अस्पृश्यता का अर्थ, परिभाषा, निर्योग्यताएँ | asprishyata

अस्पृश्यता

अस्पृश्यता का इतिहास भारतीय समाज में जाति व्यवस्था के इतिहास से जुड़ा हुआ है क्योंकि यह जाति व्यवस्था के साथ ही हमारे समाज में एक गम्भीर समस्या रही है। वैदिक काल में अस्पृश्यता शब्द का प्रयोग तो नहीं किया जाता रहा है, परन्तु चण्डाल, डोम, अन्त्यज, निषाद आदि शब्दों का प्रयोग ऐसे व्यक्तियों के लिए किया जाता रहा है, जिनका स्तर लगभग अस्पृश्यों जैसा ही था। उस समय पवित्रता-अपवित्रता सम्बन्धी विचारों का प्रमुख स्थान था तथा इन लोगों को दूध से बनी वस्तुओं एवं यज्ञ में काम आने वाली चीजों को छूने की आज्ञा नहीं थी। परन्तु वैदिक तथा उत्तर-वैदिक काल में इन लोगों के प्रति भेदभाव एवं घृणा की भावना अधिक कटु नहीं थी। घुरिये के अनुसार यद्यपि वैदिक काल में यज्ञ, धर्म आदि से सम्बन्धित शुद्धता या पवित्रता की धारणा अत्यन्त प्रखर थी, तथापि अस्पृश्यता का जो रूप आज है वैसा उस युग में नहीं था। उस काल में चण्डाल आदि लोगों के रहने की व्यवस्था गाँव से बाहर होती थी। इनके अनुसार उत्तर-वैदिक काल में केवल चण्डालों या अन्त्यजों पर ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण शूद्र वर्ण पर अस्पृश्यता सम्बन्धी प्रतिबन्ध लगा दिए गए। अगर कोई उच्च वर्ण की स्त्री निम्न या अस्पृश्य जाति के किसी व्यक्ति से विवाह कर लेती थी, तो उसे घृणा की दृष्टि से देखा जाता था। स्मृतिकाल में अस्पृश्यता की भावना में तेजी से वृद्धि होने लगी। महर्षि मनु के अनुसार चण्डालों को गाँव से बाहर रहना चाहिए, दिन में गाँव में नहीं आना चाहिए और अपने बर्तनों के प्रयोग को केवल अपने तक ही सीमित रखना चाहिए।
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इस काल में इन्हें अधम कार्य (यथा गन्दगी साफ करना, लावारिस शवों को उठाना आदि) ही करने दिया जाता था। भारत में मुस्लिम राज्य की स्थापना के पश्चात् अस्पृश्यों की स्थिति में और अधिक गिरावट आ गई और इन्हें अनेक प्रकार की निर्योग्यताओं के कारण एकान्त स्थान पर रहने के लिए बाध्य किया गया। अंग्रेजी शासनकाल में समाज सुधारकों एवं सरकारी प्रयासों के कारण अस्पृश्यों की स्थिति में काफी सुधार हुआ तथा स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् संवैधानिक प्रावधानों द्वारा अस्पृश्यता को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है। अस्पृश्य जातियों के नाम के बारे में प्रारम्भ से ही काफी विवाद रहा है। वैदिक एवं उत्तर-वैदिक काल में इन्हें चण्डाल, डोम, अन्त्यज आदि नामों से पुकारा जाता था, जबकि अंग्रेजी शासनकाल में इन्हें दलित वर्ग कहा जाने लगा। 1931 ई० की जनगणना में दलित वर्ग के स्थान पर बाहरी जाति शब्द का भी प्रयोग किया गया। 1931 ई० में उस समय के ब्रिटिश प्रधानमन्त्री रेम्जे मैक्डोनाल्ड ने इनको पृथक् निर्वाचन का अधिकार दे दिया परन्तु गांधी जी ने इसका तीव्र विरोध किया। गांधी जी का विचार था कि दलित वर्ग हिन्दुओं से पृथक् नहीं हैं अपितु हिन्दुओं का ही एक अंग हैं, इसलिए उन्हें पृथक् निर्वाचन का अधिकार देना उचित नहीं है। गांधी जी ने 20 सितम्बर, 1932 ई० को इसके विरोध में आमरण अनशन शुरू कर दिया। परन्तु डॉ० सप्रू एवं डॉ. जयकर के प्रयासों से गांधी जी एवं डॉ० अम्बेडकर में 'पूना पैक्ट' के नाम से जानी जाने वाली एक सन्धि हुई जिसके अनुसार दलित वर्ग को हिन्दुओं का ही अंग स्वीकार किया गया और उनको कुछ विशेष अधिकार प्रदान किए गए।
उसी समय गांधी जी ने इन्हें दलित वर्ग के स्थान पर 'हरिजन' कहना प्रारम्भ कर दिया। 1935 ई० के विधान में इन जातियों को विशेष सुविधाएँ देने के लिए एक अनुसूची तैयार की गई तथा जिन जातियों को इस अनुसूची के अन्तर्गत रखा गया उन्हें वैधानिक दृष्टि से अनुसूचित जातियाँ भी कहा जाने लगा। आज भी समस्त सरकारी प्रयोग में उन्हें अनुसूचित जातियों के नाम से सम्बोधित किया जाता है। अनुसूचित जातियों के लोग हरिजन शब्द के प्रयोग को भी अब पसन्द नहीं करते और इसे अपमानजनक समझते हैं। इसलिए सरकार द्वारा भी अब यह शब्द प्रयोग नहीं किया जाता है।
भारतीय समाज में पाई जाने वाली प्रमुख समस्याओं में से अस्पृश्यता भी एक समस्या है। अस्पृश्यता के नाम पर हजारों वर्षों तक निम्न जातियों को अनेक मानवीय अधिकारों से वंचित रखा गया तथा उन पर अनेक सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक व राजनीतिक निर्योग्यताएँ लगा दी गईं। गांधी जी ने कहा था कि, “अस्पृश्यता जिस रूप में आज हिन्दू धर्म में प्रचलित है, यह भगवान तथा मनुष्य दोनों के ही विरुद्ध है। अत: अस्पृश्यता एक विष की भाँति है जो हिन्दू धर्म को खाए जा रही है। मेरे विचार में हिन्दू शास्त्रों में सामूहिक दृष्टि से इसकी कहीं भी स्वीकृति नहीं है।"

