विजयनगर साम्राज्य - विजयनगर साम्राज्य का इतिहास | vijay nagar samrajya

विजयनगर साम्राज्य

दिल्ली सल्तनत एक अखिल भारतीय साम्राज्य स्थापित करने में असफल रही। तेरहवीं शताब्दी में दक्षिण भारत को अपने नियन्त्रण में लाने के लिए सल्तनत की महत्त्वाकांक्षाओं से, जिनके फलस्वरूप सैनिक संघर्ष भी हुए, एक अनिश्चितता का वातावरण उत्पन्न हो गया। इस प्रायद्वीप के असंख्य छोटे-छोटे राज्य को बराबर यह आशंका बनी रही कि कहीं तुर्कों द्वारा विजित होना ही उनकी नियति न हो। परन्तु चौदहवीं शताब्दी में यह वातावरण बदल गया, क्योंकि सल्तनत की दुर्बलता प्रकट हो चुकी थी।
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दक्षिण के तुर्क राज्यपाल ने विद्रोह करके बहमनी राज्य की स्थापना कर ली थी लेकिन इससे एक दशक पूर्व विजयनगर का स्वतन्त्र राज्य सुदूर दक्षिण में स्थापित हो चुका था, जहां कभी होयसल राजाओं का शासन था। विजयनगर राज्य की स्थापना का अप्रत्यक्ष सम्बन्ध इस तथ्य से भी था कि प्रायद्वीप को अपने आधिपत्य में लाने में सल्तनत असफल रही थी। विजयनगर के उत्थान से पतन तक संगम, सुलुब एवं अरविन्द वंश का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा तथा अंत में तालीकोट के युद्ध में इसकी पराजय के साथ पतन प्रारम्भ हो गया।

विजयनगर साम्राज्य की स्थापना

वारंगल पर मुस्लिम आक्रमण के दौरान, सल्तनत को सेना दो स्थानीय राजकुमारों हरिहर तथा बुक्का को बन्दी बनाकर दिल्ली ले आयी थी, जहां उन्हें मुसलमान बना लिया गया और सल्तनत की सत्ता को पुनः स्थापित करने के लिए उन्हें वापस दक्षिण भेज दिया गया। दोनों राजकुमार अपने इस कार्य में सुलझे हुए, परन्तु उनमें अपने निजी राज्य स्थापित करने की इच्छा प्रबल हो गयी। जिस समय मुहम्मद तुगलक की योजनाओं से सर्वव्यापी असन्तोष फैल रहा था, उस समय लगभग 1336 ई. में हरिहर हस्तिनावती (आधुनिक हम्पी) का राजा बना और आगे चलकर वही राज्य विजयनगर कहलाया।
कालान्तर में इन दोनों भाइयों ने पुनः हिन्दू धर्म ग्रहण किया। यह कार्य राज्य, प्राप्त करने से कठिन रहा होगा, क्योंकि इस्लाम ग्रहण करने से वे जाति से बहिष्कृत हो गये थे और तत्कालीन वर्ण व्यवस्था के अनुसारपुन: वर्ण मर्यादा प्राप्त करना असम्भव था। परन्तु उस क्षेत्र के एक समादृत धर्माचार्य विद्यारण्य ने इस दोनों भाइयों को न केवल वर्ण-व्यवस्था में ही पुनः सम्मिलित कर लिया अपितु समस्त कठिनाइयों को यह कहकर दूर कर दिया कि हरिहर वास्तव में स्थानीय देवता का प्रतिनिधि है।
विजयनगर पर कुल चार राजवंशों ने शासन किया जो इस प्रकार थे -
  • संगम वंश (1336-1485 ई.)
  • सुलुव वंश (1485-1505 ई.)
  • तुलुव वंश (1505-1570 ई.)
  • अरविन्दू वंश (1570-1614 ई.)

विजयनगर साम्राज्य के शासक और शासनकाल

राजवंश

शासक/संस्थापक

शासनकाल

संगम वंश

बुक्का व हरिहर

1336-1485

सुलुव वंश

नरसिंह

1485- 1505

तुलुव वंश

वीर नरसिंह

1505- 1570

अरविन्दू वंश

तिरूमल्ल (तिरुमला)

1570-1614


संगम वंश (1336 ई.-1485 ई.) :

हरिहर, बुक्काराय और उनके उत्तराधिकारी संगम वंशीय कहलाते थे, जिन्होंने विजयनगर पर लगगभग 150 वर्ष तक शासन किया।
इस वंश के शासकों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-

हरिहर (1336-1356 ई.)
संगम वंश का पहला शासक हरिहर था, जो 1336 ई. में गद्दी पर बैठा। उसने अपनी शक्ति को दृढ़ करने के लिए विजयनगर में एक दुर्ग का निर्माण करवाया। इसके पश्चात उसने नालौर प्रदेश में उदयगिरि के प्रसिद्ध दुर्ग की नींव रखी। उसने होयसल राज्य के एक बढ़े भाग को विजय करके अपने राज्य का विस्तार किया। डॉ. गजूगदार लिखते हैं, "हरिहर के शारानकाल के अन्तिग वर्षों में विजयनगर का अधिकार क्षेत्र बहुत बढ़ गया और उसने एक साम्राज्य का रूप धारण कर लिया था।

बुक्काराय (1356-1377 ई) (बुक्का)
हरिहर की मृत्यु के बाद उसका भाई बुक्काराय (बुक्का) सिंहासन पर बैठा। उसका अधिकांश समय बहमनी राज्य के सुल्तान के साथ युद्ध करने में व्यतीत हुआ। युद्ध का प्रमुख कारण यह था कि दोनों ही राज्यों के शासक रायचर दोआब के उपजाऊ प्रदेश पर अधिकार करना चाहते थे। फरिश्ता के अनुसार , "यद्यपि दोनों शासकों को अन्त में एक सन्धि करनी पड़ी, तथापि इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि इस युद्ध में बुक्कराय का पलड़ा भारी रहा।" बुक्काराय ने मदुरा को विजय किया और वहां के मुसलमानों को मार भगाया। इस विजय फलस्वरूप लगभग सम्पूर्ण दक्षिणी भारत पर बुक्का का अधिकार हो गया। 1374 ई. में बुक्का ने चीन में अपना एक दूत भेजा। 1377 ई. में बुक्काराय की मृत्यु हो गई।
नीलकण्ठ शास्त्री ने लिखा है, "बुक्काराय अपने समय का एक महान शासक था, जिसे विजयनगर साम्राज्य का सच्चा निर्माता होने का श्रेय दिया जा सकता है। वह एक कुशल योद्धा था, जिसे मुसलमानों के विरुद्ध महान् सैनिक सफलताएं प्राप्त हुई। धर्मान्धता के इस युग में भी बुक्काराय उदारचित्त व्यक्ति था। उसने वेद-विद्या के प्रसार को बहुत प्रोत्साहन दिया।"

