हुमायूं - मुग़ल शासक हुमायूँ का इतिहास | humayun history in hindi

प्रस्तावना

बाबर के चार पुत्र थे हुमायूं कामरान, हिन्दाल एवं मिर्जा अस्करी। निजामुद्दीन हुमायूं का जन्म 6 मार्च, 1508 ई. को काबुल में हुआ था। उसका जन्म उत्सव बड़ी धूमधान से मनाया गया। बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है "जब वह (हुमायूं) पांच-छ: दिन का हो गया, तो मैं चारबाग पहुंचा, जहां उसके जन्म का समारोह मनाया गया।"

हुमायूं का प्रारम्भिक जीवन

हुमायूं का जन्म मार्च, सन 1508 ई. में हुआ था। हुमायूं की माता माहम बेगम सुल्तान हुसेन बैकरा के परिवार से सम्बंधित थी और वह शिया धर्म को मानती थी। जब बाबर से उसकी सन् 1506 ई. में भेंट हुई तब वह उसके रूप-गुण पर इतना मुग्ध हुई कि उसने धर्म-विभेद को महत्व नहीं दिया। माहम शीघ्र ही बाबर की अनन्य प्रेमपात्री सिद्ध हुई। बालक हुमायूं का शैशव इसी स्नेहपूर्ण वातावरण में बीता। बाबर की इच्छा थी कि हुमायूं एक आदर्श शासक बन सके। इस हेतु वह उसको सर्वगुण सम्पन्न बनाने का इच्छुक था। उसने उसकी शिक्षा ले लिए योग्य अध्यापक नियुक्त किये और हुमायूं ने विद्याभ्यास में समुचित उत्साह दर्शाया तथा तुर्की, अरबी और फारसी का ज्ञान प्राप्त कर लिया। उसने फारसी में कविता करने का भी अभ्यास किया। उसे गणित, दर्शन तथा ज्योतिष में विशेष रूचि थी और उसने फलित ज्योतिष में इतना अधिकार प्राप्त कर लिया था कि अनेक अवसरों पर वह अपनी गणना को ही मानकर चलता था, यथा हमीदा बानू से विवाह के समय।
humayun history in hindi
भारत में आने के उपरान्त उसने हिन्दी का भी ज्ञान प्राप्त कर लिया। हुमायूं की शिक्षा में एक दोष यह दिखाई पड़ता है कि उसने इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्र आदि व्यावहारिक विषयों में अभिरूचि नहीं प्राप्त की वरन कल्पना को व्यापक एवं पुष्ट करने वाले मननात्मक विषयों में। संभवतः इसी कारण व्यवहार जगत में वह अधिक सफल नहीं हो सका। विद्याभ्यास के अतिरिक्त उसे सैनिक शिक्षा भी दी गयी। बाबर उसकी गतिविधि में बराबर रूचि लेता रहा क्योंकि यद्यपि उसके अन्य पुत्र भी थे परन्तु हुमायूं ही उसका सर्वाधिक प्रेमभाजन था।

राज्यारोहण के पूर्व का सार्वजनिक जीवन

हुमायूं ने सन् 1520 ई. से सार्वजनिक जीवन में पदार्पण किया और उसे बदख्शां का शासक नियुक्त किया गया। जब बाबर ने भारतीय विजय के लिए अंतिम आक्रमण किया, उस समय हुमायूं भी उसके साथ आया। उसने अफगानों के विरूद्ध अनेक युद्ध किये। पानीपत के युद्ध में वह दक्षिण पार्श्व का नेता था। इसके बाद उसने ग्वालियर के राजा विक्रमादित्य को हराकर आगरे का घेरा डाला और उस पर अधिकार कर लिया। बाबर के वहां आने पर उसने विक्रमादित्य की रानी से प्राप्त कोहिनूर हीरा उसे भेंट किया परन्तु बाबर ने उसे उसी को लौटा दिया। जब बाबर ने अपनी विजय के उपलक्ष में सबको उपहार देना आरंभ किया तब हुमायूं को 3 1/2 लाख रुपया मिला। इसके कुछ समय बाद ही हुमायूं ने जाजमऊ के निकट एकत्रित अफगानों को तितर-बितर किया और सन् 1527 ई. में राणा सांगा के विरूद्ध फिर दक्षिण पार्श्व का नेतृत्व ग्रहण किया।

हुमायूं का बदख्शा में अवस्थान (1527-29 ई.)
हुमायूं को भारत में हिसार फिरोजा और सम्भल की जागीरें देने के बावजूद बाबर ने उसे बदख्शां भेज दिया। सन् 1527 ई. से सन् 1529 तक हुमायूं बदख्शां रहा। परन्तु वह बाबर की मनोकामना के अनुरूप न हो सका। बाबर चाहता था कि हुमायूं या तो स्वयं समरकन्द पर अधिकार कर ले अथवा बाबर द्वारा उस पर आक्रमण के लिए समुचित पृष्ठभूमि तैयार करे। इसके विपरीत वह कलन्दरों और सूफियों की संगति में समय नष्ट करता रहा और वैराग्य तथा संसार के सुखों की निस्सारता के गीत गाने लगा।

हुमायूं का भारत लौटना और रोग-ग्रस्त होना
हैदर मिर्जा दगलात लिखता है कि बाबर ने हुमायूं को इसलिए वापस बुलाया था ताकि उसकी मृत्यु होने पर उत्तराधिकारी निकट रहे। डाक्टर सुकुमार बनर्जी का मत है कि बाबर ने शायद उसे वैराग्य के भूत से मुक्त करने के लिए पास बुलाया था। अर्सकीन और श्रीमती बेवरिज का मत है कि माहम ने गुप्त संदेश भेज कर हुमायूं को वापस बुलाया था क्योंकि उसे प्रधानमंत्री खलीफा के विरोध का पता चल गया था। हुमायूं के कुछ दिन भारतवर्ष में रह लेने के बाद बाबर ने उसे फिर बदख्शां भेजना चाहा परन्तु हुमायूं के अनुरोध पर उसने उसे सम्भल का शासन संभालने को भेजकर मिर्जा सुलेमान को बदख्शां सौप दिया। कुछ समय बाद हुमायूं बीमार पड़ा और कहा जाता है कि जब उसके बचने की कोई आशा नहीं रही तब बाबर ने भग्वान् से प्रार्थना की कि हुमायूं के बदले वह उसका प्राण ले ले। हुमायूं की प्राण-रक्षा सचमुच बाबर की प्रार्थना के कारण और उसके आत्मोत्सर्ग के प्रभाव से हुई या नहीं यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। परन्तु बाबर के समसामयिक लोग इसमें विश्वास करते थे।

हुमायूं का राज्याभिषेक

बाबर की मृत्यु 26 दिसम्बर, 1530 ई. को हुई। उसके तीन दिन पूर्व उसने हुमायूं को बुलाया और प्रधान मंत्री निजामुद्दीन खलीफा तथा अन्य अमीरों की उपस्थिति में उसने हुमायूं को सिंहासन पर बिठाते हुए उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित किया तथा सभी सरदारों को उसे युवराज स्वीकार करने का आदेश दिया। परन्तु इतना होने पर भी बाबर की मृत्यु के बाद हुमायूं तुरंत गद्दी पर बिठाया नहीं गया। इस देरी का कारण प्रधान मंत्री खलीफा का विरोध था। अर्सकीन और श्रीमती बेवरीज का कथन है कि खलीफा बहुत पहले से हुमायूं से असंतुष्ट था और वह उसे राजगद्दी के लिए अनुपयुक्त समझता था। कुछ विद्वानों ने अटकल लगाई है कि शायद हुमायूं की कोमलता, अनुशासन रखने में ढिलाई और राज्य कार्य की ओर विशेष रूचि न दिखाना इस असंतोष के मूल में था।

निजामुद्दीन अहमद ने अपनी पुस्तक तबकात अकबरी में लिखा है कि खलीफा हुमायूं के स्थान पर खानजादा बेगम के पति महदी ख्वाजा को गद्दी देना चाहता था। महदी ख्वाजा प्रायः 20 वर्ष से बाबर की सेना में था। वह एक अनुभवी सैनिक योद्धा था और उसे पानीपत तथा खानुआ के युद्धों में वही सम्मान मिला था जो हुमायूं को। उसकी आयु अधिक होने के कारण उसमें विचारों की प्रौढ़ता तथा शसन की समुचित क्षमता विकसित हो चुकी थी। उसका सामान्य व्यवहार भी दोषरहित था। परन्तु यह षड्यन्त्र बाबर से गुप्त रखा गया। खलीफा को बाद में पता चला कि महदी ख्वाजा उसके प्रति सद्भाव नहीं रखता। अतएव उसे भय हुआ कि उसे राजगद्दी पर बिठाना मृत्यु का वरण करना था। इसलिए खलीफा ने हुमाएं को बुला कर 30 दिसम्बर, 1530 ई. को उसे विधिवत् सम्राट घोषित कर दिया।

हुमायूं की कठिनाइयाँ

बाबर की मृत्यु के समय तक मुगल साम्राज्य की जड़े पूरी तरह जम नहीं पाई थी, क्योंकि बाबर अपने शत्रुओं को पूरी तरह परास्त नहीं कर पाया था। बाबर ने जो राज्य छोड़ा था वह राज्यों का संगठन मात्र था जिनमें एकता का अभाव था। इसके अतिरिक्त हुमायूं के स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति को गद्दी पर बैठाने की योजना ने हुमायूं की मानसिक स्थिति को दुर्बल बना दिया था। हुमायूं की इन कठिनाइयों को हम दो भागों में बांट सकते हैं आंतरिक कठिनाइयां तथा बाहा कठिनाइयां।

आंतरिक कठिनाइयां

मुगल साम्राज्य की विशालता
हुमायूं को उत्तराधिकार में मिला साम्राज्य अत्यन्त ही विशाल था, जिसमें मध्य एशिया के बलख, कुन्दुज और बदख्शां के प्रान्त भी शामिल थे। इस साम्राज्य की दुर्बलता यह थी कि उसे कोई सुदृढ़ आधार प्राप्त नहीं था। क्योंकि बाबर अपने अल्पकालीन शासन के कारण उसे सुसंगठित नहीं कर पाया था। वह साम्राज्य सैनिक शक्ति पर टिका हुआ था और शांतिकाल में इसे बनाये रखना अत्यन्त कठिन था। अनेक दूरस्थ प्रान्तों में तो मुगल शासन केवल नाम मात्र का था। इसके अतिरिक्त भुगल सेना में अफगान, ईरानी, भारतीय, उज्जबेक आदि जातियों के लोग थे जिनके मन में बाबर के प्रति तो श्रद्धा थी, लेकिन हुमायूं के प्रति कोई श्रद्धा नहीं थी। ऐसी स्थिति में विशाल साम्राज्य को बनाये रखने में सेना से पूर्ण सहयोग प्राप्त करना अत्यन्त कठिन था।

रिक्त राजकोष
बाबर की खर्चीली और उदार नीति ने राजकोष रिक्त कर दिया था। इसके अतिरिक्त बाबर अपने संघर्षमय जीवन के कारण धन संचन नहीं कर पाया था। स्वयं बाबर की आर्थिक स्थिति शोचनीय हो गयी थी, जिसके कारण बाबर को अपने उच्च अधिकारियों पर 30 प्रतिशत कर लगाना पड़ा था। फिर भी उसकी आर्थिक दशा शोचनीय बनी रही। अत: हुमायूं को विरासत में रिक्त राजकोष प्राप्त हुआ, जिससे उसकी कठिनाइयां और अधिक बढ़ गई थी। रशबुक विलियम के शब्दों में, “हुमायूं की कठिनाइयों में उसकी आर्थिक स्थिति का बहुत बड़ा हाथ था।"

हुमायूं के भाई
हुमायूं के तीन भाई थे- कामरान जो 17 वर्ष का था, अस्करी 15 वर्ष का और हिन्दाल 12 वर्ष का था। बाबर ने अपनी मृत्यु से पूर्व हुमायूं को सलाह दी थी कि वह ऐसा कार्य न करें जिससे उसके भाइयों को दुःख और कष्ट हो। इतना ही नहीं, बाबर ने हुमायूं को अपने भाइयों में साम्राज्य विभाजन का भी निर्देश दिया था। फलस्वरूप हुमायूं ने अपने भाइयों के प्रति सदैव उदार नीति अपनाई थी। इसके प्रत्युत्तर में हुमायूं के भाई उसकी कठिनाइयों के निवारण में सहायता दे सकते थे, लेकिन उसके भाइयों ने सदैव उसके प्रति विरोधी आचरण अपनाकर उसकी कठिनाइयों में और अहि क वृद्धि कर दी। इसके अतिरिक्त हुमायूं के तीनों भाई अल्पवयस्क थे, इसलिये महत्वाकांक्षी अमीर अपनी महत्वाकांक्षा की तुष्टि के लिये उन तीनों का उपयोग हुमायूं के विरूद्ध बड़ी सरलता से कर सकते थे।

