद पुनर्जीवित करते रहना पड़ता है। इसके विपरीत स्टैटिक रैम में विद्युत आवेश लीक न होने से ऐसी कोई अतिरिक्त सावधानी नहीं बरतनी पड़ती। इसलिए इस पर अधिक भरोसा किया जा सकता है। इसके अलावा स्टैटिक रैम से कोई जानकारी निकालने में केवल 80 नैनो सेकंड का समय लगता है, जबकि डायनेमिक रैम में 120 से 200 नैनो सेकंड समय लगता है।

मॉनिटर
मॉनिटर टीवी की तरह होता है। वैसे आजकल टीवी को भी मॉनिटर बनाने की तैयारी चल रही है और कुछ कंपनियों ने बाजार में ऐसा कंप्यूटर उप ध भी कराया है। अभी बाजार में जो टीवी उपलब्ध है उसे मॉनीटर के रूप में उपयोग करने में कठिनाई है । यदि टीवी पर एक लाइन में 40 अक्षर से अधिक आ जायें तो देखने में कठिनाई होती है। जबकि कंप्यूटर के मॉनिटर पर आसानी से 80 तक अक्षरों को देख और पढ़ सकते हैं। मॉनिटर का प्रचलन इन दिनों न के बराबर है।

मॉनिटर दो प्रकार के होते हैं :-
  • श्वेत
  • श्याम
यह छोटे-छोटे बिन्दुओं से बना होता है। इन बिन्दुओं को 'पिक्सल' कहा जाता है । एक मॉनिटर पर लगभग 600 बिन्दुओं की 200 रेखाएँ होती हैं। अतएव मॉनिटर प्रदर्शन का 'रिजोल्युशन' 600 x 200 = 120000 पिक्सल हुए।

इनपुट डिवाइस
वे डिवाइसें जो कंप्यूटर और मानव के बीच संपर्क बनाती हैं, इनपुट डिवाइस और आउटपुट डिवाइस कहलाती है। इनपुट डिवाइसों द्वारा कंप्यूटर में डेटा और प्रोग्राम डाले जाते हैं तथा आउटपुट डिवाइसों द्वारा कंप्यूटर से संसाधित (Processed) जानकारी प्राप्त की जाती है। जैसा कि पहले बताया जा चुका है, लिखित, ध्वनि (आवाज), दृश्य (देखी जा सकने योग्य जैसे चित्र, रेखांकन या ग्राफ) और यांत्रिक मानवीय चेष्टा के रूप में हो सकता है। इन सभी तरह के इनपुटों को विद्युतीय संकेतों में बदल लिया जाता है। ये संकेत बाइनरी कोड (0 और 1) में होते हैं। बाइनरी कोड के अनुसार विद्यतीय पल्स (संवेदन) के होने को 1 और न होने को 0 प्रदर्शित करता है।

कुछ प्रमुख इनपुट डिवाइस हैं-
  • की-बोर्ड (Key Board)
  • माउस (Mouse)
  • जोस्टिक (Joystick)
  • प्रकाशीय पेन (Light Pen)
  • स्कैनर (Scanner)
  • बार कोड रीडर (Bar Code Reader)
  • माइकर (MICR-Magnetic Ink Character Recognition)
  • पंच कार्ड रीडर (Punch Card Reader)
  • ऑप्टिकल मार्क रीडर (Optical Mark Reader)
  • ऑप्टिकल कैरेक्टर रीडर (OCR-Optical Character Reader)
  • डिजिटल कैमरा (Digital Camera)
  • टच स्क्रीन (Touch Screen)
  • माइक (Mike)
  • स्पीच रिकॉग्नीशन सिस्टम (Speech recognition system)
  • आप्टिकल कैरेक्टर रिकॉग्नीशन (Optical Character Recognition)
  • इलेक्ट्रानिक कार्ड रीडर (Electronic Card Reader) ।

आउटपुट डिवाइस
आउटपुट डिवाइस वे युक्तियां हैं जो कंप्यूटर के सेन्ट्रल प्रोसेसिंग डिवाइस द्वारा दिये जाने वाले संकेतों को उस रूप में बदल देते हैं जिस रूप में हम उनका प्रयोग करना चाहते हैं । ये संकेत को लिखित रूप में, ग्राफ या रेखा चित्र, ध्वनि या दृश्य रूप में दे सकते हैं । इस तरह ये युक्तियाँ कंप्यूटर और मानव के बीच एक माध्यम का काम करती हैं। कुछ आम युक्तियाँ इस प्रकार हैं-
  • विजुअल डिस्प्ले डिवाइस (स्क्रीन या मॉनीटर)
  • प्रिंटर्स
  • प्लाटर और ट्रेसर्स
  • माइक्रोफिश
  • रोबोटिक आर्म
कंप्यूटर से प्राप्त होने वाली जानकारी बाइनरी रूप में यानि डिजिटल होती है। इसे मानवीय भाषा में बदला जाना जरूरी है। कई बार जानकारी विद्युत-स्पंदनों के रूप में प्राप्त होती है जिसे 'मोडेम' नामक युक्ति द्वारा translate करना होता है। इसके बाद ही इन विद्युतीय संकेतों को टेलीफोन द्वारा दूर भेजा जा सकता है । कंप्यूटर से प्राप्त होने वाली जानकारी को सीधे ही छाप लिया जाए तो इसे हार्ड कॉपी कहते हैं। फ्लॉपी, हार्डडिस्क आदि पर स्टोर की गयी फाइल को सॉफ्ट कॉपी कहते हैं।

की-बोर्ड
यह टाइपराइटर की तरह होता है। इसपर अल्फाबेट अंकित होता है। कंप्यूटर का उपयोग इसी के द्वारा होता है। हालांकि इसमें एक साधारण टाइपराइटर से अधिक की होती हैं। इसकी 'की' निम्न भागों में विभाजित होती हैं

माउस
की-बोर्ड' की तरह 'माउस' एक छोटा सा इनपुट डिवाइस होता है। इसमें तीन बटन होते हैं। इसके द्वारा अलग-अलग ऐप्लीकेशन सॉफ्टवेयरों का अत्यन्त तीव्र गति से चलाकर परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। लगभग सभी पीसी में दो सिरियल पोर्ट होते हैं जो COM, और COM, के नाम से जाने जाते हैं। हम किसी भी पोर्ट में माउस लगाकर अपना काम कर सकते हैं। इसे हाथ से टेबुल पर नचाने पर एक तीर कंप्यूटर में चलता है। इस तीर को 'करसर' कहते हैं इस तीर को किसी भी कमांड पर दबाने पर वह कार्यान्वित हो जाता है। इन दिनों इंटरनेट का प्रचलन बढ़ गया है और इसमें माउस की उपयोगिता काफी बढ़ गयी है।

प्रिंटर
प्रिंटर कंप्यूटर का एक महत्त्वपूर्ण आउटपुट उपकरण है। मॉनिटर पर आप जो देखते हैं उसे छपे रूप में इसके द्वारा प्राप्त कर सकते हैं। प्रिंटर उपयोगिता के हिसाब से कई प्रकार के होते हैं।

स्कैनर
स्कैनर द्वारा किसी भी दस्तावेज, चित्र अथवा आंकड़े को सीधे हू-ब-हू रूप में कंप्यूटर में भेज सकते हैं। साथ ही अपनी आवश्यकतानुसार उसे छोटा या संधोधित भी कर सकते हैं। इन दिनों यह कंप्यूटर का एक प्रमुख उपयोगी उपकरण हो गया है।

स्पीकर
वर्तमान समय के सभी कम्प्यूटर मल्टीमीडिया कम्प्यूटर हैं। इसलिए स्पीकरों का प्रयोग सबके साथ होता है। लेकिन स्पीकर को कंप्यूटर से जोड़ना हमारी इच्छा पर निर्भर है । कंप्यूटर में स्पीकर को सीपीयू में लगे साउंड कार्ड के एक जैक से जोड़ते हैं । जहां से हमें आवाज सुनाई पड़ती है।

माइक
यह भी कंप्यूटर का ऐसा भाग है जिसे जरूरत होने पर कंप्यूटर में जोड़ा जाता है । लेकिन इस वर्ष सरकार के द्वारा कंप्यूटर के जरिए टेलीफोन कॉल की सुविधा देने से अब माइक का चलन भी अनिवार्य हो जाएगा । मल्टीमीडिया कम्प्यूटर में माइक को आवाज इनपुट करने के लिए प्रयोग करते हैं । सीपीयू में साउंड कार्ड की माइक संबंधित पोर्ट से जोड़कर हम इसमें आवाज रिकार्ड कर सकते हैं।

वेब कैमरा
आजकल इंटरनेट का चलन लगातार बढ़ रहा है, जिससे नई-नई ऐसे सीरीज बाजार में आ रही है। इसी नयी तकनीक के तहत अभी हाल में वेब कैमरा बाजार में आया है। इस कैमरे के प्रयोग से आप कम्प्यूटर में फिल्म इंपुट करने से लेकर दूर बैठे व्यक्ति से इस तरह से बात कर सकते हैं जैसे वह आपके सामने बैठा हो। वेब कैमरे को कम्प्यूटर की यूएसबी पोर्ट में लगाते हैं। इसके बाद जब यह कम्प्यूटर में इंस्टॉल हो जाता है तो आप इंटरनेट से फोन करते समय इसका प्रयोग लाइव वीडियो कैमरे की तरह से कर सकते हैं।

सीडी राइटर
इसका प्रयोग भी जिप ड्राइव की तरह किया जाता है। इसे दो रूपों में इस्तेमाल कर सकते हैं। बहुत से लोग सीडी राइटर को सीपीयू में स्थाई रूप से लगा लेते हैं और इसके द्वारा सीडी राइटिंग से लेकर सीडी में लिखे प्रोग्रामों तक को पढ़ने में कर सकते हैं। लेकिन अभी भी सीडी राइटर को लोग एक्सटर्नल रूप में इस्तेमाल करते हैं। जिसमें हम जिप ड्राइव की पोर्ट से ही सीडी राइटर को जोड़कर कम्प्यूटर में स्टोर बहुत बड़ी मात्रा में डेटा को सीडी पर लिखकर सुरक्षित रख सकते हैं।

