मुगलों की धार्मिक नीति | muglo ki dharmik niti

मुगलों की धार्मिक नीति

औरंगजेब से पूर्व तक के मुगल सम्राटों ले धार्मिक क्षेत्र में उदार नीति अपनाकर सिद्ध कर दिया था कि यही भारत के शासक वर्ग के लिए उपयुक्त है। बाबर एवं हुमायूँ संघर्षों के कारण व्यवस्थित धार्मिक नीति की स्थापना न कर सके। अकबर ने धार्मिक उदारता की नीति अपनाते हुए भारत में राष्ट्रीय एकता स्थापित करने का प्रयत्न किया।
muglo ki dharmik niti
यद्यपि जहाँगीर एवं शाहजहाँ के शासनकाल में धार्मिक असहिष्णुता की नीति का बीजारोपण हो चुका था, तथापि सैद्धान्तिक रूप से उन्होंने अकबर की ही नीति को अपनाया। औरंगजेब एक धर्मान्ध शासक था। उसने हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाकर भारत में इस्लामी राज्य की स्थापना का प्रयास किया। अतः मुगल साम्राज्य को पतन का मुँह देखना पड़ा।

बाबर की धार्षिक नीति

भारत में मुगल साम्राज्य की नींव डालने वाला प्रथम मुगल बादशाह जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर सुन्नी मुसलमान था। वह ईश्वर में अगाध श्रद्धा रखता था। उसने कहा था, "ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध कुछ नहीं होता। उसकी दया पर निर्भर करते हुए हमें आगे बढ़ना चाहिए।" परन्तु बाबर धार्मिक दृष्टि से असहिष्णु नहीं था। उसने ईरान के शिया बादशाह शिया इस्माइल से संधि करके शियामत को अपने राज्य में फैलाने का वायदा किया था। उसने अपने दरबार में धार्मिक कट्टरता को कोई स्थान नहीं दिया। इसमें कोई संदेह नहीं कि बाबर ने भारत में युद्ध के अवसर पर धार्मिक असहिष्णुता की नीति का परिचय दिया था, जिसकी पुष्टि में कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। जैसे-खानवा के युद्ध में धर्मयुद्ध (जिहाद) की संज्ञा दी थी। इन दोनों युद्धों के पश्चात् उसने 'गाजी' (काफिरों का कत्ल करने वाला) की उपाधि धारण की और राजपूतों के सिरों की मीनारें खड़ी करवायी। मुसलमानों को 'तमगा' (व्यापारिक कर) से मुक्त कर दिया। उसने अयोध्या में रामचन्द्र जी के जन्म स्थान पर मंदिर तोड़कर मस्जिद का निर्माण करवाया, परन्तु बाबर की इस नीति का मूल उद्देश्य धार्मिक न होकर राजनीतिक था। बाबर ने ये कार्य मुख्यतया युद्ध के अवसर पर ही किए थे। शासन की ओर से भारतीय जनता के प्रति कोई धार्मिक कट्टरता की नीति बाबर ने नहीं अपनायी थी। डॉ. ए.एल. श्रीवास्तव ने लिखा है, “यहां की जनता के प्रति बाबर का व्यवहार सत्लनतयुग के शासकों के व्यवहार की भांति बुरा न था।" डॉ. एस.आर. शर्मा ने भी लिखा है, "ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि उसने धर्म के आधार पर कभी किसी हिन्दू मंदिर को नष्ट किया हो अथवा हिन्दुओं पर अत्याचार किया हों" डॉ. आर.पी. त्रिपाठी ने लिखा है, "ऐसा कोई उदाहरण नहीं है, जो यह प्रमाणित करे कि धार्मिक अत्याचार राज्य की नीति का भाग था अथवा इसे मुगल बादशाह बाबर का कोई नैतिक समर्थन प्राप्त था।" अतः स्पष्ट है कि बाबर व्यक्तिगत रूप से धार्मिक था, परन्तु असहिष्णु और धर्मान्ध शासक नहीं था। भारत में उसने धार्मिक असहिष्णुता के जो कार्य किये, वे राजनैतिक उद्देश्य से प्रेरित थे।

