ध्वनि विज्ञान - ध्वनि विज्ञान की परिभाषा | dhwani vigyan

ध्वनि-विज्ञान (Phonetics)

ध्वनि अर्थात् मानवकृत आवाज़ का वैज्ञानिक अध्ययन ही ध्वनि-विज्ञान कहलाता है। इसे 'वर्ण-विज्ञान', 'ध्वनि-विचार' आदि अन्य नामों से भी विद्वानों ने पुकारा है। संस्कृत के प्राचीनतम ग्रन्थों में छह वेदांग माने गए हैं जिनमें एक है 'शिक्षा' यह महत्वपूर्ण वेदांग है जिसमें स्पष्ट रूप से मानवीय ध्वनियों का विस्तत विश्लेषण उपलब्ध होता है। इसी कारण शिक्षा वेदांग को विशेष महत्व दिया जाता है।
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किसी भी भाषा का सम्पूर्ण ढाँचा ध्वनियों के आधार पर खड़ा रहता है। इसी कारण ध्वनियों का भाषा में सर्वाधिक महत्त्व होता है। ध्वनियाँ ही किसी भाषा की नींव होती हैं और उनके द्वारा ही शब्दों और वाक्यों का निर्माण होता है। जहाँ शब्दों और वाक्यों का अध्ययन भाषा के तात्त्विक रूप की विवेचना करने के लिए महत्त्वपूर्ण है वहाँ ध्वनियों का वैज्ञानिक विशलेषण किये बिना वाक्य-विचार और शब्द-चर्चा असम्भव है। ध्वनियों का सामान्य अर्थ है दो वस्तुओं के टकराने से होने वाली आवाज परंतु भाषा-विज्ञान में इसे भिन्न अर्थ में प्रयोग किया जाता है। ध्वनियों का वैज्ञानिक अध्ययन करते समय हम 'ध्वनि' शब्द की भाषा वैज्ञानिक परिभाषा देते हैं तथा संध्वनि और ध्वनिग्राम में अन्तर, ध्वनियों की उत्पत्ति की प्रक्रिया, ध्वनि-यंत्र अथवा उच्चारण के अवयवों का परिचय, किसी भाषा विशेष में प्रयुक्त होने वाली ध्वनियों का परिचय तथा उनका वर्गीकरण आदि विषयों पर विचार करते हैं। इसके साथ ही ध्वनि-विकार की दिशाएँ तथा उनके कारण एवं कुछ विशेष महत्वपूर्ण ध्वनि-नियमों को भी इस वैज्ञानिक अध्ययन में सम्मिलित किया जाता है।

भाषा-विज्ञान और ध्वनि

भाषा-विज्ञान की दष्टि से 'ध्वनि' शब्द का एक विशेष अर्थ है। 'ध्वनि; इन मानवकृत ध्वनियों को कहा जाता है जिन्हें मानव अपने भाव या विचार प्रकट करने के लिए अपने उच्चारण अवयवों की सहायता से उत्पन्न करता है। इन ध्वनियों के लिखित रूप में कुछ लिपि चिन्ह अपनाए जाते हैं जिन्हें वर्ण कहा जाता है। इन्हीं वर्णों के संग्रह को वर्गमाला कहा जाता है। पशु-पक्षियों की ध्वनियों से मानवकृत ध्वनियाँ भिन्न होती है। भाषा वैज्ञानिक अध्ययन के क्षेत्र में पशु-पक्षियों की ध्वनियों को सम्मिलित नहीं किया जाता क्योंकि विद्वानों ने इन ध्वनियों को 'अव्यक्त वाक्' अर्थात् अस्पष्ट कहा है। मानव-ध्वनियाँ 'व्यक्त वाक् या स्पष्ट कहीं गई हैं। भाषा-विज्ञान केवल उन्हीं ध्वनियों का अध्ययन करता है जो मानव भावों और विचारों को प्रकट करने वाली भाषा के निर्माण में सहायक होती है।

ध्वनि और संध्वनि में अंतर

एक ध्वनि का बार-बार उच्चारण किये जाने पर भाषा विज्ञान के अनुसार प्रत्येक बार का उच्चारण अपने पूर्ववर्ती उच्चारण से भिन्न होगा। इस प्रकार किसी व्यक्ति द्वारा एक ध्वनि का एक बार का उच्चारण संध्वनि कहलाता है।

संध्वनि तथा ध्वनिग्राम
जब एक व्यक्ति किसी एक ध्वनि का कई बार उच्चारण करता है तो प्रत्येक बार का उच्चारण अपना अलग अस्तित्व रखता है, वह संध्वनि कहलाता है परन्तु अनेक संध्वनियाँ किसी एक ही ध्वनि का उच्चारण होने के कारण एक वर्ग या श्रेणी को अभिव्यक्त करती है। यह एक ध्वनि की अनेक संध्वनियों का वर्ग या समूह ध्वनि ग्राम कहलाता है। संध्वनि शब्द यदि किसी एक ध्वनि के उच्चारण की एक इकाई को सूचित करता है तो ध्वनि ग्राम शब्द में एक ध्वनि के उच्चरित अनेक बार के रूप सम्मिलित रहते हैं। अतः ध्वनिग्राम का अर्थ है एक ध्वनि के उच्चरित अनेक रूपों का समूह। भाषा-विज्ञान की यह मान्यता है कि एक व्यक्ति जब एक ध्वनि का दो बार उच्चारण करेगा तो वे दोनों उच्चारण भिन्न-भिन्न होंगे, यदि एक ही ध्वनि का दस बार उच्चारण किया जाएगा तो वह दस बार का उच्चारण प्रत्येक, एक-दूसरे से पथक और स्वतंत्र होगा। मान लो एक व्यक्ति 'त' का उच्चारण दस बार करता है तो एक बार का उच्चरित 'त' -संध्वनि' है और दस बार के उच्चारण से युक्त 'त' ध्वनि ग्राम कहा जाएगा।

अंग्रेजी में ध्वनि ग्राम को 'फोनीम' (Phoneme) तथा संध्वनि को -एलोफोन' (Allophone) कहते हैं। उदाहरण के रूप में एक ध्वनि 'प' के ध्वनिग्राम और संध्वनि को प्रस्तुत करते हैं

ध्वनिग्राम
प् के श्रव्य रूप

संध्वनि 
'प' के विभिन्न मिलते-जुलते उच्चरित रूप

पश्चिम के प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक 'ब्लॉक' और 'ट्रेगर' ने 'ध्वनिग्राम' को 'फोनीम' और -संध्वनि' को 'एलोफोन' नाम से ही व्याख्यायित किया है।

ध्वनि गुण का अर्थ

भाषा में प्रयोग होने वाली ध्वनियों में जो साधारण विशेषाताएँ देखने में आती हैं वे ही ध्वनिगुण कही जाती हैं। ध्वनि का उच्चारण करते समय उस पर डाला जाने वाला प्रभाव ही गुण कहा जाता है। यही गुण अर्थात् ध्वनि के उच्चारण में डाला जाने वाला प्रभाव ही एक ध्वनि को दूसरे ध्वनि से पथक् बनाता है। ध्वनि गुण के पाँच भेद हैं-
  • मात्रा
  • स्वराघात (सुर (स्वर) या संगीतमय स्वराघात)
  • बलाघात (बल या बलात्मक स्वराघात)
  • रूपात्मक स्वराघात
  • वत्ति।

