औरंगजेब - औरंगज़ेब का इतिहास | aurangzeb history in hindi

औरंगजेब का प्रारम्भिक जीवन

मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब का जन्म 3 नवम्बर, 1618 ई को उज्जैन के निकट दोहद में हुआ था। उस समय उसका बाबा जहांगीर दक्षिण से आगरा लौट रहा था। अपने पिता शाहजहां के विद्रोहकाल में औरंगजेब और उसके बड़े भाई दारा को अत्यधिक कष्ट सहने पड़े। इन दोनों को नूरजहां के पास बंधन के रूप में रखा गया और जब शाहजहां ने समर्पण कर दिया और उसे क्षमा कर दिया गया, तब इन दोनों को मुक्त किया गया। इन सब बातों के कारण उसकी शिक्षा 10 वर्ष की आयु में योग्य शिक्षकों के संरक्षण में प्रारम्भ की गयी। वह बहुत प्रखर बुद्धि तथा परिश्रमी विद्यार्थी था। वह कुरान और हदीस जैसी धार्मिक पुस्तकों का पण्डित हो गया। अल्पायु में ही वह अरबी और फारसी का अच्छा ज्ञाता हो गया। साथ में उसने तुर्की तथा हिन्दी भी सीख ली। उसे धार्मिक विषयों के अध्ययन में विशेष रूचि थी, परन्तु चित्रकला, संगीत तथा अन्य ललित कलाओं की ओर उसने कोई ध्यान नहीं दिया। इसके साथ-साथ उसे सैनिक शिक्षा का भी उचित ज्ञान कराया गया और वह शीघ्र ही कुशल सैनिक बन गया।
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1634 ई. के अंत में उसे दस हजार जात और चार हजार सवार के पद पर मनसबदार नियुक्त किया गयां ओरछा के जूझारसिंह के विरुद्ध बुन्देल आक्रमण का भार उसे ही सौंपा गया। वहां पर उसने कूटनीति और युद्ध का प्रथम अनुभव प्राप्त कियां इसके बाद उसे दक्षिण का राज्यपाल नियुक्त किया गया जहां वह 1636 ई. से 1644 ई. तक रहा। यहां अपने कार्यों के कारण वह एक कुशल सैनिक, प्रबंधक तथा कूटनीतिक माना जाने लगा। 18 मई, 1637 ई. को फारस के राजघराने के शाहनवाज की पुत्री दिलरास बानो बेगम के साथ औरंगजेब का पाणिग्रहण-संस्कार हुआ। अपने बड़े भाई दारा से विचार-भेद हो जाने के कारण 1644 ई. में उसे दक्षिण के राज्यपाल की नौकरी से त्यागपत्र देना पड़ा। परन्तु फरवरी 1645 ई. में उसे क्षमा कर दिया गया और गुजरात का राज्यपाल नियुक्त किया गयां वहां वह 1647 ई. तक रहा जहां से उसे बल्ख के आक्रमण का भार संभालना पड़ा। कुशल सेनापति होते हुए भी औरंगजेब ट्रान्स-ऑक्सियाना विजित न कर सका। सम्राट ने उसे वापस बुला लिया और मुल्तान का राज्यपाल नियुक्त किया जिस पद पर वह 1648 ई से 1652 ई. तक कार्य करता रहा। इसी बीच उसे 1649 ई और 1652 ई. में दो बार कन्धार को पुनर्विजित करने के लिए भेजा गया, परन्तु इन दोनों आक्रमणों में वह असफल रहा। इन असफलताओं के कारण शाहजहां बहुत अप्रसन हुआ और 1652 ई. में उसे पुन: दक्षिण का राज्यपाल बनाकर भेज दिया। औरंगजेब इस बार दक्षिण भारत में 1652 ई. से 1658 ई. तक राज्यपाल रहा।
अपने राज्यपाल-काल में औरंगजेब ने उच्चकोटि की प्रबंध शक्ति तथा कर्त्तव्य-परायणता का परिचय दिया। परन्तु इसके साथ-साथ वह अपने दल का शक्तिशाली संगठन करके अपने पिता का सिंहासन प्राप्त करने की चेष्टा में भी लगा रहता था। कट्टर सुन्नी होने के कारण वह हिन्दुओं और विशेषकर राजपूतों को नापसन्द करता था। धार्मिक असहिष्णुता की नीति का पालन करके उसने खुल्लमखुल्ला राजपूतों को अपमानित भी किया। बीजापुर और गोलकुण्डा के युद्ध में जब विजयश्री उसके चरण चूमने वाली थी तभी उसने अपने पिता शाहजहां की बीमारी और मृत्यु की अफवाहें सुनीं। यह सुनते ही उसने उत्तराधिकारी होने तथा सिंहासन प्राप्त करने का इच्छुक होने के नाते उत्तराधिकार युद्ध की तैयारियां प्रारम्भ कर दी।

औरंगजेब का राज्याभिषेक

आगरा दुर्ग को विजित कर तथा अपने पिता को उसमें बंदी बनाकर मुरादबख्श के सिंहासन प्राप्त करने के दावों को समाप्त करने के बाद 31 जुलाई, 1658 ई. को हड़बड़ी में औरंगजेब बहादुर आलमगीर बादशाह गाजी की उपाधि ग्रहण की। क्योंकि उसे दारा का पीछा करके शुजा के साथ युद्ध में फैसला करना बाकी था इसलिए उसने उत्सव तथा जश्न स्थगित कर दिये। खजुआ और अजमेर पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् 15 मई, 1659 ई. को सम्राट औरंगजेब ने दिल्ली में एक शानदार जुलूस के साथ प्रवेश किया। शाहजहां के भव्य महल में बहुत ठाट और धूमधाम के साथ उसका राज्याभिषेक-संस्कार सम्पन्न हुआ। 15 मई, 1659 ई. को ज्योतिषियों द्वारा बताये हुए समय, सूर्योदय से 3 घंटे 15 मिनट उपरान्त, उसने मयूर-सिंहासन पर आसन ग्रहण किया। राज्य में कई दिन तक खुशियां मनायी गयीं और उत्सव हुए। औरंगजेब चाहता था कि उसका राज्याभिषेक इतनी शान से मनाया जाय, जैसा कि किसी भी मुगल बादशाह के समय में न हुआ हो। इस कारण इस अवसर पर दिल खोलकर रुपये खर्च किये गये। बड़ी-बड़ी दावतें की गयीं तथा वृहत पैमाने पर रोशनियां की गयीं। अनेक सामन्तों तथा सरदारों की पद-वृद्धि तथा अनेक नये अफसर भी नियुक्त किये गये।

