समाज क्या है - अर्थ एवं परिभाषा, विशेषताएँ | samaj kya hai

समाज

समाज, समाजशास्त्र में केन्द्रीय महत्त्व का शब्द है। इसे समझे बिना समाजशास्त्र को समझना कठिन है। समाजशास्त्र, समाज का विज्ञान है। अतः समाज, समाजशास्त्र की सबसे महत्त्वपूर्ण अवधारणा है। यद्यपि हममें से सभी इस शब्द से परिचित है परन्तु इसके जिस अर्थ से हम परिचित हैं वह अर्थ समाजशास्त्रीय अर्थ से भिन्न है।
सामान्य बोलचाल की भाषा में हम समाज शब्द का प्रयोग सभी प्रकार के मानव समूहों के लिए करते हैं।
उदाहरण स्वरूप यदि किसी कक्षा के विद्यार्थियों से पूछा जाए कि वे किस समाज के सदस्य हैं, तो प्राप्त होने वाले कुछ उत्तर निम्नानुसार होंगे-
  1. “मैं हिन्दू (या मुस्लिम या ईसाई) समाज का सदस्य हूँ।" (यहाँ समाज से अभिप्राय सम्प्रदाय से है।)
  2. “मैं ब्राह्मण (या क्षत्रिय या वैश्य या हरिजन) समाज का सदस्य हूँ।" (यहाँ समाज से अभिप्राय वर्ण से है।)
  3. “मैं विद्यार्थी (या व्यापारी) समाज का सदस्य हूँ।" (समाज यहाँ पर वर्ग बोधक है।)
  4. "मैं भारतीय समाज का सदस्य हूँ।" (समाज से यहाँ तात्पर्य राष्ट्रीयता से है।)
  5. "मैं मराठी (या बंगाली या गुजराती) समाज का सदस्य हूँ।" (समाज को यहाँ पर विशेष प्रकार की भाषा का प्रयोग करने वाले मनुष्यों के समूह के रूप में व्यक्त किया गया है।)
  6. “मैं विदर्भ (या राजस्थानी या पंजाबी या दक्षिण भारतीय या उत्तर भारतीय) समाज का सदस्य हूँ।" (यहाँ समाज शब्द का प्रयोग, एक क्षेत्र या प्रदेश विशेष से मूलतः आए हुए मनुष्यों के समूह के लिये किया गया है।)

समाज का अर्थ एवं परिभाषा

उपरोक्त उदाहरणों से यह स्वतः ही प्रतिपादित होता है कि साधारण बोलचाल की भाषा में समाज शब्द का प्रयोग, भिन्न-भिन्न प्रकार के समूहों को प्रकट करने के लिए किया जाता है। समाजशास्त्र, समाज का विज्ञान है।
अतः यदि हम समाज के उपरोक्त अर्थों को यहां प्रतिस्थापित कर दें, तब समाजशास्त्र किसका विज्ञान होगा? समाज विषयक अनिश्चितता और भ्रांति को दूर करने के लिए ही समाजशास्त्री, समाज को मनुष्यों का समूह नहीं मानते हैं। समाज को परिभाषित करने के लिए समाजशास्त्रियों ने उस भावना या तथ्य को आधार माना है, जिसके कारण समूह के सदस्य स्वयं को एक समाज का होना निरूपित करते हैं। इस तथ्य भावना या आधार को हम एक उदाहरण के द्वारा भली-भांति ज्ञात कर सकते हैं।
samaj kya hai
समस्त ब्राह्मण वर्ण के व्यक्ति स्वयं को ब्राह्मण समाज का सदस्य कहते हैं। किसी क्षत्रिय को ब्राह्मण समाज की या ब्राह्मण को क्षत्रिय समाज की सदस्यता प्रदान नहीं की जाती है। इसका कारण यह है कि समस्त ब्राह्मण न केवल एक जाति के हैं, बल्कि उनमें परस्पर (सगे, माने हुए या जाति बंधु के रूप में) सम्बन्ध भी है। उनका ऐसा सम्बन्ध किसी क्षत्रिय से नहीं है। इसीलिये वे क्षत्रिय को अपने समाज की सदस्यता प्रदान नहीं करेंगे। यही कारण है कि क्षत्रिय, वैश्य, ब्राह्मण आदि भी अपने वर्ण की सदस्यता अन्य वर्गों के सदस्यों को प्रदान नहीं करेंगे। अतः वर्ण समाज के निर्माण के लिए “वर्ण के सदस्यों में किसी न किसी प्रकार का सम्बन्ध होना" आवश्यक है।
एक सम्प्रदाय, एक वर्ग, राष्ट्रीय समूह, भाषाई समूह, प्रादेशिक समूह आदि के सदस्य भी इसी प्रकार के वास्तविक या काल्पनिक सम्बन्धों से सम्बन्धित होने के आधार पर ही स्वयं को उस समाज का सदस्य निरूपित करते हैं। इस दृष्टि से हम निर्विवाद रूप से कह सकते हैं कि मनुष्यों के सभी प्रकार के समूहों के सदस्यों में किसी न किसी प्रकार के सम्बन्ध अवश्य ही पाये जाते हैं जिनके आधार पर उनमें संगठन या समूह बनाने की भावना का उदय होता है। समूहों के संगठन के लिए सम्बन्धों की इस अनिवार्यता को आधार मानकर समाजशास्त्री, समाज की परिभाषा “मनुष्यों (या समूह के सदस्यों) के बीच पाये जाने वाले सम्बन्धों की व्यवस्था के रूप में करते हैं (न कि मनुष्यों की संख्या, समूह, एकत्रीकरण या झुण्ड के रूप में)।" समूहों का आकार या विशेषता इस परिभाषा को प्रभावित नहीं करती है। अत: यह परिभाषा मनुष्यों के सभी प्रकार के समूहों के लिए उपयुक्त है तथा समाज के वास्तविक रूप को प्रकट करती है। विभिन्न समाजशास्त्रियों ने 'समाज' की भिन्न-भिन्न विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए उसे अपने-अपने ढंग से परिभाषित करने का प्रयास किया है।
कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित है-

गिडिंग्स (Giddings)
“समाज स्वयं एक संघ है, एक संगठन है, औपचारिक सम्बन्धों का एक योग है, जिसमें सहयोगी व्यक्ति परस्पर आबद्ध हैं।"

गिन्सबर्ग (Ginsberg)
"समाज मानवीय सम्बन्धों का सम्पूर्ण जाल है।"