अस्पृश्यता का अर्थ एवं परिभाषाएँ

अस्पृश्यता का अर्थ अछूत है अर्थात् जो छूने योग्य नहीं है वह अस्पृश्य है। अस्पृश्यता पवित्रता-अपवित्रता की धारणा से जुड़ी हुई है क्योंकि अस्पृश्य जातियों को अपवित्र माना जाता है। ऐसा समझा जाता है कि अगर कोई अस्पृश्य किसी सवर्ण हिन्दू को छू देता है तो वह भी अपवित्र हो जाता है और उसे पुनः पवित्र होने के लिए विशेष संस्कार करने पड़ते हैं।
  • मजूमदार (Majumdar) के अनुसार, “अस्पृश्य जातियाँ वे समूह हैं जो अनेक सामाजिक व राजनीतिक निर्योग्यताओं का शिकार हैं, इनमें से अनेक निर्योग्यताएँ उच्च जातियों द्वारा परम्परागत तौर पर निर्धारित और सामाजिक दृष्टि से लागू की गई हैं।”
  • घुरिये (Ghurye) के अनुसार, “अनुसूचित जातियाँ वे समूह हैं जिनका कि एक विशेष नाम एक विशेष समय पर लागू अनुसूचित जाति-क्रम के अन्तर्गत आता है।"
  • इस भाँति, के० एन० शर्मा (K. N. Sharma) के अनुसार, “अस्पृश्य जातियाँ वे हैं जिनके स्पर्श से एक व्यक्ति अपवित्र हो जाए और उसे पवित्र होने के लिए कुछ कृत्य करने पड़ें।"
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि अस्पृश्यता के साथ अपवित्रता की भावनाएँ जुड़ी हुई हैं तथा इसीलिए अस्पृश्यों पर अनेक निर्योग्यताएँ लगाई गई थीं।

