शेर शाह सूरी - शेर शाह सूरी का इतिहास | sher shah suri history in hindi

शेरशाह सूरी

हुमायूं को परास्त कर शेर 1540 ई. में शासक बना तथा उसने 1545 ई तक शासन किया। उसके उत्तराधिकारियों ने 1545 ई. से लेकर 1565 ई. तक शासक किया। 1555 ई. ने हुमायूं ने अपना राज्य पुनः प्राप्त कर लिया। शेरखां का पांच वर्ष का अल्प शासन भी भारतीय इतिहास में अत्यन्त महत्व रखता है।

शेर शाह सूरी का आरम्भिक जीवन

शेरखां का मूल नाम फरीद था। उसका जन्म 1472 ई. में होशियारपुर के पास बजवाड़ा नामक गांव में हसन खां के यहां हुआ था। उसका जन्म 1472 ई. में हुआ था, जबकि डॉ. कानूनगो के अनुसार उसका जन्म 1486 ई. में हिसार फिरोजा में हुआ था। फरीद के जन्म के बाद हसन खां जौनपुर के शासक जमाल खां के पास नौकरी करने लगा, जिसकी सिफारिश पर सिकन्दर लोदी ने हसन खां को सहसराम, खसपुर तथा टांडा के परगने जागीर में दे दिये। फरीद का बचपन सहसराम में बीता।
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हसन के चार पत्नियां तथा आठ पुत्र थे। फरीद सबसे बड़ी पत्नी का पुत्र था, जिससे हसन प्रेम नहीं करता था। वह अपनी सबसे छोटी पत्नी से प्रेम करता था। अपनी सौतेली मां से तंग आकर फरीद जौनपुर चला गया, जहां उसने अरबी व फारसी की शिक्षा प्राप्त की एवं गुलिस्तां, बोस्तां, सिकन्दरनामा आदि ग्रंथों का अध्ययन किया। वह अपनी योग्यता से जौनपुर में प्रसिद्ध हो गया। उससे प्रभावित होकर जमाल खां ने पिता-पुत्र में समझौता करवा दिया।
हसन ने फरीद को सहसराम, ख्वासपुर तथा टांडा का प्रबंधक बनाया। फरीद ने वर्तमान शाहाबाद (दक्षिणी बिहार) में स्थित इन जागीरों का बहुत अच्छा प्रबंध किया। उसने उन जागीरदारों को समृद्ध बना दिया। उसकी सफलता से जल-भुनकर उसकी सौतेली माता ने उसे जागीरों से निकलवा दिया। अब फरीद के सूबेदार दरिया खां लोहानी के पुत्र बहार खां लोहानी के पास नौकरी करने लगा। बहार खां उसकी योग्यता से बहुत प्रभावित हुआ। "एक बार जब फरीद बहार खां के साथ शिकार खेलने गया, तो उसने तलवार के एक ही वार से शेर को मार डाला। उसकी बहादुरी से प्रसन्न होकर बहार खां ने उसको शेरखां की उपाधि प्रदान की। उसके बढ़ते प्रभाव से असंतुष्ट होकर अफगान सरदारों ने बहार खां को शेरखां के विरुद्ध भड़का दिया। अतः वह आगरा जाकर 1527 ई. में बाबर की सेना में भर्ती हो गया। बाबर की सेना में रहकर वह मुगल सैन्य संगठन की विशेषताओं तथा दोषों से परिचित हो गया था। 1528 ई. में वह बाबर की नौकरी छोड़कर बिहार चला गया।

शेरशाह का साम्राज्य विस्तार

बिहार पर अधिकार
शेरखां पुनः बहार खां की सेवा में आ गया। कुछ समय बाद बहार खां की मृत्यु होने पर उसकी बेगम दूदू बीबी ने उसे बिहार का नायब सूबेदार नियुक्त किया, क्योंकि उसका पुत्र जलाल खां अभी वयस्क नहीं था। अब शेरखां अपनी शक्ति बढ़ाने लगा। उसने उच्च पदों पर अपने विश्वास पात्र अफगान सरदारों को नियुक्त किया तथा सेना को अपने विश्वास में ले लिया। लोहानी सरदारों ने उसे बिहार से भगाने का असफल प्रयत्न किया परन्तु उन्हें असफलता हाथ लगी। इसके बाद वह सम्पूर्ण बिहार का शासक बन गया। उसने चुनार के सूबेदार ताजखां की विधवा बेगम लाड मलिका से विवाह कर चुनार का दुर्ग तथा बहुत-सा धन प्राप्त किया।

बंगाल विजय
बंगाल का शासक महमूदशाह शेरखां की बढ़ती शक्ति से आशंकित था। बिहार से भागकर आये लोहानी सरदारों ने उसे शेरखां के विरूद्ध भड़काया। अतः जब हुमायूं ने शेरखां को चुनार के दुर्ग में घेर लिया था, तो उसने शेरखां को तंग किया था। अतः शेरखां ने बंगाल पर आक्रमण कर सूरजगढ़ नामक स्थान पर महमूदशाह को परास्त किया। उसे लूटमार में अपार धन मिला। डॉ. कानूनगो के अनुसार, “यदि सूरजगढ़ के युद्ध क्षेत्र में शेरखां को विजय प्राप्त न हुई होती, तो वह कभी भी भारतवर्ष के राजनीतिक क्षेत्र में न आता और न ही उसे बहादुरशाह और हुमायूं जैसे बादशाहों के साथ राज्य स्थापना की दौड़ में भाग लेने का अवसर मिलता।" महमूदशाह ने शेरखां पर आक्रमण कर दिया किन्तु शेरखां ने उसे तेलियागढ़ी तथा सीकरीगढी नामक स्थानों पर परास्त किया। शेरखां ने बंगाल की राजधानी गौड़ को घेर लिया। अतः महमूदशाह की सहायता की प्रार्थना कर हुमायूं ने बंगाल की तरफ कूच किया, किन्तु मार्ग में वह चुनार दर्ग पर विजय प्राप्त करने में लग गया। इसी बीच शेरखां ने गौड़ पर अधिकार कर सारे धन व परिवार को रोहतासगढ़ के दुर्ग में भेज दिया।

हुमायूं पर विजय
अब शेरखां ने हुमायूं से निपटने का निश्चय किया। उसने बनारस नामक स्थान पर एक समझौता किया, जो सिर्फ तीन दिन चला। समझौते का वर्णन पूर्ववर्ती इकाई में किया जा चुका है।
हुमायूं ने समझौता भंग करते हुए बंगाल पर आक्रमण कर दिया। शेरखां ने उसे बिना रोक-टोक बंगाल पर अधिकार करने दिया। हुमायूं, शेरखां की चालाकी को नहीं समझ सका। वह गौड़ में रंगरेलियों में डूब गया। इसी दौरान शेरखां ने बिहार से मुगल सेना को खदेड़ दिया एवं मुगलों के आवागमन के मार्ग काट दिये। अब वह हुमायूं से खुले युद्ध के लिए तैयार हो गया।

चौसा का युद्ध (1539 ई.)
हुमायूं की जब आंखें खुली, तब तक वह चारों तरफ से कठिनाइयों से घिर चुका था। उसने शेरखां से संधि करने का असफल प्रयत्न किया। शेरखां ने 26 जून, 1539 ई. को हुमायूं को चौसा के मैदान में बुरी तरह परास्त किया। हुमायूं जान बचाने हेतु घोड़े सहित गंगा नदी में कूद पड़ा, जहां एक भिश्ती ने उसकी प्राणरक्षा की। वह बड़ी मुश्किल से आगरा पहुंचा। डॉ, कानूनगो के अनुसार, "चौसा के युद्ध से पूर्व यदि शेरखा से बंगाल में छेड़छाड़ न की जाती, तो वह मुगलों के अधीन रहने में संतुष्ट रहता। एक ही झटके में उसने बंगाल और बिहार के साथ जौनपुर को भी अपनी स्वतंत्र राजसत्ता में कर लिया और अब वह मुगल बादशाह से भी बराबरी का दावा कर सकता था। अब शेरखां ने शेरशाह की उपाधि धारण की और बंगाल व बिहार का स्वतंत्र शासक बन गया।

कन्नौज का युद्ध (1540 ई.)
हुमायूं सेना एकत्रित करके 17 मई, 1640 ई. को शेरखां से युद्ध करने के लिये कन्नौज पहुंचा, किन्तु वह पुनः परास्त हुआ। कन्नौज विजय के बाद शेरशाह ने हुमायूं को भारत से खदेड़ दिया एवं आगरा, दिल्ली एवं पंजाब पर अधिकार कर लिया। इस तरह मुगल वंश के स्थान पर सूर वंश की स्थापना हुई।