असंगठित शासन व्यवस्था
बाबर अपने अल्पकालीन शासनकाल में शासन-व्यवस्था संगठित न कर पाया था अतः हुमायूं को विरासत में एक असंगठित विशाल राज्य प्राप्त हुआ था। प्रान्तों का प्रबन्ध अत्यन्त ही ढीला था तथा सैनिक जागीरों की व्यवस्था से बड़े बड़े सरदार शक्तिशाली हो गये थे। ये शक्तिशाली सरदार हुमायूं के आदेशानुसार चलने को तैयार नहीं थे, क्योंकि वे हुमायूं को निर्बल और अस्थिर चित्त का भी व्यक्ति समझते थे। बाबर ने एक शासक के रूप में अपनी प्रजा की सुख सुविधा का पूरा ध्यान नहीं रखा। अतः प्रजा, मुगलों को विदेशी आक्रान्ता के रूप में देख रही थी। ऐसी स्थिति में हुमायूं अपनी प्रजा के सहयोग से भी वंचित हो गया। इस प्रकार हुमायूं को न तो अपने सरदारों से सहयोग प्राप्त हो सका और न अपनी प्रजा से।

बाबर के सम्बन्धी
मध्य एशिया के कई वंशों के अमीर बाबर के साथ भारत आकर यहीं बस गये थे और बाबर ने भी उनका सम्मान करते हुए उनसे वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये थे। इनमें खुरासान का मुहम्मद जमाल मिर्जा, मुहम्मद सुल्तान मिर्जा, मीर मोहम्मद मेहदी ख्वाजा और खलीफा मुख्य थे। बाबर इनके प्रति बड़ा दयालु था, अतः वे अपने को बाबर का उत्तराधिकारी समझने लगे थे। हुमायूं की गद्दीनशीनी के समय खुरासान में मिर्जाओं का प्रभाव समाप्त हो गया था, अत: वे भारत में कोई राज्य प्राप्त करने के इच्छुक थे। नयी परिस्थितियों में वे साम्राज्य में अपना विशेष स्थान प्राप्त करने के लिए हुमायूं के समक्ष गंभीर कठिनाइयां उपस्थित कर सकते थे।

बाह्य कठिनाइयां

हुमायूं की गद्दीनशीनी के समय मुगल साम्राज्य की सीमा के निकट निम्नलिखित शक्तियां ऐसी थी जो मुगल साम्राज्य के लिये कभी भी खतरा उत्पन्न कर सकती थी

गुजरात
हुमायूं की गद्दीनशीनी के समय गुजरात पर बहादुरशाह सासन कर रहा था, जो नौजवान एवं महत्वाकांक्षी था। उसने एक शक्तिशाली सेना संगठित कर ली थी और 1531 ई. में उसने मालवा पर आक्रमण कर उसे अपने राज्य में मिला लिया था। उसने आस-पास के असंतुष्ट अमीरों को अपने दरबार में आश्रय प्रदान किया था। मालवा को अपने राज्य में मिलाने के पश्चात् उसके राज्य की सीमाएं मुगल साम्राज्य के निकट पहुंच गई थी। महत्वाकाक्षी बहादुरशाह हुमायूं की आंतरिक कठिनाइयों से लाभ उठा सकता था और हुमायूं के लिये अनेक राजनीतिक समस्याएं उत्पन्न कर सकता था।

अफगान
पानीपत और घाघरा युद्धों में अफगान रूपी सर्प को कुचल अवश्य दिया गया था, लेकिन वह मरा नहीं था। अधिकांश अफगान बिहार में अपनी शक्ति संगठित कर रहे थे। इन अफगानों के प्रमुख दो नेता थे महमूद लोदी और शेरखां । महमूद लोदी ने अपने पूर्वजों की गद्दी पुनः प्राप्त करने की आशा अभी नहीं छोड़ी थी। शेरखां, जो अत्यन्त ही महत्वाकांक्षी था, अफगानों के शक्तिशाली संगठन की सहायता से एक स्वतंत्र राज्य का निर्माण करना चाहता था। इसके अतिरिक्त बिब्बन और बायजीद भी, जो अपने राज्य खो चुके, अपने अपने राज्यों को पुनः प्राप्त करने की ताक में थे। डॉ. एच. एस. श्रीवास्तव के मतानुसार, "इसमें कोई संदेह नहीं कि इस नई परिस्थिति में, जबकि पानीपत का विजेता मर चुका था, उसका पुत्र हुमायूं अभी नौजवान और अनुभवहीन था, जिसे गद्दी पर बैठाने में भी मुगल अमीरों को थोड़ी हिचकिचाहट थी, अफगान पूर्णरूप से लाभ उठाने को तैयार थे। निःसंदेह यह उनके लिये स्वर्ण अवसर था।" वास्तव में शेरखां बिहार में अफगानों का नेतृत्व करने लगा और बाद में हुमायूं के लिये सिरदर्द बन गया था।

बंगाल
बंगाल का शासक नुसरतशाह न केवल अफगानों को सहयोग दे रहा था, बल्कि बाबर के विद्रोही अफगानों को अपने यहां शरण देकर उन्हें अच्छी जागीरें भी प्रदान करवा दी थी। इतना ही नहीं इब्राहीम लोदी की पुत्री से शादी करके मुगलों में भय उत्पन्न कर दिया था। नई परिस्थितियों में वह बिहार के अफगानों की सहयाता से मुगल सत्ता को खतरा उत्पन्न कर सकता था।

सिन्ध और मुल्तान
यद्यपि गुजरात के शासक बहादुरशाह के भय से सिन्ध और मुल्तान के शासक ने बाबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी, किन्तु अब वह हुमायूं की अयोग्यता एवं दुर्बलता का लाभ उठाकर पुनः अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर सकता था और हुमायूं के लिये एक नया सिरदर्द उत्पन्न कर सकता था।

मालवा
गुजरात और राजपूताने के मध्य स्थित होने के कारण मालवा का सामरिक महत्व था और इसीलिये गुजरात और राजपूताने के बीच संघर्ष का मुद्दा बना हुआ था। 1531 ई. में गुजरात के शासक बहादुरशाह ने इसे जीत कर अपने राज्य में मिला लिया था। अतः अब मालवा हुमायूं के लिये कभी भी समस्या बन सकता था।

खानदेश
दिल्ली से दूर होने के कारण खानदेश का उत्तरी भारत की राजनीति में कोई प्रभाव नहीं था, किन्तु यहां के शासक मुहम्मद प्रथम की मां, गुजरात के शासक बहादुरशाह की बहन थी, जिससे उसका महत्व बढ़ गया था। बहादुरशाह से सम्बन्ध होने के कारण हुमायूं के विरोधी बहादुरशाह के अधिक शक्तिशाली होने की संभावना थी।

कश्मीर
पहाड़ों से घिरे होने के कारण तथा सीमान्त प्रदेश होने के कारण कश्मीर का विशेष महत्व था। यद्यपि हुमायूं की गद्दीनशीनी के समय इस राज्य में पारस्परिक संघर्ष चल रहा था, लेकिन हुमायूं की अयोग्यता और कठिनाइयों का लाभ उठाने के लिये वह एकता के सूत्र में बंधकर हुमायूं के लिये गंभीर समस्या उत्पन्न कर सकता था।

राजपूताना
खानवा-युद्ध की पराजय ने राजपूतों में एकता समाप्त कर दी थी। राणा सांगा की मृत्यु के बाद मेवाड़ का शासक बना, लेकिन रानी कर्मवती ने इसका विरोध करते हुए हुमायूं से सहायता मांगी थी। हुमायूं इस घरेलू झगड़े का लाभ न उठा सका, फलस्वरूप वह हमेशा के लिये राजपूतों के सहयोग से वंचित रह गया। राजपूताने में मारवाड़, आमेर, सिरोही आदि महत्वपूर्ण राज्य थे, किन्तु ऐसा कोई शक्तिशाली शासक नहीं था, जो इनमें एकता स्थापित कर सके। यद्यपि हुमायूं को राजपूताने से कोई तात्कालिक भय नहीं था, लेकिन राजपूताने में बहादुरशाह के बढ़ते हुए प्रभाव के कारण हुमायूं के लिये राजपूताना समस्या बन सकता था।
उपर्युक्त परिस्थितियों में एक ऐसे शासक की आवश्यकता थी जो उच्च कोटि का सैनिक हो, जिसे अपने अमीरों व सरदारों का विश्वास प्राप्त हो और जो एक उच्च कोटि का कूटनीतिज्ञ हो। लेकिन हुमायूं में इन योग्यताओं का अभाव था। उसका पालन-पोषण बडे लाड प्यार में हुआ था. अतः उसने कठिन परिस्थितियां कभी देखी ही नहीं थी। उसे युद्ध के प्रति लगाव न होकर आमोद-प्रमोद के प्रति लगाव था। उसमें शीघ्र निर्णय लेकर उसे कार्यान्वित करने की योग्यता नहीं थी। लेनपूल ने लिखा है, "चारित्रिक बल तथा संकल्प शक्ति का उसमें अभाव था। जी-जान से प्रयत्न करना उसकी शक्ति से बाहर था। विजय प्राप्ति के थोड़ी देर बाद ही अपने हरम में जाकर आनन्द से पड़ा रहता था और अपने अमूल्य समय को अफीमची के सपनों की दुनिया में नष्ट करता रहता था, जबकि उधर शत्रुओं का गर्जन उसके द्वार पर सुनाई दे रहा होता था। स्वभाव से दयालू होने के कारण उसे जहां दण्ड देना चाहिये, वहां वह क्षमादान करता था। नम्र स्वभाव व मिलनसार होने के कारण वह नाजुक समय में भी मौज करता नजर आता था, जबकि उस समय उसे युद्ध क्षेत्र में होना चाहिये था।" हुमायूं की इस प्रवृत्ति के कारण वह स्वयं अपना सबसे बड़ा शत्रु और अपने स्वयं के लिये एक समस्या था। अत: उसकी सफलता आरम्भ से ही संदिग्ध थी।

साम्राज्य का विभाजन

अपने शासन के आरम्भ से ही हुमायूं ने अपनी निर्णयहीनता के कारण हानि उठानी आरंभ कर दी। साम्राज्य को अपने भाई और चचेरे भाइयों में विभाजित कर उसने पहली भूल की। अपनी द्वेषी और प्रतिद्वन्द्वी भाइयों पर कड़ा नियंत्रण रखने के बजाय उसने उन्हें अपने राज्य का भागीदार बना दिया। सुलेमान मिर्जा को बदख्शां में स्थायी पद दे दिया गया। हिन्दाल को बदख्शां से लौटने पर मेवात का विस्तृत क्षेत्र जागीर मे दे दिया गया, जिसमें आधुनिक अलवर, गुड़गांव और मथुरा के जिले तथा आगरा का कुछ भाग सम्मिलित था, और एक शक्तिशाली सेना का सरदार बनाकर उसे मेवात की राजधानी अलवर भेज दिया। सम्भल का जिला असकरी के नाम कर दिया गया। यह भी मेवात की तरह घना बसा हुआ विस्तृत प्रदेश था। कामरान को, जो कि खुल्लमखुल्ला विद्रोह कर रहा था, काबुल और कन्धार का स्थायी अधिकारी ही नहीं बना दिया गया बल्कि पंजाब और हिसाक के अपहरण को स्वीकार करके हुमायूं ने अपने पिता के साम्राज्य-संगठन की जड़ काट दी। काबुल, कंधार पार और सिन्ध के क्षेत्र कामरान के अधिकार में चले जाने से सेना के लिए रंगरूटों की भरती का सबसे अच्छा क्षेत्र हाथ से निकल गया। मुगल मध्य एशिया से अपनी सेना में सैनिकों की भरती किया करते थे। कामरान का पंजाब और अफगानिस्तान का वास्तविक शासक बन जाने की स्थिति में हमायं का सम्पर्क मध्य एशिया से ट गया और उसे सिन्ध के पार रंगरूटों की भरती करने से वंचित होना पड़ा। हिसार पर अधिकार करने से कामरान ने पंजाब और दिल्ली के बीच की सदर सड़क पर भी अपना अधिकार सुरक्षित कर लिया। फौजी अधिकारियों को बहुत अधिक मात्रा में भूमि वितरित करने की घातक नीति के दुष्परिणामों को समझने में वह असमर्थ रहा जिसके लिए उसका पिता भी उत्तरदायी था। भाइयों में साम्राज्य को विभाजित करने पर भी मानो उसे संतुष्टि न मिली हो, इसलिए उसने अपने प्रत्येक सरदार की जागीरों में अभिवृद्धि कर दी। इसका परिणाम यह हुआ कि उच्च मुगल अधिकारियों को स्वच्छन्द स्वाधीन होने का प्रोत्साहन मिला और हुमायूं को अत्यन्त बाधाओं का सामना करना पड़ा।