अस्पृश्यों की निर्योग्यताएँ

अनेक विद्वानों (जैसे डॉ० डी० एन० मजूमदार) ने अस्पृश्यता की परिभाषा ही अस्पृश्य जातियों की आर्थिक एवं राजनीतिक निर्योग्यताओं के आधार पर दी है। निर्योग्यताएँ परम्परागत रूप से निर्धारित होती हैं और सामाजिक दृष्टि से लागू की जाती हैं। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् सरकार ने वैधानिक रूप से अस्पृश्यता एवं अस्पृश्यों की सभी निर्योग्यताओं को समाप्त कर दिया है तथा इसमें काफी सीमा तक सफलता भी मिली है। के० एम० पाणिक्कर के मतानुसार, “यह मान लेना सर्वथा अनुचित होगा कि अस्पृश्यता समाप्त हो जाने की घोषणा कर देने से ही अस्पृश्यों की सामाजिक निर्योग्यताएँ समाप्त हो गई हैं।" यह कथन काफी सीमा तक ठीक भी है क्योंकि व्यावहारिक जीवन में ये निर्योग्यताएँ आज भी कुछ सीमा तक देखी जा सकती हैं। ग्रामीण समाज में परम्परा का बोलबाला होने के कारण अस्पृश्यों के साथ कुछ नियोग्यताएँ आज भी देखी जा सकती हैं। अस्पृश्यों को समाज में निम्नवत् निर्योग्यताओं का शिकार होना पड़ता था-

1. धार्मिक निर्योग्यताएँ
क्योंकि अस्पृश्यता पवित्रता-अपवित्रता के विचारों से जुड़ी हुई है, इसलिए धार्मिक दृष्टि से अस्पृश्यों की अनेक धार्मिक निर्योग्यताएँ थीं। ये लोग हिन्दुओं के मन्दिरों में प्रवेश नहीं कर सकते थे, वेदों का अध्ययन व मन्त्रोच्चारण नहीं कर सकते थे तथा हिन्दू ग्रन्थों के उपदेशों को सुनना तक इनके लिए पाप समझा जाता था। प्राचीन समय में ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जिनके अनुसार अगर कोई शूद्र मन्त्रोच्चारण करता था तो उसकी जीभ काट दी जाती थी। परन्तु अब ये धार्मिक निर्योग्यताएँ लगभग समाप्त हो गई हैं।

2. राजनीतिक निर्योग्यताएँ
यद्यपि अस्पृश्यों के साथ मुख्य रूप से धार्मिक, सामाजिक तथा आर्थिक नियोग्यताएँ ही जुड़ी हुई थीं, फिर भी अस्पृश्यों की कुछ राजनीतिक निर्योग्यताओं का भी उल्लेख मिलता है। इनको राय देने का अधिकार नहीं था तथा नौकरी में नियुक्ति एवं वेतन सम्बन्धी समान अधिकार नहीं थे। वोट देने तथा शिक्षा प्राप्त करने के अधिकारों से भी इन्हें वंचित रखा जाता था। परन्तु आज अधिकांश राजनीतिक निर्योग्यताएँ समाप्त हो चुकी हैं।

