अकबर - अकबर का इतिहास | akbar history in hindi | akbar in hindi

अकबर

इस लेख का मुख्य उद्देश्य मुगल सम्राट अकबर के विषय में पाठकों को विस्तृत जानकारी देना। मुगल साम्राज्य की स्थापना बाबर ने की लेकिन उसके पास समय बहुत अल्प था और इन चार वर्ष के दौरान वह चार महत्त्वपूर्ण युद्धों में व्यस्त रहा अतः प्रशासन की ओर विशेष ध्यान नहीं दे सका। हुमायु के सामने अनेक समस्याएं थी-
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परिणामस्वरूप अधिकांश इतिहास अकबर को ही मुगल प्रशासन का वास्तविक संस्थापक मानते है क्योकि उसके समय में मुगल साम्राज्य का चहुमुखी विकास हुआ। मुगल सम्राट अकबर की सभी विशेषताओं को निम्नलिखित बिन्दुओं द्वारा समझाया जायेगा -
  • अकबर का साम्राज्य विस्तार
  • अकबर की राजपूत नीति
  • अकबर की धार्मिक नीति
  • प्रशासनिक, शैक्षिक, कलात्मक, साहित्यिक एवं अन्य सुधार

आरम्भिक जीवन

अकबर का जन्म 15 अक्टूबर, 1542 ई. (रविवार) को अमरकोट में राणा वीरसाल के यहां हुआ था। उसके पिता का नाम हुमायूं एवं माता का नाम हमीदाबानू था। हुमायूं इस समय निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहा था। अकबर के जन्म के उपलक्ष में हुमायूं ने कस्तूरी के टुकड़े अपने साथियों को बांटते हुए कहा था अपने पुत्र जन्म के इस अवसर पर केवल यही भेट मैं आप लोगों को दे सकता हूं। मैं आशा और कामना करता हूं कि जिस तरह इस खेमें में इस कस्तूरी की सुगन्ध फैल रही है, उसी तरह मेरे पुत्र का यश-सौरभ किसी दिन संसार में फैलेगा।" हुमायूं ने अपने पुत्र का नाम 'अकबर' रखा, जिसका तात्पर्य है अत्यन्त महान अथवा श्रेष्ठ। अकबर शिक्षा के प्रति उदासीन था।
डॉ. ए.एल. श्रीवास्तव के अनुसार, "एक को बदलकर दूसरा, इस प्रकार कई शिक्षक नियुक्त किये गये, किन्तु वे सभी उसे पढ़ाने में असमर्थ रहे, क्योंकि वह तो पढ़ने-लिखने की अपेक्षा खेल-कूद की ओर व ऊंट, घोड़े, कुत्ते और कबूतर इत्यादि जानवरों के प्रेम में अधिक निमग्न रहता था।" अबुल फजल के अनुसार, "उसका पवित्र हृदय और पवित्रता कभी बाह्य ज्ञान की ओर उन्मुख नहीं हुई।"

राज्यारोहण

हुमायं की मृत्यु के समय अकबर बैरम खां के साथ कलानौर नामक स्थान पर था। बैरम खां ने उसे 14 फरवरी, 1556 ई, को कलानौर के चबूतरे पर बैठाकर उसका राज्याभिषेक किया। इसके बाद 17 फरवरी को उसको दिल्ली के सिंहासन पर बैठाया तथा भव्य उत्सव मनाया गया। अहमद यादगार के अनुसार, "बैरम खां ने बहुत बड़ा जलसा किया और एक बहुत बड़ा शामियाना रेशम से सजाया गया, जो ऐसा मालूम होता था कि मानों स्वर्ग में बसन्त के प्रारम्भ होने पर वाटिका में सुंदर फूल खिले हुए हैं।" चुगताई काम के सरदारों को बहुमूल्य खिलअतें देकर प्रसन्न किया गया और भविष्य में शाही तोहफो तथा कृपा के वचन दिये गये। फिर बैरम खां ने घोषणा की, "यह बादशाह सलामत के शासन का आरम्भ है।" अकबर के अल्पायु होने के कारण बैरम खां उसका संरक्षक बन गया।

अकबर की समस्याएं

गद्दी पर बैठते समय अकबर समस्याओं से घिरा हुआ था। निजामुदीन अहमद के अनुसार, "जब अकबर कलानौर में गद्दी पर बैठा, तो यह नहीं कहा जा सकता था कि उसके पास कोई राज्य था। बैरम खां के पास एक छोटी-सी सेना थी. उसका कुछ डगमगाता हुआ-सा अधिकार पंजाब के जिलों पर था और वह सेना भी ऐसी नहीं थी, जिस पर विश्वास किया जा सके। अतः स्पष्ट है कि जब अकबर सम्राट बना, उस समय दिल्ली की गद्दी संकटपूर्ण थी।' वी.ए. स्मिथ के अनुसार, "अकबर के राज्याभिषेक के समय भारत में राजनीतिक एकता का अभाव था।'
स्मिथ के अनुसार, "उस समय तो उसे किसी निश्चित राज्य का स्वामी भी नहीं कहा जा सकता था। उसकी छोटी-सी सेना का पंजाब के केवल कुछ जिलों पर शिथिल-सा अधिकार था और दुर्भाग्य से इस सेना पर भी पूर्ण विश्वास नहीं किया जा सकता था। वास्तविक रूप में सम्राट बनने के लए अकबर को अपने आपको राज्य के दूसरे दावेदारों से अधिक बलवान सिद्ध करना था और अपने पिता द्वारा छोड़े हुए राज्य को पुनः अधिकार में लाना था। अकबर की मुख्य समस्याएं इस प्रकार थीं-
मुगल साम्राज्य अव्यवस्थित था तथा कई दावेदार राज्य हड़पना चाहते थे।
पंजाब पर सिकन्दर सूर, आगरा पर हेमू तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश पर मुहम्मद आदिलशाह सूर का अधिकार था। 
अहमद यादगार के अनुसार,आगरा से मालवा तक के देश तथा जौनपुर की सीमाओं पर आदिलशाह की राजसत्ता थी, दिल्ली से छोटे रोहतास तक, जो काबुल के मार्ग पर था, शाह सिकन्दर के हाथों में था तथा पहाड़ियों के किनारे से गुजरात की सीमा तक इब्राहीम खां के अधीन था।"
अकबर का सौतेला भाई हकीम तथा चचेरा भाई सुलेमान मिर्जा उसका राज्य हड़पना चाहते थे।
दिल्ली तथा आगरा के पास अकाल पड़ने से स्थिति और बिगड़ गई थी।
इस समय बैरम खां ने अपनी वीरता तथा योग्यता द्वारा इन कठिनाइयों को दूर किया।

कठिनाइयों पर विजय

कलानौर में राज्याभिषेक के पश्चात् बैरम खां ने अकबर के साथ दिल्ली की तरफ कूच कियां मार्ग में उन्हें सूचना मिली कि हेमू ने मुगल सूबेदार तारदी बेग को पराजित करके दिल्ली तथा आगरा पर अधिकार कर लिया है एवं वह पंजाब की तरफ बढ़ रहा है। बैरम खां ने सरहिन्दी नामक स्थान पर शत्रु का मुकाबला करने का निश्चय किया तथा तारदी बेग को कायर ठहराकर उसे मृत्यु दण्ड दिया। बदायूनी के अनुसार, "बैरम खां ने तारदी बेग का विश्वासघात प्रमाणित करने के लिए खानजमां तथा उसके साथियों को प्रस्तुत किया और इस प्रकार उसने अल्पवयस्क सम्राट अकबर को विश्वास दिलाकर तारदी बेग को प्राणदण्ड देने की अनुमति प्राप्त कर ली।" वी.ए. स्मिथ के अनुसार, यह दण्ड बिना मुकदमा चलाये दिया गया था, परन्तु यह आवश्यक था और मूल रूप से न्यायसंगत था।" स्मिथ आगे लिखते हैं, "इतना अवश्य कहा जा सकता है कि यदि तारदी बेग को दंड नहीं दिया जाता, तो अकबर का जीवन और राज्य दोनों नष्ट हो जाते।" फरिश्ता के अनुसार, “उस समय मुगल सेना की दशा इतनी खराब थी कि तारदी बेग को उदाहरण के तौर पर मृत्यु दण्ड न दिया जाता, तो इस बार भी मुगलों की वही दशा हो जाती, जो शेरशाह से युद्ध के समय हुमायूं की हुई थी। इसके बाद मुगल सेना दिल्ली की तरफ बढ़ी।

पानीपत का द्वितीय युद्ध (5 नवम्बर, 1556 ई.)

आदिल खां के मंत्री हेमू ने तारदी बेग को खदेड़कर दिल्ली तथा आगरा पर अधिकार कर लिया था। वह विक्रमादित्य की उपाधि धारण करके गद्दी पर बैठा। मुगल सेना के पानीपत के मैदान में पहुंचने पर वह भी उसका सामना करने के लिए एक लाख सैनिकों सहित वहां आ डटा। 5 नवम्बर, 1556 ई. को हेमू तथा अकबर के बीच पानीपत का द्वितीय युद्ध हुआ। हेमू 'हवाई' नामक हाथी पर युद्ध कर रहा था। उसने एक ही हमले में मुगल सेना को अस्त-व्यस्त कर दिया था, किन्तु आंख में तीर लगने से वह अचेत होकर गिर पड़ा। वी.ए. स्मिथ के अनुसार, “संभवतः विजय हेमू की होती, किन्तु आकस्मिक घटनावश उसे परास्त होना पड़ा। एक तीर उसकी आंख में आ लगा, जिसने उसका मस्तिष्क छेदकर उसे अचेत कर दिया।"
हेमू के घायल होने से अफगान सेना में भगदड़ मच गई तथा मुगल विजयी रहे। डॉ.आर.पी. त्रिपाठी ने लिखा है, "उसकी (हेमू की) पराजय दुर्घटना थी और अकबर की विजय दैवी संयोग से थी।। हेमु को बंदी बना लिया गया। डॉ. एस. आर. शर्मा के अनुसार, "बैरम खां ने अपनी तलवार निकाली और एक ही बार में हेमू का सिर धड़ से अलग कर दिया।" बदायूंनी तथा अबुल फजल यही मानते हैं। अहमद यादगार के अनुसार, “हेमू का सिर काटकर काबुल भेज दिया गया और उसके धड़ को दिल्ली के एक दरवाजे पर लटका दिया गया।"
पानीपत का द्वितीय युद्ध इतिहास की अत्यन्त महत्वपूर्ण घटना है। इससे भारत में पुनः हिन्दू राज्य अथवा पठान राज्य स्थापित होने की संभावना समाप्त हो गई।

दिल्ली तथा आगरा पर अधिकार

पानीपत की विजय से अकबर का दिल्ली तथा आगरा पर अधिकार हो गया। मेवात भी उसके अधिकार में आ गया। अब अकबर ने स्वयं को भारत का सम्राट घोषित किया। अब अकबर ने सिकन्दर सूर को मानकोट के किले में घेरकर अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश किया। इसके बाद अकबर ने मालवा, गुजरात एवं जौनपुर पर अधिकार कर लिया। 1560 ई. तक उसने हुमायूं द्वारा विरासत में छोड़े गये राज्य पर अधिकार कर लिया था। एलफिन्स्टन के अनुसार, "शासनकाल के पहले वर्षों में अकबर का राज्य पंजाब, आगरा और दिल्ली के आस-पास के प्रदेशों तक सीमित था। तीसरे वर्ष में उसने बिना युद्ध लडे ही अजमेर पर अधिकार कर लिया। चौथे वर्ष के आरम्भ में उसने ग्वालियर का दुर्ग प्राप्त कर लिया और बैरम खां के पतन के कुछ समय पूर्व उसने अफगानों को लखनऊ तथा गंगा के साथ-साथ पूर्व में जौनपुर तक के समस्त प्रदेश से निकाल दिया।"

बैरम खां का पतन

बैरम खां का पतन अकबर के राज्यकाल की दुःखद घटना है। यह ईरानी शिया मुसलमान था और बाबर के समय भारत आया था। उसने हुमायूं की बहुत सेवा की। एस.आर. शर्मा के अनुसार, "उसने सुख और दुःख में हुमायूं का साथ दिया और बहुत कम लोग उसकी स्वामिभक्ति की बराबरी कर सकते हैं।" उसने हमायूं को राज्य प्राप्ति में महत्वपूर्ण सहयोग दिया। अकबर ने उसे 'सरहिन्दी' की जागीर दी। वह उसे 'खानबाबा' कहा करता था। बैरम खां ने अकबर के प्रति भी स्वामिभक्ति का परिचय देते हुए उसे गद्दी पर बैठाया तथा उसे प्रारम्भिक कठिनाइयों पर विजय दिलवाई। बैरम खां ने हेमू को परास्त कर भारत में मुगल साम्राज्य को समाप्त होने से बचाया। उसने सिलन्दर सूर को पराजित करने तथा ग्वालियर, अजमेर व जौनपुर विजय में महत्वपूर्ण सहयोग दिया।
बैरम खां 1556 ई. तक अकबर का संरक्षक रहा। 1560 ई. तक अकबर शासन संभालने के योग्य हो चुका था। अतः उसने स्वतंत्र शासक बनने का निश्चय किया। उसने अब्दुल लतीफ के साथ बैरम खां के पास संदेश भोजा कि, "मुझे आपकी ईमानदारी और राज्य भक्ति पर पूरा-पूरा भरोसा था। इसलिए मैंने राज्य का सब काम आपके सुपुर्द कर दिया था। और मैं केवल आनंद करता था। अब मैंने निश्चय कर लिया है कि शासन सूत्र अपने हाथ में ले लूं। इसलिए मैं चाहता हूं कि आप मक्का की यात्रा करें। एक अर्से से आपका यह विचार भी था।' स्पीयर के अनुसार, “अकबर ने बैरम खां को उसी तरह हटा दिया, जैसे कैसर विलियम द्वितीय ने बिस्मार्क को हटा दिया था।"।
अकबर ने बैरम खां के मक्का में ठहरने का प्रबंध कर दिया। बैरम खां ने इसे स्वीकार कर लिया, किन्तु अकबर द्वारा उसे शीघ्रता से भेजने की बात पर उसने विद्रोह कर दिया। अकबर ने उसे जालंधर नामक स्थान पर परास्त किया और उसे क्षमा कर दिया। अकबर ने उसे उपहार देकर मक्का जाने की आज्ञा दी। बैरम खां मक्का के लिये रवाना हुआ, किन्तु मार्ग में पाटन नामक स्थान पर मुबारक खां नामक पठान ने उसकी हत्या कर दी। इस तरह एकवीर व स्वामिभक्त व्यक्ति का दुःखद अंत हुआ। उसके पुत्र का पालन-पोषण शाही देखरेख में हुआ, जो आगे चलकर अब्दुर्रहीम खानखाना के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

अकबर का विजय अभियान

अकबर की आरम्भिक विजय नीति का उद्देश्य राज्य विस्तार और धन-दौलत प्राप्त करना था। जब उसका अधिकांश उत्तर भारत पर अधिकार हो गया तब उसकी विजय नीति का उद्देश्य देश को राजनैतिक एकता प्रदान कर प्रजा को सुख, शांति और सुरक्षा प्रदान करना हो गया। अकबर के राज्य काल के उत्तरार्द्ध में उसकी विजय नीति मानववादी भावनाओं पर आधारित थी।

मालवा की विजय
मालवा का शासक बाजबहादुर काव्य, संगीत और स्त्रियों के साहचर्य में लीन रहने वाला कामुक पुरुष था। उनके हरम में सैकड़ों सुन्दर वेश्याएं थी, जिनमें उसकी प्रेयसी रूपमती अपनी सुन्दरता के लिये विख्यात थी। उसकी विलासिता के कारण प्रशासन शिथिल हो चुका था। अतः अकबर मालवा विजय के लिये लालायित हो उठा। माहम अनगा के कहने पर उसने मालवा अभियान की सेना का नेतृत्व आधमखां को सौंपा और पीर मोहम्मद को भी उसके साथ भेजा। 29 मार्च, 1561 को बाजबहादुर व मुगल सेना के बीच भीषण युद्ध हुआ, किन्तु बाजबहादुर पराजित होकर भाग खड़ा हुआ। आधमखां ने उसके कोष व हरम पर अधिकार कर लिया तथा प्रजा पर भीषण अत्याचार किये, उसने मालवा से प्राप्त सारी सम्पत्ति और हरम अपने पास रख लिये और कुछ हाथी अकबर के पास भेज दिये। अकबर को आधमखां के अत्याचारों का पता लग चुका था, अतः अप्रैल 1561 में वह आधमखां के विरूद्ध रवाना हुआ। आधमखां ने भयभीत होकर सारी सम्पत्ति और हरम सन्नाट के समक्ष प्रस्तुत कर दिया। माहम का लिहाज रखते हुए अकबर ने उसे क्षमा कर उसे मालवा का गवर्नर बना कर स्वयं वापिस लौट आया।
जब अकबर ने अतकाखां को प्रधान मंत्री बनाया तब उसकी सलाह से उसने आधमखां को मालवा से बुला लिया और पीर मोहम्मद को मालवा का गवर्नर नियुक्त किया। पीर मोहम्मद ने समीपस्थ क्षेत्रों पर अधिकार कर वहां के निवासियों, यहां तक कि मुल्ला-मौलवियों को भी मौत के घाट उतार दिया। इसी बीच बाजबहादुर ने असीरगढ़ व बुरहानपुर से सैनिक सहायता प्राप्त कर उस पर आक्रमण किया और मालवा पर अधिकार कर लिया। पीर मोहम्मद वहां से भाग गया। इसकी सूचना मिलने पर 1562 ई. में अकबर ने अब्दुल्लाखां उजबेक को मालवा की ओर भेजा। बाजबहादुर परास्त होकर गुजरात की ओर चला गया और अकबर को आत्मसमर्पण कर दिया। अकबर ने उसे क्षमा कर दो हजार का मन्सबदार बना दिया, लेकिन कुछ ही दिनों बाद उसकी मृत्यु हो गयी। अकबर ने अब्दुल्लाखां को मलवा का गवर्नर बना दिया। लेकिन दंभ में आकर उसने स्वतंत्र शासक होने का प्रयास किया। अत: अकबर स्वयं सेना लेकर मालवा की ओर गया। अब्दुल्लाखां गुजरात की तरफ भाग खड़ा हुआ और 1565 ई. में खानजमां के विद्रोह में मारा गया। अकबर ने बहादुरखां को मालवा का गवर्नर बना दिया।

जौनपुर-विद्रोह का दमन
जिस समय आधमखां शाही सेना के साथ मालवा उलझा हुआ था, उसी समय मुहम्मद आदिलशाह के पुत्र शेरखां ने जौनपुर पर आक्रमण कर दिया, किन्तु वहां के गवर्नर अलीकुलीखां खानजमा ने उसे परास्त कर दिया। खानजमां इस विजय से दंभी हो गया और मुगल सम्राट के विरुद्ध विद्रोह करने की सोचने लगा। जब अकबर को इसकी सूचना मिली तब वह शिकार के बहाने जौनपुर की ओर आया। खानजमां ने भयभीत होकर कड़ा नामक स्थान पर अकबर से भेंट की और उसे बहुमूल्य भेंट देते हुए क्षमा याचना की। उदार सम्राट ने उसे क्षमा कर दिया।

राजपूतों से प्रथम सम्पर्क
14 जनवरी 1562 को अकबर मोहनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के दीदार हेतु अजमेर की ओर रवाना हुआ। मार्ग में आमेर के निकट सांगानेर नामक स्थान पर आमेर के शासक भारमल कछवाहा ने अकबर से भेंट कर अपनी स्वामीभक्ति प्रदर्शित की और अपनो ज्येष्ठ कन्या का विवाह सम्राट से करने का प्रस्ताव किया।
अकबर ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर अजमेर से लौटते समय सांभर में भारमल की कन्या से विवाह कर लिया। इस राजपूत कन्या को शाही हरम में उच्च स्थान दिया गया और इसी ने जहांगीर को जन्म दिया था। अकबर, भारमल के पुत्र भगवानदास और पौत्र मानसिंह को भी अपने साथ आगरा लाया और दरबार में उन्हें सम्मानजनक स्थान प्रदान किया। भारमल की इस नीति का अनुसरण अन्य राजपूत शासकों ने भी किया।
मुगल-राजपूत सम्बन्धों के इतिहास में इस विवाह का असाधारण महत्व है। इससे दोनों के बीच न केवल दृढ़ सम्बन्धों का सूत्रपात हुआ, बल्कि मुगलों को शक्तिशाली राजपूतों को ठोस समर्थन और सहयोग भी प्राप्त हुआ। डॉ. बेनीप्रसाद ने लिखा है "यह विवाह भारत की राजनीति में नवयुग के उदय का प्रतीक था। इससे देश में उत्तम शासकों की पीढ़ियां चली और मुगल सम्राटों को पुश्तों तक मध्यकालीन भारत के सर्वोच्च सेनानायक और कूटनीतिज्ञों की सेवाएं प्राप्त हो सकी। वास्तव में राजपूतों का समर्थन एवं सहयोग मुगल साम्राज्य के स्थायित्व में सहायक सिद्ध हुआ। राजपूतों से वैवाहिक सम्बन्धों ने न केवल अकबर की नीतियों को प्रभावित किया बल्कि अकबर के व्यक्तिगत जीवन को भी प्रभावित किया।