कूले (C.H. Cooley)
"समाज स्वरूपों या प्रक्रियाओं का जटिल ढांचा है जो एक-दूसरे की अन्त:क्रियाओं के कारण जीवित है तथा वृद्धि करता है। सम्पूर्ण व्यवस्था इस प्रकार संगठित है कि एक भाग पर पड़ने वाला प्रभाव अन्य भागों को भी प्रभावित करता है।"

लेपियर (Lapiere)
“समाज मनुष्यों के समूह का नाम नहीं है, वरन् यह समूह के मनुष्य के अन्तः सम्बन्धों की जटिल व्यवस्था है।"

फेयरचाइल्ड (H.P. Fairchild)
“समाज मानवों का एक समूह है, जो अपने विभिन्न प्रमुख हितों की पूर्ति के लिए परस्पर सहयोग प्रदान करते है, अनिवार्य रूप से स्वयं को बनाये रखने व स्वयं की निरन्तरता के लिए।"

मैकाइवर और पेज (Maclver and Page)
"समाज व्यवहारों और प्रणालियों, प्रभुत्व और सहयोग, समूहों और श्रेणियों, मानव व्यवहार के नियन्त्रणों और स्वाधीनता का एक विधान है।"

गिलिन (Gillin)
"समाज तुलनात्मक दृष्टि से सबसे अधिक स्थाई समूह है, जो कि सामान्य स्वार्थ, सामान्य भू-भाग, सामान्य प्रकार का रहन-सहन और सामान्य पारस्परिक सहयोग या अपनत्व की भावना रखता है, जिसके आधार पर वे अपने को बाहर से पृथक् करते हैं।"

यूटर (Reuter)
“समाज एक अमूर्त शब्द है, जो समूह के दो या दो से अधिक सदस्यों के बीच स्थित पारस्परिक सम्बन्धों की जटिलता का बोध करता है।"

समाज की विशेषताएँ

समाज की समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से विवेचना कर लेने पर अब हम सरलतापूर्वक समाज की विशेषताओं का उल्लेख कर सकते हैं।
कुछ प्रमुख विशेषताएं निम्नानुसार हैं-

1. समाज सम्बन्धों की व्यवस्था है, न कि मनुष्यों का समूह
साधारणतः मनुष्यों के समूह को समाज कह कर सम्बोधित किया जाता है। स्त्री-समाज और पुरुष-समाज का प्रचलन इसी अर्थ में है। यह सच भी है कि एक-एक मिलकर बहुत से मनुष्यों के योग से समाज बनता है किन्तु एक या कुछ एक व्यक्ति समाज नहीं होते हैं बल्कि समाज तो अनेकानेक मनुष्यों के सम्बन्धों की एक व्यवस्था है।

2. समाज अमूर्त है
अमूर्त का अर्थ है कि जिसका कोई ठोस आकार न हो अर्थात् जो स्थान न घेरती हो, जिसका कोई आकार न हो, जिसको स्पर्श न किया जा सके, जिसे उठाया अथवा रखा न जा सके। सम्बन्ध इस दृष्टिकोण से अमूर्त होते हैं। समाज चूँकि सम्बन्धों की व्यवस्था है तथा सम्बन्ध अमूर्त होते हैं इसलिए समाज भी अमूर्त है। हम मनुष्यों के समूह, परिवार के सदस्यों आदि को देख सकते हैं, परन्तु उनके बीच पाये जाने वाले सम्बन्धों को नहीं।

3. समाज में समानता और विविधता पाई जाती है
समाज, यद्यपि सम्बन्धों की व्यवस्था है, परन्तु सम्बन्धो का विकास मनुष्यों की पारस्परिक जागरूकता, पारस्परिक सम्पर्क और अन्तक्रियाओं के फलस्वरूप होता है। इस दृष्टि से हम समाज की कल्पना मनुष्यों के बिना नहीं कर सकते हैं। मनुष्यों में पाई जाने वाली समानताएँ व उनसे उत्पन्न अन्तक्रियाएँ समाज को जन्म देती हैं। इसका तात्पर्य यह नहीं कि समाज में असमानता या विविधता होती ही नहीं है। सत्य तो यह है कि सभी समाज में समानताओं के साथ-साथ असमानताएँ भी परिलक्षित होती हैं।
परिलक्षित कुछ प्रमुख समानताएँ और विविधताएँ निम्नानुसार हैं-

समाज में परिलक्षित समानताएँ
प्रजातीय दृष्टि से मानव-मानव एक समान होने के कारण ही उनमें पारस्परिक जागरूकता पाई जाती है। सभी मनुष्य बुद्धियुक्त है, इसी कारण वे एक दूसरे के विचारों को समझते हैं तथा पारस्परिक सहयोग करते है। सभी मनुष्यों की मूलभूत आवश्यकताएँ एक समान हैं। मानवीय सीमाएँ या दोष भी सभी में समान हैं पशु जैसी मूल प्रवृत्तियाँ (जैसे स्वार्थ, लोभ, क्रोध, मोह, अहंकार, परिश्रम से मन चुराने की प्रवृत्ति आदि) भी सब में समान रूप में विद्यमान रहती हैं।
इनके अतिरिक्त समाज में प्रचलित रीति-रिवाज, जनरीतियाँ, रूढियाँ, प्रथाएँ, भाषा, धर्म, आदर्श भी सभी के लिए एक जैसे पाये जाते हैं। इसीलिए सदस्यों के व्यवहारों में समरूपता पाई जाती है। इस प्रकार समाज में अनेक रूपों में समानताएँ परिलक्षित होती हैं।

समाज में परिलक्षित असमानताएँ
इन समानताओं के बावजूद समाज में अनेक असमानताएँ भी दृष्टिगोचर होती हैं। स्तरीकरण के कारण समाज में अनेक समूह-उपसमूह पाये जाते हैं। आवश्यकताओं की भिन्नता के कारण भी अनेक समूह पाये जाते हैं। इन समूहों से सम्बन्धित संस्थाएँ (कार्यविधियाँ, नियम आदि) भी भिन्न होती हैं। समाज में सभी सदस्यों की समाजिक स्थिति व भूमिकाएँ भी एक समान न होकर, भिन्न-भिन्न होती है। आयु भेद, लिंग भेद, शारीरिक शक्ति, बौद्धिक प्रतिभा, गुण, व्यक्तिगत रुचियों, कार्यक्षमता आदि के आधार पर भी समाज के सदस्यों में असमानताएँ परिलक्षित होती हैं। समाज में घटित होने वाले अपराध, असहयोग, संघर्ष, प्रतिस्पर्धा, आत्महत्या आदि भी इस तथ्य पर प्रकाश डालते हैं कि समाज में समानताएँ ही नहीं, असमानताएँ भी रहती हैं।