हुमायूं की धार्मिक नीति

हुमायूं धर्म में पूर्ण आस्था रखने वाला सुन्नी मुसलमान था परन्तु उसमें धार्मिक कट्टरता अथवा असहिष्णुता नहीं थी। सुन्नी मत का अनुयायी होते हुए भी वह शिया मत के प्रति बहुत उदार था। उसकी पत्नी हमीदाबानू बेगम तथा उसका मुख्य परामर्शदाता बैराम खां शिया थे। उसने भारत से निर्वासित होने के बाद अपने राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए ईरान के शिया शासक ने संधि की, जिसके अनुसार उसने शीया धर्म को मानने और उसका प्रचार-प्रसार करने का वायदा किया था।
हुमायूं ने हिन्दुओं के प्रति अपने पिता बाबर के समान उदारता तथा समानता का व्यवहार किया। युद्ध के अवसर पर उसने हिन्दुओं के साथ कठोर व्यवहार करते हुए कालिंजर के हिन्दू मंदिरों को नष्ट किया था, परन्तु हिन्दुओं के प्रति उसकी नीति को कटु नहीं माना जा सकता। उसके समय का ऐसा कोई उदाहरण प्राप्त नहीं होता, जिससे इस बात की पुष्टि होती हो कि उसने धर्म के आधार पर हिन्दुओं पर अत्याचार करने की नीति अपनार्य । हुमायूं साधारणतया धार्मिक कट्टरता से तटस्थ रहा। उसे सूफी संतों के धार्मिक विचारों को सुनने में बहुत आनन्द आता था। अतः स्पष्ट है कि हुमायूं व्यक्तिगत दृष्टि से धार्मिक प्रवृत्ति वाला था, परन्तु सम्राट की दृष्टि से उसकी धार्मिक नीति में असहिष्णुता के अंश प्राप्त नहीं होते।

