महिलाओं पर अत्याचार | mahilaon par atyachar

महिलाओं पर अत्याचार

महिलाओं की सबसे बड़ी प्रमुख समस्या उन पर होने वाला अत्याचार है। यह अत्याचार उनके यौन शोषण और यौन उत्पीड़न से सम्बन्धित होता है।
mahilaon par atyachar
स्त्रियों के प्रति अत्याचार निम्नलिखित रूपों में दिखाई पड़ता है-

महिलाओं पर अत्याचार के रूप

  • भेदभाव
  • देवदासी
  • अश्लील साहित्य
  • विज्ञापन
  • चलचित्र
  • कैबरे नृत्य
  • छेड़छाड़

वेश्यावृत्ति

यह विश्व का सबसे पुराना व्यवसाय माना जाता है। शायद जब से संगठित समाज है तब से वेश्यावृत्ति है। 1959 ई० में महिलाओं में अनैतिक व्यापार दमन का कानून पारित किया गया था परन्तु आज भी वेश्यावृत्ति संगठित रूप में पाई जाती है। प्राय: यह दो रूपों में प्रचलित है-एक ओर तो परम्परागत वेश्याएँ हैं जो बाजार में कोठों पर धन कमाने के लिए देह का व्यापार करती हैं और, दूसरी ओर, वे श्वेतवस्त्रधारी तथाकथित सम्मानित स्त्रियाँ हैं जो धन के लिए या अन्य भौतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बड़े-बड़े होटलों में या निजी कोठी में या किसी अन्य संगठित अड्डे पर यौन-व्यापार करती हैं। इस दूसरी श्रेणी की स्त्रियों को कॉलगर्ल कहा जाता है।
यह सच है कि कुछ स्त्रियाँ इस पेशे में आने को बाध्य की जाती हैं। झूठी शादी के द्वारा या प्रेमी द्वारा झूठे आश्वासनों में फंसाकर या अपहरण के द्वारा उन्हें इस पेशे में लाया जाता है और फिर मार-पीटकर उन्हें वेश्यावृत्ति के लिए बाध्य किया जाता है। परन्तु कुछ ऐसी स्त्रियाँ भी हैं जो वेश्यावृत्ति में स्वेच्छा से आती हैं या तो वे पैतृक रूप से इस पेशे में हैं या फिर उनकी गरीबी उन्हें इसकी ओर आकर्षित करती है। कभी-कभी ऐसे उदाहरण भी सामने आए हैं जहाँ विचित्र यौन आनन्द के आकर्षण ने स्त्रियों को इस पेशे की ओर आकर्षित किया है। परन्तु अधिकांशत: स्त्रियाँ इस पेशे की ओर मजबूरी से ही आती हैं। सामान्यत: स्त्री एक सम्मानित घर, पति और बच्चे चाहती है। यह समाज के लिए शर्म की बात है कि वहाँ ऐसी परिस्थितियाँ हों जो स्त्रियों को शरीर बेचने के लिए बाध्य करें।
वेश्यावृत्ति से समाज का नैतिक पतन होता है। सिफलिस व गनेरिया जैसे यौन रोग फैलते हैं। अब तो एड्स जैसा भयानक रोग भी फैलने लगा है जो सम्भोगजनित है और सबसे अधिक घातक है। वेश्यालय वह क्षेत्र है जहाँ अपराध पनपते हैं। वास्तव में यौन कोई वस्तु नहीं है जो बाजार में खरीदी या बेची जाए। यह तो मानव के स्वाभाविक, पवित्र व विपरीत लिंग के प्रति स्वेच्छा से प्रेम व समर्पण का विषय है। इसी के द्वारा नए जीवन का सृजन होता है। इसका क्रय-विक्रय न केवल हानिकारक ही है अपितु अमानवीय व घिनौना भी है।
'आनलुकर' (Onlooker) नामक पत्रिका में मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले की साँसी जाति की लड़कियों के सम्बन्ध में एक लेख में यह बताया गया है कि कैसे वे बम्बई के देह बाजार की ओर आकर्षित कर दी गई हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि उनमें से उनतीस साँसी लड़कियों को वेश्यालयों से पुलिस की सहायता से जब निकाला गया और वापस गाँव में लाकर उनके पुनर्वास का प्रयास किया गया तो उनमें से अधिकांश ने वापस पुन: अपने धन्धे में लौटना पसन्द किया। उन लड़कियों का कहना था कि वे गाँव के अनपढ़ व गरीब युवकों के साथ शादी करके गरीबी की जिन्दगी बिताने से कहीं बेहतर बम्बई और पूना के वेश्यालयों में जिन्दगी गुजारना समझती हैं। यह उदाहरण पूरी साँसी जाति की आर्थिक दयनीय दशा की ओर इशारा करता है।

