समाज के प्रकार | samaj ke prakar

समाज के प्रकार

समाज एक प्रकार का नहीं होता। अनेक प्रकार के समाज हैं। इसलिए हम समाज को उद्योग-धंधों या कार्यों के आधार पर वर्गीकृत करते हैं। वे हैं -
  • शिकार तथा आहार संग्रहण समाज
  • पशु-पालन समाज
  • कृषि-समाज
  • ग्रामीण समाज
  • नगर समाज
  • औद्योगिक समाज
  • सूचना समाज

शिकार तथा आहार संग्रहण समाज

मानव समाज के विकास का पहला स्तर शिकार तथा संग्रहण ही है। यह समाज का प्राचीन तथा सरल स्तर है। यह समाज बहुत छोटा था जिसमें शिकार खेलना, मछली पकड़ना, शहद तथा कंदमूलों का संग्रह करना इनका प्रमुख कार्य था। इस समाज में उम्र तथा लिंग के आधार पर स्थान निर्धारण होता था। संपत्ति के अर्जन करने की इच्छा नहीं थी। मिल बाँटकर जीवन बिताना इस समाज का लक्षण था। अपने आहार के लिए जानवरों का शिकार पत्थर के औजारों से करते थे।

पशुपालन समाज

मानव समाज के विकास में पशुपालन दूसरा स्तर है। अपने जीवनाधर के लिए पशुओं को (गाय, भैंस,भेड़, बकरी आदि) अधिक संख्या में पालनेवाले समाज को पशुपालन समाज कहा जाता है । इस समाज में लगभग सौ से लेकर हज़ार लोग रहते थे । पशुपालन इस समाज का प्रमुख कार्य था । यह समाज एक नायक के नियंत्रण में था । ये लोग जीविकोपार्जन के लिए पशुपालन, शिकार खेलने और आहार संग्रहण करने में लग जाते थे ।

खानाबदोश और अर्ध खानाबदोश समाज
प्रारम्भ में मानवशास्त्रज्ञों के अनुसार पशुपालन करने वाले ही खानाबदोश थे। एनसैक्लोपीडिया ब्रिटानिका के अनुसार खानाबदोश एक विधा है। शिकार और आहार संग्रह के लिए, पशुपालन अथवा व्यापार के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्थान परिवर्तन करने की प्रक्रिया ही खानाबदोशी है। यह स्थानांतरण प्रक्रिया से भिन्न है। पशुपालन अथवा दूसरे काम-धंधों पर लोगों के समुदाय कहीं स्थायी रूप से टिके रहने पर भी पशुपालन अथवा दुसरे काम-धंधों पर स्थान परिवर्तन प्रक्रिया को आगे नढाते है। ऐसे समुदायों को खानबदोश अथवा अर्ध खानाबदोश समुदाय कहा जाता है। समुदायों को सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक सुरक्षा के आधार पर खानाबदोश अथवा अर्ध खानाबदोश के रूप में निश्चित कर सकते हैं।