मेड़ता पर विजय
इस समय मेड़ता पर जयमल राठौड़ का अधिकार था, जो मारवाड़ के शासक राव मालदेव का सामन्त एवं सेनानायक था। अकबर ने मिर्जा शरफुद्दीन को मेड़ता के दुर्ग पर अधिकार करने भेजा। शरफुद्दीन ने दुर्ग को घेर लिया। जयमल राठौड़ और उसके राजपूत सहयोगियों ने बड़ी वीरता से मुगलों का सामना किया, किन्तु वे पराजित हुए और दुर्ग पर मुगलों का अधिकार हो गया। जयमल राठौड़ मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह की शरण में चला गया।

गोडवाना पर विजय
मध्यप्रदेश में स्थित गोंडवाना पर इस समय रानी दुर्गावती अपने पुत्र वीरनारायण की संरक्षिका के रूप में शासन कर रही थी। अकबर ने अपनी विजय नीति का अनुसरण करते हए 1564 ई. में आसफखां को गोंडवाना पर अधिकार करने भेजा। रानी दुर्गावती अपनी विशाल सेना लेकर मुगलों से युद्ध करने आगे बढ़ी। उसने बड़ी वीरता और साहस से शत्रु का सामना किया, किन्तु आंख में तीर लगने से वह घायल हो गयी। शत्रु द्वारा पकड़े जाने तथा अपमानित किये जाने की आशंका से रानी ने आत्महत्या कर ली। अब मुगल सेना चौरागढ़ की ओर गई, जहां वीर नारायण ने बड़ी वीरता से मुगलों का सामना किया, किन्तु वह परास्त होकर मारा गया। गोंडवाना पर मुगलों का अधिकार हो गया। अनेक इतिहासकारों ने अकबर की गोंडवाना विजय की निन्दा की है, क्योंकि उसने एक असहाय नारी पर बिना किसी कारण के आक्रमण किया था। किन्तु डॉ. त्रिपाठी ने इन आलोचनाओं का उत्तर देते हुए लिखा है कि अकबर का झगड़ा एक स्त्री से न होकर एक राज्य से था और यह तो एक संयोग की बात है कि उस समय उस राज्य पर एक स्त्री का शासन था। चाहे कुछ भी हो, अकबर का यह कार्य उसके मानवतावादी दृष्टिकोण पर एक प्रश्नचिहन अवश्य लगा देता है।

चित्तौड़ पर विजय
मेवाड़ का राणा उदयसिंह मुगल सम्राट को 'म्लेच्छ' समझता था तथा आमेर के कछवाहा शासक को भी घणा की दृष्टि से देखता था, क्योंकि उसने एक म्लेच्छ विदेशी' के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर लिये थे। मेवाड़ के सिसोदिया राणाओं के त्याग और बलिदान के कारण भारत के राजपूत शासक उन्हें अपना सिरमौर मानते थे। अतः जब तक अकबर मेकड़ को अपनी अधीनता में नहीं ले लेता, तब तक उसकी उत्तर भारत विजय पूर्ण नहीं हो सकती थी। अतः सितम्बर 1567 ई. में उसने चित्तौड़ विजय का निश्चय कर 23 अक्टूबर को वह इस विशाल दुर्ग पर आ  धमका। अकबर ने दुर्ग का घेरा डाल दिया। राजपूत सरदारों ने राणा उदयसिंह को अरावली की पहाड़ियों में सुरक्षित भेजकर दुर्ग की रक्षा का भार जयमल राठौड़ को सौंप दिया। दुर्ग का घेरा काफी लम्बे समय तक चलते रहने के कारण मुगलों को काफी हानि उठानी पड़ रही थी। 23 फरवरी 1568 ई. को अकबर ने दुर्ग की प्राचीर पर चढ़े जयमल को देख लिया, जो दुर्ग की मरम्मत करवा रहा था। अकबर ने बन्दूक से निशाना मारा, जिससे जयमल घायल हो गया। इस पर रात्रि में स्त्रियों ने जौहर किया और दूसरे दिन प्रातः राजपूत केसरिया वस्त्र धारण कर मुगल सेना से भिड़ गये। जयमल की मृत्यु के पश्चात् राजपूत सेना का नेतृत्व केलवा के सरदार पत्ता ने संभाला। मुट्ठी भर राजपूत असंख्य मुगल सेना के सामने कब तक टिकते। एक-एक राजपूत अपनी मातृभूमि के लिये कट मरा। दूसरे दिन अकबर दुर्ग में गया जहां लगभग तीस हजार राजपूत कत्ल कर दिये गये। जयमल और पत्ता की वीरता से अकबर इतना प्रभावित हुआ कि उनकी स्मृति में आगरे के किले के द्वार पर उनकी प्रस्तर मूर्तियां स्थापित करवायी। चित्तौड़ विजय के बाद अकबर ने आसफखां को चित्तौड़ का गवर्नर नियुक्त कर स्वयं आगरा आ गया। अभी तक मेवाड़ का अधिकांश भाग राजपूतों के ही अधिकार में था।

रणथम्भौर पर विजय
इस समय रणथम्भौर बूंदी के हाड़ा राजपूत सुरजनराय के अधिकार में था, जो मेवाड के अधीन थ। अप्रैल 1568 ई. में अकबर ने रणथम्भौर पर सेना भेज दी। किन्तु मालवा पर विद्रोही मिर्जा के आक्रमण के कारण सेना को वापस बुला लिया गया। इसके बाद 1569 ई. में मुगल सेनाओं ने रणथम्भौर दुर्ग को घेर लिय। घेरा लम्बे समय तक चलते रहने के कारण दोनों पक्षों को क्षति उठानी पड़ी। अंत में विवश होकर सुरजनराय ने अपने दो पुत्रों को अकबर की सेवा में भेजकर आत्मसमर्पण कर दिया। 22 मार्च 1569 ई. को रणथम्भौर पर मुगलों का अधिकार हो गया।

कालिंजर की विजय
कालिंजर का दुर्ग उत्तर भारत के अभेद्य दुर्गों में समझा जाता था, जो वर्तमान उत्तर प्रदेश में स्थित है। इस समय इस दुर्ग पर रीवा के राजा रामचन्द का अधिकार था। अगस्त 1569 ई. में मजनूखां को इस दुर्ग पर अधिकार करने भेजा। राजचंद चित्तौड़ व रणथम्भौर के पतन से परिचित था। अतः उसने मजनूखां का कोई विशेष विरोध किये बिना ही आत्मसमर्पण कर दिया। रामचंद को इलाहाबाद में कोई जागीर दे दी गई और कालिंजर पर मुगलों का अधिकार हो गया।

राजपूताना पर विजय
1570 ई. में अकबर नागौर की तरफ आया जहा मारवाड़ के शासक चन्द्रसेन ने आकर अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली। बीकानेर के राव कल्याणमल और उसका पुत्र रायसिंह भी अकबर की सेवा में उपस्थित हुए और उसकी अधीनता स्वीकार कर ली। अकबर ने बीकानेर और जैसलमेर के राजघरानों से भी वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये । इस प्रकार 1570 ई. तक राजपूताने के लगभग सभी राज्यों ने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली। केवल मेवाड़ और उसके अधीनस्थ राज्य बांसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रतापगढ़ अभी भी अपने वंश परम्परा पालन करते हुए मुगलों की अधीनता से मुक्त थे।

गुजरात पर विजय
गुजरात न केवल अन्तर्राज्यी व्यापार का केन्द्र था, बल्कि एशिया एवं यूरोपीय देशों का भी यहां व्यापार होता था। गुजरात, मक्का जाने के मार्ग में पड़ता था। प्रान्त की समृद्धि और हज यात्रियों की सुरक्षित मार्ग प्रदान करने की दृष्टि से अकबर इस प्रान्त को अपने राज्य में मिलाना चाहता था। इसके अतिरिक्त अकबर के विद्रोहियों का यह शरणस्थल भी बना हुआ था। अतः अकबर के लिये गुजरात-विजय आवश्यक हो गयी थी। संयोग से 1572 ई. में वहां गृह युद्ध छिड़ गया तथा इतमादखां और उसके दल ने अकबर से सहायता मांगी। अतः अकबर ने एक सेना भेजकर स्वयं भी गुजरात आया। यहां के शक्तिहीन शासक मुजफ्फरखां तृतीय ने मुगलों का कोई विशेष सामना नहीं किया और नवम्बर 1572 ई. में अहमदाबाद पर मुगलों का अधिकार हो गया। मुजफ्फरखां को बंदी बनाकर अकबर ने खान आजम मिर्जा अजीत कोका को गुजरात का गवर्नर नियक्त किया और स्वयं केम्बे के लिये रवाना हो गया। किन्तु अकबर के जाती ही गुहग्गद हुसैन गिर्जा लौट आया तथा असंतुष्ट अगीरों को साथ लेकर खान आजग को पेर लिया। खान आजग उसका सामना करने में असमर्थ था, अत: 2 सितम्बर 1573 ई. को स्वयं अकबर आ धमका। विद्रोहियों को पराजित कर 5 अक्टूबर 1573 ई. को अकबर फतहपुर सीकरी लौट आया। इस विजय के फलस्वरूप मुगल साम्राज्य की पश्चिमी सीमा सतुद्र तक पहुंच गई जिससे पुर्तगाली समपर्क में आये।

बिहार और बंगति पर विजय
सुलेमान करारानी शेरशाह के काल में बिहार का गवर्नर था, किन्तु सूर-वंश के पतन के बाद उसने अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी। उसने उड़ीसा और बंगाल को भी अधिकृत कर लिया। 1568 ई. में उसने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली। 1572 ई. में उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्र दाऊद ने पुनः अपनी स्वाधीनता घोषित कर दी तथा मुगल क्षेत्र जमानिया पर आक्रमण कर दिया। अतः 1574 ई. में अकबर ने उस पर आक्रमण कर उसे बिहार से भगा दिया और प्रान्त को अपने साम्राज्य में मिला लिया। दाऊद उड़ीसा की ओर चला गया। अकबर ने मार्च, 1575 ई. में दाऊद को पुनः पराजित किया, फिर भी बंगाल का कुछ भाग उसके अधिकार में रह गया। अक्टूबर 1575 ई. में दाऊद ने बंगाल के खोये हुए क्षेत्र पुनः प्राप्त करने का प्रयत्न किया। दाऊद युद्ध में मारा गया। बंगाल को भी अब मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया। लेकिन कुछ स्थानीय सरदार अगले कुछ वर्षों तक बराबर उपद्रव मचाते रहे।

मेवाड अभियान
चित्तौड़ पतन के चार वर्ष बाद 1572 ई. में राणा उदयसिंह की मृत्यु हो गयी और उसका पराक्रमी पुत्र राणा प्रताप मेवाड़ का शासक बना। स्मिथ महोदय ने लिखा है, "प्रताप को उत्तराधिकार में एक तेजस्वी वंश का यश तथा उपाधियां प्राप्त हुई थी, किन्तु न उसके पास राजधानी थी और न साधन; उसके जाति-बिरादरी वाले पराजयों से हतोत्साहित हो चुके थे, किन्तु अपनी जाति का श्रेष्ठ सूरत्व उसमें अभी भी विद्यमान था।" ऐसी निराशाजनक परिस्थितियों में भी प्रताप ने चित्तौड़ को पुनः जीतने और अपने वंश के सम्मान की रक्षा करने का दृढ़ संकल्प किया। इधर अकबर भी मेवाड़ के राणा को नतमस्कत करने का संकल्प कर चुका था। इस समय लगभग सभी राजपूत शासक अकबर का साथ दे रहे थे। यहां तक कि प्रताप का भाई शक्तिसिंह भी अकबर के साथ था। अप्रैल 1576 ई. में अकबर ने आमेर के कुंवर मानसिंह और आसफखां के नेतृत्व में एक विशाल सेना प्रताप के विरुद्ध भेज दी। इधर प्रताप भी तीर हजार घुड़सवार और कई सौ मील प्यादों को लेकर आगे बढ़ा। इधर मानसिंह शाही सेना को लेकर बनास नदी के दक्षिणी तीर पर स्थित खमनौर नामक गांव और अरावलीपर्वत की हल्दीघाटी शाखा के मध्य मैदान में पहुंचकर डेरा डाल दिया।
18 जून, 1576 को प्रातः राणा हल्दी घाटी के एक मुहाने से बाहर निकला और मुगल सेना पर धावा बोल दिया। राणा का यह आक्रमण इतना भीषण था कि मुगल सेना में खलबली मच गई। चूंकि राणा के पास बहुत ही छोटी सेना थी, इसलिये वह अपनी इस आरंभिक सफलता का लाभ न उठा सका। अब राणा ने शत्रु दल के मध्य हाथियों पर हमला कियां दोनों पक्षों ने अब आमने सामने युद्ध आरंभ कर दिया था। कुछ ही समय बाद यह अफवाह फैल गयी कि स्वयं अकबर. मानसिंह की सहायता हेतु आ रहा है। अतः शाही सेना दुगने जोश से लड़ने लगी और राणा को चारों ओर से घेर लिया। ऐसी संकटापन्न स्थिति में प्रताप के स्वामी भक्त सरदारों ने राणा के घोडे की लगाम पकड़कर युद्ध क्षेत्र से बाहर सुरक्षित स्थान पर ले आये। मेवाड़ी सेना का नेतृत्व बीदा झाला ने किया, लेकिन अब उनकी हिम्मत टूट चुकी थी। अतः राणा के सैनिक युद्ध क्षेत्र से भाग निकले, जिसमें से अनेक मारे गये। विजयश्री शाही सेना को प्राप्त हुई। मुगल सेना इतनी थक चुकी थी कि उसने राणा और उसकी सेना का पीछा तक नहीं किया। विजय प्राप्त होने के बावजूद मानसिंह, राणा के अधिकृत क्षेत्रों पर अधिकार नहीं कर सका।

युद्ध का महत्व - यद्यपि हल्दी घाटी के युद्ध में अकबर की सेना विजयी हुई थी, तथापि अकबर की मेवाड को अधीन करने की चिर अभिलाषा, कभी पूरी नहीं हुई। मुगल सेना को स्थानीय लोगों की शत्रुता के कारण मार्ग में असहनीय कष्ट उठाने पड़े। मानसिंह के लिये भी यह विजय निष्फल सिद्ध हुई, क्योंकि न तो वह राणा प्रताप को मृत या जीवित पकड़ सका और न मेवाड़ को अधीन कर सका। मेवाड़ में असफल होने के कारण मानसिंह को अकबर की कृपा दृष्टि से वंचित होना पड़ा। कुछ इतिहासकारों ने भाटों और चारणों द्वारा रचित साहित्यिक कृतियों के आधार पर लिखा है कि अकबर ने अपने महान प्रतिद्वन्द्वी राणा के प्रबल पराक्रम के प्रति श्रद्धावनत होकर शेष जीवन के लिये उसके साथ छेड़छाड़ बंद कर दी। लेकिन इस कथन में लेश मात्र भी सत्यता नहीं है। सत्य तो यह है कि अकबर ने राणा को अधीन करने के प्रयत्नों में कभी कोई ढील न आने दी, लेकिन ये सारे प्रयत्न असफल रहे। हाँ, 1585 ई. के बाद अकबर ने मेवाड़ की ओर कोई सेनापति नहीं भेजा, लेकिन इसका कारण यह था कि अकबर उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्तों की रक्षा में उलझा हुआ था। राणा प्रताप ने अकबर की इस व्यस्तता का लाभ उठाते हुए अपने राज्य के अधिकांश भाग पर पुनः अधिकार कर लिया। जनवरी 1597 में राणा प्रताप की मृत्यु के बाद अकबर ने प्रताप के उत्तराधिकारी अमरसिंह के विरूद्ध कई बार सेनाएं भेजी, किन्तु वह मेवाड़ को अधीन न कर सका। डॉ. त्रिपाठी का कहना है कि अकबर द्वारा भारत की एकता स्थापित करने के महान कार्य में प्रताप ने शामिल होना अस्वीकार कर वास्तव में गलती की थी। किन्तु आधुनिक काल के विचारों को अकबर और प्रताप के काल में ढूंढना इतिहास के प्रति अन्याय करना होगा। राणा प्रताप के प्रति अकबर का उद्देश्य अनुचित था। राणा प्रताप अपने उद्देश्य में सफल हुआ।

कश्मीर विजय (1585 ई.)
प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण जो स्थान स्विट्जरलैण्ड का यूरोप में है, वहीं स्थान कश्मीर का भारत में है और अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टि से वह विश्व विख्यात है। अकबर की साम्राज्यवादी दृष्टि से कश्मीर भी नहीं बचा। 1581 ई. में कश्मीर के सुल्तान यूसुफ खां ने अपने तीसरे पुत्र व 1585 ई. में अपने ज्येष्ठ पुत्र को अकबर के दरबार में भेजा था पर वह स्वयं हाजिर नहीं हुआ था। अतः अकबर कश्मीर के सुल्तान का मान-मर्दन करने तथा कश्मीर को मुगल साम्राज्य का अंग बनाने हेतु 1585 ई. के पतझड़ के मौसम में लाहौर के लिए रवाना हो गया और भगवानदास कछवाहा को सेना सहित कश्मीर के लिए रवाना कर दिया। वह आमेर नरेश यूसुफ को परास्त नहीं कर सका और उसके साथ संधि कर ली। अकबर संधि से संतुष्ट नहीं हुआ। 1586 ई. में जब यूसुफ अकबर के समाने उपस्थित हुआ तो अकबर ने उसे बंदी बना लिया परन्तु सुल्तान का ज्येष्ठ पुत्र याकूब जेल से भाग गया। कश्मीर जाकर उसने मुगलों को तंग करना आरंभ किया। परन्तु वह भी अकबर की सेना के आगे टिक नहीं सका और 1588 ई. में उसने समर्पण कर दिया। कश्मीर को मुगल साम्राज्य का अंग बना लिया और याकूब को उसके पिता के पास भेज दिया जो इस समय बिहार में बंदी का जीवन व्यतीत कर रहा था। परन्तु बाद में अकबर ने पिता व पुत्र को स्वतंत्र कर दिया और अपनी सेना में उनको उच्च स्थान प्रदान कर दिया। अकबर के जीवन पर कश्मीर नरेश को बंदी बनाना एक दाग नहीं समझा जाता है।

सिन्ध की विजय (1591 ई.)
1591 ई. में अकबर की दृष्टि कन्धार पर पड़ी क्योंकि उत्तरी-पश्चिमी भारत को विजित करने व उस पर स्थायी व सुदृढ़ प्रभाव बनाये रखने हेतु कन्धार पर अधिकार होना परम आवश्यक था। परन्तु इस महत्वपूर्ण विजय के लिए दक्षिण सिंध की विजय आवश्यक थी। इसके कई कारण थे-
  • भक्खर (Bakhar) पर अकबर ने 1574 ई. में ही अधिकार कर लिया था। इस पर अधिकार बनाये रखने हेतु दक्षिण सिन्ध व सिन्धु नदी के मुहाने पर विजय पाना आवश्यक था।
  • सिन्ध व्यापार की दृष्टि से उतना ही महत्वपूर्ण थ जितना कि गुजरा था।
  • सिन्ध ही भारत को समुद्र से मिलाता था।
  • अकबर सिन्ध को भारत में मिलाना परम आवश्यक समझता था क्योंकि वह कन्धार विजय के लिए उसे सैनिक अड्डा बनाना चाहता था।
मुल्तान अकबर के प्रभुत्व में पहले ही आ चुका था और मुल्तान से दक्षिण–सिन्ध पर आसानी से आक्रमण किया जा सकता था। अतः 1590 ई. में अकबर ने बैरामखां के पुत्र अब्दुर्रहीम खानखाना को, जो मुल्तान का गवर्नर था सिन्ध पर आक्रमण करने का आदेश दिया। इस समय सिन्ध का शासक मिर्जा जानी बेग था। उसने मुगल सेना को दो स्थानों पर मुकाबला किया और वह दोनों स्थलों पर ही परास्त हो गया। अंत में उसने आत्मसमर्पण कर दिया और थट्टा और सेहवान के महत्वपूर्ण दुर्ग भी अकबर के हवाले कर दिए। इस प्रकार 1591 ई. में सिन्ध भी अकबर की अधीनता में आ गया। अकबर ने गिर्जा जानी बेग के साथ उदारता बताई और उरो 3,000 का गनराब बना दिया। कहते हैं कि अकबर ने बाद में थट्टा का दुर्ग भी जानी बेग को लौटा दिया था। जानी बेग भी 'दीन-एइलाही' सम्प्रदाय का सदस्य बन गया था।