औरंगजेब के प्रारंभिक कार्य

औरंगजेब के शासक बनते समय राज्य में अव्यवस्था थी। अत: उसने निम्न प्रारम्भिक कार्य किये-
औरंगजेब ने सूबेदारों की इस तरह तबदीलियां कर दी कि वे मिलकर विद्रोह न कर सकें।
औरंगजेब ने राहदारी कर, पंढारी कर, अनाज कर आदि अनावश्यक कर हटाकर प्रजा को संतुष्ट करने का प्रयास किया। उसने हिन्दुओं पर से तीर्थयात्रा कर, गंगा में अस्थि प्रवाह कर, पुत्र जन्म पर कर आदि अनेक कर हटा दिये।
औरंगजेब ने अपनी मुस्लिम प्रजा को प्रसन्न करने के लिए सिक्कों पर 'कलमा' अंकित करवाना समाप्त कर दिया, ताकि वह हिन्दुओं के हाथों से छूकर अपवित्र न हो। ईरानी त्यौहार नौरोज को मनाना बंद कर दिया। उसने बड़े-बड़े नगरों में मुस्लिम लोगों को मद्यपान, जुआ एवं वेश्यागमन से रोकने हेतु 'मुहतसिब' नामक अधिकारी नियुक्त किये। उसने कई मस्जिदें बनवाईं व कई का पुनर्निमाण करवाया। उसने धार्मिक कार्यों हेतु इमाम तथा मुऊजनों को नियुक्त किया। उसने दारा के सूफी साथियों को दण्डित किया एवं शिरोमणि सरमद को इस्लाम की निन्दा के आरोप में मृत्युदण्ड दे दिया। उसने हजारों शिया मुसलमानों को मरवा दिया।

औरंगजेब की राजपूत नीति

धर्मान्ध औरंगजेब ने जयसिंह तथा जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद राजपूतों के प्रति प्रतिशोध की नीति को अपनाया। इस तरह उसने राजपूतों को अपना शत्रु बना दिया। इससे मुगल साम्राज्य को जन-धन की भारी हानि हुई और उसका पतन हो गया।

शत्रुता की नीति का प्रदर्शन
1678 ई. में मारवाड़ के राजा तथा मुगल फौजदार जसवंतसिंह की जमरौद (काबुल) में मृत्यु हो गई। जयसिंह की मृत्यु पहले ही हो चुकी थी। अतः औरंगजेब ने मारवाड़ को हड़पने का निश्चय किया। उसने मारवाड़ के हिन्दू मंदिरों को गिराने तथा वहां की हिन्दू जनता से जजिया कर वसूलने का आदेश दिया। उसने जसवंत सिंह के सम्बन्धी इन्द्रसिंह से 36 लाख रुपये लेकर उसे मारवाड़ का शासक बना दिया। अतः राजपूत असंतुष्ट हो गये।

अजीतसिंह से अन्याय एवं विरोध
इसी समय जसवंतसिंह की दो विधवा रानियों ने मारवाड़ जाते समय मार्ग में दो पुत्रों को जन्म दिया। इनमें एक तो मर गया, किन्तु दूसरा अजीतसिंह जीवित रहा। अतः स्वामिभक्त राजपूत सरदार इन्हें लेकर औरंगजेब के पास आये और उससे अजीतसिंह को मारवाड़ का शासक मान लेने की प्रार्थना की, किन्तु औरंगजेब ने उसे हरम में भेजने का आदेश दिया और शर्त रखी कि ऐसा करने से पहले अजीतसिंह को इस्लाम स्वीकार करना पड़ेगा। राजपूत इससे क्रूद्ध हो गये। वीर दुर्गादास ने अपने साथियों की मदद से अजीतसिंह तथा उसकी माताओं को मुक्त करवाकर मारवाड़ भेज दिया। मुगल सेना ने उनका पीछा किया, किन्तु उसे परास्त होना पड़ा।

मारवाड़ पर आक्रमण
औरंगजेब ने चाल चलते हुए एक ग्वाले के बच्चे को हरम में लाकर उसके असली अजीतसिंह होने की घोषणा की, किन्तु वह मारवाड़ की जनता को बेवकूफ न बना सका। मारवाड़ की जनता अजीतसिंह के साथ हो गई और इन्द्रसिंह को हटा दिया। सम्राट की आज्ञा पर शाहजादा अकबर ने मारवाड़ पर अधिकार कर लिया और उसे मुगल फौजदारों में बांट दिया। उसने मारवाड़ के मंदिरों को नष्ट करवाकर मस्जिदें बनवायीं। राजपूत पहाड़ों तथा जंगलों में छुपकर संघर्ष करते रहे।

मेवाड़ का विद्रोह
मेवाड़ के राणा राजसिंह ने मारवाड़ की दुर्दशा से क्रुद्ध होकर औरंगजेब के विरूद्ध विद्रोह कर दिया। मुगलों ने मेवाड़ पर आक्रमण कर लूट-मार की एवं 173 मंदिरों का विनाश किया। राणा राजसिंह पहाड़ियों में चला गया और गुरिल्ला प्रणाली से लड़ता रहा। अब औरंगजेब युद्ध का कार्य अकबर को सौंपकर दिल्ली लौट गया। राजपूतों ने अकबर को बहुत क्षति पहुंचाई। अत: औरंगजेब ने अकबर को मारवाड़ में तथा शहजादा आजम को मेवाड़ में नियुक्त किया, किन्तु कोई लाभ नहीं हुआ।

अकबर का विद्रोह
मारवाड़ में भी अकबर असफल रहा। अकबर ने सम्राट बनने के लिए राजपूतों से गठजोड़ किया तथा अपने पिता के विरूद्ध विद्रोह कर दिया। औरंगजेब विशाल सेना सहित अजमेर के पास आ डटा। उसने चालाकी से काम लेते हुए जाली पत्रों द्वारा अकबर तथा राजपूतों में संदेह उत्पन्न कर दिया। अकबर ने भागकर शिवाजी के पुत्र शम्भाजी के यहां शरण ली। उसका मराठों से गठजोड़ भी औरंगजेब के लिए चिंता का कारण बना रहा।