मात्रा
जिसे मात्रा कहा जाता है उस ध्वनि गुण का अर्थ है काल । जिस ध्वनि के उच्चारण में जितना काल लगता है वह उसकी मात्रा कही जाती है। किसी ध्वनि के उच्चारण में लगने वाले काल को हम मात्रा के माप द्वारा नाप सकते हैं, उसे हस्व या दीर्घ कह सकते हैं और दीर्घ से ज्यादा समय लगे तो उसे प्लुत कहा जाता है।
अतः मात्राएँ तीन हो गई;
  1. हृस्व
  2. दीर्घ
  3. प्लुत

एक मात्राकाल में उच्चरित ध्वनि हस्व कही जाती है, जैसे- क, ख, ग आदि दो मात्रा काल में उच्चरित होने वाली ध्वनि को दीर्घ कहा जाता है, जैसे चा, ता, मा तीन मात्रा काल में उच्चरित ध्वनि प्लुत कही जाती है, जैसे ओइम् का ओ। हृस्व और दीर्घ के बीच 'हृस्वर्द्ध' तथा 'दीर्घार्द्ध' नाम से दो मात्राओं की चर्चा 'अष्टाध्यायी' ग्रन्थ रचयिता महावैयाकरण आचार्य पाणिनि ने की है। इन दोनों का उच्चारण बीच की अवस्था का है। भारत के ध्वनि विज्ञानी आधी मात्रा से परिचित थे।
मात्राओं का यह वर्गीकरण अत्यन्त रथूल है जिराका बोल चाल के व्यवहार में कम ही प्रयोग होता है। इरामें निम्नलिखित त्रुटियाँ हैं-
  1. एक मात्रा काल का कोई समय का मान निश्चित नहीं किया गया है।
  2. कुछ ऐसी ध्वनियाँ हैं जिनका उच्चारण दीर्घ नहीं होता पर उन्हें दीर्घ माना जाता है।
  3. एक ही ध्वनि स्थान भेद अर्थात् शब्द में अलग-अलग (आदि, मध्य और अन्त) स्थानों पर प्रयोग किए जाने पर मात्रा की दष्टि से बदल जाती है।
  4. एक भाषा की ध्वनि जब भाषा में प्रयोग की जाती है तो उसकी मात्रा में अन्तर हो जाता है।
  5. मात्रा भेद को हम (हृस्व, दीर्घ, प्लुत आदि को) ध्वनि का तुलनात्मक अथवा सापेक्ष गुण कह सकते हैं। प्रत्येक भाषा में ध्वनि गुण का अपना मौलिक और स्वतंत्र महत्त्व है। अतः निष्कर्ष रूप में हम पाते हैं कि मात्रा नामक ध्वनिगुण का व्यवहार अतीप्राचीन समय से भाषा में होता चला आ रहा है। मात्रा-भेद से अर्थ में भी परिवर्तन हो जाता है। हिन्दी भाषा में तो मात्रा ध्वनिगुण का विशेष प्रभाव है। हिन्दी में कुछ उदाहरण देकर इसे स्पष्ट किया जा सकता है, जैसे- छीलना, छिलना, कली, काली, बल, बाल मिल, मील।
इन उदाहरणों में हृस्व मात्रा को दीर्घ करने पर अर्थ बदल गया है। छीलना क्रिया है वर्तमानकालिक और छिलना क्रिया हो गई है भूतकालिक। कली किसी फूल का खिलने से पहले का रूप है और काली रंग सूचित करने वाला विशेषण है। बल का अर्थ है शक्ति और बाल का अर्थ है केश। मिल का अर्थ मिलने की क्रिया और मील का अर्थ दूरी विशेष।

स्वराघात
स्वराघात से हमारा अभिप्राय है स्वरयंत्र में स्थित स्वरतंत्रियों का कम्पन और इस कम्पन का आधार है स्वरतंत्रियों का कम या अधिक तनाव या फैलाव। इसीसे फेफड़ों में आती हई वायु में कम्पन कम या अधिक होता है और परिणामतः स्वर ऊँचा या नीचा हो जाता है।
इसी को आधार बना कर स्वराघात के तीन भेद हो जाते हैं-
  1. उदात्त अथवा उच्च या आरोही,
  2. अनुदात्त या निम्न (नीचा) अथवा अवरोही,
  3. स्वरित या सम (न उच्च न निम्न अर्थात् मध्यम)
वैदिक भाषा में स्वराघात से ही वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया जाता था। यदि कहीं स्वराघात में अन्तर आ जाता था तो कहीं-कहीं अर्थ एक दम विपरीत हो जाता था। उदाहरण के लिए इन्द्रशत्रुः वर्धस्व' पद का स्वराघात बदल जाने के कारण ही इन्द्र के बल का वर्द्धन हुआ और जो इन्द्र को मारने के लिए इस मंत्र द्वारा यज्ञ करवा रहा था, उस वत्रासुर का संहार हो गया। स्वराघात का प्रयोग करके बोली जाने वाली भाषाओं में संगीत का पुट आ जाता है, वक्ता भाषा बोलता हुआ नहीं, गाता हुआ प्रतीत होता है।
स्वराघात (सुर या लहज़ा या काकु) के प्रयोग से एक ही वाक्य द्वार प्रेम, घणा, आश्चर्य, प्रश्न आदि अनेक भावों को प्रकट किया जा सकता है। केवल काकु के प्रभाव से शब्द ही नहीं वाक्य तक के अर्थ बदल जाते हैं।

बलाघात
भाषा के उच्चारण में जिन ध्वनियों को बोलते समय फेफड़ों से कम वायु निकलती है वे निर्बल कहलाती है जैसे 'अ', 'क', तथा जिन ध्वनियों के उच्चारण में फेफड़ों से अधिक वायु निकलती है और बल भी अधिक लगता है वे सबल कहलाती हैं, जैसे - अभ्यास, अध्यक्ष आदि में 'भ्या', 'ध्य' आदि।
इस प्रकार फेफड़ों से निकलने वाली वायु के आधार पर ध्वनियाँ दो प्रकार की हुई– सबल और निर्बल।

समबल
जिन ध्वनियों का उच्चारण करते समय श्वासवायु मध्यम (न अधिक न कम) निकले वे समबल कहलाती हैं जैसे- 'निरंतर', 'विषयांतर' शब्दों में 'तर' का उच्चारण।

बलाघात का सम्बन्ध भाषा के उच्चरित रूप से है, लिखित रूप में उसका कुछ भी प्रयोग नहीं होता। रोमन लिपि में जहाँ कहीं बलाघात युक्त उच्चारण को स्पष्ट करना होता है वहाँ उस पर चिन्ह (') लगा दिया जाता है। यदि एक ही शब्द में समबल, निर्बल और सबल, सब प्रकार की ध्वनियाँ रहती हैं तो कालान्तर में इसका यह प्रभाव देखने में आता है कि निर्बल ध्वनियों का लोप हो जाता है जैसे-  'अभ्यन्तर' शब्द ने 'भ्य' पर बल रहा और 'अ' कोमल ध्वनि होने के कारण लुप्त हो गई। शब्द बन गया 'भीतर' ‘उपाध्याय' शब्द में 'ध्या' पर बल हो जाने के कारण शब्द में पहले कोमल ध्वनि का लोप हो कर ओझा बना फिर ओ का लोप होकर 'झा' रह गया।
किसी भी भाषा में बलाघात उसके उच्चारण से सम्बन्ध रखता है। इस प्रकार उच्चारण की शुद्धता के लिए भाषा का बलाघात जानना आवश्यक है, भाषा के बलाघात को जानना ही किसी भाषा के उच्चारण पर अधिकार होना माना जाता है।