बिलोचिस्तान की विजय (1595 ई.)
सिन्ध विजय के उपरान्त अकबर ने बिलोचिस्तान पर ध्यान दिया। उसको विजित करने 1595 ई. में अकबर ने मीर मासूम को भेजा। बिलोचिस्तान ने भी अभी तक अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की थी। मीर मासूम नामक सेनापति ने क्वेटा के उत्तर-पूर्व में सीबी के दुर्ग पर आक्रमण किया और उसे अपने अधिकार में कर लिया। बिलोचिस्तान के अफगान भी बड़े वीर थे। वे वीरता से लड़े; परन्तु परास्त हो गये और अपने देश बिलोचिस्तान को अकबर के हवाले कर दिया।
कन्धार पर अधिकार करना- कन्धार फारस के शाह के अधीन था। भारत के शासक को इस पर अधिकार करना परम आवश्यक था। काबुल के स्वामी व भारत के मुगल सम्राट को भारत की सुरक्षा के लिए अपने अधिकार में करना अत्यन्त आवश्यक था। इसके अलावा यह व्यापार का केन्द्र था। एशिया के विभिन्न देशों के व्यापारी यहां एकत्रित होते थे और अपने माल की अदला-बदली करते थे।
इस समय कन्धार का गवर्नर मुज्जफ्फर हुसैन मिर्जा था। परन्तु गवर्नर मुजफ्फर हुसैन और शाह के सम्बन्ध अच्छे नहीं थे। यह बात अकबर को ज्ञात थी। अतः अकबर ने शाहबेग को कन्धार पर अधिकार करने भेजा। गवर्नर ने कन्धार शाहबेग को समर्पित कर दिया। इसके पुरस्कार स्वरूप अकबर ने मुजफ्फर हुसैन को अपने दरबार में सम्मानपूर्वक आमंत्रित किया और उसे उच्च पद पर नियुक्त कर दिया। कुछ समय के उपरान्त उसे संभल की जागीर प्रदान कर दी।
इस प्रकार काबुल, कच्चार और बिलोचिस्तान पर अधिकार कर अकबर ने भारत को उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में पूर्णतः सुरक्षित बना लिया। और इन विजय अभियानों में सम्राट ने उत्तर में काबुल-कन्धार से दक्षिण में नर्मदा नदी तक तथा पश्चिम में सिन्ध से पूर्व में बिहार तक अपना मुगल साम्राज्य सुदृढ़ता से स्थापित कर लिया।
उजबेगों का अंत- 1580 ई. से लेकर 1567 ई. तक अकबर अपने ही अनुयायियों, जो विद्रोही बन गये थे, को दबाने में व्यस्त रहा। अकबर के दरबार व उसकी सेना में उजबेग जाति के लोग भी थे, जो अकबर के उदार विचारों व उसकी राजपूत नीति के कट्टर विरोधी थे। वे लोग कट्टर सुन्नी थे। अतः उनको अकबर की हिन्दुओं के प्रति उदार नीति अखरती थी। उनका प्रमुख नेता खाँ जमान था। इनका एक नेता अब्दुला खां भी था। वह मालवा में अकबर की सेवा में नियुक्त था। इसी ने विद्रोह का आरंभ किया। अकबर ने माण्डू पर धावा बोलकर उसे परास्त किया। परास्त होकर वह जौनपुर भाग गया और विद्रोही नेता खां जमान से जा मिला। अकबर ने विश्वास कर खान जमान को अफगानों को परास्त करने जौनपुर भेजा था। खां ने अफगानों को परास्त अवश्य कर दिया, परन्तु उसने स्वयं को स्वतंत्र शासक बनाने का प्रयास किया। ऐसे में अकबर स्वयं ने उस पर आक्रमण किया। कड़ा का सुबेदार आसफ खां भी अकबर से आ मिला। उन्होंने उजबेगों को खदेड दिया। इस प्रकार जौनपुर पर भी अकबर का अधिकार हो गया। खां जमान ने अकबर से क्षमा याचना कर ली। अकबर ने उसे क्षमा कर जौनपुर में ही रख लिया। परन्तु वह अपनी बागी नीति से बाज नहीं आया और 1566 ई. में वह पुनः बगावत कर बैठा। इस पर अकबर को 1567 ई. में उजबेगों पर पुनः आक्रमण करना पड़ा। लड़ाई में उजबेग परास्त हुए और खां जमान लड़ाई में काम आ गया। खां जमान का भाता बहादुर बंदी बना लिया गया। कुछ समय बाद उसको मौत के घाट उतार दिया। उजबेग जाति के कई नेताओं को निर्दयता से हाथी के पैरों के नीचे कुचलवा दिया। इसी अर्से में अब्दुल खां की मृत्यु हो गई और उजबेगों के तीसरे नेता सिकन्दर खां को अवध से खदेड़ दिया गया। इस प्रकार अकबर ने उजबेगो का खात्मा कर दिया।

दक्षिण विजय
उत्तर भारत और उत्तर-पश्चिमी सीमान्त प्रदेशों में अपनी सामरिक स्थिति सुदृढ़ कर लेने के उपरान्त अकबर ने दक्षिण भारत के राज्यों की ओर ध्यान दिया। इनको विजित न करने पर उसकी विजय यात्रा अधुरी ही रह जाती और वह समस्त भारत का एकछत्र सम्राट नहीं बन पाता। दिल्ली सल्तनत के समय दक्षिण में कई महत्वपूर्ण व उल्लेखनीय विजयनगर और बहमनी राज्य थे। बहमनी राज्य को निरन्तर अपने अस्तित्व के लिए विजयनगर से संघर्ष करना पड़ा। परिणामतः उसकी केन्द्रीय सरकार निर्बल हो गई और उसके प्रान्तीय गवर्नर अपने-अपने क्षेत्र में पूर्णरूपेण शक्तिशाली हो गये और वे स्वतंत्र रूप से शासन करने लगे इसका परिणाम यह हुआ कि बहमनी राज्य पांच स्वशासी राज्यों में विभक्त हो गया। उन पांचों स्वशासी राज्यों के नाम थे बीजापुर, गोललुण्डा, अहमद नगर, बीदर और बरार । बीजापुर में आदिलशाही, गोलकुण्डा में कुतुबशाही, अहमदनगर में निजामशाही, बीदर में बीदरशाही और बरार में इमादशाही हुकूमतें स्थापित हुई। कालान्तर में बरार और बीदर को क्रमशः उनके शक्तिशाली पड़ोसियों अहमदनगर और बीजापुर ने अपने में विलीन कर लिया। शेष तीन राज्यों में से बीजापुर और अहमदनगर ने दक्षिण में उल्लेखनीय भूमिका निभाई और दीर्घकाल तक नर्मदा के दक्षिणी क्षेत्र के इतिहास का निर्माण किया। जदुनाथ सरकार के शब्दों में, "बहमनी राज्य की विरासत निजाम और आदिल के योग्य हाथों में आई। अहमदनगर और बीजापुर इस राज्य में इस्लामी संस्कृति के केन्द्र बन गये।
इन दक्षिण के राज्यों की राजनीति की विशेषता यह रही कि ये दक्षिण में अपनी प्रभुता स्थापित करने हेतु निरन्तर संघर्ष करते रहे। इस संघर्ष में बरार और बीदर भी सम्मिलित होते रहते थे। हालांकि इन राज्यों ने समय-समय पर आपस में वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर आपसी मतभेदों को समाप्त करने का भी प्रयास किया, परन्तु इन प्रयत्नों से इन राज्यों के बीच स्थायी शांति स्थापित नहीं हो सकी। आपसी संघर्षों में विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से कभी-कभी अपने शत्रु राज्य विजयनगर से भी सहायता ले लिया करते थे। ऐसे अवसर इतिहास में बिरले ही दृष्टिगत होते हैं जबकि ये पांचों राज्य एक ही प्रयोजन के लिए संयुक्त रूप से लड़े हों। 1565 में तालीकोट के स्थान पर पहली बार बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुण्डा और बीदर ने मिलकर युद्ध किया था। इस युद्ध के उपरान्त इन राज्यों में पुनः अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष आरम्भ हुए। अकबर की साम्राज्यवादी क्षुधा को शांत करने के लिए यह एक उपयुक्त अवसर था।

दक्षिणी भारत पर अकबर द्वारा आकमण करने के कारण
  • उत्तरी भारत व दक्षिणी भारत भौगोलिक परिस्थितियों से विलग थे और अकबर उनमें चन्द्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक, सम्राट समुद्रगुप्त, सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी व मुहम्मद तुगलक की भांति राजनीतिक एकता स्थापित करना चाहता था। विंध्याचल पर्वत उत्तर व दक्षिण के मध्य एक दीवार बना हुआ था चाहे हिमालय के समकक्ष न हो। बेनी प्रसाद के मतानुसार उत्तरी भारत ही सदा आकामक रहा है।
  • मुगल साम्राज्य की सीमा खानदेश से टकराने लगी थी। मालवा, गुजरात व आसाम मुगल साम्राज्य के अंग बन चुके थे। उत्तर भारत व दक्षिण भारत के मध्य सीमावर्ती झगड़े चला करते थे। अकबर इस विवाद को समाप्त करना चाहता था।
  • आर्थिक महत्व- अलाउद्दीन खलजी की विजय यात्रा ने स्पष्ट कर दिया था कि दक्षिण भारत सोना, चांदी व हीरे-जवाहरात से परिपूर्ण हैं। अकबर के शासनकाल में भी उत्तरी भारत की आर्थिक अवस्था अच्छी नहीं थी। चार वर्षीय अकाल, प्लेग तथा उत्तर भारत में निरन्तर विजय यात्रा से शाहीकोष की आर्थिक अवस्था दयनीय हो गई थी। अलाउद्दीन खिलजी की भांति अकबर भी दक्षिण से धन प्राप्त करना चाहता था।
  • अकबर अपनी सेना को युद्ध-रत रखना चाहता था। उत्तरी भारत को विजित करने के उपरान्त तथा उजबेगों का भय समाप्त हो जाने पर उत्तर में युद्ध व लड़ाइयों की संभावनाएं कम हो गई थीं और अकबर अपनी सेना को सदा युद्ध-स्थल में देखना चाहता था। युद्ध भूमि को ही अकबर सेना की परेड के उपयुक्त समझता था। इसके अलावा युद्ध में सैनिकों को लूट में अच्छा पैसा मिल जाता था जिससे सैनिक आर्थिक दृष्टि से संतुष्ट हो जाते थे। इसके साथ ही शाही कोष को भी धन मिल जाता था। इन उद्देश्यों की पूर्ति अकबर दक्षिण विजय से करना चाहता था।
  • अकबर अपने पड़ोस में स्वतंत्र राज्य नहीं देख सकता था अकबर यह जानता था कि अवसर आने पर स्वतंत्र राज्य आक्रमण कर सकता है। अपने शत्रुओं को शरण दे सकता है। देश की राजनीति में हस्तक्षेप कर सकता है। इस कारण दक्षिण में अपनी सीमा पर वह स्वतंत्र राज्यों को समाप्त करना चाहता था।
  • राजनीतिक एकता स्थापित करना चाहता था-अकबर धर्म के क्षेत्र में उदार बन गया था। वह शिया-सुन्नी का ही भेद मिटाना नहीं चाहता था वरन जातियों व वर्गों को एकता के सूत्र में बांधकर रखना चाहता था। यह कार्य बिना राजनीतिक एकीकरण के संभव नहीं था। इसीलिए डॉ. आर.पी. त्रिपाठी ने कहा है कि दक्षिण की विजय अकबर की व्यक्तिगत आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए ही नहीं बल्कि एक प्रबुद्ध एवं महान शासक के आदर्शों के अनुकूल भी थी।
  • दक्षिण राज्यों का निर्बल होना-उत्तर भारत में तो अकबर ने अपनी विजय नीति से राजनीतिक एकता स्थापित कर ली थी, परन्तु दक्षिण के राज्य पास्परिक झगड़ों से अपनी शक्ति खोते जा रहे थे। ऐसी स्थिति में इस बात की पूरी संभावना थी कि उत्तर की ओर से दक्षिण पर आक्रमण हो।
  • अकबर की साम्राज्यवादी नीति-दक्षिण भारत पर अकबर द्वारा इसी नीति के कारण आक्रमण किया गया था। जैसा कि बताया जा चुका था कि अकबर जन्म-जात साम्राज्यवादी था। वह अपने साम्नाज्य को बढ़ाना चाहता था। अब दक्षिण का क्षेत्र ही ऐसा बचा था जहां कि अकबर अपनी विजय यात्रा सफल बना सकता था।
  • दक्षिण में पुर्तगालियों का बढ़ता हुआ प्रभाव-इस समय दक्षिण भारत में पुर्तगालियों का प्रभाव बहुत बढ़ गया था। गुजरात को विजित करने के उपरान्त भी दमन और द्वीव में उन्होंने अपनी कोठियां स्थापित कर ली थी। दिन पर दिन वे अपनी सामुद्रिक शक्ति बढ़ा रहे थे। यहां तक कि वे दक्षिण राज्यों की राजनीति में हस्तक्षेप भी करने लग गये थे। अकबर जैसे गूढ़ राजनीतिज्ञ को यह सब अखर रहा था। अतः इनके प्रभाव को समाप्त कर अकबर अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता था। गोवा लेने को अधिक उत्कंठित था।
उपर्युक्त कारणों से स्पष्ट है कि अकबर की दक्षिण नीति शाहजहां व औरंगजेब की भांति शिया-सुन्नी के मध्य धार्मिक लड़ाई नहीं वरन् विशुद्ध राजनीतिक थी जिसका मूल उद्देश्य दक्षिण में साम्राज्य बढ़ाना था।
अकबर और खानदेश - अकबर ने सर्वप्रथम खानदेश की ओर अपना ध्यान दिया, क्योंकि वह दक्षिण का प्रवेश द्वार समझा जाता था। 1564 ई. में ही खानदेश के शासक मुबारक शाह ने अकबर के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर अपने राज्य की मुगल आक्रमणों से सुरक्षा प्राप्त कर ली थी। परन्तु 1577 ई. में अकबर ने इस राज्य पर अपना अधिक प्रभाव स्थापित करने का प्रयास किया। उसने तत्कालीन खानदेश के शासक अली खां पर मुगल प्रभुता स्वीकार करने का दबाव डाला। अली खां अकबर की शचित जानता था। अत: उसने बिना युद्ध किय अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली।

अहमदनगर और अकबर
1572 ई में अकबर ने गुजरात को मुगल साम्राज्य का अंग बना लिया था। इस विजय ने अकबर की दक्षिण विजय को सुगम बना दिया। 1591 ई. में अहमदनगर का सुल्तान बुरहान-उल-मुल्क था। अकबर ने उसके पास अपनी अधीनता स्वीकार करने का प्रस्ताव भेजा, जो उसने स्वीकार नहीं किया। 1593 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। राज्य की दशा बिगड़ गई और गृह युद्ध की परिस्थिति बन गई। अहमदनगर के प्रमुख अमीर मंझू ने अकबर के पुत्र मुराद और अब्दुर्रहीम खानखाना के पास सहायता की अपील की। मुराद ने 1593 ई. में अहमदनगर पर आक्रमण कर दिया। उस समय अहमदनगर चांदबीबी के अधिकार में था। वह एक साहसी तथा वीर महिला थी। उसने सुरक्षा का उचित प्रबंध किया। घेरा लंबा चला। मुराद के विजय की संभावना अधिक नहीं थी। उसने सुल्ताना से संधि की बात चलाई। वह भी दुर्ग का घेरा लंबा नहीं चलाना चाहती थी। उसने मुगल सम्नाट को बरार देना स्वीकार कर संधि कर ली।
परन्तु यह संधि स्थायी सिद्ध नहीं हुई। अहमदनगर के कतिपय अमीरों को यह संधि खटकने लगी। उन्हें यह अखरने लगा कि बरार मुगल साम्राज्य का अंग रहे। अतः 1597 में अकबर ने पुनः अपने शाहजादा मुराद और अब्दुर्रहीम खानखाना को आक्रमण करने भेजा। परन्तु दोनों सेना नायकों में एकता न होने से सैनिक अभियान को विशेष सफलता नहीं मिली। मराद अष्ठी के समीपे सपा में परास्त हआ और 1599 ई. में शराबी मुराद इस जहां से विदा हो गया। अब अकबर स्वयं ने दक्षिण की ओर जाने का इरादा किया। 1600 ई. में बिना किसी मुकाबले के अकबर ने बुरहानपुर पर अधिकार कर लिया। अब अहमदनगर को विजित करने का उत्तरदायित्व राजकुमार दानियाल और खानखाना को सौंपा। चांद बीबी को मौत के घाट उतार दिया गया था। खान-खाना और दानियाल अहमदनगर में प्रवेश कर गये। अगस्त 1600 ई. की इस विजय ने अहमदनगर के 15,000 वासियों को मुगलों के हाथों मरने को विवश कर दिया। परन्तु युवा सुल्तान बहादुर को बंदी बनाकर ग्वालियर के दुर्ग में भेज दिया। बालाघाट को भी मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया। लेकिन मलिक अम्बर के प्रयासों से अहमदनगर पुनः मुगलों का विरोधी हो गया। अहमदनगरवासी मुगल सेना से लोहा लेते रहे। इस प्रकार मुगल सेना को अहमदनगर की लड़ाई में काफी समय और धन लगाना पड़ा। अभाग्यवश इसी अंतराल में खानदेश में विद्रोह हो गया और अकबर को उधर ध्यान देना पड़ा।

अकबर के जीवन की अंतिम लड़ाई 

(आसीरगढ़ की विजय) अकबर का अंतिम युद्ध खानदेश के साथ हुआ। खानदेश का सुल्तान अली खां था। उसने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी। जब खानखाना और दानियाल ने अहमदनगर पर विजय प्राप्त की तो उस लड़ाई में अलीखां भी मुगलों की तरफ से युद्ध करने गया था और वह अपने प्राण गंवा बैठा था। परन्तु उसके पुत्र मीरन बहादुर ने अकबर की अधीनता स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उसे अपने असीरगढ़ दुर्ग की दृढ़ता पर बड़ा विश्वास था। उसने अपने को उस दुर्ग में बंद करके अकबर का मुकाबला करने का संकल्प किया। यह दुर्ग सतपुड़ा पहाड़ी पर 900 फीट की ऊंचाई पर निर्मित था। दक्षिण भारत का यह प्रवेश द्वार था और सोलहवीं सदी में यह विश्व का एक आश्चर्य माना जाता था। इसकी चोटी का क्षेत्रफल 60 एकड़ था। पानी के स्रोत व खाद्य सामग्री से परिपूर्ण था। इस दुर्ग की हवा भी स्वास्थ्यवर्द्धक थी। इस दुर्ग में प्रवेश केवल दो दरों से किया जा सकता था। चारों तरफ चट्टानों से घिरे होने के कारण इसमें पहुंचना असंभव प्रतीत होता था। चट्टानों की ऊंचाई 80 फीट से 120 फीट तक थी। सामरिक सामग्री से भरपूर था। तब भी अकबर ने दुर्ग को विजित करने की ठानी मीरन बहादर को दुर्ग की सुदृढ़ता के कारण मुगल सेना का सफलतापूर्वक सामना करने की आशा थी।
अप्रेल 1600 ई. से अकबर ने इस दुर्ग को जीतने की तैयारी की। अबुल फजल और मुर्तुजा खां की निगरानी में दुर्ग-विजय की तैयारी की गई। फिर भी यह घेरा कई मास चला और अकबर इसे विजित नहीं कर सका। उसकी भारी तो दुर्ग को नष्ट करने में लाभदायक सिद्ध नहीं हुई। उधर घेरा लम्बा चलने के कारण मीरन बहादुर ने अपनी माता व पुत्र को 60 हाथियों के साथ अकबर से संधि करने भेजा परन्तु सम्राट दुर्ग का बिना किसी शर्त के पूर्ण समर्पण चाहता था। इसी अंतराल में अकबर के पुत्र सलीम ने बगावत कर दी और स्वयं को 1601 ई. में सम्राट घोषित कर दिया। अतः अकबर का इलाहाबाद जाना आवश्यक हो गया, परन्तु वह दुर्ग विजय के बिना नहीं जा सकता था। इधर जब उसने देख लिया कि वह दुर्ग को तोप तलवार व रोना की वीरता रो विजित नहीं कर राकता तो उराने धूर्त के रूप में दुर्ग के किलेदार व सैनिकों को अपार धन देकर खरीदने के प्रयास प्रारंभ कर दिए। इस प्रकार के कार्यों में भी वह प्रवीण था। अपने प्रयास में वह सफल रहा। उसने सुल्तान मीरन बहादुर को उसके जीवन की सुरक्षा का आश्वासन देकर मिलने बुलाया। सम्राट के वचनों पर विश्वास कर वह सम्राट के पास आया। सम्राट अपने शब्दों पर कायम नहीं रहा और उसे धोखे से बंदी बना लिया। फिर भी अकबर अपने उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सका, क्योंकि मीरन बहादुर के बंदी बनाये जाने पर दुर्ग-रक्षकों ने वीरता से सम्राट की सेना का सामना किया। इस पर अकबर ने दुर्ग-रक्षकों में पैसा पानी की तरह बहाना प्रारम्भ कर दिया। रक्षक धन के प्रलोभन में आ गये। दुर्ग का रक्षक अबेसिनिया का था और पुर्तगाली चतुर तोपची थे। घूसखोर दुर्ग-रक्षकों ने दुर्ग का फाटक खोल दिया। इस प्रकार असीरगढ़ दुर्ग को 6 जनवरी 1601 ई को अकबर ने अपने अधिकार में कर लिया।
अकबर की यह अंतिम विजय थी। लेकिन इस दुर्ग को पराजित करने में जो उपाय अकबर ने अपनाये वे नैतिक दृष्टि से निन्दनीय थे और अकबर की वीरता पर एक धब्बा है। इसके अलावा दुर्ग के कमाण्डर के पुत्र मुकर्रब का बिना किसी अपराध के कत्ल करवा देना भी अकबर के चरित्र की आलोचना का ही विषय है।अकबर ने नव विजित प्रदेशों के तीन (अहमदनगर, बरार और खानदेश) सूबे बना दिए और इनका सूबेदार राजकुमार दानियाल को बना दिया था। स्मिथ का यह भी कहना है कि सलीम की बनावत देखकर ही अकबर ने सलीम और दानियाल के मध्य शक्ति-संतुलन बनाये रखने की दष्टि से दानियाल को इतना महान (मालवा, गुजरात, खानदेश, बरार व अहमदनगर का) सूबेदार बनाया था। मीरन बहादुर को बंदी बनाकर ग्वालियर के दुर्ग में भेज दिया और जीवन निर्वाह के लिए 4,000 अशर्फियां वार्षिक बतौर भत्ते के स्वीकार कर दी गई। असीरगढ़ की विजय का उल्लेख बुलन्ददरवाजा और फतेहपुर सीकरी की मस्जिद पर भी किया गया है।