असमानता की अपेक्षा समानता अधिक
यह सत्य है कि समाज में समानताएँ और असमानताएँ दोनों ही पाई जाती है, परन्तु असमानताओं की अपेक्षा समानताएँ अधिक प्रभावशाली होती हैं। यदि असमानताएँ अत्यधिक बढ़ जाएँ तब समाज संगठित नहीं रह सकता। इसीलिए प्रत्येक समाज, सदस्यों में समरूपता का विकास करने के साथ-साथ असमानताओं को भी नियंत्रित करने के लिए नियंत्रणात्मक व्यवस्था का विकास करता है।

4. समाज में सहयोग और संघर्ष पाया जाता है
समाज अर्थात् समाजिक सम्बन्धों की व्यवस्था मनुष्यों की, अन्तक्रियाओं के फलस्वरूप उत्पन्न होती है। मनुष्यों की अन्तक्रियाओं को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-सहयोगात्मक अन्तक्रियाएँ और असहयोगात्मक अन्तक्रियाएँ। हम ऐसे किसी भी समाज की कल्पना नहीं कर सकते, जिसके सदस्यों में सहयोग ही सहयोग हो। सत्य तो यह है कि प्रत्येक समाज में चाहे वह कितना ही छोटा व सरल क्यों न हो, किसी न किसी रूप में सहयोग की भावना भी अवश्य ही पायी जाती है। अब हम देखें कि समाज में किस प्रकार सहयोग और असहयोग पाया जाता है

समाज में सहयोग
सहयोग से तात्पर्य एक साथ या मिलजुल कर कार्य करने से है। जब दो या दो अधिक व्यक्ति परस्पर संयुक्त होकर किसी कार्य को सम्पादित करते हैं, तब इसे सहयोग कहा जाता है। इस प्राणी जगत में सर्वश्रेष्ठ प्राणी होने पर भी मनुष्य सर्वाधिक असहाय और असुरक्षित है। इसका प्रमुख कारण मानव की असीमित आवश्यकताएँ है। मानव की सम्पूर्ण दिनचर्या किसी न किसी आवश्यकता की पूर्ति के प्रयास में ही व्यतीत होती है। सीमित शक्ति, सीमित साधन और आवश्यकताओं की त्वरित पूर्ति की अनिवार्यता के कारण किसी भी एक व्यक्ति के लिए यह सम्भव नहीं होता कि वह स्वयं अपनी समस्त आवश्यकताओं को पूर्ण कर ले। इसीलिए समाज में स्तरीकरण, श्रम विभाजन, श्रम का विशेषीकरण और अन्तर्निभरता, विभिन्न स्थितियाँ, भूमिकाएँ, अधिकारिता, नियंत्रणात्मक व्यवस्था आदि पाई जाती हैं। इसके माध्यम से सभी व्यक्ति परस्पर सहायता कर आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं और सुरक्षित रहते हैं।

समाज में असहयोग और संघर्ष
प्रत्येक समाज अपने सदस्यों में समानताएँ विकसित कर उनमें सहयोग की प्रवृत्ति को विकसित करने का प्रयास करता है। फिर भी कुछ व्यक्ति पूर्णतः सामाजिक नहीं बन पाते हैं। उनकी पाशविक प्रवृत्तियों जैसे स्वार्थ, लोभ, क्रोध, मोह, अहंकार, परिश्रम से जी चुराने की प्रवृत्ति आदि को भी समाज पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर पाता है। ऐसे व्यक्ति सामाजिक हित की अपेक्षा व्यक्तिगत हित को अधिक महत्त्व देते हैं। यह स्थिति समाज में असहयोग या संघर्षों को जन्म देती है। इसके अतिरिक्त समाज में सदैव किसी न किसी मात्रा में ऐसी दशाएँ या कारक विद्यमान रहते हैं, जो समाज को परिवर्तित होने के लिए प्रेरित करते हैं। इससे परम्परावादी और परिवर्तनवादियों में असहयोग और संघर्ष उत्पन्न होता है। वैचारिक, चारित्रिक, नैतिक, आध्यात्मिक, राजनैतिक असमानताएँ भी असहयोग और संघर्ष के लिए उत्तरदायी होती हैं।

असहयोग और संघर्ष की अपेक्षा सहयोग की प्रधानता
यह सत्य है कि संघर्ष से सर्वथा मुक्त किसी समाज की कल्पना करना निरर्थक है। परन्तु, यह भी सत्य है कि सभी समाज असहयोग और संघर्ष की दशाओं को न्यूनतम करने का प्रयास करते हैं। यदि ऐसा न हो तो असहयोग और संघर्ष इस चरम अवस्था तक पहुँच जायेंगे कि अन्ततः सम्पूर्ण मानव जाति और उसके साथ उसका समाज भी नष्ट हो जायेगा। अतः समाज में असहयोग की अपेक्षा सहयोग की मात्रा अधिक पाई जाती है।

5. पारस्परिक जागरूकता
समाज में सदस्यों के बीच, एक दूसरे के अस्तित्व, आवश्यकताओं, सीमाओं, समानताओं और असमानताओं, सहयोग की अनिवार्यता, कार्य पद्धतियों और रीति रिवाजों, समूहों और संस्थाओं आदि
के प्रति जागरूकता पाई जाती है।

6. समाज मानवीय अन्तक्रियाओं का क्षेत्र है
प्रत्येक व्यक्ति समाज में जन्म लेता है, जीवनयापन करता है और मृत्यु को प्राप्त होता है। इस प्रकार समाज में ही उसके व्यक्तित्व का विकास होता है। वह शक्ति अर्जित करता है तथा उसका समाजीकरण होता है। उसकी स्थिति और भूमिका का निर्धारण भी होता है। इस प्रकार उसकी समस्त क्रियाएँ और अन्तक्रियाएँ समाज में ही सम्पादित होती हैं।

7. समाज एक अखण्ड व्यवस्था नहीं है
समाज यद्यपि सम्बन्धों की व्यवस्था है, परन्तु इस सम्बन्धों का विकास रीति-रिवाजों और कार्यविधियों, अधिकारिता और पारस्परिक सहयोग, अनेक समूहों और उपसमूहों, मानव व्यवहार के नियंत्रण की विधियों और उन्हें प्राप्त स्वाधीनताओं के द्वारा होता है। इस प्रकार यह सब मिलकर समाज को आकार प्रदान करते हैं।