हरिहर द्वितीय (1377-1404 ई.)
हरिहर प्रथम और बुक्काराय में से किसी ने भी राजा या महाराज की उपाधि नहीं की। बुक्काराय की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र हरिहर द्वितीय विजयनगर का शासक बना। गद्दी पर बैठते ही उसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की। उसने अपने वीर पुत्र वीरवक्ष की सहायता से अनेक विद्रोह का सफलतापूर्वक दमन किया। हरिहर द्वितीय ने 1377 ई. में बहनमी राज्य के सुल्तान मुजाहिदशाह को 'अदोनी' नामक स्थान पर पराजित किया। सन् 1404 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। उसने अपने शासनकाल में विजयनगर साम्राज्य का विस्तार किया, व्यापार को उन्नत बनाया और अनेक शासन–सम्बन्धी सुधार किए।

देवराय प्रथम (1406-1422 ई.)
हरिहर द्वितीय की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों में गद्दी के लिए संघर्ष हुआ और अन्त में 1 नवम्बर, 1406 ई. को देवराय प्रथम विजयनगर का शासक बना। उसने सोलह वर्ष तक शासन किया।
देवराय प्रथम ने अपने राज्य को सुरक्षित रखा और साम्राज्य का विस्तार भी किया। फरिश्ता के अनुसार, "फीरोज तुगलक ने बिना किसी विरोध के विजयनगर पर आक्रमण किये, परन्तु हार खाई। पराजित हाकर भी उसने संघर्ष जारी रखा और अन्त में देवराय को उससे सन्धि करनी पड़ी। देवराय ने अपनी एक पुत्री का विवाह भी फिरोज तुगलक से कर दिया। आधुनिक इतिहासकार फरिश्ता के इस मत को सही नहीं मानते हैं। 1422 ई. के लगभग देवराय की मृत्यु हो गई। देवराय ने अपनी सैनिक शक्ति हो सुदृढ बनाने के लिए अरब और ईरान से घोड़े खरीदकर मंगवाए। डॉ. वेंकटरमैया के अनुसार, "उसके शासनकाल में विजयनगर सचमुच ही विद्यानगर' बन गया था, जहां बड़े-बड़े विद्वान् शिक्षा लेते-देते थे।"

देवराय द्वितीय (1422-1446 ई.)
देवराय द्वितीय संगम वंश का एक महान् शासक था, जिसने बहमनी राज्य के साथ अनेक युद्ध लड़े और विजयनगर को मुसलमानों के आक्रमणों से सुरक्षित रखा। उसने अपने 25 वर्ष के शासनकाल में विजयनगर साम्राज्य का विस्तार किया। उसने व्यापार तथा साहित्य को प्रोत्साहन दिया। उसके शासनकाल में दो विदेशी यात्री (इटली का निकौलो कौण्टी और ईरान का अब्दुर्रज्जाक) विजयनगर में आए।
इटली के यात्री कौण्टी ने लिखा है, "विजयनगर का बादशाह भारत में सबसे शक्तिशाली है। उसके महल में 12,000 स्त्रियां हैं। इन सबके लिए राजा के मरने पर सती होना जरूरी है।" ईरानी यात्री अब्दुर्रज्जाक ने बादशाह के बारे में लिखा, "राजा कद का लम्बा तथा शरीर का पतला है। उसका रंग गेहूंआ है। वह गले में बहुमूल्य मोतियों की एक माला पहनता है, जिसकी कीमत का अनुमान करना कठिन है।"

संगम वंश का पतन
देवराय की मृत्यु के पश्चात् उसके उत्तराधिकारी (मल्लिकार्जुन और बीरुपाक्ष) दुर्बल प्रमाणित हुए। इससे उत्साहित होकर प्रान्तीय शासकों ने विद्रोह कर दिया। बहमनी सुल्तान ने रायचूर दोआब पर अधिकार कर लिया ओर डीसा के राजा पुरुषोत्तम गजपति ने भी विजयनगर के विरुद्ध अभियान भेजा। अन्त में विजयनगर का एक हिन्दूसरदार नरसिंह 1485 ई. में वीरुपक्ष को गद्दी से उतार कर शासक बन गया। इस प्रकार विजयनगर में संगम वंश के स्थान पर सालुव वंश का राज्य स्थापित हुआ।

सुलुव वंश (1485-1505 ई.)


नरसिंह (1485-1490 ई.)
सुलुव वंश के संस्थापक नरसिंह ने अपने छ: वर्ष के शासनकाल में उन सब शासकों को नीचा दिखाया, जो उसकी सत्ता को मानने के लिए तैयार नहीं थे। वह बहमनी ओर उड़ीसा के सुल्तानों के विरुद्ध सफलता प्राप्त नहीं कर सका। उसने सैनिक-शक्ति सुदढ करने के लिए अरब सौदागरों से बहुत से घोड़े खरीदे और विजयनगर के शान्तिप्रिय किसानों को शक्तिशाली योद्धाओं में परिवर्तित कर दिया। 1490 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

सुलुव वंश का अन्त
नरसिंह के उत्तराधिकारी कमजोर एवं अयोग्य प्रमाणित हुए। इससे उत्साहित होकर उसके सेनापति वीर नरसिंह तलुवा ने सुलुव वंश के अन्तिम शासक को 1505 ई. में गद्दी से उतार दिया और स्वयं शासक बन गया।

तुलुव वंश (1505 ई.-1570 ई.)