अकबर और दक्षिण के अन्य राज्य
गुजरात विजय के उपरान्त 1573 में दक्षिण के अन्य राज्यों में अकबर ने प्रथम दूत भेते थे। उन्होंने वहां के सुल्तानों को अकबर की दासता स्वीकार करने को समझाया।

बीजापुर
अकबर के एक विद्रोही मुहम्मद हुसैन मिर्जा ने बीजापुर के सुल्तान की शरण ले ली थी। अकबर ने अपना दूत भेजकर उसकी वापसी चाही परन्तु बीजापुर के सुल्तान का इनकार हो गया। 1579 ई. में अकबर ने पुन: बीजापुर अपना दूत भेजकर बीजापुर को अपने अधीन करना चाहा, परन्तु बीजापुर सुल्तान का फिर इनकार हो गया। 1593 ई. में वहां फैजी को भेजा, वह भी अपने उद्देश्य में असफल होकर आ गया।

गोलकुण्डा
इसी समय अकबर ने गोलकुण्डा अपना दूत भेजा। गोलकुण्डा के सुल्तान ने भी अधीनता स्वीकार करने से इनकार कर दिया और विवाह में अपनी पुत्री देने से भी इनकार कर दिया। परन्तु सम्राट को संतुष्ट करने हेतु उसने अमूल्य वस्तुएं भेंट में अवश्य भेज दीं। इसके उपरान्त अकबर बीजापुर व गोलकुण्डा की राजनीति में नहीं उलझा, क्योंकि वह अहमदनगर और खानदेश के युद्धों में फंस गया था। 1601 के उपरान्त सलीम के विद्रोह के कारण इनका विजित करने की सोच नहीं सका। उसको अपने साम्राज्य को बनाये रखने की ही चिन्ता हो गई। सलीम के विद्रोहों ने अकबर को बड़ा हताश कर दिया था।

महाराणा अमरसिंह और अकबर (1507 ई.-1620 ई.)
महाराणा प्रताप के ग्यारह रानियां थी। उनसे 17 पुत्र उत्पन्न हुए थे। राणा प्रताप के उत्तराधिकारी अमर सिंह बने। महाराणा प्रताप अपनी मृत्यु (19 जनवरी 1597 ई.) से पूर्व सिवाय चित्तौड़गढ़ माण्डलगढ़ और अजमेर के करीब-करीब सारा मेवाड़ अपने अधिकार में कर चुके थे। पर सारा मेवाड़ वीरान हो चुका था। अकबर ने राजकुमार सलीम और मानसिंह के नेतृत्व में पुनः एक सेना मेवाड़ भेजी। परन्तु बागी भावना से उत्पीडित सलीम ने इस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। अत: सलीम से समझौता हो जाने पर अकबर ने दशहरा के दिवस 1603 ई. में फिर सलीम के नेतृत्व में ही आगरा से सेना भेजी। परन्तु फतेहपुर सीकरी पहुंचते ही सलीम ने अपनी मांगे बढ़ाना आरंभ कर दिया। अतः अकबर को यह सैनिक अभियान छोड़ना पड़ा। परन्तु उसने मेवाड़ को विजित करने का इरादा नहीं छोड़ा। अपने शासन के अंतिम दिनों में उदयसिंह के एक पुत्र सागर को राणा की पदवी से विभूषित कर एकसेना अमर के विरूद्ध और भेजी। जब सागर भी कुछ नहीं कर सका तो अकबर ने अपने पौत्र खुसरो को यह भार सौंपना चाहा था पर इसी अंतराल में 1605 ई. में वह स्वयं इस दुनियां से विदा ले गया। इस प्रकार स्पष्ट है कि अकबर अपनी मृत्यु के समय तक मेवाड़ नहीं भूला था। वह इसे हर कीमत पर अपने अधीन करना चाहता था पर वह अपने उद्देश्य में अंत तक असफल रहा। तभी तो हर सिसोदिया आज भी उन्हें आदर से स्मरण करता है।

अकबर की राजपूत नीति

अकबर एक कुशल राजनीतिज्ञ तथा दूरदर्शी सम्राट था। डॉ. ईश्वरी प्रसाद के अनुसार, “अकबर से पूर्व के शासकों ने जिन शासकों पर विजय प्राप्त की, उनका बुरी तरह से निरदर किया था और उनके राज्यों में लूटमार मचायी थी। अकबर राजनीति के श्रेष्ठ गुणों से पूर्ण था और उसने अपने साम्राज्य को हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों की सदभावना का आधार प्रदान करने का निश्चय किया उसने शांति और सांत्वना की नीति अपनायी और हिन्दुओं को मूर्ति पूजा और इस्लाम में आस्था न रखने के कारण अपने से नीचा मानने से इन्कार कर दिया। उसने उनके निरूद्ध भीषण गुद्ध किगे, परन्तु उनके अधीनता स्वीकार करने पर उसने प्रसन्नतापूर्व युद्ध समाप्त करके शांति-व्यवस्था स्थापित की।"
कर्नल टॉड के अनुसार, "मुगल साम्राज्य का अकबर ही वास्तविक संस्थापक था। वहीं प्रथम सफल विजेता था, जिसने राजपूतों की स्वतंत्रता नष्ट कर दी। उसने लोगों को जंजीरो में जकड़ा, किन्तु उनके ऊपर सोने का मुलम्मा चढ़ा दिया। इन जंजीरों की राजाओं को आदत पड़ गयी, क्योंकि बादशाह ने अपनी शक्ति का उपयोग ऐसे ढंग से किया कि राजपूतों का जातिय अगिगान बना रहा और कभी कभी उनके अकीर्तिकर राग-द्वेष भी चलते रहे, परन्तु उराकी विजयों के पूर्ण रूप से दृढ़ होने से पूर्व उसकी तलवार ने इन सैनिक कौमों की कई पुश्तें काट दी और उनकी चमक-दमक और कीर्ति खत्म कर दी। उसकी गणना शहाबुद्दीन, अलाउद्दीन और दूसरे विनाशक विजेताओं में हो गयी। लाखों लाखों लोग उसकी ऐसी प्रशंसा करने लगे, जैसे उसकी जाति के किसी पुरुष की नहीं की गई थी।"
अकबर जानता था कि राजपूतों की शत्रुता से स्थायी मुगल साम्राज्य स्थापित नहीं हो सकता, बल्कि यह तो उनकी सहायता एवं सहयोग से ही हो सकता है। अकबर जानता था कि राजपूतों के सहयोग से ही राजनीतिक एवं सामाजिक एकता स्थापित हो सकती है तथा वह विरोधी मुस्लिम अमीरों एवं सरदारों पर नियंत्रण रख सकता है। अतः उसने राजपूतों को अपना विश्वासपात्र एवं मित्र बनाने का प्रयत्न किया। उसने अपनी अधीनता स्वीकार न करने वाले राजपूत शासकों से युद्ध किया तथा अपनी अधीनता स्वीकार करने पर उन्हें क्षमा कर दिया। इस तरह उसने राष्ट्रीय राज्य की स्थापना की।

राजपूत नीति की विशेषतायें
अकबर की राजपूत नीति की विशेषताये इस प्रकार थी
अकबर ने राजपूतों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये। उसने आमेर, बीकानेर तथा जैसलमेर के राजपूत शासकों की पुत्रियों से विवाह किया। अकबर ने इन राजपूत शसकों को उच्च मनसबदार बना दिया। आमेर नरेश बिहारीमल ने अपनी पुत्री जोधाबाई का विवाह अकबर के साथ कर दिया। डॉ. बेनीप्रसाद के अनुसार, "इन विवाह-सम्बन्धों से भारतीय राजनीति में एक नये युग का सूत्रपात हुआ। देश को कुछ महान शासक प्राप्त हुए ओर मुगल सम्राटों की चार पीढ़ियों को मध्यकालीन भारत के कुछ महान सेनानायकों तथा कूटनीतिज्ञों की सेवाये उपलब्ध हुई।"
अकबर ने अपनी अधीनता स्वीकार करने वाले राजपूत शासकों को उच्च पद प्रदान किए। अबुल फजल के अनुसार अकबर के राज्य के 51 महत्वपूर्ण मनसबदारों में 17 राजपूत थे। भगवानदास को पंजाब का एवं मानसिंह को अफगानिस्तान का सूबेदार बनाया गया। मानसिंह को 7,000 का मनसब दिया गया, जो शाही परिवार के व्यक्ति को साधारणतः दिया जाता था।
अकबर ने अपनी अधीनता स्वीकार करने वाले राजपूत राजाओं को आंतरिक स्वतंत्रता दी। डॉ. त्रिपाठी के अनसार. "अकबर ने अन्य राजपूत राजाओं के प्रति अपने व्यवहार से सिद्ध कर दिया कि न तो वह उनके राज्य पर अधिकार करना चाहता है और न उनके सामाजिक धार्मिक और आर्थिक जीवन में हस्तक्षेप करता है। वह तो इतना चाहता था कि वे नवीन साम्राज्य संघ का प्रभुत्व मान लें।"
अकबर ने अधीनता स्वीकार करने वाले राजपूतों के साथ उदार एवं संघर्ष करने वाले राजपूतों के साथ कठोर व्यवहार किया। मेवाड़ के राणाओं ने मुगलों से संघर्ष किया था, जिसके कारण अकबर सम्पूर्ण मेवाड़ का स्वामी नहीं बन सका। प्रताप ने अपनी मृत्यु से पहले चित्तौड़, अजमेर तथा मांडलगढ़ को छोड़कर पूरे मेवाड़ को मुक्त करा लिया था।

राजपूत नीति के परिणाम
अकबर की राजपूत नीति से राजपूत उसके मित्र व हितैषी बन गये। इससे मुगल साम्राज्य का विस्तार हुआ तथा शांति एवं व्यवस्था स्थापित हुई।
इस नीति से भारत में नया युग प्रारम्भ हुआ। अब हिन्दुओं ने मुगलों को विदेशी समझना छोड़ दिया। डॉ. ईश्वरीप्रसाद के अनुसार, “राजपूतों के माध्यम से उत्तरी भारत के लाखों हिन्दु मुगल साम्राज्य के शुभचिंतक बन गये और उसकी उन्नति तथा सफलता के लिये प्रार्थना करने लगे।"
अकबर ने अपनी राजपूत पत्नियों को भी धार्मिक स्वतंत्रता दी। अबुल फजल के अनुसार, “राजपूत राजकुमारियां देवी-देवताओं की पूजा तथा हवन करती थीं, जिससे धर्म निरपेक्षता को प्रोत्साहन मिला।" जे.एम, शैलट के अनुसार, “अकबर की राजपूत नीति ने मुगल सरकार को धर्म-निरपेक्ष राज्य बनाने में बहुमूल्य सहायता दी।"
राजपूतों ने भी अकबर के संरक्षण में कुछ ऐसे कार्य किये, जिससे उनको बहुत प्रसिद्धि मिली।
अकबर की राजपूत नीति से हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति का विकास हुआ तथा स्थापत्य कला, चित्र कला, संगीत कला, साहित्य आदि क्षेत्रों में दोनों जातियों में समन्वय हुआ। अकबर द्वारा निर्मित अनेक भवनों पर राजपूती कला का प्रभाव दिखता है। डॉ. ईश्वरीप्रसाद के अनुसार, "जहांगीरी महल पर नो हिन्दू कला का इतना प्रभाव है कि वह भवन किसी राजपूत राजकुमार द्वारा बनवाया हुआ प्रतीत होता है।" इसी तरह हिन्दू-मुस्लिम समन्वय की प्रतीक अन्य अनेक कलाकृतियां हैं।
अकबर की राजपूत नीति से साम्राज्य की उन्नति हुई, साम्राज्य का विस्तार हुआ, देश समृद्धिशाली हुआ तथा राष्ट्र निर्माण के कार्य में सहयोग मिला।

हिन्दुओं के प्रति नीति

अकबर ने हिन्दुओं के साथ समन्वय की नीति अपनायी तथा उन्हें मुस्लिमों के समान राजनीतिक व नागरिक अधिकार प्रदान किये। इससे हिन्दू राजभक्त बन गये। अकबर की हिन्दू नीति की प्रमुख विशेषतायें इस प्रकार थीं

तीर्थयात्रा कर समाप्त करना (1563 ई.)
पहले हिन्दुओं को अपने तीर्थस्थानों की यात्रा के लिए राज्य को कर देना पड़ता था, किन्तु अकबर ने इसे समाप्त कर दिया। उसने हिन्दुओं को मंदिर निर्माण की भी आज्ञा दे दी

जजिया कर समाप्त करना (1564 ई)
जजिया कर हिन्दुओं को अपमानित करके लिया जाता था, ताकि वे इस्लाम स्वीकार कर लें। अकबर ने 1564 ई. में इसे समाप्त कर दिया, जिससे हिन्दुओं के मन में उसके प्रति अगाध श्रद्धा उत्पन्न हो गयी। अबुल फजल के अनुसार, "अकबर प्रथम मुस्लिम शासक था, जिसने जजिया कर हटा दिया था।" डॉ. एस. आर. शर्मा के अनुसार, "इस कर की समाप्ति राज्य की नीति में एक भारी परिवर्तन की सूचक थी। हिन्दू तथा मुसलमान राज्य के एक समान नागरिक बन गये।" डॉ. ए. एल. श्रीवास्तव के अनुसार, अकबर की इस्लाम के प्रति धारणा और गैर-इस्लामी धर्मों तथा उनके अनुयायियों के प्रति उसका दृष्टिकोण ही वह धुरी थी, जिस पर उसके दरबार और सरकार के सभी कामकाज घूमते थे।"

उच्च पदों पर नियुक्ति
पहले हिन्दू निम्न पदों पर ही नियुक्त किये जाते थे। अकबर ने उन्हें योग्यतानुसार उच्च पदों पर भी नियुक्त किया।

धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करना
अकबर ने हिन्दुओं को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता दे दी। उसने हिन्दुओं को मूर्तिपूजा करने एवं होली, दीपावली आदि त्यौहार धूम धाम से मनाने की छूट दे दी। वह स्वयं भी इन त्यौहारों में भाग लेता था। यहां तक कि उसने जबरदस्ती मुसलमान बनाये गये लोगों को हिन्दू धर्म ग्रहण करने की छूट दे दी।

हिन्दू रिवाजों को अपनाना
अकबर ने कुछ हिन्दू रीति-रिवाजों को भी अपना लिया था। डॉ. एस.आर शर्मा के अनुसार, “उसने सूर्य को नमस्कार करना तथा तिलक लगाना शुरू कर दिया। उसने कई अन्य हिन्दू रीतियां अपनाई।" उसने अपनी राजपूत बेगमों को शिव, विष्णु आदि की उपासना करने की छूट दे दी। वह हिन्दुओं के समान तिलक लगाता था तथा हिन्दू वेश-भूषा भी धारण करता था।

गो वध निषेध
चूंकि हिन्दू गाय की पूजा करते हैं, अतः अकबर ने हिन्दुओं का दिल जीतने के लिए गोवध निषध कर दिया। 1590 ई. के बाद उसने बैलों, भैंसो एवं भेड़ों के मांस का प्रयोग भी बंद कर दिया। कुछ समय के लिए मछलियां पकड़ना भी निषेध कर दिया गया।

हिन्दू साहित्य का संरक्षण
अकबर ने हिन्दी तथा संस्कृत के विद्वानों को भी संरक्षण दिया तथा हिन्दू साहित्य को प्रोत्साहित किया। उसने हिन्दू ग्रंथों को अनुवादित करने हेतु पृथक् विभाग स्थापित किया। उसने बीरबल, मानसिंह, भगवानदास, अब्दुर्रहीम खानखाना आदि हिन्दी कवियों को संरक्षण दिया अबुल फजल के अनुसार अकबर के दरबार के विख्यात 21 विद्वानों में 9 हिन्दू थे।

सामाजिक सुधार
अकबर ने हिन्दू धर्म में सुधार का भी प्रयास किया। उसने सती–प्रथा, बाल विवाह, कन्या-वध आदि कुरीतियों को दूर करने का प्रयत्न किया एवं विधवा-विवाह तथा अन्तर्जातीय विवाह को प्रोत्साहित किया।
हिन्दू नीति के परिणाम अकबर की उदार हिन्दू नीति से हिन्दु मुगलों से प्रेम करने लगे तथा मुगल साम्राज्य के प्रति उनमें राजभक्ति की भावना उत्पन्न हुई। वे अकबर को अपना हितैषी तथा शुभचिंतक मानने लगे। अकबर की उदार हिन्दू नीति से हिन्दुओं तथा मुसलमानों में समन्वय स्थापित हुआ, जिससे स्थायी साम्राज्य की स्थापना हुई और राष्ट्रनिर्माण का कार्य हुआ। डॉ. पी.एन. सरन के अनुसार, "धर्म, वर्ग तथा जाति के मतभेदों को दूर करके अकबर ने एक ऐसे राज्य की स्थापना की, जो समस्त प्रजा की इच्छा पर आधारित था और जिसे बिना किसी संकोच के राष्ट्रीय राज्य कहा जा सकता था।"

अकबर की धार्मिक नीति

अकबर प्रथम मुस्लिम शासक था, जिसकी गणना भारतीय इतिहास में एक राष्ट्रीय शासक के रूप में की जाती है। उसका एक प्रमुख कारण उसकी धार्मिक सहिष्णुता है। उसे पिता हुमायूं का रहस्यवाद तथा अपनी माता की धार्मिक भावना विरासत में मिली थी। वह धार्मिक एवं सांस्कृतिक मामलों में तलवार का सहारा लेना नहीं चाहता था। बैरामखां व अपनी शिया धर्मावलम्बी माता हमीदा बान के प्रभाव में रहने से उसमें धार्मिक कट्टरता घर नहीं कर सकी थी। अतः उसने भारत में प्रचलित समस्त धर्मों को सम्मान व समानता की दृष्टि से देखा। उसके शासन काल में धर्म के नाम पर न तो किसी प्रकार का अत्याचार ही किया गया और न किसी सरकारी सेवा से वंचित ही किया गया। इसीलिए अतर अली का कहना है कि अकबर अपनी इस नीति से धर्म निरपेक्ष राज्य की स्थापना करना चाहता था। परन्तु इसका यह आशय नहीं कि वह मुसलमान नहीं था। अपने शासन के प्रारम्भ में वह एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था। सुन्नी धर्म के समस्त नियमों का वह पालन करता था। दिन में बह पांच बार नमाज पढ़ता तथा मुल्ला-मौलवियों के प्रभाव में आकर हिन्दुओं पर अत्याचार भी करता था। राज्य के अलावा काजी अब्दुन्नबी खां का बड़ा आदर करता था। एक अवसर पर अकबर ने उसकी चप्पलें भी उठाई थी। परन्तु 1573 ई. के उपरान्त उसके धार्मिक विचारों में महान परिवर्तन आया। जब 1573 में अकबर गुजरात विजय करके सीकरी लौटा तब शेख मुबारक ने सम्राट से कहा था कि वे धार्मिक मामलों में भी नेतृत्व करें। हालांकि शेख मुबारक के सुझाव का सम्राट ने कुछ उत्तर नहीं दिया, परन्तु धार्मिक विषयों की विवेचना करने में अपने को योग्य बनाने हेतु अकबर ने भारत में प्रचलित सभी धर्मों के सिद्धान्तों पर मनन करना आरम्भ कर दिया। उसने धार्मिक कट्टरता का परित्याग कर सब धर्मों का आदर करना आरम्भ किया। अपने धार्मिक जीवन में भी वह केवल सुन्नी धर्म का ही अनुयायी नहीं रहा, वरन् अन्य धर्मों की परम्पराओं को भी उसने अपनाना आरम्भ किया।
अकबर के धार्मिक विचारों का अध्ययन करने के उपरान्त यह कहना कठिन हो जाता है कि वह सच्चे अर्थ में किस धर्म का अनुयायी था? जन्म से कट्टर सुन्नी मुसलमान होते हुए उसने हिन्दुओं पर अत्याचार करने वाले कानून समाप्त कर दिये । धर्मान्धता 1573 ई. के उपरान्त उसे अप्रिय हो गई। यह उसकी धार्मिक सहिष्णुता का ही परिणाम था कि हिन्दुओं को अपने ढंग से जीवन व्यतीत करने, पूजा पाठ करने, और मंदिर बनवाने व उनकी मरम्मत कराने की छूट मिल गई थी। इसी उलझन के कारण कछ विद्वान उसे पाखण्डी और ढोगी कहते हैं। इसके साथ ही कतिपय इतिहासकार उसे सत्य की खोज करने वाला सम्राट बताते हैं। अतः निम्नलिखित अवतरणों में हम यही बताने का प्रयास करेंगे कि उसके धार्मिक विचारों में यह परिवर्तन किस प्रकार आया, किन कारणों से आया और इसका क्या प्रभाव पड़ा?