3. सामाजिक निर्योग्यताएँ
सामाजिक क्षेत्र में अस्पृश्य जातियों की अनेक सामाजिक निर्योग्यताएँ थीं जिनके कारण इनसे लोग समान व्यवहार नहीं करते थे। मुख्य सामाजिक निर्योग्यताएँ निम्न प्रकार थीं-
  • समाज में निम्नतम स्थिति- अस्पृश्यता की भावना के कारण इन लोगों को निम्नतम स्थिति प्रदान की गई। सभी ऊँची जातियों के लोग अस्पृश्यों को घृणा की दृष्टि से देखते थे। इन लोगों के स्पर्श होने पर ऊँची जाति के व्यक्ति अपने को अपवित्र समझते थे तथा पुन: पवित्र होने के लिए संस्कार करते थे। यहीं तक नहीं, बल्कि कहीं-कहीं तो इनकी छाया का पड़ना भी अपवित्र माना जाता था।
  • शिक्षा सम्बन्धी निर्योग्यताएँ- अस्पृश्यों की शिक्षा सम्बन्धी भी निर्योग्यताएँ थीं। अस्पृश्य जातियों के बच्चे उन स्कूलों में नहीं पढ़ सकते थे जहाँ ऊँची जातियों के बच्चे शिक्षा प्राप्त करते थे। प्राचीन समय में ब्राह्मण गुरु इनके बच्चों को शिष्य बनाना अपनी मानहानि एवं धर्म के विरुद्ध समझता था। इसका यह परिणाम था कि अछूत लोग प्रायः शत-प्रतिशत अशिक्षित होते थे।
  • अन्य प्रकार की सामाजिक निर्योग्यताएँ- कहीं-कहीं पर अस्पृश्यों को अपनी इच्छानुसार जेवर आदि पहनने की भी सामाजिक अनुमति नहीं थी। उदाहरणार्थ-जौनसार बाबर (चकराता के समीप) के क्षेत्र में कोलटा जाति के लोग सोना नहीं पहन सकते थे। इस अस्पृश्य जाति की औरतें केवल चाँदी के बने जेवर पहन सकती थीं। साथ-ही- साथ, अस्पृश्य अपनी इच्छानुसार अपने रहने का स्थान भी नहीं बना सकते थे। प्राय: अस्पृश्यों को ग्राम से बाहर अपने मकान आदि बनाने पड़ते थे। पहाड़ी क्षेत्रों में प्राय: अस्पृश्य जाति के लोग ग्राम के सबसे नीचे क्षेत्र में अपने मकान बनाते थे क्योंकि ऊँचाई पर रहने से उनकी परछाई ऊँची जाति के लोगों पर पड़ती थी। इनके लिए अलग सड़कें थीं तथा सार्वजनिक स्थानों जैसे कुओं, तालाबों, छात्रावासों, होटलों आदि के प्रयोग पर विविध प्रकार के प्रतिबन्ध लगे हुए थे।

4. आर्थिक निर्योग्यताएँ
कोई भी समाज, व्यक्ति, समूह या राष्ट्र तब तक उन्नति नहीं कर सकता है जब तक कि उसकी आर्थिक स्थिति ठीक न हो। अस्पृश्यों के पिछड़े होने का मुख्य कारण उनकी आर्थिक हीनता रही है। इनकी प्रमुख आर्थिक नियोग्यताएँ निम्नांकित थीं-
  • इच्छानुसार पेशे नहीं चुन सकते थे- प्रत्येक जाति का एक निश्चित व्यवसाय से सम्बन्ध होता था। व्यवसाय के आधार पर जाति की सामाजिक स्थिति निर्धारित होती थी। अस्पृश्य केवल निम्नतम श्रेणी के व्यवसाय ही कर सकते थे तथा उनको अपनी इच्छानुसार व्यवसाय चुनने की अनुमति नहीं थी। इस कारण इनकी आर्थिक दशा कालान्तर में और भी दयनीय होती चली गई।
  • भूमिहीन श्रमिक- खेती करना ऊँची जातियों का ही अधिकार माना जाता रहा है। इसके फलस्वरूप अस्पृश्य लोग अधिकतर भूमिहीन ही थे। यदि ऊँची जाति के लोग इनको खेती के काम में नौकरी दे देते थे तो वे इसे अपना सौभाग्य समझते थे। अस्पृश्य लोगों को खेती में श्रमिक बनाकर इनसे बेगार भी ली जाती थी। अब भी इन जातियों के अधिकांश लोगों के पास अपनी भूमि नहीं है। वे या तो बटाई पर खेती करते थे या दूसरों के खेतों में मजदूरी करते थे। 
  • सबसे कम वेतन- उच्च श्रेणी के व्यवसाय करने की अनुमति न होने के कारण अस्पृश्यों को अपने परम्परागत निम्न व्यवसाय ही करने पड़ते थे। इनके व्यवसाय समाज में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण थे किन्तु इनको वेतन सबसे कम मिलता था। गांधी जी के शब्दों में, “यदि एक डॉक्टर अपनी डॉक्टरी छोड़ दे तो उसके रोगी का सर्वनाश हो जाएगा, किन्तु यदि अछूत अपना काम बन्द कर दे तो जगत का विनाश हो जाएगा।” जजमानी व्यवस्था में सबसे कम आर्थिक लाभ अस्पृश्य जातियों को ही था।

