कृषि आय - कृषि आय की परिभाषा, आशय, प्रकार, उदाहरण | krishi aay

कृषि आय

भारतीय आयकर अधिनियम के अधीन कृषि आय पर आयकर नहीं लगाया जाता है क्योंकि कृषि राज्य का विषय है, केवल राज्य सरकार को ही कृषि आय पर कर लगाने का अधिकार प्राप्त है। इस आय पर छूट इस अधिनियम की धारा 10(1) के अधीन दी गई है। चूंकि इस आय पर कर नहीं लगाया जाता है, इसलिए इसके स्पष्टीकरण का बहुत महत्व है। यह स्वाभाविक है कि करदाता अपनी कुछ आय को कृषि आय के रूप में दिखाकर कर की छूट प्राप्त करना चाहेगा।
भले ही, वह प्रत्यक्ष रूप से कृषि से जुड़ी न हो। दूसरी ओर, आयकर अधिकारी कृषि आय शब्दों की विस्तृत परिभाषा करना चाहेगा। इस प्रकार कृषि आय शब्द के अर्थ के सम्बन्ध में दोनों पक्षों के बीच विवाद होने की संभावना होती है। इस बात को ध्यान में रखकर आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 2(1A) में कृषि आय की परिभाषा विस्तारपूर्वक दी गई है।

कृषि आय की परिभाषा

धारा 2(1A) के अनुसार “कृषि आय का तात्पर्य ऐसी भूमि से प्राप्त लगान या आय से है। जो भारत में स्थित है और कृषि कार्यों के प्रयोजनों [2(1A)]., के लिए प्रयुक्त होती है। इस परिभाषा से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि किसी भी प्रकार के किराये या राजस्व (नकद या वस्तु) का स्वरूप कृषि से सम्बन्धित केवल तभी होगा यदि निम्न शर्ते पूरी होती है;
  • लगान या आय भूमि से प्राप्त की गई है
  • भूमि भारत में स्थित है, और
  • भूमि का उपयोग कृषि के लिए किया जाता है।
चूंकि आय के स्वरूप का निर्धारण "कृषि" शब्द करेगा, इसलिए हमारे लिए यह समझना आवश्यक है कि कृषि क्या है? भूमि पर कृषि से प्राप्त वहीं आय कही जाती है जब उस भूमि पर मनुष्य का श्रम तथा कार्यकुशलता लगी हो, भले ही यह खेती या किसी अन्य रूप में हो। यद्यपि खेत को जोतना कृषि कार्य का आवश्यक अंग नहीं है, फिर भी मनुष्य को खेती के लिए अपने श्रम तथा कार्यकुशलता का प्रयोग करना आवश्यक है। उच्चतम न्यायलय ने आयकर आयुक्त (CIT) बनाम राजा विनय कुमार सहस राय के मुकदमें में कृषि तथा कृषि उद्देश्यों की व्याख्या की है। निर्णय का सम्बन्धित अंश नीचे दिया गया है।
  1. कृषि का तात्पर्य जमीन पर खेती के प्राथमिक कार्यों से है और प्राथमिक कार्यों से तात्पर्य उन कार्यों से है जो फसल उपजाने के लिए पहले करने पड़ते हैं तथा जिसका अर्थ यह है कि खेत की जुताई करना, बीज बोना, पौध लगाना तथा इसी प्रकार के अन्य कार्य करना। इस कार्य में वे सभी कार्य शामिल है जिनसे उपज को बढ़ाया जाता है और उत्पाद को सुरक्षित रखा जाता है तथा वे कार्य भी करने पड़ते हैं जिनसे उत्पाद को विपणन योग्य बनाया जाता है। इन शब्दों के अर्थ की परिधि में सभी प्रकार के उत्पाद आते हैं, भले ही वे अपने स्वरूप में चाहे जिस तरह के हों।
  2. यह निश्चित करने के लिए कि किसी भू-खंड विशेष का इस्तेमाल कृषि कार्यों के लिए किया गया है या नहीं, भूमि की जुताई सम्बन्धी कुछ मानदण्ड तथा उस भूमि पर लगाया गया कौशल और श्रम का मानदण्ड रखना होगा। अतः जंगल में प्राकृतिक रूप से उगे हुए तथा मानव श्रम के बिना ही पले-बढ़े वृक्षों की बिक्री से हुई आय को कृषि आय नहीं कहा जा सकता।