हुमायु का विजय अभियान

कालिंजर का अभियान (1531 ई.)
राज्याभिषेक के पश्चात् छह मास के भीतर हुमायू बुन्देलखण्ड के कालिंजर दुर्ग को घेरने के लिए चल पड़ा। दुर्ग के शासक को अफगानों का शुभचिन्तक समझा जाता था। यह घेरा कुछ महीनों तक पड़ा रहा और अंत में हुमायूं को सुलह करनी पड़ी। उसने राजा से जन-धन की हानि का मुआवजा लिया ताकि शीघ्र ही पूर्व में अफगानों के उपद्रव का सामना करने के लिए वहां से चल दे। कालिंजर का अभियान एक बड़ी भूल थी। राजा को पराजित न किया जा सका और हुमायूं अपने लक्ष्य की पूर्ति में असफल रहा। राजा आसानी से अपनी तरफ मिला लिया जा सकता था और उसको मित्र भी बनाया जा सकता था।

अफगानों के विरूद्ध प्रथम अभियान : चुनार का प्रथम घेरा ( 1532 ई.)
हुमायूं को कालिंजर का घेरा उठाने के लिए बाध्य होना ही पड़ा क्योंकि महमूद लोदी के संचालन में बिहार के अफगान मुगल प्रदेश जौनपुर की ओर बढ़े चले आ रहे थे। इस प्रान्त का गवर्नर जुन्नैद बरलास था जो प्रधानमंत्री खलीफा का छोटा भाई था। जुन्नैद मैदान में न ठहर सका और पीछे हट गया। अफगान लोग बाराबंकी जिले के अन्तर्गत वर्तमान नवाबगंज तक बढ़ आये। हुमायूं और महमूद लोदी की मुठभेड़ दौहरिया में अगस्त 1532 ई. में हुई। अफगान लोग पराजित हुए और भयभीत होकर बिहार की ओर भाग खड़े हुए। इसके बाद हुमायूं ने चुनार का दुर्ग घेर लिया जो शेरखां के आधिपत्य में था। यह घेरा चार मास तक पड़ा रहा (सितम्बर से दिसम्बर 1532 ई), किन्तु दुर्ग-विजय करने के बजाय अंत में हुमायूं ने घेरा उठा लिया और शेरशाह का आत्मसमर्पण स्वीकार कर लिया, जिसके अनुसार शेरखां ने अफगान सैनिकों की एक टुकड़ी अपने लड़के कुतुबखां के संरक्षण में मुगल सम्राट की सेवा में छोड़ दी। हुमायूं फिर आगरा लौट आया और इस प्रकार शेरखां को अपनी शक्ति-साह न की वृद्धि का अवसर मिल गया। यह हुमायूं की तीसरी भूल थी।

समय और धन की बरबादी (1533-34)
यद्यपि गुजरात से, जहां बहादुरशाह निश्चिन्त होकर अपने वैभव के उत्कर्ष में लगा हुआ था, चिन्ताजनक सूचनाएं बराबर आ रही थीं, तो भी हुमायूं अगले डेढ़ वर्ष तक आगरा और दिल्ली में आमोद-प्रमोद में समय नष्ट करता रहा। उसका कोष खाली था, फिर भी राजभोगों पर वह बहुत सा धन व्यय करता। पुरस्कार और सत्कारस्वरूप बहुमूल्य खिलअतों का वितरण अपने सहस्रों राज्याधिकारियों तथा सरदारों में किया करता था। उसने अपना काफी समय और धन दिल्ली में एक बड़ा दुर्ग बनाने की विशाल योजना में नष्ट किया। इस दुर्ग का नाम उसने दीनपनाह' रखा। इस प्रकार उसने बहादुरशाह को सीमा विस्तार और शक्ति-वृद्धि का पर्याप्त अवसर दिया।

मालवा एवं गुजरात के शासकों के साथ संघर्ष (1535-36 ई.)
मालवा मध्य युग में एक महत्त्वपूर्ण भाग समझा जाता था। गुजरात, मेवाड तथा दिल्ली के शासकों के बीच मालवा को लेकर बराबर संघर्ष बना रहता था। बाबर शासक था। बाबर की मृत्यु के पश्चात् सुल्तान महमूद ने राणा सांगा द्वारा अधिकृत स्थानों पर अधिकार करने तथा गुजरात की गद्दी पर बहादुरशाह के भाई चॉदों को बैठाने की योजना बनाई। बहादुरशाह ने इससे लाभ उठा कर मालवा पर आक्रमण किया, तथा 1531 ई. में उसने मालवा को अपने राज्य में मिला लिया। इस तरह हुमायूं के राज्य रोहण के प्रथम वर्ष ही मालवा पर बहादुरशाह का अधिकार हो गया।
हुमायूं के गद्दी पर बैठने के समय गुजरात पर बहादुरशाह शासन करता था, यह एक महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति था उसने दो तुर्की विशेषज्ञों की सहायता से अपना तोपखाना शक्तिशाली तथा मजबूत कर लिया था। उसकी सेना में लगभग 10 हजार विदेशी सैनिक थे। हिन्दुओं के साथ ही उसका व्यवहार अच्छा था, थोड़े ही दिनों में वह जनप्रिय शासक बन गया, उसने निकट के भागों पर अधिकार कर अपनी शक्ति को और बढ़ा लिया
1532 ई. में उसने रायसीन पर अधिकार किया। 1533 ई. में उसने चित्तौड़ पर आक्रमण कर उसे आत्म-समर्पण करने पर विवश किया, किन्तु उसे उसने अपने राज्य में नहीं मिलाया। इस बीच बहादुरशाह ने कई प्रमुख अफगान अमीरों को जो मगलों से असंतष्ट थे अपने दरबार में शरण दी। इनमें आलमखाँ, अलाउद्दीन लोदी, आलमखाँ जिघाट तथा तातार खा प्रमुख थे। मुहम्मद जमान मिर्जा तथा अन्य मुगल अमीर भी हुमायूं से असंतुष्ट होकर इसके दरबार में आये। इस तरह बहादुरशाह का दरबार हुमायूं विरोधी आंदोलन का केन्द्र बन गया। बहादुरशाह की योजना आगरा और दिल्ली पर अधिकार करने की थी। उसने एक महान् योजना बनाई जिसके अनुसार तीन तरफ से मुगल क्षेत्रों पर आक्रमण करने की योजना थी। आलमखाँ लोदी को कालिंजर पर, दूसरी सेना बुरहानुल मुल्क वनियानि के नेतृत्व में दिल्ली पर तथा तीसरी तातार खाँ के नेतृत्व में आगरा पर आक्रमण करने के लिए भेजी गयी, किन्तु इसमें किसी को सफलता न मिली।
हुमायूं ने प्रारम्भ में पत्र व्यवहार के द्वारा गुजरात के साथ सम्बन्ध सुधारने का प्रयत्न किया, किन्तु इसे इसमें सफलता न मिली। इस बीच बहादुरशाह ने नवम्बर, 1534 ई. में चित्तौड़ पर आक्रमण किया। इस समाचार को सुनकर हुमायूं अपनी सेना के साथ आगरा से मालवा की तरफ रवाना हुआ।
हुमायूं ने रायसीन पर बिना किसी कठिनाई के अधिकार कर लिया। यहां वह बजाय इसके चित्तौड़ पर आक्रमण करे कुछ दिन वहीं रूका रहा। और जब तक बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर अधिकार नहीं कर लिया, तब तक वह आगे नहीं बढ़ा। हुमायूं के सारंगपुर रूकने की विद्वानों ने आलोचना की है। बनर्जी ने उसका समर्थन किया है, किन्तु उनके विचार सही नहीं हैं। हुमायूं ने यदि इस समय राजपूतों की सहायता की होती और इन्हें मित्र बना लिया होता तो उसे भविष्य में एक शक्तिशाली मित्र प्राप्त हो जाता।
चित्तौड़ विजय पर बहादुरशाह मन्दसौर आया। हुमायूं भी यहां पहुंच गया था। दोनों की सेनायें एक-दूसरे के सामने आमने खड़ी थी। हुमायूं बहादुरशाह की सेना को घेरे रहा। जिससे शत्रु को आवश्यक सामग्री मिलने में कठिनाई हुई। कदाचित् इस कठिनाई से, या मुगल सेना के भय से बहादुरशाह एक रात्रि कुछ विश्वास पात्र सैनिकों के साथ निकल भागा। उसने जवाहरात, तोपखाना तथा अन्य वस्तुओं को जहां तक संभव हो सका नष्ट कर दिया। रात्रि में हुमायूं को बहादुरशाह के भागने की सूचना मिली। वह अपनी सेना के साथ युद्ध के लिए तैयार रहा। लेकिन उसने बहादुरशाह की भागती सेना पर आक्रमण नहीं किया। दूसरे रोज बहादुरशाह के बचे हुए सैनिक वहां से मांडू की तरफ रवाना हो गये। हुमायूं ने बहादुरशाह का पीछा किया, बहादुरशाह मांडू के दुर्ग में जा छिपा। कुछ दिन हुमायूं उसका घेरा डाले रहा। यहां भी बहादुरशाह हुमायूं के विरूद्ध युद्ध न कर सका और एक रात मांडू से भी निकल भागा। हुमायूं ने मांडू के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। यहां कत्ले आम की आज्ञा दी, जिससे मांडू के बहुत से लोग मारे गये। इस हत्याकाण्ड से गुजराती जनता की दृष्टि में मुगल एक भयंकर आक्रमणकारी माने जाने लगे।
बहादुरशाह मांडू से भाग कर चम्पानेर के दुर्ग में गया। चम्पानेर का दुर्ग गुजरात के शासकों का कोष संचित करने का स्थान था। बहादुरशाह चम्पानेर से भाग कर कैम्बे चला गया। हुमायूं ने बिना चम्पानेर के दुर्ग पर अधिकार किये, बहादुरशाह का पीछा किया। बहादुरशाह के कैम्बे भाग जाने के पश्चात् हुमायूं लौटकर पुनः चम्पानेर आया और उसने चम्पानेर पर अधि कार किया। इस तरह बिना किसी युद्ध के पूरा गुजरात हुमायूं के अधिकार में आ गया।
हुमायूं ने अस्करी को गुजरात का गवर्नर नियुक्त किया और स्वयं मांडू में आकर रहने लगा। इस बीच अस्करी की दावतों तथा मुगलों की शासकी अयोग्यता ने गुजरात में एक मुक्ति आंदोलन आरंभ कर दिया। कुछ महीनों में या कुछ ही दिनों में, एक के बाद एक स्थान से मुगल भगाये जाने लगे। चम्पानेर में तरदीबेग नामक मुगल था। अस्करी ने चम्पानेर पर अधिकार करना चाहा। इस कारण तरदीबेग से उसका संघर्ष हुआ। विवश होकर अस्करी आगरा की तरफ रवाना हुआ। हुमायूं भी इस समाचार से आगरा की तरफ रवाना हुआ, और दोनों भाइयों में मुलाकात हुई।
गुजरात अभियान में विजित स्थानों का वाइसराय हुमायूं ने अपने भाई अस्करी को ही बनाया था। हुमायूं के गुजरात छोड़ने के तीन महीने बाद तक शांति बनी रही। यदि अस्करी ने अच्छे शासक की योग्यता दिखाई होती और मुगल अमीरों को अपने में मिलाकर उसने गुजरात में एक शक्तिशाली शास्न की नींव डाली होती तो मुगल साम्राज्य की रक्षा हो सकती थी। दुर्भाग्यवश अस्करी ने अपना समय दावतों में बरबाद किया और उसी का अमीरों ने भी अनुसरण किया।
अस्करी अपने स्वभाव, व्यवहार तथा योग्यता से न मुगल अमीरों को प्रसन्न कर सका, न गुजरात की जनता को। पर अपने वायसराय के पद को अधिक महत्व देना चाहता था तथा गुजरात के सभी मुगल अमीरों को अपने अधीन समझता था। गुजरात मुक्ति आंदोलन के प्रसार ने सभी मुगल सैनिकों को सतर्क कर दिया। अस्करी तथा हिन्दू बेग हुमायूं के पास मांडू संदेश भेज रहे थे तथा उससे सहायता और निश्चित आदेश चाहते थे। हुमायूं से कोई उत्तर न पाने पर अस्करी को हिन्दू बेग ने सुझाव दिया कि वह अपने नाम से खुतबा पढे, सिक्के चलाये तथा गुजरात का स्वतंत्र शासक बन जाये। अस्करी ने प्रकट रूप में यह विचार अस्वीकार कर दिया। पर उसके मन में इस अभिलाषा ने घर कर लिया जो उसकी एक दावत की घटना से स्पष्ट है जिसमें उसने शराब के नशे में कहा था, कि वह ईश्वर का प्रतिरूप है। इस तरह धीरे-धीरे हुमायूं से स्वतंत्र होने के भाव ने उसके हृदय में स्थान बना लिया था।
गुजरात स्वतंत्रता सेनानियों के विरूद्ध अस्करी ग्यारसपुर में युद्ध करना चाहता था पर यह स्थान उसे असुरक्षित लगा, और उसने हिन्दू बेग की सलाह से चम्पानेर को अपना केन्द्र बनाया। चम्पानेर में तरदी बेग ने उसे रहने का स्थान दिया था, परन्तु जब उसने धन की मांग की तो तरदी बेग ने हुमायूं की स्वीकृति की आवश्यकता बताई। इतना ही नहीं तरदी बेग ने मांडू में उसकी उपस्थिति की सूचना हुमायूं को दी, और बताया कि अस्करी के विचार पवित्र नहीं है। वह आगरा पर अधिकार करना चाहता है। अस्करी को इन परिस्थितियों के दबाव में चम्पानेर छोड़ कर आगरा की ओर प्रस्थान करना पड़ा।
हुमायूं को मालवा में अस्करी की आगरा यात्रा की सूचना मिली। इस स्थिति में वह भी आगरा की ओर रवाना हुआ जिससे वह अस्करी से पूर्व ही आगरा पहुंच जाय। आगरा के रास्ते में चित्तौड़ के निकट अस्करी और हुमायूं की भेंट हुई। दोनों भाइयों में पुनः मित्रता स्थापित हो गयी हुमायूं ने अस्करी तथा उसके अमीरों सभी को क्षमा कर दिया।
अस्करी हुमायूं के पास जाने के बजाय आगरा की तरफ क्यों रवाना हुआ? अबुलफजल तथा कुछ अन्य समकालीन इतिहासकारों का मत है कि अस्करी आगरा पर अधिकार करना चाहता था। उसके मन में जो भी इरादा हो, प्रकट रूप में उसने न खुतबा पढ़ा न अपने नाम से सिक्के चलाये, जैसा बाद में हिन्दाल ने किया। हो सकता है उसका इरादा आगरा में राजस्व धारण करने का था किन्तु उसे समय नहीं मिला। गुजरात के मुगल साम्राज्य से अलग हो जाने में काफी हद तक अस्करी उत्तरदायी था। उसने अपने व्यवहार से मुगल अमीरों को तो असंतुष्ट किया ही उसने गुजराती जनता के मन में मुगलों की अयोग्यता का प्रदर्शन भी कर दिया। विद्रोह होने पर उसका सामना करने की अयोग्यता दिखाकर, उसने गुजरोल में मुगलों को अस्तित्व ही समाप्त कर दिया।
हिन्दु बेग के आश्वासन से शेरखाँ को विश्वास हो गया कि हुमायूं अब कुछ दिन उस पर आक्रमण नहीं करेगा। इसी बीच उसने बंगाल पर आक्रमण कर उस पर अधिकार करने का निश्चय किया। शेरखाँ ने कर न देने का दोष लगाकर बंगाल पर आक्रमण कर दिया। महमूद के लिए शेरखाँ का सामना करना सरल नहीं था। वह भागकर गौड़ में जा छुपा। शेरखाँ की सेना ने नगर की ओर प्रस्थान किया तथा उसके आस-पास के स्थानों पर अधिकार कर लिया।