मेवाड़ के साथ संधि (1681 ई.)
औरंगजेब ने अपनी सेना को दक्षिण की तरफ मोड़ने के लिए मेवाड़ के साथ संधि करना उचित समझा। अतः जून, 1681 ई. को औरंगजेब तथा मेवाड़ के राणा जयसिंह के बीच संधि हो गयी, जिसके अनुसार-
जयसिंह को मेवाड़ का राणा मान लिया गया एवं उसे पांच हजार का मनसब दिया गया।
जजिया कर के स्थान पर मुगल सम्राट को राणा ने कुछ परगने दे दिये।
राणा ने चित्तौड़ के दुर्ग का पुनर्निर्माण न करना स्वीकार किया।
राणा ने मारवाड़ को सहायता न देने का आश्वासन दिया।

मारवाड़ द्वारा संघर्ष
मारवाड़ ने इस संधि के बाद भी अपना संघर्ष जारी रखा। 1681 ई. से 1687 ई. तक राजपूत बिना किसी प्रसिद्ध नेता के संघर्ष करते रहे। दुर्गादास इन दिनों दक्षिण गया हुआ था। इसके बाद उन्होंने दुर्गादास के नेतृत्व में संघर्ष किया एवं दिल्ली तक जा पहुंचे। 1690 ई. में अजमेर का सूबेदार उनके हाथों परास्त हुआ। मारवाड़ का संघर्ष रुक-रुककर औरंगजेब की मृत्यु तक चलता रहा। उसकी मृत्यु के बाद 1707 ई. में अजीतसिंह मारवाड़ का शासक बन गया। औरंगजेब के पुत्र बहादुरशाह ने उसे मान्यता दे दी।

राजपूत नीति के परिणाम
औरंगजेब की राजपूत नीति मुगल साम्राज्य के पतन का कारण सिद्ध हुई। औरंगजेब मारवाड़ तथा मेवाड़ को निर्णायक रूप से पराजित न कर सका। औरंगजेब की राजपूत नीति के निम्न परिणाम हुए-
  • राजपूत मुगलों के शत्रु बन गये तथा अब उनका मुगल सम्राट पर विश्वास न रहा। औरंगजेब ने उनके मंदिरों का विनाश करवाया, उनसे जजिया कर वसूल किया तथा अजीतसिंह से अन्याय किया। अतः राजपूतों ने मुगलों से संघर्ष छेड़ दिया। इससे साम्राज्य में अव्यवस्था फैल गई।
  • लेनपूल ने लिखा है, "जब तक वह कट्टरपंथी अकबर के सिंहासन पर बैठा रहा, एक भी राजपूत उसे बचाने के लिए अपनी उंगली भी हिलाने को तैयार न था। औरंगजेब को अपनी दाहिनी भुजा खोकर दक्षिण के शत्रुओं के साथ युद्ध करना पड़ा।" राजपूतों ने औरंगजेब को दक्षिणी अभियानों में कोई सहयोग नहीं दिया, अतः वह दक्षिण में सफलता प्राप्त न कर सका।
  • राजपूतों से संघर्ष के कारण साम्राज्य में अव्यवस्था फैल गई। इससे हाजस्थान के साथ-साथ मालवा तथा गुजरात में भी अराजकता फैल गई। अतः दक्षिण जाने वाला मार्ग असुरक्षित हो गया। साम्राज्य में लूटमार मचने से सैनिक, प्रशासनिक तथा आर्थिक शक्ति को धक्का पहुंचा। जे.एन. सरकार के अनुसार, "राजस्थान में फैली हुई गड़बड़ ने शीघ्र ही पड़ोसी प्रदेशों को अपनी लपेट में ले लिया और साम्राज्य के लिए विचित्र कठिनाइयां उत्पन्न कर दी।"
  • राजपूतों के संघर्ष से राज्य को जन-धन की बहुत हानि हुई। आर्थिक अवस्था बिगड़ गयी एवं इन अभियानों से कोई लाभ नहीं हुआ। के.एम पन्निकर के अनुसार, “इन राजपूत युद्धों ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि साम्राज्य न केवल अपनी प्रजा के सहयोग से ही वंचित है, अपितु सैनिक दृष्टिकोण से भी शक्तिशाली नहीं है।" ।
  • औरंगजेब के अंतिम वर्षों में राजपूतों ने अचानक हमले कर साम्राज्य को बहुत नुकसान पहुंचाया एवं शाही अभियानों को असफल कर दिया। एसआर. शर्मा के शब्दों में, “संघर्ष के अंतिम वर्षों में राजपूतों का विरोध इतना प्रबल हो गया कि शाही सेनाओं को कई बार पराजय का सामना करना पड़ा। इस वीर जाति के योद्धाओं ने भीमसिंह और दयालदास के नेतृत्व में न केवल मुगल सेनाओं को ही नीचा दिखाया. अपितु मालवा और गुजरात के प्रदेशों में लूटमार भी की।"
  • अनेक कठिनाइयों के बाद भी राजपूत सफल हुए और अजीतसिंह मारवाड़ का शासक बन गया। इस संघर्ष ने मुगल साम्राज्य को पतन के मार्ग पर ला खड़ा किया।

औरंगजेब की दक्षिण नीति

औरंगजेब की दक्षिण नीति भी बड़ी घातक सिद्ध हुई। सर जे.एन. सरकार के अनुसार, "जिस प्रकार नेपोलियन के स्पेन के विरुद्ध अभियान उसके लिए एक रिसता हुआ घाव सिद्ध हुए, इसी प्रकार औरंगजेब के दक्षिणी अभियान उसके साम्राज्य के लिए घातक सिद्ध हुए।" आरंभ में मुगल सूबेदार ही दक्षिण में लड़ते रहे, किन्तु दरबार द्वारा विद्रोह कर दक्षिण चले जाने तथा मराठों से गठबंधन करने पर सम्राट ने स्वयं दक्षिणी अभियान किये। इन दक्षिणी अभियानों के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार थे-
  • औरंगजेब बीजापुर एवं गोलकुण्डा के शिया राज्यों तथा शक्तिशाली बनते जा रहे मराठों को कुचलना चाहता था।
  • वह अकबर के विद्रोह को दबाना चाहता था।
एस.आर. शर्मा के अनुसार, “बीजापुर और गोलकुण्डा की आंतरिक दुर्बलता तथा मराठों के प्रति उनके बढ़ते हुए झुकाव ने औरंगजेब के लिए दक्षिण की ओर पग उठाना अनिवार्य कर दिया था।" औरंगजेब 25 वर्षों तक दक्षिण में जूझता रहा, किन्तु असफल रहा। उसकी दक्षिण नीति साम्राज्य के लिए बहुत घातक सिद्ध हुई।