कृषि आय के प्रकार

कृषि आय को निम्न पाँच श्रेणियों में बाँटा जा सकता है:-
  • (i) भूमि से प्राप्त लगान या आय
  • (ii) कृषि से प्राप्त आय
  • (iii) कृषक द्वारा किए गए विपणन कार्य से हुई कोई आय या वस्तु के रूप में किराए की प्राप्ति
  • (iv) उपज की बिक्री से प्राप्त आय
  • (v) कृषि भूमि पर स्थित मकान से प्राप्त आय।
(ii), (iii) और (iv) को एक ही शीर्षक के अंतर्गत समझा जा सकता है। अब हम विभिन्न प्रकार की कृषि आय पर विस्तारपूर्वक विचार करेंगे।

भूमि से प्राप्त लगान या आमदनी
भारत में स्थित कृषि कार्यों के लिए उपयोग की गई भूमि का लगान (किराया) या उससे हुई आमदनी कृषि आय कही जाएगी। भूमि से प्राप्त किराया एक व्यक्ति द्वारा दूसरे किसी व्यक्ति को भूमि से प्राप्त किराया, भूमि के उपयोग करने का अधिकार देने पर प्राप्त की गई आय है। किराया या तो नकद या कृषि उत्पाद के रूप में प्राप्त किया जा सकता है। किराया प्राप्त करने वाले व्यक्ति के लिए भूमि का स्वामी होना आवश्यक नहीं है, यदि भूमि को किसी व्यक्ति द्वारा किराए पर उठा दिया गया हो और उसे कृषि उत्पाद के रूप में किराया प्राप्त होता है तो उसे "वस्तु के रूप में किराया प्राप्त करने वाला व्यक्ति” कहा जाएगा।
किराए को वस्तु के रूप में प्राप्त करने वाले व्यक्ति द्वारा यदि उत्पाद को विपणन योग्य बनाने हेतु कोई कार्य करने के लिए भूमि का इस्तेमाल किया जाता है अथवा ऐसे उत्पाद की बिक्री से उसे कोई आय होती है तो इस आय को भी कृषि आय माना जाएगा। निःसंदेह, यह आय, कृषक को प्राप्त कृषि आय है।

ऐसी भूमि पर कृषि से उत्पन्न आय या विनिर्माण प्रक्रिया से हुई आय, धारा 21 (1A)(b)
यहाँ पर "ऐसी भूमि' शब्द अत्यधिक महत्वपूर्ण है। ऐसी भूमि से तात्पर्य भारत की उस कृषि योग्य भूमि से है जिसका उपयोग कृषि उद्देश्यों के लिए किया गया हो।
निम्नलिखित कार्यकलापों से उत्पन्न हुई आय को कृषि आय कहा जाएगा-
  • (a) कृषि कार्यों से प्राप्त आय।
  • (b) सामान्यतया ऐसी प्रक्रिया से प्राप्त आय जो उत्पादन को विपणन योग्य बनाने के लिए की जाती है।
  • (c) उपर्युक्त (b) में उल्लिखित प्रक्रिया के अतिरिक्त कोई अन्य प्रक्रिया अपनाए बिना कृषक द्वारा उत्पाद को बेचने से हुई आय।
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि कृषकों को अपने उत्पाद को विपणन योग्य बनाना आवश्यक होता है क्योंकि वह उत्पाद उसी रूप में बेचा नहीं जा सकता है। उसे वह प्रक्रिया अपनाने की छूट होती है, जिसे आमतौर पर सभी कृषक अपने उत्पाद को विपणन योग्य बनाने के लिए अपनाते हैं। चूँकि तम्बाकू की पत्तियों को बेचने से पहले उन्हें सुखाया जाता है इसलिए तम्बाकू की सखाई गई पत्तियों को बेचने से प्राप्त आय कृषि आय की श्रेणी में आएगी। तथापि उसी तंबाक से बीडी बनाकर बेचने से प्राप्त आय को कृषि आय नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इस स्थिति में विपणन योग्य उत्पाद को और अधिक संसाधित किया गया होता है तथा अधिक मूल्यवान बनाया गया होता है।