गक्खर प्रदेश की विजय
सिन्धु और झेलम नदी के उत्तर में स्थित गक्खर प्रदेश सामरिक महत्व का प्रदेश था, क्योंकि भारत पर उत्तर-पश्चिम से होने वाले आक्रमण इसी मार्ग से होते थे। अतः शेरशाह इस प्रदेश को अहि कृत करना चाहता था। रायसारंग और आदमखां जैस गक्खर सरदारों ने शेरशाह का विरोध किया। फलस्वरूप शेरखाह और गक्खर सरदारों के बीच भीषण युद्ध हुआ। यद्यपि शेरशाह ने पूरे प्रदेश को रौंद डाला, लेकिन गक्खर सरदारों पर पूरा नियंत्रण स्थापित न कर सका। शेरशाह ने इस सीमा की रक्षा के लिये झेलम से 10 मील उत्तर की ओर एक विशाल दुर्ग बनवाया जिसका नाम भी रोहतास दुर्ग रखा। इस दुर्ग में उसने 50,000 सैनिक तैनात कर दिये। इसी काल में उसे टोडरमल जैसा योग्य अधिकारी मिला, जिसकी देखरेख में रोहतास दुर्ग का निर्माण कार्य प्रारम्भ करवाया गया। यह दुर्ग शेरशाह के उत्तराष्ट्रि कारी इस्लामशाह के काल में पूरा हुआ था। शेरशाह को इसी प्रदेश में सूचना मिली कि बंगाल के गवर्नर खिजखां ने विद्रोह कर दिया है। अत: गक्खर सरदारों को नियंत्रण में लाने का कार्य अपने सरदारों पर छोड़कर मार्च, 1541 ई. में शेरशाह बंगाल की तरफ चला गया।

बंगाल में व्यवस्था स्थापित करना
बंगाल से शेरशाह कल लम्बी अनुपस्थिति का लाभ उठाते हुए बंगाल का गवर्रन खिजखां स्वतं. होने का प्रयास करने लगा। शेरशाह को इसकी सूचना मिलने पर वह तुरन्त 1541 ई. की वर्षा ऋतु में अचानक ससैन्य गढ़ के पास आ धमका। शेरशाह के अचानक आ धमकने से खिजखां स्तम्भित रह गया और विवशतः शेरशाह का स्वागत करने आगे आया। लेकिन शेरशह ने उसे बन्दी बनाने की आज्ञा दे दी। भविष्य में ऐसे विद्रोह की पुनरावृत्ति रोकने हेतु उसने सैनिक गवर्नर का पद समाप्त कर दिया। उसने समस्त प्रान्त को अनेक सरकारों (जिलों) में विभाजन कर प्रत्येक सरकार में एक फौजी शिकदार की नियुक्ति कर दी, जो अपने क्षेत्र में शांति एवं व्यवस्था बनाये रखता था। प्रान्त के अधिकारियों पर कड़ी दृष्टि रखने तथा आपस की झगड़ों को निपटाने के लिये उसने एक काजी फजीलत नामक अधिकारी की नियुक्ति कर दी। इससे प्रान्तीय शासन का स्वरूप बिलकुल बदल गया।

मालवा की विजय
उत्तर भारत से दक्षिण की ओर जाने वाले मार्ग मालवा प्रान्त में होने के कारण तथा दिल्ली के पड़ोस में होने के कारण दिल्ली के शासक मालवा की राजनीति पर दृष्टि लगाये रहते थे। मालवा पर शेरशाह के आक्रमण के मुख्य चार कारण थे। प्रथम तो, चौसा की विजय के बाद शेरशाह ने अपनी बादशाहत की घोषणा का शाही फरमान मालवा के शासक कादिरशाह के पास भेजा तो कादित्शाह ने अपने को स्वतंत्र शासक बताते हुए उस शाही फरमान को ठुकरा दिया था। दूसरा यह कि जब कालपी के पास शेरशाह का पुत्र कुतुबखां मुगल सेना से लड़ रहा था, तब कादिरशाह ने उसकी कोई सहायता नहीं की जिसके फलस्वरूप वह पराजित होकर मारा गया था। तीसरा यह कि हुमायूं अभी भी सिंध। में भटक रहा था और मालवा की निर्बलता का वह लाभ उठा सकता था। चौथा यह कि मारवाड़ का शासक मालदेव मालवा पर अधिकार करने को उत्सुक था। अतः शेरशाह, मालदेव के पहुंचने के पहले ही मालवा अधिकृत कर लेना चाहता था। 1541 ई. में शेरशाह बंगाल से मालवा की ओर रवाना हुआ। उसने ग्वालियर पर अधिकार कर लिया और गागरोन पहुंचा जहां रायसीन के शक्तिशाली शासक पूरणमल ने पहुंचकर शेरशाह की अधीनता स्वीकार कर ली। वहां से शेरशाह सारंगपुर की ओर बढ़ा। अब कादिरशाह उज्जैन से निकला, लेकिन उसके निकलने के पहले ही शेरशाह ने सारंगपुर पर अधिकार कर लिया। कादिरशाह भयभीत होकर अपनी राजधानी माण्डू की तरफ आया। लेकिन ज्योंही शेरशाह ने मालवा पर धावा बोला, कादिरशाह का साहस टूट गया और उसने सारंगपुर पहुंचकर मालवा की सल्तनत शेरशाह को समर्पित कर दी। कादिरशाह को मालवा के बदले अन्य जागीर दी गई, लेकिन उसे यह जागीर पसन्द न होने के कारण एक रात वह अपने परिवार सहित गुजरात की तरफ भाग गया। इस प्रकार मालवा में साहसहीन व निर्बल कादिरशाह की सत्ता क्षण भर में समाप्त हो गयी। मालवा से शेरशाह रणथम्भौर की ओर बढ़ा, जहां के किलेदार उस्मानखों ने रणथम्भौर का दुर्ग बिना किसी प्रतिरोध के शेरशाह को समर्पित कर दिया।

रायसीन की विजय
मध्य भारत में रायसीन का शासक पूरनमल ने हुमायू के कल में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थिति में प्राप्त कर ली थी। उसने चन्देरी पर विजय प्राप्त कर ली थी तथा प्राचीन सामन्ती मुस्लिम परिवारों को बेघरबार कर उनकी स्त्रियों को नर्तकियों का पेशा अपनाने को विवश कर दिया था। मालवा के सैयदों की स्त्रियों को अपनी रखैले बना लिया था। यद्यपि 1542 ई. में पूरनमल ने शोहरशाह की अधीनता स्वीकार कर ली थी, लेकिन मुसलमानों के प्रति पूरनमल के व्यवहार को देखते हुए शेरशाह उसे सजा देना चाहता था। 1543 ई. में शेरशाह ने रायसीन को घेर लिया और यह घेरा कई दिनों तक चलता रहा। शेरशाह ने किले की रसद को रोक लिया, लेकिन राजपूत राजा और उसके आदमियों की जान-माल की सुरक्षा का आश्वासन दिया तो पूरनमल ने आत्मसमर्पण कर दिया और उसे शेरशाह ने समीप ही एक खेमें में ठहरा दिया गया। शेरशाह अपने वचन का पालन करना चाहता था, लेकिन चन्देरी की उन मुस्लिम विधवाओं की प्रार्थना पर, जिन्हें पूरनमल ने कष्ट दिये थे, उसने अपना वचन भंग कर दिया और राजपूत खेमे के चारों ओर सेनाएं तैनात कर दी। जब दिन निकला तो पूरनमल स्थिति समझ गया और उसने अपनी स्त्रियों को अपने ही हाथों से कत्ल कर दिया। जब राजपूत अपनी स्त्रियों की हत्या में लगे हुए थे, अफगान उन पर टूट पड़े। राजपूत बड़ी वीरता से लड़े, लेकिन उनका एक भी आदमी जीवित नहीं बचा। जो राजपूत स्त्रियां व बच्चे जीवित बच गये थे उन्हें गुलाम बना लिया गया। राजपूतों के प्रति यह विश्वासघात शेरशाह के उज्ज्वल चरित्र को कलंकित करने वाला एक धब्बा है।

मुल्तान और सिन्ध की विजय
शेरशाह ने गक्खर प्रदेश में खवासखां और हैबातखां को तैनात किया था, लेकिन इनमें आपस में मनमुटाव होने के कारण खवसखां को वहां से हटा दिया और हैबातखां को प्रान्त का गवर्नर बना दिया। हैबातखां को फतहखां जाट और फतहखां देदई से सामना करना पड़ा। इन दोनों विद्रोही सरदारों का दमन करने 1543 ई. की शरद ऋतु में हैबातखां, लाहौर होता हुआ सतगढ़ा नामक स्थान पर पहुंचा। भयभीत होकर फतहखां जाट अपने कुटुम्ब को लेकर भागा ओर फतहपुर के पास एक मिट्टी के दुर्ग में शरण ली। यहां से उसने सन्धि का प्रस्ताव भेजा। हैबातखां ने उसे सुरक्षा का आश्वासन दिया, लेकिन ज्योंही उसे हैबातखां के पास लाया गया, हैबातखां ने उसे बन्दी बना लिया। किन्तु उसका एक साथी सीदू बलूच वहां से भाग और फतहखां दोदई व उसके आदमियों को इसकी सूचना दे दी। फतहखां के आदमी अपने स्त्री बच्चों को कत्ल कर सीदू बलोच के नेतृत्व में अफगान सेना को चीरते हुए निकले, लेकिन वे पकड़े गये। इस प्रकार हैबातखां ने मुल्तान को पूरी तरह जीत लिया।
सिन्ध में भक्खर और सेहवान के दुर्ग प्रसिद्ध थे। शाह हुसैन अरघून ने महमूद भक्खरी को भक्खर दुर्ग पर तैनात किया था। 1542 ई. के अंत में हुमायूं ने थट्टा पर आक्रमण किया था, तब शाह हुसैन ने महमूद भक्खरी को ठट्टा बुला लिया। जब अफगानों को इसकी सूचना मिली तब हैबातखां ने भक्खर पर आक्रमण कर उसे जीत लिया। सिन्ध विजय शेरशाह के लिये महत्वपूर्ण सिद्ध हुई। अब शेरशाह को मारवाड़ में घुसने का मार्ग मिल गया था।