उच्चारण के अवयव

मानव ध्वनियों को उच्चरित करने के लिए मुख में स्थित जिन अंगों की सहायता ली जाती है उन्हें ही उच्चारण अवयव या उच्चारण के अंग कहा जाता है। (1) फेफड़े, (2) श्वास नली, (3) स्वरयंत्र, (4) स्वरतंत्रियाँ, (5) गलबिल, (6) अभिकाकल, (7) मुख-नसिका- संधिस्थल, (8) नासिका विवर, (9) मुख विवर, (10) कौआ (काग), (11) ताल, (12) जिह्वा, , (13) दन्त, (14) ओष्ठ।

इन अवयवों का वर्णन इस प्रकार है

फेफड़ा
ये शरीर का वह अंग है जो निरंतर फैलने और सिकुड़ने की क्रिया के द्वारा नासिका विवर से वायु भीतर खींचते और बाहर फेंकते रहते हैं। यह श्वसन क्रिया कहलाती है। ध्वनि उत्पन्न करते समय फेफडों की श्वास क्रिया के सहयोग से ही जिह्वा,  आदि उचारण अवयव सक्रिय हो पाते हैं। श्वास के अभाव में कोई ध्वनि उत्पन्न नहीं हो सकती। पाणिनीय 'शिक्षा' में इसी वायु को 'मारुत' कहा गया है।

श्वास नलिका तथा कंठ पिटक
फेफड़ों से श्वास वायु को जो नलिकाएँ मुख तथा नासिका तक ले जाती हैं वे श्वास नलिकाएँ कहलाती हैं। इन श्वास नलिकाओं का अंतिम छोर कंठ पिटक कहा जाता है। इसे जन भाषा में टेंटुआ कहा जाता है। इसे स्वर-यंत्र भी कहते हैं क्योंकि इसमें सभी–स्वर नलिकाएँ रहती हैं। मौन अवस्था में तो श्वास नलिकाओं के द्वारा ले जाई गई वायु नासिका के मार्ग से चुपचाप निकल जाती है परन्तु मनुष्य के बोलने की स्थिति में यह वायु स्वर तंत्रियों से टकरा कर ध्वनि उत्पन्न करती हैं।

स्वरतंत्रियाँ
ध्वनि उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली ये स्वरतंत्रिकाएँ पतली खाल चमड़ी की नलियाँ ओठों के समन दो परदे-सी होती हैं। स्वरतंत्रियों के बीच में अवकाश या छिद्र को ही 'काकल' कहा जाता है। कुछ विद्वानों ने इसे कंठद्वार संज्ञा भी दी है।

गलबिल या ग्रसनिका
काकल के ऊपर तथा मुख विवर के पहले का भाग ही गल बिल कहलाता है। इसे ग्रसनिका भी कहते हैं। ध्वनि उत्पन्न करने में इसका भी महत्वपूर्ण स्थान है।

मुख-विवर
इसके भीतर कई उच्चारण अवयव आते हैं जैसे जिह्वा, ।

जिह्वा
यह बहुत ही कोमल उच्चारण अवयव है। अपने पतले ओर लचकीले गुण के कारण जिह्वा अनेक वर्गों के उच्चारण में अनेक रूप धारण कर लेती है जैसे अ, आ, ई, इ, उ, ऊ के उच्चारण करते समय । (2) यह मुख में दन्त, तालु, मूर्धा को स्पर्श करती हुई अंदर से बाहर आती हुई वायु को एक क्षण में रोक कर स्फोटक वर्गों को उत्पन्न कर सकती है। जिह्वा,  की सहायता से ही ध्वनियाँ, वर्णों-शब्दों और भाषा में परिणत होती है। बिना जिह्वा की सहायता के कोई कुछ भी भाषा बोलने में समर्थ नहीं हो सकता सभी स्पर्श व्यंजन क्, से 'म्', तक जिह्वा के स्पर्श से ही बोले जा सकते हैं।
यह जिह्वा मुख विवर से निकलने वाली वायु का मार्ग इतना संकरा कर देती है कि उसे, घर्षण करते हुए निकलना पड़े इससे स, ज घर्षण ध्वनियों का उच्चारण हो पाता है।
यह वायु को बिना किसी रुकावट या स्पर्श के निकलने देती है जिससे स्वरों का उच्चारण हो पाता है जैसे अ, आ आदि।

ओष्ठ
ध्वनियों के उच्चारण करते समय ओष्ठ भी जिह्वा,  की भाँति विभिन्न प्रकार का आकार धारण करते हैं। 'प'. 'ब' आदि ध्वनियों का स्पर्श द्वारा उच्चारण किया जाता है तथा 'च' 'छ' आदि के उच्चारण में वायु संघर्ष करती हुई निकलती है।

दन्त
दाँतों की सहायता से भी त, थ, र, ल आदि ध्वनियों का दन्त मूल, मध्य, पश्च आदि भागों के स्पर्श द्वारा उच्चारण होता है। हिन्दी, संस्कृत के 'वन' जैसे शब्दों के उच्चारण में दाँतों का ओष्ठों से स्पर्श होकर वायु घर्णण करती हुई बाहर निकलती है।

तालु
मुख विवर का ऊपरी भाग तालु कहलाता है। इसकी बनावट कोमल और कठोर होती हैं इसी को आधार बना कर इसके कोमल तालु और कठोर तालु दो भेद हैं। कठोर ताल के तीन भेद हैं- वर्ल्स, तालु और मूर्धा ।

कोमल तालु
यह तालु का कंठ की ओर का भाग है। अनुनासिक ध्वनियों के उच्चारण करते समय यह वायु को नाक में जाने से रोकता है। यह तेजी से हिल-डुल सकता है, यह इसकी विशेषता है।

नासिका
कुछ ध्वनियों का उच्चारण करते समय ओष्ठ बंद रहते हैं तब नासिका ही वायु को बाहर निकालती है। नासिक्य ध्वनियों का उच्चारण (अनुस्वार) नासिका से ही होता है।

मुख तथा नासका का संधि स्थल
उच्चारण अवयव की दष्टि से यह बड़ा महत्त्वपूर्ण है। अनुनासिक ध्वनियों के उच्चारण में इसकी भी सहायता लेते हैं। निष्कर्षतः फेफड़े, कण्ठपिटक, गलबिल (त्रिकोण आकार का स्वर यंत्र, मुख विवर, जिह्वा, , ओष्ठ, दन्त, वत्स, लघु, नासिका आदि सभी का वाक् यंत्र के अवयवों की दष्टि से महत्त्व है।