डीवीडी ड्राइव
डीवीडी ड्राइव भी सीडी राइटर का एक परिष्कृत रूप है इसमें प्रयोग होने वाली डिस्क में सीडी से कई गुना डेटा स्टोर करके रखा जा सकता है।

कम्प्यूटर प्रोग्राम की भाषाएं

कम्प्यूटर हार्डवेयर द्वारा किसी वांछित कार्य को संपन्न कराने की जिम्मेदारी साफ्टवेयर या प्रोग्राम पर होती है। कम्प्यूटर प्रोग्राम आपस में जुड़े हुए निर्देशों का समूह है जिसे किसी खास कार्य के लिए संग्रहित किया जाता है। प्रोग्राम लिखने की प्रक्रिया को प्रोग्रामिंग (Programming) कहते हैं। प्रोग्राम जिस भाषा या कोड में लिखा जाता है उसे प्रोग्राम की भाषा (Programming Language) कहते हैं। कम्प्यूटर साफ्टवेयर तैयार करने वाला व्यक्ति प्रोग्रामर (Programmer) कहलाता है।
प्रोग्राम भाषा को मुख्यतः तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-
  • (i) मशीन भाषा (Machine Language)
  • (ii) असेम्बली भाषा (Assembly Language)
  • (iii) उच्च स्तरीय भाषा (High Level Language)

(i) मशीन भाषा (Machine Language)
कम्प्यूटर वास्तव में एक इलेक्ट्रानिक सर्किट है जो केवल ऑन (1) या ऑफ (0) की पहचान कर सकता है। इसे बाइनरी अंकों (1 या 0) द्वारा निरूपित किया जाता है। कम्प्यूटर मशीन ऑन या ऑफ को समझ सकता है, अतः बाइनरी अंकों (1 या 0) में लिखे भाषा को मशीन भाषा कहते हैं।
प्रत्येक कम्प्यूटर प्रोसेसर की अपनी एक विशिष्ट मशीन भाषा होती है जो प्रोसेसर बनाने वाली कंपनी और प्रोसेसर की डिजाइन पर निर्भर (Machine Dependent) होता है। कम्प्यूटर प्रोसेसर मशीन भाषा को सीधे समझ सकता है तथा क्रियान्वित कर सकता है। अतः मशीन भाषा के लिए किसी ट्रांसलेशन साफ्टवेयर की जरूरत नहीं होती तथा प्रोग्राम के क्रियान्वयन की गति भी तेज होती है। परंतु मशीन भाषा में प्रोग्राम लिखना कठिन होता है तथा त्रुटियां भी अधिक होती हैं। मशीन भाषा को निम्न स्तरीय भाषा (Low Level Language) कहा जाता है।
मशीन भाषा के दो भाग होते हैं। पहला भाग कमांड या ऑपरेशन कोड (Operation Code) कम्प्यूटर को यह बताता है कि उसे क्या करना है। दूसरा भाग ऑपरेण्ड (Operand) कहलाता है, जो कम्प्यूटर मेमोरी में प्रोसेस किए जाने वाले डाटा की स्थिति (Location) बतलाता है।

मशीन भाषा के लाभ
(i) मशीन भाषा के क्रियान्वयन के लिए ट्रांसलेशन साफ्टवेयर की आवश्यकता नहीं होती।
(ii) मशीन भाषा में प्रोग्राम के क्रियान्वयन की गति तेज होती है। मशीन भाषा की कमियां-
  • अलग अलग कंपनियों के प्रोसेसर का आंतरिक डिजाटन अलग अलग होता है। अतः एक ही कार्य के लिए अलग अलग प्रोग्राम की जरूरत होती है। तात्पर्य यह की मशीन भाषा मशीन के प्रकार पर निर्भर (Machine Dependent) होती है।
  • मशीन भाषा में प्रोग्राम तैयार करना कठिन होता है तथा गलतियों की संभावना भी अधिक होती है।
  • मशीन भाषा में गलतियों में सुधार करना भी कठिन होता है।

(ii) असेम्बली भाषा (Assembly Language)
इसे निम्नस्तरीय भाषा (Low Level Language) भी कहते हैं। इस भाषा में अक्षर व अंकों से बना न्यूमोनिक कोड (Mnemonic Code) का प्रयोग किया जाता है जिसका एक निश्चित अर्थ होता है। जैसे- जोड़ने के लिए 'ADD'; घटाने के लिए 'SUB'; डाटा को मेमोरी में लोड करने के लिए 'LD' आदि। अलग-अलग कम्प्यूटर और साफ्टवेयर पैकेज में न्यूमोनिक कोड अलग-अलग हो सकते हैं। प्रयोग से पूर्व उस साफ्टवेयर के असेम्बलर (Assembler) द्वारा इस भाषा को मशीन भाषा में बदला जाता है।
असेम्बली भाषा में लिखा प्रोग्राम सोर्स प्रोग्राम (Source Programme) कहलाता है। जब इसे असेम्बलर साफ्टवेयर द्वारा मशीन भाषा में बदल दिया जाता है तो इसे आब्जेक्ट प्रोग्राम (Object Program) कहा जाता है।
computer kya hai
असेम्बली भाषा के लाभ
  • असेम्बली भाषा बोलचाल की भाषा के करीब है। अतः इस भाषा में प्रोग्राम लिखना मशीन भाषा की अपेक्षा सरल होता है।
  • असेम्बली भाषा के प्रोग्राम में गलतियां खोजना और उन्हें ठीक करना मशीन भाषा की अपेक्षा आसान होता है।

असेम्बली भाषा की कमियां
  • असेम्बली भाषा कम्प्यूटर हार्डवेयर के प्रकार पर निर्भर करता है। अतः इस भाषा में लिखे प्रोग्राम मशीन के ऊपर निर्भर (Machine Dependent) होते हैं।
  • अलग अलग कम्प्यूटर हार्डवेयर के लिए असेम्बलर साफ्टवेयर अलग-अलग होता है।
  • असेम्बली भाषा के प्रोग्राम के क्रियान्वयन में मशीन भाषा की अपेक्षा अधिक समय लगता है।

क्या आप जानते हैं?

  • पहली पीढ़ी की कम्प्यूटर भाषा (1GL) - मशीन भाषा
  • दूसरी पीढ़ी की कम्प्यूटर भाषा (2GL) - असेम्बली भाषा
  • तीसरी पीढ़ी की कम्प्यूटर भाषा (3GL) - उच्च स्तरीय भाषा
  • चौथी पीढ़ी की कम्प्यूटर भाषा (4GL) - डोमेन आधारित भाषा (Domain Specific Language)
  • पांचवीं पीढ़ी की कम्प्यूटर भाषा (5GL) - कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) में प्रयुक्त भाषा


(iii) उच्च स्तरीय भाषा (High Level Language)
इसे तीसरी पीढ़ी की भाषा (3rd Generation Language) भी कहते हैं। यह बोलचाल व लेखन में प्रयुक्त भाषा के काफी करीब है। इस भाषा का प्रयोग विभिन्न प्रकार के कम्प्यूटर या सॉफ्टवेयर में आसानी से किया जा सकता है। इस भाषा पर कम्प्यूटर की आंतरिक संरचना का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। प्रयोग से पहले इस भाषा को कम्पाइलर (Compiler) या इंटरप्रेटर (Interpreter) द्वारा मशीन भाषा में बदला जाता है। कम्पाइलर या इंटरप्रेटर सोर्स प्रोग्राम को ऑब्जेक्ट प्रोग्राम में बदलता है। प्रत्येक भाषा के लिए अलग-अलग कम्पाइलर या इंटरप्रेटर का प्रयोग करना पड़ता है।
उच्च स्तरीय भाषा के कुछ अन्य उदाहरण हैं-
  • कोबोल (COBOL)
  • लोगो (LOGO)
  • बेसिक (BASIC)
  • एल्गोल (Algol)
  • सी (C)
  • सी-प्लस-प्लस (C++)
  • कोमाल (COMAL)
  • प्रोलॉग (PROLOG)
  • पास्कल (Pascal)
  • जावा (Java)
  • सी शार्प (C#-C Sharp)
  • आरपीजी (RPG-Report Program Generator)
  • लिस्प (LISP)
  • स्नोबॉल (SNOBOL) आदि।

उच्च स्तरीय भाषा के लाभ
  • इस भाषा में लिखा साफ्टवेयर विभिन्न प्रकार के कम्प्यूटर में बिना किसी बदलाव के प्रयोग में लाया जा सकता है।
  • उच्च स्तरीय भाषा मशीन के प्रकार पर निर्भर (Machine Dependent) नहीं होती।
  • यह भाषा सीखने में आसान है तथा प्रोग्राम लिखना व पढ़ना सरल है। उच्च स्तरीय भाषा बोलचाल की भाषा के करीब होती है।
  • त्रुटियां कम होती हैं।

उच्च स्तरीय भाषा की कमियां
  • उपयोग से पहले कम्पाइलर या इंटरप्रेटर द्वारा मशीन भाषा में बदला जाता है।
  • प्रत्येक भाषा के लिए अलग-अलग कम्पाइलर या इंटरप्रेटर का प्रयोग करना पड़ता है।

क्या आप जानते हैं?