कृषि-समाज

सामाजिक विकास के इस स्तर पर मानव खानाबदोशी जीवन छोड़कर एक ही स्थान में टिके रहता है। इस प्रकार का समाज कृषि पर निर्भर ग्रामवासियों का समूह है। अधिक लोग कृषि पर अवलंबित होकर जीवन यापन करनेवाले समाज को कृषि समाज कहा जाता है। कृषि करनेवालों को किसान कहा जाता है। ये कृषि के लिये जानवर और हल का उपयोग करते हैं।
भारत को देहातों (गाँवों) का देश कहा जाता है। भारत के प्राचीन साहित्य में ग्रामों का संघटन और उनके प्रशासन संबंध में विवरण है। ऋग्वेद में ग्राम के मुखिया को ग्रामस्थ कहा गया है। अनेक ग्रामों के समूह को विश, जन, देश जैसे प्रशासनिक भाग बनाया था। महाभारत में ग्राम के मुखिया को ग्रामिणी कहा जाता था। ग्रामों के समूह के मुखिया को दशमुखी शतमुखी और अधिपति कहा जाता था।
बोगार्डस के अनुसार मानव समाज का विकास ग्राम रूपों में हुआ है। ग्राम अत्यंत पुरानी संकल्पना होने पर भी उसे सटीक रुप से परिभाषित करना साध्य नहीं है । बोगार्डस के अनुसार लोगों की कम सघनता, सरल और मितव्ययी जीवन बिताने. प्राथमिक संबंधों से युक्त परिवारों का समूह ही ग्राम है। एस. सी. दबे के अनुसार एक ही स्थान में रहनेवाले परिवारों का समूह ही ग्राम है। इस समाजिक व्यवस्था में सामाजीकरण और सामाजिक नियंत्रण का कार्य दक्षता के साथ होता है।
लगभग ईसा पूर्व 3000 तक हल के अनुसंधान के साथ-कृषि-क्रांति का आरंभ हुआ है। गाँव इस देश की जीवनधारा हैं। भारत में करीब छ: लाख गाँव हैं जो भारतीय संस्कृति और परंपरा को रक्षक हैं। कृषि को ही अपना जीविकोपार्जन कर रहे हैं। ग्रामीण प्रदेशों में 59 प्रतिशत पुरुष और 75 प्रतिशत महिलाएं अपने जीविको पार्जन के लिए कृषि पर निर्भर हैं। 

ग्राम समाज

  1. ग्राम का आकार छोटा है : म्याक्स वेबर के अनुसार भारत के बहत से लोग ग्राम निवासी हैं। ग्राम सामान्यतः छोटे आकार में रहता है। जनघनत्वअधिक नहीं रहता।
  2. प्राथमिक तथा परिवरिक संबंधों का प्रभाव : ग्रामीण समाज में प्राथमिक संबंधअर्थात व्यक्तियों के बीच स्नेह, प्रेम, बंधुत्व आदि को देखा जा सकता हैं। परिवार भी अनेक रूप के सामाजिक जीवन पर प्रभाव डालता है। अविभक्त विशाल परिवार भारत के गाँवों की एक प्रमुख विशेषता है।
  3. सरल आर्थिक जीवन : भारतीय कषि विशेष रूप से प्रकति पर ही आधारित है। ग्रामीण जीवन सरल, मितव्ययी, निश्चित आय न होने के कारण और कम आय के कारण ग्रामीण जनता मितव्ययी आडंवरहीन जीवन व्यतीत करती है। सभ्यता बढ़ने पर भी उन्होंने अपने प्राचीन संप्रदायों को नहीं छोड़ा है। उनकी माँग सीमित हैं। इसके लिए संप्रदाय और कृषि उद्योग ही कारण है।
  4. पड़ोस : आस-पड़ोस ग्रामीण समाज की एक विशिष्ट विशेषता है । सार्वजनिक कार्यों में, जन्म-मरण के संदर्भ में, त्योहार-मेलों में आस-पड़ोस के लोग विशिष्ट कार्य निर्वहण करते हैं। कर्नाटक में इन्हे केरी (ओणी) कहा जाता है । महाराष्ट्र में वाड कहा जाता है।

कृषि समाज की सामाजिक रचना : कृषि समाज में होनेवाले प्रमुख आर्थिक गतिविधि जैसे भूस्वाभित्व, भूमि के साथ-संबंध और कृषि गतिविधि के आधार पर कृषि समाज की रचना को पहचाना जा सकता है।

जाजमानी पद्धति : जमानी पद्धति और जाति पद्धति दोनों एक साथ-कार्य रत थे। उस समय ज जमानी व्यवस्था सामाजिक-अर्थ व्यवस्था का अविभाज्य अंग बन गयी थी । जाति पद्धति में एक जाति दूसरी जाति के समूह पर निर्भर थी। सहकारिता से जीने के लिए प्रेरणा देती थी। ज जमानी व्यवस्था में दो प्रमुख वर्ग थे । एक वर्ग दूसरे वर्ग के लिये सेवा और कृषि गतिविधि की आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति करता था । इसके बदले में वह वर्ग अनाज, खाद्य सामग्रियाँ प्राप्त करता था।