बंगाल अभियान
जैसे ही हुमायूं को शेरखाँ के अभियान की सूचना मिली, उसने बंगाल पर आक्रमण करने का निश्चय कर लिया। आक्रमण से पहले उसने दिल्ली, आगरा आदि अनेक स्थानों का समुचित प्रबंध किया और हिन्दाल के साथ 27 जुलाई, 1537 ई. को आगरा से रवाना हुआ। उसके साथ उसकी बेगमें तथा साम्राज्य के प्रमुख अमीर रूमीखाँ, तीबग, बैरमखाँ, कासिम हुसैनखाँ, जाहिद बेग, जहाँगीर कुलीबेग इत्यादि थे। अधिकतर अमीर नदी के मार्ग से रवाना हुए किन्तु सेना का मुख्य भाग स्थल मार्ग से चला। हुमायूं कमी जल मार्ग से नाव पर चलता था तथा कभी घोड़े पर स्थल मार्ग से। हुमायूं के आक्रमण की सूचना पाते ही शेरखाँ ने इसका प्रतिवाद किया और कहा कि उसने मुगलों के विरूद्ध कोई कार्य नहीं किया। पर हुमायूं ने इस बात का कोई उत्तर नहीं दिया और आगे बढ़ गया। हुमायूं के अभियान से शेरखाँ चिंतित हुआ। उसने गौड़ के घेरे का प्रयत्न किया तथा वहां ख्वासखों को नियुक्त किया। चुनार के दुर्ग की रक्षा का उत्तरदायित्व उसने अपने पुत्र कुतुबखाँ तथा अन्य अफगानों को सौंपा। शेरखाँ स्वयं भरकुण्डा में अफगान परिवारों के साथ चला गया। बाहर से वह दोनों दुर्गों पर तथा हुमायूं की गतिविधि पर दृष्टि रख सकता था। आगरा से चलकर हुमायूं 1537 ई. में चुनार पहुंचा।

चुनार का दूसरा घेरा
जिस समय हुमायूं चुनार के दुर्ग को घेरे हुए था उसी समय शेरखाँ की रोना गौड़ को घेरे हुए थी। गौड़ में बंगाल के शाराक का राजकोष था। हुगायूं के बंगाल पहुंचने के पूर्व यदि शेरखाँ गौड़ पर अधिकार कर लेता है तो उसे यह कोष, आभूषण तथा यश भी प्राप्त होता, जिससे उसकी शक्ति बढ़ जाती। पर हुमायूं ने अपने अनुभवी अमीरों की सलाह को न मानकर नौजवान अमीरों की सलाह मानी और चुनार पहुंच कर चारों ओर से घेरा डाल दिया। हुमायूं को चुनार पर अधिकार करने में लगभग 6 महीने लगे। इसी बीच शेरखाँ ने गौड़ पर अधिकार कर कोष को सुरक्षित स्थान से हटा दिया तथा कुछ ही दिनों में हुमायूं को पराजित करने में सफल हुआ।
इस दुर्ग पर अधिकार करने का उत्तरदायित्व रूमीखाँ पर डाला गया। रूमीखाँ ने स्वयं दुर्ग का निरीक्षण किया। उसने देखा कि किले के भाग इतने दृढ़ थे कि सफलता मिलना कठिन है। दुर्ग के कमजोर स्थान का पता लगाने के लिए उसने एक अबीसीनियाई दास कुलाकात को बुरी तरह बेतों से मारा। बुरी अवस्था में कुलाकात चुनार के दुर्ग के पास गया और उसने रूमीखाँ के व्यवहार की निन्दा की और अपने सेवायें चुनार के दुर्गपति को अर्पित की। अफगानों ने उसके प्रति सद्भावना दिखलाई उसके घावों की मरहम पट्टी की और दुर्ग की आंतरिक कमजोरियों का ज्ञान हो गया और रूमीखाँ ने अपना कार्य करना शुरू कर दिया। उसकी योजना दुर्ग पर तोपों की सहायता से अधिकार करने की थी। रूमीखाँ ने नौकाओं पर एक मुकबिलकोब या सरकोब तैयार करवाया। यह एक तैरता हुआ तोपखाना था जो काफी ऊँचा था जिससे किले के पास की दीवाल को सरलता से उड़ाया जा सकता था। स्थल मार्ग से भी आक्रमण करने का प्रबंध किया गया था। सम्पूर्ण प्रबंध हो जाने के बाद दोनों पक्षों में भीषण संग्राम हुआ जिसमें अफगानों ने बड़ी वीरता दिखलाई। 700 मुगल मारे गए, रूमीखों के सरकोब का एक भाग टूट गया। उसकी मरम्मत कराने के बाद दूसरे दिन आक्रमण करने का पुनः प्रबंध किया गया। अफगानों ने दुर्ग को बचाना असंभव जानकर दुर्ग को समर्पित कर दिया। दुर्ग के समर्पण के बाद बहुत से अफगान तथा सैनिक बंदी बनाये गए। जौहर के अनुसार 300 तोपचियों के हाथ काट लिए गए जिससे भविष्य में वे अपने अनुभव का पुनः प्रयोग न कर सकें जिसके लिए हुमायूं को आंशिक रूप से उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। अबुल फजल इस हत्या का उत्तरदायित्व मुईद बेग चुगदाई पर डालता है। जौर रूमीखाँ पर उत्तरदायित्व डालता है। विजय के हर्ष में रूमीखाँ को दुर्ग का गवर्नर बनाया गया पर कुशल साथियों ने ईर्ष्यावश जहर देकर मार डाला।

शेरखाँ का रोहतास के दुर्ग पर अधिकार
जिस समय हुमायूं चुनार के किले पर घेरा डाले हुए था, उसी बीच शेरखाँ ने गौड़ दुर्ग के घेरे को ओर भी कठोर कर दिया। बिहार तथा बंगाल के अधिकांश भागों पर उसने अपना अधिकार स्थापित कर लिया। जलालखाँ तथा ख्वासखाँ को गौड़ के घेरे का उत्तरदायित्व सौंप कर शेरखाँ पुनः भस्कुण्डा के निकट पहुंच गया।
शेरखाँ ने इसी बीच अनुभव किया कि भरकुण्डा का दुर्ग उसके तथा अन्य अफगानों के परिवारों को सुरक्षित रखने के लिए काफी नहीं था। गौड़ में प्राप्त धन इत्यादि रखने की भी समस्या थी। इस दृष्टि से रोहतास का दुर्ग बहुत ही उपयुक्त प्रतीत हआ। यद्यपि रोहतास के दुर्ग के राजा से शेरखाँ की मित्रता थी लेकिन उसका ब्राह्मण मंत्री चूणामणि उसका परम मित्र था। जागीर सम्बन्धित संघर्ष के समय शेरखाँ के भाई निजाम ने अपने परिवार के साथ यहीं शरण ली थी। शेरखाँ की प्रार्थना पर और अपनी कठिनाइयों का उल्लेख करने पर चूणामणि ने राजा को शरण देने के लिए प्रार्थना की, जिस पर राजा ने कुछ दिनों के लिए स्वीकृति प्रदान कर दी थी। किन्तु परिवार के पहुंचने पर राजा ने प्रवेश की अनुमति नहीं दी। जिस पर शेरखाँ ने राजा को चेतावनी दी कि यदि हमायूं ने वहां पहुंचकर अफगानों को नष्ट किया तो उसका उत्तरदायित्व आपके ऊपर होगा। किले में शरण देने के लिए रिश्वत के रूप में शेरखाँ ने 6 मन सोना दिया और उसे धमकाया कि यदि उसे दुर्ग न दिया गया तो वह हुमायूं से मिलकर संयुक्त रूप से हमला कर देगा। दूसरी तरफ चूणामणि ने राजा को धमकाया कि यदि मेरा वचन आपने भंग किया तो आत्महत्या कर लूंगा। राजा ने विवश होकर अफगानों को प्रवेश करने दिया। अफगानों को शेरखाँ ने डोलियों में छिपाकर दुर्ग में भेजा तथा शक्ति के बल पर दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार के संकट के समय शरण देने वाले राजा के साथ शेरखाँ ने जो धोखा किया वह उसके चरित्र पर बहुत बड़ा कलंक है।