फोरट्रान (FORTRAN) पहली उच्च स्तरीय भाषा (HLL) मानी जाती है जिसका विकास 1957 में आईबीएम कम्पनी के जॉन बेकस (John Backus) ने किया।


चौथी पीढ़ी की भाषा (4GL-4th Generation Language)
यह एक उच्चस्तरीय भाषा (HLL) है जिसे कार्यान्वित करने के लिए निर्देशों की संख्या कम होती है। यह भाषा बोलचाल भाषा के ज्यादा करीब है। इसमें प्रोग्राम लिखना आसान और तीव्र है।
चौथी पीढ़ी की कम्प्यूटर भाषा (4GL) एक डोमेन आधारित भाषा (Domain Specific Language) है। इसका प्रयोग डाटाबेस प्रबंधन, वेब आधारित संरचना के विकास आदि में किया जाता है। चौथी पीढ़ी की भाषा प्रोग्रामरों के लिए आसान है जिसमें आइकन (Icon) तथा चिह्नों (Symbols) का भी प्रयोग किया जाता है। चौथी पीढ़ी की भाषा (4GL) के उदाहरण हैं-एस क्यू एल (S QLStructured Query Language); जावा स्क्रिप्ट (Java Script); माइक्रोसाफ्ट फ्रंट पेज (Microsoft Frontpage) आदि।

पांचवीं पीढ़ी की भाषा (5GL-5th Generation Language)
पांचवीं पीढ़ी की कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग भाषा में किसी समस्या के समाधान के लिए एल्गोरिथम का प्रयोग न कर समस्या के समाधान में आने वाली बाधाओं (Constraints) तथा उससे उत्पन्न होने वाली तार्किक अवस्थाओं (Logical Conditions) का उपयोग किया जाता है। पांचवीं पीढ़ी के भाषा का उपयोग कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) तथा तार्किक प्रोग्रामिंग (Logical Programming) के लिए होता है। लिस्प (LISP-List Processing) तथा प्रोलॉग (PROLOG) पांचवीं पीढ़ी के भाषा का उदाहरण है।

सिंटैक्स रूल (Syntax Rule)
बोलचाल की प्रत्येक भाषा में शब्दों और चिह्नों के प्रयोग के लिए व्याकरण के कुछ नियम होते हैं। उसी प्रकार, कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग भाषा (Programming Language) में भी शब्दों और चिह्नों के प्रयोग के लिए नियम बनाए जाते हैं जिन्हें सिंटैक्स रूल (Syntax Rule) कहा जाता है। कम्प्यूटर केवल पूर्व निर्धारित भाषा के नियमों को समझ पाता है तथा इनका अनुपालन नहीं करने पर प्रोग्राम के क्रियान्वयन के समय सिंटैक्स इरर (Syntax error) देता है।

रिजर्वड् वर्ड्स (Reserved Words)
कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग में वह शब्द जिसका प्रयोग प्रोग्राम बनाते समय चर (Variable) के रूप में नहीं किया जाता है, रिजर्वड् वर्ड कहलाता है। सामान्यतः रिजर्व वर्ड का प्रोग्रामिंग भाषा के सिंटैक्स में कोई अलग व विशेष अर्थ होता है। प्रत्येक प्रोग्रामिंग भाषा में रिजर्व वर्ड की सूची अलग अलग हो सकती है। इसे की वर्ड (Key Word) भी कहा जाता है।

उच्च स्तरीय भाषाएं (High Level Language) 

फोरट्रॉन (FORTRAN)
यह Formula Translation का संक्षिप्त रूप है। इसे प्रथम उच्च स्तरीय भाषा माना जाता है जिसका प्रयोग वैज्ञानिक और इंजीनियरों द्वारा गणितीय सूत्रों को आसानी से हल करने तथा जटिल वैज्ञानिक गणनाओं में किया गया।
फोरट्रान बीजगणित (Algebra) पर आधारित प्रोग्रामिंग भाषा है। 1966 में आन्सी (ANSI-Americal National Standard Institute) ने फोरट्रॉन भाषा का मानकीकरण किया। इस प्रकार फोरट्रॉन पहली मानक भाषा बन गई।

लोगो (LOGO)
अमेरिका के सिमोर पेपर्ट (Seymour Papert) द्वारा विकसित इस भाषा का उपयोग कम उम्र के बच्चों को रेखाचित्र और ग्राफिक के माध्यम से कम्प्यूटर की शिक्षा देने के लिए किया गया।

कोबोल (COBOL-Common Business Oriented Language)
यह व्यावसायिक कार्यों के लिए प्रयोग होने वाली भाषा है। कोबोल भाषा में निर्देश (Command) और वाक्य की संरचना (Sentence Structure) अंग्रेजी भाषा के समान है। इस भाषा को पैराग्राफ (Paragraph), डिविजन (Division) और सेक्शन (Section) में बांटा जाता है। इसे आन्सी कोबोल (ANSICOBOL) कम्पाइलर के साथ किसी भी कम्प्यूटर सिस्टम पर चलाया जा सकता है। कोबोल का एक संस्करण विजुअल कोबोल (Visual Cobol) आब्जेक्ट ओरिएंटेड प्रोग्रामिंग (Object Oriented Programming-OOP) भाषा है।

बेसिक (BASIC-Beginners' All-purpose Symbolic Instruction Code)
यह एक लोकप्रिय व सरल प्रोग्राम भाषा है जिसका विकास 1964 में प्रोफेसर जॉन केमेनी (John Kemeny) तथा थॉमस कुर्टज (Thomas Kurtz) ने किया। यह पर्सनल कम्प्यूटर में व्यवहार में लाया जाने वाला प्रथम उच्च स्तरीय भाषा है। इसका प्रयोग गणितीय और व्यावसायिक- दोनों कार्यों के लिए किया जा सकता है। इसकी सरलता के कारण इसका प्रयोग प्रशिक्षुओं को भाषा की अवधारणा स्पष्ट करने के लिए भी किया जाता है। इसी कारण इसे अन्य भाषाओं के लिए 'नींव का पत्थर' कहा जाता है। यह विश्व में सबसे अधिक प्रयोग होने वाली कम्प्यूटर भाषा है।
माइक्रोसाफ्ट द्वारा विकसित क्विक बेसिक (Quick Basic) तथा विजुअल बेसिक (Visual Basic) एक लोकप्रिय ऑब्जेक्ट ओरिएंटेड प्रोग्रामिंग (OOP) भाषा है।

पास्कल (Pascal)
इस भाषा का विकास 1971 में स्विट्जरलैण्ड के प्रोफेसर निकलॉस विर्थ (Nicklaus Writh) द्वारा किया गया। इसका नामकरण कम्प्यूटर के जनक कहे जाने वाले ब्लेज पास्कल (Blaise Pascal) के नाम पर किया गया। इस भाषा का प्रयोग प्रशिक्षुओं में प्रोग्रामिंग की अवधारणा स्पष्ट करने में किया गया। अतः इसे शिक्षापरक भाषा (Educational Language) भी कहते हैं।

सी और सी ++ (C and C++)
इस उच्च स्तरीय भाषा का विकास 1972 में बेल लैबोरेटरीज के डेनिस रिची तथा ब्रायन करनिंघम द्वारा किया गया। इसका विकास उच्च स्तरीय भाषा में असेम्बली भाषा की क्षमता डालने के उद्देश्य से किया गया। यह सामान्य कार्य के लिए प्रयुक्त भाषा है। इसमें सोर्स प्रोग्राम छोटा और संक्षिप्त रूप में लिखा जाता है। इसका कम्पाइलर सभी प्रकार के कम्प्यूटर में कार्य कर सकता है।
सी++ (C++) ऑब्जेक्ट ओरिएंटेड प्रोग्रामिंग भाषा है। यह बोलचाल की अंग्रेजी भाषा के करीब है। हालांकि यह भाषा संक्षिप्त और सशक्त है, पर यह एक कठिन भाषा है। यूनिक्स (Unix) आपरेटिंग सिस्टम सीभाषा में लिखा गया पहला महत्त्वपूर्ण प्रोग्राम है।

जावा (Java)
इस उच्च स्तरीय भाषा का विकास सन माइक्रो सिस्टम के जेम्स गाँसलिंग द्वारा किया गया। यह C++ की तरह ऑब्जेक्ट ओरिएंटेड प्रोग्रामिंग भाषा है पर उसकी अपेक्षा छोटी और सरल है। इसका विकास मुख्यतः इंटरनेट में उपयोग के लिए किया गया। इसका प्रयोग इलेक्ट्रानिक उपभोक्ता उत्पादों जैसे-टीवी, टेलीफोन आदि में भी किया जाता है। एनीमेशन (Animation) आधारित वेब पेज (Web Page), शैक्षिक कार्यक्रम (Tutorial) तथा खेल आदि के विकास में भी इसका प्रयोग किया जाता है। इस भाषा में कम्पाइल किया गया कोड मशीन के प्रकार पर निर्भर नहीं करता।

अल्गोल (ALGOL-Algorithmic Language)
इस उच्च स्तरीय भाषा का प्रयोग बीज गणितीय गणनाओं में किया जाता है।

कोमल (COMAL-CommonAlgorithmicLanguage)
मध्य स्तर के छात्रों के लिए प्रयुक्त भाषा है।

प्रोलोग (PROLOG-Programming in Logic)
इसका विकास 1972 में फ्रांस में किया गया। इसमें समस्याओं के समाधान में तर्क की प्रधानता दी जाती है। इसे कृत्रिम बुद्धि (AI Artificial Intelligence) तथा तार्किक प्रोग्रामिंग (Logical Programming) में प्रयोग किया जाता है।

सी शार्प (C#-C Sharp)
यह ऑब्जेक्ट ओरिएंटेड प्रोग्रामिंग भाषा है जिसका विकास माइक्रोसाफ्ट ने इंटरनेट में प्रयोग के लिए किया। यह भाषा यूरोपियन कम्प्यूटर मैन्युफैक्चरर एसोसिएशन (ECMA) तथा इंटरनेशनल स्टैंडर्ड आर्गनाइजेशन (ISO) के मानकों द्वारा मान्यता प्रदत्त है।

आरपीजी (RPG-Report Program Generator)
यह समान्य व्यावसायिक कार्यों द्वारा प्राप्त रिपोर्ट को आउटपुट के रूप में प्रस्तुत करने के लिए बनाई गई भाषा है। यह एक सरल भाषा है जिसका प्रयोग छोटे व्यावसायिक कम्प्यूटर में किया जा सकता है। इस भाषा का विकास IBM कंपनी द्वारा किया गया है।