कृषि भवन जैसी सम्पत्ति या फार्म भवन या उसके निकट जैसी सम्पत्ति से हुई आय, धारा 2(1A)(C)
निम्नलिखित मामलों में किसी भवन से प्राप्त आय को कृषि आय कहा जाएगाः
  • a) किसी भी ऐसी भूमि का किराया या आमदनी प्राप्त करने वाला व्यक्ति भवन या स्वामी हो या वह भवन उसके अधिग्रहण में हो।
  • b) भवन, भारत में कृषि योग्य भूमि पर ही स्थित हो या उस भूमि के बिल्कुल आस पास हो।
  • c) उक्त कृषक द्वारा भवन का उपयोग अपने निवास, भण्डारगृह या बाहरी घर (आउट हाउस) के रूप में भूमि से जुड़े कार्यों के लिए किया जाता हो।
  • d) वह भूमि, जिस पर मकान स्थित है, भू-राजस्व के अधीन हो या उस पर ऐसा स्थानीय कर लगता हो जिसका निर्धारण व वसूली सरकारी अधिकारियों द्वारा की जाती हो।
  • e) यदि उस भूमि पर भू-राजस्व देय न हो तो वह शहरी क्षेत्र से बाहर होनी चाहिए अर्थात् वह भूमि कैंटोन्मेंट बोर्ड या छावनी बोर्ड, नगर पालिका बोर्ड, अधिसूचित क्षेत्र, नगर क्षेत्र, नगर निगम तथा इसी प्रकार के अन्य नाम से समझे जाने वाले क्षेत्र के अंतर्गत न हो जिसकी जनसंख्या 10,000 (दस हजार) या इससे अधिक हो।
  • f) यदि इसे केन्द्रीय सरकार के गजट (राजपत्र) में अधिसूचित किया गया है तो यह भूमि नगरपालिका से आठ किलोमीटर क्षेत्र के अंतर्गत स्थित न हो। अथवा उस नगरपालिका की अधिकारिता से ऐसी निम्नतम सीमा क्षेत्र के अंदर स्थित न हो जैसा इस सम्बन्ध में केन्द्रीय सरकार अधिसूचित करें।

कृषि आय के आवश्यक लक्षण या तत्व

कृषि आय की परिभाषा के आधार पर कृषि आय में पाये जाने वाले प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं :
  1. कृषि आय प्रत्यक्ष रूप से भूमि से प्राप्त होनी चाहिए - जैसे, कृषि आय में से वितरित किया गया लाभांश अंशधारियों के लिए कृषि आय नहीं है क्योंकि इस आय का प्रत्यक्ष सम्बन्ध भूमि से नहीं है।
  2. भूमि भारत में स्थित होनी चाहिए-विदेश में स्थित कृषि भूमि से प्राप्त आय कृषि आय की श्रेणी में नहीं आती और इसीलिए करदाता के लिए कर-मुक्त नहीं होती है।
  3. भूमि खेती के रूप में प्रयोग होनी चाहिए-अर्थात् भूमि पर खेती की आधारभूत क्रियाएँ (जिनका वर्णन पिछले पृष्ठों में किया गया है) अवश्य की जानी चाहिए, तभी प्राप्त आय कृषि आय कहलायेगी।
  4. भूमि में हित-कृषि भूमि के मालिक अथवा भूमि के किरायेदार का भूमि में हित होना चाहिए।
  5. भूमि के साथ मात्र कुछ सम्बन्ध होना ही कृषि आय के लिए पर्याप्त नहीं है-किसी क्रिया को 'कृषि' के अन्तर्गत समाहित करने हेतु मात्र इतना ही पर्याप्त नहीं है कि उस व्यक्ति का भूमि के साथ सम्बन्ध है अथवा वह व्यक्ति किसी तरीके से उस पर आश्रित है। इसी आधार पर पशुधन का प्रजनन एवं उन्हें पालना, डेयरी फार्मिंग, मक्खन तैयार करना, मुर्गी पालना-ये सभी कार्य कृषि के उद्देश्य हेतु नहीं है अत: इन्हें कृषि क्रियाएँ नहीं कहेंगे तथा इनसे प्राप्त आय कृषि आय नहीं होगी।
  6. नर्सरी से सम्बन्धित आय- कर निर्धारण वर्ष 2009-10 से धारा 2(1A) में संशोधन किया गया है कि नर्सरी से सम्बंधित आय को कृषि आय माना जाये भले ही मूलभूत क्रियाएं की गई हों अथवा नहीं। अत: किसी नर्सरी में उगाई गयी पौधे या पौधों से होने वाली आय कृषि आय मानी जायेगी।