5. सार्वजनिक निर्योग्यताएँ
अपवित्र समझे जाने के कारण अनुसूचित जातियों को सार्वजनिक स्थानों का प्रयोग नहीं करने दिया जाता था। उच्च जातियों के कुओं के पास तक आना इनके लिए निषेध था। यहीं तक नहीं, बल्कि इनको सड़क पर घूमना भी मना था। पेशवाओं की राजधानी पूना में अछूतों के लिए राजाज्ञा थी कि वे अपने साथ एक मिट्टी की हाँडी लटकाकर चलें। यदि उनको थूकना होता था तो वे उसी हाँडी में थूक सकते थे, सड़क पर नहीं। ये लोग दोपहर को ही सड़क पर चल सकते थे।

निर्योग्यताओं के परिणाम

अस्पृश्यों की निर्योग्यताओं से केवल वे लोग ही प्रभावित नहीं होते थे, परन्तु सम्पूर्ण समाज पर इनका प्रभाव पड़ता था। निर्योग्यताओं के प्रमुख परिणाम निम्नलिखित रहे हैं-

धार्मिक परिणाम
अस्पृश्यों की नियोग्यताओं से हिन्दू समाज पर बुरा प्रभाव पड़ा है, क्योंकि अनेक अस्पृश्य जातियों के व्यक्तियों ने अपना धर्म परिवर्तन करना प्रारम्भ कर दिया। ईसाई धर्म के प्रचार से बहुत से अस्पृश्य ईसाई बन गए तथा काफी लोग मुसलमान भी बन गए, क्योंकि ईसाई धर्म की भाँति मुसलमानों में भी अस्पृश्यता नहीं थी।

सामाजिक एकता में बाधा
यह सत्य है कि भारत आपसी भेदभाव के कारण पराधीन हुआ। इससे देश की सामाजिक एकता में निरन्तर बाधा पड़ती रही और इसका लाभ विदेशी उठाते रहे। एक ओर उच्च जातियों के हिन्दू अस्पृश्यों को सदैव अपने से नीचा समझते रहे हैं और दूसरी ओर अस्पृश्य सदैव इन लोगों से अपने को अलग समझते रहे हैं। इसी कारण समाज में कभी भी एकता नहीं रही है।

राजनीतिक फूट
अस्पृश्यों की निर्योग्यताओं से इनकी राजनीति पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। अछूतों ने अपने को अलग मानकर अपने पृथक् मताधिकारों की माँग की। 1931 ई० में डॉ० अम्बेडकर ने ब्रिटिश सरकार से गोलमेज कॉन्फ्रेन्स के समय अछूतों के लिए पृथक् मताधिकार की माँग की तथा इसमें उन्हें सफलता भी मिली, परन्तु गांधी जी के प्रयासों से उन्हें हिन्दुओं का ही एक अंग समझा जाता रहा है।

आर्थिक असमानताएँ
श्रम-विभाजन जाति के आधार पर होने के कारण अस्पृश्य जातियों के लोग केवल निम्न व्यवसाय ही कर सकते थे। इन लोगों को उच्च व्यवसायों को करने की अनुमति नहीं थी, खेती करने का अधिकार नहीं था और इन्हें अच्छी नौकरियाँ भी नहीं मिल सकती थीं। इसलिए इनकी आय बहुत कम होती थी। ये लोग भर पेट भोजन भी नहीं खा सकते थे। इसके फलस्वरूप समाज में आर्थिक असमानताएँ पैदा हुईं और आज भी अनुसूचित जातियाँ आर्थिक दृष्टि से पिछड़ी हुई हैं।