लिस्प (LISP-List Processing)
इसका विकास 1959 में जॉन मैकार्थी (John Macarthy) द्वारा कृत्रिम बुद्धि (Artificial Intelligence) के प्रयोग में किया गया। यह एक फंक्शनल प्रोग्रामिंग लैंग्वेज है जिसका उपयोग गैर सांख्यिकी डाटा (non-statistical data) के प्रोसेसिंग में किया जाता है। यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता में प्रयुक्त सर्वाधिक लोकप्रिय भाषा है।

सब प्रोग्राम (Sub Program)
यह किसी विशेष कार्य के लिए तैयार किया गया ऐसा छोटा साफ्टवेयर है जिसका प्रयोग किसी अन्य कार्य या प्रोग्राम में बिना किसी परिवर्तन के किया जा सकता है। साफ्टवेयर प्रोग्रामर अपनी सुविधा के अनुसार, किसी साफ्टवेयर प्रोग्राम में सब प्रोग्राम को जोड़ सकता है। इस प्रकार, उसका पूरा ध्यान प्रोग्राम के मुख्य उद्देश्य पर ही टिका रहता है।

रोचक तथ्य

सभी उच्च स्तरीय भाषा (HLL) में अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षर (A से Z) तथा इंडो अरबिक अंकों (0, 1, 2......, 9) का प्रयोग किया जाता है।


कंप्यूटर का विकास

कंप्यूटर का आविष्कार एक ऐतिहासिक प्रयास का परिणाम है। यह अलग बात है कि कंप्यूटर आज आधुनिक युग का आविष्कार और देन साबित हुआ। लेकिन इसके प्रयोग की सूचना 3500 वर्ष पहले भी मिलती है। सबसे प्राचीन कंप्यूटर 'स्टोन हेन्ज' इंग्लैंड में 3500 वर्ष पूर्व बनाया गया था। जिसका गैराल्ड हादिन्स ने अपनी पुस्तक 'स्टोन हेन्ज डिसकोडिड' में वर्णन किया है । एक अन्य कंप्यूटर ग्रीस के लोगों द्वारा बनाया गया था। इसमें कंप्यूटर की प्रमुख विशेषताएँ मौजूद थीं। 2000 वर्ष पुराना होने के बावजूद उसकी विशेषताओं को आधुनिक युग के कंप्यूटरों की तकनीकि में शामिल किया जाता है। हालांकि यांत्रिक कंप्यूटरों का उद्गम पास्कल (1923-62), ग्राटफर्ड और विल्हेल्म (1696-1761) जैसे गणितज्ञों के कार्यों में ढूँढा जा सकता है। पर चार्ल्स बैबेज (1792-1871) प्रथम गणितज्ञ थे, जिन्होंने एक ऐसी मशीन बनाने का विचार किया, जिसमें लघुगणिकीय अंकणों, जिनका आविष्कार जॉन. नेपियर (1550-1617) ने किया था, को समाहित किया जा सके।
अंग्रेज वैज्ञानिक चार्ल्स बैबेज को आधुनिक कंप्यूटर विज्ञान का जन्मदाता कहा जाता है। बैबेज की शिष्या और कवि बायस की बेटी लेडी एडा ने सर्वप्रथम कंप्यूटर प्रोग्राम तैयार किया था।
पंचकार्ड का आविष्कार एक रोचक घटना है। डॉ. हर्मन हालरिथ ने इसे मूर्त रूप दिया। उन्होंने 1887 में पंचकार्ड मशीन बनाया। इसे जनगणना मशीन नाम दिया गया। पंचकार्ड एक 'इनपुट' उपकरण है जो डेटा कंप्यूटर तक पहुँचाता है।
सन् 1883 में अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ. वेन्नेवर बुश ने समीकरणों को हल करने के लिए यांत्रिक कलपुर्जी का एक शानदार गणक यंत्र बनाया और इस प्रकार बैबेज के आधारभूत सिद्धांतों को मूल रूप देना संभव हुआ। इसके बाद के मॉडलों में दण्डों और चक्रों के स्थान पर इलेक्ट्रॉनिक स्विच कंप्यूटरों का युग शुरू हुआ। दूसरे महायुद्ध के दौरान ही गणितज्ञ न्यूमन ने इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटरों के लिए नया स्थापत्य प्रस्तुत किया।
द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम दौर तक आधुनिक कंप्यूटर के लिए सभी प्रमुख सिद्धांत अस्तित्व में आ चुके थे। इसकी बाद ही निर्वात नलिकाओं या वाल्वों पर आधारित पहली पीढ़ी के कंप्यूटर बने। फिलहाल, पांचवी पीढ़ी के कम्प्यूटर अस्तित्व में हैं।

कम्प्यूटर की पीढीयाँ Computer Generations in Hindi

पहली पीढ़ी के कम्प्यूटर (1950-60)
  • 1951 के मध्य में इस मशीन का प्रयोग आरंभ हुआ।
  • इस युग के कंप्यूटर का नाम 'यूनीवासी' था और इसका प्रयोग अमेरिका में किया गया।
  • इसी काल में निर्वात ट्यूबों (Vacume Tubes) का प्रयोग शुरू हो गया । ट्यूबों पर आधारित मार्क-1 नामक कंप्यूटर का विकास इसी पीढ़ी के अन्तर्गत हुआ था।
  • इस समय के कंप्यूटर काफी आधुनिक होते हुए भी खर्चीले, आकार में बड़े और अत्यधिक ऊष्मा छोड़ने वाले थे।
  • इसी पीढ़ी में 'Punched-Card-Processing' मशीन का प्रचलन शुरू हुआ ।
  • 1952 में पेंसिलवानिया विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. ग्रेस हापर ने “Assembly Language” का आविष्कार किया और इस भाषा का प्रयोग प्रथम पीढ़ी के कंप्यूटर में हुआ।
  • इस पीढ़ी के कंप्यूटर में 'चुम्बकीय ड्रम' उपकरण होता था, जिसका प्रयोग आंतरिक मेमोरी के लिए होता था।
  • इस पीढ़ी के कंप्यूटर की भाषा अस्तित्व में आ चुकी थी । पहली भाषा “Machine Language” निम्न थी-0101100011000001001001

दूसरी पीढ़ी के कम्प्यूटर (1960-65)
  • इस काल में इलेक्ट्रॉनिक के क्षेत्र में ट्रांजिस्टर ने क्रांति का काम किया।
  • निर्वात नली (Vacume Tube) की जगह लघु ट्रांजिस्टर ने ले ली। फलतः कंप्यूटर काफी हल्का और छोटा हो गया। इसमें विद्युत् का प्रयोग काफी कम मात्रा में होता था।
  • Punch Card की जगह Tape तथा Disk का प्रयोग शुरू हुआ, फलतः कम्प्यूटर की गति काफी तीव्र हो गई।
  • Disk प्रयोग में आने के कारण इस पीढ़ी के कंप्यूटर आँकड़ों तथा निर्देशों को अधिक मात्रा में संग्रहित करने में सक्षम हो गए।
  • इस पीढ़ी में आकर ड्रम 'मेगनेटिक कोर इंटरनल मेमोरी' में बदल गया।
  • अब Machine Language का स्थान High Level Language ने ले लिया। इससे सबसे बड़ा बदलाव यह आया कि अब कंप्यूटर का संचालन अंग्रेजी भाषा में होने लगा।
  • High Level Language में प्रमुख थे-
  • COBOL यानी Common Business Oriented Language
  • FORTRAN- Formula Translator इसका विकास आईबीएम द्वारा किया गया। इसका सबसे अधिक प्रयोग वैज्ञानिक कार्यों के लिए किया गया। जबकि कोबोल सामान्य व्यापार की भाषा बनी।
  • 1962 में आकर आईबीएम और अमेरिकन एयरलाइन्स ने संयुक्त रूप से 'यात्री आरक्षण व्यवस्था' नामक साफ्टवेयर का विकास किया। इसके अलावा इसी वर्ष टेलस्टार नामक पहला उपग्रह संचार साफ्टवेयर भी बनाया गया जिसके द्वारा आँकड़ों का स्थानान्तरण संभव हो सका।

तीसरी पीढ़ी के कम्प्यूटर (1965-70)
  • इस पीढ़ी का समय 1965 से 1970 तक है।
  • इस काल में आईबीएम ने क्रांतिकारी सफलता अर्जित की।
  • आईबीएम के महत्वपूर्ण सहयोग से Integrated Circuit से लैस कंप्यूटर की एक नई श्रृंखला प्रस्तुत की गई। इसका प्रयोग कार्यालयों में शुरू हुआ।
  • यह सबसे युगांतकारी प्रयोग साबित हुआ। इस शृंखला के प्रमुख कंप्यूटर थे- 360/मॉडल 195, सिस्टम/360 तथा 360/मॉडल 101
  • आईसी (Integrated Circuit) के प्रयोग से कंप्यूटर काफी छोटा हो गया। इसका रख-रखाव काफी सहज हो गया । एक छोटे से पीसीबी (PCB-Printed Circuit Board) पर सभी आईसी को लगा दिया जाता था ।
  • इस पीढ़ी का कंप्यूटर कार्यालयों के अतिरिक्त परिवार में प्रवेश किया।
  • इस पीढ़ी के दौरान 'बेसिक' (Basic : Beginners all purpose Symbolic Instruction Code) 7147 High Level Language का विकास हुआ, जिसका प्रयोग अपने समकालीन सभी Language से अधिक किया गया।
  • इस काल में ही RPG (Report Program Generator) नामक संकल्पना प्रचलन में आया । इसका सबसे बड़ा लाभ यह मिला कि मनचाही रिपोर्ट का Layout कंप्यूटर में Feed करते थे तथा कंप्यूटर स्वयं ही Program लिख देता था।
  • इसी काल में आईबीएम के सहयोग से कंप्यूटर पर World Processing प्रारंभ हुआ।
  • POP-8 नामक मिनी कंप्यूटर इसी समय बाजार में उतारा गया। वह एक फ्रिज की तरह होता था। इसे डीईसी (DEC-Digital Equipment Corporation) नामक कम्पनी ने तैयार किया था। बाद में दूसरी अमेरिकन कम्पनी 'डाटा जनरल' ने काफी कम कीमत में ही मिनी कंप्यूटर को बाजार में उतारा। फलतः इसका काफी तेजी से प्रचलन बढ़ा।