मारवाड़ पर विजय
मारवाड़ का शासक मालदेव में केवल मध्य भारत का प्रमुख जिा था बल्कि श्रेष्ठ सैनिक और कुशल कूटनीतिज्ञ भी था। उसने मारवाड़ के आसपास के क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया तथा बीकानेर के राव कल्याणमल को पराजित कर उसके आधे से अधिक राज्य पर अधिकार कर लिया था। 1541 ई. में उसने हुमायूं को भी सहायता देने की पेशकश की थी, लेकिन हुमायूं ने मालदेव से उस समय सहायता मांगी जब शेरशाह ने उत्तरी भारत के अधिकांश भूभागों पर अधिकार कर लिया था। इस समय शेरशाह ने भी मालदेव को कहलवाया कि वह हुमायूं को शरण अथवा सहायता न दे तथा उसे बन्दी बनाकर शेरशाह को सौंप दे। मालदेव ने तात्कालिक परिस्थितियों में तटस्थ रहना ही उचित समझा। अतः उसने हुमायूं को सैनिक सहायता का कोई वचन नहीं दिया। इधर जब हुमायूं के दूत ने जोधपुर में शेरशाह के दूत को देखा तो उसे किसी षड़यंत्र की योजना समझ कर हुमायूं को सूचित कर दिया। फलस्वरूप हुमायूं सिन्ध की तरफ चला गया। चूंकि मालदेव ने हुमायूं को बंदी नहीं बनाया, इसलिए शेरशाह मालदेव से नाराज हो गया। इधर बीकानेर का राव कल्याणमल, जो मालदेव से पराजित हो चुका था, शेरशाह से जा मिला और उसे मालदेव पर आक्रमण करने हेतु प्रोत्साहित करता रहा। फिर मालदेव जैसा शक्तिशाली शासक शेरशाह के लिए असहनीय था। अतः दोनों में संघर्ष अवश्यंभावी था।
1543 ई. के अंत में रायसीन विजय के बाद शेरशाह ने मारवाड़ को जीतने का निश्चय कर 80 हजार सैनिकों के साथ मारवाड़ पर चढ़ाई कर दी। जब शेरशाह मेवाड़ नामक स्थान पर पहुंचा तब मालदेव भी अपने 40 हजार सैनिक लेकर शेरशाह का मुकाबला करने चल पड़ा। दोनों की सेनायें जैतारण के पास सुमेल नामक स्थान पर एक माह आमने-सामने पड़ी रही। मारवाड़ जैसे बंजर क्षेत्र में शेरशाह के लिए रसद आदि एकत्र करना कठिन हो गया। ऐसी विकट परिस्थितियों में शेरशाह ने एक कूटनीतिक चाल चली। उसने राठौड़ सरदारों की ओर से एक जाली पत्र लिखवाया कि राठौड़ सरदार अपने राजा को बंदी बनाने का वचन देते हैं, और यह पत्र मालदेव के शिविर में डलवा दिया। इस पत्र को देखते ही मालदेव को अपने ही सरदारों से विश्वासघात की आशंका हुई और उसने युद्ध न करने का निश्चय किया। लेकिन जैता और कूपा नामक राठौड़ सरदारों ने अपने 12 हजार आदमियों को लेकर अफगान सेना पर टूट पड़े ताकि उनके विश्वासघाती होने का कलंक मिट सके। यद्यपि राठौड़ राजपूतों ने अपनी अद्भुत वीरता का परिचय दिया किन्तु मुट्ठी भर राजपूत 80 हजार अफगानों के सामने न टिक सके। एक-एक राजपूत लड़ते-लड़ते कट मरा। यद्यपि मालदेव के सामने सच्चाई आ गयी, किन्तु तब तक राजपूत सेना पूरी तरह बिखर चुकी थी। शेरशाह राजपूतों के शौर्य को देखकर दंग रह गया, क्योंकि मुट्ठी भर राठौड़ों ने भी उसे काफी क्षति पहुंचायी थी। उसे विवश होकर कहना पड़ा कि, "एक मुट्ठी भर बाजरे के लिए वह अपना साम्राज्य खो बैठा था।" मालदेव यहां से सिवाना चला गया। अजमेर से आबू तक का क्षेत्र शेरशाह के अधिकार में आ गया। मारवाड़ की व्यवस्था का दायित्व खवासखां व ईसा खां को सौंपकर शेरशाह चित्तौड़ की ओर चला गया।
मारवाड़ पर अफगानों का अधिकार अधिक समय तक नहीं रह सका। शेरशाह की मृत्यु के दो महीने के अंदर ही मालदेव ने जुलाई 1545 ई. में पुन: मारवाड़ पर अधिकार कर लिया।

मेवाड़ विजय और राजस्थान पर नियंत्रण
राणा सांगा की मृत्यु के बाद मेवाड़ में अव्यवस्था और अराजकता फैल गई थी। इसी अव्यवस्था के काल में बनवीर अपने पुत्र की बलि देकर राजकुमार को बचा लिया था। 1542 ई. में शिशु उदयसिंह मेवाड़ की राजगद्दी पर बैठा। 1544 ई. की वर्षा ऋतु में शेरशाह ने मेवाड़ पर चढाई कर दी। राणा उदयसिंह अल्पवयस्क था तथा उसके सरदारों में अफगानों का सामना करने का साहस नहीं था। अतः जब शेरशाह चित्तौड़ से केवल 24 मील दूर था, दूर्ग-रक्षक दुर्ग की चाबियां लेकर शेरशाह के पास गया और चाबियां उसे सौंप दी। अब शेरशाह कुम्भलगढ़ की ओर गया और बिना किसी विरोध के उस पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार बीकानेर और जैसलमेर को छोड़कर राजस्थान का अधिकांश भाग अफगान सत्ता के अधीन आ गया।
कानूनगो ने लिखा है कि शेरशाह ने राजस्थान के शासकों की स्वतंत्रता को पूर्णतः समाप्त नहीं किया, बल्कि उनके राज्यों को उन्हीं के अधिकार में रहने दिया। शेरशाह की यह नीति थी कि राजस्थान की रियासतों का राजनैतिक पृथक्कीकरण रहे ताकि वे अफगानों के विरूद्ध संगठिन न हो सके। अतः राजस्थान के महत्वपूर्ण मार्गों पर नियंत्रण रखने के लिए शेरशाह ने राजस्थान के महत्वपूर्ण स्थानों पर अपनी चौकियां स्थापित कर दी।

कालिंजर की विजय
शेरशाह ने रीवा के राजा वीरभान बघेला को दरबार में बुलाया था, लेकिन वह शेरशाह ने भयभीत होकर कालिंजर के राजा कीरतसिंह के यहां शरण ले ली। शेरशाह ने कीरतसिंह से मांग की कि वह वीरभान को उसे सौंप दे, लेकिन कीरतसिंह ने इस मांग को ठुकरा दिया। अतः राजस्थान अभियान के बाद नवस्बर 1544 ई. में शेरशाह कालिंजर गया और दुर्ग को घेर लिया। यह घेरा लगभग एक वर्ष तक चलता रहा, किन्तु दुर्ग पर अधिकार न हो सका। अंत में दुर्ग की दीवारों को बारूद से उड़ाने का जाल बिछा दिया और इतना ऊंचा दुर्ग तैयार किया कि दुर्ग का भीतरी भाग स्पष्ट दिखाई दे। 22 मई 1544 को आक्रमण की आज्ञा दे दी गई। शेरशाह स्वयं बुर्ज पर चढ़ गया और बारूद का एक पतीला दुर्ग के भीतर फेंका, किन्तु वह पतीला दुर्ग की दीवारों से टकरा गया और बारूद के ढेर में, जहां शेरशाह खड़ा था, आ गिरा जिससे भयंकर विस्फोट हुआ। इस विस्फोट में शेरशाह बुरी तरह जल गया, अतः उसे शिविर में लाया गया। शेरशाह ने आक्रमण जारी रखने का आदेश दिया। अफगानों का आक्रमण सफल रहा और उन्होंने दुर्ग पर अधिकार कर लिया। जब इस विजय की सूचना शेरशाह को दी गई तो उसका चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा। इसके तुरन्त बाद उसकी मृत्यु हो गयी।