औरंगजेब के दक्षिणी अभियान

औरंगजेब ने पहले शहजादा आजम को विशाल सेना सहित अकबर के विरूद्ध भेजा। तत्पश्चात् स्वयं ने भी विशाल सेना सहित कूच करके 1681 ई. में बुरहानपुर नामक स्थान पर डेरे डाल दिये। पहले चार वर्षों तक वह मराठों से उलझा रहा। इसी दौरान उसने अकबर को पकड़ने के असफल प्रयत्न किये। तब उसने अनुभव किया कि बीजापुर तथा गोलकुण्डा पर अधिकार किये बिना मराठों को कुचलना संभव नहीं है, क्योंकि इन राज्यों से मराठों को सहायता मिलती है। अतः उसने इन राज्यों पर अधिकार करने का निश्चय किया।

बीजापुर पर अधिकार
अप्रैल, 1658 ई. में शहजादा आजम ने बीजापुर को घेर लिया, किन्तु गोलकुण्डा तथा मराठों की मदद से बीजापुरियों ने 15 मास तक उनका डटकर सामना किया। अतः मुगल सेना निराश हो गई, किन्तु जुलाई, 1686 ई. में स्वयं सम्राट ने रणक्षेत्र में पहुंचकर युद्ध का संचालन अपने हाथ में ले लिया। घेरे को कड़ा कर दिया गया, जिससे बीजापुर को सहायता तथा खाद्य सामग्री नहीं मिल सकी। अतः बीजापुर के शासक सिकन्दर आदिलशाह ने रसूलपुर नामक स्थान पर मुगल सत्ता स्वीकार कर ली। उसे मुगल मनसबदार बना दिया गया तथा खान की उपाधि दी गई। बीजापुर को मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया।

गोलकुण्डा पर अधिकार
गोलकुण्डा के शासक अब्दुल हसन ने बीजापुरियों को सहायता दी थी तथा मराठों से भी गठजोड़ कर रखा था। वह हिन्दुओं के प्रति काफी उदार था। उसने राज्य का शासन मदन नामक ब्राह्मण व्यक्ति को सौंप रखा था। अत: औरंगजेब ने शहजादे मुअज्जम को गोलकुण्डा पर आक्रमण करने की आज्ञा दी। शहजादे मुअज्जम ने कुछ संघर्ष के बाद गोलकुण्डा से संधि कर ली, जिसे विवश होकर औरंगजेब ने स्वीकार किया।
औरंगजेब ने 1687 ई. में गोलकुण्डा का दुर्ग घेर लिया, किन्तु वह उस पर अधिकार न कर सका। अंत में, उसने 2 अक्टूबर, 1687 ई. की रात्रि को दुर्ग का पूर्वी द्वार खोल दिया। दुर्ग रक्षक अब्दुल रज्जाक तथा उसके साथियों ने मुगल सैनिकों का डटकर सामना किया। एस.आर. शर्मा के अनुसार, "गोलकुण्डा के दुर्ग में वीर अब्दुल रज्जाक ने मुगलों का सामना उस साहस तथा वीरता से किया, जिस प्रकार चांदबीबी ने अहमदनगर के दुर्ग में किया था।"
घायल होकर बंदी बनने पर अब्दुल रज्जाक ने औरंगजेब से कहा, "जिसने अब्दुल हसन का नमक खाया है, वह किसी भी तरह औरंगजेब आलमगीर की सेवा में नियुक्त नहीं हो सकता।" उसने रज्जाक के उपचार के लिए दो वैद्यों को भेजा। औरंगजेब ने उसके साहस से प्रभावित होकर कहा, “यदि अब्दुल हसन के पास इस प्रकार का एक और सरदार होता तो उसके दुर्ग पर कभी भी हमारा अधिकार नहीं हो सकता था।"
गोलकुण्डा विजय के बाद अब्दुल हसन को पचास हजार रुपये वार्षिक पेंशन देकर दौलताबाद भेज दिया गया। गोलकुण्डा मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया। मुगलों को सात करोड़ रुपये मिले व अपार सोना-चांदी मिला।

मराठों से संघर्ष
औरंगजेब ने नवम्बर, 1689 ई. में मराठा शम्भाजी को परास्त करके उसका निर्दयतापूर्वक वध करवा दिया। उसके बाद भी भराठे उसके भाई राजाराम के नेतृत्व में संघर्ष करते रहे। धीरे-धीरे मराठों का विद्रोह व्यापक होता गया और राष्ट्रीय विरोध में परिवर्तित हो गया। औरंगजेब इसे नहीं कुचल सका। अतः विवश होकर उसने युद्ध बंद करके उत्तरी भारत की तरफ कूच किया किन्तु मार्ग में ही 1707 ई. में बुरहानपुर नामक स्थान पर उसकी मृत्यु हो गई।