अकबर की धार्मिक नीति

सभी इतिहासकारों ने समस्त मुगल बादशाहों में अकबर की धार्मिक नीति को सर्वश्रेष्ठ माना है। अकबर एक उच्चकोटि का सेनानायक, कुशल शासन-प्रबंधक और प्रतिभाशाली शासक ही नहीं था, अपितु एक सामाजिक और धार्मिक सुधारक भी था। ईश्वर में उसकी अगाध श्रद्धा थी, परन्तु उसकी नीति पूर्णतया धार्मिक सहिष्णुता की 'सुलहकुल' (सभी के साथ शांति) के सिद्धान्तों पर आधारित थी। उसने अपनी समस्त प्रजा को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की। इसके बाद उसने अपनी प्रजा को एक साझा धर्म देने का प्रयास किया, जिसके कारण राष्ट्र-निर्माण के कार्य को प्रोत्साहन मिला।
अकबर की उदारता और धार्मिक सहिष्णुता की नीति के निर्माण और विकास में विभिन्न परिस्थितियों ने सहायता दी।
अकबर का जन्म तथा पालन-पोषण ऐसे उदार वातावरण में हुआ था कि उसका बड़े होकर सहनशील तथा उदारचित्त होना स्वाभाविक था। अकबर का दादा बाबर और पिता हुमायूं धर्मान्ध नहीं थे, वे उदार तथा स्वतंत्र विचारों के थे। उसकी माता हमीदाबानों शिया थी, जो धार्मिक संकीर्णता से मुक्त थी। अकबर का संरक्षण बैराम खां शिया मुसलमान था। उसका शिक्षक अब्दुल लतीफ धार्मिक विचारों में इतना उदार था कि फारस में उसे सुन्नी समझा जाता था और भारत में उसे शिया माना जाता था। इस समय भक्ति आंदोलन तथा सूफी मत के नेताओं ने धार्मिक संकीर्णता का विरोध करते हुए ईश्वर की एकता और भाईचारे पर बल दिया। इसी प्रकार भक्ति आंदोलन ने भी अकबर को प्रभावित किया।
अकबर ने हिन्दू राजकुमारियों से विवाह किया था, उन्होंने भी उसके विचारों पर गहरा प्रभाव डाला। उसके हिन्दू अधिकारीयों-टोडरमल, भगवानदास, मानसिंह, बीरबल, जगन्नाथ कच्छावा आदि ने भी उसके विचारों को उदार एवं सहिष्णु बनाने में सहायता दी। शेख मुबारक और उसके दो विद्वान पुत्र अबुलफजल और फैजी ने भी अकबर की धार्मिक नीति को उदार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। यद्यपि यह ठीक है कि उपरोक्त सभी बातों ने अकबर को उदार धार्मिक नीति अपनाने हेतु प्रेरित अवश्य किया था, परन्तु उसकी उदारता और सहिष्णुता की नीति का प्रमुख आधार स्वयं उसका उदार स्वभाव, दार्शनिकता तथा जिज्ञासु धार्मिक प्रवृत्ति थी। अबुल फजल के अनुसार अकबर अक्सर फतेहपुर सीकरी के बड़े दरवाजे के बाहर एक पत्थर पर बैठकर प्रातःकाल घंटों तक ईश्वर के चितन में लीन रहता था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार अकबर ने राजनीतिक कारण से उदार धार्मिक नीति अपनाई थी। यदि इसे सत्य भी मान लें, तो भी इससे अकबर की महानता पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। वह बहुसंख्यक हिन्दू प्रजा और युद्धप्रिय राजपूत वर्ग की सहायता से एक मजबूत राज्य की स्थापना करने में सफल रहा था। इस प्रकार अकबर की धार्मिक सहिष्णुता की नीति का विकास सीढ़ी-दर-सीढ़ी हुआ था।
अकबर के धार्मिक विचारों के विकास में पहला चरण (1560-1575 ई.) वह आता है, जब उसने सहनशीलता की नीति को आरम्भ किया। प्रथम चरण में उसने 1562 ई. में दास-प्रथा को समाप्त कर दिया। इन उदार पगों को उठाने के बावजूद अकबर के व्यक्तिगत धार्मिक विचारों में कोई परिवर्तन नहीं आया। वह अभी भी एक सच्चे मुसलमान की तरह दिन में पांच बार नमाज पढ़ता था। इस प्रकार 1575 ई. तक अकबर इस्लाम के नियमों का पालन बड़ी दृढ़ता से करता रहा।
अकबर की धार्मिक नीति का द्वितीय चरण (1575-1580 ई.) है। उसने इस्लाम धर्म के बारे में अधिक ज्ञान प्राप्त करने की लालसा से 1575 ई. में फतेहपुर सीकरी में 'इबादतखाने का निर्माण करवाया और इस्लाम धर्म के सिद्धान्तों पर वाद-विवाद करने के लिए इस्लाम धर्म के सभी विद्वानों को आमंत्रित किया। अकबर उनके वाद-विवाद को सुनकर इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि इस्लाम धर्म के सिद्धान्तों पर भी इस्लाम के विद्वान एकमत नहीं हैं और वे संकीर्ण मनोवृत्ति तथा पररस्परिक ईर्ष्या व द्वेष के शिकार हैं। अकबर को इन सब बातों से दुःख हुआ और इस्लाम की श्रेष्ठता से उसका विश्वास हिल गया। इस कारण उसने इबादतखाने के दरवाजे हिन्दू, जैन, ईसाई और फारसी आदि सभी धर्मों के विद्वानों के लिए खोल दिए। परिणामस्वरूप हिन्दू धर्म के विद्वान पुरुषोत्तम और देवी, जैन धर्म के हीरविजय सूरी, जिनचन्द्र सूरी, शांतिचन्द्र, विजयसेन सूरी, पारसियों के दस्तूर जी मेहरजी राणा तथा ईसाई धर्म के पादरी भी इस इबादतखाने में उपस्थित हुए। इन सभी विद्वानों के वाद-विवाद को अकबर ने ध्यान से सुना। इसके बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि सभी धर्म मूलरूप से एक समान हैं, केवल उनके रीति-रिवाजों तथा बाहरी क्रियाओं में थोड़ा बहुत अंतर है। वाद-विवाद के दौरान अकबर ने यह भी अनुभव किया कि मुस्लिम धार्मिक वर्ग के उच्चतम नेताओं को इस्लाम के सिद्धान्तों का विशेष ज्ञान नहीं है और वे अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करते हैं। अतः सम्राट ने उनके कुप्रभाव राज्य से बचाने के लिए इस दिशा में शीघ्र ही पग उठाने का निश्चय किया।
अकबर ने मुल्लाओं के प्रभाव को कम करने के लिए 22 जून, 1579 ई. को फतेहपुर सीकरी की जामा मस्जिद में खुतबा पढ़ा। अबुल फजल के पिता शेख मुबारक ने इस खुतबे को तैयार किया था। इस खुतबे के द्वारा अकबर ने 'मुख्य इमाम' की उपाधि धारण की। इसके बाद सितम्बर, 1579 ई. में शेख मुबारक ने सम्राट के आदेश पर मजहर अथवा अभ्रांति आज्ञा-पत्र के द्वारा भारत में इस्लाम धर्म से सम्बन्धित सभी वाद-विवादों को सुलझाने तथा इस सम्बन्ध में अंतिम निर्णय करने का अधिकार अकबर को सौंप दिया गया।
मजहर-पत्र की आलोचना करते हुए बदायूंनी ने लिखा है, "इस पत्र के द्वारा धार्मिक झगड़ों को निपटाने की अंतिम शक्ति अकबर के अधिकार में आ गई है और उसके फरमान का विरोध करना संभव नहीं।' कुछ आधुनिक इतिहासकारों ने भी बदायूंनी के मत का समर्थन किया है। बी.ए. स्मिथ और सर बूल्जले हेग जैसे पाश्चात्य इतिहासकारों ने मजहर-पत्र को अचूक आज्ञा-पत्र की संज्ञा दी है। उनका कहना है कि इस पत्र की सहायता से अकबर अपनी प्रजा का धार्मिक तथा राजनीतिक नेता बन गया।
मजहर आज्ञा–पत्र के निरीक्षण से ज्ञात होता है कि पाश्चात्य इतिहासकारों की आलोचना न्यायसंगत नहीं है। इससे अकबर को यह अधिकार प्राप्त हुआ कि मतभेद होने पर वह इस्लाम के सिद्धान्तों के बारे में प्रस्तुत विधि–वेत्ताओं के मतों में से किसी एक को स्वीकार कर सकता था। इसके अतिरिक्त वह कोई ऐसा फरमान जारी नहीं कर सकता था, जो राष्ट्रीय हितों अथवा कुरान के नियमों के विरुद्ध हो। अतः स्पष्ट है कि अकबर ने उन्हीं अधिकारों को अपने हाथों में लिया था, जो अब तक उसके एक अधीनस्थ अधिकारी सद्र-उस-सुदूर (मुख्य सदर) के हाथों में थे। इस प्रकार अपने ही एक अधिकारी के अधिकारों को अपने हाथ में लेने से 'अकबर पोप' बन गया था अथवा बनना चाहता था, यह कहना उचित नहीं है। मुस्लिम धार्मिक वर्ग अकबर से इसलिए नाराज था कि सम्राट ने उनके धार्मिक अधिकारों के दुरुपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था।