शेरशाह का प्रशासन

केन्द्रीय शासन व्यवस्था
शेरशाह के समय में केन्द्रीय सरकार भली प्रकार से संगठित थी। राजा तथा मंत्री केन्द्रीय सरकार के संचालक थे। कार्य कुशलता के लिए केन्द्रीय सरकार को कुछ विभागों में बांट दिया गया था ताकि शासन ठीक प्रकार से चल सके। शेरशाह एक निरंकुश सम्राट था। वह असीम शक्तियों का स्वामी था। सच तो यह है कि वह स्वयं ही कानून बनाता और लागू करता था। निःसंदेह उसके पास मंत्री थे, परन्तु वह मंत्री आजकल के मंत्रियों की भांति नहीं थे। न तो वे कोई कानून बनाने की सलाह दे सकते थे न किसी कानून को लागू करने का परामर्श । वह प्रायः राजा से आज्ञा मांगते थे। शेरशाह, फ्रांस की क्रांति से पूर्व राजाओं की भांति एक सम्राट था। वह वास्तव में 'पृथ्वी पर ईश्वर की छाया था और किसी भी मानवीय शक्ति के प्रति उत्तरदायी नहीं था। इतना होते हुए भी वह अपने से पूर्व राजाओं की भांति निरंकुशता नहीं करता था। ईश्वरीप्रसाद के शब्दों में, यद्यपि शेरशाह की सरकार निरंकुश थी तथापि प्रबल व्यवहार पक्षपात से विमुक्त थी।' श्रीवास्तव भी इस बात की पुष्टि करते है। वह एक परोपकारी राजा था। वह अपनी प्रजा के सुख-सुरक्षा में रूचि रखता था। वह लोगों के हित सम्बन्धी कार्यो में रूचि लेता था। वह स्वयं कहा करता था, 'महापुरुषों को सदैव सक्रिय रहना ही शोभा देता है वह अपनी महानता को अपनी पदवी से प्रकट न करके लोगों की भलाई से प्रगट करें। शेरशाह रात्रि के तीसरे पहर उठता था। स्नान तथा नमाज से निवृत्त होकर, राज्य कार्य में व्यस्त हो जाता था। कहा जाता है कि तीन घण्टे तक कार्य करने के पश्चात वह सुबह की नमाज पढ़ता था तत्पश्चात् वह सेना का निरीक्षण करता इसके बाद दरबार लगाता था जिसमें वह लोगों की शिकायतें सुनना और अपना निर्णय देता था। दोपहर में थोड़ा विश्राम करता इसके पश्चात् वह स्वयं कुरान का पाठ करता था। संध्या के समय विद्वानों के साथ रहता। रात को पुनः कार्य में व्यस्त हो जाता था। यदि हम उनकी दिनचर्या को देखें तो भली भांति ज्ञात हो जाएगा कि वह एक कठोर परिश्रमी तथा प्रजा हितैषी तथा अपने से पूर्व राजाओं से भिन्न शासक था।

मंत्री
एक विशाल साम्राज्य का शासन करने के लिए मंत्रियों की सहायता लेना अनिवार्य होता है। कोई भी व्यक्ति कितना भी महान हो उसका अकेले कार्य करना दुकर है। शेरशाह ने भी राज्य कार्यों को सुचारू रूप से चलाने के लिए मंत्री नियुक्त किए हुए थे। उनका मुख्य कार्य राजा की आज्ञाओं का पालन करना था उनके पास किसी प्रकार के अधिकार नहीं थे। शेरशाह के पास चार मुख्य तथा दो गौण विभाग थे मुख्य विभाग में-
  • दीवाने वजारत
  • दिवाने आरिज
  • दिवाने रसातल
दिवाने इंशा थे जो दीवान (मंत्री) के द्वारा चलते थे शेरशाह के गौण विभागों में दिवाने कज़ा तथा दिवाने बरीद के नाम मिलते हैं।

दिवाने वजारत
के मंत्री को वजीर कहा जाता था। यह राजस्व तथा वित्त-सम्बन्धी विभाग था। वजीर राज्य की आमदनी तथा व्यय का लेखा-जोखा रखता था वजीर दूसरे विभागों का निरीक्षण भी कर सकता था। कभी-कभी शेरशाह स्वयं आमदनी तथा व्यय के हिसाब को देखता था।

दिवाने आरिज
यह विभाग सैनिक-मंत्री के अधीन था। यद्यपि हम इस विभाग के मंत्री को सेनापति नहीं कह सकते, तथापि वह सेना की भरती करता था। सेना का संगठन तथा उसे नियमपूर्वक चलाना भी उसी का ही काम था। सेना को वेतन देने का कार्य भी इसी विभाग का था। शेरशह स्वयं एक महान सैनिक था अतः वह इस विभाग का निरीक्षण किया करता था। कानूनगो कहते हैं, 'शेरशाह स्वयं ही कमान्डरल्ड्न चीफ तथा पे मास्टर जनरल था।'

दीवाने रसातल
यह विदेश मंत्री के अधीन होता था। वह राजा के निर्देश के अनुसार दूसरे देशों में दूत भेजता था वह अन्य देशों के साथ कूटनीतिज्ञ सम्बन्ध स्थापित करता था। कभी-कभी दान विभाग भी इसी के संरक्षक में रहता था। वह बाहर से आने-जाने वाले विदेशी व्यक्तियों पर भी नियंत्रण रखता था।

दीवाने इंशा
यह विभाग भी मंत्री के अधीन होता था। इसकी कार्यवाही घोषणा की रूपरेखा तैयार करना, शेरशह की ओर से पत्र लिखना और सरकारी आलेखों को संभालना तथा भेजना होता था। यही मंत्री सरकार की ओर से किए गए निर्णयों को प्रान्तीय शासकों तक भिजवाता था।

दीवाने कजा
इस विभाग को भी मंत्रालय समझा जाता था। यह मुख्य काजी के अधिकार में था। वह न्याय करने के साथ, छोटी अदालतों से आए हुए प्रार्थना पत्रों को भी देखता था और अपना निर्णय देता था। न्याय विभाग उसी के नियंत्रण में कार्य करता था।

दीवाने बरीद
यह गुप्तचर विभाग का मुखिया था। राज्य में प्रत्येक महत्वपूर्ण घअनाओं से राजा को सूचित करना इसी विभाग का काम था। इस विभाग के अंतर्गत बहुत से गुप्तचर तथा गुप्त सिपाही थे। यह सभी महत्वपूर्ण स्थानों पर नियुक्त किए हुए थे। डाक का कार्यभार भी इसी को सौंपा गया था।

इन विभागों के अतिरिक्त शाही महल में खाने-सामान भी नियुक्त था। इसे मंत्री की पदवी नहीं दी गई थी। शाही कारखाने भी इसके आधीन थे। महल में नौकरों की देख-रेख करना भी इसी का कार्य था। राजा के साथ अधिक समीप रहने के कारण इसका सम्मान किसी मंत्री के कम नहीं था।

प्रान्तीय शासन

शेरशाह ने राज्य प्रबंध की कुशलता के लिए राज्य को भागों तथा उपभागों में बांटा हुआ था। इतिहासकारों में शेरशाह के राज्य के बटवारे के विषय में अनेक मत है। कानूनगो कहते हैं कि शेरशाह ने राज्य को प्रान्तों में बटवाने की नीति का त्याग कर दिया गया। उसने प्रान्तों के बजाय राज्य को सरकारों में बांटा था। राज्य को प्रान्तों में बटवाने का श्रेय अकबर को ही है। सर-वून्जले हैग भी इसी मन की पुष्टि करते हैं जब वह कहते हैं, 'प्रत्येक सरकार या राजस्व-जिले में मुख्य-शिकदार नियुक्त थे। परन्तु डॉ. परमात्मा शरण इसके बिल्कुल विपरीत मत प्रकट करते हैं। उनका विचार है कि शेरशाह के राज्य की सबसे बड़ी शासकीय इकाई प्रान्त थी और उसका राज्य ऐसी बारह इकाइयों में विभक्त था। यह प्रान्त सैनिक गवर्नर के अधीन थे। ईश्वरी प्रसाद का विचार है 'शेरशाह ने अपने राज्य को 47 भागों में बांटा हुआ था। प्रत्येक भाग बहुत से परगनों को मिलाकर बनाया गया था। अबुलफजल का कहना है कि बंगाल की 19 सरकारों को मिलाकर शेरशाह के राज्य में सरकारों की कुल संख्या 66 थी। श्रीवास्तव अपना अलग ही मत प्रकट करते हैं। वह कहते हैं 'सल्तनत काल से लेकर, शेरशह तथा उसके पुत्र इस्लाम शाह के राज्यकाल में, प्रशासकीय भाग थे जिनका रूप एक समान नहीं था। इन्हें सूबा अथवा प्रान्त नहीं कहते थे बल्कि इक्ता के नाम से पुकारते थे। इनके राज्यपाल बादशाह के या तो निकट के रिश्तेदार या फिर बहुत ही अधिक विश्वास पात्र अधिकारी होते थे। प्रान्त की सब तरह की सैनिक अथवा असैनिक व्यवस्था राज्यपाल के द्वारा की जाती थी।'