चौथी पीढ़ी के कम्प्यूटर (1971-87)
  • आज बाजार में जितनी अच्छी कंपनियाँ काम कर रही हैं, उन सभी की नींव इसी समय रखी गई थी।
  • सभी अर्थों में इस काल को हम Micro Processor युग के रूप में जानते हैं। इसकी वजह से कंप्यूटर फ्रीज से घटकर टेबुल पर रखने वाली वस्तु बनी।
  • इसी काल में VLSI एवं ULSI (VLSI : Very Large Scale Integrated Circuit और ULSI : Ultra Large Integrated Circuit) का प्रयोग शुरू हुआ और इसी वजह से कंप्यूटर काफी छोटा हो गया।
  • इस काल ने ही 'इनटेल कारपोरेशन', 'एमआईटीएस', 'माइक्रोसॉफ्ट कारपोरेशन', 'एप्पल', 'आईबीएम' और 'लोटस' को जन्म दिया। बिल गेट्स और मैरीन ई.टेड हौफ भी इसी समय की देन हैं।
  • मैरीन ई.टेड, जिन्हें इंजीनियरों के इंजीनियर नाम से जानते हैं, ने 'नरल परपरस लॉजिक चीप' का विकास किया। इसी के उपयोग से Interl 4004 नामक कंप्यूटर बाजार में प्रस्तुत किया गया।
  • 1970 में एक अन्य अमेरिकन कंपनी MITS (Micro Instrumentation and Telemetry Systems) द्वारा Altair 8800 के नाम से 'माइक्रोप्रोसेसर' पर आधारित कंप्यूटर बाजार में लाया गया।
  • अपने काम को और अधिक उपयोगी बनाने के लिए MITS ने 'बिलगेट्स' नामक एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर को 'बेसिक' नाम की एक 'उच्च स्तरीय कंप्यूटर की भाषा' के निर्माण का कार्य सौंपा। बिल गेट्स इसमें सफल रहे।
  • बाद में बिल गेट्स ने स्वयं 'माइक्रोसॉफ्ट कारपोरेशन' नाम की कंपनी स्थापित की । आज बिल गेट्स दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति हैं और 80 से 90 प्रतिशत कंपनियों का काम इन्हीं के सॉफ्टवेयर से चलता है।
  • इसी काल के मध्य में स्टीव जॉव और जोनेक नामक दो युवा 'एप्पल कंप्यूटर' के नाम से माइक्रोप्रोसेसर युक्त कंप्यूटर कीट को बाजार में ले आये। इससे एप्पल काफी आगे बढ़ा। बाद में Visi Calc नामक एक Calculating सॉफ्टवेयर को प्रस्तुत किया। यह कंप्यूटर के क्षेत्र में एक करिश्मा था। वस्तुत: यह एक सॉफ्टवेयर था। इसके बाद एप्पल काफी आगे बढ़ गया।
  • 1981 में आईबीएम ने माइक्रो कंप्यूटर के क्षेत्र में पहला कदम रखा जिसे उसने आईबीएम (पीसी) नाम दिया। यह अपने आप में एक धमाका था। इससे एप्पल माईक्रो कंप्यूटर से काफी पीछे चला गया। बाद में 'लोटस डेवलपमेंट कारपोरेशन' द्वारा लोटस 1-2-3 नामक एक Spread Sheet सॉफ्टवेयर को बाजार में प्रस्तुत किया गया। इस सॉफ्टवेयर के आते ही आईबीएम (पीसी) का प्रयोग और बिक्री काफी बढ़ गई। यह सॉफ्टवेयर एप्पल के Visi Calc से काफी शक्तिशाली था।
  • बाद में आईबीएम और लोटस ने एक व्यापारिक समझौते के अन्तर्गत अपने-अपने उत्पादों की कीमत काफी कम कर दी। इसके परिणाम स्वरूप लगभग 75% कंप्यूटर बाजार पर आईबीएम का कब्जा हो गया।
  • इस पीढ़ी में एमओएस (MOS : Metal Oxside Semiconductor) मेमोरी का प्रयोग शुरू हुआ। यह छोटा, तेजी से काम करने वाला तथा शक्तिशाली था। साथ ही इसकी सहायता से मेमोरी को घटाने-बढ़ाने में भी सुविधा हुई।
  • इसी काल में सी एवं पास्कल भाषा आई तथा बेसिक, फोरट्रान, कोबोल, आरपीजी आदि में परिमार्जन हुआ। इसके अतिरिक्त 'पैकेज साफ्टवेयर' का प्रचलन शुरू हुआ।

पांचवीं पीढ़ी के कम्प्यूटर
  • वर्तमान पीढ़ी कंप्यूटर की पांचवीं पीढ़ी का परिचायक है।
  • इस पीढ़ी का कंप्यूटर काफी छोटा और अति उपयोगी हो गया है।
  • आईबीएम ने इस पीढ़ी में 80286-386-586 (पेंटियम) बाजार में उपलब्ध करा चुकी है।
  • आज सुपर कंप्यूटर और रोबोट भी बाजार में आ चुके हैं।
  • कृत्रिम ज्ञान क्षमता (Artificial Inteligency) वाले तथा नए-नए Application Software भी बाजार में आ चुके हैं। साथ ही Operating System में भी काफी विकास हुआ है।
  • सीडी के माध्यम से कंप्यूटर मनोरंजन उद्योग में भी तहलका मचा रहा है।
  • आज कंप्यूटर की मेमोरी (RAM) व्यक्ति के हाथ में है। इसे अपनी इच्छानुसार घटाया बढ़ाया जा सकता है।

छठवीं पीढ़ी के कम्प्यूटर
कंप्यूटर की पहली पाँच जनरेशन्स इलेक्ट्रॉन के प्रवाह पर आधारित हैं जबकि छठवीं जनरेशन फोटॉनों पर आधारित होगी। जिस प्रकार पदार्थ के मूलभूत कण इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन व न्यूट्रॉन होते हैं, उसी प्रकार प्रकाश का मूलभूत कण फोटॉन होता है फोटॉन एक सेकंड में 3 लाख किमी. की दूरी तय कर लेता है। लेजर की किरणें भी फोटॉन से बनी हुई हैं। इस प्रकार के फोटॉनों पर आधारित कंप्यूटर को फोटॉनिक या ऑप्टिकल कंप्यूटर कहा जाएगा। ये पांचवीं जनरेशन के कंप्यूटरों से हजार गुने शक्तिशाली होंगे। इन्हें घड़ी के समान हाथ पर बांधा जा सकेगा। छठवीं जनरेशन में फोटोनिक के अलावा एटॉमिक और बायोलॉजिकल कंप्यूटर भी होंगे।

अगली पीढ़ी के कम्प्यूटर (Next Generation Computer)

नैनो कम्प्यूटर (Nano Computer)
नैनो ट्यूब्स जिनका व्यास 1 नैनो मीटर (1x10-9 मी.) तक हो सकता है, के प्रयोग से अत्यंत छोटे व विशाल क्षमता वाले कम्प्यूटर के विकास की परिकल्पना की गई है। नैनो टेक्नोलॉजी में पदार्थ की आण्विक संरचना (Atomic Structure) का उपयोग किया जाता है।

क्वांटम कम्प्यूटर (Quantum Computer)
विद्युतीय किरणों में ऊर्जा इलेक्ट्रान की उपस्थिति के कारण होती है। ये इलेक्ट्रान अपने कक्ष में तेजी से भ्रमण करते हैं। इस कारण इन्हें एक साथ 1 और 0 की स्थिति में गिना जा सकता है। इस क्षमता का इस्तेमाल कर मानव मस्तिष्क से भी तेज कार्य करने वाले कम्प्यूटर के विकास का प्रयास चल रहा है।
इस प्रकार के कम्प्यूटर में पदार्थ के क्वांटम सिद्धांत का उपयोग किया जाता है। सामान्य कम्प्यूटर में मेमोरी को बिट में मापा जाता है जबकि क्वांटम कम्प्यूटर में इसे क्यूबिट (Qubit - Quantum Bit) में मापा जाता है।

डीएनए कम्प्यूटर (DNA Computer)
इसमें जैविक पदार्थ, जैसे DNA या प्रोटीन (Protein) का प्रयोग कर डाटा को संरक्षित व प्रोसेस किया जा सकता है। इसे Bio Computer भी कहा जाता है।

केमिकल कम्प्यूटर (Chemical Computer)
इसमें गणना के लिए पदार्थ के रासायनिक गुणों व सांद्रता (Concentration) का उपयोग किया जा सकता है।

कंप्यूटर की समस्या

जिस तरह कंप्यूटरों का प्रचलन बढ़ रहा है, उनका प्रयोग करने वाले उन पर अधिक मात्रा में आश्रित हो रहे हैं, और उतना ही वे क्षतिग्रस्त हो सकने के लिए कमजोर भी पड़ रहे हैं। कंप्यूटर सिस्टम की थोड़ी सी गड़बड़ी सारे कार्य को बाधित कर सकती है। यहाँ पर कंप्यूटरों की उत्तम देखभाल की आवश्यकता है, परंतु उससे भी अधिक सुरक्षा की आवश्यकता उन्हें तोड़-फोड़ करने वालों से बचाये रखने की है। ये तोड़-फोड़ करने वाले हथियार नहीं रखते। इनका हथियार तो इनका कंप्यूटर संबंधी ज्ञान ही है। एक असन्तुष्ट कर्मचारी कंप्यूटर के काम को बिना किसी जोर-जबरदस्ती के आसानी से छिन्न-भिन्न कर सकता है। उसकी एक अत्यंत घातक विधि है प्रोग्राम के अंदर एक टाइम बम को छुपा देना। इसमें सामान्य तौर पर कंप्यूटर बिल्कुल ठीक काम करता है, परंतु डाटा के आँकड़ों की एक विशेष स्थिति में पहुँचते ही, या किसी भविष्य की निश्चित तारीख को सारे डेटा को चीर-फाड़ कर नष्ट कर डालता है। यह कार्य किसने किया उसका पता लगाना बहुत मुश्किल हो सकता है क्योंकि विनाश करने वाला कर्मचारी तब तक नौकरी छोड़ कर कहीं दूर जा चुका होता है। इस विनाश से दुबारा काम की स्थिति में आना बहुत महँगा पड़ सकता है।