बनारस विजय तथा शेरखाँ से सन्धि वार्ता
चुनार पर अधिकार करने के बाद हुमायूं ने बनारस पर अधिकार कर लिया, तत्पश्चात् मुगल सेना आगे बढ़कर सोन नदी के तट पर मनेर पहुंची। जौहर के अनुसार उसका इरादा भरकुण्डा के दुर्ग की तरफ जाने का था जहां से शेरखाँ बंगाल तथा बिहार की सेनाओं को नियंत्रित कर रहा था। लेकिन मनेर पहुंच कर हुमायूं ने शेरखाँ से सन्धि करने का विचार किया, जबकि चुनार विजय के बाद अफगानों को पराजित करने का संकल्प करना चाहिए था। जिसके लिए हुमायूं ने काबुल हुसैन तुर्कमान को अपना दूत बनाकर भेजा तथा उसने सन्धि की निम्नलिखित शर्ते रखीं-
  • शेरखाँ मुगलों की सेवा में हाजिर होगा।
  • बंगाल के शासन से प्राप्त राजछत्र तथा अन्य राज्य चिन्ह मुगल सम्राट को देगा।
  • रोहतास तथा बंगाल से अपने अधिकारों को त्याग देगा।
  • चुनार, जीनपुर या जो अन्य जागीर शेरखाँ पसन्द करे उसे प्राप्त होगी।
पर शेरखों जैसे व्यक्ति के लिए इन उपर्युक्त शर्तों को मानना असंभव था। अतः शेरखाँ ने कूटनीति का उत्तर कूटनीति में ही देने का विचार किया, क्योंकि इन शर्तों को स्वीकार करने का अर्थ यह था कि अफगान संगठन नष्ट हो जाय और पूर्ण रूप से मुगलों के आधीन हो जाए। सन्धि की शर्तों को ठुकरा देने पर युद्ध की संभावना थी जिसके लिए शेरखाँ तैयार नहीं था क्योंकि गौड़ में प्राप्त धन को वह हटाना चाहता था। अतः शेरखाँ ने हुमायूं के प्रस्ताव के विरोध में दूसरा प्रस्ताव रखा जिसमें शेरखाँ ने मुगल सम्राट को प्रति वर्ष 10 लाख रुपया, बिहार प्रदेश समर्पित करने का वचन दिया और स्वामिभक्त बने रहने का आश्वासन दिया।
हुमायूं ने शर्तों को मानकर उपहार स्वरूप शेरखाँ के लिए घोड़ा तथा खिलअत भेजा। पर दुर्भाग्यवश हुमायूं को गौड़ के पतन की सूचना मिली। पहले बंगाल के पराजित शासक महमूद ने अपने राजदूत को भेजा फिर स्वयं मुगल सम्राट के पास आया और हमायं से प्रार्थना की कि वह शेरखॉ को पराजित करे जिसमें हम पूर्ण सहयोग प्रदान करेंगे। अतः मुगल सम्राट ने सन्धि को भंग कर दिया क्योंकि शेरखाँ ने न तो अभी तक मुगलों को कोई इलाका ही दिया था और जब मुगल सेना रोहतास पहुंची तो उसे निराश होकर वापस लौटना पड़ा था। इस प्रकार सन्धि को तोड़ने का फल बुरा हुआ। हुमायूं अफगानों के सामने झूठा और कमजोर साबित हुआ और शेरखाँ अधिक समय पाकर अपनी शक्ति का संचय करता रहा पर यह मुगल सम्राट का दुर्भाग्य था कि वह शेरखाँ की इस चाल को समझ न सका और शक्ति संचित करने का उसे अधिक से अधिक मौका दिया।

हुमायूं का बंगाल में प्रवेश
सन्धि वार्ता की विफलता के बाद हुमायूं ने अपनी सेना को बंगाल अभियान के लिए दो भागों में बांटा। सईद बेग, तरदी बेग और जहाँगीर कुली के नेतृत्व में 30,000 अश्वारोहियों का दल आगे-आगे चला। दूसरा दल हुमायूं के नेतृत्व में अग्रणी दल के सात कोस पीछे चला। कुछ सेना जल मार्ग से चली। पटना तक हमायूं उसी मार्ग से गया जहां से गंगा के निकट की ओर हमला करने का सरल मार्ग था। इसी समय हमायूं ने कासिम हुसैन सुल्तान को पटना का गवर्नर नियुक्त किया और मुंगेर की तरफ मुगल सेना को बढ़ने की आज्ञा दे दी जिस समय हुमायूं पटना के निकट था, सईद बेग के जासूसों ने सूचना दी की शेरखाँ रास्ते में मिले हुए सईफ खाँ के परिवार को रोहतास लेकर चला गया दूसरी ओर मुगलों को रोकने का उत्तरदायित्व सईफखाँ ने स्वयं लिया फिर दूसरे दिन मुगल सेना शेरखाँ का पीछा करती हुई आगे बढ़ी पर मार्ग में गूंगारधर पर सईफ खाँ ने तीन भाइयों समेत मुगलों से युद्ध किया जिसमें दोपहर के बाद सभी मारे गये। घायल अवस्था में हुमायूं के सामने सईफ को पेश किया गया। हुमायूं ने उसके बहादुरी और स्वामिभक्ति की प्रशंसा कर छोड़ दिया। पटना से मुंगेर होता हुआ हुमायूं भागलपुर पहुंचा। जहां से बैरमखाँ और जहाँगीर कुली बेग की अध्यक्षता में कलह गांव के निकट गढ़ी पर भेजा, पर सूचना मिली की अफगानों ने सुल्तान महमूद के दोनों पुत्रों को मार डाला है। अतः प्रिय पुत्रों के आघात वश पिता महमूद की भी मृत्यु हो गयी। हुमायूं कहल गांव से लिया गढ़ी पहुंचा। जहां पर शेरखाँ ने 13,000 चुने हुए सैनिकों के साथ अपने बेटे जलालखों को नियुक्त कर रखा था जलाल को यह सख्त आज्ञा थी कि जब तक कोष रोहतास न चला जाये वह मुगल सेनाओं को रोके रहे। ख्यासखाँ, जलालखाँ का सहायक था। जलाल ने दर्रे की चोटियों के चारों ओर तोपें लगा रखीं थी जिससे आती हुई मुगल सेना का डटकर सामना किया जा सके।
मुगलों ने तेलियागढ़ी के कुछ दूर पर अपना पड़ाव डाला और अफगानों को बाहर आने के लिए उत्तेजित करते रहे। जबकि दूसरी ओर शेरखाँ की कठोर आज्ञा घेरे से बाहर न निकलने की थी। जब जलालखाँ मुगलों की घृणित कार्यवाहियों से बहुत परेशान हो गया तब आक्रमण करने का निश्चय कर लिया। जब मुगल सैनिक अपने खेमें में आराम कर रहे थे जलालखाँ ने तोपखाना तथा 6000 घुड़सवारों के साथ (1538 ई. जुलाई-अगस्त) मुगलों पर आक्रमण कर दिया। जिसमें बहुत से मुगल मारे गये और भाग कर कहल गांव में हुमायूं को सूचना दी। उसी समय आंधी और पानी ने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया। मुगलों को एक महीना तक सफलता नहीं मिली। इसी बीच शेरखाँ ने कोष को रोहतास के दुर्ग में पहुंचा दिया और अफगान सेना अपने आप दर्रे से हट गयी। हुमायूं ने बिना किसी कठिनाई के दर्रे पर अधिकार कर लिया जहां बहुत से आदमियों की लाशें पड़ी थी जिसे हुमायू ने दफनवा दिया और प्रबंध के लिए अमीरों को नियुक्त किया और गौड़ का नाम जन्नताबाद कर दिया। जलवायु पसन्द होने के नाते हुमायूं यहां कई महीने निवास करता रहा, जबकि राजधानी की स्थिति बड़ी ही गंभीर थी।

चौसा का युद्ध (1539 ई.)
हुमायूं ने अपनी शक्ति में वृद्धि हेतु कुछ समय पाने के लिए शेख खलील को दूत बनाकर सन्धि के लिये शेरखां के पास भेजा, किन्तु शेरखां ने इन्कार कर दिया। अंत में 26 जून, 1539 ई. को चौसा नामक स्थान पर हुमायूं तथा शेरखां के बीच युद्ध हुआ। युद्ध में हुमायूं ने वीरता का परिचय दिया, किन्तु सैनिकों के पूर्ण सहयोग न देने के कारण परास्त हुआ। असहाय होकर हुमायूं जान बचाने के लिये घोड़े सहित गंगा में कूद पड़ा। इस समय निजाम नामक भिश्ती ने उसकी प्राणरक्षा की। अतः हुमायूं ने उसे दो दिन के लिये हिन्दुस्तान का बादशाह बना दिया। इस पराजय से हमायं की प्रतिष्ठा को गहरी क्षति पहुंची तथा शेरखां का गौरव बढ़ा। हुमायूं बड़ी कठिनाई से आगरा पहुंचा। शेरखां ने हुमायूं की बन्दी बेगमों को बाइज्जत वापस पहुंचा दिया।

बिलग्राम अथवा कन्नौज का युद्ध (1540 ई.)
आगरा पहुंचकर हुमायूं ने अपने भाइयों से सहयोग मांगा। कामरान ने इन्कार कर दिया और लाहौर लौट गया। अस्करी भी उसके प्रति उदासीन रहा। ऐसी परिस्थिति में हुमायूं ने 9,000 सैनिक एकत्रित किये और कन्नौज की तरफ बढ़ा। शेरखां भी सेना सहित वहां पहुंच गया। दोनों पक्षों में हुए भयकर युद्ध में हुमायूं पुनः परास्त हुआ। इसके बाद हुमायूं भारत में इधर से उधर ठोकरें खाता रहा। अंत में उसे शेरखां ने भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया। शेरखां ने दिल्ली तथा आगरा पर अधिकार कर स्वयं को सम्राट घोषित किया।

हुमायूं की असफलता के कारण
शेरखां तथा हुमायूं के बीच लम्बा संघर्ष चला, जिसमें अंत में हुमायूं को परास्त होकर भारत छोड़ना पड़ा। हुमायूं की असफलता के प्रमुख कारण निम्न थे
हुमायूं चारित्रिक दृष्टि से दुर्बल था। वह रंगरेलियों में डूब जाया करता था। वह अपने उद्देश्य की प्राप्ति हेतु निरन्तर प्रयत्न नहीं करता था, जिससे शत्रु अपनी शक्ति बढ़ा लेता था।
हुमायूं अदूरदर्शी था। उसने शेरखां के विरूद्ध कई भूलें की। उसने शेरखां की बढ़ती शक्ति के प्रति उदासीन रूख अपनाया तथा हिन्दू बेग द्वारा शेरखां के सम्बन्ध में दी गई रिपोर्ट पर बिना किसी जांच पड़ताल के विश्वास कर लिया। गौड़ की अपेक्षा चनार को घेरकर उसने मुर्खता का परिचय दिया। गौड पर अधिकार करने के बाद वह रंगरेलियां मनाने लगा, जिससे शेरखां को अपनी शक्ति में वृद्धि करने का अवसर मिल गया।
हुमायूं के भाइयों ने उसके साथ असहयोग किया। चौसा के युद्ध से पहले हिन्दाल ने आगरा में विद्रोह करके हुमायूं के लिए नयी कठिनाई उत्पन्न कर दी। कामरान ने हुमायूं की सहायता की प्रार्थना को ठुकरा दिया। यदि हुमायूं को अपने भाइयों का सहयोग मिला होता, तो उसे दर-दर की ठोकरें नहीं खानी पड़ती।
मुगल सैनिकों तथा कर्मचारियों ने हुमायूं के साथ दगा किया। हिन्दु बेग तथा शेख खलील ने शेरखां से मिलकर हुमायूं को धोखे में रखा तथा शाही सैनिकों ने कन्नौज तथा चौसा के युद्धों में शेरखां का पक्ष लिया।
हुमायूं अयोग्य सेनानायक एवं चारित्रित दृष्टि से दुर्बल था, जबकि शेरखां चतुर, महत्वाकांक्षी तथा कुशल सेनानायक था।

हुमायूं का निर्वासनकाल

कन्नौज के युद्ध में परास्त होने के बाद हुमायूं भागकर आगरा गया। शेरखां ने उसका पीछा किया। वह आगरा से दिल्ली व लाहौर पहुंचा। यहां उसकी सहायता की अपील को उसके भाइयों ने दकरा दिया। शेरखां उसका पीछा कर रहा था। अब वह सिन्ध पहुंचा, जहां शाह हुसैन अरगुन का अधिकार था उसने सिध में भक्कर तथा सहवान के दुर्गों पर अधिकार करने का असफल प्रयास किया। 1541 ई. में उसने अपने भाई हिन्दाल के धर्मगुरु अकबर जामी की चौदह वर्षीय पुत्री हमीदा बानू से विवाह कर लिया। सिन्ध में परेशान होकर हुमायूं ने जोधपुर प्रस्थान किया।

जोधपुर प्रस्थान
विवाह से कुछ समय पहले हुमायूं को जोधपुर नरेश मालदेव ने एक निमंत्रण द्वारा उसे शेरखां के विरुद्ध दो हजार सैनिकों की सहायता देने का वचन दिया था। जोधपुर पहुंचने पर उसे मालदेव के विश्वासघाती होने की जानकारी मिली। अतः उसने फिर सिघ की तरफ प्रस्थान किया।