मुख्य शिकदार
'सरकार' का सैनिक अधिकारी था जिसके अधीन दो हजार से लेकर पांच हजार तक सैनिक होते थे। वह कानून-व्यवस्था बनाए रखने का जिम्मेदार समझा जाता था। शांति बनाए रखना, विद्रोहों का कुचलना, सड़कों और जनपथों पर चौकसी रखना स्थानीय अधिकारिये की सहायता करना, परगनों में शिकदारों की कार्य व्यवस्था देखना इसी का काम होता था। फौजदारी मुकदमों का फैसला भी यही करता था। यह पद किसी विश्वसनीय व्यक्ति को दिया जाता था।

मुख्य मुन्सिफ
तारीखे शेरशाही के लेखक अब्बासखां के अनुसार 'सरकार' में एक असैनिक मुख्य मुन्सिफ अधिकारी भी नियुक्त किया जाता था। अब्बासखां के अनुसार मुख्य–मन्सिफ मुख्य शिकदार से कम महत्वपूर्ण था। शेरशाह मसनदऐ-अली-ईसा खां सारवानी को सम्मान की दृष्टि से देखता था। शेरशाह ने उसे 5,000 सवार की पदवी दी बाद में उसे सम्भल का मुन्सिफ नियुक्त कर दिया।
यदि हम अब्बासखां के कथन को देखें तो हमें यह मानना पड़ेगा कि सारवानी, नासिरखां, जो कि सम्भल का फौजदार था, के अधीन था। परन्तु अन्य स्थान पर अब्बासखां स्वयं ही लिखता है कि सारवानी को नासिरखां के अधीन नहीं लगाया गया था क्योंकि शेरशाह नासिरखां की क्रूर नीति से रूष्ट था। फिर शेरशाह जो कि परोपकारी था, लोगों की प्रार्थना को दबा नहीं सकता था। सारवानी के अनुसार शेरशाह स्वयं मुख्य-मुन्सिफ और मुख्य शिकदार अधिकारियों की सीमा निर्धारित करता था।
उपरोक्त तथ्यों से यह विदित होता है कि मुख्य-शिकदार के पास सैनिक शक्ति होती थी। उसका कार्य राज-विद्रोहों को, जमींदारों को परगावों के शिकदरों के व्यवहार की निगरानी करना दण्ड देना तथा मुख्य-मुन्सिफ द्वारा घोषित अपराधियों को दण्ड देता था। जबकि मुख्य-मुन्सिफ का कार्य शांति बनाये रखना था। संभवतः मुख्य शिकदार मुख्य-मुन्सिफ के साथ अदालत में स्थान ग्रहण करता था।
मुख्य–शिकदार तथा मुख्य–मुन्सिफ के कार्य में सहायता के लिये बहुत से कर्लक तथा अन्य व्यक्ति हुआ करते थे। ये अपना वेतन तथा भत्ते प्रान्त की वार्षिक आय से लेते थे।
शेरशाह ने मुख्य–शिकदार तथा मुख्य–मुन्सिफ दोनों को ही संयुक्त रूप से सरकार के प्रति उत्तरदायी नियुक्त किया हुआ था। उन दोनों का कर्तव्य था कि वह परस्पर सहयोग की भावना रो, सरकार में शांति व्यवस्था बनाये रखें।

परगना की शासन व्यवस्था

अब्बासखां के अनुसार प्रत्येक सरकार, परगनों में विभक्त थी। परगना राज्य की सबसे छोटी शासकीय इकाई थी। राज्य में कुल 1,13,000 परगने थे। (दाउदी) के अनुसार न तो यह परगने थे और न ही गांव बल्कि यह संख्या सारे परगने जो खालसा जमीन के आधीन थे, सवारों की थी। कानूनगों का मत है कि यह संख्या गांवों की है। ईश्वरी प्रसाद भी इसी कथन से सहमत हैं। परगनों का शासन-प्रबंध मुख्यतः शिकदार तथा मुन्सिफ चलाते थे परन्तु उनके कार्य में सहायता के लिये अन्य कर्मचारी भी होते थे।

शिकदार
शिकदार का मुख्य काम था शाही फरमानों को कार्यान्वित करना, परगने में शांति व्यवस्था को बनाए रखना, चोरों, डाकुओं और विद्रोहियों को सख्ती से कुचलना। अपराधियों के मुकदमों का निर्णय करना मुन्सिफ के कार्य में सहायता करना। यह पद किसी कुलीन वंश के शिक्षित व्यक्ति को ही दिया जाता था।

मुन्सिफ
इक्तेदार हुसैन सिद्दकी के अनुसार मुन्सिफ सम्मानीय वंश से होते थे। उन्हें मुस्लिम शिक्षाओं का पूर्ण ज्ञान होता था। मुस्ताकी कहता है कि प्रत्येक परगने में एक मुन्सिफ नियुक्त किया जाता था। अब्बासखां लिखता है कि मुन्सिफ राजस्व विभाग का अध्यक्ष होता था। वह सरकार के मुख्य मुन्सिफ के आधीन कार्य करता था। वह किसानों से सीधा सम्पर्क रखता था। वह भूमि की पैदाइश भी करवाता था। कृषकों को समय पर ही अपने परगने का कर स्थानीय कोष में जमा करवाना पड़ता था। यदि वह समय पर कर न दे पाते तो, मुन्सिफ उन्हें दण्ड भी दे सकता था। वह अपने अधीन कर्मचारियों के कार्य का निरीक्षण करता था।

खजाँची और कारकुन
परगनें में एक खजांची भी होता था। उसका मुख्य कार्य रकमें वसूल करना तथा एकत्रित धनराशि के सम्बन्ध में शिकदार को सचित करना था। यही खजाने का अध्यक्ष होता था। उसके फोतेदार भी कहते थे। शेरशाह ने प्रत्येक परगने में दो कारकुन अर्थात् लिपिक नियुक्त किए थे। उनमें से एक हिन्दी में तथा दूसरा फारसी भाषाओं में रिकार्ड रखता था ताकि किसानों को असुविधा न हो। फसलों के रिकार्ड भी यही बनाते थे। मुन्सिफ के कार्य में भी यही सहायता करते थे। तात्पर्य तो यह है कि भूमि तथा भूमि के सम्बन्ध में लेखा-जोखा इन्हीं के पास होता था।

ग्रामीण शासन व्यवस्था

कुछ एक का कहना है कि परगना और ग्राम में कोई अन्तर नहीं था। परन्तु आर.पी. त्रिपाठी के अनुसार, परगना और ग्राम बिलकुल भिन्न हैं ग्राम और परगना को यदि एक दूसरे के समीप लायें तो हमें विदित होगा कि गांव ही शासन व्यवस्था की सबसे छोटी इकाई है। प्रत्येक गांव में मुकदमा होता था। ताराचंद के अनुसार इन्हें मुख्य या पटेल भी कहते थे। यह कृषकों से राजस्व एकत्रित करके राज्य के खजाने में जमा करवा देते थे। इसके अतिरिक्त ग्राम में पटवारी तथा चौकीदार भी नियुक्त होते थे। पटवारी भूमि-आय का लेखा-जोखा रखता था। चैकीदार इसकी सहायता के लिये होता था।
सच तो यह है कि शेरशाह ने ग्रामों की आंतरिक स्वतंत्रता बनाये रखने की चेष्टा की। उसने ग्रामों को पंचायतों के आधीन ही रहने दिया। पंचायतों में ग्राम के वृद्ध साहूकार, शास्त्री आदि व्यक्ति होते थे। पंचायतों का कार्य गांव की सुरक्षा, सफाई आदि का प्रबंध करना होता था। यही झगड़ों आदि पर अपना निर्णय देते थे। तभी तो ताराचंद ने भी कहा है कि वह स्वयं ही पुलिस तथा जज होते थे। उसने ग्रामीण जनता को अपनी उपज बेचने तथा आवश्यकता की वस्तुओं का क्रय करने के लिए प्रत्येक दस गांवों का एक मण्डल बनाया था। इन गांवों के लिए सप्ताह में एक दिन बाजार लगता था जहां सभी ग्रामीण क्रय-विक्रय के लिए आते थे।

भूमि-प्रबंध

शेरशाह के शासक बनने से पूर्व भूमि-प्रबंध अव्यवस्थित था। भूमि की पैमाइश तथा वर्गीकरण के बारे में निश्चित नियम का अभाव था। लगान की दर भी नियत नहीं थी। डॉ. एस.आर. शर्मा के अनुसार, “प्रत्येक परगने में एक कानूनगों होता था, जिससे परगने की पूर्व, वर्तमान और भावी स्थिति का परिचय मिल जाता था।" मुस्लिम सम्राटों एवं हिन्दू मुकद्दमों के शोषण से किसानों की स्थिति शोचनीय थी। शेरशाह ने इन दोषों को दूर करते हुए भूमि-प्रबंध को प्रजा हितैषी, कुशल एवं सुदृढ़ बनाया। डॉ. ईश्वरी प्रसाद के अनुसार, “शेरशाह का भूमि-प्रबंध मुगलों के लिये एक बहुमूल्य बपौती थी।