दक्षिण नीति के परिणाम
औरंगजेब की दक्षिण नीति भी असफल रही। इससे साम्राज्य को जन-धन की अपार क्षति हुई तथा वह पतन के मार्ग पर बढ़ने लगा। एस.आर. शर्मा के अनुसार, “दक्षिण उसके लिए कब्रिस्तान सिद्ध हुआ और जब 1707 ई. में उसे वहां दफनाया गया तो एक सम्राट की लाश ही नहीं, बल्कि अन्य अनेक चीजें भी कब्र के नीचे दब गई।" वी.ए. स्मिथ के अनुसार, "दक्षिण सम्राट के जीवन, उसके साम्राज्य तथा गौरव के लिए काल सिद्ध हुआ।" उसकी दक्षिण नीति के निम्न प्रभाव पड़े-
  1. बीजापुर तथा गोलकुण्डा मुगलों तथा मराठों के बीच दीवार का काम करते थे, किन्तु औरंगजेब द्वारा इन पर अधिकार करने से उनमें सीधी टक्कर होने लगी। बीजापुर तथा गोलकुण्डा के पदच्युत सैनिक मराठों से जा मिले। औरंगजेब मराठा शक्ति को कुचल न सका। मराठों के विद्रोह से राज्य में अराजकता फैल गई।
  2. मुगल अभियानों तथा मराठा लुटेरों से दक्षिण में कृषि, व्यापार तथा उद्योग को भारी नुकसान पहुंचा तथा मार्ग असुरक्षित हो गये। फसलों के नष्ट होने से साम्राज्य की आर्थिक स्थिति डांवाडोल हो गई। जे.एन. सरकार के अनुसार, "इन युद्धकालीन परिस्थितियों में ग्राम-उद्योग तथा औद्योगिक वर्ग लगभग समाप्त हो गये। कृषकों तथा मजदूरों को अकाल का सामना करना पड़ा और मुगल सैनिकों की लूटमार तथा स्थानीय कर्मचारियों के अत्याचारों से किसानों की दशा दयनीय हो गयी। मद्रास की ओर से विदेशियों के साथ व्यापार स्थगित हो गया और सरकार के अनुचित कार्यों ने स्थिति को अधिक गंभीर बना दिया।"
  3. दक्षिण में युद्धों के कारण औरंगजेब को 25 वर्षों तक दक्षिण में रहना पड़ा और उत्तर से मुगल सैनिकों को भी वहां बुलवाना पड़ा। अतः उत्तरी भारत में अराजकता फैल गई। मालवा, जौनपुर तथा बंगाल के पठानों, जाटों, राजपूतों एवं सिक्खों आदि ने विद्रोह कर दिया। मेवाती भी लूटमार करने लगे। अतः साम्राज्य का विघटन होने लगा।
  4. दक्षिणी अभियानों में दो लाख सैनिक तथा असैनिक कर्मचारियों का खर्चा उठाना पड़ा। युद्ध एवं खाद्य-सामग्री पर भी अपार धन व्यय हुआ। कृषि, व्यापार नष्ट होने के कारण राज्य की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गयी। इस कारण सैनिकों को तीन वर्षों तक वेतन नहीं मिला तथा भूखमरी के कारण वे युद्ध के प्रति उदासीन हो गये। अतः शाही अभियान असफल रहे तथा शाही प्रतिष्ठा को आघात पहुंचा।
  5. बीजापुर एवं गोलकुण्डा विजय से मुगल साम्राज्य बहुत विशाल हो गया, जिससे उसे व्यवस्थित रखना कठिन हो गया। साम्राज्य में अनेक विद्रोह होने से जन-धन की भारी हानि हुई। साम्राज्य में इतनी अराजकता फैल गई कि दूरस्थ प्रांतों पर उसका कोई नियंत्रण नहीं रहा। अतः औरंगजेब के सामने ही साम्राज्य विघटित होने लगा।
  6. औरंगजेब अपने दक्षिणी भारत की सुन्दर ललितकलाओं को प्रोत्साहन न दे सका। इतना ही नहीं, उसने भारत की सुन्दर कलाकृतियों को नष्ट कर भारतीय संस्कृति को गहरी क्षति पहुंचाई। अतः हमें औरंगजेब के शासनकाल की कोई यादगार इमारत, पुस्तक अथवा तस्वीर देखने को नहीं मिलती।
  7. मुगल सैनिक निरन्तर युद्धों के कारण युद्ध के प्रति उदासीन हो गये। इसी प्रकार शाही सरदारों का नैतिक पतन हो गया था और राज्य आर्थिक दृष्टि से जर्जर हो चुका था। जे.एन सरकार ने ठीक ही लिखा है, "मुगल शासन का वास्तव में नाश हो चुका था, परन्तु सम्राट की उपस्थिति के कारण भ्रमात्मक ढंग से प्रशासन की गाड़ी खिंच रही थी।' दक्षिण के वातावरण से तंग होकर मुगल सेनापति भी उत्तर में लौटने का प्रयास करने लगे। अतः मुगल सैन्य शक्ति को आघात पहुंचा तथा वह सुसंगति न रही।
औरंगजेब की दक्षिण नीति उसके साथ-साथ उसके साम्राज्य को भी ले डूबी। स्मिथ के अनुसार, "दक्षिण औरंगजेब की प्रतिष्ठा और उसके शरीर के लिए कब बन गया।' वस्तुतः मुगल साम्राज्य का पतन औरंगजेब की दक्षिण नीति के साथ-साथ उसकी धार्मिक नीति, राजपूत नीति, मराठा नीति तथा सिक्खों, जाटों तथा सतनामियों के विद्रोहों के कारण हुआ था।

औरंगजेब तथा मराठे
औरंगजेब मराठों की बढ़ती शक्ति से आशंकित था। इस समय मराठा नेता शिवाजी हिन्दूशाही की स्थापना के लिए प्रयत्नशील थे एवं वे छापामार प्रणाली द्वारा मुगल प्रदेशों को लूटते थे। शिवाजी के हाथों बीजापुर के सेनापति अफजल खां के मारे जाने के बाद औरंगजेब ने मराठों के दमन का निश्चय किया, अतः उसने जुलाई 1659 ई. में अपने मामा शाहस्ता खां को दक्षिण का सूबेदार बनाकर शिवाजी के दमन की आज्ञा दी।

शाहइस्ता खां तथा शिवाजी
शाइस्ता खां ने 1660 ई. में महाराष्ट्र पर आक्रमण कर दिया। इस समय शिवाजी पनहाला के दुर्ग में बीजापुरियों से घिरे हुए थे। अतः शाइस्ता खां पूना तथा चक्कन जीतता हुआ कोंकण की तरफ बढ़ा। इस समय तक शिवाजी बीजापुरियों का घेरा तोड़ चुका था। अब उसने पहले रत्नगिरि के समीप तथा फरवरी, 1661 ई. में पुनः मुगलों को परास्त किया एवं उन्हें भारी क्षति पहुंचायी।।
अप्रैल, 1663 ई. में रात्रि को शिवाजी ने पूना के निकट 400 वीर सैनिकों सहित अचानक शाइस्ता खां के शिविर पर आक्रमण कर दिया, जिससे उसका एक पुत्र, छ: पत्नियां एवं चालीस सेवक मारे गये तथा शाइस्ता खां की भी एक अंगुली कट गयी। वह बड़ी मुश्किल से जान बचाकर भागा। अतः क्रुद्ध होकर औरंगजेब ने शाइस्ता खां को हटाकर बंगाल के सूबेदार को नियुक्त किया।