इस वंश में निम्नलिखित राजा हुए -

वीर नरसिंह (1505-1509 ई.)
तुलुव वंश के संस्थापक वीर नरसिंह ने विजयनगर पर केवल 5 वर्ष राज्य किया। उसे अपने शासन काल में निरन्तर विद्रोहों से जूझना पड़ा। अतः शासन प्रबन्ध की ओर पूरा ध्यान नहीं दे सका। फिर भी उसने राज्य के सैन्य संगठन में अनेक सुधार किए और पुर्तगालियों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किए। उसने अपनी प्रजा में साहस और शूरवीरता का संचार करने का पूर्ण प्रयत्न किया। कुछ करों को हटाकर उसने प्रजा को राहत देने की भी कोशिश की।

कृष्ण देवराय (1509-1529 ई.)
वीर नरसिंह की मृत्यु के बाद उसका भाई कृष्ण देवराय गद्दी पर बैठा। वह न केवल तुलुव वंश का बल्कि विजयनगर साम्राज्य का सर्वश्रेष्ठ राजा सिद्ध हुआ और इतिहास में उसे भारत का एक महान शासक बनने का श्रेय प्राप्त है। 1509 ई. तक के अपने 20 वर्ष के शासन काल में उसने विजयनगर को एक विशाल और गौरवपूर्ण साम्राज्य बना दिया।

विजएं - कृष्ण देवराय बहुत ही शूरवीर और कुशल सेनापति था जिसने अपने शासन काल में आन्तरिक विद्रोहों को दबाया और उन सब प्रदेशों को वापस छीन लिया जो बहमनी सुल्तान और उड़ीसा नरेश ने पहले छीन लिए थे। उसने अनेक युद्ध किए और सभी में सफलता प्राप्त की। उसे अपने जीवन में कभी पराजय हाथ नहीं लगी। युद्धों में उसने सेना का नेतृत्व किया।
1509 ई. के अन्तिम दिनों में उसने बहमनी सुल्तान महमूदशाह को करारी हार दी। अगले ही वर्ष उसने दक्षिण मैसूर में उम्मतूर के विद्रोह सरदार को दबाया। 1511-1512 ई. में उसने शिव समुद्रम् के दुर्ग पर कब्जा कर लिया। उसने उड़ीसा के शासक गजपति प्रतापरूद्र पर भी आक्रमण किया और अन्त में एक लम्बे युद्ध के बाद 1518 ई. में दोनो पक्षों में सन्धि हो गई जिसके अनुसार गजपति ने अपनी पुत्री का विवाह कृष्णदेव से कर दिया और कृष्णदेव ने उड़ीसा के जीते हुए प्रदेशों को लौटा दिया।
1512 ई. में कृष्ण देवराय ने बीजापुर के शासक इस्माइल आदिलशाह से रायत्तूर दोआब छीन लिया। वह उसकी उत्तर में सबसे महान विजय थी। इसके बाद उसने अपने योग्य मन्त्री सालुवत्तिम्म के परामर्श का आदर करते हुए उत्तर के मुस्लिम शासकों से छेड़-छाड़ नहीं की।
कृष्ण देवराय को मार्च, 1520 ई. में बीजापुर सुल्तान इस्माइल आदिलशाह से पुनः जूझना पड़ा, क्योंकि उसने रायचूर दोआब वापस छीनने का प्रयत्न किया। कृष्णदेव ने केवल उसे पराजित ही नहीं किया बल्कि बीजापुर राज्य के विख्यात दुर्ग 'गुलबर्गा' को मिट्टी में मिला दिया।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि कृष्णदेव ने महान् सैनिक सफलताओं द्वारा अपने साम्राज्य की शक्ति और सीमाओं को बढ़ाया। विजयनगर राज्य की सीमाएं पूर्व में विजगापट्टम, पश्चिम में दक्षिण कोंकण और दक्षिण में समुद्र तक फैल गई।

पुर्तगालियों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध
कृष्णदेव ने पुर्तगालियों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किए। उन्हें व्यापारिक सविधाएं प्रदान की ओर उसने अपनी सेना के लिए अच्छे घोड़े खरीदे। कृष्णदेव के समय अनेक पुर्तगाली सौदागर ओर यात्री विजयनगर में आने लगे।
यद्यपि कृष्णदेव ने पुर्तगालियों को दोस्त बनाया, लेकिन उसने उन्हें अपने राजनीतिक कार्यों में हस्तक्षेप करने की आज्ञा न दी। सन् 1523 ई. में पुर्तगालियों द्वारा गोआ प्रदेश पर अधिकार करने के प्रयत्न करने पर कृष्णदेव ने उनके विरूद्ध शक्तिशाली सैनिक टुकड़ी भेज दी।

शासन प्रबन्ध
कृष्णदेव ने युद्धों में व्यस्त रहते हुए भी शासन प्रबन्ध की ओर काफी ध्यान दिया। उसने राज्य में अनेक तालाब बनवाए और नहरें खुदवाई ! उसने कुछ अनुचित कर भी हटा दिए। कृषि को उसने प्रोत्साहन दिया जिससे राजकोष में आय बढ़ी। विजयनगर के समीप उसने नगलपुर नामक नगर बसाया और उसे सुन्दर भवनों व मन्दिरों से अलंकृत किया।

कला व साहित्य को संरक्षण
कृष्णदेव ने कला और साहित्य को पूरा संरक्षण दिया। विद्वानों, कवियों और कलाकारों को उसने इतना प्रोत्साहन दिया कि उसे लोग आन्ध्र प्रदेश का भोज कहते थे। तेलगु साहित्य की उसके शासन काल में विशेष उन्नति हुई। उसके दरबार में तेलगु भाषा के 8 प्रसिद्ध कवियों को संरक्षण मिला हुआ था।
निष्कर्षता कृष्ण देवराय के समय विजयनगर की शक्ति और समृद्धि का चरमोत्कर्ष हुआ।

अच्युतराय (1529-1542 ई.)
कृष्ण देवराय की 1529 या 1530 ई. के लगभग मृत्यु को गई। तत्पश्चात उसके भाई अच्युतराय ने 1541-42 ई. तक शासन किया। अच्युतराय के बाद उसका पुत्र बैंकट गद्दी पर बैठा जिसका शासन केवल 6 महीने रहा।