जमीनदारी पद्धति : ज़मीनदार शब्द पर्शियन भाषा का शब्द है। जिसका अर्थ भूमिधारक है। यह पद्धति दिल्ली सुल्तानों के समय उदित मानी जाती है। चौदहवीं शताब्दी में जमीनदार शब्द एक प्रदेश के मुखिया के लिए प्रयुक्त होता था। राजपूतों की उपाधियाँ राय और राणा जमीनदार वर्ग बन गया था। ज़मीनदारी शब्द मगलों के समय में परम्परा में आया। अकबर के समय में किसानों की फसल को आनुवंशिक रूप से प्राप्त करने के लिए अधिकार रखनेवाले के लिए यह शब्द 17 वीं शताब्दी में प्रचार में आया ।

रैतवारी पद्धति : अंग्रेज सरकार के भारत के बह संख्या किसान वर्ग पर राजस्व निर्धारित कर 'कर' वसूल करने की नई भूमिधारण पद्धति से किसान शोषित होने लगे । शोषण मुक्त करने के लिए किसानों को जायदाद अधिकार की रक्षा करने लिए कोर्ट आफ डैरेक्टर ने 1817 में इस रैतवारी पद्धति जारी करने का आदेश दिया।

महल्वारी पद्धति : जमीनदारी और रैतवारी पद्धतियाँ जब अपेक्षित स्तर पहुँचने में विफल हुई तब तीसरी नई पद्धति के रूप में महल्वारी पद्धति को लाग किया गया। इस पद्धति में महल अथवा एस्टैट, फसल के आधार पर सरकार अनेक महलों के मालिक के समूह पर राजस्व निर्धारित करता था। महलों के मालिकों में कुछ लोगों को चुनकर महलों के पर्यवेक्षण और राजस्व वसूल करने के लिए नियुक्त किया जाता था ।

किराएदारी या काश्तकारी पद्धति : भू मालिक से खेती के लिए भूमि को लेनेवालो को किराएदार कहा जाता था। इन किराएदारों के दो प्रकार हैं - स्थाई और अस्थाई। स्थाई किराएदार करनेवाली भूमि पर थोड़ा अधिकार रखते थे, लेकिन अस्थाई किराएदार खेती करनेवाली भूमि पर किसी भी प्रकार का अधिकार नहीं रखते थे। भूमालिक इनसे भूमि छीनकर दूसरों को दे सकते थे। इस प्रतिकूल परिणाम को रोकने के लिए सरकार ने किराया नियंत्रण कानून लागू किया। किराएदार को भूमि अपने वश में रखने का अधिकार शासन के रूप में जारी में आया इसे भू-सुधार कहा गया। भूमि को वश में रखने की सीमा निर्धारित की गयी।

नगर समाज

नगर आदर्श समाज कहा जाता है। साथ ही साथ जटिल भी। अधिक जन संख्या से विविध प्रकार के सांस्कृतिक, व्यावसायिक, रचनात्मक भिन्नता और लक्षणों से युक्त नगर अपने बड़े आकार के कारण, विपरीत विकास के कारण अनेक समस्याओं से युक्त है। इसके बावजूद इतिहास से हमें यह ज्ञात होता है कि नगर जीवन कभी भी स्वागत योग्य हैं। आजकल नगर समुदायों का विकास, नगर समाज होकर नवीकृत जटिल समाज बन गया है।
भारत में नगर जीवन कोई नई बात नहीं है। सारे विश्व में अति प्राचीन सभ्यता में मेसोपोटामिया और मिस्र के बाद सिंधु नदी सभ्यता का स्थान है। अति उन्नत सभ्यता और नगर जीवन के विकास करने की कीर्ति भारत की है। हडप्पा, मोहनजोदडो, लोथल, कालीबंगा आदि अनेक बडे-छोटे नगर समुदायों का जन्म भारत की कीर्ति बढाता है। सभ्यता और नगर जीवन् परस्पर पूरक लगते हैं। अर्थात् सभ्यता के विकास में नगरीय जीवन प्रकाश में, अस्तित्व में आ रहा है।