ध्वनियों का वर्गीकरण

ध्वनियों के वर्गीकरण करने से पूर्व यह जाने लेने की आवश्यकता है कि किसी भी भाषा विशेष में कुल ध्वनियाँ कितनी हैं? यद्यपि बोलचाल में किसी भी भाषा में जितनी ध्वनियाँ होती है उनका निश्चय कर पाना कठिन होता है फिर भी प्रत्येक भाषा में उसके लिखित रूप के अन्दर कुछ वर्गों को स्वीकार किया जाता है जो उसका 'ध्वनि-समूह' या 'वर्ण समूह' कहलता है।
कुछ भाषाओं के ध्वनि समूह उदाहरण के लिए नीचे दिये जा रहे हैं-

वैदिक ध्वनि-समूह

मूल स्वर
  • अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ऋ, ल, ए, ओ। = (11)

संयुक्त स्वर
  • अई (ऐ) अउ (औ) व्यंजन।

स्पर्श
  • क् ख् ग् घ् ङ् (कण्ठय)
  • च् छ् ज् झा (तालव्य)
  • ट् ठ् ड् (ल) ढ् (ल् ह) ण् (मूर्धन्य)
  • त् थ् द् ध् न् दन्त्य)
  • प् फ् ब् भ् म् (ओष्ठ्य ) = (27)
अन्तस्थ- य् (इँ) र् ल् व्   = (4)
अघोष संघर्षी - श् ष् स्   =(3)
घोष ऊष्म - ह्             =(1)
अघौष ऊष्म- (विसर्ग) = (जिह्वा, मूलीय) = (उपध्मानीय) = (3)
शुद्ध अनुस्वार = (1)
का = (52)

संस्कृत भाषा का ध्वनि समूह
स्वर
  • मूल स्वर - अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ  ल ए ओ = (11)
  • संयुक्त स्वर- अइ (से) अ उ (ओ)  = (2)

व्यंजन
स्पर्श
  • क् ख् ग् घ् ङ् (कण्ठ्य ) 5
  • च् छ् ज् झ् य्  (तालव्य) 5
  • ट् ठ् ड् ढ् ण  (मूर्धन्य) 5
  • त् थ् द् ध् न्  (दन्तव्य) 5
  • प् फ् ब् भ् म्  (ओष्ठ्य) 5
  • = 25
  • अन्तस्थ - य् (इँ) र ल व् (उँ) (4)
  • अघोष संघर्षी - श् ष् स् (3)
  • घोष ऊष्म - हे (1)
  • अघोष ऊष्म - : विसर्ग (जिह्वा, मूलीय)  (1)
  • शुद्ध अनुनासिक - (अनुस्वार) (1)
  • = 48

हिन्दी भाषा का ध्वनि समूह
  • मूल स्वर- अ आ इ ई उ ऊ ए ओ 8
  • ऐ (अइ) औ (अउ) 2

व्यंजन

स्पर्श
  • क् ख् ग् घ्
  • ट् ठ् ड् ढ्
  • त्, थ्, द्, ध्
  • प् फ् ब् भ् = 17

संघर्षी
ह ख् ग् श् स् ज् फ् व् = 8

स्पर्श संघर्षी
च् छ् व् झ =4

अनुनासिक
ङ (I) ण् न् न्ई म् म्ह =7

पार्श्विक
ल् (ल्ह्) =2

लुंठित
(ल्) (ल्ह्) =2

उत्क्षिप्त
ड् ढ़ =2

अन्तस्थ या अर्द्धस्वर
य् व् =54

वैदिक भाषा की ल् ल् ह् जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय ये चार ध्वनियाँ बाद की संस्कृत में नहीं है। हिन्दी के ध्वनि समूह में संस्कृत की अनेक ध्वनियों का लोप हो गया है तथा अनेक नई विदेशी ध्वनियों का आगम हो गया है।

ध्वनियों का वर्गीकरण और उसके आधार

ध्वनियों का वर्गीकरण तीन दष्टियों या आधारों पर किया जाता है, जैसे-
  1. श्रवणीयता की दष्टि से।
  2. स्थान की दष्टि से।
  3. प्रयत्न की दष्टि से।

श्रवणीयता की दृष्टि से
श्रवणीयता से हमारा अभिप्राय है ध्वनियों या वर्णों के सुने जाने की योग्यता या सामर्थ्य। प्रत्येक भाषा में कुछ ध्वनियाँ तो इतनी पुष्ट या स्पष्ट होती हैं जिन्हें श्रोता दूर से भी सुनने में समर्थ हो जाता है तथा कुछ ध्वनियाँ अपेक्षाकृत कम परिपुष्ट या कम स्पष्ट होती हैं जिन्हें श्रोता दूर से सुन नहीं पाता। इस प्रकार यह श्रवणीयता का आधार हुआ, इसमें ध्वनियों के तीन वर्ग बन जाते हैं, जैसे-
  1. स्वर,
  2. व्यंजन, तथा
  3. अन्तः स्थ।
महाभाष्यकार पतजलि के अनुसार स्वर स्वतंत्र हैं उनका उच्चारण स्वतंत्र रूप से किया जा सकता है, परन्तु व्यंजन स्वरों का अनुसरण करने वाले हैं अर्थात् स्वरों को सहायता से व्यंजनों का उच्चारण किया जा सकता है।
स्वरों के उच्चारण में वायु मुख विवर के भीतर किसी अवयव को स्पर्श किये बिना बाहर निकलती है। जब किसी ध्वनि के उच्चारण में श्वास वायु मुख विवर में क्षण भर रुक कर झटके से पुनः बाहर निकलती है तो यह ध्वनि स्फोट कहलाता है। स्फोट का अर्थ है फूटना या फटना।

स्वरों की विशेषता
  1. सभी स्वर सघोष होते हैं अर्थात् स्वरों के उच्चारण में स्वरतंत्रियों में व्यंजनों के उच्चारण की तुलना में अधिक कम्पन होता है।
  2. स्वरों के उच्चारण में जिह्वा,  को विभिन्न प्राकर की आकृतियाँ धारण करनी पड़ती है और मुख विवर को खुला या कम खुला क्र देती है 
  3. स्वरों के उच्चारण में जिह्वा,  और ओष्ठ का कहीं स्पर्श नहीं होता।
  4. स्वरों का उच्चारण काफी देर तक किया जा सकता है।
  5. स्वरों को काफी दूर तक सुना जा सकता है।
  6. स्वरों का उच्चारण किसी अन्य की सहायता के बिना स्वतंत्र रूप से किया जा सकता है।
  7. स्वराघात वहन करने की क्षमता व्यंजनों में नहीं होती केवल स्वरों में होती है।
  8. व्यंजनों में मिल कर स्वर अक्षर बनाते हैं। "ऑसिलोग्रॉफ” नामक ध्वनि यंत्र से परीक्षण करने पर स्वरों की इन सभी विशेषताओं का स्पष्ट रूप से पता चल सकता है।

व्यंजन
ध्वनि का दूसरा भेद है जो स्वर से भिन्न है, व्यंजन कहलाता है। व्यंजन उन ध्वनियों को कहते हैं जिनके उच्चारण करते समय स्वरयंत्र से बाहर निकलती हुई श्वास वायु मुख विवर में या मुख नासिका के संधि स्थल में कहीं न कहीं अवरूद्ध होकर या संघर्षित होकर मुख या नासिका से बाहर निकलती है। व्यंजनों के उच्चारण में जिह्वा,  आदि (करण) का तालु आदि (स्थानों) से स्पर्श होता है तथा स्फोट होता है। इसी कारण व्यंजन ध्वनियों को स्पर्श या स्फोट भी कहते हैं।