जयसिंह तथा दिलेरखां का आक्रमण
सूरत की लूट में शिवाजी को एक करोड़ रुपये का माल मिला। अतः औरंगजेब ने अपने दो विख्यात सेनानायकों-जयसिंह तथा दिलेर खां को शिवाजी के दमन के लिये भेजा।
जयसिंह ने दक्षिण के कुछ सरदारों का सहयोग प्राप्त कर शिवाजी को पुरन्दर के दुर्ग में घेर लिया। कुछ संघर्ष के बाद शिवाजी को संधि करनी पड़ी, जिसके अनुसार उन्होंने मुगल सत्ता स्वीकार कर ली, 1665 ई. में पुरन्दर की संधि कर ली। इसके अनुसार शिवाजी ने मुगलों को 23 दुर्ग दे दिये तथा मुगल दरबार में उपस्थित होना स्वीकार कर दिया। मई, 1666 ई. में शिवाजी द्वारा मुगल दरबार में उपस्थित होने पर औरंगजेब ने उन्हें बंदी बनाकर आगरा भेज दिया। तीन मास बाद ही शिवाजी बड़ी चतुराई से फलों की टोकरी में छिपकर तथा भेष बदलकर दक्षिण पहुंच गये।

मुगलों से पुनः संघर्ष एवं राज्याभिषेक
दक्षिण पहुंचने के बाद तीन वर्ष तक शिवाजी व मुगलों ने एक-दूसरे से कोई छोड़छाड़ नहीं की। इस दौरान शिवाजी अपनी शक्ति बढ़ाते रहे। 1670 ई. में शिवाजी ने अपने खोये हुए प्रदेश पुनः प्राप्त कर लिये तथा मुगलों से बरार, खानदेश, बागलान, सालहर आदि प्रदेश भी मुगलों से छीन लिये। मुगल इन्हें पुनः प्राप्त करने में असफल रहे। शिवाजी ने सूरत को दो बार लूटा। दक्षिण में मुगल सूबेदार बहादुर खां एवं खानजहां शिवाजी का दमन नहीं कर सके, उल्टे शिवाजी मुगल प्रदेशों से चौथ कर वसूलने लगे। जून 1674 ई. में शिवाजी का स्वतंत्र शासक के रूप में राज्याभिषेक हुआ। उसने मैसूर एवं कर्नाटक पर छापे मारे। शिवाजी अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक मुगलों से संघर्ष करते रहे। 1680 ई. में उनकी मृत्यु हो गयी।

शम्भाजी का वध
शिवाजी के पुत्र शम्भाजी ने भी मुगल प्रदेशों में लूटमार तथा उन पर अधिकार करने की नीति अपनायी। उसने विद्रोही शहजादे अकबर को शरण दी तथा मुगलों से संघर्ष किया। बीजापुर एवं गोलकुण्डा पर मुगल अधिकार होने के बाद शम्भाजी की स्थिति खराब हो गई उसे पश्चिम में सिडियो एवं पुर्तगालियों का एवं पूर्व में मुगलों का सामना करना पड़ा। मार्च, 1689 ई. में उसे मुगलों ने बंदी बना लिया तथा उसका निर्ममतापूर्वक वध कर दिया।

रायगढ़ पर अधिकार
शम्भाजी के बाद उसके छोटे भाई राजाराम ने संघर्ष जारी रखा। मुगलों ने मराठा रायगढ़ पर अधिकार कर लिया। अतः राजाराम ने कर्नाटक के जिन्जी दुर्ग में आश्रय लिया। शम्भाजी की पत्नी तथा उसके पुत्र शाहू को बंदी बनाकर दिल्ली भेज दिया गया, जहां शाहू का मुस्लिम ढंग से पालन-पोषण हुआ।

जिन्जी दुर्ग पर मुगल अधिकार
मुगलों ने जिन्जी के दुर्ग पर घेरा डाल दिया, जो आठ वर्ष तक चलता रहा। इस दौरान रामचन्द्र नेरकर बावदेकर, शंकर जी मलहार, परशुराम त्रियम्बक आदि मराठा सरदारों के रणक्षेत्र में कूदने से मराठा विद्रोह बहुत प्यापक हो गया। मुगल सेनापति कासिम खां भी मराठों के हाथों परास्त हुआ। मराठे निरन्तर शक्तिशाली होते गये। 1695 ई. में मुगलों ने जिन्जी पर अधिकार कर लिया, अतः राजाराम सतारा के दुर्ग में भाग गया। मार्च, 1700 ई. में राजाराम की सिंहगढ़ नामक स्थान पर मृत्यु हो गयी।

औरंगजेब के अंतिम प्रयास

राजाराम की मृत्यु के बाद उसकी विधवा पत्नी ताराबाई ने अपने पुत्र शिवाजी तृतीय को शासक बनाकर मुगलों का डटकर मुकाबला किया। 1698 ई औरंगजेब ने ब्रह्मपुरी नामक स्थान पर डेरे डालकर दुर्गों को विजय करने में असफल प्रयास किये। वह यदि एक दुर्ग पर अधिकार करता, तो दूसरा उसके हाथ से निकल जाता। जे.एन. सरकार का मानना है कि वह 1698 से 1705 ई. तक सतारा, पत्तहाला, रायगढ़, तोरान आदि दुर्गों पर विजय प्राप्त करता रहा एवं उन्हें खोता रहा। अंत में उसकी स्थिति इतनी खराब हो गयी कि मराठों ने उसे अहमदनगर नामक स्थान पर घेर लिया। निराश औरंगजेब ने दौलताबाद प्रस्थान किया, किन्तु 3 मार्च 1707 ई. को मार्ग में ही बुरहानपुर नामक स्थान पर उसका देहान्त हो गया।