भूमि-प्रबंध की विशेषताएं
शेरशाह के भूमि-प्रबंध की प्रमुख विशेषताएं निम्न थीं-
  • शेरशाह ने अपने साम्राज्य में प्रत्येक किसान की कृषि योग्य भूमि की पैमाइश करवा कर उसका रिकार्ड रखा। भूमि की पैमाइश करने वालों को पर्याप्त वेतन दिया जाता था, ताकि वे किसानों का शोषण न कर ईमानदारी से कार्य करें।
  • शेरशाह ने भूमि को तीन श्रेणियों-उत्तम, मध्यम तथा निम्न में विभाजित किया था। डॉ. पी. सरन के अनुसार, "भूमि-कर उपज का 1/3 भाग तथा डॉ. कानूनगों के अनुसार 1/4 भाग लिया जाता था। इसके अतिरिक्त कृषकों से जरीबाना (पैमाइश करने वालों की फीस) तथा महसीलाना (कर इकट्ठा करने वालों की फीस) के रूप में भूमि कर का 21/2 से 5 प्रतिशत तक लिया जाता था।
  • भूमि कर नकद तथा जिंस (अनाज) दोनों रूपों में चुकाया जा सकता था।
  • किसानों की सुविधा हेतु दो सरकारी-पत्र तैयार लिये जाते थे-पट्टा एवं कबूलियत । पट्टे पर किसान की भूमि का माप, खेतों की स्थिति एवं भूमि कर का वर्णन होता था। यह पत्र किसानों को दे दिया जाता था तथा उनसे कबूलियत नामक पत्र पर हस्ताक्षर करवा लिए जाते थे।
  • शेरशाह ने भूमि-कर की बटाई या गल्ला बख्शी, कनकूत तथा जब्ती प्रणाली को अपनाया। बटाई प्रणाली में कुल उपज को चौधरी एवं सरकारी कर्मचारियों के समक्ष तीन भागों में विभक्त किया जाता था। एक भाग सरकार को एवं दो भाग किसान को मिलते थे। कनकूत प्रणाली में फसल की कटाई से पहले अनुमान द्वारा कर नियत कर दिया जाता था और फसल की कटाई के बाद वह ले लिया जाता था। जब्ती प्रणाली (ठेला व्यवस्था) में किसान सरकार को प्रति बीघा की दर से कुछ वर्षों के लिए कर देता था। उपज के कम या अधिक होने पर भी कर की दर में परिवर्तन नहीं होता था।
  • शेरशाह ने किसानों की भलाई के लिए कुछ नियम भी बनाये। उसने राजस्व कर्मचारियों को किसानों के साथ अच्छा व्यवहार करने तथा उन पर अधिक कर न लगाने का आदेश दिया, किन्तु साथ ही सार वसूली में नरमी न दिखाने की भी आज्ञा दी। सैनिकों को अभियान के दौरान फसलों को नुकसान न पहुंचाने का आदेश दिया। इन आदेशों का उल्लंघन करने वाले को दण्डित किया जाता था। प्राकृतिक विपदा से फसलों को हानि पहुंचने पर कृषकों को सहायता दी जाती थी। कृषकों की सुविधा हेतु फरमान फारसी के साथ हिन्दी में भी जारी किए जाते थे। डॉ. कानूनगो के अनुसार, “यदि शेरशाह एक या दो दशाब्दी और जीवित रहा होता तो यहां जमींदारों की जमात समाप्त हो गयी होती और हिन्दुस्तान अथक परिश्रमी किसानों द्वारा जोते जाने वाला झाड़ी, घास–विहीन एक विस्तृत उपजाऊ भू-प्रदेश होता।"
इस भूमि प्रबंध में भी कुछ दोष अवश्य थे। कृषकों को उपज का काफी भाग कर के रूप में चुकाना पड़ता था। राजस्व कर्मचारी रिश्वतखोर होते थे। राज्य के कई हिस्सों में जागीरदारी-प्रथा का भी प्रचलन था। उपज से कम या अधिक कर लेने की शिकायतें अक्सर सम्राट् के पास आती थीं।

सैन्य-प्रबंध

शेरशाह एक योग्य शासक था। वह सैन्य-संगठन की महत्ता जानता था। अतः उसने अपने सुधारों द्वारा सैन्य संगठन को अत्यन्त कुशल बना दिया। डॉ. कानूनगो के अनुसार, "शेरशाह ने अलाउद्दीन की सैनिक प्रणाली को पुनर्जीवित करके वास्तविक रूप में सेना को शाही संस्था बना दिया।'' शेरशाह ने कुछ ऐसे सैन्य सुधार भी किये थे, जिन्हें अलाउद्दीन नहीं कर पाया था।
शेरशाह की सेना के सम्बन्ध में निश्चितता के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता। समकालीन लेखकों के अनुसार उसकी सेना में 1 1/2 लाख घुड़सवार, 25 हजार प्यादे (पैदल) एवं पांच सौ हाथी थे। इसके अलावा सूबेदारों एवं स्थानीय अधिकारियों के पास एक लाख घुड़सवार तथा पांच हजार प्यादे थे। सेना लई भागों में विभाजित थी। प्रत्येक भाग का प्रधान एक सेनापति होता था। शेरशाह के पास कुशल तोपखाना भी था। सैनिक धनुष तथा तोड़ेदार बन्दूक से लड़ते थे।
सैनिकों की भर्ती स्वयं सम्राट करता था। उन्हें योग्यतानुसार वेतन दिया जाता था। शेरशाह ने भी अलाउद्दीन के समान प्रत्येक घोड़े को दागने तथा प्रत्येक सैनिक का हुलिया सरकारी रिकार्ड में रखे जाने की प्रथा को पुनः प्रचलित किया। शेरशाह ने अपनी सेना में कड़ा अनुशासन स्थापित किया। डॉ. कानूनगो के अनुसार, "शेरशाह के शिविर का अनुशासन इतना कड़ा था कि केवल एक ही अभियान में भाग लेने वाला एक अनाड़ी सैनिक कुशल योद्धा बन जाता था।"
फसलों को नुकसान पहुंचाने पर सैनिकों को दण्डित कया जाता था। सैनिकों को वेतन नकद दिया जाता था। अधिकारियों को वेतन के बदले जागीरें दी जाती थीं। शेरशाह द्वारा सैनिकों को योग्यता के आधार पर पदोन्नति दी जाती थी, किन्तु अफसरों की सिफारिश का भी महत्व था।

पुलिस-प्रबंध

शेरशाह का पुलिस-प्रबंध भी बड़ा कुशल था। उसने पुलिस-प्रबंध द्वारा राज्य में व्यवस्था स्थापित की। उसके पुलिस-प्रबंध की आज भी प्रशंसा की जाती है। उसके पुलिस-प्रबंध की प्रमुख विशेषतायें निम्नलिखित थीं
डॉ. ए.एल. श्रीवास्तव के अनुसार, शेरशाह के समय सेना ही पुलिस का कार्य भी करती थी। परगने में शिकदार एवं केन्द्र में मुख्य शिकदार द्वारा पुलिस सम्बच्ची कार्य किया जाता था। वे अपराधियों को दण्डित करते थे।
गांव में पुलिस सम्बन्धी कार्य मुखिया द्वारा किया जाता था। यदि मुखिया निश्चित अवधि के भीतर चोरी या हत्या के अपराधियों को नहीं पकड़ पाता था, तो उसे दण्डित होना पड़ता था।
शेरशाह का दण्ड-विधान प्रबंध की प्रशंसा करते हुए अब्बास खां लिखते हैं, "शेरशाह के शासन काल में एक बुढिया अपने सिर पर आभूषणों की गठरी रखकर बिना किसी के भय के सफर कर सकती थी, क्योंकि शेरशाह की ओर से दिए जाने वाले दण्ड का इतना भय था कि कोई भी चोर अथवा डाकू उसके समीप आने का साहस नहीं कर सकता था।" डॉ. कानूनगो के अनुसार, "शेरशाह की पुलिस-प्रणाली उस समय की परिस्थितियों के अनुकूल थी।"