सदाशिवराय (1542-1570 ई.) तथा तालीकोट का युद्ध (1565 ई.)
बैंकट के बाद अच्युतराय का भतीजा सदाशिवराय गद्दी पर बैठा। वह अपने मन्त्री रामराय के हाथों की कठपुतली बना रहा जो अरविन्दू वंश का था। रामराय ने अपनी अविवेकपूर्ण नीति से विजयनगर साम्राज्य को पतन की ओर धकेल दिया। उसने उत्तर-दक्षिण के मुस्लिम राज्यों के बीच पड़ना शुरू कर दिया जिससे सभी मुस्लिम शासक विजयनगर राज्य के विरुद्ध हो गए। अन्त में बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुण्डा और बीदर के शासकों ने विजयनगर के विरुद्ध एक संघ बनाया जिसका उद्देश्य विजयनगर की शक्ति को कुचल देना था। 23 जनवरी, 1565 ई. को इन मुस्लिम शासकों ने संयुक्त होकर विजयनगर पर आक्रमण कर दिया। कृष्णा नदी के तट पर तालीकोट नामक स्थान पर भयानक युद्ध में रामराय पकड़ा गया जिसे अहमदनगर के सुल्तान निजामशाह ने जान से मार दिया। विजयी मुस्लिम सेनाओं ने चारों ओर भयानक लूट-मार मचाई। फरिश्ता के अनुसार इस लूट से इतना माल हाथ लगा कि प्रत्येक सैनिक बहुत मालदार बन गया। विजेता मुस्लिम सेना ने विजयनगर में जो तबाही और बर्बादी मचाई, वह वर्णन से बाहर है। तालीकोट का युद्ध विजयनगर के पतन के सन्दर्भ में निर्णायक सिद्ध हआ। मुस्लिम सुल्तानों ने राज्य के कुछ भाग पर अपना अधिकार कर लिया और राज्य की सैनिक शक्ति को गम्भीर क्षति पहुंचाई। इसके बाद विजयनगर राज्य फिर सम्भल नहीं सका।

अरविन्दू वंश (1570 ई.-1614 ई.)

मुस्लिम सुल्तानों ने विजयनगर साम्राज्य के काफ भाग पर अपना अधिकार जमा लिया और शेष भाग पर रामराय के भाई तिरूमल ने (1570 ई. के लगभग) कब्जा जमा कर आरबीदू वंश की नींव डाली। इस वंश के शासकों ने लगभग 1614 ई. तक राज्य किया। इस वंश के सभी शासक अयोग्य और निर्बल सिद्ध हुए जो विजयनगर को नष्ट होने से बचा न सके। प्रान्तीय गवर्नर स्वतन्त्र होते गए ओर कुछ इलाके बीजापुर व गोलकुण्डा के कब्जे में चले गए। आरवींदू वश का अन्तिम शासक रंग तृतीय बड़ा ही अयोग्य निकला। उसी के समय 1614 ई. के आसपास विजयनगर राज्य समाप्त हो गया। उत्तरी भाग पर मुसलमानों ने अधिकार कर लिया ओर दक्षिणी भाग पर मदुरा व तंजौर के नायकों ने अपने स्वतन्त्र राज्य काम कर लिए।

शासन-प्रबन्ध

विजयनगर के अधिकांश शासक कुशल शासन-प्रबंधक थे। उनके शासन की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार थीं -

राजा
राजा राज्य का सर्वोच्च अधिकारी था तथा राज्य की सभी शक्तियां उसके हाथों में केन्द्रित थी। वह निरंकुश होता था। वह मंत्रियों के परामर्श के अनुसार शासन का संचालन करता था, किन्तु वह उनके परामर्श को मानने के लिये बाध्य नहीं था। राजा ही मंत्रियों को नियुक्त करता था।

मंत्रिमंडल
मन्त्री शसन संचालन में राजा की सहायता करते थे। मन्त्री राज्य के विभिन्न विभागों के प्रमुख होते थे। वे राजा द्वारा नियुक्त किये जाते थे। मन्त्री पद पर सभी जाति के व्यक्तियों को (शूद्र को छोड़कर) नियुक्त किया जाता था। इसके अलावा प्रान्तीय सूबेदार, सेनापति तथा पण्डित भी विभिन्न विषयों पर राजा को परामर्श देते थे। नीलकंत शास्त्री के अनुसार, "केन्द्रीय सरकार के दो राजकोष थे। छोटे राजकोष द्वारा दैनिक लेने-देन का काम होता था, जबकि बड़ा राजकोष सीधा राजा के नियंत्रण में होता था। उसमें राजा की सम्पत्ति होती थी।'

प्रान्तीय शासन

साम्राज्य प्रान्तों में, प्रान्त कोट्टम तथा जिलों में विभक्त था। एक कोट्टम में कई गांव होते थे। प्रान्तों का शासक प्रान्तपति होता था, जो एक शक्तिशाली व्यक्ति होता था। नीलकण्ठ शास्त्री के अनुसार, "शासकीय इकाइयों तथा उनके कर्मचारियों के राज्य में भिन्न-भिन्न नाम थे, परन्तु प्रत्येक प्रान्त का शासक अवश्य ही प्रान्तपति होता था। देश में कुछ ऐसे भी भाग थे, जहां प्राचीन शासकों को राज्य करने की आज्ञा दी गयी थी, परन्तु वे विजयनगर शासक का आधिपत्य मानते थे तथा उसे वार्षिक कर भी नियमित रूप से देते थे। प्रान्तपति का पद साधारणतया राजकुमारों को दिया जाता था।

स्थानीय शासन

गांव-शासन की सबसे छोटी इकाई थी तथा उसका शासन पंचायत द्वारा चलाया जाता था।

वित्तीय व्यवस्था

राज्य की आय का मुख्य साधन भूमि कर था, जो 1/6 से 1/2 भाग तक लिया जाता था। भूमि की पैमाइश की जाती थी। चरागाह, चुंगी, व्यवसाय, गृह, कुम्हार, मोची, धोबी, नाई, वेश्या आदि पर कर लगाया जाता था, किन्तु कर उदारता से वसूला जाता था।

न्याय व्यवस्था

न्याय व्यवस्था भी सुसंगठित थी। न्याय हेतु राज्य में कई न्यायालय होते थे। राज्य का सर्वोच्च न्यायाधीश राजा स्वयं होता था। वह मुकद्दमों का निर्णय भी करता था। न्याय हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार किया जाता था। दण्ड विधान कठोर था। मृत्यु दण्ड, अंग-भंग, जुर्माना आदि दण्ड दिये जाते थे।

सैन्य प्रबन्ध

विजयनगर राज्य का सैन्य-प्रबंध भी उत्तम था। संभवतः विजयनगर की सेना में तोपखाना व जलसेना भी शामिल थी। घुड़सवार सेना के मुख्य अंग थे तथा विजयनगर के शासकों ने अरबों तथा पुर्तगालियों से घोड़े खरीदे थे। अब्दुर्रजाक के अनुसार, "विजयनगर राज्य में बहुत से सैनिक स्कूल थे, जिनमें वहां के देशवासियों को तलवार तथा धनुष चलाने की शिक्षा दी जाती थी। केवल राजधानी में 90, 000 ऐसे व्यक्ति थे, जो शास्त्र चलाना जानते थे।'' राज्य में 200 सामन्त थे, जो आवश्यकता पड़ने पर राजा की सहायता करते थे।