व्यजनों की कतिपय विशेषताएँ
  • स्वरों की सहायता के बिना व्यजनों का उच्चारण नहीं हो सकता। अतः वे स्वरों के अनुसरण करने वाले कहे जाते हैं।
  • व्यजनों के उच्चारण में श्वासवायु मुख विवर में अवरुद्ध अवश्य होती है अथवा संघर्ष करती हुई बाहर निकालती है।
  • व्यजनों का उच्चारण देर तक नहीं किया जा सकता।
  • स्वरों की तुलना में व्यंजन कम परिस्फुट (स्पष्ट) होते हैं जिससे उन्हें दूर से नहीं सुना जा सकता।
  • व्यंजन स्वराघात वहन करने में असमर्थ होते हैं।
  • व्यंजन स्वतंत्र रूप से अक्षर नहीं बना सकते।

अन्तस्थ
श्रवणीयता को आधार बनाकर किये गये ध्वनियों के वर्गीकरण में स्वर और व्यंजन के पश्चात् तीसरा वर्ग अन्तःस्थ कहलाता है। अन्तस्थ वे ध्वनियाँ होती हैं जो कम परिस्फुट स्वर के बाद अधिक परिस्फुट स्वर के आ जाने पर पहले वाले स्वर का उच्चारण जहाँ ह्रस्व हो जाता हो- जो स्वर बहुत हृस्व उच्चरित होते हैं, जैसे प, व, र।

अन्तःस्थ ध्वनियों की विशेषताएँ
अन्तःस्थ ध्वनियाँ स्वरों के समान दूर तक सुनाई नहीं देती, अतः स्वरों से भिन्न होती है। इनके उच्चारण में जिह्वा,  का स्थान पर पूर्ण स्पर्श नहीं कहा जा सकता। इनसे अक्षर भी नहीं बन पाते। न तो ये ध्वनियाँ पूरी तरह स्वर होती हैं और न ही व्यंजन। इनकी बीच की-सी स्थिति है। अतः स्वर और व्यंजन के बीच मध्यवर्ती ध्वनियाँ कही जा सकती हैं।

स्थान के आधार पर ध्वनियों का वर्गीकरण
श्वास नलिका से प्रवाहित होती हुई प्राण-वायु वाणी के यंत्र में जिस स्थान पर एकत्रित होकर ध्वनि बनती है काग्यंत्र का वह स्थान उस ध्वनि का स्थान कहलाता है।
हिन्दी और संस्कृत भाषा में प्रयोग होने वाली ध्वनियों की दष्टि से निम्नलिखित उच्चारण–अवयव ध्वनि उत्पन्न करने के स्थान कहे जाते हैं।
  • काकल (32),
  • जिह्वा, मूल
  • कण्ठ अथवा कोमल तालु
  • नासिका
  • कण्ठ तथा तालव्य
  • कण्ठोष्ठ्य
  • मूर्धा
  • (कठोर) तालु
  • वत्सर्य
  • दन्त,
  • दन्त तथ ओष्ठ,
  • दोनों ओष्ठ ।
इन स्थानों पर उत्पन्न होने के कारण ध्वनियों का इन्हीं के समान नाम पड़ जाता है। इन उच्चारण स्थानों के कारण ध्वनियाँ इस प्रकार कहलाती हैं-
  • काकल्य (उरस्य),
  • जिह्वामूलीय,
  • काण्ठ्य या कोमलतालव्य,
  • नासिक्य,
  • कण्ठ-तालव्य,
  • कण्ठोष्ठ्य,
  • मूर्धन्य,
  • तालव्य,
  • वत्सर्य
  • दन्त्य,
  • दन्तोष्ठ्य,
  • द्वयोष्ठ्य।
ऊपर लिखे गए ध्वनियों के उच्चारण स्थानों एवं उनमें उच्चरित होने वाली ध्वनियों का विवरण निम्नलिखित हैं-

काकल्य ध्वनियाँ
मानव के कण्ठ पिटक या स्वरयंत्र में दो लचकवाली स्वरतंत्रियाँ होती हैं। श्वास नलिका से प्रवाहित होने वाली वायु इन्हीं स्वरतंत्रियों के मध्य से होकर जब निकलती है तब सामान्य ध्वनि उत्पन्न होती है। इन्हीं स्वरतंत्रियों के मध्य में स्थित वायुमार्ग 'काकल' (Glottis) कहलाता है। 'काकाल' स्थान से उच्चरित होने वाली ध्वनियों को ही 'काकल्य' ध्वनियाँ कहते हैं। इसके उदाहरणस्वरूप है विसर्ग (:) तथा ह्। कुछ विद्वान् इनका उच्चारण स्थान उर मान कर इन्हें उरस्य कहते हैं।

जिह्वामूलीय
मानव मुख के भीतर जिस स्थान पर जीभ प्रारम्भ होती है वही जिह्वा, मूल कहलाता है। जब जिह्वा, मूल का वायु मार्ग रोकता हुआ अलिजिह (कौआ) ध्वनि उत्पन्न करता है तो वे ध्वनियाँ जिह्वा, मूलीय कहलाती हैं। उदाहरण के लिए
अरबी की कुछ ध्वनियाँ ले सकते हैं जो हिन्दी में स्वीकृत हो चुकी हैं, जैसे- क, ग, ज, ख आदि।
संरकृत में क् तथा ख् रो पूर्व अर्ध विरार्ग के रामान उच्चरित होने वाली ध्वनि को जिह्वा, मूलीय कहा जाता है। उरो इरा प्रकार लिखा जता है- क, ख।

कण्ठ्य ध्वनियाँ
इन्हें कोमल तालव्य भी कहा जाता है। प्राचीन शिक्षाकारों ने मानव मुख विवर में अलिजिह (कोआ) तथा मूर्धा के मध्य भाग को कंठ कहा है। आधुनिक भाषा शास्त्रियों ने इसे कोमल-तालु नाम दिया है। इस स्थान से उत्पन्न ध्वनियाँ कण्ठ्य कहलाती हैं। ये तीन प्रकार की होती हैं।
कंठ के साथ  जिह्वा पश्च के सहयोग से उत्पन्न, जैसे- क् ख् ग् घ् ।
कण्ठ के साथ अलिजिह (काग) तथा नासिका के सहयोग से उत्पन्न ध्वनियाँ, जैसे- अँ, आँ, ङ आदि सभी अनुनासिक स्वर।

नासिक्य
हमारी श्वास क्रिया का प्रमुख अंग नासिका ही है। नासिका से उत्पन्न ध्वनियाँ, नासिक्य कहलाती हैं। जब हमारे ओठ बंद हों और श्वास वायु नासिका से ही बाहर निकलती हो जैसे, अनुस्वार (-) नासिक-ध्वनि है।

कण्ठ तालव्य
तालु से अभिप्राय यहाँ कठोर तालु से है। कण्ठ और कठोर तालु से उत्पन्न ध्वनियाँ कण्ठ तालव्य कहलाती हैं। कठोर तालु के समीप जिह्वा,  जाने से इनमें कुछ विशेषता उत्पन्न हाती है। ए, ऐ आदि ऐसी ही ध्वनियाँ हैं।