8. पारस्परिक निर्भरता
कोई भी मनुष्य अन्य मनुष्यों से सर्वथा स्वतंत्र रहकर अपनी समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकता। वस्तुतः पारस्परिक निर्भरता के कारण ही व्यक्ति एक दूसरे के सम्पर्क में आकर मिलजुल कर कार्य (क्रियाएँ) करते हैं, जिससे सम्बन्धों का विकास होता है। इस प्रकार समाज में मनुष्यों के बीच अन्योन्याश्रित प्रवृत्ति पाई जाती है।

9. समाज एक जटिल व्यवस्था है
समाज का स्वरूप सरल नहीं है। समाज का विकास किसी एक या कुछ सम्बन्धों के द्वारा नहीं होता है। इसमें मनुष्यों के सभी प्रकार के सम्बन्ध सम्मिलित रहते हैं। समाज में समानता के साथ असमानता तथा सहयोग के साथ असहयोग या संघर्ष भी पाया जाता है। समाज स्वयं तो अमूर्त है, परन्तु इसमें अनेक समूह और उपसमूह रहते हैं। इन सभी कारणों से समाज का स्वरूप सरल नहीं वरन् जटिल होता है।

10. समाज परिवर्तनशील है
समाज जड़ नहीं चेतन है। भौगोलिक दशाएँ, जनसंख्यात्मक कारक, प्रौद्योगिकी कारक, आर्थिक कारक, सांस्कृतिक कारक आदि में परिवर्तनों के कारण कोई भी समाज एक जैसी दशा में न रहकर परिवर्तित होता रहता है।

मानव और पशु समाज की विशेषताएँ

(अ) मानव समाज की प्रमुख विशेषताएँ
सामाजिक मनोवैज्ञानिक दृष्टि से मानव समाज की निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएं हैं-

1. मानव समाज एक मशीन है
प्रसिद्ध समाजशास्त्री पैरेटो ने अपनी रचना में इस बात को घोषित किया है कि मानव समाज एक मशीन के समान है। जिस प्रकार एक जटिल मशीन में तरह-तरह के छोटे-बड़े पुर्जे और विविध अंग होते है उसी प्रकार मानव समाज में भी इसके अनेक अंग होते है। ये छोटे-छोटे अंग प्रत्येक समाज में एक व्यक्ति की इकाई जैसे, परिवार, पड़ोस, विवाह समुदाय, समितियाँ आदि के नाम से प्रख्यात है। इन सभी छोटी-छोटी इकाइयों का समाज के संगठन में महत्त्वपूर्ण एवं प्रभावशाली स्थान होता है। इनमें से किसी एक छोटे
से अंग के टूट जाने से जिस प्रकार सम्पूर्ण समाज पर प्रभाव पड़ता है उसी प्रकार पैरेटो के अनुसार एक भीषण विशालकाय मशीन में एक बाल जैसे पुर्जे के टूट जाने से सारी मशीन बेकार हो जाती है।

2. मानव समाज सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था है
समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों (Sociology theories) पर। लिखने वाले विद्वानों का मत है कि मानव समाज के पास "संस्कृति नाम की भी एक विशेषता है।" इसके कारण यह अन्य समाजों से भिन्न है। उदाहरण के लिये, पशुओं का भी एक समाज है लेकिन उसके पास भाषा, कला, साहित्य, वेशभूषा, धर्म, संगीत जैसे तत्व नहीं है। मानव समाज की यह विशेषता है कि इसके पास सब कुछ है। मानव समाज की विशेषता के सम्बन्ध में विचार व्यक्त करते हुए प्रबुद्ध समाजशास्त्री किंग्सले डेविस (K. Davis) ने अपनी पुस्तक "मानव समाज" में स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि 'मानव और पशु में अन्तर संस्कृति के आधार पर किया जा सकता है। संस्कृति के कारण ही मानव का बौद्धिक स्तर पशुओं से ऊँचा होता है, बोलचाल की भाषा का रूप निखरा होता है तथा सामाजिकता का तत्व अधिक होता है।' वे आगे और भी लिखते है "मानव समाज की अद्वितीय प्रकृति का द्योतक यदि कोई एक कारक है तो वह यह कि वह अकेला है, जिसके पास संस्कृति है। यहीं से उसके और अन्य विशिष्ट रूप आगे बढ़ते हैं, उसकी बुद्धिमता, उसका भाषण, उसका सामाजिक जीवन, यह सब संस्कृति से संचालित है। इस प्रकार संस्कृति एक अद्वितीय प्रकार का अधिकार है जो सम्पूर्ण मानव जीवन में उसकी क्रियाओं में व्यक्ति की अद्वितीयता की विशेषता है।"

3. मानव समाज मानव-सम्बन्धों का संगठन है
प्रसिद्ध समाजशास्त्री पारसन्स (Parsons) भी समाज के प्रबुद्ध विचारक हैं। उन्होंने लिखा है कि “समाज की परिभाषा मानव सम्बन्धों की पूर्ण जटिलताओं के रूप में की जा सकती है। जहाँ तक कि साध्य-साधन का सम्बन्ध है वह मानव सम्बन्धों पर आधारित है।" पारसन्स के इन शब्दों से यह पता चलता है कि समाज की सम्पूर्ण व्यवस्था में व्यक्ति के परस्पर सामाजिक सम्बन्धों का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। समाज व्यवस्था का यह सम्बन्ध साध्य और साधन है। इसका तात्पर्य यह है कि समाज की व्यवस्था व्यक्तियों के सम्बन्धों हेतु सम्बन्धों के द्वारा बनायी जाती है।

4. मानव समाज एक जैविकीय इकाई है
पशु समाजों के समान मानव समाज का भी एक जैविकीय आधार है इसीलिये प्राणिशास्त्र में जब जैविकीय संरचना का ज्ञान करना होता है तो पशुओं को चीर-फाड़ कर देखा जाता है। अतः मानव समाज की जैविकीय स्थिति पशु समाज के समान प्रजनन, ज्ञान तथा आशा-निराशा, सुख-दुख, भय तथा क्रोध आदि वैज्ञानिक प्रवृत्तियों की तरह होती है।
यदि इस दृष्टि से मानव समाज में कोई विशिष्टता होती है तो वह निम्नलिखित है-
  • मानव समाज के पास सुव्यवस्थित और केन्द्रीय चेतना संहिता है।
  • मानव में सीधे खड़े होने की स्थिति है।
  • मनुष्य के पास वाणी है।।
  • अन्य शारीरिक विशेषताएँ हैं।
निम्न विभिन्नताओं का आशय है कि मनुष्य में अन्य जीवधारियों की तुलना में सोचने और विचारने की क्षमता अधिक है। मानव को सर्दी-गर्मी से शरीर के रक्षार्थ कृत्रिम साधनों की खोज करनी पड़ती है।