कृषोत्तर आय के उदाहरण

निम्नलिखित आय यद्यपि भूमि से सम्बन्ध है फिर भी इसे कृषि आय नहीं माना जाएगाः ।
  1. कृषि भूमि के विक्रेता या कृषि के किसी खण्ड पर अपना दावा छोड़ने वाले व्यक्ति को देय वार्षिकी की राशि
  2. कृषि उत्पादन के विक्रय से प्राप्त कमीशन की राशि।
  3. डेयरी फार्म से प्राप्त आय।
  4. अनियंत्रित रूप से बढ़ने वाले जंगली पेड़ों को बेचने से प्राप्त आय।
  5. मछली पालन से प्राप्त आय।
  6. रूई की धुनाई से प्राप्त आय।
  7. खरीदी गई भूमि पर फसल की पैदावार से प्राप्त आय
  8. लकड़ी या फसल रखने के लिए भूमि को किराए पर देने से प्राप्त आय।
  9. कृषि आय से लाभांश का भुगतान
  10. भू-स्वामी द्वारा कृषि उत्पादन बेचने से प्राप्त कमीशन।
  11. खड़ी फसल को खरीदकर उस उत्पाद को बेचने से प्राप्त आय।
  12. रेशमी कीड़ों को पालने से प्राप्त आय।
  13. पत्थरों की खानों से प्राप्त आय।
  14. खानों की रॉयल्टी से प्राप्त आय।
  15. मुर्गी पालन से प्राप्त आय।
  16. ईट बनाने हेतु प्रयुक्त भूमि की आय
  17. तालाब में सिंघाडे उगाने से प्राप्त आय।
  18. सैन्य प्रयोग हेतु ली गई भूमि के सम्बन्ध में प्राप्त क्षतिपूर्ति।
  19. वक्फ के मुत्तवली या ट्रस्टी को वक्फ की कृषि आय से प्राप्त पारिश्रमिक।
  20. गन्ने की खेती में लगे करदाता की ट्रेण्डर फार्म विक्रय करने से होने वाली आय।
  21. नर्सरी के रखरखाव एवं संचालन से होने वाली आय।

अंशतः कृषि आय

कुछ ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जिनको स्पष्ट रूप से कृषि आय या कृषोत्तर आय की श्रेणी में रखना कठिन हो जाता है क्योंकि ऐसी आय किन्हीं रूपों में तो कृषि आय की तरह होती है और किन्हीं रूपों में व्यापार आय की तरह होती है। ऐसी आय को अंशतः कृषि आय कहा जाता है। उदाहरण के लिए गन्ना उत्पादन करके चीनी बनाने वाली चीनी मिल की कुल आय अंशतः कृषि आय होती है क्योंकि गन्ना काटकर बेचने तक की आय कृषि आय की प्रकृति की है जबकि चीनी के उत्पादन से हुई आय, कर लगाए जाने योग्य होगी। अतः 60 प्रतिशत आय कृषि आय तथा 40 प्रतिशत व्यापारिक आय मानी जाती है। इसी प्रकार चाय बागानों की चाय बेचने से प्राप्त आय भी अंशतः कृषि आय है। अंशतः कृषि आय के उपरोक्त दोनों उदाहरणों को आयकर नियमावली, 1962 के नियम संख्या 7 व 8 में समझाया गया है।