स्वास्थ्य का नीचा स्तर
घृणित पेशे करने के कारण इनके जीवन स्तर पर काफी प्रभाव पड़ता था। ये लोग शहरों तथा ग्रामों के मध्य सवर्ण हिन्दुओं के बीच अपने मकान नहीं बना सकते थे। गन्दी बस्तियों में रहने के फलस्वरूप इनके जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ता रहा है।

अशिक्षा
अस्पृश्य जातियों के व्यक्ति उच्च जाति के लोगों के साथ नहीं बैठ सकते थे जिसके कारण अस्पृश्यों के बच्चों को स्कूलों में प्रवेश नहीं दिया जाता था। ब्राह्मण लोग अस्पृश्यों को शिक्षा देना धर्म के विरुद्ध समझते थे। इस हेतु ये लोग प्राय: शत-प्रतिशत अशिक्षित होते थे तथा आज भी अनुसूचित जातियों में शिक्षा का स्तर उच्च जातियों की अपेक्षा काफी भिन्न है।
स्वतन्त्र भारत में संवैधानिक रूप से अस्पृश्यों को विभिन्न प्रकार के संरक्षण प्रदान किए गए हैं, किन्तु इससे पूर्व उन्हें किसी भी प्रकार के राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं थे।

भारत में अस्पृश्यता निवारण

अस्पृश्यता भारतीय समाज के लिए एक बहुत बड़ा कलंक रही है। इसीलिए इसके निवारण के लिए अनेक प्रयास किए गए हैं। आज औद्योगीकरण, नगरीकरण, लौकिकीकरण, प्रजातान्त्रिक व्यवस्था, शिक्षा तथा अनेक ऐसे कारकों से जातीय दूरी कम हुई है तथा अस्पृश्यों के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन हुआ है। ऐसे लोगों की संख्या काफी हो गई है जो अस्पृश्यता को आमूल-चूल रूप में समाप्त करना चाहते हैं। स्वयं अनुसूचित जातियों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता में वृद्धि हुई है तथा स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् आरक्षण नीति एवं इनको उपलब्ध विशेष सुविधाओं के परिणामस्वरूप इनके सामाजिक-आर्थिक स्तर में भी सुधार हुआ है।
अस्पृश्यता निवारण के प्रयासों को निम्नलिखित दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-