(ब) पशु समाज की प्रमुख विशेषताएँ
समाज दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम, मानव समाज जिस पर हम विचार कर चुके हैं। द्वितीय पशु समाज होता है। इस समाज का निर्माण कैसे होता है? पशु व अन्य जीवधारियों को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु समूह का निर्माण करना पड़ता है। इससे उनमें सामूहिक जीवन के तत्व विकसित हो जाते हैं। इस प्रकार पशुओं में भी समाज तथा सामाजिक व्यवस्था होती है। उनमें भी सामाजिक सम्बन्ध तथा वंश परम्परा पायी जाती है। इस कारण पशु समाज की प्रकृति जैवीय-सामाजिक (Bio-social) है।

1. पशु समाज एक जैवीय सामाजिक व्यवस्था है
इस मत के प्रस्तुतकर्ता प्रोफेसर के. डेविस हैं। इन्होंने पशु समाज को एक जैवीय-सामाजिक व्यवस्था के नाम से सम्बोधित किया है। उन्होंने लिखा है “प्रत्येक जीवधारी आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिये ऐसी सामाजिक व्यवस्था स्थापित करते हैं जिसका आधार वंशानुक्रम होता है।" इस दृष्टि से पशु समाज को दो भागों में बाँटा जा सकता है।

(क) एककोशीय जीवधारियों का समाज
एककोशीय जीवधारियों का समाज वह होता है जिसमें शारीरिक दृष्टिकोण से समरूपता होती है। उनको देखकर ऐसा लगता है कि वे सब एक अवयव ही हैं। ऐसे जीवों में पोखरों में पाई जाने वाली 'हरी शैवाल' नामक जीव होता है जो परस्पर जुड़े पाये जाते हैं। इन शैवाल जीवधारियों में समाज व्यवस्था होने के साथ-साथ श्रम विभाजन, सहयोग, एकीकरण की भावना आदि तत्व भी पाये जाते हैं।

(ख) बहुकोषीय जीवधारियों का समाज
ऐसे जीवधारियों के समाज में शारीरिक निकटता के स्थान पर मानसिक निकटता पाई जाती है। उदाहरण-चींटी, मधुमक्खी, दीमक, मछलियाँ, सर्प, मगर, बन्दर और कुत्ते आदि का समाज बहुकोषीय जीवधारियों का समाज होता है।
चींटी, मधुमक्खी तथा दीमक में तो एक रानी होती है जो प्रजनन का कार्य करती है। व्यवहार करने की इनमें जन्मजात प्रकृति होती है। इसके सम्बन्ध में गिलिन ने स्पष्ट लिखा है कि “व्यक्ति के रूप में प्रत्येक चींटी और मधुमक्खी ऐसी प्रतीत होती है मानो वह अपने व्यवहार को जन्म से ही सीखी और पैदा हुई हो, अर्थात् व्यवहार करने का उसे सहज ज्ञान है।" अतः मानव समाज की भाँति बहुकोषीय जीवधारी समाज में बच्चों को व्यवहार करने की शिक्षा देने की आवश्यकता नहीं होती है।

2. पशु समाज में सामाजिक व्यवहार होता है
पशुओं तथा अन्य जीवधारियों में ऐसे कई उदाहरण देखने को मिलते हैं जिनमें उनकी रचनात्मक क्रियाएँ स्पष्ट रूप से दिखायी देती हैं। दीमक अपने निवास स्थान की सफाई और सारा निर्माण तथा सुरक्षा के लिये प्रसिद्ध है। चींटियों में श्रम-विभाजन होता है उनमें अनुशासन, एक भाँति भोजन तथा परस्पर सम्पर्क स्थापित करते हुए काम का एक क्रम पाया जाता है। ऐसे अनेक पशु समाज भी हैं जिनमें सामूहिक कार्य की आदत एवं व्यवहार पाया जाता है।

3. पशु समाज में सामाजिक जीवन होता है
पशु समाज भी जीवन के महत्त्व से अवगत हैं। ऐसे अनेक पशु हैं जिनको हम अपने दैनिक जीवन में सामूहिक प्रतिक्रियाएँ करते हुए देखते हैं। एक मुहल्ले में किसी अजनबी पशु या मानव को देखकर सब कुत्तों का एक साथ भौंकना एक ऐसा उदाहरण है जो सामूहिकता की प्रवृत्ति का द्योतक है। पशु समाज इस बात को ठीक तरह से समझता है कि अकेले में अपनी आवश्यकताओं की पूति करना असम्भव है। इसलिए पशु समाज में संघ और टोलियाँ होती हैं। उनके भी प्रादेशिक तथा स्थानीय संगी-साथी होते हैं। पशु समाज यह समझता है कि सामूहिक प्रयत्नों से कार्य-क्षमता में अभिवृद्धि होती है। इससे कार्य शीघ्र और सरल होता है। इस दृष्टि से मानव समाज के अनुरूप पशु-समाज भी स्थायी वस्तुओं का निर्माण करता है। वे अपने निवास स्थान, सुरक्षा स्थान जैसे घोंसले व अन्य प्रकार की गुफा, बिल आदि बनाते हैं और उनमें रहते हैं।