धार्मिक सहिष्णुता

विजयनगर के शासक वैष्णव धर्मावलम्बी थे, परन्तु उन्होंने अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णुता की नीति अपनाई। बारबोसा ने लिखा है - "राजा ने इतनी स्वतंत्रता दे रखी है कि कोई भी व्यक्ति इच्छानुसार विचरण कर सकता है तथा अपने धर्म के अनुसार जीवन बिता सकता है, उसे न कोई कष्ट देगा और न यह पूछेगा कि तुम ईसाई, यहूदी, मुसलमान अथवा हिन्दू हो।"

साहित्य तथा कला का विकास

विजयनगर राज्य में साहित्य तथा कला का भी बहुत विकास हुआ।

साहित्यिक उन्नति
विजयनगर राज्य में हिन्दू धर्म एवं साहित्य की बहुत उन्नति हुई तथा संस्कृत भाषा का पुनरुद्धार हुआ। माधवाचार्य ने "न्याय-शास्त्र" पर एक ग्रंथ लिखा तथा सायण वेदों का महान् टीकाकार था। विजयनगर में तेलगु तथा कन्नड़ साहित्य का बहुत विकास हुआ। कृष्णदेव राय ने 'अमुक्त माल्यद' नामक ग्रन्थ लिखा। नीलकण्ड शास्त्री के अनुसार, "यह तेलगु भाषा के पांच प्रसिद्ध काव्यों में एक मानी जाती है।" इसके दरबार में 8 महान् कवि थे। रानी गंगादेवी ने 'मदुरा विजय' नामक ग्रन्थ लिखा।
विजयनगर के राजा बड़े साहित्य प्रेमी थे। इनके राज-दरबार में अनेक विद्वानों को आश्रय प्राप्त था। इनके शासनकाल में संस्कृत तथा तेलगू साहित्य की बड़ी उन्नति हुई। सायण एवं माधव दो सगे भाई थे। इन दोनों को विजयनगर की राज्य सभी में आश्रय प्राप्त था। माधव ने 'सुदर्शनसंग्रह' नामक गन्थ लिखा तथा सायण ने ऋग्वेद संहिता, ऐतरेय ब्राह्मण तथा आरण्यक उपनिषदों पर टीकाएं लिखीं। ये दोनों भाई बुक्का प्रथम की राज्यसभा के रत्न थे। लक्ष्मीधर नामक विद्वान ने 'सरस्वती विकास' तथा 'सौन्दर्य लहरी' नामक ग्रन्थ लिखे। भट्टोजी दीक्षित ने 'सिद्धान्त कौमुदी लिखा। श्रीसराज ने 'मायावाद खण्डन' नामक ग्रन्थ लिखा। तेलगू साहित्य की भी पर्याप्त उन्नति हुई। कृष्णदेवराय स्वयं विद्वान था तथा उसके दरबार में उच्चकोटि के विद्वानों को राजश्रय प्राप्त था।

कला के क्षेत्र में उन्नति
विजयनगर के शासक कला-प्रेमी भी थी। उन्होंने कई कलात्मक भवन बनवाये। विजयनगर के हजारा तथा विट्ठलस्वामी नामक दो मन्दिर प्रसिद्ध है। विट्ठलनाथ का मन्दिर विशाल, भव्य तथा कलात्मक है। विरूपाक्ष द्वितीय निर्मित हजारा मन्दिर भी तत्कालीन कला की सुन्दर कृति है। इसमें राम के जीवन से सम्बंधित दृश्य बनाये गये हैं। इसके अतिरिक्त चित्रकारी, संगीत-कला के क्षेत्र में भी बहुत विकास हुआ।
निकोलों कोण्टी एवं अब्दुलरज्जाक के विवरणों से विदित होता है कि विजयनगर के राजाओं को कला से बड़ा प्रेम था। स्थापत्य कला के क्षेत्र में काफी उन्नति हुई। राजाओं ने अपनी राजधानी में भव्य भवन तथा सुन्दर मन्दिरों का निर्माण करवाया। राजाओं ने अनेक जलाशय तथा तालाब भी बनवाये थे। भवनों तथा मन्दिरों की दीवारों पर चित्रकारी की जाती थी। राजा कृष्णदेव राय ने सुन्दर 'हजारा' का मन्दिर बनवाया था। इस मन्दिर की दीवारों में राम की कथा खुदी हुई थी। अब्दुलरज्जाक ने लिखा है, "ऐसा नगर न कभी आंखों से देखा है, न कानों से सुना है। नगर में सात दुर्ग एवं सात रक्षा दीवारें है।" विजयनगर का विट्ठल स्वामी का मन्दिर स्थापत्य कला का एक अन्य श्रेष्ठ उदाहरण है। विजयनगर के शासकों ने चित्रकला एवं संगीत को भी प्रोत्साहन एव संरक्षण दिया तथा नाटक कला की भी उपेक्षा नहीं की गयी। संक्षेप में कहा जा सकता है कि विजयनगर साम्राज्य का इतिहास साहित्य एवं कलात्मक रचनाओं के विकास के लिए प्रसिद्ध है। आर.सी. मजूमदार ने भी विजयनगर की कला की प्रशंसा की है।

कला और वास्तुशिल्प

विजयनगर राजाओं के समय में जो देवालय, भवन और मूर्तिशिल्पों को देखकर प्रसिद्ध कला इतिहासकार पर्सि बौन ने वर्णन किया है कि - 'द्रविड शैली का श्रेष्ठ विकसित स्वरूप'।
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इस काल के देवालय ठोस पत्थरों से निर्मित हुए हैं।
हंपी के विरुपाक्ष देवालय का कल्याणमंटप, हजार रामस्वामी देवालय, विठ्ठलस्वामी देवालय, कृष्णस्वामी देवालय, गारे से निर्मित कमल महल, श्रृंगेरी विद्याशंकर देवालय प्रमुख हैं । विशाल प्राकार, ऊँचे गोपुर, विशाल कल्याण मंटप, सभा मंटप, वसंत मंटप आदी विजयनगर काल के देवालयों का लक्षण हैं।
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कालहस्ती, श्रीशैल, तिरुपति, चिदंबरम्, श्रीरंगम्, कुंभकोणम्, कांची आदी जगहों पर विजयनगर के काल का वास्तुशिल्प देख सकते हैं।
'शैवों का अजंता'नाम से प्रसिद्ध लेपाक्षी देवालय में विजयनगर काल के शिवपुराण चित्र देख सकते हैं । हंपी का विरुपाक्ष देवालय के कल्याण मंटप की ऊपरी छत पर दशावतार और गिरिजा कल्याण से संबंधित दृश्यों का चित्रण किया गया है।
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हंपी के एकशिला रथ, नरसिंह और गणेश विग्रह विजयनगर काल के एक शिला शिल्पकला का सुंदर रूप दिखाते हैं।
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कर्नाटक संगीत नाम से परिचित दक्षिणादि संगीत इस काल में आमलोगों तक पहुँचा। पुरंदरदास और कनकदास इस क्षेत्र की देन हैं।
vijay nagar samrajya