कण्ठोष्ठ्य
कण्ठ तथा ओष्ठों के सहयोग से उत्पन्न होने वाली ध्वनियाँ कण्ठोष्ठ्य कहलाती हैं। जैसे ओ, औ आदि। इन ध्वनियों का उच्चारण करते समय ओंठ एक विशेष मुद्रा धारण कर लेते हैं और उत्पत्ति स्थान इनका कण्ठ है। अतः कण्ठोष्ठ्य ध्वनियों के उच्चारण में कण्ठ एवं ओष्ठों की समान भूमिका रहती है।

मूर्धन्य
मुख विवर में ऊपरी भाग में जो सबसे ऊँचा स्थान होता है उसे मूर्धा कहा जाता है जो ध्वनियाँ मूर्धा में जिह्वा,  के स्पर्श से उत्पन्न होती हैं वे मूर्धन्य कहलाती हैं, जैसे- ट ठ ड ढ ण ड़ आदि। डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार हिन्दीमें 'ट' वर्ग को मूर्धन्य माना तो जाता है परन्तु इसका उच्चारण अब मूर्धा से न होकर लगभग कठोर तालु से होता है।

तालव्य
जिन ध्वनियों का उच्चारण तालु से होता है वे तालव्य कहलाती है जैसे- इ ई च छ ज झ । य, श आदि ।

वत्सर्य
जिन ध्वनियों के उच्चारण में जिह्वा,  का स्पर्श मसूढ़ों से होता है वे वय॑ ध्वनियाँ कहलाती हैं। उदाहरणार्थ-न्, न्ह, ल्, ल्ह, र, हृ, स्, ज, आदि।

दन्त्य
दन्त का अर्थ है ऊपर के दाँत। अतः जिन ध्वनियों के उच्चारण में हमारी जिह्वा,  का अग्र भाग दाँतों के पिछले भाग को स्पर्श करता है, वे दन्त्य ध्वनियाँ कही जाती हैं, जैसे-त्, थ्, द्, ध्, न् तथा ल, ल्, स् । ये ध्वनियाँ हिन्दी तथा संस्कृत दोनों भाषाओं में दन्त्य ही मानी जाती हैं।

दन्तोष्ठ्य
दोनों ओष्ठों द्वारा मुख विविर को अवरुद्ध करके जो ध्वनियाँ निकलती हैं वे द्वयोष्ठ कहलाती हैं जैसे- प्, फ्, ब्, भ, आदि। उ, ऊ आदि । उ, ऊ, (स्वर) तथा उपध्मानीय (विसर्ग से पूर्व आधे विसर्गसदशध्वनि) भी इसी में गिनी जाती हैं।

प्रयत्न के आधार पर ध्वनियों का वर्गीकरण
ध्वनियों के उच्चारण करते समय जो-जो अवयव जो-जो क्रियाएँ करते हैं उन सबको प्रयत्न कहा जाता है। इसके अन्तर्गत उच्चारण– क्रियाओं में जीभ का उच्चारण अवयवों को स्पर्श करना या न करना, स्वर-तंत्रियों का मिलना या न मिलना श्वास वायु का वेग कम या अधिक होना, श्वास वायु का मुख या नासिका से निकलना आदि आते हैं। इस प्रयत्न के दो भेद हैं:
  1. आभ्यन्तर प्रयत्न
  2. बाह्य प्रयत्न

आभ्यन्तर प्रयत्न
मुख के भीतर ध्वनि-उच्चारण के लिए किया गया क्रिया-व्यापार आभ्यान्तर प्रयत्न कहलाता है। इसमें जीभ का ध्वनि स्थानों का स्पर्श करना, जिह्वा,  का विभिन्न आकार धारण करना, नसिका से ध्वनि उत्पन्न करना आदि आते हैं। स्वरों के उच्चारण में मुख-विवर में जिह्वा,  कहीं भी स्पर्श नहीं करती और मुख विवर खुला रहता है। अतः इन्हें विवत ध्वनियाँ कहा जाता है। व्यंजन ध्वनियों के उच्चारण में मुख के भीतर होने वाले प्रयत्न के आधार पर कई भेद होते हैं जैसे-
  • स्पर्श व्यंजन,
  • संघर्षी व्यंजन,
  • स्पर्श संघर्षी,
  • अनुनासिक,
  • पार्श्विक,
  • लुण्ठित,
  • उत्क्षिप्त,
  • अर्द्ध स्वर ।

बाह्य प्रयत्न
जो प्रयत्न मुख विवर से बाहर अर्थात् नसिका स्वर तंत्रियों या श्वास नलिका में होता है बाह्य प्रयत्न कहा जाता है। बाह्य प्रयत्न के आधार पर स्वर-ध्वनियों के
  • संवत,
  • अर्द्ध संवत,
  • अर्द्ध विवत तथा
  • विवत
ये चार भेद होते हैं। इसी प्राकर व्यंजनों के (1) अघोष (श्वास) तथा संघोष (नाद) ये दो भेद बाह्य प्रयत्न के आधार पर ही किये जाते हैं। श्वास सम्बन्धी बाह्य प्रयत्न के आधार पर व्यंजनों के दो भेद होते हैं- (1) सघोष तथा अघोष।

अभ्यन्तर प्रयत्न के आधार पर ध्वनि-भेदों का विवरण

स्पर्श
इन ध्वनियों में मुख के भीतर जिह्वा,  आदि दो उच्चारण अवयवों का स्पर्श होने से इन्हें स्पर्श संज्ञा प्रदान की जाती है। कोई दो उच्चारण अवयव मुख विवर के भीतर श्वास वायु को रोक कर ध्वनि उत्पन्न करते हैं और वायु जो अवरूद्ध थी, स्फोट से बाहर निकलती है इससे इन ध्वनियों को स्फोट भी कहा जाता है। हिन्दी में स्पर्श ध्वनियाँ हैं-
  • क् ख् ग् घ् (क वर्ग)
  • च् छ् ज् झ् (च वर्ग)
  • त् थ् द् ध् (त वर्ग)
  • ट् ठ् ड् ढ् (ट वर्ग)
  • प् फ् ब् भ् (प वर्ग)
संस्कृत में क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग तथा प वर्ग की सभी 25 ध्वनियाँ स्पर्श ध्वनियाँ कहलाती है।

संघर्षी
वे ध्वनियाँ जिनके उच्चारण में प्राणवायु बिना संघर्ष के नहीं निकल पाती संघर्षी ध्वनियाँ कहलाती हैं। इनके उच्चारण में न स्पर्श होता है न स्फोट। हिन्दी में स् ष् श् ह विसर्ग – (:), व् तथा विदेशी शब्दों में प्रयुक्त ख् ग् ज् फ् आदि ध्वनियाँ संघर्षी ही हैं। कुछ विद्वानों ने 'ष' को हिन्दी ध्वनियों में सम्मिलित नहीं किया है।

स्पर्श संघर्षी
जिन विनियों के वारण में स्पर्श तथा संघर्ष की प्रवत्ति पाई जाए वे स्पर्श – संघर्षी कहलाती हैं। हिन्दी में च् छ् ज् झ् 
( च वर्ग) अर्थात् ये चार ध्वनियाँ स्पर्श – संघर्षी हैं।