मानव तथा पशु समाज में अन्तर

1. मानव समाज में विविधता, समरूपता दोनों होती है
मानव समाज की प्रकृति पर विचार प्रस्तुत करते हुए प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैकाइवर और पेज ने यह स्पष्ट किया है कि मानव समाज में समानता और भेद दोनों ही सन्निहित है। परिवार की रचना को लीजिए। इसमें दो विषमलिंगीय व्यक्ति संगठित होते हैं। इसके साथ-साथ पति-पत्नी के रूप में इन दोनों प्राणियों में परस्पर सादृश्यता भी होती है। गिडिंग्स ने कहा है कि समाज का आधार सजातीयता की भावना है और यह सजातीयता की भावना चीटियों तथा मधुमक्खियों की भाँति ही मनुष्यों के सामाजिक सम्बन्धों तक ही सीमित रहती है। इस प्रकार मानव समाज में भिन्नता समानता के अधीन है। समाज में श्रम-विभाजन है। पहले सहयोग है बाद में विभाजन है। लोग असमान कार्यों के करने में परस्पर सहयोगी बनते हैं। इस प्रकार संगठन और विघटन साथ-साथ चलते हैं। समानता के समान विविधताओं का आधार मानव समाज में जाति, गोत्र, प्रजाति व जाति रक्त और रंग आदि के आधार पर होती है। यह सामाजिक समरूपता ही होती है। वे शारीरिक समरूपता के कारण ही परस्पर आबद्ध होकर सामूहिक व सामाजिक जीवन व्यतीत करने के लिए एकत्रित होते हैं। अतः मानव और पशु समाज में सबसे अधिक मौलिक अन्तर यही है कि पशु समाज एक ही प्रकार का जीवनयापन समरूपता के आधार पर करते हैं। बन्दर, चींटी तथा मच्छर अपने में सबके समान जीवनयापन करते हैं जबकि मानव समाज विविधताओं से परिपूर्ण है।

2. मानव समाज में परिवर्तन की गति तीव्र होती है
मानव समाज गतिशील है। इसमें परिवर्तन की गति तीव्र होती है। ऐसा बतलाया जाता है मानव समाज में प्रतिपल परिवर्तन होता है। यह परिवर्तन सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से मानव संस्कृति में कम्पन उपस्थित कर उसमें गति लाता है। इस प्रकार मानव संस्कृति का घेरा घूमता रहता है। पशु समाज में परिवर्तन के लिये लेशमात्र की सम्भावना नहीं होती है। उनका जीवन वंशानुक्रम में संचालित होता है। शारीरिक दृष्टि से भी परिवर्तन दीर्घकाल के बाद आता है। लेकिन जहाँ तक पशु, कीट समाजों में व्यवहारों का परिवर्तन है वह नहीं के बराबर होता है। चीटियाँ, हजारों वर्ष पहले भी पंक्ति बनाकर चलती थीं, आज भी उनका यही हाल है। अतः पशु समाज सामाजिक दृष्टि से गतिहीन है जबकि मानव समाज में प्रतिपल गतिशीलता पाई जाती है। मानव समाज में परिवर्तन लाने के लिए अनेक माध्यम हैं। मनुष्यों के व्यवहारों में परिवर्तन लाने के लिए शिक्षा, अनुनय, दबाव, बन्धन और सजा, पारितोषिक, प्रशंसा आदि ऐसे तत्व हैं, जिनमें वान्छित परिवर्तन किये जा सकते हैं। पशु समाज के पास ऐसा न तो कोई माध्यम है और न ही विचार के लिए विकसित मस्तिष्क ही। इसलिए पशु समाज और मानव समाज में परिवर्तन की तीव्रता के आधार पर भी अन्तर रेखा खींची जा सकती है।

3. मानव समाज के पास संस्कृति है
मानव और पशु समाज में परस्पर भिन्नताओं का एक यह भी प्रमुख आधार है कि मानव समाज के पास संस्कृति होती है। पशु समाज संस्कृतिहीन है। इस सम्बन्ध में किंग्सले डेविस (K. Devis) ने स्पष्ट लिखा है-“संस्कृति के आधार पर मानव समाज और पशु समाज में अन्तर किया जा सकता है। मानव-समाज अपनी संस्कृति के कारण ही पशु समाज की तुलना में मानसिक दृष्टि से ऊँचा है। उसके पास साहित्य, कला, भाषा आदि अनेक गुण हैं।" मानव समाज में संस्कृति के विभिन्न तत्व हैं। उसमें प्रथाएँ, जनरीतियाँ, परम्परायें, आदर्श, मूल्य, रूढ़ियाँ तथा संस्थाएँ होती हैं। मानव समाज के समान खाने-पीने, बातचीत करने, चिन्तन पद्धति, कला, सृष्टि दर्शन एवं साहित्य सृजन की अपनी मान्यताएँ हैं जो पशु समाज में नहीं पाई जाती हैं। त्यौहार, संस्कार, पर्व, भाषा, जाति, रंग आदि जितने भी विभेदीकरण आधार हैं वे सब मानव कृत हैं।

4. मानव समाज अपनी यौन इच्छाओं पर नियन्त्रण रखता है
यदि कामशास्त्र की दृष्टि से भी हम मनुष्य और पशु समाज की तुलना करें तो दोनों में भिन्नता पायेंगे। मनुष्य में 'काम' नियन्त्रित होता है जबकि पशुओं में 'काम' की स्वच्छन्दता पायी जाती है। मानव समाज में 'काम तृप्ति' के लिए समाज द्वारा मान्य विवाह संस्कार और अन्य अनेक प्रतिमान होते हैं। मनुष्य हर किसी के साथ 'काम' की सन्तुष्टि नहीं कर सकता। वह विवाह जैसे वैध और मान्य तरीके के माध्यम से ही 'काम' की संतुष्टि कर सकता है। लेकिन पशुओं में देखा जाता है कि वे जब चाहे, जहाँ चाहे किसी भी पशु के साथ स्वच्छन्दतापूर्वक 'काम' सन्तुष्टि कर सकते हैं।

5. मानव समाज के पास भाषा है
भाषा एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा वह अपने विचारों को दूसरों तक पहुँचाता है। वैसे पशुओं में भी बोलने की क्षमता होती है किन्तु वे अपने विचारों और भावनाओं को दूसरे तक नहीं पहुंचा सकते हैं। इसका कारण यह है कि मनुष्य का जबड़ा सन्तुलित और जीभ पतली होती है। पशुओं की जीभ मोटी होने के कारण वे इसे आसानी से घुमा नहीं सकते हैं। बोलने की क्षमता का सीधा सम्बन्ध मस्तिष्क के विकास से है। यही कारण है कि कम बुद्धि वाले व्यक्ति किसी बात को अच्छी तरह नहीं समझ पाते हैं जबकि बुद्धिमान व्यक्ति शीघ्र ही समझ जाते हैं। इसके साथ ही पशु समाज अपनी भाषा में परिवर्तन नहीं कर सकता है जबकि मनुष्य अपनी भाषा में मधुर और प्रभावपूर्ण ढंग से परिवर्तन कर सकता है।