विजयनगर साम्राज्य की समृद्धि

विजयनगर साम्राज्य की गणना विश्व इतिहास के अत्यधिक धनी राज्यों में की जाती है। अनेक विदेशी यात्रियों ने विजयनगर के वैभव और समृद्धि की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की है। इटली यात्री निकोलो कोण्टी ने 1420 ई में विजयनगर की यात्रा की थी। उसने लिखा है - "नगर की परिधि सात मील है, उसकी दीवारें पर्वत-शिखरों तक पहुंचती है ओर उनके चरणों को घाटिया घेरे हुए हैं, इससे उसका विस्तार ओर भी अधिक बढ़ जाता है। अनुमान से नगर में 90 हजार व्यक्ति अस्त्र-शस्त्र धारण करने योग्य है। राजा भारत के अन्य सभी राजाओं से शक्तिशाली है।"
ईरानी यात्री अब्दुर्रजाक ने 1442-43 ई. में विजयनगर का भ्रमण किया था। उसने लिखा है, "देश इतना अच्छा बसा हुआ है कि उसका चित्र प्रस्तुत करना असम्भव है। राजा के कोषागृह में, जिसमें गड्डे खुदे हुए है, उनमें पिघला हुआ साना भर दिया गया है, जिसकी ठोस शिलाएं बन गई हैं। देश के सभी उच्च एवं निम्न जातियों के निवासी, यहां तक कि बाजार के कारीगर भी कानों, कण्ठों, बहुओं, कलाइयों तथा उंगलियों में जवाहरात तथा सोने के आभूषण पहनते हैं।"
डेमिंगोस पेइज नामक पुर्तगाली यात्री ने लिखा है – “यह नगर संसार में सबसे अधिक धन-धान्य से सम्पन्न है। इसमें चावल, गेहूं तथा अन्य अनाजों के भण्डार हैं। बाजार तथा सड़कों में अनगिनत बैल सामान से लदे रहते हैं।"
बारबोसा ने 1516 ई. में भारत भ्रमण किया था। उसने विजयनगर की प्रशंसा करते हुए लिखा है, "नगर विस्तृत, घना बसा हुआ तथा चालू व्यापार का केन्द्र है, हीरे, पीगू के लाल, चीन और सिकन्दरिया का रेशम कपूर, सिन्दूर, कस्तूरी तथा मालाबार की काली मिर्च और चन्दन इन वस्तुओं का अधिक क्रय-विक्रय होता है।

विजयनगर साम्राज्य की सामाजिक स्थिति

विदेशी यात्रियों के लेखों से हमे विजयनगर के लोगों के सामाजिक जीवन का स्पष्ट चित्र मिलता है तथा निम्नलिखित विशेषताएं स्पष्ट होती है :

वर्ण व्यवस्था
विजयनगर का समाज वर्ण-व्यवस्था का पोषक था। हिन्दू समाज के चारों अंग ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र वहां रहते थे। ब्राह्मणों को समाज में उच्च स्थान प्राप्त था। राजा कृष्णदेवराय ने ब्राह्मणों की सहायता के लिए एक नया कर लगाया था। शासन में ब्राह्मणों की सहायता के लिए एक नया कर लगाया था। शासन में ब्राह्मणों की राय ली जाती थी। ये ब्राहाण वेद-पाठ करते थे और आवश्यकता पड़ने पर इन्हें सेना के उच्च पदों पर नियुक्त किया जाता था। ब्राह्मण व्यापार भी करते थे। राजनीतिक सत्ता क्षत्रियों के हाथों में थी। सेना में क्षत्रिय लिये जाते थे। समाज में उनका विशेष आदर होता था। वैश्य लोग व्यापार करते थे। कृषि इनका विशेष व्यवसाय था। कुछ वैश्य वेद, इत्यादि पढ़ते थे। योगी नामक जाति के लोग प्रायः नग्न रहते थे।

खान-पान
ब्राह्मणों का समाज में अधिक प्रभाव था। ब्राह्मणों को छोड़कर अन्य सब जातियों के लिए खान-पान पर प्रतिबन्ध नहीं थें राजा तथा साधारण जनता मांसाहारी थी और गाय तथा बैल को छोडकर सभी प्रकार का गोश्त खाया करते थे। चूहे तथा बिल्ली का मांस भी खाया जाता था।

स्त्रियों की दशा
समाज में स्त्रियों को उच्च स्थान प्राप्त था। उन्हें विद्या प्राप्त करने की सुविधाएं भी मिली हुई थी। राज्य के उच्च पदों पर भी स्त्रियों को रखा जाता था। पर्दा-प्रथा का प्रचलन नहीं था। स्त्रियां, पुरुषों के साथ सामाजिक उत्सवों तथा युद्ध में भाग लेती थी। नूनिज के अनुसार, राजा की सेवा करने वाली स्त्रियां, कुश्ती लड़ने वाली, हिसाब-किताब रखने वाली स्त्रियां, नत्य एवं गायन करने वाली स्त्रियां समाज में रहती थी। सहित्य के निर्माण में भी स्त्रियों का विशेष योगदान था। तिरुमलम्बादेवी ने 'बरदाम्बिकापरिणयम्' नामक ग्रन्थ तथा गंगा नामक स्त्री ने 'मथुरा विजय' नामक ग्रन्थ लिखा था। राजा अनेक रानियां रखता था। सामन्त तथा धनवान लोग भी अनेक पत्नियां रखते थे। इटली के यात्री निकोलो कोण्टी के अनुसार देवराय द्वितीय की अनेक पत्नियां थी। बाल-विवाह का समाज में प्रचलन अधिक था। विवाह में दहेज का प्रचलन था।
विजयनगर में विधवा-विवाह का उल्लेख नहीं मिलता है। स्त्रियां पति की मृत्यु के बाद सती हो जाया करती थी। विधवाओं का जीवन पाप-युक्त माना जाता था। मौर्यकाल के समान वेश्याएं भी समाज में रहती थी। कृष्णदेवराय के समय में स्त्रियों के लिए अलग गणिका नगर बसाया गया।