औद्योगिक समाज

औद्योगिकरण के साथ इस प्रकार का समाज उत्पन्न हुआ। उत्पादन में वैज्ञानिक विधियों को उपयोग करना और ऊर्जा के स्रोत ढूँढ़ना इस समाज की विशषताएँ हैं। हाँगकांग, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, ब्राजिल और मैक्सिको इस सूची में सम्मिलित हैं। सीमित संख्या के लोग कृषि पर निर्भर हैं तो बहुत से लोग नगरों में उद्योगों पर निर्भर हैं।
औदयोगिक समाज में उत्पादन मानव श्रम से न होकर यंत्र चालित तकनीकों से चलता रहता है। यहाँ उत्पादन अधिक मात्रा में होता है। यह श्रम विभाजन पर निर्भर रहता है। औद्योगिक क्रांति (इ 1780) के फलस्वरूप समाज में उत्पादन प्रक्रियाएँ निरंतर होती हैं। इसके फलस्वरूप उत्पन मानव श्रम से न होकर यंत्र शक्ति से होता है। प्रारंभ में भापशक्ति पर आधारित यंत्रों द्वारा उत्पादन होकर अगले स्तर में बिजली से चालित यंत्र औद्योगिक व्यवस्था को बृहत मात्रा में बनायी है। वस्त्रोद्योग यंत्र कपास का धागा बनाकर वस्त्र तैयार कर ने आदि रुप में विस्तारित होकर आज कोयले द्वारा बृहत यात्रा में बायलर द्वार लोहे को भी गलानेवाले स्तर पर औद्योगिक क्षेत्र की उन्नति हुई है । औदयोगिक समाज की विशेषताओं का निम्नांकित रूप में विवरण दे सकते है।

औद्योगिक समाज की विशेषताएँ
  • उद्योग आधारित आर्थिकता : इस आर्थिकता में समाज अनेक वर्ग के होते हैं । जैसे पूँजीपती वर्ग, मज़दूर वर्ग और छोटे व्यापारी वर्ग यहाँ चलनेवाले बहुत से आर्थिक क्रियाकलाप औद्योगिक क्षेत्र से संबंधित होते है।
  • व्यावसायिक कौशल : इस समाज में व्यावसायिक कौशल तकनीक कार्य और उसके लिए आवश्यक कौशल, ज्ञान और प्रशिक्षण आवश्यक होता है। 
  • परिवहन और संपर्क : औदयोगिक समाज में परिवहन और संपर्क माध्यमों का विस्तार होता है। उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चा माल कारखानों तक ले आने के लिए और उत्पादित पदार्थों को बाज़ार तक ले जाने के लिए और विस्तृत रूप का परिवहन संपर्क इस समाज में रहता है।
  • स्थानांतरण हमारे ग्रामीण प्रदेश में कृषि क्षेत्र की आर्थिकता को डगमगा गया। इसने ग्रामीण समाज की सास्थिक व्यवस्था के अंतर्गत अनेक मतभेदों का उत्पन्न किया। इसके फलस्वरूप अविभक्त परिवार अपना अस्तित्व खोकर छोटे परिवार बन गये। इसके अलावा औदयोगिक समाज ने व्यावसायिक कौशल के द्वारा व्यक्ति केंद्रित वैयक्तिकता को पैदा किया।
  • सूचना समाज : सूचना समाज सभी वर्ग के लिए आवश्यक होने के कारण उसका महत्व बढ़ गया है। समाज में लोग अपनी सुविधाओं और अपने अभावों को पूर्ति के लिए सूचना समाज की ओर सहज रूप से चले जाते हैं। लोगों के लिए अपने अगले जीवन की अवश्यकता के लिए शिक्षा, वाणिज्य, उद्योग इत्यादि अंशों के लिए सूचना समाज सहायक बनता है। सूचना समाज से संबंधित अध्ययन और सिद्धात आर्थिकता पर ज्ञान के नियंत्रण के बारे में प्रमुख रूप से दो प्रकार की चर्चा करते हैं। एक सामाजिक अर्थ जीवन में सूचना तकनीकी महत्व बढ़ाना और उसके प्रभाव से संबंधित हो तो दूसरा सूचना स्वरूप ही बाज़ार की सामग्र बनाने के बारे में विश्लेषण करता है। इस प्रकार ज्ञान सामायिक, वैश्विक (Globalization) मुक्त समाज में एक व्यक्ति अथवा संस्था की संपदा मात्र न बनकर नहीं उत्पादन तकनीकी सामग्रियों में (Computer) आदि से ज्ञान का विनिमय हो रहा है। कंप्यूटर सूचना भंडार बन गए हैं।