सुधार आन्दोलन अथवा गैर
सरकारी प्रयास समाज सुधारकों द्वारा समय समय पर अस्पृश्यता के निवारण के लिए आन्दोलन किए जाते रहे हैं। महात्मा बुद्ध, रामानुज, कबीर, सेन, चैतन्य, नानक, नामदेव, तुकाराम, रैदास आदि विद्वानों के नाम इन आन्दोलनों से जुड़े हुए हैं। स्वयं अस्पृश्य जातियों द्वारा उन्नीसवीं शताब्दी में दक्षिण में ऐसे आन्दोलनों की शुरूआत की गई। श्री ज्योतिबा फुले एवं डॉ० अम्बेडकर ने अस्पृश्यों को संगठित करके ऐसे आन्दोलनों को आगे बढ़ाया। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भी अनेक संगठन, संघ व आश्रम अस्पृश्यता निवारण तथा हरिजनोद्धार के कार्यों में लगे हुए हैं। इन सभी के प्रयासों को भी दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-
  1. स्वयं अस्पृश्य जातियों द्वारा आन्दोलन- अस्पृश्यता निवारण के प्रयासों में स्वयं अस्पृश्य जातियों द्वारा किए जाने वाले आन्दोलनों का मुख्य स्थान है। उन्नीसवीं शताब्दी में दक्षिण में ऐसे आन्दोलनों की शुरुआत हुई क्योंकि दक्षिण में अस्पृश्यों पर अधिक कुठाराघात किया जाता था। इस आन्दोलन के अग्रणी नेता पूना के श्री ज्योतिबा फुले थे जिन्होंने 'सत्य-शोधन समाज' की स्थापना करके अस्पृश्यों को उनके अधिकार दिलाने का प्रयास किया। बाद में डॉ. अम्बेडकर के नेतृत्व में यह आन्दोलन आगे बढ़ा। 1920 ई० में इनके नेतृत्व में 'अखिल भारतीय दलित वर्ग संघ' एवं 'अखिल भारतीय दलित वर्ग फेडरेशन' स्थापित किए गए जिनके माध्यम से अस्पृश्यों के अधिकारों की आवाज उठाई गई। 1931 ई० में गोल मेज कॉन्फ्रेन्स में डॉ० अम्बेडकर इनके लिए पृथक् निर्वाचन की माँग को स्वीकार कराने में सफल हो गए, परन्तु गांधी जी ने इन्हें हिन्दुओं का ही अंग स्वीकार करते हुए अनशन प्रारम्भ कर दिया। 30 दिसम्बर, 1931 ई० को बम्बई में पं० मदनमोहन मालवीय की अध्यक्षता में एक विशाल सभा हुई और 1932 ई० में सारे देश में अस्पृश्यता निवारण के लिए 'अखिल भारतीय सेवक संघ' की स्थापना की गई। इस संघ ने अस्पृश्यों को उनके अधिकार दिलाने एवं निर्योग्यताओं को समाप्त कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस संघ के प्रयासों द्वारा इनके लिए 1,130 शिशु मन्दिर, 1,018 छात्रावास, 67 धर्मशालाएँ एवं 1,995 कुओं की व्यवस्था की गई तथा अस्पृश्यता विरोधी प्रचार में भी तीव्रता आई। इस संघ के प्रयासों के परिणामस्वरूप इनमें शिक्षा का प्रसार हुआ तथा इनकी आर्थिक स्थिति में भी थोड़ा-बहुत सुधार आया।
  2. सवर्ण हिन्दुओं द्वारा आन्दोलन- अस्पृश्यता निवारण आन्दोलन में सवर्ण हिन्दुओं एवं इनके द्वारा बनाए गए संगठनों का भी महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। इनकी सामाजिक-आर्थिक निर्योग्यताओं को दूर करने के लिए ब्रह्म समाज, आर्य समाज तथा रामकृष्ण मिशन ने काफी प्रयत्न किया है। गांधी जी के नेतृत्व में हरिजनोद्धार की दृष्टि से अनेक सुधार समितियों का गठन किया गया। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भी अनेक संगठन, संघ तथा आश्रम अस्पृश्यता निवारण तथा इनके कार्य में लगे हुए हैं।

सरकारी प्रयास
अंग्रेजी शासनकाल में ही अस्पृश्यता निवारण के सरकारी प्रयास प्रारम्भ हो गए थे। 1920 ई० में कांग्रेस ने अस्पृश्यता निवारण को अपने प्रयोग का एक महत्त्वपूर्ण अंग बनाया। 1936 ई० में कांग्रेस मन्त्रिमण्डलों की स्थापना के बाद इनकी अवस्था सुधारने के प्रयास शुरू किए गए। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् संविधान का निर्माण करते समय अस्पृश्यता निवारण को सामने रखा गया जिसका परिणाम यह है कि हमारा संविधान किसी भी नागरिक के प्रति धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान या अन्य किसी आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता। संविधान में अस्पृश्यों को सार्वजनिक संस्थाओं में प्रवेश की अनुमति प्रदान की गई है और इनकी निर्योग्यताओं की समाप्ति तथा अस्पृश्यता को फैलाने या मानने वालों के लिए कठोर दण्ड की व्यवस्था की गई है। 1955 ई० में अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम पारित किया गया जिसमें निर्योग्यताओं को समाप्त कर अस्पृश्यता के लिए कठोर दण्ड की व्यवस्था रखी गई। इसके अतिरिक्त, इनके लिए अनेक कल्याण कार्यों से सम्बन्धित योजनाएँ बनाई गई हैं, विधानमण्डलों में इनको प्रतिनिधित्व दिया गया है तथा सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सुविधाएँ प्रदान की गई हैं। इनकी आर्थिक दशा सुधारने के लिए इन्हें कुटीर उद्योगों की स्थापना व गृह निर्माण के लिए ऋण सुविधाएँ उपलब्ध करवाई गई हैं तथा पंचवर्षीय योजनाओं में इनके कल्याण के लिए काफी पैसा खर्च किया जा रहा है।