दीन-ए-इलाही - अकबर ने 1582 ई. में दीन-ए-इलाही के नाम से एक नवीन मत या धर्म अथवा संघ स्थापित किया। इसके कुछ नियम कुरान से, कुछ हिन्दू धर्म से, कुछ जैन धर्म से एवं कुछ अन्य धर्मों से लिए गये थे। दीन-ए-इलाही का सरकारी जाम तौहीद-ए-इलाही' था। अबुल फजल इस मत का प्रधान पुरोहित था। जो व्यक्ति इस सम्प्रदाय का सदस्य बनना चाहता था, वह रविवार के दिन अपनी पगड़ी हाथों में लेकर अपना सिर सम्राट के चरणों में रख देता था। तब बादशाह उसे उठाकर पगड़ी पुनः उसके सिर पर रख देता था और उसे एक शिस्त (अंगूठी की भांति सोने की वस्तु) देता था, जिस पर 'अल्लाह-हू-अकबर' खुदा होता था। इसे प्राप्त करने पर व्ही दीन-ए-इलाही का सदस्य बन जाता था। दीन-ए-इलाही का सदस्य अकबर की रत्नजड़ित सोने की मूर्ति सिल्क के टुकड़े में लपेटकर अपनी पगड़ी के सिरे पर पहनता था।
दीन-ए-इलाही के सदस्यों की संख्या केवल कुछ हजार तक ही सीमित रही और उच्च वर्ग के व्यक्तियों में से केवल 18 व्यक्तियों ने ही इसे स्वीकार किया। इनमें अबुल फजल, फैजी तथा शेख मुबारक के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। प्रसिद्ध हिन्दुओं में से केवल बीरबल ने ही इस धर्म को स्वीकार किया था। राजा भगवानदास और मानसिंह ने इसका सदस्य बनने से इन्कार कर दिया, परन्तु अकबर ने उन पर कोई दबाव नहीं डाला।

आलोचना
दीन-ए-इलाही की स्थापना को लेकर कुछ इतिहासकारों ने अकबर की बड़ी आलोचना की है। बारतोली ने उसे अकबर की दूरदर्शितापूर्ण धूर्तता' की संज्ञा दी है। इतिहासकार स्मिथ ने भी लिखा है, "दीन-ए-इलाही अकबर की बुद्धिमत्ता नहीं, अपितु उसकी मूर्खता का प्रमाण था।"
डॉ. ईश्वरीप्रसाद, एस.आर. शर्मा तथा एस.एम. जाफर जैसे इतिहासकारों ने उपरोक्त मतों का खण्डन करते हुए लिखा है दीन-ए-इलाही को प्रचलित करने के पीछे अकबर का उद्देश्य धार्मिक नहीं था। यदि उसका उद्देश्य धार्मिक होता, तो वह इसके प्रसार के लिए राज्य के समस्त साधनों का प्रयोग करता, परन्तु उसने ऐसा नहीं किया। राजा भगवानदास और मानसिंह ने दीन-ए-इलाही का सदस्य बनने से इन्कार कर दिया, परन्तु अकबर ने उन पर कोई दबाव नहीं डाला। नवीन मत प्रचलित करने के पीछे उसका उद्देश्य राजनीतिक था। वह इसके माध्यम से हिन्दू और मुसलमानों को राष्ट्रीय एकता के सूत्र में बांधना चाहता था। अतः उसका यह प्रयास किसी भी दृष्टि से निंदनीय नहीं माना जा सकता। दीन-ए-इलाही अधिक समय तक प्रचलित न रह सका। अकबर की मृत्यु के साथ ही उसका भी अंत हो गया।
अकबर की धार्मिक नीति ने मुगल साम्राज्य के विस्तार और स्थायित्व में बहुत सहयोग दिया और अकबर को राष्ट्रीय सम्राट होने का गौरव प्राप्त हुआ।