धार्मिक परिवर्तन के कारण

शिया-सुन्नी के पारस्परिक झगड़े
उसने धार्मिक सिद्धान्तों का मनन इस्लाम धर्म से ही प्रारम्भ किया। 1575 ई. में धर्म का पर्यवेक्षण करने की दृष्टि से उसने फतेहपुर सीकरी में एक इबादतखाना बनवाया। वहां वह शिया व सुन्नी दोनों सम्प्रदायों के धर्माधिकारियों को आमंत्रित करता था। वहां उनमें धार्मिक प्रश्नों पर वाद-विवाद होता था। यह वाद-विवाद कभी-कभी उग्र हो जाता था कि दोनों सम्प्रदायों के धर्माधिकारी आपस में गाली-गलौज पर उतर आते थे। यह देखकर अकबर को महान् दुःख होता था। उनके इस प्रकार के वाद-विवाद ने अकबर को अन्य धर्मों की जानकार प्राप्त करने को बाध्य किया। इसका परिणाम यह निकला कि उसने अपने धर्म के अन्धविश्वासों का परित्याग करना आरम्भ किया। शुक्रवार को उसने मांस-भक्षण बंद कर दिया तथा वह पशु-वध को भी हेय समझने लगा। उसने अब्दुलनबी को 'सदर-उस-सुदूर' (धर्माचार्य) पद से हटा दिया। फैजी ने खुतबा तैयार किया और अकबर स्वयं ने खुतबा पढ़ने का निश्चय किया। खुतबे के अंत में 'अल्लाह अकबर' लिखा गया। कट्टर पंथियों ने इसका यह अर्थ लिया कि अकबर पैगम्बर बनने का प्रयास कर रहा है। अतः कट्टर सुन्नी मुसलमानों ने उसका घोर विरोध किया। इस श्रेणी में हम वी.ए. स्मिथ और एके. निजामी को ले सकते हैं। उनका कहना था कि अकबर पैगम्बर का रुतवा (पद) प्राप्त करने की चेष्टा कर रहा था।

हिन्दू स्त्रियों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करना
आमेर के राजा भरमल की पुत्री से विवाह कर अकबर ने एक नवीन इकाई का श्रीगणेश किया। इसके उपरान्त उसने कई राजपूत कन्याओं से विवाह किये और उनके प्रति उराने धार्गिक राहिष्णुता की नीति अपनायी। उनके प्रभाव में आने पर उसने गांरा-गदिरा का प्रयोग रागाप्त कर दिया तथा उन बेगमों के धार्मिक विचारों के प्रति भी वह उदार बना रहा। राजकुमार सलीम का विवाह भी आमेर नरेश भगवानदास की पुत्री मानबाई से हुआ। सलीम उसका बहुत आदर करता था और उसे शाह बेगम कहता था। अकबर उस शादी व हिन्दू रीति रिवाजों से बहुत प्रभावित हुआ।

वंशानुगत प्रभाव
अकबर को सुन्नी धर्म की कद्दरता बचाने में उसकी वंश परम्पराओं ने भी बड़ी भूमिका निभाई। स्वयं सुन्नी मुसलमान होते हुए हुमायूं ने सूफी मतावलम्बी हमीदा बानू बेगम से विवाह किया। अकबर का जन्म ही हिन्दू राजा के घर हुआ था। उसके जन्म का एक मास थट्टा में ही व्यतीत हुआ था। उसके पिता हुमायूं को सुन्नी होते हुए ईरान के शाह से शिया धर्म पर समझौता करना पड़ा था। हुमायूं ने अकबर का संरक्षक बैरामखां को बनाया तथा जो शिया तथा उदार विचारों का था। अकबर का गुरु अब्दुल लतीफ था। उसकी नियुक्ति हुमायूं ने ही की थी। वह शिया व उदार विचारों का था।

अकबर पर अन्य धर्मों का प्रभाव
अकबर ने अपने धार्मिक विचार केवल सुन्नी धर्म तक ही सीमित नहीं रखे। वह संप्रभुता के एक ऐसे सिद्धान्त की स्थापना का प्रयास कर रहा था जिसमें भारत की धार्मिक तथा जातिगत विषमताओं का पूरा ध्यान रखा गया था। अकबर के धार्मिक सिद्धान्तों का विकास वास्तव में 1576 ई. से आरंभ हुआ। इसका श्रेय उसके द्वारा निर्मित इबादतखाने को जाता है जो धार्मिक विषयों पर वाद-विवाद के उद्देश्य से बनवाया गया था। इस वाद-विवाद में अबुल फजल ने प्रमुख भूमिका निभाई। परम्परावादी सुन्नी उलेमा के विषय में विभिन्न वर्गों को सक्रिय करने का श्रेय उसी को जाता है। इबादतखाने में होने वाले वाद-विवाद ने अकबर के धार्मिक विचारों के विकास में गहरी भूमिका निभाई। कट्टर सुन्नी सम्प्रदाय के नेता मखदूम-उल-मुल्क और शेख अब्दुल नबी थे। उनके पारस्परिक झगड़ों और विचारों का संघर्ष उग्र रूप में देखने का अवसर अकबर को इबादतखाने में ही मिला। उनकी असहिष्णुता तथा कट्टरता का अकबर के जीवन पर भारी प्रभाव पड़ा और धर्म का सच्चा स्वरूप जानने की अभिलाषा ने अकबर को अन्य धर्मों के विषय में जानकारी प्राप्त करने को विवश कर दिया।

अकबर की धार्मिक नीति के चरण
अकबर की धार्मिक नीति को तीन चरणों में विभक्त किया जा सकता है-
  1. उदारता की नीति (1560-1575 ई.)
  2. इबादतखाने की स्थापना और महान परिवर्तन (1575-1580 ई.)
  3. दीन-ए-इलाही (1581 ई.)

उदारता की नीति (1560-1575 ई.)
अकबर आरम्भ में पूर्ववर्ती शासकों की भांति कट्टर था, अतः उसने मखदूम-उल-मुल्क एवं अब्दुन्नबी आदि कट्टर मुल्लाओं के कहने पर कुछ गैर-इस्लामिक व्यक्तियों को मरवा दिया। आमेर की राजकुमारी जोधाबाई से 1562 ई. में विवाह करने के पश्चात् उसकी धार्मिक नीति में परिवर्तन हुआ, जो निम्न तथ्यों से प्रमाणित होता है
  1. अकबर ने 1562 ई. में युद्धबंदियों को गुलाम तथा बलपूर्वक मुसलमान बनाए जाने पर प्रतिबंध लगा दिया। उसने आदेश दिया कि बलपूर्वक मुसलमान बनाये गये लोग हिन्दू धर्म ग्रहण कर सकते हैं।
  2. हिन्दुओं को अपने तीर्थस्थानों की यात्रा के लिए कर्गी नागक कर देना पड़ता था, जिसे अकबर ने 1563 ई. में समाप्त कर दिया।
  3. अकबर ने 1564 ई. में हिन्दुओं से वसूल किया जाने वाला जजिया कर समाप्त कर दिया। इससे हिन्दुओं को भी समान नागरिकता का अधिकार प्राप्त हुआ। जजिया कर समाप्त करने वाला अकबर पहला मुस्लिम शासक था।
  4. अकबर ने अपनी राजपूत रानियों को उनका धर्म मानने तथा उसका पालन करने की स्वीकृति दे दी। उसने समस्त प्रजा को धार्मिक स्वतंत्रता दे दी तथा मंदिरों के निर्माण पर लगी रोक हटा दी। मानसिंह ने वृंदावन तथा काशी में मंदिर बनवाये। एस.आर. शर्मा के अनुसार, "उस समय उज्जैन में कई मंदिर बने। ईसाइयों ने भी आगरा तथा लाहौर में गिरजाघर बनवाये।
इन उदार कदमों के बावजूद अकबर व्यक्तिगत धार्मिक जीवन में कट्टर रहा। उसने मुख्य सदर अब्दुन्नबी के परामर्श पर 1569 ई. में मिर्जा मुकीम एवं मीर याकूब खां को प्राणदण्ड दिया। 1572 ई. में उसने नगरकोट के विख्यात मंदिर महानदी को तथा बनारस के प्राचीन मंदिर को ध्वस्त किया। उसके द्वारा टोडरमल को वजीर बनाने पर कट्टर मुस्लिम धार्मिक लोगों ने इराकी कटु आलोचना की। एरा.एग. जफर के अनुसार, "1573 ई. तक अकबर कट्टर सुन्नी गुरालगाग रहा और इरलाग के नियमों का पालन दृढ़ता से करता रहा।"
बदायूंनी के अनुसार, 1575 ई. तक नमाज पढ़ता रहा, मुस्लिम धार्मिक नेताओं का सम्मान करता रहा, पीरों के मकबरों के दर्शन करता रहा, किन्तु इसके बाद अबुल फजल तथा फैजी के प्रभाव से उसकी कट्टरता समाप्त होने लगी।

इबादतखाने की स्थापना और महान् परिवर्तन (1575-1580 ई.)

इबादतखाने में वाद-विवाद
अकबर ने 1575 ई. में फतेहपुर सीकरी में एक इबादतखाना बनवाया, जिसमें प्रत्येक गुरुवार को धार्मिक विषयों पर शिया तथा सुन्नी विद्वानों में वाद-विवाद होता था। कभी-कभी तो इन दोनों में इस्लाम के सिद्धान्तों को लेकर गाली-गलौज तक हो जाती थी। उलेमाओं के इस व्यवहार से अकबर का उन पर से विश्वास उठ गया और उसे यह अनुभव हुआ कि केवल इस्लाम ही सच्चा धर्म नहीं है। अतः उसने 1579 ई. में हिन्दू, ईसाई, पारसी, जैन तथा सिख विद्वानों को भी धार्मिक चर्चा के लिए इबादतखाने में बुलवाया। इन विभिन्न धर्मों के विद्वानों के विचार सुनने से अकबर का दृष्टिकोण और व्यापक हो गया। उसने मुस्लिम धार्मिक वर्ग के कुप्रभाव को रोकने का निश्चय किया। अकबर ने विभिन्न धर्मों की अच्छी बातें अपनायीं। अकबर पर विभिन्न धर्मो का इस प्रकार प्रभाव पड़ा।
  • जैन धर्म का प्रभाव - अकबर ने हीर विजय सूरी, जिनचन्द्र सूरी, भानुचन्द्र शांतिचन्द्र आदि जैन संतों को इबादतखाने में वाद-विवाद के लिए आमंत्रित किया। उसने हीर विजय सूरी की विद्वत्ता से प्रभावित होकर उन्हें 'जगतगुरु' की उपाधि दी। उसने जैन धर्म से प्रभावित होकर शिकार खेलना एवं मांस भक्षण लगभग समाप्त कर दिया, गौवध निषेध कर दिया एवं वर्ष में 180 दिन पशु-पक्षियों के शिकार पर प्रतिबंध लगा दिया।
  • हिन्दू धर्म का प्रभाव - अकबर ने पुरुषोत्तम, दैवी आदि हिन्दू विद्वानों को इबादतखाने में आमंत्रित किया तथा वह इनके विचारों से बहुत प्रभावित हुआ। उसने कर्म एवं पुनर्जन्म का सिद्धान्त स्वीकार कर लिया। वह हिन्दुओं के समान प्रतिदिन झरोखा दर्शन देता था एवं जन्मदिन पर तुलादान करवाता था। वह सिर पर पगड़ी पहनता था तथा माथे पर तिलक लगाता था। वह दरबार में दीपावली, होली, रक्षाबंधन आदि त्यौहारों को धूमधाम से मनाता था। अपनी माता की मृत्यु होने पर उसने हिन्दुओं के समान मुंडन करवाया। उसने हिन्दुओं के परस्पर विवादों के निपटारे हेतु ब्राह्मण न्यायाधीश नियुक्त किये। उसने हिन्दुओं को भी उच्च पदों पर नियुक्त किया। उसने टोडरमल को वजीर तथा भगवानदास को पंजाब का सूबेदार बनाया। उसने मानसिंह को सात हजार का मनसब देकर काबुल का सूबेदार बनाया, जो साधारणत: शहजादों को ही दिया जाता था।
  • पारसी धर्म का प्रभाव - पारसी धर्मगुरु दस्तूरजी मेहरजी राणा से प्रभावित होकर अकबर ने सूर्य एवं अग्नि की पूजा करना तथा पारसी त्यौहार मनाना आरम्भ कर दिया।
  • ईसाई धर्म का प्रभाव - अकबर ने गोआ से ईसाई मिशनरियों को आमंत्रित किया। उनसे प्रभावित होकर अकबर ने उन्हें गिरजाघर बनाने, सार्वजनिक ढंग से पूजा-पाठ करने, अपने त्यौहार मनाने तथा भारत में ईसाई धर्म का प्रसार करने की अनुमति दे दी। वह स्वयं भी कभी-कभी गिरजाघर जाता था।

अकबर द्वारा खुतबा पढ़ना (22 जून, 1579 ई.)
अकबर ने उलेमाओं का प्रभाव कम करने के लिए पहले मुख्य इमाम का पद ग्रहण किया तथा तत्पश्चात् 22 जून, 1579 ई. को राजकवि फैजी द्वारा रचित खुतबा जामा मस्जिद में पढ़ा। इसकी अंतिम पंक्ति 'अल्लाह-हू-अकबर' से उलेमा घबरा गये और उन्होंने इसका अर्थ लगाया कि अकबर स्वयं पैगम्बर बनना चाहता है। बदायूंनी के अनुसार अकबर खुतबे की तीन पंक्तियां पढ़कर घबरा गया, किन्तु यह कथन असत्य है. क्योंकि निमाजद्दीन ने इसकी पुष्टि नहीं की है तथा अबुल फजल ने लिखा है, "अकबर ने खुतबा पढ़ने के बाद जामा मस्जिद में एकत्र लोगों को सम्बोधित किया।

मज़हर-पत्र की घोषणा (सितम्बर, 1579 ई.)
अकबर ने मुल्लाओं को कट्टरता छोड़कर इस्लाम के नियमों की नवीन व्याख्या प्रस्तुत करने हेतु समझाने का प्रयास किया, किन्तु असफल रहा। इसके बाद सितम्बर 1579 ई. में अकबर ने शेख मुबारक द्वारा तैयार 'मजहर' नामक पत्र की घोषणा कर दी, जिसके द्वारा अकबर इस्लाम का प्रधान नेता बन गया। अब इस्लामी नियमों की व्याख्या की सर्वोच्च शक्ति उसके हाथ में आ गई। अब्दुन्नबी, मखदूम-उल-मुल्क तथा अन्य मुल्लाओं ने इस पत्र पर हस्ताक्षर कर निम्न बातों की स्वीकृति दे दी-
  • जनता को ईश्वर, उसके पैगम्बर तथा मुगल सम्राट अकबर के आदेश का पालन करना चाहिए।
  • अकबर की आज्ञा की अवहेलना ईश्वर का विरोध है।
  • अकबर राबरो बड़ा तथा श्रेष्ठ धार्मिक नेता है।
  • अकबर को ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त है।
  • इस्लाम सम्बन्धी विवादों पर मुस्लिम धार्मिक नेताओं में मतभेद होने पर अकबर का निर्णय अंतिम तथा अनिवार्य माना जायेगा, किन्तु वह कुरान के अनुसार तथा राष्ट्रहित में हो।
आलोचना-मजहर घोषणा-पत्र से उलेमा निराश हो गये। यह अकबर का एक साहसिक कदम था। बदायूंनी के अनुसार, "इस पत्र के द्वारा धार्गिक झगड़ों को निपटाने की शक्ति अकबर के अधिकार में आ गई और किसी भी व्यक्ति के लिए उसके फरमान का विरोध करना संभव नहीं।' बदायूंनी के ही अनुसार, अकबर ने मुल्लाओं को इस पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए विवश किया था। कुछ आधुनिक इतिहासकार भी बदायूंनी के मत का समर्थ करते हैं। मैलसन के अनुसार, “इस पत्र की घोषणा ने सम्राट के जीवन तथा राज्य को एक नवीन दिशा प्रदान की।" मुल्लाओं के अनुचित प्रभाव से बादशाह मुक्त हो गया और उसे अपने सहनशील विचारों का प्रचार तथा प्रसार की खुली छूट मिल गई।' वी..ए. स्मिथ इस पत्र की तुलना इंग्लैण्ड की महारानी एलिजाबेथ के प्रसिद्ध ऐक्ट 'ऐक्ट ऑफ सुपरमेसी' के साथ करते हुए कहते हैं कि इस पत्र से अकबर धार्मिक नेता भी बन गया।
वस्तुतः इस पत्र से अकबर को असीम धार्मिक शक्ति नहीं मिली थी। यह इस पत्र की धाराओं से स्पष्ट होता है। उसे धार्मिक विवादों पर उलेमाओं द्वारा प्रस्तुत मतों में से किसी एक को स्वीकार करने का अधिकार था। उसे धार्मिक विषयों पर व्याख्या करने तथा कुरान के विरूद्ध आदेश जारी करने का अधिकार नहीं था। मुस्लिम उलेमा उससे इसलिए असंतुष्ट थे, क्योंकि उनका कुप्रभाव समाप्त हो गया था। बदायूंनी का यह कथन भी गलत है कि अकबर ने इस पत्र पर मुल्लाओं से जबर्दस्ती हस्ताक्षर करवाये थे।

दीन-ए-इलाही (1581 ई.)