समाज का अर्थ

समाज शास्त्र के अध्ययन में समाज प्रमुख अध्ययन वस्तु है। मानव समाज को वैज्ञानिक रुप से अध्ययन करने के लिए बनाया शास्त्र ही समाजशास्त्र है। व्यावति और समाज एक ही सिक्के के दो पहलू है। मानव अकेले नहीं जी सकता। मानव हमेशा सब के साथ समाज में रहता है। समाज मानव के सर्वागीण व्यक्तित्व विकास में सहायक है।
प्रत्येक समाज का जनजीवन, संस्कृति आचार, विचार, काम-धंधा आदि अंश एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में भिन्न होता है। उसी तरह ग्रामीण प्रदेश में कई भेड बकरियाँ गाय और अनेक तरह के जान वर हमें देखने को मिलते हैं। उसी तरह खेत, घरों के समूह खेत में काम करनेवाले किसानों को भी हम देख सकते हैं। बेंगलूर, मुंबई, दिल्ली जैसे शहर में रास्ते भर वाहन, अधिक जनसंख्या, बडी-बडी संस्थाएं, सरकारी दफ्तरें, अस्पताले आदि अनेक आधुनिक संस्थाओं को हम देख सकते हैं।

समाज का अर्थ
समाज यह हिंदी शब्द अंग्रेजी भाषा के 'सोसाइटी' शब्द का अनवाद है । सोसाइटी पद लैटिन भाषा के सोषियस पद से आया है। इसका अर्थ-में रहना, मित्रता अर्थात् एक साथ रहने, एकत्रित होकर रहने की व्यवस्था ही समाज है। 

समाज की परिभाषाएं

मैकाइवर और पेज के अनुवाद ; सामाजिक संबंधों का जाल ही समाज है । एक समुदाय के अंतर्गत आनेवाली संस्थाओं, संघों की संकुल व्यवस्था ही समाज है।

समाज स्वरूप

समाज समूहों का समूह है : कई लोगों के एकत्रित होने से एक समूह बनता है । ऐसे अनेक समूह एकत्रित होकर समाज का निर्माण करते है । प्रत्येक समाज में परिवार, आस-पडोस, ग्राम, नगर, मज़दूरों के संघ, धार्मिक समूह आदि समूह होते हैं । इस कारण एच्. एम्. जान्सन ने कहा है कि समूहों का समूह ही समाज है।

समाज सामाजिक संबंधों का जाल है : समाज का अर्थ केवल लोगों का समूह ही नहीं है। वह निरंतर रूप से सक्रिय पारस्परिक व्यवहार में लगे हुए लोगों का समूह है। इसके सामाजिक संबंधों की व्याप्ति विशाल है । उदाहरण के लिए यहाँ हम गुरु-शिष्य, अभिभावक बच्चे, रोगी-डाक्टर, पति-पत्नि-आदि संबंध-देखते हैं । इसलिए मेकइवर और पेज ने समाज को सामाजिक संबंधों का जाल कहा है।