देवदासी

आज भी कर्नाटक और आन्ध्र प्रदेश में येलम्मा और पोचम्मा के ऐसे मन्दिर हैं जहाँ बड़ी संख्या में प्रतिवर्ष देवदासियों के रूप में लड़कियों को समर्पित किया जाता है। परम्परा की दृष्टि से उसका कार्य देवता की सेवा करना है, परन्तु वास्तव में वे पुजारी और गाँव के जमींदारों की यौन भूख का शिकार बनती हैं और आखिर में वेश्यावृत्ति द्वारा अपनी जीविका चलाती हैं। धार्मिक अन्धविश्वास गरीब लोगों को ऐसी प्रथा का पालन करने के लिए प्रेरित करते हैं। कानून के द्वारा देवदासी प्रथा का उन्मूलन कर दिया गया है परन्तु फिर भी स्वस्थ जनमत के अभाव में कानून इस प्रथा को रोकने में नपुंसक सिद्ध हो रहा है। अब महिला संगठन ही इस दिशा में जागरूक हुए हैं और वे देवदासियों के पुनर्वास का कार्य कर रहे हैं और इस प्रथा के खिलाफ जन आन्दोलन चला रहे हैं। उनके प्रयासों में आशा की किरण दिखाई देती है।

अश्लील साहित्य

नग्न एवं अर्द्धनग्न स्त्री की तस्वीरों, काम चेष्टाओं और कुत्सित किस्सों पर आधारित अश्लील साहित्य भी बाजार में धन कमाने का एक सरल साधन बन गया है। अनेक पत्र-पत्रिकाएँ इस प्रकार की सामग्री द्वारा मानव की काम भावनाओं का शोषण करती हैं। अश्लील साहित्य किशोर-किशोरियों और युवाओं के नैतिक पतन का कारण बनता है और उन्हें गुमराह करता है। ऐसे साहित्य पर भी कानूनी रोक लगी है पर वह चोरी-छिपे बाजार में ऊंचे दामों पर मिल ही जाता है। इस व्यापार का आधार भी स्त्री का यौन शोषण ही है।

विज्ञापन

आज के व्यवसायों का मुख्य आधार विज्ञापन है और विज्ञापन स्त्री के अंग प्रदर्शन पर आधारित है। चाहे किसी वस्तु का स्त्री के जीवन से सीधा सम्बन्ध हो या न हो परन्तु उसके शरीर के उत्तेजक चित्रों के अभाव में विज्ञापन अधूरा समझा जाने लगा है। यही कारण है कि माडलिंग का व्यवसाय लोकप्रिय होता जा रहा है। यह विज्ञापन भी राष्ट्र के नैतिक पतन के लिए उत्तरदायी है। यह भी सिद्ध करता है कि स्त्री की देह एक वस्तु है जो सार्वजनिक रूप से विभिन्न प्रयोगों के लिए बाजार में उपलब्ध है। अनेक महिला संगठन ऐसे विज्ञापनों के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं।

चलचित्र

अधिकांश चलचित्र स्त्री के यौन शोषण के ज्वलन्त उदाहरण हैं। व्यावसायिक रूप से चलचित्र की सफलता के लिए यह आवश्यक समझा जाता है कि उसमें अर्द्धनग्न स्त्री के द्वारा कैबरे के दृश्य और असहाय स्त्री पर पुरुष के पुरुषत्व की ताकत को प्रकट करते हुए क्रूर बलात्कार के दृश्य अवश्य हों। अधिकतर चलचित्र पुरुष प्रधान होते हैं। नायिका तो प्रदर्शन के लिए एक गुड़िया मात्र दिखाई जाती है। जब लम्बे कामुक दृश्यों के द्वारा दर्शकों की कामवासना को उत्तेजित किया जाता है तो स्त्री का अपमान भी होता है। सच तो यह है कि स्त्री की देह उसकी निजी पवित्र धरोहर है जिस पर उसी का निरपेक्ष अधिकार होना चाहिए और किन्हीं भी मजबूरियों या प्रलोभनों से उसका सार्वजनिक प्रदर्शन सारे राष्ट्र के लिए लज्जा का विषय है। इस दिशा में आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए।

कैबरे नृत्य

नगरों में रेस्तराँ और होटलों में कैबरे नृत्य एक साधारण बात बनती जा रही है जहाँ नृत्य के नाम पर स्त्री के अंगों का उत्तेजक रूप में प्रदर्शन होता है, और कहीं-कहीं तो धीरे-धीरे नाचते हुए कपड़े उतारते हुए पूर्ण नग्नता का भी प्रदर्शन किया जाता है। शराब की गन्ध, सिगरेट के धुएँ और मध्यम रोशनी में खचाखच भरे हाल के बीच उत्तेजक म्यूजिक के साथ मांसल देह लिए थिरकती हुई स्त्री की उत्तेजक चेष्टाओं से सारा वातावरण ही कामुक बन उठता है। धन के लिए आज भी स्त्री उसी तरह नचाई जा रही है जैसे वह सदियों पहले नचाई जा रही थी।