इबादतखाने के वाद-विवादों से अकबर का दृष्टिकोण व्यापक हआ। अकबर देश में राष्ट्रीय एकता स्थापित करने के लिए एक साझा धर्म चलाना चाहता था। अतः उसने विभिन्न धर्मों के अच्छे-अच्छे सिद्धान्त लेकर 1581 ई. में दीन-ए-इलाही नामक नवीन मत की स्थापना की। डॉ. ईश्वरीप्रसाद के अनुसार, "दीन-ए-इलाही सर्वेश्वरवाद था, जिसमें सभी धर्मों की अच्छी-अच्छी बातें सम्मिलित थीं।" लेनपूल के अनुसार, "अकबर का यह मत दर्शन, रहस्यवाद और प्रकृति की उपासना का मिश्रण था।" डॉ. रायचौधरी इसकी तुलना सूफी मत से करते हैं। एस.आर. शर्मा ने इसे धर्म नहीं माना है, क्योंकि इसका कोई पैगम्बर, देवालय, पुरोहित वर्ग, पृथक धार्मिक ग्रंथ या धार्मिक सिद्धान्त नहीं थे। डॉ. शर्मा इसे कट्टर मुसलमानों का विरोध करने वाली एक सभा मानते हैं। निष्कर्ष के रूप में हम कह सकते हैं कि अकबर इस मत से हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करना चाहता था।

दीन-ए-इलाही के सिद्धान्त
दीन-ए-इलाही का राजकीय नाम 'तोहीदे इलाही' अथवा दैवी एकेश्वरवाद था। इसका कोई उपासनागृह या पुरोहित वर्ग नहीं था। आईन-ए-अकबरी की 77वीं धारा के अनुसार दीन-ए-इलाही के प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित थे-
  • इस मत के सदस्य ईश्वर को दिव्य शक्ति वाला मानते थे अथा अकबर को उसका इमाम मानते थे।
  • इस मत के सदस्य जहां तक संभव हो, मांस नहीं खाते थे तथा परोपकार की शपथ लेते थे। वे अपने जन्मदिन वाले महीने मांस नहीं खाते थे।
  • इस मत के सदस्य वृद्धाओं तथा कम उम्न की कन्याओं से विवाह नहीं कर सकते थे।
  • इसके सदस्य कसाई, चिड़ीमारों तथा शिकारियो से कोई सम्बन्ध नहीं रख सकते थे।
  • इस मत के अनुयायी 'अल्ला-हो-अकबर' तथा 'जलले जलाल हूँ' कह कर परस्पर अभिवादन करते थे।
  • इसके सदस्य अकबर को सिजदा (साष्टांग) करते थे तथा उसका जन्मदिन मिलकर मनाते थे।
  • वे अन्य धर्मावम्बियों के प्रति सहनशील होते थे।
  • इसके सदस्य सूर्य तथा अग्नि की पूजा करते थे।
  • इसके अनुयायी जीवनकाल में ही मृत्यु भोज देते थे तथा अपना जन्मदिन मनाते थे। इस अवसर पर वे भोज तथा दान देते थे।

सदस्य बनने की विधि
इस मत का सदस्य बनने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति रविवार के दिन दरबार में जाता था। वहां इस धर्म का मुख्य पुरोहित अबुल फजल सम्राट के समक्ष उसका परिचय देता था। तत्पश्चात् वह व्यक्ति पगड़ी अपने हाथ में रखकर अपना सिर सन्नाट के कदमों में रख देता था। सम्राट उसे उठाकर उसकी पगड़ी उसके सिर पर रख देता था और 'अल्ला-हू अकबर खुदा हुआ एक शिस्त देता था और इस तरह वह व्यक्ति दीन-ए-इलाही का अनुयायी बन जाता था। एम.आर. चौधरी के अनुसार, "शिस्त एक प्रकार की अंगूठी होती थी, जो हीरे-जवाहरात से जड़े एक सुन्दर वस्त्र में लपेटी हुई होती थी। दीन-ए-इलाही का सदस्य इसे अपनी पगड़ी के सिर पर पहनता था।"

अनुयायियों के चार पद
दीन-ए-इलाही के अनुयायियों को सम्राट के प्रति त्याग करने एवं भक्ति प्रदर्शित करने हेतु तैयार रहना पड़ता था। इसके सदस्य सम्राट के लिए धन-सम्पत्ति, मान-मर्यादा, जीवन, धर्म आदि का त्याग करने हेतु तैयार रहते थे। इनका बलिदान करने वालों को भक्ति के पद मिलते थे। संभवतः अकबर राजभक्तों की श्रेणी बनाना चाहता था। अबुल फजल इस धर्म का मुख्य पुरोहित था।

प्रसार
दीन-ए-इलाही का अधिक प्रसार न हो सका। हिन्दुओं ने इसे इस्लाम का नया रूप समझकर तथा मुसलमानों ने इसे अपने धर्म के विरूद्ध समझकर स्वीकार नहीं किया। अतः इसकी सदस्य संख्या सिर्फ कुछ हजार ही पहुंच पायी, जिसमें उच्च वर्ग के सिर्फ 18 व्यक्ति थे, जिसमें अबुल फजल, फैजी, शेख मुबारक, बीरबल आदि प्रमुख थे। अकबर ने इस धर्म के प्रसार के लिए प्रलोभन या शक्ति का सहारा नहीं लिया। उसने भगवानदास तथा मानसिंह द्वारा यह धर्म ग्रहण न करने पर उन को कोई दबाव नहीं डाला। अतः बदायूंनी का यह कथन सही नहीं माना जा सकता कि सभी दरबारी एक साथ दीन-ए-इलाही के अनुयायी बन गये थे। अकबर की मृत्यु के साथ यह धर्म भी समाप्त हो गया।

आलोचना
बदायूंनी के अनुसार अकबर ने दीन-ए-इलाही की स्थापना इस्लाम का दमन किया। उसके अनुसार
  1. उसने सामूहिक नजाज पढ़ने पर प्रतिबंध लगा दिया था।
  2. नमाज के समय रेशमी कपड़े तथा आभूषण पहनना अनिवार्य कर दिया।
  3. हज पर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया था।
किन्तु बदायनी के ये आरोप निराधार हैं। उसका दुसरा आरोप है उसके पहले आरोप का खंडन करता है। उसने 1575 ई. में अपनी गुआ बुलबदन बेगम को हज पर जाने की अनुमति दे दी। वस्तुतः कट्टर सुन्नी बदायूंनी ने अकबर की उदार धार्मिक नीति को इस्लाम के प्रति अन्याय समझा था। डॉ. वी.र. स्मिथ ने भी बदायूंनी का मत अपनाते हुए निम्न ता द्वारा दीन-ए-इलाही की आलोचना की है-
  • अकबर ने पैगम्बर बनने के लिए यह धर्म चलाया था।
  • अकबर चाहता था कि जनता उसकी पूजा करे। उसने अपने दर्शन करने को ईश्वर का स्मरण कहा।
  • व्यक्ति को सम्राट के कदमों में साष्टांग करना पड़ता था, सम्राट के प्रति भक्ति प्रदर्शित करनी पड़ती थी एवं उसके प्रति त्याग करने के लिए तैयार रहना पड़ता था।
स्मिथ के अनुसार, धन-दौलत से अकबर का सिर फिर गया था। अतः उसने पैगम्बर बनने के लिए वह धर्म चलाया, किन्तु उसे निराशा हाथ लगी। स्मिथ आगे लिखता है, "दीन-ए-इलाही सम्राट के मिथ्या अभिमान का परिणाम था और बुद्धिमत्ता का नहीं, अपितु उसकी मूर्खता का प्रमाण था।"
डॉ. ईश्वरीप्रसाद, एस.एम, जफर, एस.आर. शर्मा आदि इतिहासकार इन मतों का खंडन करते हुए कहते हैं कि इस मत को चलाने के पीछे अकबर का कोई धार्मिक उद्देश्य नहीं था और न ही वह अपनी पूजा करवाना चाहता था। यदि ऐसा होता तो, इस मत के प्रसार के लिए वह प्रलोभन तथा शक्ति का सहारा लेता तथा भगवानदास, मानसिंह तथा टोडरमल पर इसे स्वीकार करने के लिए दबाव डालता। वस्तुतः दीन-ए-इलाही मत के पीछे अकबर का राजनीतिक उद्देश्य था। वह इसके द्वारा हिन्दू मुस्लिम समन्वय स्थापित कर भारत में राष्ट्रीय एकता स्थापित करना चाहता था, अत: यह उसकी बुद्धिमत्ता का प्रमाण था। प्रो.एस.आर. शर्मा के शब्दों में, "दीन-ए-इलाही सम्राट के राष्ट्रीय आदर्श की उच्चकोटि की अभिव्यंजना थी।"

दीन-ए-इलाही की विफलता के कारण
दीन-ए-इलाही मत निम्न कारणों से विफल रहा-
  1. अकबर यह नहीं समझ सका कि धर्म कभी निर्मित नहीं किया जाता है। महावीर, गौतम बुद्ध, ईसा आदि ने धर्म निर्माण का प्रयास न करके जनता में अपने विचारों का प्रसार किया था तथा उनकी मृत्यु के बाद उनके अनुयायियों ने भिन्न-भिन्न सम्प्रदाय बनाये। अकबर ने पहले धर्म की स्थापना की तथा फिर उसके सदस्य बनाये, जबकि उसे चाहिए था कि वह पहले जनता को अपने विचारों से अवगत कराता। इस तरह उसने उल्टा मार्ग अपनाया।
  2. दीन-ए-इलाही में विशेष आकर्षण नहीं था। इस धर्म के अनुयायियों में अधिकांश ने इसे अकबर को प्रसन्न करने के लिए अथवा उसके भय से अपनाया। इसे दिल से स्वीकार करने वाले बहुत कम थे। अकबर की मृत्यु के साथ यह समाप्त हो गया।
  3. लारैन्स बिनयन के अनुसार, "दीन-ए-इलाही की उदारता तथा सरलता भी उसकी असफलता का कारण सिद्ध हुई। बदायूंनी जैसे कट्टर आलोचक द्वारा इस मत की घोर निन्दा करने पर किसी प्रकार का दण्ड नहीं दिया गया।"
  4. अकबर ने इसके प्रसार के विशेष प्रयत्न नहीं किये। अकबर ने इस धर्म के सिद्धान्तों से जनता को परिचित करवाने के लिए अधिकारी नियुक्त नहीं किये। इस मत के बहुत सारे अनुयायी अकबर के जीवन काल में ही मर गये और बहुतों ने इससे उसकी मृत्यु के साथ छोड़ दिया।
  5. जहांगीर ने इस मत में कोई रूचि नहीं ली, अतः यह लुप्त हो गया।

निष्कर्ष
अकबर ने उलेमाओं तथा मुल्लाओं के कुप्रभाव को समाप्त कर दिया तथा इस्लाम की श्रेष्ठता के दावे को समाप्त कर अन्य धर्मों को भी उसके बराबर माना। यह अकबर की सहिष्णुता का प्रतीक है, क्योंकि सल्तनतकाल में किसी भी व्यक्ति द्वारा अपने धर्म को इस्लाम धर्म के बराबर कहने पर उसे मृत्यु दण्ड दिया जाता था। अकबर ने सभी धर्मों का समान आदर किया। उसने इस मत द्वारा भारत में राष्ट्रीय एकता स्थापित करने का प्रयत्न किया। उसका यह प्रयास असफल होते हुए भी सराहनीय है।

अकबर की मृत्यु

ऊपर की घटनाओं से स्पष्ट है कि अकबर के अंतिम दिन अत्यन्त दुःखद व्यतीत हुए। उसे मानसिक शांति नहीं थी। अत: वह 3 अक्टूबर, 1605 ई. को बीमार पड़ा। उसे पेचिश तथा अतिसार की शिकायत हो गई। हकीम अली सम्राट का उपचार नहीं कर सका। उधर सलीम व खुसरो राज्य-प्राप्ति के लिए षडयंत्र रच रहे थे। इससे भी अकबर को हार्दिक वेदना हुई।
इन सबका परिणाम यह हुआ कि उसका रोग दिन पर दिन बढ़ता गया और हकीम उसका उपचार नहीं कर सका। 11 अक्टूबर को रात्रि को सम्राट की अवस्था और भी दयनीय हो गई और 25-26 अक्टूबर की रात्रि को वह इस लोक से बिदा हो गया। उसे सिकन्दरा में दफना दिया गया। इसकी बोली चार दिन तक बंद रही। इस कारण वह अपनी अंतिम इच्छा व्यक्त नहीं कर सका और साथ में यह भी नहीं बता सका कि उसे कहां दफनाया जावे। लेकिन आगरा से 6 मील दूर सिकन्दरा में उसने अपने जीवन काल में ही अपना मकबरा आरंभ कर दिया था।
वाल्टेयर ने उसकी उपमा कैथेराइन द्वितीय से करते हुए कहा कि वह अपने समकालीन सम्राटों व शासकों (एलिजाबेथ प्रथम इंग्लैण्ड), फ्रांस हेनरी, चतुर्थ, टर्की के महान सुलेमान व फारस के शाह अब्बास) में एक महान सम्राट था। शरीर से वह बलिष्ठ था। उसके कन्धे चौड़े, आवाज बुलन्द तथा हाजिर जवाब सम्राट था। वह वास्तव में सम्राट था और एकत्रित मनुष्यों में वह आसानी से एक सम्राट के रूप में पहचाना जा सकता था। प्रकृति से वह दयालु व नेक था। अवसर पड़ने पर दह निर्दयी भी बन जाता था।

राष्ट्रीय शासक के रूप में अकबर

अकबर ने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की, उसमें सुव्यवस्थित शासन अपनाया तथा जनकल्याणकारी नीतियों को अपनाया। उसने सभी जाति के व्यक्तियों को योग्यता के आधार पर उच्च पदों पर नियुक्त किया तथा संपूर्ण साम्राज्य में एक समान कानून, सिक्के तथा नाप-तोल की व्यवस्था की। उसने सभी व्यक्तियों को धार्मिक स्वतंत्रता दी तथा दीन-ए-इलाही द्वारा राष्ट्रीय एकता स्थापित करने का प्रयत्न किया। उसने हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति के समन्वय का प्रयास किया। डॉ. परमात्माशरण के शब्दों में, "अकबर का राज्य एक ऐसा राज्य था, जो एक संस्कृति, एक परम्परा और एक ही राष्ट्र के सिद्धान्त पर आधारित था और वह राज्य वास्तव में राष्ट्रीय राज्य था।"
यद्यपि राष्ट निर्माण के क्षेत्र में शेरशाह अकबर का अग्रगामी था, तथापि अकबर उससे भी महान था। अकबर द्वारा किये गये कार्यों (जजिया कर समाप्त करना, गोवध निषेध, हिन्दी साहित्य को संरक्षण, हिन्दू समाज में सुधार) को करने का साहस शेरशाह भी नहीं कर सका था। जवाहरलाल नेहरू के अनुसार, "अकबर भारतीय राष्ट्रवाद का पिता था।"

विशाल साम्राज्य का संस्थापक
अकबर एक सफल विजेता था। उसका मानना था, "एक सम्राट को विजय के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए, नहीं तो उसके पडोसी शासक उसके विरुद्ध शस्त्र उठा लेते हैं" अतः अकबर ने विशाल साम्राज्य स्थापित किया। उसने मालवा, गोंडवाना, मेवाड़, रणथम्भौर, कालिंजर, गुजरात, बंगाल, काबुल, कन्धार, कश्मीर, सिन्ध, बिलोचिस्तान, खानदेश, अहमदनगर, बरार आदि प्रदेशों पर विजय प्राप्त कर देश को राजनीतिक एकता के सूत्र में बांध दिया। के.एम. मुंशी के शब्दों में, "अकबर एक सफल विजेता था, जो यह भली प्रकार जानता था कि उसे एक शत्रु के साथ कब और कैसे निपटना है। वह जहां शत्रुओं के साथ क्रूर व्यवहार करता था, वहां उन्हें उदारतापूर्वक क्षमा भी कर देता था।"

कुशल शासन प्रबंध
अकबर एक जनकल्याणकारी शासक था। वह कुशल शासन-प्रबंधक था। उसने विशाल साम्राज्य में सुदृढ़ शासन-प्रबंध स्थापित किया, जो दो सदियों तक बना रहा। उसने केन्द्रीय तथा प्रांतीय शासन की वैज्ञानिक ढंग से स्थापना की। उसने भूमि कर–प्रबंध में अनेक सुधार किये, जिनमें दहसाला पद्धति मुख्य है। मनसबदारी व्यवस्था से कर्मचारियों की कुशलता बढ़ी एवं उनमें अनुशासन स्थापित हुआ। उसने जजिया कर समाप्त किया एवं कई दुर्गों का निर्माण करवायो अकबर ने निष्पक्ष न्याय तथा धार्मिक स्वतंत्रता की व्यवस्था की। वह कशल वित्त प्रबंधक था। उसने विभिन्न मदों के लिए व्यय की राशि निश्चित कर रखी थी। उसने फिजूलखर्ची तथा रिश्वतखोरी समाप्त करने का प्रयत्न किया। अतः उसका राज्य समृद्ध था।

समान नागरिकता
जजिया कर हिन्दुओं से लिया जाता था। इससे वे द्वितीय श्रेणी के नागरिक हो गये थे। अतः अकबर ने हिन्दुओं को समान नागरिकता प्रदान करने हेतु एवं हिन्दू-मुस्लिम भेदभाव मिटाने के लिए 1564 ई. में जजिया कर समाप्त कर दिया। अकबर ने हिन्दुओं से लिया जाने वाला तीर्थयात्रा कर भी समाप्त कर दिया। इससे हिन्दू मुगल साम्राज्य के हितैषी बन गये तथा राष्ट्रीय राज्य की स्थापना हुई।

धार्मिक स्वतंत्रता तथा सहिष्णुता
अकबर ने सभी व्यक्तियों को अपनी इच्छानुसार धर्म मानने तथा उसके पालन करने की छूट दे दी। उसने आदेश जारी किया कि जिन लोगों को बलपूर्वक मुसलमान बनाया गया है, वे अपने पहले वाले धर्म को ग्रहण कर सकते हैं। वह सभी धर्मों का सम्मान करता था। वह सभी धर्मों को समान मानता था।

सामाजिक समन्वय
अकबर ने राजपूत राजकुमारियों से विवाह कर सामाजिक समन्वय स्थापित करने का यत्न किया। उसने अपनी राजपत रानियों को हरम में मूर्तिपूजा व हवन करने की छूट दे दी। अतः राजपूत मुगल साम्राज्य के हितैषी बन गये तथा अब हिन्दू मुगलों को विदेशी न मानकर उनसे प्रेम करने लगे। अकबर ने झरोखा दर्शन, तुलादान आदि हिन्दू प्रथाएं अपना लीं। वह सिर पर पगड़ी पहनता था तथा माथे पर तिलक लगाता था। उसके दरबार में होली, दीपावली, रक्षाबंधन आदि त्यौहार धूमधाम से मनाये जाने लगे।

योग्यता के आधार पर नौकरी
अकबर से पहले हिन्दुओं को उच्च पदों पर नियुक्त नहीं किया जाता था, किन्तु अकबर ने उन्हें भी योग्यता के आधार पर उच्च पदों पर नियुक्त किया। उसने टोडरमल को वजीर एवं मानसिंह को काबुल का सूबेदार बना दिया तथा बीरबल, भगवानदास, रायसिंह आदि को भी उच्च पदों पर नियुक्त किया। इन्होंने साम्राज्य की महत्वपूर्ण सेवा की। इससे कर्मचारी वर्ग की कार्यकुशलता बढ़ी तथा राष्ट्र निर्माण को प्रोत्साहन मिला।

समान शासन-व्यवस्था
अकबर ने समस्त राज्य में एक राजभाषा, एक प्रकार के नियम, एक प्रकार के पदाधिकारी, एक प्रकार के नाप-तौल तथा एक प्रकार के कानून की व्यवस्था की। उसने राज्य में एक समान सिक्के प्रचलित किये। इससे उद्योग तथा व्यापार काफी उन्नत हो गये। उसने जाति, धर्म तथा वर्ग सम्बन्धी भेदभावों को मिटा दिया तथा समस्त जनता को समान सुविधाएं दी। इससे राष्ट्र-निर्माण को प्रोत्साहन मिला।

हिन्दू समाज में सुधार
अकबर ने हिन्दू समाज की निम्न कुरीतियों को दूर करने का प्रयत्न किया-
  • सती प्रथा पर प्रतिबंध उस समय हिन्दू समाज में सती–प्रथा का व्यापक प्रचलन था। अकबर ने आदेश दिया कि किसी भी स्त्री को बलपूर्वक सती न किया जाए। उसने शाही फरमान जारी किया कि उस हिन्दू कन्या को, जिसके पति की मृत्यु विवाह से पहले ही हो जाए, सती न किया जाए। यदि कोई हिन्दू नारी अपने पति के साथ सती होना चाहे, तो उसे रोका न जाए, परन्तु सती होने के लिए किसी विधवा को विवश नहीं किया जाना चाहिए।
  • विवाह के कुछ नियम अकबर ने विवाह के कुछ नियम बनाये। उसने निकट सम्बन्धियों में विवाह पर प्रतिबंध लगा दिया तथा बाल-विवाह निषेध कर दिया। विवाह के समय लड़के की आयु सोलह वर्ष तथा लड़की की चौदह वर्ष निश्चित की गयी। पिधपा विवाह को मान्यता दी गयी तथा युवक पुरुषों के पृद्ध स्त्रियों से विवाह पर प्रतिबंध लगा दिया गया। अकबर ने उन व्यक्तियों को दूसरा विवाह करने की आज्ञा दे दी जिनकी पहली पत्नी से बच्चा न था।
  • मद्यपान निषेध अकबर ने मद्यपान पर प्रतिबंध लगा दिया। अब मदिरा का प्रयोग वैद्य की सिफारिश पर सिर्फ दवा के रूप में किया जा सकता था। शाही महल के पास मदिरा को दुकान थी, जिसमें मदिरा लेने वाले व्यक्तियों को अपना नाम तथा पता दर्ज करवाना पड़ता था। यह रोक-टोक सिर्फ राजधानी में थी, साम्राज्य के अन्य भागों में नहीं।
  • वेश्याओं की स्थिति में सुधार-अकबर ने वेश्याओं का एक अलग मोहल्ला निश्चित कर दिया। उसने वेश्याओं की देख-रेख के लिये एक इन्स्पेक्टर तथा एक क्लर्क को नियुक्त किया। अकबर ने आदेश जारी किया कि कोई व्यक्ति सरकारी आदेश प्राप्त करके वेश्या से विवाह कर सकता है।
  • कन्या क्ध निषेध-उस समय साम्राज्य के कुछ भागों में कन्या-वध का प्रचलन था। अकबर ने नियम बनाकर कन्या वध करने वाले व्यक्ति के लिये कठोर दण्ड की व्यवस्था की।
  • भिखारियों के लिए मुफ्त भोजन अकबर ने खैरपुर नामक केन्द्र पर मुस्लिम भिखारियों के लिए, धर्मपुर नामक केन्द्र पर हिन्दू भिखारियों के लिए तथा योगीपुर नामक केन्द्र पर रोगियों के लिए मुफ्त भोजन की व्यवस्था की।