कंप्यूटर वाइरस

कंप्यूटर वाइरस भी एक प्रकार के विनाशकारी प्रोग्राम होते हैं जो आपके डेटा व प्रोग्रामों को बिना आपकी अनुमति के आपके कंप्यूटर में घुस कर कुछ भी नुकसान पहुँचा सकते हैं। एक बार कंप्यूटर में घुसने के बाद ये अपनी स्थिति सुदृढ़ बना लेते हैं, और फिर संक्रामक रोग की तरह फैलना प्रारम्भ कर देते हैं। ये किसी भी अछूती फ्लॉपी डिस्क या हार्ड डिस्क के सम्पर्क में आते ही उसमें घुस जाते हैं। बाद में उसे वाइरस वाली फ्लापी डिस्क को यदि किसी दूसरे कंप्यूटर पर चलाने का प्रयास किया जाए तो उसे उसकी हार्ड डिस्क में घुस कर बैठ जाते हैं, और संक्रामक रोग की तरह यह बीमारी फैलती रहती है। वाइरस की पहचान व उससे छुटकारा पाना बहुत महँगा पड़ सकता है। अभी हाल 1999 के अप्रैल के महीने में CIH वाइरस ने विश्व भर में उत्पात मचाया था। एक अनुमान के अनुसार इसने कोई बीस लाख कंप्यूटरों के डेटा उड़ा डाले। अतः इनसे बचाव रखना ही बुद्धिमानी है। वाइरस के प्रोग्राम उन लोगों द्वारा लिखे जाते हैं जो कंप्यूटर के प्रोग्राम लिखने में अत्यंत कुशल हैं और जिन्हें दूसरों को क्षति पहुँचाने में आनन्द का अनुभव होता है । अब तक सैकड़ों प्रकार के वाइरस पहचाने जा चुके हैं। Stone virus, “Dark Avenger", वाइरस प्रोग्रामों के कुछ उदाहरण हैं।

कंप्यूटर वाइरस की खोज व निवारण
वाइरस के कंप्यूटर में प्रवेश का आपको पता चल भी सकता है और नहीं भी। यदि आपकी डिस्क बहुत जल्दी भरने लगे, या कंप्यूटर की कार्य-गति धीमी पड़ जाए, या मॉनीटर के पटल पर विचित्र प्रदर्शन होने लगें, तो आप वाइरस का संदेह कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में आप वाइरस की खोज निकालने वाले प्रोग्रामों द्वारा अपनी पूरी हार्ड डिस्क व फ्लॉपी डिस्कों की जाँच कर सकते हैं। ऐसे प्रोग्राम VIRUS SCAN आदि नाम से McAfee Associates, USA द्वारा बनाये गये हैं। वाइरस का पता चलने पर ये प्रोग्राम उनका निवारण भी कर सकते हैं। भारत में भी ऐसे प्रोग्राम कुछ कम्पनियों द्वारा बनाये जाते हैं, पर सभी प्रोग्रामों में एक समस्या तो बनी ही रहती है कि रोज नये वाइरस बनाये जा रहे हैं। इसलिये वाइरस को ढूँढने व निकालने के प्रोग्रामों के थोड़े-थोड़े समय के अन्तराल के बाद नये संस्करण लेना आवश्यक है। अब अनेक प्रकार के हार्डवेयर भी मिलने लगे हैं जिन्हें लगा कर आप वाइरस के प्रवेश पर रोक लगा सकते हैं।
  • वाइरस विनाशकारी प्रोग्राम होते हैं जो कि आपकी अनुमति के बिना ही आपके कंप्यूटर में प्रवेश करके आपके प्रोग्रामों व डेटा को बहुत क्षति पहुँचा सकते हैं।
  • वाइरस के प्रोग्राम उन व्यक्तियों द्वारा लिखे जाते हैं जिन्हें कंप्यूटर का बहुत विस्तृत ज्ञान होता है और जो अपने ज्ञान का उपयोग दूसरों को क्षति पहुँचाने के लिये करते हैं।
  • वाइरस से बचे रहना ही बुद्धिमानी है।
  • अपने डेटा का समुचित बैक-अप रखने से आप सुरक्षित रह सकते हैं।
  • वाइरसों की पहचान व निवारण के लिये अनेक प्रोग्राम मिलते हैं।

कंप्यूटर से जुड़े विशेषज्ञ और अन्य व्यक्ति

कंप्यूटर सिस्टम से जुड़े हुए व्यक्तियों को सामूहिक रूप से Humanware या Liveware कहते हैं । कंप्यूटर के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों ही बुद्धिमान व्यक्तियों द्वारा डिजाइन व संचालित किये जाते हैं इसलिए इस प्रकार के व्यक्तियों को Brainware भी कहते हैं ।
कंप्यूटर सिस्टम को चलाने, इसके विकास और रख-रखाव आदि के लिए निम्न विशेषज्ञों और कर्मचारियों की जरूरत होती है-
  1. ऑपरेटर
  2. प्रोग्रामर
  3. सिस्टम एनालिस्ट
  4. सॉफ्टवेयर इंजीनियर
  5. मेन्टीनेन्स इंजीनियर

  1. ऑपरेटर - कंप्यूटर के हार्डवेयर के विभिन्न भागों को चलाने वाले व्यक्तियों को कंप्यूटर ऑपरेटर कहते हैं। ऑपरेटर का मुख्य काम सभी तरह के प्रोग्रामों को कंप्यूटर पर चलाकर परिणाम मालूम करना होता है । हार्डवेयर के किसी हिस्से के ठीक काम न करने पर ऑपरेटर द्वारा मेन्टीनेन्स इंजीनियर को सूचित किया जाता है।
  2. प्रोग्रामर - प्रोग्रामर का मुख्य काम प्रोग्राम लिखना या दूसरे व्यक्तियों द्वारा बनाये गये प्रोग्रामों को चेक करना या उन्हें ठीक करने का होता है। छोटे आर्गेनाइजेशन में यही व्यक्ति ऑपरेटर और कीपंचर या की-बोर्ड ऑपरेटर का काम भी करता है।
  3. सिस्टम एनालिस्ट - अनुभवी प्रोग्रामर ही बाद में सिस्टम एनालिस्ट बन जाते हैं । सिस्टम एनालिस्ट का काम मुख्यतः एक पूरे सिसटम को कंप्यूटराइज करना होता है। वह एक सिस्टम से जुड़े सारे व्यक्तियों की जरूरतों को समझकर उस कंपनी या सिस्टम से संबंधित सॉफ्टवेयर को विकसित करता है और सॉफ्टवेयर को बनाने के लिए अपनी सेवाएँ या सलाह देता है।
  4. सॉफ्टवेयर इंजीनियर - इसका कार्य किसी सॉफ्टवेयर बनाने वाली फर्म के लिए तरह-तरह की भाषाओं, ऑपरेटिंग सिस्टम, एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर आदि को विकसित करने का होता है। यह व्यक्ति सिस्टम एनालिस्ट को बहुत ही उपयोगी/कठिन क्षेत्रों में अपनी सलाह देता है।
  5. मेन्टीनेन्स इंजीनियर - यह व्यक्ति कम्प्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक्स का विशेषज्ञ होता है और इस पर कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक यंत्रों के रख-रखाव की जिम्मेदारी होती है। कंप्यूटर सिस्टम के अलावा यह कंप्यूटर से संबंधित दूसरी वस्तुओं जैसे, यू.पी.एस. (Uninterupted Power Supply), प्रिंटर, वोल्टेज स्टेबलाइजर, इलेक्ट्रिक सप्लाई आदि के रख-रखाव की व्यवस्था भी करता है।