आंशिक रूप से कृषि आय के उदाहरण

चाय के अतिरिक्त कृषि उत्पाद के बढ़ने और निर्माण से आय (नियम 7)
यह नियम तेल, वनस्पति घी, आटा, चीनी आदि के कारखानों में लागू है, यह उन निर्माताओं पर लागू होता है जो अपने माल बनाते और बेचते हैं जिसमें कृषि माल को कच्चे माल के रूप में प्रयोग में लाते हैं इसे कृषि का उपयोग इसमें कृषि और गैर-कृषि आय दोनों शामिल हैं। इस मामले में कृषि उपज की बिक्री आंशिक रूप से कृषि आय होगी और बाजार मूल्य कृषि आय होगी।

चाय बागानों की आय (नियम 8)
चाय के निर्माण और बिक्री से प्राप्त कुल आय को कृषि आय नहीं माना जाता है। हालॉकि, कल आय का 60 प्रतिशत कृषि आय के रूप में माना जाता है और बाकी की आय को गैर-कृषि या व्यावसायिक आय के रूप में माना जाता है।

रबर के उत्पादन से आय (नियम 7A)
रबड़ की बिक्री से प्राप्त कुल आय का 65 प्रतिशत या आयकरदाता द्वारा निर्मित और संसाधित रबड़ को कृषि आय माना जाता है और शेष 35 प्रतिशत आय गैर कृषि आय माना जाता है। नये संयंत्र के सम्बन्ध में और मृत संयंत्र से संबंधित खर्चों को लागत में शामिल किया जाएगा। रबर बोर्ड से प्राप्त किसी भी सब्सिडी को उत्पादन की लागत से घटाया जाएगा।

कॉफी के उत्पादन से आय (नियम 7B)
यदि कॉफी उत्पादन भारत में किया जाता है तो 75 प्रतिशत आय और 25 प्रतिशत को गैर-कृषि आय माना जाएगा। हालाँकि यदि कॉफी को भूनना या तपाने के बाद और कुछ स्वाद आदि को जोड़ने के बाद बेचा जाता है, तो ऐसी आय का 60 प्रतिशत कृषि आय के रूप में और शेष 40 प्रतिशत व्यावसायिक आय या गैर-कृषि आय के रूप में माना जाएगा। इसके बारे में कुल आय की गणना के लिए उन पौधों से संबंधित खर्चों को उत्पादन की लागत में शामिल किया जाएगा जिन्हें मृत पौधों के स्थान पर लगाया गया है, लेकिन कॉफी बोर्ड द्वारा प्राप्त किसी भी अनुदान या सहायता को लागत से घटाया नहीं जाएगा।

गैर-कृषि आय में कृषि आय का एकीकरण

जैसा कि पहले से ही चर्चा की गई है कि कृषि आय पर कोई कर नहीं लगता है, लेकिन अगर कोई करदाता कृषि के साथ-साथ गैर-कृषि आय भी अर्जित करता है, तो ऐसी कृषि आय को उसकी कुल आय से जोड़कर गैर-कृषि आय की तरह गणना की जाती है।
गैर कृषि आय का एकीकरण निम्नलिखित निम्न दोनों नियमों के संतुष्ट होने पर होगा।
  1. शुद्ध कृषि आय 5000 रु. से अधिक हो और
  2. करदाता की गैर कृषि आय करमुक्त सीमा 2,50,000 रु. से अधिक होनी चाहिए। (60 वर्ष के व्यक्ति से ऊपर आयु वाले व्यक्ति)
अशतः एकीकरण निम्न में इन स्थिति में लागू होता है।
  • व्यक्ति
  • हिन्दू अविभाजित परिवार
  • व्यक्तियों का संघ (AOP) एवं व्यक्तियों का निकाय (BOI) इत्यादि D
  • कृत्रिम कानूनी व्यक्ति
यह निम्न पर लागू नहीं होगा।
  • फर्म
  • कम्पनी
  • सहकारी समिति
  • स्थानीय प्राधिकरण
यह इन पर लागू नहीं होते हैं इस अवधारणा को गैर कृषि आय में कृषि आय का एकीकरण कहते है।