शैक्षिक सुधार
डॉ. पी. सरन के अनुसार, "साहित्य तथा शिक्षा को प्रोत्साहन देना अकबर अपनी सरकार का मुख्य उद्देश्य समझता था।" अकबर ने निम्न शैक्षिक सुधार किये
  • मदरसों की स्थापना उस समय हिन्दू विद्यार्थी मंदिरों में तथा मुस्लिम विद्यार्थी मस्जिदों में शिक्षा प्राप्त करते थे। अकबर ने इन मकतबों व पाठशालाओं को संरक्षण दिया। इसके अलावा उसने दिल्ली, आगरा तथा फतेहपुर सीकरी में नये मदरसों की स्थापना की। सियालकोट शिक्षा का विख्यात केन्द्र था। उसने सरकारी मदरसों में हिन्दू विद्यार्थियों को भी प्रवेश दिया। इससे हिन्दू तथा मुस्लिम विद्यार्थी साथ-साथ बैठकर समान विषयों का अध्ययन करने लगे, जिससे राष्ट्र निर्माण के कार्य को प्रोत्साहन मिला।
  • मुस्लिम विद्यार्थी तर्कशास्त्र, धर्मशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र आदि विषयों की एवं हिन्दू विद्यार्थी संस्कृत, व्याकरण, गणित ज्योतिष आदि विषयों की शिक्षा प्राप्त करते थे। अकबर ने इतिहास, सामाजिक विज्ञान आदि विषय भी पाठ्यक्रम में जोड़ दिये।
  • अनुवाद विभाग की स्थापना-अकबर ने फारसी तथा संस्कृत ग्रंथों के अनुवाद हेतु एक अनुवाद विभाग की स्थापना कर उसमें हिन्दू तथा मुस्लिम विद्वानों को नियुक्त किया। रामायण तथा महाभारत का फारसी में अनुवाद हुआ। इससे हिन्दू एवं मुस्लिम साहित्य का विकास हुआ एवं वे परस्पर निकट आये।
  • पुस्तकालयों की स्थापना-अकबर ने राजधानी में एक विशाल पुस्तकालय की स्थापना की, जिसमें अरबी, फारसी, संस्कृत तथा अन्य भाषाओं की हजारों पुस्तकें थीं। इन पुस्तकों का उचित वर्गीकरण किया गया था। फैजी के पुस्तकालय की 46 हजार पुस्तकें भी उसकी मृत्यु के बाद इस पुस्तकालय में रख दी गयी। अकबर ने गुजरात से भी बहुत-सी पुस्तकें प्राप्त की।

साहित्यिक विकास
अकबर के शासनकाल में फारसी, संस्कृत तथा हिन्दी साहित्य का आश्चर्यजनक विकास हआ। उसने अशिक्षित होते हुए भी विद्वानों को उदारतापूर्वक संरक्षण दिया। उसने फारसी को राजभाषा बनाया तथा संस्कृत ग्रंथों को फारसी में अनूदित करवाया। डॉ ईश्वरीप्रसाद के अनुसार, “अकबर का समय भारतीय मुस्लिम कला तथा साहित्य का स्वर्ण युग था।"
  • फारसी साहित्य की उन्नति- अकबर के समय में फारसी साहित्य का बहुत विकास हुआ। अबुल फजल ने 'अकबर-नामा' तथा 'आइने-अकबरी', फैजीने 'अकबरनामा', निजामुद्दीन ने तबकात-ए-अकबरी', बदायूंनी ने 'मुन्तखाब-उत-तवारीख' तथा हाजी मोहम्मद कन्ध्यारी ने 'तारीख-ए-अकबरशाही की रचना की। अकबर ने संस्कृत ग्रंथों के फारसी अनुवाद हेतु एक अनुवाद विभाग स्थापित किया। उसके समय में निम्न ग्रंथों का अनुवाद हुआ
नकीब खां, अब्दुल कादिर बदायूंनी तथा शेख सुल्तान ने रामायण एवं महाभारत का फारसी, अनुवाद किया एवं महाभारत का नाम 'रज्जनामा' (युद्धों की पुस्तक) रखा।
हाजी इब्राहीम सरहदी ने अथर्ववेद का, मुल्लाशाह मोहम्मद ने राजतरंगिणी का, अबुल फजल ने पंचतंत्र का तथा अब्दुर्रहीम खानखाना ने 'तुजुक-ए-बाबरी का फारसी में अनुवाद किया।
फैजी ने लीलावती का अनुवाद किया। उसने नल दमयन्ती (सूरदास द्वारा रचित) कथा का अनुवाद कर उसका नाम 'सहेली' रखा।
  • संस्कृत साहित्य का विकास- अकबर ने संस्कृत साहित्य को भी प्रोत्साहन दिया। उसने फारसी-संस्कृत शब्दकोश का संकलन करवाया। दरभंगा के महेश ठाकुर ने संस्कृत में अकबर का इतिहास लिखा। जैन विद्वान पद्म सुन्दर ने 'अकबरशाही शृंगार' नामक ग्रंथ लिखा।
  • हिन्दी साहित्य का विकास- अकबर का शासनकाल हिन्दी साहित्य का स्वर्ण युग था। तुलसीदास, सूरदास, बीरबल एवं अब्दुर्रहीम खानखाना आदि उस समय के प्रसिद्ध हिन्दी विद्वान थे। तुलसीदास हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ कवि थे। उन्होंने 25 ग्रंथों की रचना की। इसमें से 'रामचरितमानस सबसे विख्यात है। इसमें भगवान राम की कथा सात खंडों में है। विनयपत्रिका, गीतावली, दोहावली, कवितावली आदि उनके अन्य प्रसिद्ध ग्रंथ हैं। सूरदास ने 'सूरसागर' एवं 'नल दमयन्ती' नामक ग्रंथ लिखे। अब्दुर्रहीम खानखाना ने रहीम सतसई की रचना की, जो 700 दोहों का संकलन है। कृष्णभक्त रसखान ने 'प्रेमवाटिका तथा 'सुजान रसखान' नानक ग्रंथों में कृष्ण की लीलाओं का वर्णन किया। संभवतः अकबर स्वयं भी हिन्दी कवि था।

दीन-ए-इलाही द्वारा प्रयत्न
अकबर ने 1581 ई. में दीन-ए-इलाही धर्म चलाकर हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रयत्न किया। उसका यह प्रयत्न असफल होते हुए भी सराहनीय था।

कला में समन्वय
अकबर ने स्थापत्य कला, चित्रकला, संगीत कला आदि क्षेत्रों में भी समन्वय स्थापित करने का प्रयत्न किया।

निष्कर्ष
अकबर एक राष्ट्रीय शासक था, जिसने राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, शिक्षा, साहित्य तथा कला आदि क्षेत्रों में समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया। इससे हिन्दू तथा मुसलमान परस्पर निकट आये तथा राष्ट्रीय एकता स्थापित हुई। अतः इतिहासकार उसे राष्ट्रीय सम्राट मानते हैं। डॉ.ए.एल. श्रीवास्तव के अनुसार, "अकबर मध्यकालीन भारत का सबसे महान् सम्राट था और वास्तव में इस देश का सम्पूर्ण इतिहास के सर्वश्रेष्ठ शासकों में से एक था। वह वास्तव में हमारा राष्ट्रीय सम्राट था।"

अकबर का शासन प्रबंध

शासन-प्रबंध के सिद्धान्त
अकबर के शासन-प्रबंध के प्रमुख सिद्धान्त इस प्रकार थे-
  1. अकबर ने लौकिक शासन स्थापित करते हुए राजनीति को धर्म से अलग रखा। उसने उलेमाओं तथा मुल्लाओं को शासन में हस्तक्षेप नहीं करने दिया।
  2. अकबर ने धार्मिक सहिष्णुता तथा स्वतंत्रता की नीति को अपनाया। उसने सभी व्यक्तियों को धार्मिक मामलों में स्वतंत्रता दे दी। उसने अपने हरम में हिन्दू रानियों को भी मूर्ते पूजा तथा हवन करने की आज्ञा दे दी।
  3. अकबर ने सभी जाति के व्यक्तियों को योग्यतानुसार उच्च पदों पर नियुक्त किया।
  4. अकबर निरंकुश शासक था, किन्तु उसने जन-कल्याण को महत्व दिया, क्योंकि वह जानता था कि जनता के सुखी रहने पर ही शांति व व्यवस्था रह सकेगी तथा स्थायी मुगल साम्राज्य स्थापित हो सकेगा।
  5. अकबर ने सैनिक तथा प्रशासकीय विभाग के अधिकारियों को अलग-अलग नहीं रखा। उसने उच्च प्रशासकीय अधिकारियों जैसे भगवानदास, टोडरमल, मानसिंह आदि को सेनापति बनाकर युद्ध में भेजा। इस नीति से सैनिक तथा प्रशासकीय अधिकारी परस्पर एक दूसरे के विभाग में स्थानान्तरित हो सकते थे। वह रणक्षेत्र में दो सेनापतियों को भेजता था, जिससे विश्वासघात की संभावना बहुत कम रहती थी।
  6. अकबर के शासन-प्रबंध का एक सिद्धान्त यह था कि राजा तथा प्रजा में अत्यधिक प्रेम तथा सहानुभूति होनी चाहिए। उसने प्रजा को प्यार दिया तथा उससे प्यार पाया। उसने हिन्दू रिवाजों तथा वेशभूषा को भी अपनाया। उसने स्वयं को राष्ट्रीय शासक सिद्ध करने का प्रयत्न किया।
इन सिद्धान्तों पर चलते हुए अकबर ने सुदृढ़ शासन-प्रबंध की स्थापना की।

केन्द्रीय शासन

केन्द्रीय शासन में सम्राट तथा उसके मंत्री आते थे।
सम्राट शासन की समस्त शक्तियां सम्राट के हाथों में निहित होती थी। वह निरंकश होता था तथा अधिकारियों व मंत्रियों को नियुक्त एवं पदच्युत करता था। वह दैवी शक्ति सम्पन्न माना जाता था। वह प्रजा को प्रतिदिन झरोखे से दर्शन देता था। अकबर निरंकुश होते हुए भी जनकल्याणकारी प्रवृत्ति का था। वह प्रजा की भलाई के लिए सदैव विचारमग्न रहता था।
अकबर भी शेरशाह के समान यह मानता था कि राजपद-आराम की वस्तु नहीं है। राजा को शासन कार्य में पूर्ण रूचि लेनी चाहिए एवं साम्राज्य की हर घटेना के प्रति जागरूक रहना चाहिए। वह राजकार्य हेतु दिन में तीन बार महल से बाहर आता था तथा रात को भी पदाधिकारियों से विचार-विमर्श करता था। वह निश्चित समय में न्याय करने तथा पदोन्नति देने का कार्य करता था। अकबर प्रतिदिन अपने मंत्रियों तथा सचिवों के विभागों की रिपोर्ट देखता था। वह प्रातः काल से रात्रि तक राजकार्य में जुटा रहता था।

मंत्रिमण्डल लथा विभागीय व्यवस्था
राजकार्य में सम्राट की सहायता के लिए कई मंत्री होते थे, जिनके अधीन विभिन्न विभाग होते थे। ये सम्राट के प्रति उत्तरदायी होते थे। ये शासन कार्यों में सम्राट को परामर्श देते थे, किन्तु सम्राट उनके परामर्श को मानने के लिए बाध्य नहीं था। केन्द्रीय स्तर पर प्रमुख मंत्रियों की संख्या चार थी तथा अन्य कई निम्नस्तरीय मंत्री भी थे। ये महत्वपूर्ण मंत्री इस प्रकार थे

वकील अथवा प्रधानमंत्री
प्रधानमंत्री सबसे महत्वपूर्ण मंत्री होता था, जिसे वकील कहा जाता था। वह सभी विभागों तथा प्रांतीय सरकारों पर नियंत्रण रखता था। बैराम खां अकबर का पहला प्रधानमंत्री था। डॉ पी.एन, सरन के शब्दों में, "बैराम खां के अधीन इस पद की शक्ति वजीरे आजम की उस शक्ति से भी अधिक थी, जिसकी व्याख्या इस्लामी कानून में की गई है।" उसकी मृत्यु के बाद वकील के पद की शक्ति घटती गई। 1564 ई. में वित्त विभाग वकील से लेकर नये मंत्री 'दीवान' को दे दिया गया। वकील अन्य सब मंत्रियों से ऊचा था तथा महत्वपूर्ण विषयों पर सम्राट को परामर्श देता था।

दीवान
दीवान का पद भी काफी महत्वपूर्ण था। इसके पास वित्त-विभाग होता था। इसका कार्य राज्य की आय-व्यय का हिसाब रखना तथा राजकोष को समृद्ध बनाये रखना था। उसके कार्यालय में भूमिकर सम्बन्पी  विभिन्न पत्र आते थे। भुगतान–सम्बन्धी आदेश वही जारी करता था। इस पद पर योग्य व्यक्ति ही नियुक्त किये जाते थे। टोडरमल, शाहबुद्दीन आदि प्रसिद्ध दीवान थे। अकबर की भी इस विभाग में काफी रूचि थी।

मीरबख्शी
यह सैन्यमंत्री था, जिसका प्रधान कार्य सैनिकों की भर्ती एवं अनुशासित करना, सैनिक परीक्षाओं तथा युद्ध अभियानों की व्यवस्था करना, घोड़ों का निरीक्षण करना आदि था।

मुख्य सदर
यह धर्मार्थ-विभाग का अध्यक्ष होता था, जो सदरे-जहां अथवा सदरे कुल भी कहलाता था। यह पद उदार विचारों वाले व्यक्ति को दिया जाता था। इसका प्रमुख कार्य इस्लामी शिक्षा को प्रोत्साहित करना, मुस्लिम, विद्वानों व महात्माओं को आर्थिक अनुदान देना, शिक्षालयों को धर्मार्थ भूमि दिलवाना व उनका रिकार्ड रखना, इस्लामी कानूनों की व्याख्या करना व कर्मचारियों को उसके अनुसार चलाना, प्रांतीय सदरों पर नियंत्रण रखना, धार्मिक सलाह देना आदि था।

खान-ए-सामान
यह राजपरिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति करता था एवं शाही भू-दान का प्रबंधक होता था।

मुहतसिब
यह पदाधिकारियों के आचरण पर निगरानी रखता था तथा जनता का नैतिक स्तर ऊंचा उठाता था।

मीर आतिश
यह तोपखाना-विभाग का प्रमुख होता था।

काजी-उल-कुजात
यह सम्राट के बाद सबसे बड़ा न्यायाधीश होता था। यह न्याय का समुचित प्रबंध करता था व स्थानीय काजियों को नियुक्त करता था।

दरोगा-ए-डाक चौकी
इसका प्रमुख कार्य डाक भेजना तथा प्राप्त करना था। यह साम्राज्य के विभिन्न भागों की घटनाओं की सूचना रखता था।
इसके अतिरिक्त मीरे-अदल, मीरे-तौजक, मीरे–मंजिल आदि निम्न पदाधिकारी होते थे। टकसाल की समुचित व्यवस्था करने के लिए एक दरोगा होता था। विभिन्न कारखानों की देख-भाल हेतु अलग-अलग दरोगा होते थे।

मनसबदारी प्रथा

'मनसब' शब्द का अर्थ है पद अथवा दर्जा। इसी तरह मनसबदार का तात्पर्य है-पदों में क्रम स्थापित कर उसके अनुसार वेतन निश्चित करना। अकबर ने नागरिक एवं सैनिक विभागों में मनसबदार नियुक्त किये। केवल उच्च पदाधिकारी ही मनसबदार कहलाते थे। इन पदों पर योग्य तथा विश्वासपात्र व्यक्तियों को ही नियुक्त किया जाता था। मनसबदार संख्या में 33 थे। सबसे छोटे मनसबदार के पास 10 तथा सबसे बड़े मनसबदार के पास 12,000 तक सैनिक होते थे। 5,000 से ऊपर के मनसबों पर साधारणतः शहजादों को ही नियुक्त किया जाता था। मनसबदारों को ऊंचे वेतन दिये जाते थे।

प्रांतीय शासन

अकबर ने अपने साम्राज्य को अनेक प्रांतों में बांट रखा था। प्रांतीय शासन केन्द्रीय शासन के समान ही था। डॉ.एस. आर. शर्मा प्रांतीय प्रबंध को अकबर की देन मानते हैं, जबकि डॉ.पी. सरन सहमत नहीं हैं। अकबर का प्रांतीय शसन भी बड़ा सुसंगठित था। .

सूबेदार
प्रांतीय शासन का प्रमुख सूबेदार अथवा सिपहसालार होता था। वह सम्राट द्वारा नियुक्त तथा पदच्युतं किया जाता था तथा उसके प्रतिनिधि के रूप में ही शासन करता था। उनका कार्य सम्राट के आदेशों का पालन करना, प्रांत में शांति व व्यवस्था बनाये रखना, न्याय करना, कृषि, उद्योग व शिक्षा को प्रोत्साहन देना आदि था। उसे संधि-विग्रह करने तथा किसी को मृत्यु दण्ड देने का अधिकार नहीं था।

दीवान
दीवान प्रांतीय वित्तीय विभाग का प्रमुख अधिकारी होता था। उसे सम्राट केन्द्रीय दीवान के परामर्श से नियक्त करता था। दीवान का कार्य प्रांतीय आय–व्यय का हिसाब रखना, प्रांतीय कोष का प्रबंध करना, भूमि-कर निर्धारित कर उसकी वसली का प्रबंध करना, प्रांतीय विभागों की देख-भाल करना, दीवानी मुकदमों का फैसला करना, कृषि की उन्नति के प्रयास करना व कृषकों को ऋण देना आदि थे। प्रांतीय दीवान पर सूबेदार का नियंत्रण नहीं था। वस्तुतः वे दोनों एक-दूसरे पर नियंत्रण रखते थे, जिससे विद्रोह की संभावना कम हो जाती थी। दीवान का सीधा सम्पर्क केन्द्रीय दीवान के साथ होता था।

सदर एवं काजी
सदर अथवा सद्र केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त धार्मिक विभाग का प्रधान होता था, जिसका प्रमुख कार्य दीन-दुखियों, विद्वानों व निर्धनों को सहायता देना था। इस पद पर विद्वान तथा उच्च चरित्र वाले व्यक्ति ही नियुक्त किये जाते थे। ये सूबेदार अथवा दीवान के नेयंत्रण से मुक्त होते थे। काजी प्रांत का मुख्य न्यायाधीश होता था। वह फौजदारी मुकदमों का निर्णय करता था तथा अपने अधीन काजियों पर नियंत्रण रखता था।

बख्शी
इसे सम्राट मीरबख्शी की सिफारिश पर नियुक्त करता था। इसका प्रमुख कार्य सैनिकों की भर्ती करना, उनमें अनुशासन स्थापित करना, सैनिक अभियानों में भाग लेना तथा घोड़ों का निरीक्षण करना था। वह गुप्तचर विभाग के मुखिया के रूप में भी कभी-कभी काम करता था।

अन्य पदाधिकारी
अन्य प्रांतीय अधिकारियों में आमिल, वितिक्ची, पोतदार, कोतवाल, सूचनावाहक आदि प्रमुख थे। आमिल का कार्य मालगुजारी वसूल करना, वितिक्ची का कार्य लगान का हिसाब रखना, पोनदार का कार्य लगान वसूल करना तथा कोतवाल का कार्य नगरों में शांति व व्यवस्था बनाये रखना तथा अपराधों का पता लगाना था। सूचनावाहक सूचना ले जाते थे, जो चार भागों में विभक्त होते थे-वाक-ए-नवीस, सवानह-निगार, खफिया-नवीस एवं हरकारह। ये सूचनावाहक दरोगा के नियंत्रण में होते थे। करोड़ी, कानूनगों, अमीन आदि कर्मचारी लगान वसूल करते थे। करोड़ी लगान वसूल करके पोतदार के पास भेजताथा। अमीन लगान निश्चित करता था एवं कानूनगो भूमि के लगान का विवरण रखता था।

स्थानीय प्रशासन

स्थानीय प्रशासन भी बड़ा सुदृढ़ था। प्रांत कई सरकारों अथवा जिलों में विभक्त था। सरकार का प्रमुख हाकिम फौजदार कहलाता था, जिसका प्रमुख कार्य सम्राट के आदेशों को लागू करना, शांति व व्यवस्था बनाये रखना, छोटी सैनिक टुकड़ी रखना, पुलिस व्यवस्था करना एवं भूमि-कर वसूली में सहयोग करना आदि था।
दूसरा प्रमुख अधिकारी अमल-गुजार था, जिसका प्रमुख कार्य भूमि की पैमाइश करवाना, किसानों को सुविधाएं उपलब्ध करवाना, मुकदमों तथा पटवारियों के रजिस्टरों की जांच करना, कृषि की अवस्था में सुधार करना एवं पदाधिकारियों को कषि-अवस्था से सूचित करना आदि था। वितिक्ची नामक कर्मचारी लगान का रिकार्ड रखता था तथा लगान-वसूली में अमल गुजार की सहायता करता था। लगान से प्राप्त धन को एक खजानेदार सरकारी कोष में सुरक्षित रखता था।
परगना सरकार से छोटी प्रशासकीय इकाई थी। शिकदार परगने का मुख्य अधिकारी होता था, जिसका कार्य परगने में शांति व्यवस्था बनाये रखना, फौजदारी मुकदमों का निर्णय करना, चोरों को दंडित करना, उच्च अधिकारियों के आदेश लागू करना तथा भूमि कर वसूली में सहयोग देना था। आमिल का कार्य लगान वसूल करना तथा भूमि की पैमाइश करना था। वह दीवानी मुकदमों का निर्णय भी करता था। कानूनगों भूमि कर का रिकॉर्ड रखता था। फोतदार खजांची होता था। इसके अतिरिक्त कारकुन भी होता था।
परगना गांवों में विभक्त था। गांव शासन की सबसे छोटी इकाई थे। इसका प्रमुख अधिकारी मुदकद्दम लगान वसूली एवं शांति व व्यवस्था बनाये रखने में सहयोग करता था। पटवारी लगान एवं भूमि का विवरण रखता था। पंचायतें सफाई, शिक्षा एवं सिंचाई आदि का प्रबंध करती थी तथा छोटे-छोटे मुकदमों का निर्णय करती थी।