अकबर का जन्म
सिन्ध के मार्ग में हुमायूं अमरकोट नामक स्थान पर रूका। वहां के राजपूत राजा ने उसका स्वागत करते हुए उसे सहायता देने का भी वचन दिया। यहां 15 अक्टूबर, 1542 ई. को अकबर का जन्म हुआ। इस शुभअवसर पर हुमायूं के पास केवल कस्तुरी की एक मंजूषा थी। उसने अपने मित्रों में कस्तुरी बांटी तथा अपने पुत्र के नाम की कस्तुरी की सुगन्ध की तरह सारे संसार में फैलने की कामना की।

कन्धार में हुमायूं
पुत्र जन्म के बाद राजपूतों की मदद से हुमायूं ने भक्कर विजय का असफल प्रयत्न किया। अंत में दोनों में सन्धि हो गयी, जिसके अनुसार भक्कर के राजा ने हुमायूं को सुरक्षित कन्धार पहुंचा दिया। कन्धार पर हमायं के भाई कामरान का शासन था। उसने हुमायूं की मदद करने के स्थान पर उसे बन्दी बनाने एवं उसका मार्ग रोकने का प्रयास किया। हुमायूं बड़ी मुश्किल से किसी तरह ईरान पहुंचा।

ईरान में हुमायूं
हुमायूं ने अकबर को कन्धार में किसी सुरक्षित स्थान पर छोड़ दिया था। ईरान के शासक तहमास्प ने उसका भव्य स्वागत किया। वैराम खां के प्रयत्नों से हुमायूं तथा तहमास्प के बीच सन्धि हो गई, जिसके द्वारा निश्चित किया गया कि-
  • तहमास्प हुमायूं को काबुल, बुखारा तथा कन्धार विजय में सहायता देगा।
  • इन प्रदेशों पर अधिकार करने के बाद हुमायूं कन्धार का प्रदेश तहमास्प को दे देगा।
  • हुमायूं शिया मत को अपनाकर उसे अपने राज्य में फैलाएगा। बदायूंनी के अनुसार, "दोनों सम्राटों में मेल हो जाने के उपरान्त शाह ने हुमायूं से शिया धर्म स्वीकार करने को कहा और हुमायूं ने इस दिशा में कदम भी उठाया। उसने फारस में शिया धर्म से सम्बन्धित स्थानों तथा हजरत अली के मजार की यात्रा की।

काबुल एवं कन्धार विजय
ईरान के शासक की मदद से हुमायूं ने काबुल एवं कन्धार पर अघि कार कर लिया। उसने असाधारण वीरता दिखाते हुए बदख्शां के सूबेदार सुल्तान मिर्जा को भी अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश किया। उसने मध्य एशिया में अपने पिता के खोये हुए प्रदेशों पर अधिकार करने का प्रयत्न किया, किन्तु बलख से आगे नहीं बढ़ सका। अब उसने भारत विजय का निश्चय किया।

हुमायूं का दिल्ली की गद्दी पर पुनः आरूढ़ होना

नवम्बर, 1554 ई. में अपने पश्चिमोत्तर एवं विजित क्षेत्रों को सुदृढ़ कर हुमायूं ने भारत की ओर प्रस्थान कर दिया। प्रतापी शेरशाह, जिसने हुमायूं को भारतीय सम्राट को पद से हटा दिया था, मई 1545 ई. में इस संसार से विदा हो चुका था। शेरशाह के उत्तराधिकारी इस्लामशाह, फिरोजशाह अथवा आदिलशाह में इतनी योग्यता न थी कि वे विशाल भारतीय साम्राज्य को संगठित कर अपने अधिकार में रखते। वैसे इस्लामशाह कुछ अंश में शेरशाह को उचित उत्तराधिकारी था और वह अपने पिता की श्रेष्ठ शासन-नीति पर चलकर प्रजा की सुख-सुविधा का ध्यान रखते हुए शासन करने में सफल रहा था, किन्तु सरदारों को अपने अधीन रखने में उसे पूरी सफलता प्राप्त न हो सकी। अस्तु, उसकी मृत्यु के पश्चात् अफगान साम्राज्य का पतन आरंभ हो गया। इस्लामशाह के उत्तराधिकारी पुत्र फिरोजशाह की हत्या कर मुवारीज खा जो रिश्ते में उसका मामा लगता था, आदिलशाह के नाम से दिल्ली की गद्दी पर आरूढ़ हुआ। आदिलशाह स्वभाव से भोग-विलास प्रिय एवं आलसी शासक था। उसने शासन के सारे कार्यों को अपने वजीर हेमू को सौंप दिये और स्वयं निश्चिंत होकर चुनार में जाकर रहने लगा था। परिस्थितियां भी सर शासकों के विरूद्ध थी और इब्राहिम शाह तथा सिकन्दर शाह के जैसे अनेक अफगान सरदार आदिल शाह के अधिकार को चुनौती दे रहे थे। इस प्रकार अफगान सरदारों की आपसी फूट के कारण ही शेरशाह द्वारा स्थापित अफगान साम्राज्य की जड़ हिल गयी थी। भारत की राजनीतिक स्थिति इतनी डावांडोल थी कि हुमायूं के लिए भारत की गद्दी को फिर से प्राप्त कर लेना अथवा भारत में पुनः मुगल साम्राज्य की स्थापना करना आसान हो गया।
भारत पर पुनः अपनी सत्ता को स्थापित करने के उद्देश्य से हुमायूं ने अपनी सेना को सुसंगठित किया। इस कार्य में उसे अपने परम विश्वासपात्र अधिकारी वैरम खां तथा अनेक सैनिक अधिकारियों का सहयोग प्राप्त हुआ। कालानौर नामक स्थान पर उसने अपनी फौज को तीन भागों में विभाजित कर उनमें से एक को सिहाबुद्दीन के नेतृत्व में लाहौर की ओर भेजा तथा दूसरे को बैरंग खां के नेतृत्व में हरियाणा क्षेत्र के अफगान प्रधान नवीव खां को पराजित करने के लिए भेजा। 24 फरवरी, 1555 ई. को मुगल सेना बिना किसी प्रतिरोध के लाहौर में प्रवेश कर गयी। मुगलों ने सहबाज खां को पराजित कर दिपालपुर तथा नसिब खां को हराकर हरियाणा पर भी अपना अधिकार कर लिया। अब पंजाब, सरहिन्द, दिपालपुर, हिसार, हरियाणा आदि के क्षेत्र पूर्ण रूप से हुमायूं के कब्जे में आ गये। मुगलों की विजयी सेना हर्ष के साथ दिल्ली पर अधिकार करने के उद्देश्य से आगे बढ़ी।।

मच्छिवाडा का निर्णायक युद्ध

उन दिनों दिल्ली पर सिकन्दर शाह का अधिकार था। सिकन्दर शाह ने तातार खां तथा हेबात खां के नेतृत्व में लगभग तीस हजार अफगान सैनिको को मुगल सेना पर आक्रमण करने के लिए भेजा। दोनों सेनाएं लुधियाना से लगभग 9 मील पूर्व सतलज के किनारे मच्छिवाडा नामक स्थान पर आ डटी। अफगान सैनिकों की तुलना में मुगल सैनिकों की संख्या कम थी, फिर भी उन्होंने जोश के साथ आगे बढ़ना चालू रखा ओर 15 मई, 1555 ई. की संध्या में दोनों सेनाओं के बीच घमासान युद्ध छिड़ गयी। अफगानों ने वाणों की वर्षा द्वारा युद्ध आरम्भ किया, किन्तु अंधेरा हो चला था। इसलिए मुगलों पर उनके वाणों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। मुगलों ने अफगानों पर भयंकर गोलीबारी की। अफगान गोलाबारी से बहुत भयभीत हुए और उन्होंने भागकर पास के एक गांव में शरण ली। चूंकि हिन्दुस्तान के गांव के अधिकतर घरों पर छप्पर पड़े होते हैं इसलिए गोलेबारी से उसमें आग लग गयी और युद्ध क्षेत्र प्रकाशित हो उठा। मुगल धमुर्धारियों ने निकल कर जलते हुए प्रकश में जी भरकर अपने हथियार प्रयोग किया। अग्नि के प्रकाश में भलीभांति शत्रु को अपने वाणों का लक्ष्य बना सके। अफगान और अधिक न डट सके और वे भाग खड़े हुए।
मच्छिवाडा की सफलता मुगलों के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रभावित हुई। उन्हें लूट में अनेक हाथी, अस्त्र-शस्त्र तथा बहुत-सा धन प्राप्त हुआ। इस युद्ध के पश्चात् लगभग सम्पूर्ण पंजाब सरहिंद, हिसार फिरोजा तथा दिल्ली के कुछ क्षेत्रों पर हुमायूं का अधिकार हो गया। इस युद्ध ने सिकन्दर शाह के नहत्वाकांक्षी पर पानी फेर दिये।

सरहिन्द का युद्ध

मच्छिवारा की पराजय को सिकन्दर शाह सहज ही स्वीकार करने को तैयार नहीं था। मुगलों से प्रतिशोध लेने के उद्देश्य से तथा सरहिन्द को पुन: अपने अधिकार में कर लेने की इच्छा से 27 अप्रैल, 1565 ई. को सिकन्दर शाह ने अस्सी हजार घुड़सवार और हाथी तथा तोपखाना लेकर दिल्ली से सरहिन्द की ओर कूच किया। मुगलों ने भी संगठित होकर सिकन्दर शाह का सामना किया। सरहिन्द के निकट दोनों सेनाओं के बीच 22 जून को भयंकर लड़ाई छिड़ गयी। कुछ दिनों तक दोनों सेनाओं के शाही योद्धाओं ने एक-दूसरे को चुनौती दी और अपने पराक्रम का प्रदर्शन किया और अंत में राजकुमार अकबर ने सेना के अग्रभाग को युद्ध के लिए खड़ा कर दिया। एक दल ने बैरम खां की अधीनता में एक ओर से तथा दूसरे दल ने इस्लाम खां की अधीनता में दूसरी ओर से शत्रु सेना पर आक्रमण किये। युद्ध में सभी अमीरों ने अदम्य साहस तथा दृढ संकल्प का परिचय दिया। अफगानों की संख्या एक लाख थी, फिर भी वे परास्त हुए क्योंकि साहस में वे घटिये थे। युद्ध में पराजित होकर सिकन्दर भाग खड़ा हुआ।
विजेताओं ने शत्रु सेना का पीछा किया और उनमें से अनेक को मार डाला। लूट का अतुल धने लेकर वे सम्राट् की सेना में उसे बधायी देने के लिए उपस्थित हुए। सम्राट् की आज्ञा से विजय का एक फरमान निकाला गया जिसमें से विजय का श्रेय अकबर को दिया गया और चारों ओर उसे घुमाया गया।

हुमायूं का दुबारा भारत का सम्राट बनना

फरिश्ता के शब्दों में, "इस युद्ध ने साम्राज्य के भाग्य का निर्णय कर दिया और दिल्ली का राज्य सदा के लिए अफगानों के हाथ से निकल गया।” इस महान् विजय के पश्चात् हुमायूं ने अपनी विजय सेना के साथ सरहिन्द को पदार्पण किया। उसने सिकन्दर खां उजवेग को दिल्ली पर चढ़ाई करने के लिए भेजा। दिल्ली के अफगान नेता मुगलों का मुकाबला करने में असफल रहे और उन्हें भागना पड़ा। सिकन्दर खां उजवेग ने दिल्ली के ऊपर अधिकार कर लिया। एक मुगल सेना को मीर अब्दल माली के नेतत्व में सिकन्दर खां सर को, जो सरहिन्द की पराजय के पश्चात शिवालिक के पहाडियों में भाग गया था, पकड़ने के लिए लाहौर भेजा गया। दिल्ली पर मुगल सेना का अधिकार हो जाने के पश्चात् रमजान के महीने में (23 जुलाई, 1545 ई.) सम्राट् हुमायूं ने धूमधाम के साथ दिल्ली में प्रवेश किया और एक बार फिर हिन्दुस्तान में उसके नाम के खुतने पढ़े गये तथा सिक्के ढाले गये। गद्दी पर बैठने के बाद उसने अपने अमीरों, सैनिकों तथा गैर-सैनिक अधिकारियों को राज दरबार में सम्मानित किया था तथा उन्हें उदास्तापूर्वक पुरस्कृत किया। बैरम खां को पंजाब का गवर्नर नियुक्त किया गया। आगरा तथा इसके आसपास के क्षेत्रों पर पुनः अधिकार करने के प्रयत्न किये गये और थोड़े ही समय में हुमायूं ने अपने खोये हुए साम्राज्य के अनेक हिस्सों पर पुनः अपना अधिकार कर लिया।