गतवर्ष में, व्यक्ति (चाहे पुरुष हो या महिला) जो भारत में निवासी हो और 60 वर्ष या उससे अधिक लेकिन 80 वर्ष से कम के व्यक्ति को 250,000 की जगह 3,00,000 अधिकतम की छूट प्राप्त होगी। लेकिन यदि व्यक्ति की आयु 80 वर्ष या उससे अधिक है, तो अधिकतम छूट सीमा 2,50,000 की जगह 5,00,000 होगी।

कृषि आय के होने पर कर की गणना के चरण:
नीचे दिये गये चरणों के आधार पर कर की गणना।
  1. कृषि आय और गैर कृषि आय को जोड़े और कुल पर कर की गणना करें जैसे कि यह कुल आय है।
  2. उपलब्ध अधिकतम छूट सीमा में कृषि आय को जोड़े और इस तरह की राशि पर कर की गणना करे जैसे कि कुल आय में।
  3. चरण 1 में कर की गणना के पश्चात चरण 2 में कर की गणना करें और चरण 1 में से 2 को घटा से गणना की गई राशि करदाता निर्धारिती द्वारा कुल आयकर देय होगी।
  4. धारा 37A के अन्तर्गत दावा प्रस्तुत करें, यदि लागू हो।
  5. अधिभार जोड़ें और स्वास्थ्य और शिक्षा उपकर @4% यदि लागू हो।
उदाहरण 1
1) भूमि पर कृषि करने से कृषि आय ज्ञात कीजिए:
  • i) कृषि उत्पाद की बिक्री से आय (sale proceeds of agricultural produce) 1,70,000
  • ii) उपकरणों पर हास (Depreciation of equipments) 7,000
  • iii) श्रमिकों का खर्चा (Labour charges) 25,000
  • iv) बीजों की लागत (Cost of seeds) 5,000
  • v) खाद की लागत (Cost of fertilizers) 30,000
  • vi) बिजली खर्च (Electricity charges 13,000

हल

कृषि आय की गणना

रु.

रु.

कृषि उत्पादन की विक्री से आय घटायें : खर्च

 

1,70,000

उपकरणों पर हास

7,000

 

श्रमिकों के खर्च

25,000

 

बीजों की लगात

5,000

 

खाद की लागत

3,000

 

बिजली खर्च

13,000

53,000

कृषि आय

 

1,17,000


उदाहरण 2
मि. राम किशन काफी, रबर एवं चाय की सम्पदा से आय प्राप्त करता है। उसकी एक नर्सरी भी है जिसमें वह पौधे उगाता है और बेचता है। 31 मार्च, 2020 को समाप्त होने वाले गत वर्ष की सम्पदा एवं नर्सरी की निम्नलिखित आय से कर निर्धारण वर्ष 2020-21 के लिए कर योग्य आय की गणना कीजिए।
i) रबर निर्माण (Manufacturer of Rubber 8,50,000
ii) कॉफी उगाकर निर्माण एवं संसाधित करना 2,50,000
iii) चाय निर्माण 3,50,000
iv) नर्सरी के पौधे बेचना 1,00,000

हल

श्री रामकिशन की कर निर्धारण वर्ष 2020-21 के लिए करयोग्य आय

i) काफी उगाकर निर्माण एवं संसाधित करना (व्यावसायिक आय 25% होगी)

62,500

ii) रबड निर्माण (व्यवसायिक आय 35%)

2,97,500

iii) चाय निर्माण (40% आय व्यावसायिक आय होगी।

1,40,000

iv) नर्सरी के पौधे बचना

कर मुक्त

करयोग्य आय

5,00,000


नोटः नर्सरी के पौधों के विक्रय से प्राप्त आय, कृषि आय है। अतः यह कर-मुक्त है।
krishi aay

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