सैन्य-प्रबंध

अकबर ने अपने विशाल साम्राज्य की रक्षा हेतु एक सुसंगठित, शक्तिशाली, आदर्श एवं सुव्यवस्थित सेना की व्यवस्था की।
अकबर ने सैनिक अधिकारियों को नकद वेतन देने की व्यवस्था की।
अकबर ने घोड़े दागने की प्रथा पुन: प्रचलित की तथा प्रत्येक अधिकारी की सेना के अलग-अलग निशान तय
कर दिये।
अकबर के अधीन पांच सेनाएं थी-
  1. अधीन राजाओं की सेना यह सेना अकबर की अधीनता स्वीकार करने वाले राजाओं की थी, जिसका संगठन भी उन्हीं के द्वारा किया जाता था। इस सेना के लिए आर्थिक सहायता नहीं दी जाती थी। यह निश्चित था कि राजा आवश्यकता पड़ने पर सम्राट को कितने सैनिक सहायता देंगे।
  2. मनसबदारों की सेना-इस सेना पर अकबर को पूरा भरोसा था। सबसे छोटे मनसबदार के पास 10 एवं सबसे बड़े मनसबदार के पास 12 हजार तक सैनिक होते थे। 500 से 2500 सैनिक तक के मनसबदार अमीर एवं 2500 से अधिक सैनिक वाले अमीर आजम कहलाते थे। पांच हजार के ऊपर शाही व्यक्तियों को ही मनसबदार बनाया जाता था।
  3. दाखिली सेना-यह आंतरिक शांति एवं व्यवस्था बनाये रखती थी।
  4. अहदी सेना इस सेना में सम्राट के अत्यन्त विश्वसनीय सैनिक होते थे। इसमें प्रायः कुलीन वर्ग के लोग होते थे, जो ऊंचा वेतन प्राप्त करते थे। ये सीधे सम्राट के प्रति उत्तरदायी होते थे तथा उसके अंगरक्षक का कार्य भी करते थे।

अकबर की सेना छ: भागों में विभक्त थी
अश्वारोही सेना-यह सेना सबसे महत्वपूर्ण थी तथा समतल मैदानों में युद्ध के लिए बड़ी उपयोगी थी।
पैदल सेना यह ऊबड़-खाबड़ एवं पर्वतीय प्रदेशों में युद्ध के लिए उपयोगी थी। इसमें बन्दूकची तथा शमशेरबाज आते थे। 12000 बन्दुकची 'दरोगा तोपचियान' के नेतृत्व में बन्दूकों से युद्ध करते थे। शमशेरबाज तलवार, कटार, चाकू, कोड़े आदि से लड़ते थे।
हस्ति सेना-इस सेना में 5000 प्रशिक्षित हाथी थे, जो रणक्षेत्र में काफी उपयोगी होते थे। इसका प्रयोग सावधानी से करना पड़ता था, क्योंकि हाथी उल्टे भी पड़ सकते थे। इनका प्रयोग सामान ढोने के लिए भी किया जाता था।
तोपखाना-अकबर का तोपखाना बड़ा शक्तिशाली था। उसने ऐसी तोपें बनवायी, जो आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाई जा सकती थी।
नौसेना इस क्षेत्र में अकबर ने विशेष ध्यान नहीं दिया, फिर भी उसने नदियों के युद्ध हेतु विशालकाय नावें बनवाईं, जिनका बंगाल, बिहार एवं सिन्ध में प्रयोग होता था।
शाही खेमा अभियान के समय अकबर के साथ पंच से बीस मील लम्बा विशाल शाही खेमा चलता था। इसमें 1 लाख से 2 लाख तक व्यक्ति होते थे। इस शाही खेमें में वस्तुओं की आपूर्ति का उत्तम प्रबंध था।
इस प्रकार अकबर का सैन्य-प्रबंध बड़ा सुसंगठित एवं उत्तम था।

भू-प्रबंध एवं राजस्व

भू-प्रबंध तथा राजस्व व्यवस्था के क्षेत्र में भी अकबर ने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। उसके शासक बनते समय भूमि-प्रबंध में निम्न दोष थे-
  1. शेरशाह द्वारा स्थापित भूमि-प्रबंध अस्त-व्यस्त हो चुका था। अमीरों तथा अफसरों में विशाल प्रदेश बांट दिये गये। थे। राजकीय भूमि तथा जागीर की भूमि को निश्चित ढंग से पृथक् नहीं किया गया था।
  2. लगान केन्द्र सरकार द्वारा हर साल उपज एवं परगने में प्रचलित मूल्यों के आधार पर निश्चित किया जाता था। इस तरह प्रतिवर्ष सरकारी मांग की दर में परिवर्तन होता रहता था। यह अनिश्चियपूर्ण दशा थी। केन्द्र से दर निर्धारित न होने तक लगान वसूल नहीं हो पाता था।
  3. लगान वसली में बहत विलम्ब होता था और बहुत अधिक रकम बकाया हो जाती थी, जो सरकार तथा जनता दोनों के लिए नुकसानदेह था।
  4. उपज और मूल्य का हर साल पता लगाने में काफी खर्चा होता था।
  5. एकत्रित सूचनाओं का मूल्यांकन अविश्वसनीय होता था।
अकबर के सुधार- अकबर ने शासक बनने के बाद भू-प्रबंध तथा राजस्व व्यवस्था में सुधार करने का निश्चय किया। बैराम खां के समय तक इस क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई। दीवान ख्वाजा अब्दुल मजीद खां ने अनुमान द्वारा भूमि-कर निश्चित किया। 1570-71 ई. में मुजफ्फर खां तुरबती ने भूमि की माप करने के लिए सरकारी अधिकारियों को निर्देश दिये। इसके बाद टोडरमल ने भूमि की पैमाइश करवाकर उपज के अधार पर लगान निश्चित कर दिया। इस व्यवस्था को 1575-76 ई. में बंगाल तथा बिहार को छोड़कर संपूर्ण साम्राज्य में लागू किया गया। इसके अनुसार साम्राज्य को 182 परगनों में बांटकर प्रत्येक परगने में 'करोड़ी' नामक अधिकारी नियुक्त किया गया। प्रत्येक परगने की आय एक करोड़ दाम थी। करोड़ी का मुख्य कार्य राजस्व एकत्रित करना था।

इन सुधारों का विशेष लाभ नहीं हुआ। उसने कुछ ऐसे कार्य किये, जिसने इस क्षेत्र में अकबर का नाम अमर कर दिया-
उनसे भूमि की पैमाइश करवाई। 40 अंगुल का एक गज तथा 3600 वर्ग गज का एक बीघा निश्चित किया गया। नपाई के लिए बांस की जरीब प्रयोग में लाई गई। रिश्वत लेने वालों के लिए कठोर दंड की व्यवस्था की गई।
राजस्व निर्धारण करने हेतु भूमि को चार भागों में बांटा गया-
पोलज-यह सबसे उत्तम भूमि थी। इसमें वर्ष में दो बार फसलें काटी जाती थी व राज्य को प्रति वर्ष लगान मिलता था
परौती-यह द्वितीय श्रेणी की भूमि थी। इसे कुछ दिनों खाली छोड़ दिया जाता था, ताकि उर्वरा शक्ति पुनः प्राप्त कर सके।
चाचर या छच्छर यह तृतीय श्रेणी की भूमि थी तथा इसे तीन-चार वर्ष खाली रखा जाता था।
बंजर-यह सबसे घटिया भूमि थी और इसे पांच वर्ष से भी अधिक समय के लिए खाली छोड़ना पड़ता था।
आइने अकबरी से पता चलता है कि पोलज एवं परौती भूमि तीन भागों में विभक्त थी-उत्तम, मध्यम तथा निम्न। इन भागों की उपज के आधार पर लगान निश्चित किया जाता था, जो नकद एवं अनाज दोनों रूपों में दिया जा सकता था।
लगान वसूल करने की तीन व्यवस्थाएं थी-
  1. गल्ला बख्शी-इसमें फसल का कुछ भाग सरकार द्वारा ले लिया जाता था।
  2. नसक-यह व्यवस्था बंगाल में थी। इसमें खड़ी फसल के आधार पर लगान का अनुमान लगाकर फसल कटने पर उसे ले लिया जाता था।
  3. जब्ती-यह सबसे महत्वपूर्ण प्रणाली तथा अकबर व टोडरमल की विशेष देन थी। इसमें बोई गई फसल के आधार पर लगान का निश्चय किया जाता था, जो नकद लिया जाता था।
  4. अकबर का एक महत्वपूर्ण सुधार छह सालह या दस वर्षीय प्रबंध था। सूबों में समान उपज वाले परगनों को मिलाकर एक क्षेत्र बना दिया गया। इसका लगान उपज का 3/4 भाग नियत किया गया, किन्तु लगान चुकाने की दृष्टि से 1580 ई. के पहले दस वर्षों के मूल्य का औसत निकालकर नगद लगान निर्धारित किया गया।
इस व्यवस्था से किसान निश्चित लगान देने लगे। यह प्रबंध किसानों तथा अफसरों दोनों के लिए लाभदायक था। सरकारी अफसर इसे आसानी से लागू कर सकते थे और अब उन्हें उपज तथा मूल्य का पता नहीं लगाना पड़ता था या केन्द्र सरकार के आदेशों की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती थी। किसान को भी पता चल जाता था कि उसे कितना लगान देना है। इससे रिश्वतखोरी की संभावना कम हो गई। इसके अलावा किसानों को प्राकृतिक विपदा की स्थिति में लगान में कमी का आश्वासन दिया गया।

समीक्षा-आलोचकों के अनुसार
  1. भू-प्रबंध की उद्देश्य किसानों की सहायता न होकर किसानों व सरकारी कर्मचारियों की चालों से राजकीय आय को सुरक्षित करना था।
  2. भूमि-कर बहुत अधिक वसूल किया जाता था, जिससे किसान बड़ी कठिनता से जीवन निर्वाह करते थे।
आलोचकों का कथन अन्यायसंगत है। तत्कालीन स्रोत इस बात की पुष्टि करते हैं कि अकबर की भू-प्रबंध एवं राजस्व-प्रणाली के सुन्दर परिणाम निकले व किसान सुखी हो गये । इतिहासकार मोरलैण्ड के अनुसार, सोलहवीं सदी के अंत में किसान सुखी थे एवं खाद्य पदार्थ बड़े सस्ते थे। लगान दर निश्चित हो जाने एवं प्राकृतिक विपदा के समय लगान में छूट के सरकार के वायदे से किसान संतुष्ट हो गये। किसानों की भूमि के सम्बन्ध में पट्टा तथा कबूलियत नामक दो पत्रों की व्यवस्था की गयी, जिससे सरकारी कर्मचारी उन्हें खोखा नहीं दे सकते थे। तकाबी ऋण देने की व्यवस्था की गयी। भूमि की पैमाइश करने वालों को घूसखोरी से बचाने हेतु उनके वेतन बढ़ा दिये गये। सैनिकों को अभियान के दौरान फसलों को नुकसान न पहुंचाने का आदेश दिया गया। कर्मचारियों को किसानों के साथ सव्यवहार करने का आदेश दिया गया। घुसखोरों को कड़ा दंड दिया गया ।वस्तुतः इन सुधारों से किसानों तथा कृषि की स्थिति में बहुत सुधार हुआ।

न्याय-व्यवस्था

अकबर राज्य का सर्वोच्च न्यायाधीश था। उसने निष्पक्ष न्याय की व्यवस्था की। अकबर के बाद काजी-उल-कजात तथा उसके बाद अनेक काजी आते थे। प्रत्येक न्यायालय में काजी, मुफ्ती तथा मीर अदल तीन पदाधिकारी होते थे, जिनका कार्य क्रमशः मुदद्दमे की जांच करना, कानून की व्याख्या करना तथा निर्णय देना था। न्याय कुरान के नियमो के अनुसार दिया जाता था। हिन्द मुकदमो का निर्णय उनके रीति-रिवाजों के अनुसार किया जाता था। दण्ड विधान कठोर था। राजद्रोह तथा हत्या करने पर प्राणदण्ड, गंभीर अपराधों के लिए अंग-भंग तथा साधारण अपराधों के लिए जुर्माना तथा कठोर दंड दिये जाते थे।

सामाजिक सुधार एवं शैक्षिक सुधार
अकबर के सामाजिक सुधारों का विस्तृत वर्णन पिछले पृष्ठों में किया जा चुका है।

कला के क्षेत्र में उन्नति

अकबर के शासनकाल में कला के क्षेत्र में बहुत उन्नति हुई। उसने कला को बहुत प्रोत्साहन दिया। अकबर ने अनेक चित्रकारों को संरक्षण दिया। उसने राजधानी में प्रसिद्ध चित्रकार ख्वाजा अब्दुल समद की अध्यक्षता में एक चित्रकला विभाग स्थापित किया। कलाकारों को शाही कर्मचारी माना गया। सम्राट ने उन्हें पुरस्कृत कर प्रोत्साहित किया। अकबर के दरबार के प्रसिद्ध 17 चित्रकारों में 13 हिन्दू थे।
अकबर ने लेखन कला को भी प्रोत्साहित किया। उसके शासनकाल में प्रचलित लेखन कलाओं में नशतालीक नायक लेखन कला मुख्य थी। यह टेढ़ी पंक्तियों में लिखी होती थी।
अकबर संगीत प्रेमी भी था। अकबर के दरबार में 36 संगीतज्ञ थे, जिनमें तानसन, बाबा रामदास, बैजू बावरा तथा सूरदास प्रमुख थे।
अकबर की स्थापत्यकला में भी बहुत रूचि थी। उसके राज्यकाल में हिन्दू-मुस्लिम शैली का सम्मिश्रण हुआ तथा भवनों में लाल पत्थर का प्रयोग किया जाने लगा। उसने आगरा, लाहौर तथा इलाहाबाद के किले बनवाये। फतहपुर सीकरी में उसके द्वारा बनवाये गये भवन अपनी सुन्दर डिजाइनों तथा कोमल सौन्दर्य के लिये प्रसिद्ध हैं। शेख सलीम चिश्ती की समाधि, जो संगमरमर से बनी है, स्थापत्यकला का बेजोड़ नमूना है। अकबर ने नक्काशी पर विशेष ध्यान दिया।
इस प्रकार अकवर के शासनकाल में रागी क्षेत्रों में अभूतपूर्व विकारा हुआ।

अकबर का मूल्यांकन और सारांश

अकबर का व्यक्तित्व बड़ा आकर्षक था, जैसाकि मान्सरेट ने, जिसने 1580 ई. में 38 वर्षीय अकबर को देखा था, लिखा है कि, “शाही गौरव के अनुकूल बादशाह का कद और चेहरा ऐसा है कि पहली दृष्टि में ही उसे कोई पहचान लेगा कि वह शासक है।" उसकी आवाज बड़ी रोबीली थी, किन्तु भाषण के समय उसमें एक विशेष माधुर्य आ जाता था। वह स्वभाव से मानवीय, सज्जन और दयालु था। वह विदेशियों से विशेष सौजन्यता और स्नेह से बर्ताव करता था। वह दिन में केवल एक बार दोपहर में अच्छा भोजन लेखा था। वह केवल तीन घंटे सोता था और फिर निरन्तर व्यस्त रहता था। वह शिकार का अनन्य प्रेमी था तथा पशुओं की लड़ाइयों को वह बेशौक से देखता था। किन्तु आमोद-प्रमोद के समय भी उसका मस्तिष्क राजकाज के मसलों में लिप्त रहता था। वह अपने परिजनों के प्रति स्नेहशील था। मध्ययुगीन शासकों की भांति बहुपत्नीधारी होते हुए भी वह सभी को समान प्यार एवं समान आदर देता था। वह अपने माता-पिता का तो सम्मान करता ही था, साथ ही अपनी धाय तथा उनके पुत्रों के प्रति भी सदैव कृपालु रहा। वह एक स्नेही पिता भी था। सलीम के विद्रोह करने पर भी उसने उसे क्षमा कर अपना उत्तराधिकारी बनाया। मानव मात्र के प्रति उसके मन में सम्मान था। वह मनुष्य के प्राणों की कीमत समझता था और कहता था कि "प्राण लेने का अधिकार उसे होना चाहिये जो जीवन दे सकता है।" यद्यपि वह न लिख सकता था और न पढ़ सकता था, लेकिन विद्वानों के साथ चर्चा करके रसने इतना ज्ञान प्राप्त कर लिया था कि कोई नहीं जानता था कि वह अनपढ़ है। अपने राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये कूटनीति का भी सहारा लेता था। राजपूत नरेशों के साथ उसके सम्बन्ध उसकी कटनीति के ही परिणाम थे। एक सैनिक के रूप में अकबर कुशल बन्दुकची, तेज शमशीरबाज, निपुण धनुर्धर तथा दक्ष घुडसवार था। सेनापति के रूप में उसकी प्रतिभा असाधारण थी और इसी प्रतिभा के कारण उसे निरन्तर सफलताएं प्राप्त हुई थी। वह कहा करता था कि, "सम्राट को सदैव सामरिक सफलताओं के लिये तत्पर रहना चाहिये अन्यथा उसके पड़ौसी उसके विरूद्ध शस्त्र उठा लेंगे।" ईश्वर के प्रति उसकी गहरी आस्था थी। अबुल फजल ने लिखा है, "वह अपने जीवन का प्रत्येक पल आत्म निरीक्षण में या ईश्वर की आराधना में व्यतीत करता है।'' वह कहा करता था कि व्यक्ति की
श्रेष्ठता विवेक पर आधारित है। विवेक के महत्व और उसके प्रते आस्था ने ही उसे अन्धविश्वासों से मुक्त रखा, जो मध्यकाल में बहुत सामान्य था।
वह एक कशल प्रशासक था और प्रशासन की दैनिक समस्याओं में गहरी रूचि लेता था। अपनी व्यस्वताओं के म य वह प्रशासकीय मामलों के निराकरण के लिये समय निकाल लेता था। किसी महत्वपूर्ण बात को कार्यान्वित करने से पूर्व अपने दरबार के सदस्यों से परामर्श करता था, किन्तु निर्णय वह स्वयं लेता था। निर्धारित नियमों का पालन बड़ी कठोरता से करता था। अकबर एक न्यायी सम्राट के रूप में भी प्रसिद्ध है। उसके दण्ड सामान्यतः क्रूर नहीं होते थे, खासकर वह मृत्यु दण्ड देते समय बहुत सचेत रहता था। उसके शासन की उपलब्धियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि वह राजनीतिज्ञता में महारानी एलिजाबेथ, शासन प्रबंध में फ्रेडरिक, महान रणकौशल में नेपोलियन और धर्मपरायणता में अशोक के समकक्ष था। स्मिथ ने यह कहकर अकबर के साथ न्याय नहीं किया कि उसके सारे सुधारों का एक ही उद्देश्य था-शक्ति, यश तथा सम्पत्ति में वृद्धि। स्मिथ ने यह भी कहा है कि उसके प्रशासकीय सुधारों का जनसामान्य पर कोई वास्तविक प्रभाव नहीं पड़ा। स्मिथ का यह विश्लेषण द्वेषपूर्ण प्रतीत होता है। लेनपूल का यह कथन उचित है कि "अकबर भारत के शासकों में सर्वोत्तम शासक हुआ है वह साम्राज्य का सच्चा संस्थापक और व्यवस्थापक था। ... उसका समय मुगल साम्राज्य का स्वर्ण काल है।" उसने राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक एकता के लिये जो प्रयास किये, उससे वह एक राष्ट्रीय शासक प्रमाणित होता है। डॉ. बी.एल. श्रीवास्तव ने लिखा है, "अकबर मध्ययुगीन भारत का सबसे महान सम्राट था और वास्तव में इस देश के सम्पूर्ण इतिहास में सर्वश्रेष्ठ शासकों में था, वह वास्तव में हमारा राष्ट्रीय सम्राट था।" वस्तुतः वह एक भाग्यशाली शासक था। वह जो चाहता था, उसे उपलब्ध हो जाता था। एक विदेशी नस्ल और संस्कृति का होने पर भी उसने भारतीय जनता का हृदय जीतने में सफलता प्राप्त की। स्मिथ ने भी उसकी प्रशंसा करते हुए लिखा है, "वह मनुष्यों का जन्मजात सम्राट था और उसे इतिहास में ज्ञात शासकों में सर्वाधिक शक्तिशाली होने का अधिकार है। उसका यह दावा (स्मिथ का) उसकी असाधारण प्रतिभा, मौलिक विचारों और शानदार उपलब्धियों पर आधारित है।"

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