हुमायूं की अंतिम योजनाएं एवं मृत्यु

दिल्ली की गद्दी पर पुनः आरूढ़ होने के पश्चात् राज्य के कार्यों की देखभाल में जुट गया। उसने मुगल सैनिकों को विभिन्न प्रान्तों पर आधिपत्य स्थापित करने के उद्देश्य से भेजा और उनके प्रगति का निरीक्षण किया। इस काल में उसने मुगल शासन व्यवस्था के अनेक दोषों को भी सुधारने का प्रयत्न किया। वस्तुतः मुगलों की गद्दी को पुनः प्राप्त करने के पश्चात् हुमायूं ने अनुभव किया कि उसके सामने कुछ ऐसी प्रज्ज्वलित समस्याएं थीं जिन्हें सुलझाये बगैर वह शांति से शासन नहीं कर सकता था। अभी तक साम्राज्य के अनेक क्षेत्र उसके अधीन नहीं हो पाये थे और सम्पूर्ण साम्राज्य में अफगान तथा अन्य विद्रोहियों ने झण्डे गाड़ रखे थे। अस्तु शक्तिशाली हाथों से इन विद्रोहों का दमन कर साम्राज्य में शांति-सुव्यवस्था तथा राजनीतिक एकता लाना उनके लिए अत्यन्त अनिवार्य था। हुमायूं को अपनी पहली समस्या के समाधान में विशेष कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ा और जल्द ही उसने मुगल सत्ता की स्थापना हेतु अपने सैनिक कार्य प्रारम्भ कर दिये। किन्तु, शासन व्यवस्था को अच्छे ढंग से स्थापित कर प्रजा की सहानुभूति प्राप्त करने का उसने शायद कोई प्रयत्न नहीं किया। वैसे कुछ विद्वानों का मत है कि उसने इसकी योजना बनायी थी। इस योजना के अनुरूप साम्राज्य को अनेक भागों में विभक्त करना, प्रत्येक भाग के लिए एक राजधानी तथा स्थानीय विषयों के संचालन के लिए एक प्रशासक मण्डल की स्थापना करना था। इस योजना के अनुरूप जो राजधानियां निश्चित की गयीं उनमें दिल्ली, आगरा, कन्नौज, माण्डू और लाहौर उल्लेखनीय थे। इनमें से प्रत्येक में एक योग्य सेना नायक के अधीन एक शक्तिशाली सैनिक दल की स्थापना की बात सोची गयी जिससे उसे दूसरों की सहायता पर निर्भर न रहना पड़े, किन्तु हुमायूं में आवश्यक दृढ़ता तथा अध्यवसाय की कमी के कारण अथवा समयाभाव के कारण ये योजनाएं कार्यान्वित नहीं की जा सकीं। सम्राट् का अंत अब निकट आ चुका था। 24 जनवरी, 1556 ई. को जब अपनी पुस्तकालय में हुमायूं अजान का शब्द सुनकर तेजी से पुस्तकालय की सीढ़ियों से उतरने लगा तो उसके पैर फिसल गये और वहां से गिर जाने के कारण उसको इतनी गहरी चोट आयी कि 27 जनवरी को संध्याकाल में उसकी मृत्यु हो गयी। हुमायूं की मृत्यु पर विचार व्यक्त करते हुए इतिहासकार लेनपूल ने स्मरणीय वाक्य कहा है-"हुमायूं गिरते-पड़ते इस जीवन से मुक्त हो गया - ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार सम्पूर्ण जीवन काल में वह गिरते-पड़ते चल रहा था।' अपने जीवन के अंतिम दिनों में हुमायूं ने अकबर को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था।

हुमायूं की असफलता के कारण

मुगल शासकों में सर्वाधिक ठोकरें हुमायूं को खानी पड़ी थी। यद्यपि उसे विरासत में असंगठित साम्राज्य और रिक्त राजकोष मिला था, जो किसी योग्यतम शासक को भी असफलता के द्वार पर पहुंचा सकते हैं, लेकिन स्वयं हुमायूं की व्यक्तिगत दुर्बलता और तात्कालिक परिस्थितियां भी उसकी असफलता का कारण सिद्ध हुई। समग्र रूप में हुमायूं की असफलता के निम्नलिखित कारण बताये जा सकते हैं-

व्यक्तिगत दुर्बलताएं
यह सत्य है कि बाबर ने एक अस्त-व्यस्त साम्राज्य छोड़ा था, जिसके चारों ओर शत्रु सिर उठा रहे थे। किन्तु हुमायूं की व्यक्तिगत दुर्बलताओं ने भी स्थिति को अधिक विषम बना दिया था। जिन विषम परिस्थितियों में हुमायूं ने गद्दी प्राप्त की थी, उसे अपने साम्राज्य को संगठित करना चाहिए था तथा अपने शत्रुओं से डटकर मोर्चा लेना चाहिये था, जबकि उसने मूर्खतावश अपने भाइयों में साम्राज्य का विभाजन करके साम्राज्य की रही सही एकता को भी समाप्त कर दिया। पंजाब और काबुल कामरान को दे देने से उसकी शक्ति का आधार ही समाप्त हो गया। वह कालिंजर के राजा को भी कूटनीति से अपने पक्ष में कर सकता था, लेकिन उसने कालिंजर का घेरा डालकर अपनी अदूरदर्शिता का परिचय दिया। उसने शेरशाह की बढ़ती हुई शक्ति और महत्वाकांक्षा को रोकने की बजाय शेरशाह से सन्धि कर ली। शेरशाह जैसा कूटनीतिज्ञ हुमायूं की दुर्बलता समझ गया। तत्परता से निर्णय लेकर कार्य करने की क्षमता न होने के कारण ही उसे चौसा के युद्ध में पराजित होना पड़ा था। जैसाकि एलफिन्सटन ने लिखा है कि वह वीर अवश्य था, किन्तु स्थिति की गंभीरता को समझने की उसमें क्षमता नहीं थी। यही कारण था जिसकी वजह से कन्नौज के युद्ध में पराजित होकर दर दर की ठोकरें खानी पड़ी। अपनी विलासी प्रवृत्ति के कारण विजित हुए गुजरात राज्य को भी खोना पड़ा। वस्तुतः इन्हीं व्यक्तिगत दुर्बलताओं के कारण नह जीनन भर ठोकरें खाता रहा।

अपव्ययता
हुमायूं को विरासत में रिक्त राजकोष मिला था, जबकि अस्तव्यस्त साम्राज्य की सुरक्षा के लिये धन की आवश्यकता थी। लेकिन हुमायूं में धन संचय की ओर कभी ध्यान नहीं दिया। यद्यपि उसे कालिंजर के शासक से जन-धन की हानि का मुआवजा प्राप्त हुआ था तथा चांपानेर से गुजरात के बादशाहों का राजकोष मिल था, लेकिन वह अपने धन को बड़ी-बड़ी दावतें देने, अनिन्दं मनाने, अपने अन्यायियों को पुरस्कार बांटने और बड़ी-बड़ी इमारतें बनवाने में खर्च करता रहा। वह अपने अनुयायियों में खिल्लत बांटने और दावतें देने को सदैव तत्पर रहता था। उधर शत्रु द्वार खटखटा रहा होता था और हुमायूं दाइत खाने में ही व्यस्त रहता था। हुमायूं की इस अपव्ययता के कारण साम्राज्य की बिगड़ी हुई आर्थिक स्थिति को और अधिक खराब कर दिया। तात्कालिक परिस्थितियों में उसे मितव्ययी होना चाहिये था।

भाइयों के प्रति अत्यधिक उदार
यह सत्य है कि बाबर ने हुमायूं को अपने भाइयों के प्रति उदार रहने का निर्देश दिया था। लेकिन जब उसे मालूम हो गया कि उसके भाई उसके प्रति वफादार नहीं है, तब उसे अपने व्यवहार में परिवर्तन करना चाहिये था। लेकिन उसके भाइयों के विरोधी रवैये के बावजूद वह अपने भाइयों के प्रति उदार बना रहा। इसका परिणाम यह हुआ कि हिसार-फिरोजा और पंजाब जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र उसके हाथ से निकल गये और उसने इन क्षेत्रों पर कामरान का अधिकार स्वीकार कर लिया। फिर भी कामरान के विरोधी रूख में कोई परिवर्तन नहीं आया। अस्करी ओर हिन्दाल भी उसके प्रति वफादार नहीं रहे। उन्हें जब भी अवसर मिला उन्होंने हुमायूं के विरुद्ध विद्रोह कर स्वयं को सम्राट घोषित कर दिया। लेकिन हुमायूं बार-बार अपने भाइयों को क्षमा करता रहा। अपने भाइयों के प्रति अत्यधिक उदारता हुमायूं की असफलता में सहायक सिद्ध हुई।

राजपूतों का सहयोग न मिलना
जब हुमायूं गुजरात के शासक बहादुरशाह के विरूद्ध संघर्ष करने जा रहा था, तब मेवाड़ की रानी कर्मवती ने बहादुरशाह के विरुद्ध हुमायूं की सहायता मांगी थी। यदि हुमायूं बहादुरशाह पर उसी समय आक्रमण कर देता जबकि वह चित्तौड़ का घेरा डाले हुए था, तो बहादुरशाह की शक्ति चित्तौड़ में ही नष्ट हो जाती और राजपूतों की सहानुभूति भी प्राप्त हो जाती। लेकिन हुमायूं ने बहादुरशाह पर उस समय आक्रमण करना पाप समझा क्योंकि बहादुरशाह एक गैर-मुस्लिम के विरूद्ध संघर्ष कर रहा था। यह हुमायूं की राजनीतिक भूल थी। इसी भूल के परिणामस्वरूप उसे राजपूतों के सहयोग से वंचित होना पड़ा। जिस प्रकार राजपूतों ने अकबर को सहयोग देकर मुगल साम्राज्य को दृढ़ता प्रदान की थी, उसी प्रकार हुमायूं को भी सहायता देकर उसके साम्राज्य की रक्षा कर सकते थे। लेकिन अपनी राजनीतिक अदूरदर्शिता के कारण हुमायूं को राजपूतों का सहयोग नहीं मिल सका और उसे अपने साम्राज्य से हाथ धोना पड़ा।

विलासिता
हुमायूं की विलासिता ही उसकी प्रबल शत्रु सिद्ध हुई। वस्तुतः उसके लाड़-प्यार के पालन-पोषण ने ही उसे विलासी बना दिया था। गद्दी पर बैठने के तुरंत बाद उसने अपने आपको भोग-विलास और आमोद-प्रमोद में लिप्त कर लिया था। चाहे शत्रु उसके सिर पर मंडरा रहा होता, लेकिन वह अपनी रंगरेलियों को नहीं छोड़ता था। गुजरात में बहादुरशाह को पूर्ण परास्त किया ही नहीं था कि मांडू में उसने कई सप्ताह रंगरेलियों में व्यतीत कर दिये। इसका परिणाम यह हुआ कि बहादुरशाह को अपनी शक्ति संगठित करने का अवसर मिल गया। जिस समय शेरखां के बंगाल अभियान की उसे सूचना मिली, वह अपने आमोद-प्रमोद में ही मस्त था। फिर शेरखां के विरूद्ध अपने बंगाल अभियान के समय वह शेरखां को परास्त भी नहीं कर पाया था कि उसने गौड़ में आठ महीने भोग-विलास में बिता दिये। फलस्वरूप शेरखां ने विशाल भू क्षेत्रों पर अपना अधिकार कर लिया। अपने सैनिक अभियानों में भी वह अपना विशाल हरम साथ रखता था, जिससे तोपों की गर्जन के बीच भी सैनिक शिविर में उसकी रंगरेलियां आरम्भ हो जाती थी। अपने पलायन काल में भी, जबकि वह अपना सर्वस्व खो चुका था, चौदह वर्षीय हमीदाबानू से निकाह करना उसकी विलासी प्रवृत्ति का परिचायक है। वस्तुतः औरतें हुमायूं की सबसे बड़ी कमजोरी थी। उसकी यही कमजोरी उसकी असफलताओं का प्रमुख कारण बनी।

शासन के प्रति उदासीनता
यह सही है कि हुमायूं को विरासत में अस्त-व्यस्त प्रशासन व्यवस्था प्राप्त हुई थी। इसका कारण तो यह बताया जा सकता है कि बाबर को पर्याप्त समय नहीं मिल पाया। लेकिन हुमायूं को तो पर्याप्त समय मिला था, और यदि उसमें योग्यता होती तो वह प्रशासन को सुसंगठित कर सकता था। लेकिन उसे तो अपनी रंगरेलियों से ही फर्सत नहीं मिलती थी। अतः प्रशासन की ओर उसने कोई ध्यान नहीं दिया। गुजरात को अधिकृत करने के बाद यदि वह वहां पर अच्छी प्रशासन व्यवस्था स्थापित कर देता तो बहादुरशाह के अधिकारी इमादुलमुल्क को अहमदाबाद से मालगुजारी एकत्र करने का अवसर ही न मिलता और न गुजरात उसके अधिकार से जाता। साम्राज्य के स्थायित्व के लिये सुसंगठित प्रशासन व्यवस्था का होना अनिवार्य है। दुर्गाग्यवश हुमायूं इस तथ्य को समझ ही नहीं सका। इसलिये उसे दर-दर की ठोकरें खानी पड़ी थी।