कंप्यूटर से संबंधित पारिभाषिक शब्दावली

  • Access : समीप में पहुँचना, वांछित डेटा तक पहुँचना।
  • Application Software : वे प्रोग्राम जिनके द्वारा कंप्यूटर पर उपयोगी कार्य किए जा सकते हैं। सामान्यतया ये फ्लॉपी डिस्कों अथवा सीडी रोम पर वितरित किये जाते हैं । इन्हें पहले हार्ड डिस्क पर स्थापित करना होता है।
  • Attribute (A, R, H, S) : वह सूचना जिसके द्वारा यह जाना जाता. है कि कोई फाइल गुप्त है, या केवल पढ़े जाने के लिये है, या वह सिस्टम फाइल है, और क्या उसमें बैक-अप के पश्चात् कोई संशोधन हुआ है।
  • Backup : सुरक्षा के लिए किसी भी प्रोग्राम या डेटा की प्रतिलिपि बना कर रखना।
  • Binary : केवल दो अंकों, अर्थात् 0 व 1 के द्वारा गणना करने की प्रणाली ।
  • BIOS : कंप्यूटर को प्रारम्भ करने का प्रोग्राम । यह Basic Input Output System का संक्षिप्त रूप है।
  • Bit : यह शब्द binary digit को संक्षिप्त करके बनाया गया है। एक बिट 0 या 1 हो सकता है, जो कि विद्युत सर्किट के ऑन या ऑफ होने की अवस्था दर्शाता है।
  • Boot : कंप्यूटर को प्रारंभ करने की क्रिया। बूट-डिस्क द्वारा आप अपने कंप्यूटर को चालू करके कार्य प्रारम्भ कर सकते हैं।
  • Browse : डाइरेक्टरियों (फोल्डरों) और फाइलों की सूचियों के बीच झाँकना। किसी बातचीत के बक्से में browse बटन को दबाने पर डाइरेक्टरियों व फाइलों की सूची दिखाई देने लगती है जिसमें से वांछित फाइल का चयन किया जा सकता है।
  • Bug : कंप्यूटर के प्रोग्राम में त्रुटि। इनके निवारण को debuggng कहा जाता है।
  • Buffer : कंप्यूटर स्मृति में पाठ्य सामग्री (text) को तब तक संचित करके रखने का स्थान जब तक कि कंप्यूटर कुछ और कार्य करने के लिए तैयार नहीं हो जाता।
  • Bus : विद्युत संकेतों को लाने-ले जाने वाला तारों का समूह।
  • Byte : आठ बिटों (bits) का एक समूह। एक बाइट द्वारा बाइनरी प्रणाली में 256 अंक (शून्य से लेकर 255 तक) गिना जा सकता है।
  • Cache : सूचना के भंडारण की एक युक्ति जिसमें सूचना अंकित करने व अंकित सूचना को पढ़ने का कार्य बहुत द्रुत गति से किया जा सकता है।
  • Click : माउस के बटन को एक बार दबा कर जल्दी से छोड़ने की क्रिया।
  • Clipart : प्रकाशन, प्रस्तुतिकरण या अन्य कार्यों के लिये उपयोग में लिये जा सकने वाले चित्रों का संग्रह, जिनके उपयोग में कॉपीराइट की कोई समस्या नहीं होती।
  • Clipboard : अस्थाई स्मृति में कुछ याद रख सकने का क्षेत्र। इसमें किसी पाठ्य या चित्र की प्रतिलिपि काट (cut) कर संचित रखी जा सकती है और उसे फिर किसी भी अन्य उपयोगी प्रोग्राम (application) में कितनी भी बार चिपकाया (paste) जा सकता है।
  • Clock : कंप्यूटर में समय के क्रम की व्यवस्था बनाए की युक्ति। समय गलत न हो जाये इसलिये इसके लिये एक बैटरी अलग से कंप्यूटर में लगी होती है।
  • Command Button : बातचीत के बक्से के बटन जैसे कि OK या Cancel बटन जिन पर क्लिक करके प्रक्रिया की जा सकती है। यदि किसी बटन के आगे तीन बिन्दु हों जैसे कि Browse.... में, तो उसे क्लिक करने पर एक और बातचीत का बक्सा खुल जायेगा।
  • Compatibility : किसी दूसरे प्रकार के हार्डवेयर या सॉफ्टवेयर को आपके कंप्यूटर पर चलाए जा सकने की क्षमता है।
  • Compiler : उच्चस्तरीय भाषा में लिखे गये प्रोग्राम को मशीनी भाषा में परिणत करने वाला प्रोग्राम।
  • Comprocessor : माइक्रोप्रोसेसर की सहायता करने वाला प्रोसेसर। CPU : Central processing Unit जिसे माइक्रोप्रोसेसर भी कहते है।
  • Crash : किसी हार्डवेयर या सॉफ्टवेयर के फेल हो जाने पर कंप्यूटर का अचानक कार्य करना बन्द कर देना।
  • Cursor : मॉनीटर के पटल पर एक टिमटिमाती रेखा, जो यह दर्शाती है कि आपके द्वारा की-बोर्ड पर टाइप किया जाने वाला अक्षर पटल पर कहाँ दृष्टिगोचर होगा।
  • Cylinder : डिस्क पर वे सारे ट्रैक जिन्हें एक साथ पढ़ा जा सकता है।
  • Data : कंप्यूटर के लिए उपयोगी सूचना। इसमें पाठ्य (text) के अतिरिक्त आँकड़े, चित्र व ध्वनि भी हो सकती हैं।
  • Daughter Board : कंप्यूटर के मदरबोर्ड पर उपलब्ध सॉकेटों में लगाया जा सकने वाला प्रिन्टेड सर्किट बोर्ड। इसका उपयोग कंप्यूटर की क्षमता को बढ़ाने के लिये किया जाता है।
  • Database : सुव्यवस्थित प्रकार से भंडारित सूचना।
  • Debug : प्रोग्राम या सॉफ्टवेयर में त्रुटियों (bugs) का समाधान करना।
  • Default Button : किसी बातचीत के बक्से में जिस बटन का चयन विन्डोज ने पहले से ही कर रखा हो ।
  • Default Data : सॉफ्टवेयर द्वारा पहले से निर्धारित सूचना, अंक या माप।
  • Defragmentation : डिस्क पर बिखरी फाइलों को एक साथ एकत्रित करके अंकित करने की क्रिया ताकि बीच-बीच में व्यर्थ घिरा हुआ स्थान रिक्त करके उपयोग में लिया जा सके।
  • Desktop : मॉनीटर का पटल का पार्श्व जिस पर विन्डोज की आइकने व बातचीत के बक्से दिखलाई देते हैं।
  • Device : कंप्यूटर के साथ उपयोग में ली जाने वाली युक्ति। किसी प्रकार का कार्य करने की कोई युक्ति।
  • Device Driver : एक प्रोग्राम जो किसी युक्ति (जैसे कि प्रिन्टर) का विन्डोज के साथ संबन्ध जोड़ता है। सामान्यतया इनका उपनाम dev होता है ।
  • Dialog Box : पटल पर दिखाई देने वाली एक अस्थाई खिड़की में बातचीत का बक्सा, जो या तो कुछ अतिरिक्त सूचना माँगता है, या प्रदर्शित करता है। अनेक बक्सों में विकल्प के बटन भी होते हैं जिन्हें माउस से क्लिक किया जा सकता है।
  • Directory : डिस्क पर संचित सूचना का एक विशेष अंग। इसमें समस्त संचित सूचनाओं की विशिष्ट जानकारी होती है जिसके द्वारा कंप्यूटर किसी भी फाइल को तुरन्त ढूँढ कर उपयोग में ले सकता है।
  • Digitizer : कंप्यूटर के साथ काम में ली जाने वाली वह युक्ति जो कि कंप्यूटर को भेजे जाने वाले विद्युत् संकेतों को कंप्यूटर की समझ में आ सकने वाली सांख्यिकी (digital) संकेतों में बदल देती है।
  • Disk : कंप्यूटर में सूचना को स्थायी रूप में संचित रखने का माध्यम। ये तीन प्रकार की होती है-5.25" की फ्लॉपी डिस्कें, 3.5" की डिस्केटें, व हार्ड डिस्क।
  • Diskette : फ्लॉपी डिस्क का दूसरा नाम।
  • Display : प्रदर्शन। कोई भी वस्तु दर्शाने का उपकरण। कंप्यूटर में इस शब्द का उपयोग मॉनीटर या उसके पटल के लिए किया जाता है।
  • DOS : Disk Operating System का संक्षिप्त रूप है। वह प्रोग्राम जो उपभोक्ता व कंप्यूटर की मशीन के बीच परस्पर का सम्बन्ध स्थापित करने की क्षमता देता है।
  • Double Click : किसी प्रोग्राम को चलाने के लिये माउस के बटन को दो बार जल्दी-जल्दी क्लिक करना।
  • Downloaded Fonts : वे फॉन्टें जिन्हें मुद्रण करने के पहले प्रिन्टर की स्मृति में संचित करने के लिये भेजा जाता है।
  • Drag : माउस के बटन को दबाये रख कर माउस के द्वारा पटल पर की किसी आकृति को सरकाने की क्रिया।
  • DTP : Desk Top Publishing का संक्षिप्त रूप। ये प्रोग्राम पुस्तकें अथवा विज्ञापन आदि को तैयार करने के लिये उपयोग किये जाते हैं।
  • Editor : पाठ्य अथवा ग्राफिक्स का अवलोकन करने व उसमें फेर-बदल करने की सुविधा देने वाला प्रोग्राम।
  • E-mail : Electronic mail का संक्षिप्त रूप। कंप्यूटरों द्वारा भेजी जाने वाली या प्राप्त की जाने वाली डाक।
  • Extension : फाइल का उपनाम जो कि बिन्दु (.) के बाद लिखा जाता है और जिसमें अधिक से अधिक तीन अक्षर हो सकते हैं। सामान्यतया यह उस फाइल को बनाने वाले प्रोग्राम का द्योतक होता है।
  • File : डिस्क पर संचित सूचना के एक खण्ड का नाम। एक फाइल में पाठ्य (text), चित्र या बाइनरी प्रणाली में सूचना हो सकती है।
  • Font : किसी विशिष्ट आकार-प्रकार में लिखे गये एक भाषा की वर्णमाला के अक्षर। वैसे अब केवल चिह्नों वाली फॉन्टें भी मिलने लगी हैं जैसे कि Dingbats या Wingding फॉन्टें।