छेड़छाड़

स्त्री की दैहिक समस्याओं में सबसे प्रमुख समस्या उनका छेड़छाड़ का शिकार होना है। बसों में, बाजारों में, स्कूल और कॉलेजों के प्रांगणों में वे पुरुष द्वारा छेड़छाड़ का शिकार होती हैं। उन पर आवाज कसना, उन्हें स्पर्श करने की चेष्टा करना, कुत्सित इशारा करना, चोंटना-नोचना एक आम बात बन गई है। उत्तर भारत में यह समस्या ज्यादा विकराल है। राजधानी दिल्ली में इसके खिलाफ स्त्रियों ने प्रदर्शन भी किया था और गुण्डागर्दी के खिलाफ अभियान की माँग की थी, परन्तु यह रुकता ही नहीं। इक्का-दुक्का गुण्डे पीटे भी जाते हैं या पुलिस उन्हें पकड़ भी लेती है तो कानून की लम्बी प्रक्रिया तथा गवाही आदि की जटिलता व असुरक्षा प्राय: उन गुण्डों। के बच निकलने का साधन बन जाते हैं।
स्त्रियों के प्रति होने वाले अत्याचार का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत में प्रति दो घण्टे में एक बलात्कार की घटना घट जाती है। सविया वेगास (SaviaVegas) ने उचित ही लिखा कि "दन्तविहीन कानून और नपुंसक जनाक्रोश' के कारण अपराधी बच निकलते हैं। इस दिशा में कुछ प्रशासकीय कदम उठाए गए हैं जिनमें एक तो बलात्कार सम्बन्धी कानून में यह संशोधन है कि बलात्कार नहीं हुआ, यह सिद्ध करने का भार अभियुक्त पर होना चाहिए न कि बलात्कार की शिकार स्त्री पर। 1983 ई० में सुप्रीम कोर्ट ने दो निर्णयों में क्रान्तिकारी दृष्टिकोण उपस्थित किया है। इनके अनुसार सर्वोच्च न्यायालय ने प्रतिपादित किया कि यदि बलात्कार की शिकार स्त्री का कथन सच दिखाई दे तो उस पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं है। मेडिकल रिपोर्ट या अन्य किसी सबूत का अभाव ऐसे बयान को झुठलाने में पर्याप्त नहीं माना जाना चाहिए। इस नए और जागरूक दृष्टिकोण से यह सम्भव हो सकेगा कि धनिक व्यक्तियों द्वारा या शक्तिशाली लोगों द्वारा किए गए बलात्कार की घटनाओं में दोषी को दण्ड मिल सके। 
यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि बलात्कार की घटना के बारह घण्टे भीतर ही मेडिकल साक्षी किया जाना कानूनी रूप से आवश्यक है ताकि सम्भोग के तथ्य की पुष्टि हो सके। कई बार सरकारी दबाव या सरकारी कर्मचारी होने के नाते अस्पताल के डॉक्टर बलात्कार की घटना में परीक्षण करने में कतराते हैं या झूठी रिपोर्ट देते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि किसी भी प्राइवेट डॉक्टर के द्वारा किया गया मेडिकल निरीक्षण कानूनी रूप से ग्राह्य हो और मेडिकल कौन्सिल ऑफ इण्डिया सभी डॉक्टरों के लिए यह अनिवार्य दायित्व घोषित कर दे कि वे बलात्कार के मामलों में उससे पीड़ित स्त्री के मेडिकल चैकअप की आवश्यकताओं की पूर्ति करें।
स्त्रियाँ शारीरिक हिंसा की शिकार अनेक साम्प्रदायिक दंगों या युद्धों में सदा से होती रही हैं। यहाँ भी पुरुष प्रधान सांस्कृतिक दृष्टिकोण का दोष है। शत्रु को सबसे अधिक अपमानित करने, उसका हौसला तोड़ने और उसे सबक सिखाने का सबसे कारगर तरीका यही समझा जाता है कि शत्रु की स्त्रियों का नग्न जुलूस निकाला जाए या उनसे सामूहिक बलात्कार किया जाए। यह पशुता मानवीय सभ्यता पर कलंक है। इस दिशा में स्वस्थ सांस्कृतिक पुनर्निर्माण की आवश्यकता है। स्त्री का शारीरिक स्वशुचिता को ही सर्वाधिक मूल्य समझना मूर्खता है और उसे बलात्कार या यौन उत्पीड़न को भी शरीर के अन्य अंगों पर की गई हिंसा के समकक्ष ही मानना चाहिए। हाँ, स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उसके साथ सम्भोग के अपराध के रूप में बलात्कारी को अतिरिक्त रूप से दण्डित किया जाना चाहिए।
इस भाँति, अनेक रूपों में स्त्री यौन शोषण और उत्पीड़न की शिकार है। इसके विरुद्ध अभियान तभी सफल हो सकता है जब जागरण हो और स्त्रियाँ शिक्षित व आत्म-निर्भर हों। हमें बच्चों के लालन-पालन और शिक्षा-दीक्षा का तरीका भी बदलना होगा ताकि पुरुष यौन के प्रति इतनी कुण्ठाओं से ग्रसित न हों और स्त्रियाँ अपनी रक्षा करने में आप समर्थ हो सकें।

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