मुद्रा-व्यवस्था

शेरशाह का दूसरा बड़ा काम मुद्रा सम्बन्धी सुधारों का श्रीगणेश करना था। राज्य प्राप्ति के पश्चात उसको ज्ञान हुआ कि धातु की कमी, प्रचलित सिक्कों की घिसावट और खोटापन तथा विभिन्न धातुओं के सिक्कों के बीच कोई निश्चित अनुपात न होने के कारण मुद्रा प्रणाली एकदम बिगड़ चुकी है। एक दूसरी कठिनाई यह भी थी कि सभी युगों के सिक्के गत शासकों के सिक्के भी उन दिनों चल रहे थे। शेरशाह ने चांदी के बहुत से नये सिक्के निकलवाये जो 'दाम' कहलाते थे। चांदी के रुपये और तांबे के दाम के आधे, चौथाई, आठवें और सोलहवें भाग के सिक्के भी निकलवाये थे। इसके बाद उसने सब प्रकार के पुराने सिक्कों तथा मिश्रित धातु की मुद्रा प्रणाली को समाप्त कर दिया। चांदी और तांबे के सिक्कों में उसने अनुपात निश्चित कर दिया। चांदी का रुपया 180 ग्रेन का था जिसमें 175 ग्रेन विशुद्ध चांदी थी। यदि शेरशाह की अंकित छाप का ध्यान न रखें, तो हम कह सकते हैं कि उसका सिक्का मुगलकाल में भी चलता था और 1835 ई. तक ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा भी चालू माना गया। इतिहासकार वी.ए. स्मिथ ने ठीक ही लिखा है कि "यह रुपया वर्तमान ब्रिटिश मुद्रा-प्रणाली का आधार है।"
शेरशाह का नाम, उसकी पदवी और टकसाल का स्थान भी सरबी लिपि में सिक्कों के ऊपर अंकित रहता था। कुछ सिक्के ऐसे भी थे जिन पर बादशाह के नाम के अतिरिक्त प्रथम चार खलीफाओं के नाम भी अंकित रहते थे। विशुद्ध धातु के सोने के सिक्के भी विभिन्न तोल के-166.4 ग्रेन, 167 ग्रेन और 168.5 ग्रेन-ढाले जाते थे। रुपया और दाम में 1 और 64 का अनुपात था। सोने और चांदी के भिन्न-भिन्न सिक्कों के बीच स्थायी आधार पर अनुपात स्थिर किया गया था। मुद्रा सम्बन्धी ये सुधार बड़े लाभदायक ओर सुविधाजनक सिद्ध हुए। इनसे जनसाधारण, विशेषकर व्यापारी वर्ग, की अनेक असुविधाएं दूर हो गयीं। आधुनिक मुद्राशास्त्रियों ने शेरशाह के इन सुधारों की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की है। उदाहरणतः एडवर्ड टॉमस ने लिखा है कि "शेरशाह के राज्यकाल ने भारतीय मुद्रा इतिहास में एक प्रमुख स्थान केवल टकसालों के लिये गये सुधारों द्वारा ही प्राप्त नहीं किया, बल्कि पूर्वकालीन राजाओं की मुद्रा व्यवस्था के उत्तरोत्तर हास को रोककर उन सुधारों में से बहुतों को जारी करते हुए प्राप्त किया जिन्हें आने वाले मुगल शासकों ने अपना बताया।"

व्यापार-वाणिज्य

शेरशाह ने उन बहुत-से महसूलों को जिन्हें प्रत्येक प्रान्त और जिले की सीमा पर तथा प्रत्येक घाट पर प्रत्येक प्रमुख मार्ग पर वसूल किया जाता था, हटाकर व्यापार और वाणिज्य को बहुत प्रोत्साहन दिया। उसने यह तय कर दिया कि बिक्री के लिए आने-जाने वाली वस्तुओं पर केवल दो चुंगियां लगायी जायेंगी। एक चुंगी तो तब वसूल की जाती थी जबकि व्यापारिक वस्तुएं उसके राज्य की सीमा में पूर्वी बंगाल के सोनारगांव नामक स्थान अथवा पंजाब के रोहतासगढ़ या अन्य किसी प्रान्त की सीमा से प्रवेश करती थीं और दूसरी चुंगी इन वस्तुओं की विक्री के स्थानपर लगायी जाती थी। यह चुंगी कितनी लगती थी, इसका कोई निश्चित पता नहीं है। ऐसा अनुमान है कि यह महसूल वस्तु के मूल्य का 2.5 प्रतिशत होता था। राज्य के अंदर चुंगी वसूल करने के शेष सभी स्थान उसने बंद कर दिये थे। इन सुधारों से देश के अंदर व्यापार-वाणिज्य को बहुत प्रोत्साहन प्राप्त हुआ और यथेष्ट व्यापारिक समृद्धि हुई। 

न्याय-व्यवस्था

शेरशाह मध्ययुग का अत्यन्त न्यायप्रिय शासक समझा जाता है। अपनी प्रजा की भलाई करते रहने के उसके व्यक्तिगत गुण और विशेषताओं पर ही उसकी प्रतिष्ठा आधारित नहीं थी, बल्कि एक श्रेष्ठ न्याय व्यवस्था की स्थापना द्वारा भी उसने लोगों के दिलों में ऊंया स्थान प्राप्त किया था। सुदीर्घकाल से प्रचलित प्रथा के अनुसार पह साधारण मुकदमे भी सुनता था और उनकी अपीलें भी सुनता था। बुधवार के दिन संध्या के समय उसकी कचहरी लगती थी। उसके नीचे प्रमुख काजी होता था, जो न्याय विभाग का प्रधान था और न्याय व्यवस्था के सुप्रबंध की जिम्मेदारी भी इसी के ऊपर होती थी। प्रमुख काजी की कचहरी मुख्य रूप से अपील सुनवाई की कचहरी थी, किन्तु पहले-पहल के मुकदमों के भी यहां फैसले किये जाते थे। प्रत्येक जिले में और संभवतः प्रत्येक प्रमुख नगर में काजी होता था। प्रमुख मुन्सिफ के ऊपर जिले में दीवानी न्याय व्यवस्था का सुचारू रूप रो प्रबंध करने का उत्तरदायित्व था और परगनों में यही कार्य अगीन' करते थे। रांगवतः काजी फौजदारी के मुकदमे करता था और मुन्सिफे तथा अमीन दीवानी के मुकदमे। एक अन्य न्याय अधिकारी भी था, जो मीर-आदिल कहलाता था।
शेरशाह की न्याय व्यवस्था उच्च आदर्शों पर अवलम्बित थी। निर्धन और निर्बलों को अनाचार एवं अन्याय से बचाने में वह विशेष रूचि लेता था। अधिकतर वह इस सिद्धान्त का पलन करता था कि निर्धन और निकृष्ट जनों की अपेक्षा सरकारी अफसरों और सम्मान प्राप्त व्यक्तियों के प्रति ही अधिक कटोरता का व्यवहार किया जाय। यहां तक कि न्याय सम्पादन के समय वह अपने निकट सम्बन्धियों को भी कोई महत्व नहीं देता था। इस सम्बन्ध में लिखे हुए एक चुटकुले से ज्ञात होता है कि एक सुनार की पत्नी पर अपने घर में स्नान करते हुए पान का पत्ता फेंकने के अपराध में शेरशाह ने अपने भतीजे को दण्ड दिया था। जब शहजादा अपने हाथी पर घर के पास से गुजर रहा था, उसी समय यह घटना घटी थी। सरदारों द्वारा उक्त दण्ड का विरोध किये जाने पर भी शेरशाह अपने न्यायपूर्ण निर्णय से विचलित नहीं हुआ। शेरशाह के सतर्क और निष्पक्ष मालवा के गवर्नर शुजातखां ने अन्यायपूर्वक 2,000 सैनिकों की जागीरों के एक भाग पर अपना अधिकार कर लिया था। जब शरशाह ने यह बात सुनी तो उसने उचित दण्ड की आज्ञा निकाल दी, यद्यपि इसी बीच जागीरं वापस देकर शुजातखां ने अपनी भूल का सुधार कर लिया था। हम पहले ही लिख चुके हैं कि किसानों की भलाई के निमित्त शेरशाह विशेष रूप से उदार था। युद्धकाल में वह सेना द्वारा रौंदी हुई फसलों की क्षतिपूर्ति भी करता था। न्यायप्रिय बादशाह होने के नाते शेरशाह की पूर्ति उसकी मृत्यु तथा उसके वंश के पतनोपरान्त भी बनी रही। तबकाते अकबरी के लेखक निजामुद्दीन अहमद ने सोलहवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में लिखा था कि शेरशाह के शासनकाल में कोई भी सौदागर रेगिस्तान में यात्रा करते हुए जा सकता था और लुटेरों द्वारा माल-असबाब के लूटे जाने का उसे कोई भय नहीं था। शेरशाह के भय और न्याय प्रेम के कारण चोर और लुटेरे तक सौदागरों के माल की निगरानी करते थे।

सार्वजनिक सुधार

शेरशाह का नाम उसके सार्वजनिक कार्यों के लिए चिरस्मरणीय है। उसने शासन सम्बन्धी अनेक सुधार किये, परन्तु साधारण जनता में अपना नाम अपने कार्यों से प्राप्त किया। सड़कें, सरायें अब भी उसकी कीर्ति तथा महानता के अमिट स्मारक हैं।

सड़कें
शेरशाह जानता था कि सड़कों के बिना देश में व्यापार आदि की वृद्धि असंभव है। राष्ट्र का निर्माण करना दुश्वार है। अतः उसने अपनी दूरदर्शिता का परिचय अनेक प्रजाहित कार्य करके दिया। सबसे पहली तथा प्रसिद्ध सड़क वर्तमान जर्नेली सड़क ही है। इसे ‘सड़के आजम' के नाम से पुकारा जाता था। यह सोनार गांव (बंगाल) से लेकर रोहतास (पंजाब) तक 1500 कोस लम्बी सड़क थी। दूसरी सड़क आगरा से बुरहानपुर तक जाती थी। तीसरी सड़क आगरा से जोधपुर तक जाती थी और चौथी लाहौर से मुलतान तक।
सड़कें बहुत नियमपूर्वक ढंग से बनाई गई थी। सभी महत्वपूर्ण स्थानों से गुजरती थी। इन सड़कों के दोनों किनारों पर फलदायक वृक्ष लगाये गये थे। यात्रियों को सफर करने में सुविधा मिल गयी थी, वहां चोर डाक तथा अन्य विद्रोहियों का सामना बड़ी सरलतापूर्वक किया जा सकता था। शांति व्यवस्था स्थापित करना सरल बन गया । पी.सरन के मतानुसार 'सड़कों का सबसे महत्वपूर्ण लाभ यह हुआ कि लोगों में एकता की भावना प्रबल हुई जिससे राष्ट्र विभाग के कार्यों को प्रोत्साहन मिला।'