जहांगीर की धार्मिक नीति

धार्मिक दृष्टि से जहांगीर का स्थान अपने पिता अकबर और पुत्र शाहजहां के मध्य में आता है। जहांगीर का ईश्वर में अगाध विश्वास था। वह हिन्दू और मुसलमान संन्यासियों का आदर करता था और उनकी संगति में उसे बहुत आनन्द आता था साधारणतया जहांगीर अपने धर्म के नियमों का पालन करता था, परन्तु धर्म में उसे विशेष रूचि न थी। इस्लाम के सिद्धान्तों का पालन भी वह कट्टरता से नहीं करता था। जहांगीर ने अकबर की भांति सभी धर्मों के प्रति सहनशीलता और सुलहकुल की नीति अपनाई थी। इसीलिए उसने हिन्दुओं को अपने राज्यकाल में सम्मानित पद दिये और उन पर किसी प्रकार के अतिरिक्त कर नहीं लगाए गए। इसी प्रकार ईसाइयों तथा अन्य धर्मावम्बियों के प्रति भी उदारता एवं सहिष्णुता की नीति अपनायी गयी।
परन्तु जहांगीर के समय में कुछ घटनायें अवश्य ही ऐसी घटित हुई, जिनसे यह स्पष्ट होता है कि यदा-कदा उसने धर्म का पक्ष लिया था। राजौरी के हिन्दुओं को उसने इसलिए दण्डित किया कि वे मुसलमान लड़कियों से विवाह करके उन्हें हिन्दू धर्म में परिवर्तित कर लेते थे। कांगड़ा की विजय के बाद उसने वहां एक गाय को कटवाकर जश्न मनाया था। उसने मेवाड़ और कांगड़ा के अभियान के समय हिन्दु मंदिरों को तोड़ने का आदेश दिया। अजमेर में उसने वाराह के मंदिर की मूर्तियों को तालाब में फिंकवा दिया था और पुर्तगालियों से युद्ध करते समय राज्य के समस्त गिरजाघरों को बंद करवा दिया था। एक बार उसने जैनियों से अप्रसन्न होकर उन्हें गुजरात से बाहर चले जाने के आदेश दिये थे। गुरु अर्जुनदेव को राजनीतिक कारणों से दण्ड दिया था, परन्तु उसके बाद सिक्खों के धार्मिक कार्यों में उसने कोई हस्तक्षेप नहीं किया। ये सब घटनाएं एक विशेष अवसर अथवा परिस्थिति के कारण थीं, अन्यथा हिन्दुओं से उसका घनिष्ठ सम्बन्ध था और वह उनके सभी त्यौहारों तथा उत्सवों में भाग लेता था। उसने हिन्दुओं को तीर्थ यात्रा करने अथवा मंदिरों के निर्माण की स्वतंत्रता दे रखी थी। वह ईसाई पादरियों को भी सजकोष से भत्ता देता था।
इसके अतिरिक्त जब हम यह देखते हैं कि जहांगीर ने असंतुष्ट होने पर मुस्लिम धर्म प्रचारकों जैसे शेख रहीम, काजी नूरुल्ला, शेख अहमेद सरहिन्दी आदि को भी दण्डित किया था, तो इससे यह स्पष्ट हो जाता हैकि उसने हिन्द, सिक्खों. जैन अथवा ईसाइयों के साथ कठोरता का व्यवहार धार्मिक कट्टरता के कारण नहीं, अपितु राजनीतिक परिस्थितिवश किया था। इस प्रकार जहांगीर अपने पिता की तरह धर्म के क्षेत्र में उदार नीति का ही पालन करता रहा।