अनुनासिक
जिन ध्वनियों के उच्चारण करते समय श्वास वायु नासिका विवर के साथ-साथ मुख से भी निकले वे ध्वनियाँ-अनुनासिक कहलाती हैं। हिन्दी की ङ्, I, न्, म्, न्ह, तथा म्ह ध्वनियाँ अनुनासिक होती हैं। इसके साथ ही सभी स्वर भी अनुनासिक होते हैं।

पार्श्विक
जिन ध्वनियों के उच्चारण में श्वास वायु जिह्वा,  के दोनों पार्यों से होकर मुख विवर से बाहर निकलती है वे पार्श्विक कहलाती हैं। हिन्दी में 'ल' 'ल्ह' ध्वनियाँ पार्श्विक हैं।

लुण्ठित
जिन ध्वनियों के उच्चारण में जिह्वा,  बेलन की तरह गोल होकर जिह्वा, लोक से ऊपरी मसूढ़ों से कुछ ऊपर कठोर तालु की ओर स्पर्श करके या बार-बार जल्दी-जल्दी स्पर्श करती हुई वायु को निकलने देती है वे ध्वनियाँ लुण्ठित कहलाती हैं। हिन्दी में र्, रह, आदि ध्वनियाँ लुण्ठित कही जाती हैं।

उत्क्षिप्त
जिन ध्वनियों का उच्चारण करते समय जिह्वा,  की नोक शीघ्रता से उठ कर उच्चारण स्थान (तालु या मूर्धा) को स्पर्श करती है वे उत्क्षित ध्वनियाँ कहलाती हैं। उदाहरण के लिए हिन्दी की डु और द् ध्वनियाँ उत्क्षिप्त हैं।

अन्तःस्थ अथवा अर्द्धस्वर
अन्तःस्थ वे ध्वनियाँ हैं जिनकी गणना तो व्यंजनों में होती है परन्तु जिनका प्रयोग स्वरों के स्थान पर भी हो जाता है। इसी कारण इन्हें अर्द्धस्वर भी कहा जाता है। हिन्दी में य, व, ध्वनियाँ अर्द्धस्वर हैं।

बाह्यय प्रयत्न के आधार पर, ध्वनियों का वर्गीकरण
मुख से बाहर होने वाले प्रयत्नों के आधार पर किया गया ध्वनियों का वर्गीकरण स्वरतंत्री, सुर (काकल या वक्ष), नासिका और ओठों की स्थिति से सम्बन्ध रखता है। इसके तीन भेद हैं-
  1. स्वरतंत्री सम्बन्धी बाह्य प्रयत्न
  2. उर सम्बन्धी बाह्य प्रयत्न, तथा
  3. नासिका सम्बन्धी बाह्य प्रयत्न।
स्वरतंत्रीय बाह्य प्रयत्न के आधार पर हिन्दी और संस्कृत में दो प्रकार की ध्वनियाँ कही जाती हैं (क) अघोष या श्वास, (ख) सघोष अर्थात् घोष या नाद।

अघोष
जिन ध्वनियों के उच्चारण में स्वर रचना में स्थित स्तरतंत्रियाँ श्वासनलिका से आती हुई वायु को अवरुद्ध न करके अपेक्षाकृत शिथिल अवस्था में श्वास वायु मार्ग को खुला रहने देती हैं, वे अघोष ध्वनियाँ कहलाती हैं। हिन्दी या संस्कृत भाषा में क वर्ग से प वर्ग तक प्रत्येक वर्ग के प्रथम तथा द्वितीय वर्ग (क्, ख्, च्, छ, त्, थ्, ट्, ठ, प, फ्.) तथा संघर्षी वर्ण (श्, ष, स्) अघोष ध्वनियाँ हैं।

सघोष
जहाँ श्वासवायु स्वरतंत्रियों में अधिक कम्पन करती हुई, अघोष ध्वनियों की तुलना में स्वर तंत्रियों से टकरा कर बाहर निकलती है तो जो ध्वनियाँ ऐसी अवस्था में उच्चरित होती हैं वे सघोष ध्वनियाँ कही जाती हैं। हिन्दी और संस्कृत में प्रत्यक वर्ग का तीसरा, चौथा और पाँचवाँ वर्ग सघोष ध्वनि होता है। (ग, घ, ङ्, ज, झ्, ड्, द, ण, द्, ध्, न्, ब्, भ, म्.) तथा य, र, ल, व् के साथ-साथ सभी स्वर सघोष ध्वनियों के अन्तर्गत आते हैं।

औरस्य बाह्य प्रयत्न
उर का अर्थ है वक्ष । उर में ही श्वास वायु को कम या अधिक करने की क्षमता है। स्वरों, अर्द्धस्वरों या संघर्षी व्यंजनों का औरस्य बाह्य प्रयत्न से कोई सम्बन्ध नहीं। शेष व्यंजनों को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है- (1) अल्प प्राण तथा (ख) महाप्राण।

अल्पप्राण
वे ध्वनियाँ है जिनको उच्चारण में प्राणवायु का कम वेग रहता है, हिन्दी तथा संस्कृत भाषा की निम्नलिखित ध्वनियाँ अल्पप्राण हैं, यथा-
  1. क्, ग्, ङ्, ट्, ड्, ड्, ण,
  2. च, ज्, I, त्, द्, न्,
  3. प्, ब्, म्, र्,
अर्थात् (पाँचों वर्गों के प्रथम, ततीय तथा पंचम वर्ण एवं डू और र)।

महाप्राण
वे ध्वनियाँ महाप्राण ध्वनियाँ कहलाती हैं जिनके उच्चारण में प्राणवायु का वेग अधिक (महा) रहता है। इसमें
सभी वर्गों के दूसरे, चौथे वर्ण के साथ ह, विसर्ग (6) न्ह्, म्ह्, ल्ह्, तथा र्ह आदि ध्वनियाँ आती हैं। यथा-
  1. ख्, घ्, फ्, भ्,
  2. छ्, झ्, ह्, : (विसर्ग)
  3. ठ्, द्, न्ह्, म्ह्
  4. थ्, धू, ल्ह्, 

बाह्य प्रयत्न नासिक्य
प्राचीन भाषा शास्त्रियों ने नासिका को मुख से बाहर माना है। इसीलिए नासिका के सहयोग से उत्पन्न ध्वनियों को बाह्य प्रयत्न के अन्तर्गत माना गया है। नासिक्य प्रयत्न के आधार पर भी दो प्रकार की ध्वनियाँ हैं
जिन ध्वनियों के उच्चारण में श्वासवायु मुख के साथ-साथ नासिका से या केवल नासिका से बाहर निकलती है वे नित्य, अनुनासिक कही जाती हैं।
हिन्दी तथा संस्कृत की ङ्, I, ण्, न्, म् (प्रत्येक वर्ग का पाँचवाँ वर्ण) अनुनासिक ध्वनि है।
संस्कृत में यूँ, वू, ल् ध्वनियाँ अनुनासिक हैं।
अनुस्वार (-) एक ऐसी अनुनासिक ध्वनि है जिसका उच्चारण करते समय मुख ओठों द्वारा बंद रहता है तथा
पूरी श्वास वायु नासिका से ही बाहर निकलती है। इसी कारण यह भी नित्य अनुनासिक ध्वनि है।
इसके साथ संस्कृत के सभी स्वर अ, आ, इ, ई आदि जो संख्या में नौ (9) हैं व अनुनासिक भी माने जाते हैं और अननुनासिक भी। इस प्रकार ये नौ स्वर (अच्) 9x 2 = 18 माने जाते हैं।