सरायें
सड़कों के किनारे लगभग 1700 सरायें बनवाई। हिन्दुओं तथा मुसलमानों के लिए पृथक-पृथक कमरे होते थे। इन सरायों पर घोड़े भी रखे जाते थे, जो डाक पहुंचाने के काम आते थे। उनके खाने का प्रबंध भी सरायों पर किया जाता था। प्रत्येक सराय के साथ एक कुंआ तथा एक मस्जिद बनवाई गई थी मस्जिदों में इमाम रहा करते थे। शांति व्यवस्था बनाने के लिए शिकदार भी आकर रहा करते थे। सरायों के साथ डाक चौकी भी जोड़ दी गई और डाकिए भी वहां पर नियुक्त किए गए थे। शाही आज्ञाओं को आगे पहुंचाने का कार्य करते थे।
सराय साधारण जनता के लिए बड़ी उपयोगी सिद्ध हुई। सामान्य यात्री आते जाते यहां आकर रुकते और विश्राम करते थे। सरकारी कर्मचारियों को भी अत्यधिक लाभ हुआ। गव वालों को भी इन सरायों का लाभ पहुंचा, उनको अब दर्शकों आदि का अधिक बोझ नहीं उठाना पड़ता था। शेरशाह परोपकारी कार्यों से अत्यधिक प्रसिद्ध हो गया। कानूनगों के कथनानुसार, सरायों ने साम्रज्य की धमनियों का सा रूप ले लिया और अब तक के अर्ध–जीवित अंगों में नए जीवन का संचार करने लगी।
यदि हम शेरशाह के ऊपर लिवित कार्य का मूल्यांकन करें तो हमें एस आर शर्मा के प्रश्नों से सहमत होना ही पड़ेगा। शर्मा का मत है कि शेरशाह में अनेक गुण थे। वह एक अद्भुत प्रतिभा का स्वामी था। उसका जागीरदारों से व्यवहार हमें इंग्लैंड के राजा हेनरी सप्तम् की याद दिलाता है। उसका सैनिक तथ असैनिक प्रशासन तथा उसका संगठन एशिया के महान फैडरिक प्रथम के प्रशासन के कम नहीं था उसके राजनीति के नियम कौटिल्य तथा मैक्यावली के नियमों जैसे थे। शेरशाह का प्रजा के प्रति हित अशोक सम्राट की याद दिलाता है। वास्तव में शेरशाह, बाबर और फैडरिक महान का मिश्रण था। अरिस्कन के अनुसार 'शेरशाह असाधारण व्यक्तियों में वह एक मानव था जिसका नाम भारतीय इतिहास में लिखा गया है।' कानूनगो के कथनानुसार शेरशाह एक महान प्रशासकीय तथा सैनिक बुद्धि का स्वामी था। शर्मा कानूनगो से सहमति प्रकट करते हुए कहते हैं कि 'शेरशाह की शासन प्रणाली और उनके परिणामों को देखते हुए हम कह सकते हैं कि कानूनगो के शब्दों में कोई अतिश्योक्ति नहीं है। शेरशाह के कार्यों ने बाबर के विजय की कीर्ति को कम कर दिया। दोनों का समय लगभग एक जैसा ही है परन्तु बाबर ने जहां भारत को आलोचनात्मक दृष्टि से देखा, शेरशाह ने उसी के नव-निर्माण में अपना जीवन लगा दिया। शेरशाह के कार्य से, बाबर के समर्थकों को कि बाबर के पास समय का अभाव था, स्वयं ही उत्तर मिल जाता है। शेरशाह वास्तव में एक महान सुयोग्य कूटनीतिज्ञ सम्राट था।

शेरशाह का मूल्यांकन

उत्तरी भारत के मुसलमान शासकों में मात्र शेरशाह एक ऐसा व्यक्ति था जिसका राज परिवार से कोई सम्बन्ध नहीं था और साधारण परिवार में जन्म लेकर भी वह इतने ऊंचे राजपद पर पहुंच गया था। यह उसकी उच्चकोटि की बुद्धिमत्ता और योग्यता का प्रमाण है। यद्यपि वह 68 वर्ष की आयु में शासक बना था, किन्तु उसका उत्साह और महत्वाकांक्षा असीमित थी। वह कठोर परिश्रमी था। वह प्रतिदिन सोलह घंटे राज कार्य में लगाता था। रात्रि के तीसरे पहर में उठकर स्नान और नमाज से निवृत होकर वह राज्य कार्य में व्यस्त हो जाता था। तीन घंटे तक कार्य करने के पश्चात सुबह की नमाज पढ़ता था। तत्पश्चात वह सेना का निरीक्षण करता, फिर दरबार लगाता, जिसमें लोगों की शिकायतें सुनकर अपना निर्णय लेता था। दोपहर को थोड़ा विश्राम करके कुरान का पाठ करता था। संध्या के समय वह विद्वानों के साथ रहता था और रात को पुनः कार्य में व्यस्त हो जाता था। इस दिनचर्या से स्पष्ट है कि शेरशाह कठोर परिश्रमी और प्रजा हितैषी शासक था।
शेरशाह में किसी अभिजात पुरुष की-सी सुसंस्कृति नहीं थी और न उसमें व्यक्तिगत आकर्षण था। उसे एक आज्ञाकारी पुत्र भी नहीं कह सकते। इस बात का भी कोई प्रमाण नहीं मिलता कि वह अपने बच्चों के प्रति विशेष प्रेम रखता था यद्यपि शेरशाह अरबी और फारसी का अच्छा ज्ञाता तथा इतिहास के प्रति रूचि रखता था, तथापि उसे विद्वान नहीं कहा जा सकता। इतिहास का अध्ययन तो उसने व्यवहारिक उपयोगिता के कारण किया था। वह प्रतिदिन कुरान इसलिए पढ़ता था क्योंकि एक धार्मिक मुसलमान के लिए इसका पढ़ना जरूरी है। यद्यपि वह विद्वानों का आदर करता था, किन्तु उसके राज्यकाल में किसी विद्वान ने कोई विशिष्ट रचना तैयार नहीं की। लेकिन वह एक वीर सैनिक, चतुर सेनानायक और कुशल कूटनीतिज्ञ अवश्य था। वह केवल विजय करने के विचार से युद्ध करता था और उसका विश्वास था अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भले-बुरे सभी साधनों को व्यवहार में लाना उचित है। वह न केवल सफल विजेता ही था बल्कि शासन प्रबंध में भी उसने अपनी रचनात्मक प्रतिभा का परिचय दिया था। शासन प्रबंध में पटुता, चारित्रिक दृढ़ता और सम्पन्न किये गये कार्यों की दृष्टि से शेरशाह मध्यकालीन भारतीय शासकों में एक विशेष स्थान रखता है।
उसकी धार्मिक नीति के सम्बन्ध में डॉ. कानूनगो ने उसे धार्मिक सहिष्णुता वाला बताया है जबकि डॉ. श्रीराम शर्मा ने उसे इस्लाम का कट्टर अनुभवी बताया है। वस्तुतः वह इस्लाम का प्रबल समर्थक था। रायसीन के राजा पूरनमल के विरूद्ध उसने जिहाद घोषित किया था तथा मारवाड़ विजय के बाद जोधपुर के किले में मंदिर ध्वस्त करवा कर उसके स्थान पर मस्जिद बनवायी थी। उसके ये कार्य उसकी धार्मिक कट्टरता को प्रदर्शित करते है। लेकिन उसने दिल्ली के सुल्तानों की भांति हिन्दुओं के प्रति अत्याचारपूर्ण नीति नहीं अपनायी थी। उसकी पैदल सेना में अधिकांश सैनिक हिन्दू थे। जहां तक संभव होता, वह राजनीति को धर्म से पृथक ही रखता था।

सारांश

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि शेरशाह अपने पूर्ववर्ती सम्राटों से श्रेष्ठ था। किन्तु बुल्जले हेग का यह कथन कि, "वह भारत के गुसलगान शासकों में सबसे महान था' अतिशयोक्तिपूर्ण है। सफल विजेता और शासन प्रबंधक के रूप में वह निश्चय ही अलाउद्दीन खिलजी से श्रेष्ठ था, किन्तु रचनात्मक राजनीतिज्ञता में वह उससे घटिया था। अकबर के साथ भी शेरशाह की तुलना करना अनुपयुक्त है क्योंकि एक व्यक्ति के रूप में अथवा एक शासक के रूप में अकबर उससे कहीं अधिक श्रेष्ठ था। डॉ. कानूनगो के इस मत से हम सहमत हैं कि इतिहास में अकबर का स्थान शेरशाह के स्थान से अधिक ऊंचा है।

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