शाहजहां की धार्मिक नीति

शाहजहां अपने धार्मिक विचारों में अकबर और जहांगीर की तुलना में अधिक अनुदार सिद्ध हुआ। वह कट्टर सुन्नी मुसलमान था और इस्लाम के नियमों का कठोरता से पालन करता था। वह नियमित रूप से नमाज पढ़ता था और रोजे भी रखता था। उसने दाढ़ी रखी थी, वह मुसलमानी ढंग के वस्त्र पहनता था। उसने हिन्दुओं को मुसलमानी ढंग से वस्त्र पहनने के लिए मना कर दिया था। वह शराब बहुत कम पीता था। उसने शासन के प्रारम्भिक वर्षों में धार्मिक कट्टरता का परिचय दिया। उसने सिजदा (बादशाह के आगे जमीन पर लेटकर दण्डवत प्रणाम करना) की इस्लाम विरोधी-प्रथा को बंद कर दिया, दरबार में इलाही सम्वत् के स्थान पर हिजरी सम्वत् आरम्भ केया था, हिन्दुओं को मुसलमान गुलाम रखने से रोक दिया। उसने दरबार में हिन्दू त्यौहारों के मनाने पर प्रतिबंध लगा दिया, जबकि मुसलमानों के त्यौहार पहले की तरह मनाये जाते रहे। उसने हिन्दुओं को नये मंदिर बनाने और पुराने मंदिरों की मरम्मत कराने से रोक दिया। उसने यह आदेश जारी किया कि उसके पिता के शासनकाल में निर्मित मंदिरों को गिरा दिया जाए। उसके समय में बनारस, इलाहाबाद, गुजरात और कश्मीर में बहुत-से हिन्दू मंदिर गिराये गये। अकेले बनारस में लगभग 72 मंदिर तोड़े गये थे। बुन्देला के जुझारसिंह के परिवार के कुछ सदस्यों को शाहजहां ने इस्लाम स्वीकार करने के लिए विवश किया। पुर्तगालियों से युद्ध होने पर उसने आगरा के गिरजाघर को तुड़वा दिया। राजौरी के हिन्दू, मुसलमान लड़कियों से विवाह करके उन्हें हिन्दू बना लेते थे शाहजहां ने आदेश दिया कि ऐसी सभी लडकियों उनके पतियों से छीनकर उनके मां-बाप को लौटा दी जाए और भविष्य में कोई हिन्दु मुसलमान लडकियों से विवाह न करे। शाहजहां ने अपने शासनकाल के सातवें वर्ष में यह आदेश निकाला कि हिन्दू द्वारा इस्लाम स्वीकार करने पर ही उसे अपनी पिता की सम्पत्ति का हिस्सा प्राप्त होगा। उसने हिन्दुओं को इस्लाम ग्रहणकरने के लिए प्रोत्साहित किया। युद्ध–बन्दियों को इस्लाम स्वीकार करवाने की प्रथा पुनः आरंभ की गयी, अपराधियों को इस्लाम स्वीकार करने पर मुक्त करने की व्यवस्था की। इस्लाम का अपमान करने वाले व्यक्तियों के लिए मृत्यु-दण्ड की व्यवस्था की गयी। इन सब बातों से यह स्पष्ट होता है कि शाहजहां ने अकबर की धार्मिक समानता की नीति को समाप्त कर दिया था, क्योंकि वह इस्लाम की श्रेष्ठता में विश्वास करता था।
शाहजहां की कट्टरता की धार्मिक नीति उसके आरम्भिक वर्षों तक ही सीमित रही। बाद में धीरे-धीरे इस कट्टरता में कमी आ गयी। आरम्भ में उसके द्वारा बनाये गये बहुत-से नियमों का बाद में पालन नहीं किया गया। उसने झरोखा दर्शन, तुलादान तथा हिन्दू शासकों के सिर पर तिलक लगाने की प्रथा को स्थापित रखा। बाद के समय में हिन्दू मंदिरों को तोड़ना बंद कर दिया। शाहजहां के दरबार में सुन्दरदास, चिंतामणि, सेनापति कवीन्द्राचार्य आदि हिन्दू विद्वानों को राजकीय संरक्षण प्राप्त था। उसने हिन्दुओं को शासन तथा सेना में ऊंचे पदों पर नियुक्त किया। राजा जसवंतसिंह और राज्य जयसिंह उसके बड़े अधिकारी थे। शाहजहां ने अहमदाबाद के चिंतामणि के मंदिर की मरम्मत की आज्ञा दे दी तथा कैम्बे के नागरिकों की प्रार्थना पर वहां गो हत्या बंद करा दी। हिन्दुओं के अतिरिक्त ईसाई धर्म के अनुयायियों के साथ भी उसने सहिष्णुता की नीति का पालन किया। इस कारण शाहजहां का शासनकाल धार्मिक असहिष्णुता तथा धार्मिक अत्याचार का काल नहीं माना जा सकता। फिर भी यह स्वीकार करना पड़ेगा कि शाहजहां का झुकाव धार्मिक संकीर्णता की ओर हो गया था और उसने अकबर के उद्देश्य को भुला दिया गया था।