  • Folder : जिस डॉस में डाइरेक्टरी कहा जाता है, विन्डोज में उसे फोल्डर कहते हैं। डॉस की भांति ही एक फोल्डर में अनेक फाइलें व फोल्डर हो सकते हैं। इस फोल्डरों को संबोधित करने की वंशावली पर आधारित प्रणाली भी डॉस के जैसी होती है।
  • Footer : किसी ग्रन्थ में हर पृष्ठ पर नीचे की ओर लिखा जाने वाला पाठ्य।
  • Format : किसी डिस्क को सूचना रिकार्ड कर सकने के लिए तैयार करने की क्रिया सभी प्रकार की डिस्कों को कुछ भी रिकार्ड करने के पहले। फॉर्मेट करना पड़ता है।
  • Hard Disk : कंप्यूटर के अन्दर स्थायी रूप से लगी डिस्क, जिसमें सूचना के भंडारण की क्षमता बहुत अधिक होती है। इसके अतिरिक्त वांछित सूचना को ढूँढने या नई सूचना को रिकार्ड करने में भी यह बहुत तेजी से काम करती है।
  • Hardware : कंप्यूटर के वे कल-पुर्जे जिन्हें आप छूकर देख सकते हैं उदाहरणार्थ-मदरबोर्ड, मॉनीटर, की-बोर्ड, प्रिन्टर, मोडेम आदि। फ्लॉपी डिस्क भी स्वयं में एक हार्डवेयर ही है, परन्तु उसमें अंकित जानकारी सॉफ्टवेयर है।
  • Header : किसी ग्रन्थ के हर पृष्ठ पर सबसे ऊपर लिखा जाने वाला पाठ्य ।
  • Icon : किसी ड्राइव, डाइरेक्टरी, समूह, उपयोगी प्रोग्राम या दस्तावेज को पटल पर दर्शाने वाला एक लघुचित्र। इस चित्र से उस प्रोग्राम का आभास हो जाता है, और इस पर माउस द्वारा डबल-क्लिक करने से वह प्रोग्राम या क्रिया चालू हो जाती है।
  • Label : किसी डिस्क पर पहचान के लिये दिया जाने वाला नाम या अंक या दोनों का समूह।
  • LAN : Local Area Network का संक्षिप्त रूप ।
  • Local Printer : स्थानीय प्रिन्टर। वह प्रिन्टर जिसे कंप्यूटर के साथ सीधे ही संलग्न किया गया हो ।
  • Memory : स्मृति जिसमें किसी भी प्रकार की सूचना (पाठ्य अथवा चित्र) संचित किया जा सकता है, और जहाँ से आवश्यकता पड़ने पर उसे वापस भी लिया जा सकता है ।
  • MIDI : Musical Instruments Digital Interface of Fif2167 रूप है। इसके द्वारा आप कंप्यूटर पर प्यानो के कीबोर्ड जैसे कीबोर्ड को संलग्न करके कंप्यूटर पर संगीत बजा सकते हैं, उसमें अनेक प्रकार के संशोधन कर सकते हैं, और रिकार्डिंग भी कर सकते हैं।
  • MODEM : MOdulator-DEModulator के संक्षिप्तीकरण से बना एक शब्द। यह यन्त्र कंप्यूटर जनित डिजिटल प्रकार के विद्युत्-संकेतों को परिवर्तित करके उन्हें टेलीफोन की लाइनों द्वारा दूर भेजे जा सकने योग्य बना देता है, और उसी प्रकार के टेलीफोन लाइनों से आने वाले विद्युत-संकेतों को कंप्यूटर के उपयोग के लिये अनुरूप डिजिटल विद्युत-संकेतों में बदल कर कंप्यूटर को दे दिया है।
  • Monitor : कंप्यूटर के संदेश दिखाने वाला यंत्र। ये दो प्रकार के होते हैं, सादा और रंगीन। रंगीन प्रकार के मॉनीटर या तो RGB (Red Green Blue) संकेतों पर काम करने वाले होते हैं, और या संयुक्त (composite) संकेतों पर काम करने वाले होते हैं।
  • Motherboard : एक बड़ा प्रिन्टेड सर्किट बोर्ड जिस पर कंप्यूटर के मुख्य इलेक्ट्रॉनिक सर्किट बना होता है। सामान्यतया यह सिस्टम यूनिट के अंदर फंदे पर लगा होता है।
  • Mouse : कंप्यूटर से संपर्क करने की युक्ति जिसे मेज पर रख कर हाथ से चला कर उपयोग में लिया जाता है। इसके सरकने के साथ मॉनीटर पर दिख रहा माउस का कर्सर भी उसी के अनुरूप मॉनीटर के पटल पर सरकता जाता है।
  • OCR : Optical Character Recognition का संक्षिप्त रूप। मशीन द्वारा लिखे या छपे अक्षरों को पहचानना ।
  • Operating System : वह प्रोग्राम जो मनुष्य व कंप्यूटर का परस्पर संपर्क स्थापित करता है, और कंप्यूटर का संचालन करता है।
  • Optical Disk : लेजर किरणों के प्रयोग से बहुत अधिक मात्रा में सूचना भंडारण करने की क्षमता।
  • Pentium : 80486 के बाद का 64-Bit का माइक्रोप्रोसेसर।
  • Pixel : कंप्यूटर के मॉनीटर के पटल पर का एक बिन्दु। कंप्यूटर के पटल पर प्रदर्शन की स्पष्टता (resolution) इन बिन्दुओं की संख्या पर निर्भर करती है। उदाहरणार्थ, यदि एक पटल पर आड़ी लाइन में 500 और खड़ी लाइन में 200 पिक्सलें हैं तो कुल मिला कर चित्र खींचने के लिये 500x300 = 150,000 पिक्सलें हुई।
  • Printer : कंप्यूटर जनित संदेशों को मुद्रित करने का यंत्र। ये कई प्रकार के होते हैं, जैसे कि डॉट-मैट्रिक्स प्रिन्टर, लेजर प्रिन्टर, डेजी व्हील प्रिन्टर, व इंक जैट प्रिन्टर।
  • Printer Driver : कंप्यूटर द्वारा जनित संदेशों को प्रिन्टर की समझ में आने वाले संकेतों में परिणत करने वाला प्रोग्राम।
  • PRN : डॉस में पहले पैरेलल पोर्ट को संकेत करने का शब्द। इसे LPTI भी कहते हैं।
  • Prompt : उकसाना। मॉनीटर के पटल पर दिखाई देने वाला वह विशेष चिह्न (>) जो आपको कंप्यूटर के लिये अगला आदेश देने का आवाहन करता है। डॉस में इसे डॉस प्रॉम्प्ट कहा जाता है।
  • RAM : Random Access Memory का संक्षिप्त रूप। यह एक अस्थायी प्रकार की स्मृति होती है जिसे कंप्यूटर गणनाओं के लिए एक स्लेट की भांति प्रयोग करता है।
  • Reset Button : कंप्यूटर में लगा बटन जिसके द्वारा बिना कंप्यूटर को बन्द किये ही दुबारा से बूट किया जा सकता है। इसका प्रयोग Ctrl + Alt + Del के काम न करने की अवस्था में किया जाता है ।
  • RGB : एक विशेष प्रकार का रंगीन मॉनीटर जिसके CRT में तीन रंगों (Red, Green व Blue) के लिए अलग-अलग guns बनी होती हैं। ये महँगे होते हैं पर ये रंगीन चित्रों को बहुत स्पष्ट दिखाते हैं।
  • ROM : Read Only Memory का संक्षिप्त रूप। यह एक स्थायी प्रकार की इलेक्ट्रॉनिक स्मृति होती है। इसमें अंकित सूचना को पढ़ा तो कई बार जा सकता है पर बदला नहीं जा सकता। कंप्यूटर का BIOS प्रोग्राम इसी प्रकार की स्मृति में अंकित होता है।
  • Save : कंप्यूटर के अस्थायी स्मृति से स्थायी स्मृति (जैसे कि फ्लॉपी डिस्क) में सूचना के संचय करने की क्रिया।
  • Screen Saver : वह प्रोग्राम जिसके द्वारा कुछ समय तक कोई कुंजी या माउस के प्रयोग न करने पर पटल पर एक हिलने-डुलने वाला दृश्य दिखाई देने लगता है। एक स्थाई चित्र पटल पर स्थाई रूप से रच सकता है, और यह प्रोग्राम ऐसी क्षति से मॉनीटर को बचाये रखता है।
  • Scroll : पटल के दृश्य को ऊपर-नीचे या इधर-उधर सरकाने की क्रिया ताकि जो भाग नहीं दिख रहा है उसे भी देखा जा सके।
  • Serial : कम्प्यूटर-जनित सूचना के बिटों को एक-के-बाद-एक करके भेजने की प्रणाली।
  • Serial Port : कंप्यूटर के पीछे लगा वह सॉकेट जिसमें माउस, मोडेम, जॉयस्टिक, सीरियल प्रिन्टर आदि अनेक प्रकार की युक्तियाँ लगाई जा सकती है, और उपयोग में ली जा सकती हैं।
  • Server : वह कंप्यूटर जो अन्य कंप्यूटरों को किसी प्रकार की सेवा प्रदान करता है, जैसे कि इन्टरनेट सेवा प्रदान करने वाले का कंप्यूटर।
  • Software : कंप्यूटरों पर प्रयोग के लिए प्रोग्रामों का संग्रह। सामान्यतया ये फ्लॉपी डिस्कों पर रिकार्ड करके वितरित किए जाते हैं।
  • Terminal : दूर स्थित कंप्यूटर से संपर्क करने का संयन्त्र।
  • Touch Screen : एक विशेष प्रकार का मॉनीटर जिसके पटल पर प्रदर्शित आइकनों या विकल्पों को छूने मात्र से वह क्रिया चालू हो जाती है।
  • Unix : मिनि व मेन-फ्रेम कंप्यूटरों का ऑपरेटिंग सिस्टम, जिसमें एक ही कंप्यूटर पर अनेक व्यक्ति एक साथ काम कर सकते हैं।
  • USB : Universal Serial Bus का संक्षिप्त रूप। जिन कंप्यूटरों में ऐसी बस होती है उनमें बाहर से युक्तियाँ जोड़ना बहुत आसान होता है।
  • User : कंप्यूटर का उपयोग करने वाला अर्थात् उपभोक्ता।
  • VGA : Video Graphics Array का संक्षिप्त रूप। इस कार्ड से मॉनीटर का रिजॉल्यूशन बहुत अधिक हो जाता है।
  • Write Protect : किसी डिस्क पर अकस्मात कोई अनचाही चीज रिकार्ड होने से सुरक्षित रखने की युक्ति।
  • Wizard : एक ऐसा प्रोग्राम जो कठिन कार्य को आसानी से कर सकने के लिये एक कुशल व्यक्ति की तरह आपका मार्गदर्शन करता है।

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