औरंगजेब के मराठों के विरूद्ध असफलता के कारण

औरंगजेब निम्न कारणों से मराठों के विरूद्ध असफल रहा-
  • मुगलों के लिये दक्षिण की जलवायु प्रतिकूल थी। वे वहां की भौगोलिक स्थिति से परिचित नहीं थे तथा पर्वतों एवं असमतल भूमि में युद्ध लड़ने के आदी नहीं थे। दूसरी तरफ मराठे दक्षिण की जलवायु एवं उसकी भूमि से परिचित थे एवं छापामार प्रणाली से लड़ते थे।
  • मुगल मैदान में युद्ध करना जानते थे एवं गुरिल्ला प्रणाली से अनभिज्ञ थे। मराठे अचानक पहाड़ों से निकलकर मुगलों पर आक्रमण कर वापस पहाड़ों में छिप जाते थे। अतः मुगल उन्हें परास्त न कर सके।
  • औरंगजेब की सेना शिविरों में पड़े रहने के कारण दुर्बल, विलासी तथा आलसी हो गयी थी। वेतन न मिलने के कारण भी वे युद्ध के प्रति उदासीन हो गये थे। वे मराठों की छापामार युद्ध प्रणाली से परेशान हो गये थे और उत्तर भारत लौट जाना चाहते थे। उनमें कोई उत्साह नहीं था। दूसरी तरफ मराठे अपने देश, धर्म, जाति तथा संस्कृति की रक्षा के लिये लड़ते थे।
  • मराठों को योग्य नेतृत्व तथा सेनानायकत्व प्राप्त हुआ। शिवाजी, राजाराम, ताराबाई, धन्नाजी यादव, शांताजी घोरपड़े, परशुराम त्रियम्बक जी आदि में योग्यता कूट-कूटकर भरी थी। इसके विपरीत मुगल सेनानायकों में एकता नहीं थी। दिलेर खां एवं मुअज्जम के द्वेष के कारण कई मुगल अभियान असफल रहे। सम्राट भी काफी वृद्ध हो चुका था, अतः वह अपनी योग्यता का प्रदर्शन न कर सका।
  • मराठा विद्रोह शनैः शनैः फैलता गया 1695 ई. के बाद सम्राट को सम्पूर्ण मराठा जाति से संघर्ष करना पड़ा। जे. एन. सरकार के शब्दों में, "संग्राम के अंतिम वर्षों में मुगलों के सम्मुख कोई निश्चित मराठा नरेश और सरकार न रही। अनेक मराठा सरदार और उनके देशभक्त सैनिक भिन्न-भिन्न दिशाओं से मुगल साम्राज्य पर आक्रमण करने लगे और शाही सेनाओं के लिये एक ही साथ सभी दिशाओं में लड़ना असंभव हो गया। अतः उनकी रणक्षेत्र में पराजय होने लगी और मराठों का उत्साह तथा गौरव दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगा।
  • मराठों में राष्ट्र-प्रेम कूट-कूटकर भरा हुआ था तथा मुगलों से लड़ना वे अपना कर्त्तव्य समझते थे। रानाड़े के अनुसार, "इस स्वतंत्रता संग्राम में यदि कुछ मराठा सैनिक अथवा सेनानायक मृत्यु का ग्रास हो जाते थे, तो उनका स्थान लेने के लिये महाराष्ट्र के अन्य शूरवीर खड़े होते थे, जो अपनी देशभक्ति तथा उत्साह में अपने पूर्वगामियों से किसी प्रकार भी कम नहीं होते थे। इन परिस्थितियों में मुगल सम्राट का विजय प्राप्त करना सर्वथा असंभव था।"
  • यद्यपि औरंगजेब एक योग्य सेनानायक था, तथापि वृद्ध होने के कारण वह मराठों को दबा न सका। लेनपूल के अनुसार, "1706 ई. में औरंगजेब की आयु 88 वर्ष की हो चुकी थी। उसकी कमर झुक गई थी और उसका स्वास्थ्य गिर गया था। इसके बाद भी उसका उत्साह अटूट था और वह शत्रु के विरूद्ध लड़ने में पूर्णतया संलग्न था। ऐसी अवस्था में सम्राट के लिये अधिक समय तक युद्धरत रहना कठिन था। उसकी वृद्धावस्था ने उसकी महत्त्वाकांक्षा को पूरा न होने दिया और 1707 ई. उसका देहान्त हो गया।'
  • औरंगजेब के लम्बे समय तक दक्षिण में रहने के कारण उत्तरी भारत में अराजकता फैल गयी तथा विद्रोह होने लगे, अतः उसे उत्तरी भारत से आवश्यक सहायता न निल सकी।
  • राजपूतों ने औरंगजेब की दक्षिण में कोई सहायता नहीं की, अतः वह सफल न हो सका।

औरंगजेब के अंतिम दिन और नृत्यु

निरन्तर युद्धों के कारण औरंगजेब का स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन गिरता गया और 1705 ई. के लगभग बीमार पड़ गया। किन्तु कुछ समय बाद वह पुनः स्वस्थ होकर जनवरी 1706 ई. में अहमदनगर की तरफ गया। मार्ग में मराठा सैनिकों ने उसका पीछा किया। मुगलों द्वारा आक्रमण करने पर वे तितर-बितर हो गये, लेकिन ज्योंही हमलावर सेना अपनी मुख्य सेना से मिली, ज्यौंही मराठे पुनः संगठित हो गये। सम्राट के अहमदनगर पहुंचने पर मराठों के उसके शिविर को घेर लिया और बड़े भीषण युद्ध के बाद मई 1706 ई. में वे खदेड़े जा सके। सम्राट मराठों की शक्ति से आतंकित हो गया। जब मराठों के विरूद्ध मुगलों की असफलता का समाचार सुनता तो वह अपनी पगड़ी फेंकने लगता और होंठ काटने लगता। ऐसी स्थिति में उसका स्वास्थ्य गिरता गया। उसे अपने उत्तराधिकार की चिंता होने लगी। वह नहीं चाहता था कि उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्र भी संघर्षरत हो जाय। अतः उसने शाहजादे कामबख्श को शाही सम्मान के साथ बीजापुर भेजा, जिसका स्पष्ट अर्थ उसे अपना उत्तराधिकारी बनाना था। लेकिन वह अपने पुत्रों पर भी विश्वास नहीं करता था। उसे हर समय यह भय बना रहता था कि कहीं कोई शाहजादा उसे बंदी न बना ले। अंत में विफलता, विनाश और व्यथा का भार लेकर औरंगजेब 21 फरवरी 1707 ई. को इस संसार को छोड़ चल बसा। दौलताबाद से चार मील पश्चिम में खुलदाबाद में उसके शव को दफना दिया गया। खुलदाबाद (स्वर्गधाम) अनेक फकीरों का कब्रिस्तान था और मुसलमानों का विश्वास था कि यहां दफनाये गये लोग निश्चित रूप से जन्नत में पहुंच गये होंगे।