औरंगजेब की धार्मिक नीति

औरंगजेब कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उसने शासक बनने के बाद धार्मिक असहिष्णुता की नीति अपनाई। कट्टर सुन्नी प्रजा उसे 'जिन्दा पीर' कहती थी। व्यक्तिगत जीवन में औरंगजेब ने जिन इस्लामी आदर्शों का पालन किया, उनके कारण वह समस्त मुगल बादशाहों में सबसे अधिक चरित्रवान बादशाह सिद्ध हुआ, परन्तु जब उसने व्यक्तिगत इस्लामी आदेशों को अपने सम्पूर्ण साम्राज्य में लागू किया, तब उनसे इतनी हानि हुई,जितनी किसी दूसरे मुगल बादशाह ने साम्राज्य को कभी नहीं पहुंचाई।
औरंगजेब धर्मान्ध था। उसने अकबर से भिन्न धार्मिक नीति अपनाई। उसका राजत्व सिद्धान्त इस्लाम का राजत्व सिद्धान्त था। इसलिए उसने भारत को दार-उल-हर्ब (काफिरों का देश) से दार-उल-इस्लाम (इस्लाम का देश) बनाने का निश्चय किया। अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने जीवनपर्यन्त प्रयास किया। परिणामस्वरूप उसने बहुसंख्यक हिन्दू प्रजा का विश्वास खो दिया। यही नहीं, उसकी धार्मिक नीति के कारण राजपूतों, जाटों, मराठों तथा सिक्खों ने विद्रोह कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि मुगल साम्राज्य पतन की ओर अग्रसर हो गया।
औरंगजेब ने सर्वप्रथम साम्राज्य में प्रचलित इस्लाम विरोधी नियमों को समाप्त किया। उसने सिक्कों पर कलमा खुदवाना बंद कर दिया, नौरोज का त्यौहार मनाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया, तुलादान और झरोखा दर्शन की प्रथा को बंद कर दिया, दरबार से नाचने-गाने वालों को निकाल दिया। भांग और शराब पीने पर प्रतिबन्ध लगा दिया तथा जुआं खेलना पूर्णरूप से बंद करवा दिया। वेश्याओं को विवाह करने अथवा देश छोड़ने के आदेश दिए गये। दरबार में हिन्दू त्यौहारों को मनाना बन्द कर दिया। औरंगजेब ने मुहतसिबों (धर्म-निरीक्षकों) को नियुक्त किया, जो यह देखते थे कि मुसलमान इस्लाम धर्म का ठीक से पालन करते हैं अथवा नहीं। औरंगजेब के समय में उदार शियाओं और सूफियों को भी दण्डित किया गया।
औरगजेब ने अपनी बहुसंख्यक हिन्दू प्रजा के प्रति कट्टर नीति अपनाई। उसने 1669 ई. में हिन्दू मंदिरों को गिराने के आदेश जारी कर दिये। इसके लिए एक पृथक् विभाग भी खोला गया। उसकी धार्मिक कट्टरता के कारण बनारस का विश्वनाथ मंदिर, मथुरा का केशवराय मंदिर और पाटन का सोमनाथ मंदिर नष्ट किया गया। मेवाड़ और मारवाड़ अभियान के दौरान भी औरंगजेब ने बहुत से मंदिरों को नष्ट कर दिया तथा उसे मस्जिद में परिवर्तित करवा दिया। यही नहीं, उसने हिन्दू पाठशालाओं को तोड़ने की आज्ञा दी, ताकि हिन्दू सभ्यता और संस्कृति का प्रचार बंद किया जा सके।
जजिया नामक धार्मिक कर अकबर ने हटा दिया था। औरंगजेब ने 1679 ई. में पुनः हिन्दुओं पर जजिया कर लगा दिया तथा इसे कठोरता से वसूल करने के आदेश दिये। हिन्दुओं पर पुनः तीर्थ यात्रा कर लागू किया गया। मुसलमान व्यापारिक कर से मुक्त रखे गये, जबकि हिन्दू व्यापारियों से वस्तु-मूल्य का 5 प्रतिशत चुंगी कर के रूप में लिया जाता था। हिन्दुओं को उच्च सरकारी पदों से हटाया गया तथा सेना में उन पर अप्रत्यक्षरूप से प्रतिबंध लगा दिया। औरंगजेने ने हिन्दुओं के त्यौहारों और उत्सवों के मनाने पर प्रतिबंध लगा दिया।
औरंगजेब की धार्मिक कट्टरता का उद्देश्य यह था कि किसी प्रकार हिन्दू विवश होकर इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लें। हिन्दू प्रजा को पद, धन, सम्मान का लालच तथा दण्ड से मुक्ति का प्रलोभन देकर इस्लाम का अनुयायी बनाने का प्रयास किया गया। इस्लाम धर्म स्वीकार करने वाले हिन्दू को उच्च पद प्रदान किये जाते थे। इस्लाम स्वीकार करने पर अपराधियों को जेल से मुक्त कर दिया जाता था।