सफल नेतृत्व का अभाव
जिस समय हुमायूं गद्दी पर बैठा था, यह वह काल था जबकि साम्राज्य को सुरक्षित रखने के लिये शासक में नेतृत्व के आवश्यक गुणों का होना अनिवार्य था। लेकिन हुमायूं में इन गुणों का अभाव था। हुमायूं को युद्धों के प्रति कोई लगाव नहीं था और जहां तक संभव होता वह युद्ध को टालता रहता था। गद्दी पर बैठने से पूर्व उसने कभी कठिन परिस्थितियां देखी नहीं थी। अतः गद्दी पर बैठने के बाद वह कठिन परिस्थितियों से भागता रहा। अपने सैनिक अधिकारियों पर वह कोई नियंत्रण नहीं रख पाता था, फलस्वरूप उसके सैनिक अधिकार उच्छृखल हो गये। उसे न तो सैन्य संगठन का ज्ञान था और न सैन्य संचालन का। जिस समय शेरखां गौड़ का घेरा डाले हुए था, उस समय हुमायूं द्वारा चुनार का घेरा डालना मूर्खता थी। यदि उसे सैन्य संचालन एवं रणनीति का ज्ञान होता तो वह चुनार की बजाय सीधा गौड़ पर आक्रमण करता। चौसा और बिलग्राम के युद्ध के अवसर पर उसने मुगल शिविर ऐसे स्थान पर लगाये जो काफी नीचे था। फलस्वरूप वर्षा आ जाने से मुगल शिविर में पानी भर गया और उसकी अधिकांश युद्ध सामग्री भी पानी में बह गई। जिस समय हुमायूं चौसा के मैदान में पहुंचा उस समय शेरखां की सेना भी थकी हुई पास में आराम कर रही थी। इस समय हुमायूं ने अपने अधिकारियों की सलाह की उपेक्षा करते हुए शेरखां पर आक्रमण नहीं किया और दोनों सेनाएं लगभग तीन महीने तक आमने सामने पड़ी रही। फलस्वरूप शेरखां को पर्याप्त समय मिल गया। इस प्रकार हुमायूं को यह भी ज्ञान नहीं था कि शत्रु पर कब और किस प्रकार आक्रमण करना चाहिये।

दृढ़ निश्चय का अभाव
हुमायूं में तत्काल निर्णय लेने की क्षमता नहीं थी और कभी ले भी लेता था तो उस पर दृढ़ निश्चय के साथ कार्यवाही करने की योग्यता नहीं थी। चुनार के प्रथम घेरे के समय उसने शेरखां से संदिग्ध संधि कर ली। 1538 ई. में उसने शेरखां रो रामझौता करने में कई माह खराब कर दिये और रामझौता स्वीकार करने के बाद जब बंगाल के शासक ने हुमायूं से शेरखां को पराजित करने की प्रार्थना की तो उसने शेरखां से हुए समझौते को भंग कर दिया। फलस्वरूप वह अफगानों के समक्ष झूठा सिद्ध हुआ। हुमायूं की इस ढिल-मिल नीति के कारण उसके सैनिक तो उससे असंतुष्ट रहते ही थे, किन्तु उसके भाई भी उससे नाराज रहते थे। हुमायूं की इस नीति का लाभ उठाते हुए ही कामरान ने पंजाब पर अधिकार किया था। बिलग्राम के युद्ध में पराजित होकर जब वह लाहौर आया तब उसकी इसी नीति से क्षुब्ध होकर हिन्दाल सिन्ध की तरफ चला गया था। वस्तुतः उसकी ढिल-मिल नीति का ही परिणाम था कि उसे अपना सर्वस्व खोकर दुर्दिन देखने पड़े।
डॉ. आर एस त्रिपाठी हुमायूं की असफलता के लिये उपर्युक्त कारणों को स्वीकार नहीं करते। उनका मानना है कि हुमायूं की असफलताओं का प्रमुख कारण उसका दुर्भाग्य था। लेकिन इस दुर्भाग्य का कारण उसकी मूर्खता और अदुरदर्शिता थी। युद्ध के समय वर्षा होना, केवल हुमायूं का दुर्भाग्य कैसे मान सकते हैं। वर्षा तो दोनों के लिये समान थी। वह तो हुमायूं की अदूरदर्शिता थी कि प्रथम तो उसने अपने शिविर के लिये नीचा स्थान चुना, और दूसरा युद्ध क्षेत्र में पहुंचते ही शेरखां पर आक्रमण न करने की भूल थी। यदि वह युद्ध क्षेत्र में पहुंचकर तुरंत आक्रमण कर देता तो अपनी तोपों का प्रयोग भी भली भांति कर सकता था। लेकिन मूर्खतावश उसने आक्रमण नहीं किया और शेरखां भी वर्षा होने का इंतजार करता रहा। इस प्रकार कठिन परिस्थितियां और दुर्भाग्य का निर्माण को स्वयं उसी ने किया था।

हुमायूं का चरित्र

लेनपूल के अनुसार, "हुमायूं के चरित्र में आकर्षण तो है, परन्तु प्रभाव नहीं।" हुमायूं के चरित्र में जहां कई गुण थे, वहीं उसके दोषों की भी लम्बी कतार थी।

परिवार प्रेमी
हुमायूं एक आज्ञापालक पुत्र, हितैषी भाई एवं स्नेही मित्र था। उसने अपने पिता की आज्ञानुसार सदैव अपने भाइयों के साथ अच्छा व्यवहार किया तथा उनकी गलत्तियों को क्षमा कर दिया, चाहे इसके लिए उसे स्वयं ही हानि क्यों न उठानी पड़ी हो। वह दयालु, विनम्र एवं धैर्यवान था। गुलबदन बेगम ने उसकी दयालुता एवं प्यार की प्रशंसा करते हुए लिखा है "माहम की मृत्यु के पश्चात् हुमायूं के प्रेम के कारण ही वह अपने को अनाथ नहीं समझती थी।"

उदारचित्त
हुमायूं बड़ा उदार तथा दनी था। उसने उपहारों तथा दावतों पर काफी धन व्यय किया था। निजामुद्दीन के अनुसार, "मुगल बादशाह इतना दानी था कि हिन्दुस्तान का समस्त धन भी उसकी दानशीलता के सम्मुख काफी नहीं था। बदायूंनी लिखता है “वह इतना बड़ा दानी था कि सम्पूर्ण भारत का राजस्व भी उसके दान देने के लिये पूरा नहीं था।"

विद्वान तथा साहित्य प्रेमी
हुमायूं विद्वान तथा साहित्य प्रेमी था। वह गणित, ज्योतिष तथा फारसी भाषा का पूर्ण ज्ञाता था। मिर्जा हैदर के अनुसार, "मैंने बहुत ही कम राजकुमार देखे हैं, जिनमें हुमायूं जैसी प्रतिभा और योग्यता विद्यमान हाँ' उसके दरबार में खुदामीर अब्दुल लतीफ शेख हस्न आदि विद्वान रहते थे। हुमायूं पुस्तकों के अध्ययन का शौकीन था। वह ज्योतिष शास्त्र का भी ज्ञाता था। अबुल फजल के अनुसार, "हुमायूं एक वेधशाला का निर्माण करना चाहता था। इसके लिये उसने बहुत से यंत्रों की व्यवस्था भी कर ली तथा कई स्थानों को वेधशाला के लिये चुना था।" वह भाषण देने में प्रवीण था। अब्दुल लतीफ के अनुसार, "यद्यपि वह शासन कार्य में उलझा रहा, तथापि भाषण देने में उसने अच्छी योग्यता प्राप्त कर ली थी। अपने विचारों को वह संक्षेप में तथा सुन्दर ढंग से व्यक्त करता था। चित्रकला से भी उसे अच्छा अनुराग था। उसके दरबार में ख्वाजा अब्दुल समद जैसे कलाकार थे।"

सच्चा मुसलमान
हुमायूं धर्मपरायण मुसलमान था। वह कुरान के नियमों के अनुसार जीवन व्यतीत करता धाप वह हिन्दुओं के प्रति असहनशील था। कालिंजर के मंदिरों का विनाश कर उसने धार्मिक संकीर्णता का परिचय दिया। हुमायूं के धार्मिक विचार अस्थिर थे। उसने ईरान के शासक से सहायता प्राप्त करने हेतु शिया मत स्वीकार किया तथा उसके प्रसार का वचन भी दिया था। उसने सुन्नी होते हुए भी शिया हमीदा बानू से विवाह किया।

आत्मविश्वासी तथा धैर्यवान
हुमायं आत्मविश्वासी तथा धैर्यवान होने के साथ-साथ सिद्धान्तहीन तथा अविवेकपूर्ण भी था। मेलीसन के अनुसार, "वह चंचल, विचारहीन और अस्थिर था, जिसमें कर्तव्य की ओर झुकने की कोई बलवती भावना नहीं थी।" हुमायूं शराब एवं अफीम का प्रेमी था। वह रेगरेलियों में डूबकर अपना कर्तव्य भी भूल जाता था। यही विलासिता तथा आलस उसकी असफलता का कारण सिद्ध हुआ। डॉ.ए.एल. श्रीवास्तव के अनुसार, "अपने हरम में रंगरेलियां मनाने और आराम करने का उसका यह स्वभाव उसकी असफलताओं का प्रमुख कारण समझा जाना चाहिये।"
लेनपूल ने लिखा है, “एक सम्राट के रूप में वह असफल रहा। उसके नाम का अर्थ है सौभाग्यशाली, परन्तु कोई भी दुर्भाग्यशाली व्यक्ति इतने गलत नाम से नहीं पुकारा गया है।

योग्य सेनानायक
हुमायूं साहसी, वीर, धैर्यवान तथा योग्य सैनिक था। निजामुद्दीन के अनुसार, "उत्साह और वीरता की दृष्टि से हुमायूं पानीपत, खानवा, कन्नौज तथा चौसा के युद्ध में अपने अदभुत रणकौशल का परिचय दे चुका था।" अब्बास खां के अनुसार, "कन्नौज के युद्ध क्षेत्र में हुमायूं पहाड़ की भांति अचल रहा और उसने वीरता के ऐसे जौहर दिखाये, जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता।"
हुमायूं वीर होते हुए भी सैनिक दांव-पेचों में अकुशल था। उसमें अभियानों को संगठित करने की तथा युद्ध संचालन की योग्यता नहीं थी। अतः उसने भारी भूलें की तथा उसे भारत से निर्वासित होना पड़ा। हुमायूं दूरदर्शिता तथा कूटनीतिज्ञ नहीं था। वह शत्रओं की चालाकी को समझ नहीं पाता था और उनकी बातों में आ जाता था। वह चापलूसी पसन्द करता था। अतः शेरखां एवं बहादुरशाह ने उसकी इस कमजोरी का पूरा लाभ उठाया।

शासन-प्रबंधक
हुमायूं कुशल शासक-प्रबंधक नहीं था। शासन सम्बन्धी कार्यों में उसने रूचि नहीं ली। उसमें निर्णय क्षमता का अभाव था। अतः वह अपने दरबारियों के परामर्श पर निर्भर रहता था। वह न्याय प्रेमी था। उसने निष्पक्ष न्याय की व्यवस्था की। उसने महल के निकट एक बड़ा ढोल रखवा दिया, जिसे बजाकर फरियादी सम्राट से न्याय की फरियाद कर सकता था।

सारांश

डॉ. ईश्वरीप्रसाद के अनुसार, "हुमायूं के चरित्र की सबसे प्रमुख कसौटी अध्यवसाय अर्थात् निरन्तर उद्योग करते रहने की प्रवृत्ति की थी और उसके जीवन में आदि से अंत तक यह एक ईश्वरीय वरदान के रूप में स्थिर रही। इसके अभाव में उसके लिए फिर से भारत के साम्राज्य को विजय करना असंभव ही था।' अबुल फजल के अनुसार, "सम्राट की बुद्धिमत्ता तथा निपुणता के इतने अधिक प्रमाण हैं कि उनकी गिनती नहीं की जा सकती।" हुमायू के चाचा मिर्जा हैदर लिखते हैं, “हुमायूं बादशाह बाबर के पुत्रों में ज्येष्ठ, सबसे अधिक योग्य तथा सबसे अधिक प्रतिछित था तथा मैंने उसके जैसी प्रतिभा एवं योग्यता विरले मनुष्यों में ही देखी है। अतः कहा जा सकता है कि चारित्रिक दोषों के बावजूद हुमायूं अच्छा सम्राट था।

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