तुलना और साम्यता : समाज की रचना के संदर्भ में तुलना प्रमुख भूमिका निभाती है। लोगों की शारीरिक, मानसिक समानता ही समाज का आधार है। लोगों के आकांक्षाएँ, काम-धंधे, लक्ष्य, आदर्श, मूल्य आदि में समानता दिखाई देती है । यह लोगों में पारस्परिक मित्रता, सहाकरिता, प्रेम, विश्वास, सहानुभूति, त्याग, एकता आदि भाव विकसित होकर मिल जुलकर रहने प्रेरणा देता है ।

सहकार और श्रमविभाजन : सहकार से तात्पर्य है लोगों का अपने समान उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए मिलजुलकर कार्य करना। सहकार मनोभाव के होने से ही लोग समाज में आपसी सुख-दुख में भाग लेते हैं। इसी प्रकार श्रम विभाजन किसी कार्य का आपसी बँटवारा करता है। श्रम विभाजन लोगों की - अभिरुचि, सामर्थ्य, लिंग और उम्र के आधार पर बँटवारा होता है। इसलिए सहकार और श्रम विभाजन आपस में पूरक हैं।

सामाजिक नियंत्रण : समाज का अपना रीति-रिवाज होता है। यह आधुनिक समुदाय समाज कानून, प्रशासन, संविधान द्वारा लोगों के व्यवहारों को औपचारिक या अनौपचारिक माध्यम जैसे पद्धतियों, नैतिक नियमों, रूढियों द्वारा नियंत्रित करता है।

समाज गतिशील है : समाज हमेशा परिवर्तन शील हैं। परिवर्तन के बिना किसी भी समाज का दीर्घ समय तक रहना संभव नहीं है। जैसे ग्रामीण समाज का परिवर्तन मंदगति से और नगर समाज का परिवर्तन तीव्र गति से होता है।

समाज का महत्व

सर्व व्यापी है : मानव-जीवन और समाज दोनों एक साथ-चलते हैं। समाज ही जीवन को सुगम बनाता है किसी व्यक्ति के दृष्टिकोण में व्यक्ति के जन्म से पहले और व्यक्ति की मृत्यु के बाद भी समाज अस्तित्व में रहता है। इसलिए समाज निरंतर और सर्वव्यापी है।

सुरक्षा तथा पोषण के लिए आवश्यक हैः जन समूह के साम्य-वैषम्य, आपसी सहकार, नियंत्रण, सामाजिक परिवर्तन, अधिकार स्वतंत्रता, संस्कृति-सामरस्य आदि की सम्मिश्रण व्यवस्था ही समाज है।

व्यक्तित्व के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है : समाज हमारे जीवन की दिशा, लक्ष्यों को निर्धारित करता हैं । मानवीय गुण समाज में ही विकसित होते हैं। समाज हमारी प्रतिभा की अभिव्यक्ति के लिए अवसर प्रदान करता है। इसके साथ समाज मानवसहज दुर्बलताओं, दोषों, अदम्य इच्छाओं को नियंत्रित करता है। हमारा भौतिक विकास, आवश्यकताओं पूर्ति समाज के बिना कष्टसाध्य हैं।
जीवन को सुदृढ़ बनाता है। समाज जैसी विशाल व्यवस्था हमारे जीवन को घेरे रहती हैं। वह केवल बाह्य रूप से न घेरकर हमारे मन की गहराई तक प्रभाव डालती है। व्यक्ति और समाज का संबंध सरल नहीं है। यह व्यक्ति के चिंतन तथा भाव का निर्माण करता है। इसके दवारा हमारा सामाजिक जीवन सुदृढ बनाता है।
samaj ke prakar

Post a Comment

Post a Comment (0)

Previous Post Next Post