औरंगजेब की इस कट्टर धार्मिक नीति के भयंकर दुष्परिणाम हुए। उसने मुगल साम्राज्य की एकता, शक्ति, शांति और समृद्धि को नष्ट कर दिया। उसकी धर्मान्धता के कारण जाटों, सिक्खों, सतनामियों मराठों तथा राजपूतों ने विद्रोह कर दिया। इन विद्रोहों के कारण साम्राज्य में अव्यवस्था फैल गयी। औरंगजेब ने इन विद्रोहों को कुचलने का प्रयास किया, परन्तु असफल रहा। उसने अपनी कट्टर धार्मिक नीति के कारण बहुसंख्यक हिन्दू प्रजा का विश्वास खो दिया। इस प्रकार उसकी यह नीति मुगल साम्राज्य की दुर्बलता के लिए उत्तरदायी सिद्ध हुई।
कुछ आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार औरंगजेब ने आर्थिक व राजनीतिक कारणों के आधार पर हिन्दुओं के प्रति धर्मान्धता की नीति अपनाई थी। अतः उसकी यह नीति पूर्णरूप से उचित थी। इन विद्वानों के अनुसार औरंगजेब ने हिन्दू मंदिरों को जागीरें दी थीं और उन्हीं हिन्दू मंदिरों को गिराया था, जहां पहले मुसलमानों की मस्जिदें थी। उनके इस कथन में सत्य का अंश तो अवश्य है, परन्तु ऐसे उदाहरण बहुत कम और केवल नाममात्र के हैं। तत्कालीन लेखकों के विवरणों में उनके पक्ष का समर्थन प्राप्त नहीं होता। केवल छुट-पुट उदाहरणों के आधार पर औरंगजेब के राज्यकाल के 50 वर्षों में उसके कार्यों तथा नीति को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
कुछ विद्वान इतिहासकार यह भी मानते हैं कि औरंगजेब ने आर्थिक आधार पर जजिया व तीर्थ यात्रा कर लगाये थे। इसे भी न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। अकबर के समय में औरंगजेब की तुलना में राज्यकोष काफी रिक्त था, परन्तु अकबर ने कभी भी इन करों को लगाने और मंदिरों तो तोड़ने की आवश्यकता नहीं समझी, क्योंकि वह यह अच्छी तरह जानता था कि इस प्रकार धार्मिक और सामाजिक एकता को बनाये नहीं रखा जा सकता। ऐसी स्थिति में हमारे सामने सिर्फ दो ही विकल्प हैं-या तो अकबर की नीति को अव्यावहारिक या अनुचित कहा जाए अथवा औरंगजेब की नीति को अव्यावहारिक और अनुचित कहा जाए? हम अकबर और औरंगजेब की धार्मिक नीति के परिणामों के आधार पर आंकलन कर सकते हैं। अकबर की नीति के फलस्वरूप मुगल साम्राज्य शक्तिशाली और समृद्ध हुआ और उसके उत्तराधिकारियों के समय में भी मुगल साम्राज्य शक्ति, समृद्धि और सांस्कृतिक दृष्टि से प्रगतिशील हुआ। इसके विपरीत औरंगजेब की नीति से मुगल साम्राज्य का प्रत्येक क्षेत्र में हास हुआ और उसके उत्तराधिकारियों के समय में मुगल साम्राज्य विनाश और पतन की ओर अग्रसर हो गया।
औरंगजेब संभवतया उन व्यक्तियों में से एक था, जो अपने ही विचारों और नीतियों को उचित मानता था तथा दूसरों के विचारों को सुनने या समझने के लिए तत्पर नहीं था। वह स्वभाव से कट्टर और जिद्दी प्रवृत्ति का था। अतः अपने विचारों में किसी प्रकार का परिवर्तन करने के लिए तैयार नहीं था। ऐसा व्यक्ति शासक होने की अपेक्षा एक फकीर या धर्म प्रचारक होता, तो वह इतनी आलोचना का पात्र नहीं बनता। एक अच्छा प्रचारक, अच्छी नीतिज्ञ और कुशल बादशाह नहीं हो सकता। यही बात औरंगजेब पर भी लागू होती है। यही कारण है कि औरंगजेब की धर्मान्धता की नीति उसकी असफलता का एक प्रमुख कारण सिद्ध हुई।

सारांश

उत्तर मुगलकालीन बादशाहों के समय में हुए धार्मिक कट्टरता और धार्मिक उदारता की नीति के संघर्ष में उदार विचारों को सफलता प्राप्त हुई। जहांदारशाह ने जजिया कर समाप्त कर दिया और फर्रुखसियर ने सैय्यद भाइयों के प्रभाव में आकर जजिया और तीर्थ यात्रा कर दोनों को ही समाप्त कर दिया। बाद में मुगल बादशाह इतने दुर्बल हो गये थे कि उनके लिए अनुदारता की नीति का पालन करना नितान्त असंभव था।
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