6. मानव समाज में आदर्शात्मक नियन्त्रण होता है
मानव समाज में पशु समाज की तुलना में अधिक सामाजिकता की अनुभूति होती है। मानव पशु के समान इतना स्वार्थी नहीं है कि वह अपनी आवश्यकताओं की तुष्टि तथा उद्देश्य अपने सामने रखता हो। इस दृष्टि से वह अधिक सामाजिक है। मानव समाज के पास प्रथायें, रूढ़ियाँ, आदर्श, समितियाँ, संस्थाएँ, मूल्य, प्रतिमान आदि ऐसे तत्व होते हैं जो व्यक्ति को समाजीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से समाज की अनुभूति और सामाजिक हितों की वृद्धि के लिए संकुचित करते हैं। इसके व्यवहार में परिवर्तन लाने के ये प्रमुख माध्यम हैं। इन माध्यमों से वांछित व्यवहार और क्रियाएँ प्राप्त की जा सकती हैं। व्यक्ति की स्वच्छन्दताओं में इनके द्वारा आदर्शात्मक नियन्त्रण रखा जा सकता है। पशु समाज सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत से वंचित रहता है। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को उस समाज में जो बातें हस्तान्तरित होती हैं वे अधिकांशतः प्रकृति में जैवीय होती हैं। इसलिए पशु के व्यवहार पर वातावरण का प्रभाव नहीं डाला जा सकता। उसका न तो सामाजीकरण किया जा सकता है और न ही आदर्शात्मक नियन्त्रण। किंग्सले डेविस ठीक कहता है कि “इस तरह मनुष्य समाज के पास न केवल तथ्यात्मक व्यवस्था होती है वरन् एक नैतिक व्यवस्था भी होती है और साधारणतया ये दोनों एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं।" अतः मनुष्य समाज में लक्ष्य प्राप्ति के नियंत्रण होने के कारण यह पशु समाज से भिन्न है।

7. मानव समाज में पारस्परिक चेतना अधिक होती है
पशु समाज में सामाजिक सम्बन्धों की स्पष्ट, स्थायी, निरन्तर, घनिष्ठ एवं परस्पर प्रभावपूर्ण व्यवस्था का न होना भी भिन्नता का आधार है। सामाजिक सम्बन्धों की इन विशिष्टताओं का प्रमुख आधार पारस्परिक चेतना है। तात्पर्य यह है कि सम्बन्ध स्थापित करने वाले जीवधारी एक दूसरे के सामने देखें, परस्पर मानसिक प्रतिक्रियाएँ करें और इन प्रतिक्रियाओं का प्रभाव एक दूसरे पर डालें तो वे सम्बन्ध परस्पर प्रतीतिपूर्ण होंगे। मानवीय सम्बन्ध में पारस्परिक चेतना की यह सम्पूर्ण प्रक्रिया मनुष्य में विकसित मस्तिष्क होने के कारण स्पष्टतया होती है और परिणामस्वरूप जो सम्बन्ध स्थापित होते हैं वे स्थायी एवं स्पष्ट होते हैं। पशु समाज में मानसिक शक्ति का अत्यन्त निम्न स्तर होने के कारण इसके सम्बन्धों की परस्पर प्रभावपूर्ण चेतना का होना असम्भव है। उसमें अपने समझने के सम्बन्ध होते हैं, परस्पर प्रतीति भी होती है, लेकिन उसमें प्रभावपूर्ण स्थिति का इसलिए अभाव रहता है कि इस प्रतीति में मानसिक अन्त: क्रिया का अभाव रहता है। इसलिए पशु समाज में सम्बन्ध पारस्परिक चेतनाविहीन होते हैं। पारस्परिक चेतना से मानव समाज में परस्पर अभिज्ञान इतना विस्तृत होता है कि एक ही क्षण में पारस्परिक सामाजिक स्थिति, सामाजिक स्तर के तत्व तथा अन्य विभेदीकरण के आधारों का भी भास होता है। इसी कारण मानव व्यवहारों में पारस्परिक चेतना पशु समाज की तुलना में अति श्रेष्ठ है। उपरोक्त आधारों पर हम यह कह सकते हैं कि मानव समाज और पशु समाज में पाये जाने वाले अन्तर मुख्यतया सांस्कृतिक है। मानव के पास संस्कृति है जबकि पशुओं में संस्कृति का अभाव है। इसी आधार पर व्यक्ति को अपनी "संस्कृति का प्रतिरूप" (Replica of the culture) कहा गया है।

पशु समाज का वर्गीकरण और लक्षण

पशु समाज को निम्न प्रकार से तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-
  1. नर वानरों का समाज,
  2. स्तनधारी, जीवधारियों का समाज,
  3. कीड़ों और चीटियों का समाज।

(क) नर वानरों के समाज के लक्षण
अधिकांश विद्वानों का कहना है कि मनुष्यों का विकास नर वानरों से ही हुआ है। इस प्रकार के जीवधारियों में बिना पूंछ के पशुओं को सम्मिलित किया जाता है। गोरिल्ला तथा चिम्पान्जी आदि को सम्मिलित किया जा सकता है। नर वानर समाज में निम्नलिखित बातें पाई जाती हैं-

1. समझने की क्षमता
नर वानर समाज के शरीर की बनावट मनुष्य के शरीर की बनावट के समान होती है। जिस प्रकार मनुष्य के मस्तिष्क में प्रत्येक परिस्थिति को समझने की पूर्ण क्षमता होती है ठीक उसी प्रकार नर वानरों में भी परिस्थिति को समझने की पूर्ण शक्ति एवं क्षमता होती है।

2. निश्चित स्थिति
नर वानर समाज में प्रत्येक प्राणी की एक निश्चित समूह स्थिति होती है। उस समाज में समूह का एक नेता होता है और उसकी आज्ञा तथा आदर्शों का सभी पालन करते हैं।

3. नर और मादा का घनिष्ठ सम्बन्ध
नर वानरों में बच्चों का पालन-पोषण बहुत दिनों तक किया जाता है। बच्चों का शैशव काल अधिक लम्बा होने के कारण नर और मादा एक साथ बहुत दिनों तक रहते हैं। इसलिए नर व मादा सम्बन्धों में घनिष्ठता पाई जाती है।

4. बुद्धि की अधिकता
नर वानर समाज में सभी सदस्य एक निश्चित भाषा के आधार पर अपने भाव एक दूसरे को समझाने का प्रयास करते हैं। इनमें बुद्धि भी अधिक होती है। इसलिए नर वानर समाज के बच्चे बहुत शीघ्र ही अपने माता-पिता से शिकार पकड़ना, जानवरों से बचना और पेड़ पर चढ़ना सीख जाते हैं।