औरंगजेब का मूल्यांकन

कुछ आधुनिक विद्वानों ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि औरंगजेब धर्मान्ध शासक नहीं था। उनका तर्क यह है कि उसने केवल युद्ध काल में ही मंदिर तुड़वाये थे या फिर उन मंदिरों को तुड़वाया जो हिन्दुओं ने मस्जिदों के स्थान पर बनवा दिये थे। उसने तो कुछ मन्दिरों को जागीरें दी थी, वे तो उसके पूर्व सम्राटों द्वारा प्रदान की गई थी और औरंगजेब ने मात्र उनकी पुष्टि की थी। उसने पुष्टि भी इसलिये की थी कि वे लोग उसकी चालाकियों में सहायक थे। यदि उसने एक हिन्दू मठाधीश को जागीर दी तो हजारों मंदिरों को ढा दिया था और मठाधीशों की जीविका का अपहरण कर लिया था। इस तथ्य में भी कोई सच्चाई नहीं है कि उसने केवल युद्ध काल में ही मंदिरों को ध्वस्त करवाया था। यह सही है कि उसने ऐसे प्रदेशों को मुगल साम्राज्य में मिलाया था, जो उसके पूर्वज न मिला सके थे, लेकिन इसमें उसका उद्देश्य सारे देश को इस्लामी रंग से रंग देना था। किन्तु निजी जीवन में वह एक आदर्शवादी व्यक्ति था। वह बिना थके काम करता रहता था तथा भोजन और वस्त्रों में सादगी रखता था। यद्यपि उसने कुरान के निर्देशानुसार चार स्त्रियां रखी थी, किन्तु दूसरी स्त्रियों के प्रति उसे कोई आकर्षण नहीं था। उसे शराब या किसी अन्य चीज का व्यसन नहीं था। वह जन्म से ही विद्याप्रेमी था तथा अपने धर्म का दृढ़ता से पालन करता था। यदि उसके व्यक्तिगत जीवन में कुछ दोष थे तो यह कि वह महत्त्वाकांक्षी, जिद्दी, शंकाल और संकीर्ण धार्मिक विचारों वाला व्यक्ति था। वह सदैव दूसरों को गलत और अपने को ठीक समझता था। इस्लाम के अलावा वह सभी धर्मों को झूठा मानता था। उसमें पारिवारिक प्रेम नाम की कोई चीज नहीं थी। अपने पिता के लिए वह सुपुत्र नहीं था, राज्य प्राप्ति के लिए अपने भाइयों की हत्या करवाई और यहां तक कि वह अपने पुत्रों के प्रति भी शंकालू बना रहा।
सैनिक और सेनापति के रूप में उसकी तुलना बाबर और अकबर से की जा सकती है। घनघोर युद्धों में वह अपना संयम कभी नहीं खोता था। वह एक युद्ध-कुशल सम्राट था और अपने शत्रु की भूल और दुर्बलता का सदा लाभ उठाता था। षड़यंत्र और राजनीतिक चालाकियों में तो वह पारंगत था और उसमें निर्णय करने की असाधारण शक्ति थी। प्रबंधक के रूप में वह सरकार के छोटे से छोटे कार्य को बड़े ध्यान से देखता था। यद्यपि वह एक कर्तव्यपरायण शासक था, लेकिन उसमें राजा का उत्तम गुण नहीं था। कर्तव्य के सम्बन्ध में उसका विचार बड़ा संकीर्ण था। वह अपने को केवल सुन्नी मुसलमानों का शासक मानता था और गैर मुसलमानों को तब तक घृणित समझता था जब तक कि वे इस्लाम धर्म नहीं अपना लेते थे। इन्हीं विचारों के कारण वह विनाश करता रहा, निर्माण नहीं। न्याय करते समय भी वादी अथवा प्रतिवादी में से जो कोई इस्लाम स्वीकार कर लेता था, उसके पक्ष में निर्णय दे दिया जाता था। इतना ही नहीं, यदि हत्यारा भी इस्लाम धर्म स्वीकार कर लेता तो उसे क्षमा कर दिया जाता था। उसकी स्वेच्छाचारिता और अविश्वासी प्रवृत्ति के कारण बड़े-बड़े मंत्री और अधिकारी केवल क्लर्क मात्र रह गये थे। फलस्वरूप सारी शासन व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गयी। उसने देश की संस्कृति और स्थापत्य कला, संगीत और चित्रकला के विकास का कोई प्रयत्न नहीं किया। अपने शासन के अंतिम 26 वर्ष वह दक्षिण की लड़ाइयों में व्यस्त रहा, जिससे उत्तर भारत में अनेक विद्रोह उठ खड़े हुए और साम्राज्य में अशांति व्याप्त हो गई।
अतः औरंगजेब न तो सफल शासक सिद्ध हो सका और न सफल राजनीतिज्ञ । सर जदुनाथ सरकार ने ठीक ही लिखा है कि “यदि हम राजा के सम्बन्ध में विचार करें तो वह असफल ठहरेगा। वह तो राजा के सर्वप्रथम कर्तव्य से भी अनभिज्ञ था, अर्थात् वह नहीं जानता था कि समृद्ध जनता के बिना कोई राजा बड़ा नहीं हो सकता।" वास्तव में मुहम्मद अली जिन्ना को छोड़कर औरंगजेब के समान कोई दूसरा ऐसा व्यक्ति नहीं हुआ जिसने इस देश की जनता की दो मुख्य जातियों में भेदभाव की खाई को इतना चौड़ा किया हो। औरंगजेब भारत को एक इस्लामी राज्य बनाने की इच्छा रखता था, लेकिन उसकी यह इच्छा पूरी न हो सकी।
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