मनोरंजन
धनी तथा शासक वर्ग के लोग अपना समय विविध प्रकार से मनोरंजन में व्यतीत करते थे। साधारण जनता पशु-पक्षियों की लड़ाई देखती थी। शिकार भी उस समय होता था। हिन्दू लोग अनेक त्यौहारों में भाग लेते थे। बसन्त का उत्सव भी होता था। होली, दशहरा, रामनवमी, आदि त्यौहार धार्मिक आधार पर होते थे। शतरंज का खेल शासक वर्ग में हुआ करता था।

विजयनगर साम्राज्य की आर्थिक स्थिति

विजयनगर की आर्थिक स्थिति निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट होती हैं -

कृषि
साधारण जनता कृषि करती थी। साम्राज्य के विभिन्न भागों में कृषि को प्रोत्साहन देना और बुद्धिमतापूर्ण सिंचाई नीति द्वारा कृषि के उत्पादन में वृद्धि करना विजयनगर के शासकों की मुख्य नीति थी। कृष्णदेवराय के समय में अनेक तालाब खुदवाये गये तथा इन्जीनियरों द्वारा बड़ी-बड़ी नहरें खुदवायी गयी थी। अच्छी सिंचाई से उत्तम खेती होती थी। तिल, ज्वार एंव कपास की खेती अधिक होती थी। किसानों से उपज का 1/4 से 1/6 तक हिस्सा लिया जाता था।

अन्य व्यवसाय
विजयनगर में वस्त्र व्यवसाय बड़ी उन्नत अवस्था में था। ऊनी, रेशमी तथा सूत्री वस्त्र बनाये जाते थे। कालीकट वस्त्र व्यवसाय का प्रमुख केन्द्र था। भारतीय वस्त्रों की विदेशों में मांग अधिक थी। लोहे, तांबे, आदि धातुओं के व्यवसाय भी उन्नतावस्था में थे। तिरुपति में धातुओं को ढालने का काम होता था। तेल व्यवसाय भी प्रगति की ओर था। उद्योगों तथा व्यवसायों के लिए अनेक संघ थे।

आयात निर्यात
अन्तर्देशीय तथा सामुद्रिक दोनों प्रकार का व्यवसाय उन्नत अवस्था में था। साम्राज्य में अनेक बन्दरगाह थे और हिन्द महासागर के द्वीपों मलाया द्वीपमाला, बर्मा, चीन अरब, ईरान, दक्षिणी अफ्रीका, अबीसीनिया, पुर्तगाल, आदि से अच्छा व्यापार होता था। वस्त्र, चावल, लोहा शोरा, शक्कर तथा मसाले निर्यात की वस्तुएं थी। घोड़े, हाथी, मोती, तांबा, कोयला, पारा, रेशम तथा मलमल बाहर से मंगाये जाते थे। सामुद्रिक व्यापार जहाजों द्वारा होता था। विजयनगर के पास अपना एक छोटा जहाजी बेड़ा था और यहां के लोग जहाज निर्माण कला से भली-भांति परिचित थे। आन्तरिक व्यापार के लिए बैलों, घोड़ों, गाड़ियों और गधों का प्रयोग होता था।

जल-संपदा
विजयनगर की भौगोलिक स्थिति के विषय में सबसे चौंकाने वाला तथ्य तुंगभद्रा नदी द्वारा यहाँ निर्मित एक प्राकृतिक कुण्ड है। यह नदी उत्तर-पूर्व दिशा में बहती है। आस-पास का भूदृश्य रमणीय ग्रेनाइट की पहाड़ियों से परिपूर्ण है जो शहर के चारों ओर करधनी का निर्माण करती सी प्रतीत होती हैं। इन पहाड़ियों से कई जल-धाराएँ आकर नदी से मिलती हैं।
लगभग सभी धाराओं के साथ-साथ बाँध बनाकर अलग-अलग आकारों के हौज़ बनाए गए थे। चूँकि यह प्रायद्वीप के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक था इसलिए पानी के संचयन और इसे शहर तक ले जाने के व्यापक प्रबंध करना आवश्यक था। ऐसे सबसे महत्त्वपूर्ण हौजों में एक का निर्माण पंद्रहवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में हुआ जिसे आज कमलपुरम् जलाशय कहा जाता है। इस हौज़ के पानी से न केवल आस-पास के खेतों को सींचा जाता था बल्कि इसे एक नहर के माध्यम से "राजकीय केंद्र" तक भी ले जाया गया था।
सबसे महत्त्वपूर्ण जल संबंधी संरचनाओं में से एक, हिरिया नहर को आज भी भग्नावशेषों के बीच देखा जा सकता है। इस नहर में तुंगभद्रा पर बने बाँध से पानी लाया जाता था और इसे “धार्मिक केंद्र" से "शहरी केंद्र" को अलग करने वाली घाटी को सिंचित करने में प्रयोग किया जाता था। संभवतः इसका निर्माण संगम वंश के राजाओं द्वारा करवाया गया था।

व्यापारिक विकास
विजयनगर में व्यापारिक विकास भी बहुत हुआ। के.एम, पन्निकर अनुसार, "विजयनगर में लगभग 300 ऐसे बन्दरगाह थे, जिनके द्वारा ईरान तथा पश्चिम के अन्य देशों के साथ व्यापार होता था।" विजयनगर तथा पुर्तगाल में घनिष्ठ व्यापारिक संबंध थे। विदेशी यात्री बारबोसा ने विजयनगर के विदेशी व्यापार के संबंध में लिखा है, "यह साम्राज्य विदेशी व्यापार का एक महान् केन्द्र है। यहां पर पीगू से हीरे ओर जवाहरात तथा मालाबार से काफूर. नाफा, काली मिर्च और सन्दल आते हैं।" ईरानी यात्री अब्दुर्रजाक ने लिखा है, "विजयनगर साम्राज्य का सबसे प्रसिद्ध बन्दरगाह कालीकट है, जहां से वर्मा, चीन, अरब, ईरान, दक्षिणी अफ्रीका और पुर्तगाल के साथ व्यापार होता है। इस साम्राज्य से विदेशों को कपड़ा, चावल, लोहा, शोरा, खांड, गरम मसाला इत्यादि भेजे जाते हैं। बाहर से आने वाली वस्तुओं में घोड़ा, तांबा, जवाहरात, चीनी और रेशम विशेष रूप से प्रसिद्ध है।