अस्पृश्यता-निवारण के लिए सुझाव

गैर-सरकारी तथा सरकारी प्रयासों के परिणामस्वरूप अस्पृश्यता में कमी तो हुई है परन्तु यह कुरीति पूरी तरह से समाप्त नहीं हो पाई है। अस्पृश्यता निवारण के लिए प्रभावशाली सुझाव इस प्रकार हैं-
  1. इन जातियों के लोगों की आर्थिक दशा में सुधार के लिए और अधिक ठोस कदम उठाए जाने चाहिए ताकि जीवन-स्तर ऊँचा होने के कारण इनकी निर्योग्यताएँ समाप्त हो सकें।
  2. अस्पृश्यता निवारण के लिए चलचित्रों, नाटकों, गीतों व लघुचित्रों द्वारा जनमत तैयार किया जाना चाहिए।
  3. इन जातियों को अन्य लोगों के साथ रहने से सम्बन्धित गृह-निर्माण नीति बनाई जानी चाहिए।
  4. शिक्षा सुविधाओं के साथ-साथ इन्हें अतिरिक्त कोचिंग सुविधाएँ भी प्रदान की जानी चाहिए ताकि इनका शिक्षा का स्तर ऊँचा हो सके।
  5. जो घृणा वाले निम्न पेशे हैं, उनमें भौतिक सुधार होना चाहिए।
  6. जाति व्यवस्था को समाप्त करके अस्पृश्यता समाप्त की जा सकती है क्योंकि अस्पृश्यता जाति व्यवस्था का ही एक अंग है।
  7. इनके लिए प्रौढ़ शिक्षा की सुविधाएँ उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
  8. इन्हें स्वस्थ मनोरंजन की सुविधाएँ प्रदान की जानी चाहिए।
  9. इन्हें सरकार द्वारा सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए।
  10. अन्तर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
यद्यपि अस्पृश्यता काफी सीमा तक समाप्त हो गई है, तथापि पूर्व अस्पृश्य जातियों, जिन्हें अब अनुसूचित जातियाँ कहा जाता है, का सामाजिक असमता के कारण अत्याचार और उत्पीड़न आज भी कम नहीं हुआ है। अस्पृश्यता के कारण इन्हें जिन सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता था उसके कारण ये जातियाँ अनेक प्रकार के अत्याचारों और उत्पीड़न का शिकार हो गई हैं। लगभग सभी राज्यों में अनुसूचित जातियों पर उत्पीड़न
और अत्याचार के समाचार निरन्तर मिलते रहते हैं। इनमें इनकी भूमि को अवैध रूप से छीन लेना, उनसे बेगार लेना तथा बँधुआ मजदूरों के रूप में काम लेना, महिलाओं से दुर्व्यवहार एवं शोषण, हत्याएँ, लूटमार तथा जमीन के खरीदने व बेचने में अनियमितताएँ इत्यादि प्रमुख हैं। इन्हें जिन्दा जला देने की घटनाएँ भी सुनने में आती हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इन सभी प्रकार के अत्याचार और उत्पीड़न पर कठोरता से नियन्त्रण रखा जाए। इसके लिए राज्य सरकारों को विशेष उपाय करने की जरूरत है तथा पुलिस फोर्स को इसके लिए स्पष्ट निर्देश दिए जाने अनिवार्य हैं। अगर कानून के रक्षक पुलिस वाले ही इस प्रकार के मामलों में संलग्न होने के दोषी पाए जाते हैं तो उन्हें कठोर दण्ड देने की आवश्यकता है। अत्याचार पीड़ित लोगों को उदार अनुदान देने एवं पुनर्वास की सुविधाएँ भी तुरन्त उपलब्ध की जानी चाहिए।
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