अनुनासिक या निरनुनासिक
जिन ध्वनियों के उच्चारण में नासिका से कोई प्रयत्न न किया जाए, वे निरनुनासिक या
अनुनानसिक कही जाती है हिंदी तथा संस्कृत में ऊपर कही गई चार प्रकार की अनुनासिक ध्वनियों को छोडकर शेष 
(अर्थात् प्रत्येक वर्ग की पहली चार व्यंजन ध्वनियाँ) अनननुनासिक या निरनुनासिक हैं।

केवल स्वरों का वर्गीकरण
स्वरों का वर्गीकरण पाँच आधरों पर किया जात है
मात्रा के आधार पर स्वर तीन प्रकार के होते हैं- दीर्घ, हस्व और प्लता। मात्रा के उच्चाररण को ध्यान में रख कर ये
वर्ग बनाए गए हैं जैसे-
  1. मात्रा काल (हृस्व)
  2. मात्रा काल (दीर्घ)
  3. मात्रा काल (प्लुत)

मुख विवर के खुलने की स्थिति के आधार पर
मुख पूरा खुलता है या आधा इस आधार पर स्वरों के चार वर्ग बनाए गए हैं
  1. विक्त
  2. ईषत् विवत
  3. संक्त
  4. ईषत् संवत।
जिन स्वरों के उच्चारण में मुख पूरा खुल जाता है जैसे- आ (विवत) अ, ऍ, ओं (ईषद्विवत)
जिन स्वरों को उच्चारण में मुख विवर संकीर्ण रहता है वे संवत कहलाते हैं जैसे- ई, ऊ तथा जिन स्वरों के उच्चारण
में मुख ईषत् संकीर्ण रहता हो वे ईषद्संवत कहलाते हैं, जैसे- ए, ओ।

जिह्वा की दशा के आधार पर
स्वरों के उच्चारण करते समय जिह्वा,  का अग्र, पश्च और मध्य भाग ऊँचा या नीचा हो जाता है। इसी आधार पर स्वर भी-
  1. अग्र स्वर (इ, ई, ए)
  2. मध्य स्वर (अ) या (उ)
  3. पश्च स्वर (आ, उ, ऊ) कहलाते हैं।
कुछ स्वरों का उच्चारण करते समय जिह्वा,  का मध्य भाग कुछ नीचा हो जाता है। इस प्रकार स्वरों के उच्चारण करते समय जिह्वा,  की चारों स्थितियों को रेखाओं द्वारा इस प्रकार प्रकट किया जा सकता है-
  • जिह्वा,  की सामान्य स्थिति
  • जिह्वा, ग्र का ऊपर उठना
  • जिह्वा,  पश्च का ऊपर उठना
  • जिह्वा,  मध्य का नीचा होना
अतः हिन्दी की स्वर-ध्वनियों में 'इ', 'ई,, 'ए' अग्रस्वर, 'आ', 'उ', 'ऊ', पश्च स्वर तथा 'अ', मध्य स्वर कहलाता है।

ओष्ठों की स्थिति के आधार पर
स्वरों का उच्चारण करते समय दोनों ओष्ठों की भिन्न-भिन्न स्थितियों के आधार पर भी स्वरों का वर्गीकरण किया जा सकता है। ओष्ठों की स्थिति वत्ताकार, अवत्ताकार तथा सामान्य तीन प्रकार की होती है। स्वरों में 'उ' वत्ताकार स्वर है। 'आ' तथा 'एँ' अवत्ताकार स्वर हैं। 'ई', 'ए', 'ऐ' स्वर न वत्ताकार स्वर हैं और न ही अवत्ताकार। अतः इनके उच्चारण में ओष्ठों की स्थिति सामान्य रहती है।

अनुनासिकता के आधार पर
'अ', 'आ', आदि स्वर सामान्य अवस्था में अनुनासिक हैं परन्तु इन पर चन्द्र बिन्दु (अनुनासिकता का चिन्ह अर्थात् लगा देने पर ये 'अँ', 'आँ') आदि स्वर अनुनासिक कहे जाएँगे।

मान स्वर
मूलस्वर या आधार स्वरों को ही मानस्वर कहा जाता है। इनकी संख्या 8 (आठ) है। काल्पनिक होने के कारण इन्हें किसी भाषा विशेष से सम्बद्ध करके नहीं देखना चाहिए। इन मानस्वरों की उच्चारण स्थिति को प्रदर्शित करने के लिए एक अंग्रेज भाषा वैज्ञानिक प्रोफेसर डैनियल जोन्स ने एक स्वर चतुर्भुज’ बनाया था सिजका आजकल काफी प्रचलन है।

ध्वनि विशेष के वर्गीकरण का ढंग
किसी भी विशेष ध्वनि का वर्गीकरण करने से पहले चार प्रश्नों का समाधान करना आवश्यक है।
  1. ध्वनि का स्वरूप क्या है, वह स्वर है, व्यंजन है अथवा अन्तःस्थ है?
  2. उसका उच्चारण स्थान कौन सा है?
  3. उस ध्वनि का आभ्यन्तर प्रयत्न क्या है?
  4. उस ध्वनि का बाह्य प्रयत्न क्या है?
उपर्युक्त चारों प्रश्नों का उत्तर देने के पश्चात् किसी भी ध्वनि का वर्गीकरण सहज ही किया जा सकता है।

संस्कृत ध्वनि समूह: विशिष्ट अध्ययन
संस्कृत भाषा के महान् वैयाकरण पाणिनि ने 14 मोहश्वर सूत्रों में संस्कृत ध्वनि समूह को इस प्रकर प्रस्तुत किया है:
  1. अइउण्
  2. ऋल।
  3. एओड्।
  4. एओच्।
  5. हयवरट्।
  6. लण्।
  7. मङणनम्।
  8. झभा ।
  9. घढधष् ।
  10. जबगडदश्।
  11. खफछठथचटतम्।
  12. कपय्।
  13. शषसर्।
  14. हल्
(नोटः- इन सूत्रों के अन्तिम वर्ण ण, क आदि की गणना नहीं होती और 'ह' से लेकर 'हल' के 'ह' तक सभी वर्गों में 'अ' स्वर केवल उच्चारण की सुविधा के लिए जुड़ा हुआ है।)

पाणिनिकृत ध्वनियों का यह वर्गीकरण अत्यन्त वैज्ञानिक है। इसमें तथ्यगत गुण निम्नलिखित हैं
सूत्र 1-4 तक सभी स्वरों का 5-6 तक अन्तस्थों का 7-14 तक सभी व्यंजनों का विधिवत परिगणन किया गया है।
फिर क्रमपूर्वक स्वरों में भी पहले सूत्र 1-3 तक मूलस्वरों या सामानाक्षरों का तथा सूत्र 4 में संध्यक्षरों की गणना की गई है।
सूत्र 5-6 में ह को छोड़ कर सभी अन्तःस्थ हैं, जो स्वरों के बाद तथा व्यंजनों से पहले रखे गए हैं।
इसके पश्चात् सूत्र 7-14 तक सभी व्यंजन हैं तथा उन्हें एक विशेष क्रम पूर्वक गिनाया गया है।

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