विजयनगर राज्य के पतन के कारण

विजयनगर का शक्तिशाली हिन्दू राज्य लगभग 300 वर्षों तक दक्षिण भारत में अपनी धूम मचाकर अन्त में नष्ट-भ्रष्ट हो गया। इसके पतन के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी बने

बहमनी राज्य से संघर्ष
अपने पड़ोसो शक्तिशाली बहमनी राज्य से विजयनगर राज्य का निरन्तर संघर्ष चलता रहा। दोनों ही प्रबल राज्य एक-दूसरे के घोर प्रतिद्वन्द्वी बन गए और एक-दूसरे को उखाड़ फेंकने को तैयार हो गए। परिणाम यह हुआ कि ये संघर्ष दोनों ही के लिए विनाशकारी सिद्ध हुए। युद्धों में प्राय: विजयनगर को पराजयों का सामना करना पड़ा जिससे इसकी शक्ति को बड़ा धक्का पहुंचा।

सैनिक दुर्बलता
विजयनगर एक विशाल और प्रबल राज्य था, किन्तु दुर्भाग्यवश वहां योग्य और कुशल सैनिकों का अभाव था। बहमनी सुल्तानों से अपनी सैनिक दुर्बलता के कारण ही विजयनगर को बार-बार परास्त होना पड़ा। विजयनगर की सेना के पास गोला बारूद नहीं थे जबकि बहमनी सेना में एक अच्छा तोपखाना था जिसका प्रयोग करने के लिए कुशल यूरोपीय और तुर्की लोग नियुक्त थे। विजयनगर के पास अच्छी अश्वारोही सेना भी नहीं थी। विजयनगर के शासकों ने हाथियों पर अधिक भरोसा किया, किन्तु ये हाथी मुस्लिम तीरन्दाजों के सामने नहीं ठहर पाते थे।

प्रजा की दुर्बलता
विजयनगर एक समृद्ध राज्य था। वहां के निवासी भोग-विलास में अधिक लिप्त रहते थे। उन्होंने योद्धा बनने की कोई चेष्टा नहीं की। फलस्वरूप मुस्लिम राज्यों की शक्ति का वे मुकाबला नहीं कर सके।
इसके अतिरिक्त उनकी समृद्धि और कायरता ने मुस्लिम शक्तियों को बारम्बार आक्रमण करने के लिए प्रोत्साहित किया। फलस्वरूप विजयनगर की शक्ति क्षीण होती गई।

मुसलमानों के साथ अत्याचार
विजयनगर के हिन्दू राजाओं ने अविवेकपूर्ण नीति अपनाई। जब कभी उन्हें युद्ध में विजय मिली, उन्होंने मुसलमानों पर अत्याचार किया और निर्दयतापूर्वक उनका वध करवाया। फलस्वरूप मुसलमानों में प्रतिशोध लेने की भावना प्रबल हो गई और विजयनगर की संकल्पहीन जनता इस विरोधी भावना का मुकाबला नहीं कर सकी।

विभिन्न वंशों का शासन
विजयनगर पर विभिन्न वंशों का शासन रहा, अतः एक संगठित राज्य स्थापित नहीं हो सका और राज्य सत्ता की दृढ नींव नहीं रखी जा सकी।

रक्षा प्रबन्धों की उपेक्षा
विजयनगर एक धर्म प्रभावित राज्य रहा। वहां के राजाओं ने हिन्दू धर्म की ओर अधिक ध्यान दिया और नगर की सुन्दरता बढ़ाने में अपना अधिक समय लगाया। उन्होंने नगर की रक्षा के लिए कोई सुदृढ़ प्रबन्ध नहीं किया।

अन्तिम शासक की दुर्बलताएं
कृष्ण देवराय उत्तराधिकारी अत्यन्त अयोग्य और निर्बल निकले। उनके शासनकाल में राज्य की शक्ति छिन्न-भिन्न हो गई। रामराय की अविवेकपूर्ण नीति के कारण तलीकोट का युद्ध हुआ जिसने विजयनगर की शक्ति को नष्ट कर दिया। इस युद्ध के बाद अयोग्य ओर निर्बल शासकों की एक श्रृंखला बन गई जिससे विजयनगर पतन की ओर बढ़ता गया।

मुस्लिम संघ की स्थापना
कृष्णदेवराय के बाद विजयनगर ने मुस्लिम राज्यों की राजनीति में हस्तक्षेप करने की नीति अपनाई। परिणाम यह हुआ कि विजयनगर के विरोधी मुस्लिम राज्यों का एक ऐसा प्रबल संघ बन गया जिसका सामना करने की विजयनगर में शक्ति और क्षमता नहीं थी।

तालीकोट का युद्ध
मुस्लिम राज्यों के संघ ने तालीकोट के युद्ध में विजयनगर को निर्णायक मात दी। उनकी लूट ने विजयनगर की सम्पन्नता और समृद्धि का अन्त कर दिया। इस युद्ध ने विजयनगर की सैनिक शक्ति को इतना कुवल पिया कि वह फिर सम्भल नहीं सकी।

प्रान्तीय गवर्नरों की प्रबलता
विजयनगर के विनाश का एक बड़ा कारण यह भी रहा कि प्रान्तीय राज्यपालों के हाथों में भारी शक्ति रही केन्द्रीय सत्ता के दुर्बल होने पर ये प्रान्तपति सबल हो गए और अपने स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने में लग गए। केन्द्रीय शक्ति इनके सामने निर्बल पड़ती गई और अन्त में मदुरा व तंजौर के नायकों ने अपने को स्वतन्त्र घोषित कर दिया। इस प्रकार विजयनगर साम्राज्य तेजी से विघटित हो गया।

पश्चिमी समुद्र तट पर पुर्तगालियों का आवास
विजयनगर राज्य के पश्चिमी समुद्र तट पर पुर्तगाली बस गए। यद्यपि ये व्यापारियों के रूप में आए थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया। जब विजयनगर के दुर्दिन आरम्भ हुए तो ये पुर्तगाली भी विजयनगर राज्य के लिए बड़े घातक सिद्ध हुए।

सारांश

इस प्रकार इन सभी कारणों का संयुक्त परिणाम यह हुआ कि विजयनगर जैसा शक्तिशाली हिन्दू साम्राज्य, अन्ततोगत्वा, एकदम छिन्न-भिन्न होकर समाप्त हो गया।

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