(ख) स्तनपायी जीवधारियों के समाज के लक्षण
स्तनपायी प्राणियों में वे प्राणी सम्मिलित किये जा सकते हैं जो दूध पीकर बड़े होते हैं। इस प्रकार के प्राणियों में नर व मादा दोनों ही प्रकार के प्राणी पाये जाते हैं। गाय व बैल, हाथी व हथिनी, कुत्ता व कुतिया, घोड़ा, व घोड़ी आदि को इस श्रेणी में सम्मिलित किया जाता है, क्योंकि इनके बच्चे प्रायः दूध पीकर बड़े होते हैं किन्तु यह आवश्यक भी नहीं कि सभी के बच्चे दूध पीकर ही बड़े हों।
इस समाज की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

1. नर व मादा में विशेष अन्तर का अभाव
स्तनपायी जीवधारियों की एक विशेषता यह है कि उनमें शारीरिक दृष्टि से नर व मादा के बीच आसानी से अन्तर दिखाई नहीं पड़ता। उन दोनों की शारीरिक बनावट, रूप-रंग, हाव-भाव में इतनी समानता पायी जाती है कि दूर से देखकर कोई भी व्यक्ति नर व मादा को पहचान नहीं सकता।

2. सीमित आकार
स्तनपायी जीवधारियों में मादा एक साथ इतने बच्चे नहीं देती जितने कीड़े मकोड़े देते हैं। इसलिये स्तनपायी जीवधारियों के समाज का आकार सीमित होता है। इसलिये इनके समाज का आकार
भी छोटा ही होता है।

3. अनुभव शून्यता
स्तनपायी जीवधारी अपने पुराने अनुभवों को याद नहीं रखते। इसलिये कहा जाता है कि स्तनपायी समाज अनुभव शून्य होता है।

4. अनुकूलनशीलता
स्तनपायी जीवधारियों में पर्यावरण से अनुकूलन करने की क्षमता होती है। यदि कोई स्थान उनके जीवन के अनुकूल न हो तो वे दूसरे स्थान पर आकर अपने अनुकूल पर्यावरण बना लेते हैं।

5. सम्बन्धों में स्थायित्व
स्तनपायी, समाज में नर मादा और बच्चों के बीच सम्बन्धों में स्थायित्व पाया जाता है। नर व मादा उस समय तक एक दूसरे के साथ ही रहते हैं जब तक बच्चे बड़े न हो जायें और ठीक प्रकार से अपनी आजीविका स्वयं प्राप्त न कर सकें।

(ग) कीड़ों और चींटियों के समाज के लक्षण
रेंगकर चलने वाले कीड़ों, दीमकों, चींटियों और चिड़ियों को इस समाज में शामिल किया जाता है। इस समाज में निम्नलिखित लक्षण पाये जाते हैं

1. सामूहिक जीवन
कीड़ों और चींटियों में समूह में रहने की आदत पाई जाती है। समूह में रहकर ही ये अपना भोजन एकत्र करते हैं।

2. सहयोग
इस समाज के जीवधारियों में पारस्परिक सहयोग उच्चकोटि का पाया जाता है।

3. श्रम विभाजन
इन जीवधारियों में श्रम विभाजन का सिद्धान्त देखने को मिलता है। चींटियों में भी रानी तथा श्रमिक चींटियों में भेद किया गया है।

4. ऋतु ज्ञान
ये जीवधारी ऋतुओं का विशेष ज्ञान रखते हैं और स्वयं अपनी रक्षा के साधन जुटा लेते हैं। प्रजनन की भी विशेष ऋतु होती है।

5. पर्यावरण पर निर्भरता
इस श्रेणी के जीवधारियों का अस्तित्व इनके पर्यावरण पर ही निर्भर है। यदि पर्यावरण थोड़ा-सा परिवर्तित हो जाये तो इनकी जीवन-लीला समाप्त हो जाती है।

6. प्राकृतिक प्रवरण
इस श्रेणी के जीवधारियों में प्रकृति प्रवरण का सिद्धान्त लागू होता है अर्थात् केवल वे ही प्राणी जीवित रहते हैं जो जीवन संघर्ष में विजयी रह सकें अथवा सबल हों।

किंग्सले डेविस (Kingsley Davis) ने मानव तथा पशु समाज का अन्तर स्पष्ट करने के लिये समाजों को तीन श्रेणियों में बांटा है-
  1. स्तनपायी समाज, जिसमें वह स्तनपायी जीवों और कीट-पतंगों में अन्तर स्पष्ट करता है
  2. नर-वानर समाज, जिसमें वह उच्च स्तनधारी तथा निम्न स्तनधारी जीवों में अन्तर करता है। तथा
  3. मानव समाज, जिसमें वह मानव तथा पशु समाज में अन्तर करता है।
'पशओं में समाज तो होता है किन्तु संस्कृति नहीं' (Animals have Society but no Culture)
पशुओं में समाज तो पाया जाता है तथापि संस्कृति नहीं पाई जाती है। मानव के पास भाषा और प्रतीक होते हैं। इनके माध्यम से वह विचारों का आदान-प्रदान करता है। व्यक्ति ही भाषा का प्रयोग करने की क्षमता रखता है। यह व्यक्ति और पशु में सबसे बड़ा अन्तर है। भाषा के कारण वह ज्ञानी है और संस्कृति धारक और वाहक भी है। भाषा के माध्यम से वह ज्ञान और संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाता है।
वस्तुतः भाषा और प्रतीकों के सहयोग से प्रत्येक समाज में बचपन से ही मनुष्यों को अनुभव का पुंज मिलता है और नवीन सांस्कृतिक व्यवस्था की स्थिरता तथा निरन्तरता संभव होती है। जहाँ तक पशुओं का सम्बन्ध है अधिकतर सीखना प्रयत्न और भूल से होता है और उनके कार्य सहज क्रिया के रूप में होते हैं। उनमें पिछली पीढ़ी के अनुभवों से लाभ उठाने की क्षमता नहीं पाई जाती है। संस्कृति में निर्णय और मूल्य सम्मिलित होते हैं। पशु में निर्णय करने की क्षमता नहीं होती है न उनमें मूल्य होते हैं। इसलिए उचित ही कहा गया है कि पशुओं में समाज तो होता है संस्कृति नहीं।

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